Posted by: Bagewafa | جنوری 15, 2014

दंगों की नैतिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते मोदी…एल.एस. हरदेनिया

दंगों की नैतिक जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते मोदी…एल.एस. हरदेनिया

"शैतान धर्म ग्रंथों की बात कर रहा है


नरेन्द्रमोदी के इस बयान के बाद कि उन्हें गुजरात के दंगों ने उनकी आत्मा को झकझोरदिया था। उन्होंने यह भी कहा कि उनके ऊपर हत्याओं का जो दोष लगा था उससेवे अंदर से चकनाचूर हो गए थे। इस संदर्भ में वह प्राचीन कहावत, ” शैतानधर्म ग्रंथों की बात कर रहा हैयाद आ रही है। मोदी ने ग्यारह साल के बादआत्मिक दु:ख की बात उस समय कही जब गुजरात की एक निचली अदालत ने उन्हेंगुजरात के दंगों के संदर्भ में दोषमुक्त घोषित किया। अदालत की नजर मेंकानून की बारीकियों के चलते वे भले ही दोषमुक्त पाए गए हों, परन्तुसंवैधानिक और नैतिक मापदंडों के अनुसार उन्हें किसी प्रकार से दोषमुक्तनहीं माना जा सकता है। जिस समय गुजरात में दंगे हुए थे नरेन्द्र मोदीमुख्यमंत्री थे। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे एक सख्त राजनीतिक नेताहैं। उनके मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए दंगे हुए वह अपने आप में उन्हेंदोषी करार देता है। जब दंगे हुए थे, मोदी ने यह कहा था कि यह क्रिया कीप्रतिक्रिया है। उस दौरान मोदी समेत अनेक भाजपा नेता यह कहते थे कि यदिगोधरा स्टेशन पर 56 लोगों की मौत आगजनी से नहीं होती तो गुजरात के अन्यस्थआनों पर दंगे नहीं होते। क्या यह बात किसी से छिपी है कि गोधरा की घटनाके बाद गुजरात की सरकार ने एक भी प्रतिबंधात्मक कदम नहीं उठाया था। इसकेठीक विपरीत ऐसे कदम उठाए गए जिनसे साम्प्रदायिक हिंसा ने वीभत्स रूप लेलिया। इस तरह की आपत्तिजनक गतिविधियों में शासन का वह निर्णय शामिल थाजिसके अनुसार जली हुई लाशों को खुले रूप से अहमदाबाद ले जाया गया। उनकासार्वजनिक रूप से पोस्टमार्टम किया गया। किसी भी इंसान की मृत्यु के बादशीघ्र से शीघ्र ही उसकी अंतिम क्रिया की जाती है और अंतिम क्रिया करने काअधिकार मृत व्यक्ति के परिवार का होता है। इस तरह की मान्यता सभी धर्मोंमें है। लाशों को आनन-फानन संबंधित रिश्तेदारों को नहीं सौंपना और उनकासार्वजनिक प्रदर्शन क्या अपने आप में अपराध नहीं है? क्या इस अपराध के लिएमुख्यमंत्री को उत्तरदायी नहीं माना जाना चाहिए? फिर गोधरा की जघन्य घटनाके बाद हर संभव ऐसे कदम नहीं उठाए जाना चाहिए थे जिससे हिंसक घटनाओं परनियंत्रण पाया जा सके? क्या गोधरा के बाद तुरंत संवेदनशील क्षेत्रों मेंकर्फ्यू नहीं लगाना चाहिए था और ऐसे आदेश जारी किए जाना था कि जो भीकर्फ्यू  का उल्लंघन करेगा उसे देखते ही गोली मारी जाएगी? ऐसा नहीं नहींकिया गया। जिन अधिकारियों ने ऐसे कदम नहीं उठाए और हजारों दंगाईयों कोखुलेआम सड़कों पर घूमने दिया गया। क्या सरकार के प्रमुख होने के नाते इसप्रशासनिक चूक के लिए मोदी को दोषी नहीं माना जाना चाहिए? क्या मोदी नेमुख्यमंत्री की हैसियत से एक भी ऐसे अधिकारी को दंडित किया जिसने हिंसा परनियंत्रण पाने के लिए आवश्यक प्रशासनिक कदम नहीं उठाए? इसके विपरीत ऐसेअनेक उदाहरण हैं, जिनमें मोदी ने ऐसे अधिकारियों को दंडित किया थाजिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में हिंसा पर नियंत्रण पाने का प्रयास कियाथा। साधारणत: जिस जिले में साम्प्रदायिक हिंसा भड़कती है और जिस पर शीघ्रनियंत्रण नहीं हो पाता है उस जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को तुरंत उसजिले से हटा दिया जाता है। मुझे याद है कि जब इंदौर में दंगा हुआ था उससमय तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने वहां के कलेक्टर और पुलिसअधीक्षक को तुरंत हटा दिया था। इसी तरह जब भोपाल में दंगा हुआ था, उस समयभाजपा नेता सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे। उन्होंने भी भोपाल के कलेक्टर औरपुलिस अधीक्षक को तुरंत हटा दिया था। याद नहीं पड़ता कि ऐसा कोई भी कदममोदी ने उठाया था। क्या इस भूल के लिए मोदी को दोषी करार नहीं माना जानाचाहिए?
गुजरात के दंगे इतने गंभीर थे कि प्रभावित क्षेत्रों केअधिकारियों के साथ स्वयं मोदी को भी मुख्यमंत्री के पद से हटा देना चाहिएथा। जब 1992 में बंबई में दंगे हुए थे उस समय सुधाकर नाईक मुख्यमंत्री थे।कांग्रेस के नेतृत्व ने नाईक को हटाकर शरद पवार को मुख्यमंत्री बनाया था।भाजपा के नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया। यद्यपि अब ये तथ्य सामने आए हैं कितत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राय थी कि नरेन्द्र मोदी कोत्यागपत्र देने के लिए कहा जाए। परन्तु लालकृष्ण आडवानी इसका विरोध कर रहेथे। वाजपेयी मोदी का इस्तीफा चाहते थे यह बात प्रधानमंत्री से संबंधित एकसीरियल में अभी हाल में बताई गई है। इस्तीफे की बात को सही बताया हैसुधीन्द्र कुलकर्णी ने जो वाजपेयी के काफी नजदीक रहे। इसलिए यह कहा जा सकताहै कि वह भाजपा जो छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर केन्द्रीय मंत्रियों काइस्तीफा मांगती है, उसे कम से कम मोदी को हटाकर उन्हें प्रतीकात्मक रूप सेदंडित करना था। परन्तु इस मामले में वाजपेयी की नहीं चली।  वैसे जिस अदालतके निर्णय से मोदी गदगद हैं वह सबसे निचली अदालत है। इसलिए अभी तो मामला औरऊंची अदालतों में जाएगा। अदालत ने भी जो तथ्य उसके सामने थे उन पर एकतरफाही विचार किया है। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन की टिप्पणी परध्यान नहीं दिया। जिन्होंने यह राय दी कि ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जिनकेआधार पर मोदी के विरुध्द कार्रवाई की जा सकती है। राजू रामचन्द्रन को विशेषजांच टीम के साथ सहयोग करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्त किया था।जांच टीम ने भी राजू रामचन्द्रन की राय की पूरी तरह उपेक्षा की थी। इसीआधार पर अदालत ने मोदी को निर्दोष घोषित किया है।
अदालत की राय कुछ भीहो परन्तु जन-मानस उस राय को स्वीकार नहीं करेगा। यह बात जगजाहिर है किमोदी के विरुध्द एक नहीं सैकड़ों ऐसे सबूत हैं जिनसे यह सिध्द किया जा सकताहै कि दंगों को भड़कने और दंगाइयों को संरक्षण देने में मोदी का न सिर्फ हाथ
था वरन् वे उन्हें प्रोत्साहित भी कर रहे थे।

 

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/4220/10/0
(12:02:45 AM) 10, Jan, 2014, Friday

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