Posted by: Bagewafa | جنوری 21, 2014

कैफी आजमी…..सुनील दत्ता

कैफी आजमी…..सुनील दत्ता

ज़िन्दगी जेहद में है, सब्र के काबू में नहीं, नब्जे हस्ती का लहू, कापते आँसू में नहीं,

वो मेरा गाँव है वह मेरे गाँव के चूल्हे की जिनमें शोले तो शोले धुँआ नहीं उठता

लड़ने से डरो मत, दुश्मन को खूब पहचानो और मौका मिले तो छोड़ो मत

19 जनवरी जन्मदिन है प्रगतिशील शायर कैफ़ी का

19 जनवरी 1919 सामन्तवाद, साम्प्रदायिकताऔर अराजक तत्वों के खिलाफ आवाज उठाने वाले मजहब और धर्म के नाम पर लड़ने-झगड़ने वालों को आड़े हाथों लेने वाले, गरीबी और नाइंसाफी को देश से उखाड़फेकने की तमन्ना रखने वाले मानवीय संवेदनाओं और असहाय लोगों की आवाज को जन-जन तक पहुँचाने वाले प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी पूर्वी उत्तर प्रदेश केआजमगढ़ जिले की फूलपुर तहसील से पांच- छ: किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटासा गाँव मिजवा। मिजवा गाँव के एक प्रतिष्ठित जमीदार परिवार में उन्नीसजनवरी 1919 को सैयद फतह हुसैन रिज़वी और कनीज़ फातिमा के चौथे बेटे के रूपमें अतहर हुसैन रिज़वी का जन्म हुआ। अतहर हुसैन रिज़वी ने आगे चलकर अदब कीदुनिया में कैफ़ी आजमी नाम से बेमिसाल सोहरत हासिल की कैफ़ी की चार बहनों कीअसामयिक मौत ने कैफ़ी के दिलो- दिमाग पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला। कैफ़ी केवालिद को आने वाले समय का अहसास हो चुका था। उन्होंने अपनी जमींदारी कीदेख-रेख करने के बजाय गाँव से बाहर निकल कर नौकरी करने का मन बना लिया। उनदिनों किसी जमींदार परिवार के किसी आदमी का नौकरी- पेशे में जाना सम्मान केखिलाफ माना जाता था। कैफ़ी के वालिद का निर्णय घर के लोगों को नागवारगुजरा। वो लखनऊ चले आये और जल्द ही उन्हें अवध के बलहरी प्रांत मेंतहसीलदारी की नौकरी मिल गयी। कुछ ही दिनों बाद अपने बीबी बच्चों के साथलखनऊ में एक किराए के मकान में रहने लगे। कैफ़ी के वालिद साहब नौकरी करतेहुए अपने गाँव मिजवा से सम्पर्क बनाये हुए थे और गाँव में एक मकान भीबनाया। जो उन दिनों हवेली कही जाती थी। कैफ़ी की चार बहनों की असामायिक मौतने न केवल कैफ़ी को विचलित किया बल्कि उनके वालिद साहब का मन भी बहुत भारीहुआ। उन्हें इस बात कि आशंका हुई कि लड़को को आधुनिक तालीम देने के कारणहमारे घर पर यह मुसीबत आ पड़ी है। कैफ़ी के माता-पिता ने निर्णय लिया कि कैफ़ीको दीनी तालीम (धार्मिक शिक्षा) दिलाई जाये।  कैफ़ी का दाखिला लखनऊ के एकशिया मदरसा सुल्तानुल मदारिस में करा दिया गया। आयशा सिद्दीक ने एक जगहलिखा है किकैफ़ी साहब को उनके बुजुर्गो ने एक दीनी शिक्षा गृह में इस लिए दाखिल किया था कि वह पर फातिहा पढ़ना सीख जायेंगे।कैफ़ी साहब इस शिक्षा गृह में मजहब पर फातिहा पढ़कर निकल गये

 तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो/क्या गम है जिसको छुपा रहे हो, गीत की पंक्तियों को आजादी के बाद की पीढ़ी में कौन सा शख्स ऐसा होगा जिसनेकभी न गुनगुनाया हो कोई ऐसा भी शख्स है जो यह गीत न गुनगुनाया हो जिससेउसके रोगटे खड़े न हुए हों कर चले हम फ़िदा जाने ए वतन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोकैफ़ी ने इन गीतों से पूरी दुनिया के आवाम को आवाज दी और कहा देश मेंसमाजवाद आया कि नहीं आया इस पचड़े में क्यों पड़ते हो और तुम अखबारनवीसों कोवैसे भी समाजवाद से क्या लेना देना है। एक झोंक में इतना बोलने के बाद बोलेदेखो, ”पेट के भूख और राख के ढेर में पड़ी चिनगारी को कमजोर न समझोजंगल में किसी ने पेड़ काटने से अगर रोका नहीं तो किसी ने देखा नहीं।यह समझने के भूल कभी मत करनागाँव- देहात का हर शख्स, खेती-किसानी से जुड़ा चेहरा मेहनतकश मजूर हो याखटिया- मचिया पर बैठा कोई अपाहिज, वह तुम्हारी हर चल को देख और समझ रहा है।वह भ्रष्ट अफसर शाही को खूब समझता है पर यह दौर समझने का नहीं बल्किसमझाने का है। अपने साथियो से मैं हर वक्त यही कहता हूँ-लड़ने से डरो मत, दुश्मन को खूब पहचानो और मौका मिले तो छोड़ो मत, अपनी माटी के गंध और पहचान को बनाये रखो, अपने हर संघर्ष में आधी दुनिया को मत भूलो, वही तुम्हारे संघर्ष की दुनिया को पूरा मरती है मागने के आदत बंद करो, छिनने के कूबत पैदा करो।देखो, तुम्हारी कोई समस्या फिर समस्या रह जाएगी क्या ?

बोले मेरे घर में तो खैर कट्टरपंथियोंजैसा कोई माहौल कभी नहीं रहा मगर भइया मैं तो गाँव के मदरसे कभी नहीं गया।हमें तो होली का हुडदंग और रामायण की चौपाई ही अच्छी लगती थी। कैफ़ी के येविचार उनको बखूबी बयां करती है खून के रिश्तेयह वाक्य उनके चिंतनविचार शैली और सोच के दिशा का न केवल प्रतीक है बल्कि उनके विशालव्यक्तित्व के झलक भी दिखलाती है। इसी दृश्य की झलक हमें उनके इन गीतों सेमिलती है, माटी के घर थे, बादल को बरसना था, बरस गये।गरीबी जलेगी, मुल्क से यह सुनते- सुनते उम्र के सत्तर बरस गये।सम्वेदना के धरातल पर दिल को झकझोर देने वाले शायर कैफ़ी की आवाज़ आज नहींतो आने वाले कल शोषित- पीड़ित की आवाज बनकर इस व्यवस्था को झकझोर कर रखेगीही बस वक्त का इन्तजार है।

सुल्तानुल मदारिसमें पढ़ते हुए कैफ़ी साहब 1933 में प्रकाशित और ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जब्त कहानी संग्रहअंगारेपढ़ लिया था, जिसका सम्पादनसज्जाद जहीरने किया था। उन्हीं दिनों मदरसे की अव्यवस्था को लेकर कैफ़ी साहब ने छात्रोकी यूनियन बना कर अपनी मांगो के साथ हडताल शुरू कर दी। डेढ़ वर्ष तकसुल्तानुल मदारिस बन्द कर दिया गया। परन्तु गेट पर हड़ताल व धरना चलता रहा।धरना स्थल पर कैफ़ी रोज एक नज्म सुनाते। धरना स्थल से गुजरते हुए अलीअब्बास हुसैनी ने कैफ़ी की प्रतिभा को पहचान कर कैफ़ी और उनके साथियो को अपनेघर आने की दावत दे डाली। वहीं पर कैफ़ी की मुलाक़ात एहतिशाम साहब से हुई जोउन दिनों सरफराज के सम्पादक थे। एहतिशाम साहब ने कैफ़ी की मुलाक़ातअली सरदार जाफरीसे कराई। सुल्तानुल मदारीस से कैफ़ी साहब और उनके कुछ साथियो को निकाल दियागया। 1932 से 1942 तक लखनऊ में रहने के बाद कैफ़ी साहब कानपुर चले गये औरवह मजदूर सभा में काम करने लगे। मजदूर सभा में काम करते हुए कैफ़ी नेकम्युनिस्ट साहित्य का गम्भीरता से अध्ययन किया। 1943 में जब बम्बई मेंकम्युनिस्ट पार्टी का ऑफिस खुला तो कैफ़ी बम्बई चले गये और वही कम्यून मेंरहते हुए काम करने लगे सुल्तानुल मदारीस से निकाले जाने के बाद कैफ़ी नेपढ़ना बन्द नही किया। प्राइवेट परीक्षा में बैठते हुए उन्होंने दबीर माहिर (फारसी ० दबीर कामिल ( फारसी ) आलिम ( अरबी ) आला काबिल ( उर्दू ) मुंशी (फारसी ) कामिल ( फारसी ) की डिग्री हासिल कर ली। कैफ़ी के घर का माहौल बहुतअच्छा था। शायरी का हुनर खानदानी था। उनके तीनों बड़े भाई शायर थे। आठ वर्षकी उम्र से ही कैफ़ी ने लिखना शुरू कर दिया। ग्यारह वर्ष की उम्र में पहलीबार कैफ़ी ने बहराइच के एक मुशायरे में गजल पढ़ी। उस मुशायरे की अध्यक्षतामानी जयासी साहब कर रहे थे। कैफ़ी की ग़ज़ल मानी साहब को बहुत पसंद आई औरउन्होंने काफी को बहुत दाद दी। मंच पर बैठे बुजुर्ग शायरों को कैफ़ी कीप्रंशसा अच्छी नहीं लगी और फिर उनकी ग़ज़ल पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया गयाकि क्या यह उन्हीं की गजल है ? कैफ़ी साहब को इम्तिहान से गुजरना पडा।मिसरा दिया गया- इतना हंसो कि आँख से आँसू निकल पड़ेफिर क्या कैफ़ी साहबने इस मिसरे पर जो ग़ज़ल कही वह सारे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में मशहूरहुई। लोगों का शक दूर हुआ काश ज़िन्दगी में तुम मेरे हमसफर होते तो ज़िन्दगी इस तरह गुजर जाती जैसे फूलो पर से नीमसहर का झोंकाज़िन्दगी जेहद में है, सब्र के काबू में नहीं, नब्जे हस्ती का लहू, कापते आँसू में नही, उड़ने खुलने में है निकहत, खमे गेसू में नही, जन्नत एक और है जो मर्द के पहलू में नहीं।उसकी आजाद रविश पर भी मचलना है तुझे, उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे। ( कैफ़ी )

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीयसचिव कामरेड अतुल अनजान कहते हैं कि कैफ़ी साहब साम्प्रदायिकता के घोरविरोधी थे। लोकतंत्र के जबर्दस्त हामी थे। गरीब मजदूरों, किसानों के सबसेबड़े पैरोकार थे। मार्क्सवादी दर्शन तथा वैज्ञानिक समाजवाद में उनकीजबर्दस्त आस्था थी। आवाज बड़े बुलंद थी। गम्भीर बातों को भी बड़ी आसानी सेजनता के सामने रखने की अद्भुत क्षमता थी। शब्दों का प्रयोग बहुत सोच समझकरनपे- तुले अंदाज में रखते थे। इसीलिए वे आवामी शायर थे। इसीलिए उनकी पहचानऔर मकबूलियत देश परदेश में थी। इतना विशाल व्यक्तित्व और अत्यंत सादे औरसरल। यही थे कामरेड कैफ़ी। मेरे जीवन में साहित्यिक अभिरुचि बनाये रखने केप्रेरणा स्रोत थे कामरेड कैफ़ी।

 कैफ़ी एक ऐसे संवेदनशील शयर थे जिन्हेंमुंबई की रगिनियत बाँध न सकी। जिले के कई नामवर मुंबई से लेकर इडियन द्वीपबार्वाडोस और सूरीनाम, अमेरिका, जापान तक गये लेकिन वहीं के होकर वहाँ रहगये। कई लोगों ने मुंबई को व्यावसायिक ठिकाना बनाया और जिले के मिट्टी केप्रति प्रेम उपजा तो चंद नोटों की गड्डियां चंदे के नाम व हिकारत की नजर सेयहाँ के लोगों को सौप दी; लेकिन कैफ़ी इसके अपवाद साबित हुए। उन्होंने एकशेर में जिक्र भी किया हैवो मेरा गाँव है वह मेरे गाँव के चूल्हे की जिनमें शोले तो शोले धुँआ नही उठताकैफ़ी ने ज़िन्दगी के आखरी वक्त को बड़ी सिद्दत के साथ अपने गाँव मिजवा कीतरक्की के नाम दिए। लकवाग्रस्त शरीर जो की व्हील चेयर पर सिमट गया था, केवावजूद उन्होंने यहाँ के विकास के ऐसे सपने संजोये थे, जो एक कृशकाय शरीरको देखते हुए कल्पित ख़्वाब की तरह नजर आता था। लेकिन कैफ़ी ने अपने अपाहिजशरीर को आड़े आने नहीं दिया। उन्होंने मिजवा में बालिका डिग्री कालेज खोलनेका सपना देखा था वो तो साकार नहीं हो पाया लेकिन आज मिजवा में बालिकाओं कामाध्यमिक विद्यालय उनके सपने को साकार करने का रह का सेतु बना। इसविद्यालय में बालिकाओ को कढ़ाई, बुनाई से लेकर आधुनिक दुनिया से लड़ने केलिए कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है। कैफ़ी का मानना था कि पनी मिट्टी सेकटा व्यक्ति किसी का भी नहीं हो सकता। जमींदार के घर में पैदा होने और लखनऊके शायराना फिजां में पलने- बढने के वावजूद कैफ़ी को मुज्वा की बुनियादीजरूरतें अक्सर खींचती रहती थीं। फतेह मंजिल नाम लोगों की जुबान पर बसे कैफीका यह आशियाना आज भी कैफ़ी की यादो का चिराग बना हुआ है और आने वाले सदियोंतक बना रहेगा। अजीब आदमी था वोमुहब्बतों का गीत था/ बगावतों का राग था/कभी वो सिर्फ फूल था/ कभी वो सिर्फ आग था/ अजीब आदमी था वो/ वो मुफलिसों सेकहता था कि दिन बदल भी सकते हैं/ वो जाबिरो से कहता था तुम्हारे सर पेसोने के जो ताज है /कभी पिघल भी सकते हैं/ वो बन्दिशों से कहता था/ मैंतुमको तोड़ सकता हूँ/ सहूलतो से कहता था/ मैं तुमको छोड़ सकता हूँ/ हवाओं सेवो कहता था/ मैं तुमको मोड़ सकता हूँ/ वो ख़्वाब से ये कहता था/ के तुझको सचकरूंगा/ मैं वो आरजू से कहता था/ मैं तेरा हम सफर हूँ/ तेरे साथ ही चलूँगामैं। तू चाहे जितनी दूर भी बना अपनी मंजिले कभी नही थकुंगा/ मैं वोज़िन्दगी से कहता था कि तुझको मैं सजाऊँगा/ तू मुझसे चाँद मांग ले मैं चाँदले आउंगा/ वो आदमी से कहता था कि आदमी से प्यार कर उजड़ रही ये जमी कुछइसका अब सिंगार कर अजीब आदमी था वो

कैफ़ी अपनी ज़िन्दगी से रुखसत होते- होते ये नज्म कही थी। पूरे दुनिया के मेहनतकश आवाम से- कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले उस इन्कलाब का, जो आज तक उधार सा है

http://bazmewafa.wordpress.com/2008/11/26/kaifi-azmi_shabana-azmi/

About The Author

सुनील दत्ता, रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। हस्तक्षेप.कॉम की टीम का अंग हैं।

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