Posted by: Bagewafa | جنوری 27, 2014

डर के सौदागरों के बीच उम्मीद के अरविन्द … शेष नारायण सिंह

डर के सौदागरों के बीच उम्मीद के अरविन्द
By शेष नारायण सिंह 25/01/2014 12:04:00

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हमारे सार्वजनिक जीवन में डर अब स्थायी भाव बनता जा रहा है, एक राष्ट्र के रूप में भी हम डर के कारण ही काम कर रहे हैं. हमारी राजनीतिक बिरादरी तो मुख्य रूप से डर का सौदागर बनी हुई है, वह दहशतफरोश के रूप में राजनीतिक कार्य कर रही है. अभी हाल में जब अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में संसद भवन परिसर के पास धरना दे दिया तो एकाएक व्यवस्था का डर दिखाकर अरविन्द केजरीवाल को अराजक घोषित कर दिया गया. राजनीतिक जमातों और बुद्धिजीवियों ने यह जताने की कोशिश की कि डरकर जीना गणतांत्रिक व्यवस्था है. देश की राजनीतिक जमातें और बुद्धिजीवी जिस तरह से आम आवाम में व्यवस्था का खौफ पैदा कर रहे हैं उसके बाद खतरा यह है कि कहीं देश की राजनीति का मतलब दहशतफरोशी ही न बन जाये. इस दहशतफरोशी को ही देश के भविष्य मान लेने की साज़िश में नेताओं के बाद अब बुद्धिजीवी भी शामिल हो गए हैं.
हालांकि यह भी सच्चाई यह है कि हमारे दौर के सभी दहशतफरोश बुजदिल हैं और वे हमारे पिछले एक सौ साल के इतिहास के कई पहलुओं की इज्ज़त नहीं करते. बीसवीं सदी की शुरुआत में इस देश की राजनीति का मुख्य भाव उम्मीद हुआ करती थी. आज़ादी के पहले के दौर में महात्मा गांधी ने जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती दी तो जलियांवाला बाग़ की तबाही के बाद की राजनीति का दौर शुरू हो चुका था. भारतीय सपनों को कुचल देने के उद्देश्य से ब्रिटिश साम्राज्य की फौज ने अमृतसर में निहत्थे इंसानों पर गोलियां चलाईं थी लेकिन उस समय आम आदमी की महत्वाकांक्षाओं की वाहक बन रही कांग्रेस के नेता महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की ताक़त को इतिहास के सबसे बड़े हथियार के ज़रिये ललकारा और पूरा देश उनके साथ खड़ा हो गया. हर आम-खास गांधी के साथ था. इस अभियान में महात्मा गांधी का हथियार था सत्य और अहिंसा और उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी आम आदमी के हौसलों की बुलंदी और उसके मन में हिलोरें मार रही आज़ादी की उम्मीद. महात्मा गांधी ने जलियांवाला बाग़ की तबाही के बीच में अपने देशवासियों को उम्मीद की एक किरण दिखा दी थी, भारत की आज़ादी की लड़ाई का उद्देश्य और साधन दोनों ही भारतीय जनमानस की आशाओं के बीच केन्द्रित कर दिया था. महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति का स्थायी भाव उम्मीद को बना दिया था, राजनीति के आशा पर्व की शुरुआत हो चुकी थी.
जिस आज़ादी की इच्छा ही उम्मीद की राजनीति से शुरू हुयी थी वह राजनीति आज पता नहीं किन अंधेरी गलियों में टामकटोइयाँ मार रही है, रास्ता भूल गयी है. आज हमारी राजनीति में डर स्थायी और संचारी भाव बन चुका है. डर दिखा कर राजनीतिक लाभ लेने की संस्कृति शुरू हो चुकी है और परवान चढ़ रही है .इस तरह का आचरण आज की राजनीति में चारों तरफ देखा जा सकता है. सबसे ताज़ा घटना उत्तर प्रदेश से आई है जहां वाराणसी और गोरखपुर में दो राजनीतिक सभाएं हुईं. वाराणसी में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने साफ़ ऐलान किया कि किसी भी हालत में फासिस्ट ताकतों को उत्तर प्रदेश के रास्ते केंद्र की सत्ता में नहीं आने देगें. उन्होने कहा कि बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के हाथ खून से सने हैं. वे २००२ में हुए गुजरात के नरसंहार में नरेंद्र मोदी की भूमिका का डर दिखा रहे थे. दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी वाराणसी से कुछ ही दूरी पर गोरखपुर में लोगों को मुलायम सिंह की पार्टी के राज के डर से वाकिफ करा रहे थे, वे बता रहे थे कि किस तरह से उत्तर प्रदेश की मौजूदा अखिलेश यादव की सरकार या पूर्ववर्ती मायावती सरकार ने लोगों के सपनों के साथ खिलवाड़ किया है. नरेंद्र मोदी ने अपने श्रोताओं को यह डर दिखाने की कोशिश की कि अगर इन लोगों की राजनीति को खारिज न किया गया तो किस तरह की मुसीबतों का अम्बार चारों तरफ लग जाएगा. मतलब यह कि अनिष्ट की आशंका से आगाह करते हुए दोनों ही नेता अपने श्रोताओं को अपनी दहशत फरोशी की राजनीति में शामिल करने की कोशिश कर रहे थे.

ऐसा नहीं है कि डर की यह राजनीति केवल मुलायम सिंह यादव या नरेद्र मोदी तक ही सीमित है. देश के हर कोने में दहशत के बल पर ही राजनीति हो रही है. मुंबई में पहचान की राजनीति करने वाली शिवसेना और उससे अलग हुए संगठन, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की राजनीति पूरी तरह दहशत फरोशी की राजनीति है. जब १९६६ में बाल ठाकरे ने शिव सेना की शुरुआत की थी तो दक्षिण भारत से आये हुए लोगों का डर स्थानीय मराठी माणूस को दिखाया गया था. अब वही दहशत उत्तर भारतीयों और बिहारियों के नाम पर फैलायी जाती है. उनके साथी भारतीय जनता पार्टी वाले हालांकि उत्तर भारतीयों के खिलाफ अभियान में तो शामिल नहीं होते लेकिन मुंबई की व्यापारिक ज़िंदगी में मुसलमानों के प्रभाव को अन्य लोगों में डर का कारण बनाने में कोई कसर नहीं रखते. पुराने बाम्बे राज्य से अलग कर के बनाए गए गुजरात राज्य में डर के निजाम के इर्दगिर्द बुनी हुयी सत्ता का पूरी दुनिया में उदाहरण दिया जाता है. २००२ को गुजरात के प्रमुख शहरों में योजनबद्ध तरीके से फैलाई गयी दहशत और उसके नतीजे में मिली हुई लगभग स्थायी सत्ता दुनिया के भर में राजनीतिशास्त्र के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है. वहां भी मुसलमानों को दहशत का शिकार बनाया गया और आज वहां किसी की हिम्मत नहीं है कि वह स्थापित सत्ता का विरोध कर सके. पंजाब में पिछले ३५ वर्षों से दहशत का राज कायम है. इंदिरा गांधी और ज्ञानी जैल सिंह के प्रयत्नों से जरनैल सिंह भिंडरावाले का आतंक के पर्यायवाची के रूप में अवतार हुआ था. बाद में दहशत के इस खेल ने क्या क्या नहीं किया. आपरेशन ब्लूस्टार, इंदिरा गांधी की ह्त्या, सिखों का नरसंहार, पंजाब में बहुत बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिको की ह्त्या और उनकी जीविका के साधनों की तबाही, सब कुछ दहशत फरोशी की राजनीति से ही जन्मा था और आज भी उसकी याद करके आदमी अन्दर से डर जाता है. पड़ोस के कश्मीर में भी हमेशा से डर राजनीतिक आचरण में रचा बसा रहा है. जम्मू-कश्मीर में आज चारों तरफ आतंक का माहौल है उस सबकी बुनियाद में दहशत ही है. आज़ादी के तुरन्त बाद वहां के राजा ने भारत को जिन्ना का डर दिखाकर सौदेबाज़ी करने की कोशिश की थी लेकिन जब जिन्ना ने ही कबायलियों के नाम पर पाकिस्तानी फौज से हमला करवा दिया तो राजा खुद दहशत का शिकार हो गया . उसको पाकिस्तानी कब्जे का डर इस क़दर सताने लगा कि उसने भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल की हर बात मान ली और भारत में शामिल हो गया लेकिन आज तक कश्मीर पर दहशत का साया जमा हुआ है. चारों तरफ दहशत ही दहशत है, आतंक ही आतंक है.

यही हाल आमतौर पर बाकी राज्यों का भी है. कम्युनिस्टों का डर दिखा कर ममता बनर्जी सत्ता में हैं तो उत्तर भारतीय आधिपत्य और हिंदी के प्रभाव का डर दिखाकर तमिल पार्टियां बारी बारी से राज कर रही हैं . तेलंगाना की दहशत में आज केंद्रीय भारत पूरी तरह से ग्रस्त है. माओवादी हिंसा की दहशत देश के एक बड़े भूभाग में आज आम ज़िन्दगी का हिस्सा है. पूर्वोत्तर के राज्यों में सेना की दहशत वहां पर हर तरह की राजनीति के केंद्र में है जबकि देश के विभाजन का डर दिखा कर वहां के सभी राजनेता अपना कारोबार चला रहे हैं. आज नरेंद्र मोदी जिस लाइन पर पूरे देश में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करना चाह रहे है उसमें भी यह दिखाने की कोशिश है कि अगर उनको प्रधानमंत्री न बनाया गया तो मुसलमानों का प्रभाव इतना बढ़ जाएगा कि एक हिन्दू बहुल देश के रूप में भारत की पहचान ही ख़त्म हो जायेगी. नरेंद्र मोदी का मौजूदा अभियान उनकी पार्टी के नेता और चिन्तक, डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के एक बहुचर्चित लेख पर भी आधारित माना जाता है. २०११ में मुंबई में हुए बम हमले के बाद डॉ स्वामी ने एक लेख लिखकर यह अपील की थी कि इस देश के हिन्दुओं को एक हो जाना चाहिए, वरना मुसलमान लगातार हमले करते रहेगें. उसी लेख में उन्होने मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की अपील भी की थी और वंदेमातरम् के गायन को अनिवार्य बनाने की बात को एक बार फिर दोहरया था.इस लेख के छप जाने के बाद जो विवाद शुरू हुआ उसके बाद बहुत कुछ बदल गया है. इस लेख के चर्चा में आने के बाद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के ऊपर अल्पसंख्यक आयोग ने मुक़दमा दर्ज करवाया, दिल्ली पुलिस ने भी कार्रवाई की और उनको अदालत से ज़मानत लेनी पडी. ज़मानत में यह शर्त है कि वे आइन्दा इस तरह के लेख नहीं लिखेगें.

आज की राजनीति में बहुत सारे नेता दहशत का कारोबार करते हैं , डर दिखा कर वोट लेते हैं लेकिन हमेशा ही से ऐसा नहीं था. आजादी के बाद जब जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने तो चारों तरफ उम्मीद ही उम्मीद थी , वह आदमी सपने तो नहीं दिखाता था लेकिन उसने उम्मीद की बात करके पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँध दिया था. अपने देश का पहला प्रधान मंत्री उम्मीदों की जमात का रहबर था. आजादी के शुरुआती पन्द्रह वर्षों में जवाहरलाल नेहरू ने जो बुनियाद डाली उसी का नतीजा है किस आज दुनिया में भारत का सर ऊंचा है , हालांकि जब १९६२ में चीन से युद्ध की नौबत आयी तो उम्मीद के इस राजनेता को भारी निराशा हुयी थी ,उसके बाद जवाहरलाल नेहरू में भारी बदलाव आया था लेकिन उन्होंने राजनीतिक विमर्श में दहशत को पैर नहीं पसारने दिया .यह भी सच है कि नेहरू के जाते ही देश की राजनीति में डर का युग शुरू हो गया था. १९६५ के पाकिस्तानी हमले के बाद से देश की राजनीतिक विमर्श की भाषा बदल गयी और आज जब राजनीति में आज़ादी की लड़ाई के महान नायकों के टक्कर का कोई नेता नहीं है तो चारों तरफ दहशतफरोशों का क़ब्ज़ा है . उम्मीद की जानी चाहिए कि अपने देश की राजनीति इन दहशतफरोशों के चंगुल से बाहर निकलेगी और जवाहरलाल नेहरू के विज़न को एक ईमानदार कोशिश के तहत अमली जामा पहनाने वाले नेता हमारी राजनीति में शामिल होंगें. यहाँ इस बात का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है कि नेहरू की राजनीतिक सोच का रूतबा ऐसा था कि उस दौर में कांग्रेस के अलावा भी जो राजनीतिक पार्टियां थीं वे भी उम्मीद को राजनीति का स्थायी भाव मानती थीं. मधु लिमये ने सोशलिस्ट आन्दोलन के बहुत सारे दस्तावेजों का संकलन किया है और जिस किताब में इन कागजात को संकलित किया गया है उस किताब का नाम ही एज आफ होप रखा है. यानी वह दौर ऐसा था जब उम्मीद की राजनीति हर राजनीतिक दल में थी. आज की तरह दहशतफरोशी नहीं कि डर दिखा कर वोट बटोर लिया जाए.

(visfot.com)

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