Posted by: Bagewafa | جنوری 29, 2014

आम आदमी पार्टी- राजनीति में उबाल…. राम पुनियानी

आम आदमी पार्टी- राजनीति में उबाल…. राम पुनियानी
Posted by: Amalendu Upadhyaya January 16, 2014 in आपकी नज़र

दिल्ली विधानसभा चुनाव (दिसंबर 2013) में आम आदमी पार्टी की शानदारसफलता ने इस साल होने वाले आम चुनाव के नतीजों के बारे में पूर्वानुमानोंऔर नजरिए को बदल दिया है। इससे चुनावी राजनीति के समीकरण भी परिवर्तित होगये हैं। यद्यपि दिल्ली में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और वहसरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर सकती थी परंतु उसने ऐसा नहीं किया। यहाँयह स्मरणीय है कि बाबरी मस्जिद के ध्वँस के बाद, 1996 में हुये आम चुनावमें भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, उसने सरकार बनाने का दावाप्रस्तुत किया था और अल्प समय तक दिल्ली से राज भी किया था। इस बारदिल्लीके मामले में उसका रूख अलग था और उसने आगामी आम चुनाव को दृष्टिगत रखतेहुये, दिल्ली में सरकार न बनाने का फैसला किया। शुरूआत में कुछ ना-नुकुरकरने के बाद, आप ने जनता की राय जानने का उपक्रम किया और उसके बाद बहुमतमें न होने के बावजूद सरकार बना ली।

इसके पहले कि हम दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों और आप की सरकार बननेसे राजनीति के प्रांगण में आये परिवर्तनों की चर्चा करें, हम उनपरिस्थितियों पर प्रकाश डालना चाहेंगे जिनके चलते आप उभरी। अरविंद केजरीवालद्वारा अन्ना हजारे को सामने रखकर चलाये गये भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन नेदेश को हिलाकर रख दिया था। इसआन्दोलनको व्यापक जनसमर्थन मिला। इसके समर्थकों में खाप पंचायतों से लेकर एमबीए औरआई.टी. इंजीनियर व बिल्डरों से लेकर छोटे व्यापारी तक शामिल थे। इसेमुख्यतः मध्यम वर्ग का समर्थन प्राप्त था। इस आन्दोलन को आरएसएस भी पर्देके पीछे से समर्थन दे रहा था और लोगों की भीड़ इकट्ठा करने में आरएसएस कामहत्वपूर्ण योगदान था।विरोध की इस लहर ने संसदीय व्यवस्था कोभी चुनौती दी परन्तु अन्ना-केजरीवाल के नेतृत्व में चले आन्दोलन के दबाव केबावजूद, संसद का अस्तित्व बना रहा। आन्दोलन के केन्द्र में थी यह माँग किभ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिये लोकपाल विधेयक लाया जाना चाहिए। इसके बादयह आन्दोलन दो धाराओं में बँट गया। एक धारा केवल कांग्रेस पर हमला करने कीहिमायती थी और इसकी आवाज बनीं किरण बेदी। दूसरी ओर, केजरीवालके नेतृत्व वाली दूसरी धारा हर तरह केभ्रष्टाचार के विरोधमें थी।

दूसरी धारा से उपजीआम आदमी पार्टी,जिसनेदिल्ली विधानसभा चुनाव से अपनी राजनैतिक यात्रा शुरु की। उसने मुख्यतःनगरपालिका स्तरके मुद्दों, विशेषकर बिजली, पानी पर जोर दिया और दिल्लीमें धूम मचा दी। आप जनता को यह समझाने में सफल रही कि उसकी नीयत नेक है औरउसकी पहुँचआम आदमीतक होगयी। झुग्गी झोपड़ी के लोगों में, चारों ओर व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रतिगुस्से को आप अपने प्रति समर्थन में बदलने में सफल रही। नतीजा यह हुआ किदिल्ली के वे नागरिक, जो बढ़ती कीमतों और रोजाना की जिंदगी की अन्यसमस्याओं से परेशान थे, उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर आप का दामन थाम लिया।आप, भाजपा-आरएसएस के आधार में भी कुछ हद तक सेंध लगाने में सफल रही परन्तुउसके समर्थक मुख्यतः वे थे, जो अब तक कांग्रेस का साथ देते आ रहे थे। यह भीहो सकता है कि कई लोगों ने, जो आप को वोट देने के इच्छुक रहे हों, उन्होंने इसलिये उसे वोट न दिया हो क्योंकि यह उसका पहला चुनाव था। आप कीजीत का संदेश स्पष्ट है। उसे स्थापित पार्टियों के विकल्प के रूप में जनताने स्वीकार कर लिया है। यह इस तथ्य से भी साफ है कि आप में शामिल होने केलिये देश भर में हजारों लोग आतुर हैं और उसके लिये काम करने की इच्छा रखतेहैं।

इसके पहले तक चुनावी परिदृश्य पर नरेन्द्र मोदी हावी थे, जिन्होंने‘‘गुजरात के विकास’’के अनवरत प्रचार के जरिए अपनी छवि एक ऐसे मजबूत नेता की बना ली थी जिसनेगुजरात में कमाल कर दिखाया है। भाजपा ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद काउम्मीदवार घोषित कर दिया था और मोदी को आरएसएस का सहयोग और समर्थन भीप्राप्त था।मोदी, गुजरातकत्लेआम में अपनी भूमिका पर पर्दा डालने में सफल हो गये थे और उन्होंनेइसके लिये एसआईटी की अपूर्ण जाँच रपट को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारासही ठहराये जाने के तथ्य का जमकर दुरूपयोग किया।सच यह है किउसी रिपोर्ट में मोदी के खिलाफ सुबूत हैं परन्तु जैसे तैसे मोदी अब तक सजासे बचे हुये हैं। मोदी की आम सभाएँ अत्यन्त सुनियोजित होती हैं। इन आमसभाओं और मीडिया एक हिस्से की मदद से मोदी ऐसा माहौल बनाने में सफल हो गयेमानो अगले चुनाव में उनकी विजय सुनिश्चित है।सोशल मीडियामें भी मोदी ने पैठ बना ली और वेबसाइटों और ब्लॉगों पर उनका गुणगान होनेलगा। इसके साथ ही, मोदी-भाजपा-आरएसएस कांग्रेस और विशेषकर राहुल गांधी परनिशाना साधते रहे। सरदार वल्लभ भाई पटेल की भव्य मूर्ति की स्थापना कीयोजना, रन फॉर यूनिटीव अन्य कई कार्यक्रम, मोदी के चुनाव अभियान का हिस्सा थे।

आप के उदय और इस एहसास ने कि वह भारतीय राजनैतिक परिदृश्य से जल्द गायबहोने वाली नहीं है, नागपुर में बैठे आरएसएस के शीर्ष नेताओं और मोदी की टीमने अपनी रणनीति बदल ली। अब उनके निशाने पर आप है। सोशल मीडिया औरमुँहजबानी प्रचार के जरिए केजरीवाल, प्रशांत भूषण व अन्यों पर कटु हमलेबोले जा रहे हैं। प्रशांत भूषण के इस सन्तुलित वक्तव्य की कि कश्मीर मेंसेना की तैनाती के सम्बंध में वहाँ के लोगों की राय को महत्व दिया जानाचाहिए, पर भारी बवाल मचा दिया गया।हिन्दू रक्षक सेनानामकसंगठन, जिसे आप संघ-भाजपा से जुड़ा हुआ बताती है, ने आप के दफ्तर मेंतोड़फोड़ की। यह अलग बात है कि स्वयं केजरीवाल ने भी इस वक्तव्य से अपने आपको अलग कर लिया है। आप को मिले अनापेक्षित भारी जनसमर्थन ने धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक ताकतों की इस आशंका को कुछ हद तक दूर किया है कि मोदीप्रधानमंत्री बन जायेंगे और उसके बाद देश में फासीवाद का युग शुरू होगा।केजरीवाल, मोदी को किस हद तक रोक पायेंगे यह कहना मुश्किल है। दोनों ओर सेविभिन्न कारक काम कर रहे हैं। आप की छवि में तेजी से आ रहे सुधार और उसकेबारे में लोगों की बदलती सोच को संघ-भाजपा-मोदी चुपचाप नहीं देखेंगे। बड़ेऔद्योगिक घराने भी चाहते हैं कि मोदी सत्ता में आयें क्योंकि वे सरकारीखजाने का मुँह उनके लिये खोलने में जरा भी संकोच नहीं करते। औद्योगिक घरानोद्वारा नियंत्रित मीडिया भी वर्तमान में आप के समर्थन में बात कर रहा है।

सन् 1998 में जब भाजपा एक बार फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी तब कुछअवसरवादी राजनैतिक समूह अलग-अलग आधारों पर उसका समर्थन करने के लिये तैयारहो गये। सौभाग्यवश उस समय मोदी नहीं थे। सौभाग्यवश उस समय मोदी के दाहिनेहाथ अमित शाह भी नहीं थे। सौभाग्यवश उस समय भाजपा की सीटें कम थीं और उसेआरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के एजेन्डे को लागू करते हुये भी अपने गठबंधन केसाथियों की इच्छा का सम्मान करना पड़ता था।इसबार यदि मोदी के नेतृत्व में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी तोसमीकरण एकदम अलग होंगे। भाजपा के पास अब देश पर शासन करने का अनुभव है औरमोदी के पास दुनियाभर की चालों का खजाना है।मोदी अब तक कानूनके लम्बे हाथों की पकड़ में नहीं आ सके हैं। उनकी गुजरात कत्लेआम मेंमहत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके शासनकाल में फर्जी मुठभेड़ हुयीं हैं, एक युवालड़की की जासूसी की गयी है और अब तीस्ता सीतलवाड और अन्य मानवाधिकाररक्षकों को फँसाने की तैयारी हो रही है।मोदीदूसरे भाजपा नेताओं से अलग हैं। अगर भाजपा सत्ता में आ गयी तो मोदी केनेतृत्व में वह पहले से कहीं अधिक आक्रामक होगी और अपनी चलायेगी।

आप की राजनीति क्या है? किसी पार्टी की राजनीति उसकी कथनी, करनी वघोषणापत्रों आदि से पता चलती है। आप ने अपनी नीतियों के बारे में अभी तककोई सुस्पष्ट दस्तावेज जारी नहीं किया है यद्यपि उसका एक दृष्टिपत्र अवश्यसामने आया है। आप का जन्मभ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनसे हुआ है। यहआन्दोलन सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था को लगे रोग पर केन्द्रित न होकरउसके लक्षण पर केन्द्रित था। इस आन्दोलन का लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन नहींथा। जो पार्टियाँसामाजिक परिवर्तनकी हामी होती हैं और जिनका समाज के दबे-कुचले और वंचित वर्गों के लिये कोईएजेन्डा होता है वे सामान्यतः बेहतर व्यवस्था की स्थापना की चाह से उपजतीहैं। उनकी सुविचारित नीतियाँ और कार्यक्रम होते हैं। भारतीय राष्ट्रीयकांग्रेस को ब्रिटिश औपनिवेषवाद से मुकाबला करना था और इसलिये उसने नवोदितभारतीय राष्ट्रवादकोस्वर दिया। भगतसिंह समाजवादी राज्य की स्थापना करना चाहते थे और उन्होंनेहिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की। अम्बेडकर ने वंचितवर्गों के श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिये इंडीपेन्डेन्ट लेबरपार्टी बनाई और बाद में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की नींव रखी। मुस्लिमश्रेष्ठि वर्ग अपना अलग राष्ट्र चाहता था और उसने मुस्लिम लीग की स्थापनाकी। हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग का एक हिस्सा हिन्दू राष्ट्र का स्वप्न देखता थाऔर इसलिये आरएसएस और हिन्दू महासभा अस्तित्व में आए। हाल के वर्षों मेंसोशलिस्ट पार्टियाँ भी अस्तित्व में आयी हैं। आप इस अर्थ में एक अलग तरह काप्रयोग है। वह अभी राजनैतिक दल का स्वरूप ग्रहण ही कर रही है और शायद उसकेनेतृत्व की यह सोच होगी की आन्दोलनों और आत्मावलोकन के जरिए शनैः-शनैःपार्टी की विचारधारा विकसित हो जायेगी। अब तक तो कश्मीर के मुद्दे परपार्टी ने अपने ही नेता की बात से किनारा कर लिया है- एक ऐसी बात से जो उससोच को प्रतिबिंबित करती है जिसके आधार पर हम भारतीय राष्ट्र का निर्माणकरना चाहते हैं।शिक्षा के मुद्दे पर आपकी प्रस्तावित नीति क्षेत्रवादी है। कई गम्भीर मुद्दों पर उसका दृष्टिपत्रचुप है। पार्टी के निर्माण का यह दौर चुनौतीपूर्ण है। मुख्य मुद्दा यह हैकि क्या आप अपनी सतही सोच से ऊपर उठकर आर्थिक नीति, सामाजिक व लैंगिक न्याय आदि जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलन्द करेगी।आप से लोगों की ढेरों अपेक्षाएँ हैं। केवल समय ही बतायेगा कि शुरुआती दौरकी मुश्किलातों से उबरने के बाद पार्टी किस रास्ते पर आगे बढ़ेगी।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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