Posted by: Bagewafa | فروری 6, 2014

मुझे जलता हुआ घर याद है……इमरान प्रतापगढी

मुझे जलता हुआ घर याद है……इमरान प्रतापगढी

 

तुम कहते हो फौलाद है मुझे जलता हुआ घर याद है
जाने कीतनी बस्ती उजाड , जो सत्ता पर आबाद है
पी.एम पद की गरिमाका वो हकदार नहि हो सकता है
एक कातिल पुरे भारतका सरदार नहि हो सकता है.

एक शख्स महात्मा गांधीके मजमून बेचता फिरता है
नफरतकी तराजु पर रखकर कानून बेचता फिरता है
जो चाय बेचता फिरता था कल तक ट्रेन के डिब्बो में
पी.एम पदकी खातिर वो सब का खून बेचता फिरता है

जो खून बहा गुजरातमें वो बेकार नहि हो सकता है
एक कातिल पुरे भारतका सरदार नहि हो सकता है.

गर जीत ही का पैमाना है तो क्या फूलनको मसीहा मानु में
डकवा को डकेत ना बोलुं, विरप्पना को मसीहा मानु में
इस देश में राम भी जन्में थे इस देश क्रिश्न भी जन्मे थे
क्या चाहते हो इस देशमें , ये रावण को मसीहा मानुंमें

मेरा जमीर चुप रहनेको तैयार नहि हो सकता है
एक कातिल पुरे भारतका सरदार नहि हो सकता है.

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