Posted by: Bagewafa | فروری 11, 2014

बहार लौट आयेगी …..गौहर रजा

बहार लौट आयेगी …..गौहर रजा


हवा चली तो

पतझरों ने धरतीयों को चूम कर कहा

बहार लौट आयेगी

खिजा है चंद रोज कि बहार लौट आयेंगी

बहार ओ

जिसके धुन में मजनूओं ने बेखतर नईहदोंको छू लिया

कि जिस मंदिर का गारा खून में गूंधा गया हो

कि जिसकी सारी इटें

बस्तीयों में  आग सुलगा कर

पकाई जा रही  हों

कि जीसकी घंटियों में

सीसकियां आह ओ बका, चीखें

पीरोई जा रही हों

कि जीस मंदीर कि बुनियादें

वतन की सब जडों को खोड कर तामीर की जायें

कि जीस के रंग ओ रौगन को

हजारों औरत की मांग के सिंदूर की

वहशी जरूरत हो

कि जीसके पत्थरोमें

नक्श जब उभरे तो युं उभरे

नजरे आये

कीसी  मासूमकी बिन्दी

कीसी मजबूरकी चीखें

कीसी बुढे की उम्मीदें

कीसी कमसीन जवानीकी

सिसकती आखरी सांसे

उसे मर्यादा पुर्सोत्तम का  मन्दिर

नाम देना पाप होगा

करो तुम पाप

करते ही रहे हो

मगर मुझसे तो ये हरगीज न होगा

में उसको राम का मन्दिरनहीं कह पाऊंगा हरगीज

में उसको राम का मन्दिरनहीं नहीं कह पाऊंगा हरगीज

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बहार ओ

जो रहबरो ने पाकर खो दिया

बहार ओ

जो जिसके रहजनों के हाथ बेच कर खिजा खरीद लाये थे
ये रहजनों की

रहजनी तो संगे नीले राख है

जो जिंदगी कि मोहनी से अब भी तुझ को चाह है

मैं जिंदगी के शान में फिर कशिदे गाऊगा
मैं फिर लौ लगाउगा ,

मै फिर से दीप जलाउगा

करूगाफिर से तेज तर कलम के नस्तरो की धुन में

मेहनतो कि देवता से फिर कहुगा या खुदा

समेट ले वजूद को

बजूद को समेट के

तु अपनी चुपी को तोड दे
फिर एक बार लब्जे कुन्ब से

फिर हो नया जहा अता

वही समर हो फिर अता

मैं जिसको चख के कह सकू मुझे जहांन चाहिए

ये स्वर्ग -नरक साथ है सराद ही सराद

चंद है इधर उधर तो लाखों लाख है


मुझे तो अपनी धरतीयों पर बहार चाहिए

मुझे तो अपनी धरतीयों पर बहार चाहिए

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