Posted by: Bagewafa | فروری 11, 2014

क्या मोदी दोषमुक्त हैं? ……. प्रफुल्ल बिदवई

क्या मोदी दोषमुक्त हैं? ……. प्रफुल्ल बिदवई

 

अहमदाबादके मजिस्ट्रेट बीजेगणात्रा द्वारा दिसंबर 2013 में गुजरात नरसंहार मामले में जांकिया जाफरी कीयाचिका खारिज करने और 2002 में तकरीबन 2000 मुस्लिमों की हत्या के व्यापक  षड़यंत्र में नरेन्द्र मोदी का हाथ नहीं होने का फैसला दिए जाने के बाद संघपरिवार ने बड़े उत्साह से अभियान शुरू कर दिया है। अब 1984 के दंगे मेंमारे गए सिखों के बहाने कांग्रेस पर उंगली उठाई जा रही है, लेकिन 1984 केइस कत्लेआम को रोकने में अगर कांग्रेस असफल रही हो तब भी इससे मोदीदोषमुक्त नहीं हो सकते।सरकारी रेकार्ड्स और 30 से अधिक राष्ट्रीय एवंअंतरराष्ट्रीय आयोगों की जांच में प्रचुर प्रमाण मिलते हैं कि सन् 2002 कावह कत्लेआम अनायास नहीं, बल्कि उनके द्वारा उकसाने पर हुआ था। उपरोक्तफैसले पर ज् ाकिया की अपील अभी तक सुनी नहीं गई है। इस बीच मीडया मेंप्रकाशित लेखों से यह भ्रम फैल गया है कि मोदी के खिलाफ कोई मामला है हीनहीं।वे इस आरोप को आधार बना रहे हैं कि गोधरा में ट्रेन की बोगी जलनेऔर उसमें 59 लोगों के मारे जाने के बाद मोदी ने वरिष्ठ अधिकारियों की बैठकबुलाई थी उसमें क्रिया पर प्रतिक्रिया की बात करते हुए कहा कि हिन्दुओं कोमुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा उतारने दो। उनका यह भी तर्क है कि सुप्रीम कोर्टद्वारा नियुक्त विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने  इस आरोप को नकार दिया है।मोदी द्वारा कही गई बातों के एकमात्र गवाह, पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट नौसाल तक खामोश रहे। उनकी पत्नी ने मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा। इससे एसआईटी कीनज् ारों में उनको अविश्वसनीय गवाह बना दिया।लेकिन सुप्रीम कोर्ट उसकीरिपोर्ट से संतुष्ट नहीं थी। इसलिए एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अधिवक्ताराजू रामचंद्रन को एसआईटी  द्वारा इकट्ठा किए गए सबूतों की स्वतंत्र रूप सेजांच करने हेतु नियुक्त किया। रामचंद्रन ने अनुशंसा की कि भट्ट से फिर सेपूछताछ की जाए और मोदी पर, 27 फरवरी के बाद के उनके वक्तव्य एवं अन्यविधि-विरुध्द गतिविधियों के लिए मुकदमा चलाया जाए। (इंडियन पीनल कोड कीधारा 153ए एवं 153बी- समूहों के बीच शत्रुता फैलाने और राष्ट्रीय एकता परपक्षपात का लांछन लगाने तथा धारा 166- जनसेवकों द्वारा कानून की अवहेलनाकरने के तहत)। लेकिन न्यायाधीश गणात्रा ने इस अनुशंसा को खारिज कर दिया।ज्ाकिया ज् ााफरी की याचिका केवल 27 फरवरी की बैठक तक ही सीमित नहीं है। औरभी सबूत पाए गए जिसमें गोधरा में मृत जनों के शव अहमदाबाद लाने का फैसला; उन शवों को हिन्दुत्व आंदोलनकारियों को सौंपना जिन्होंने उनकी परेड निकाली, इंटेलिजेंस की चेतावनी की अनदेखी करना, खून की प्यासी भीड़ को इकट्ठा होनेदेना, फायर ब्रिगेड को निष्क्रिय करना, संघ परिवार सदस्यों को हथियार जमाकरने की अनुमति देना और पुलिस कंट्रोल रूम्स में मंत्रियों को बिठा देनाताकि मारकाट चलती रहे; आदि शामिल हैं।श्री गणात्रा ने इसकी अनदेखी करतेहुए नरसंहार को अनायास घटी घटनाबता दिया। एक शोधकर्ता ने विश्वासयोग्य प्रमाणके साथ रहस्योद्धाटन किया है कि घटना अनायास नहीं घटी थी। यहहिंसा वहां नहीं हुई जहां भाजपा बहुत मजबूतया बहुत कमजोरथी बल्किवहां हुई जहां भाजपा को सबसे बड़ी चुनावी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ाथा।श्री गणात्रा ने यह भी कहा कि ज् ाकिया ज् ााफरी की अभिव्यक्ति मेंइथनिक क्लींसिंग‘ (जाति का परिशोधन)  और जिनोसाइड‘ (जातिनाश) जैसेविदेशी शब्दआए हैं और इसीलिए गुजरात में कार अमल नहीं हैं। दूसरे शब्दोंमें, गुजरात जिनोसाइडनहीं कर सकता! भारतीय न्याय के इतिहास में यहफैसला एक काला धब्बा एवं गुजरात न्यायतंत्र के क्षरण और साम्प्रदायिकरण काप्रमाण है।इसके बरक्स राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की 2002 की रिपोर्टमें यह मुद्दा तीक्ष्ण होकर उभरा है। इसमें कहा गया है कि गुजरात केनागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा करने में यह एक बड़ी असफलतारही।सुप्रीम कोर्ट ने भी मोदी सरकार पर आपराधिक उपेक्षा का आरोप लगाया थागुजरात जल गया और गुजरात के नीरो बंसी बजाते रहे।गुजरात के कुछ मामलोंको सुनवाई के लिए महाराष्ट्र भेज दिया गया जिनमें 39 प्रतिशत मामलों मेंसजा सुनाई गई, गुजरात में सुनाए गए फैसलों से आठ गुना यादा। भारत के उच्चन्यायालयों को गणात्रा का फैसला उलट देना चाहिए और मोदी पर फिर से मुकदमाचलाना चाहिए। न्याय की सुरक्षा के लिए, और अधिक असाधारण कदम उठाने चाहिए।सन् 2002 का गुजरात नरसंहार 1984 के दिल्ली नरसंहार से यादा बदतर था जिसमेंकुछ कांग्रेस नेताओं ने सिख विरोधी हिंसा के लिए उकसाया और राय ने इसेप्रश्रय दिया। सरकार की जिम्मेदारी  प्रत्यक्ष नहीं थी। गुजरात में भाजपासरकार ने योजना बनाकर, अधिकृत रूप से हिंसा को अंजाम दिया। यह सब मई तकचलता रहा। उसकी जिम्मेदारी निर्देशित थी।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह औरकांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कम से कम दिल्ली नरसंहार के लिए माफीमांग ली है। लेकिन गुजरात हत्याकांड के लिए (पीड़ितों की अनंत पीड़ा केबावजूद), धर्मनिरपेक्षता के प्रति लोगों की आस्था को नुकसान पहुंचाने केलिए, न्यायप्रणाली एवं भारत की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को नुकसानपहुंचाने के लिए मोदी अपनी छप्पन इंच की छाती के साथ पश्चाताप जताने से भीनिष्ठुरतापूर्वक इंकार कर देते हैं।बहरहाल, गुजरात कांग्रेस ने उसनरसंहार के लिए कभी भी मोदी का विरोध नहीं किया। वह काम  धर्मनिरपेक्षआंदोलनकारियों एवं स्वयंसेवी संगठनों के लिए छोड़ दिया। इसे बदलना ही चाहिए।भाजपा की बी टीमबनकर कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं रह जाता। उम्मीद हैकि सोनिया गांधी ने हाल ही में भाजपा पर विष बोनेका जो आरोप लगाया है, उसे गंभीरता से लिया जाएगा वरना कम से कम ग्यारह वाम एवं क्षेत्रीयपार्टियों के उभरते साम्प्रदायिक विरोधी मोर्चे के दबाव में लेना पड़ेगा।कांग्रेसएक संभावित हार का सामना कर रही है। सर्वे बताते हैं कि उसकी लोकसभा सीटें 206 से गिरकर 100 तक जा सकती हैं। यहां तक कि आपातकाल के बाद उठी चुनावीलहरमें दक्षिणी रायों को कब्जे में रखकर 154 सीटों से चुनाव जीता था। 1999 में यह आंकड़ा और नीचे गिरकर 114 रह गया था।पहले खो चुके कुछस्थानों को कांग्रेस अब भी वापस पा सकती है अगरचे वह इस भ्रम से बाहर निकलेकि नेहरू-गांधी वंश किसी भी तरह उसे बचा लेगा। ऐसा नहीं हो सकता। वह युगसमाप्त हो गया। पार्टी की सर्वोत्त्म परिकल्पना अब राहुल गांधी की साहसिकपहल और उस घोषणा में है कि यह परिवार अगले चुनाव में नेतृत्व नहीं करेगाबल्कि इसके बदले व्यापक आधार पर प्रचार टीम बनाएगा।दूसरे यह किकांग्रेस मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलुवालिया, पी. चिदम्बरम्, रघुराम राजनटीम द्वारा विश्वास दिलाने वाली आर्थिक नीति से दूरी बना ले। निश्चय केसाथ क्षतिकारक नवउदारवादी नीति से नाता तोड़ लिया जाना चाहिए जो अनिच्छा सेव्यवसाय-विरोधी नीतियों के कुछ व्यापक दुष्प्रभाव का सामना नरेगा कानून और (जो बड़े पैमाने पर अमल में नहीं लाया जा सका) शिक्षा का अधिकार कानून केजरिए करने की कोशिश करती है।कांग्रेस को पुनर्वितरण संबंधी गरीबीविरोधी एजेंडा अपना लेना चाहिए साथ ही भूमि सुधार, भूमंडलीय स्वास्थ्यसुरक्षा, शिक्षा एवं व्यापक खाद्य सुरक्षा को महत्व देना चाहिए। एक नएनवउदारवादी नीति विरोधी निर्धारण के मूल में विकासपरक पैमाना रखा जानाचाहिए। एकमात्र उम्मीद यही है।अनुवाद: प्रभा टाँक

 

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