Posted by: Bagewafa | مئی 18, 2014

इमारत नहीं रही.. .दुष्यंत कुमार

इमारत नहीं रही.. .दुष्यंत कुमार

खंडहर बचे हुए है , इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ की सर पे कोई छत नही रही।

कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।

हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया
हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही।

मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा
या यूँ कहो की बर्क की दहशत नहीं रही।

हमको पता नहीं था हमें अब पता चला
इस मुल्क में हमारी हकूमत नहीं रही।

कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नही रहे
कुछ दुश्मनो से वैसी अदावत नही रही।

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते है लोग
रो -रो के कहने की आदत नही रही।

सीने में जिन्दगी के अलामात है अभी
गो जिन्दगी की कोई जरूरत नहीं रही।

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