Posted by: Bagewafa | مئی 20, 2014

मजनूँ ने शहर छोड़ा है सहरा भी छोड़ दे —- अल्लामा मुहम्मद इक़बाल تو صحرا بھی چھوڑ دے …….علامہ محمد اقبال

मजनूँ ने शहर छोड़ा है सहरा भी छोड़ दे —- अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

मजनूँ ने शहर छोड़ा है सहरा भी छोड़ दे
नज़्ज़ारे[A] की हवस हो तो लैला भी छोड़ दे

वाइज़[B] कमाले-तर्क [C] से मिलती है याँ मुराद[D]
दुनिया जो छोड़ दी है तो उबक़ा[E] भी छोड़ दे

तक़लीद[F] की रविश[G से तो बेहतर है ख़ुदकुशी
रस्ता भी ढूँढ, ख़िज़्र का सौदा [H] भी छोड़ दे

शबनम की तरह फूलों पे रो और चमन से चल
इस बाग़ में क़याम[I] का सौदा भी छोड़ दे

सौदागरी नहीं ये इबादत ख़ुदा की है
ऐ बेख़बर जिज़ा[J] की तमन्ना भी छोड़ दे

अच्छा है दिल के पास रहे पास्बाने-अक़्ल[K]
लेकिन कभी-कभी उसे तन्हा भी छोड़ दे

जीना वो क्या जो हो नफ़्से-ग़ैर[L] पर मदार[M]
शोहरत की ज़िन्दगी का भरोसा भी छोड़ दे

वाइज़[M] सबूत लाए जो मय[O] के जवाज़[P] में
इक़बाल को ये ज़िद है कि पीना भी छोड़ दे
शब्दार्थ:
A. ↑ आलौकिक दृश्य
B ↑ उपदेशक
C ↑ आत्म-समर्पण
D. ↑ अभीष्ट
E. ↑ दूसरी दुनिया
F. ↑ चापलूसी
G. ↑ नकल
H. ↑ पगलपन
I. ↑ स्थाई ठिकाना
J. ↑ वापसी
K. ↑ तर्क-शक्ति का संरक्षण
L. ↑ उधार की सांसों
M ↑ निर्भर
N ↑ उपदेशक
O. ↑ मदिरा

تو صحرا بھی چھوڑ دے …….علامہ محمد اقبالل

 

مجنوں نے شہر چھوڑا تو صحرا بھی چھوڑ دے
نظارے کی ہوس ہو تو لیلی بھی چھوڑ دے

واعظ! کمال ترک سے ملتی ہے یاں مراد
دنیا جو چھوڑ دی ہے تو عقبی بھی چھوڑ دے

تقلید کی روش سے تو بہتر ہے خودکشی
رستہ بھی ڈھونڈ ، خضر کا سودا بھی چھوڑ دے

مانند خامہ تیری زباں پر ہے حرف غیر
بیگانہ شے پہ نازش بے جا بھی چھوڑ دے

لطف کلام کیا جو نہ ہو دل میں درد عشق
بسمل نہیں ہے تو تو تڑپنا بھی چھوڑ دے

شبنم کی طرح پھولوں پہ رو ، اور چمن سے چل
اس باغ میں قیام کا سودا بھی چھوڑ دے

ہے عاشقی میں رسم الگ سب سے بیٹھنا
بت خانہ بھی ، حرم بھی ، کلیسا بھی چھوڑ دے

سوداگری نہیں ، یہ عبادت خدا کی ہے
اے بے خبر! جزا کی تمنا بھی چھوڑ دے

اچھا ہے دل کے ساتھ رہے پاسبان عقل
لیکن کبھی کبھی اسے تنہا بھی چھوڑ دے

جینا وہ کیا جو ہو نفس غیر پر مدار
شہرت کی زندگی کا بھروسا بھی چھوڑ دے

شوخی سی ہے سوال مکرر میں اے کلیم!
شرط رضا یہ ہے کہ تقاضا بھی چھوڑ دے

واعظ ثبوت لائے جو مے کے جواز میں
اقبال کو یہ ضد ہے کہ پینا بھی چھوڑ دے

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زمرے

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