Posted by: Bagewafa | اگست 6, 2014

अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का वक्त़’ अब आ गया है :-सुभाष गाताडे

अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का वक्त़’ अब आ गया है
Posted by: Amalendu Upadhyaya 2014/08/04 in आपकी नज़र Leave a comment
समय से रूबरू हम-1-सुभाष गाताडे

‘ हे मूर्ख, मैंने तुम्हे नदी पार करने के लिए नाव दी थी, नदी पार हो जाने के बाद कंधे पर ढोने के लिए नहीं’
– बुद्ध
“I believe that despite the enormous odds which exist, unflinching, unswerving, fierce intellectual determination, as citizens, to define the real truth of our lives and our societies is a crucial obligation which devolves upon us all. It is in fact mandatory. If such a determination is not embodied in our political vision we have no hope of restoring what is so nearly lost to us – the dignity of man.”
(Harold Pinter while delivering the speech at the award of Nobel Prize for Literature in 2005)
1
अध्यक्ष महोदय एवं सभागार में एकत्रित प्रबुद्धजनों।
आप लोगों के बीच अपने आप को पाकर बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूँ।
अपने वक्त़ के महान अदीब प्रेमचन्द के जन्मदिन पर हम उन्हें याद करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। यह सोच कर थोड़ा सुकून भी हो रहा है कि हम इस मामले में अकेले नहीं हैं। देश के तमाम नगरों में, छोटे मोटे कस्बों में आज उनकी याद को लोग ताज़ा कर रहे हैं। कहीं विचारगोष्ठी हो रही है, कवि सम्मेलन हो रहे हैं, तो कहीं समाज के सामने खड़े मसलों को लेकर तबादले खयालात चल रहे हैं।
मैं कभी अपने आप से पूछता हूँ कि एक ऐसा शख्स – जिसे ‘कलम का सिपाही’ कहा गया, उसके गुजर जाने के 75 से अधिक साल बाद भी आखिर किस वजह से हम उन्हें याद कर रहे हैं ?
लिखा तो कइयों ने था। हो सकता है कि कइयों का रचनासंसार, ग्रंथभंडार उनसे बड़ा हो। मगर लिखना मतलब शब्दों को तरतीब से रखना, लाइनों को सजा कर रखना नहीं होता। उसके जरिए क्या कहा जा रहा है ? किनके दुखों, तकलीफों, आकांक्षाओं, अरमानों, संकल्पों को जुबां दी जा रही है, वह अहमियत रखता है। और महज लिखा ही नहीं बल्कि अपने उसूलों के लिए समझौताविहीन जिन्दगी जी। पुरस्कारों की बंटती रेवड़ियों के मौजूदा माहौल में जबकि क्रिकेट के मैचों की तरह पुरस्कार भी कई बार फिक्स किए जाते हैं, उनका जीवन एवं उनका संघर्ष कलम एवं कागज के बीच के या कलम एवं टीवी के बीच के समीकरण को सुलझाने में मुब्तिला हम सभी को शायद अधिक मौजूं जान पड़ता है।
इस सन्दर्भ में मुझे बरबस हरिशंकर परसाईजी का वह लेख याद आ रहा है जिसका शीर्षक है ‘प्रेमचंद के फटे जूते’। आप में से अधिकतर ने प्रेमचंद की उस तस्वीर के साथ कई स्थानों पर प्रकाशित उस आलेख को पढ़ा होगा, जिसमें प्रेमचंद अपनी पत्नी के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं, पैरों में कैनवास के जूते हैं, और ‘बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है।’
आप ने भले पढ़ा हो, मगर इस मौके पर आप के साथ उसे सांझा करने का मोह रोक नहीं पा रहा हूँ। शायद वह उस राज का खुलासा करता है कि प्रेमचंद हमें आज भी क्यों मौजूं जान पड़ते हैं।
परसाई लिखते हैं कि
‘फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी ? नहीं, इस आदमी की अलग अलग पोशाकें नहीं होगी- इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है।’
वह पूछते हैं
‘मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हे इसका जरा भी एहसास नहीं है ?’
वह प्रेमचंद के चेहरे की उस अधूरी मुस्कान की भी चर्चा करते हैं
‘यह मुसकान नहीं है, इसमें उपहास है, व्यंग्य है।’
‘चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया ?
मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत दर परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मार कर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आजमाया।’
‘तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।
तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमजोरी थी, जो होरी को ले डूबी।’
लेख के अन्त में वह उनके ‘अंगुली के इशारे’ की बात करते हैं और उस ‘व्यंग्य मुस्कान’ की बात करते हैं,
‘तुम मुझ पर या हम सभी पर हंस रहे हो, उन पर जो अंगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो – मैंने तो ठोकर मार-मार कर जूता फाड़ लिया, अंगुली बाहर निकल आई, पर पांव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अंगुली को ढांकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे ?’
2.
ईमानदारी की बात यह है कि मैं कभी अदीब का तालिब, साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा, मगर साहित्य/कलम की ताकत मुझे हमेशा मुग्ध करती रही है।
फिर 19 वीं सदी का वह चर्चित गुलामी प्रथा विरोधी उपन्यास हो जिसकी रचना अमेरिकी लेखिका हैरिएट बीचर स्टो ने की थी, जिसके बारे में कहा जाता है कि 1852 में प्रकाशित इस उपन्यास ने ‘‘गुलामी प्रथा के खिलाफ बाद में छेड़े गए गृहयुद्ध की जमीन तैयार की।’’कहा जाता है कि राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन जब 1862 में किसी समारोह में लेखिका से मिले तो उन्होंने आश्चर्यचकित होकर पूछा था ‘‘तो तुम ही हो वह कृशकाय महिला जिसने वह किताब लिखी और जिसने इस महान युद्ध की शुरूआत की।’’ या फ्रांसीसी क्रांति की पूर्वपीठिका तैयार करने वाले महान साहित्यकारों के तमाम प्रसंग हों। या 1968 के ऐतिहासिक छात्र-मजदूर आन्दोलन के वक्त महान लेखक और दार्शनिक सार्त्र को गिरफ्तार करने की पुलिस की मांग पर राष्ट्रपति द गॉल बेसाख्ता कह उठते हों कि ‘मैं फ्रांस को कैसे गिरफ्तार कर सकता हूँ’ ?
और आज के समय में शायद उन सभी को याद करने की अहमियत अधिक जान पड़ती है जब स्वतंत्र विचार पर तरह तरह की संकीर्णमना, बन्द दिमाग, कुन्दजेहन ताकतों की बन्दिशें बढ़ गयी हो, हमारी सन्तानों को पाठयक्रम में ‘अन्य’ समुदायों के प्रति नफरत फैलाने वाली, गल्प को इतिहास के तौर पर परोसने वाली और विज्ञान के साथ द्रोह करनेवाली रचनाएं ‘नैतिक तालीम के नाम पर पढ़ायी जा रही हों, जब हमें बताया जा रहा हो कि क्या लिखा जाना चाहिए, कैसे लिखा जाना चाहिए, किस किस्म की चाशनी में डूबा कर लिखा जाना चाहिए और अगर हमने इसके बावजूद भी हिम्मत की, अगर हमने उनके तालिबानी फरमानों को मानने से इन्कार कर दिया, तब फिर चाहे पूंजी की ताकतें हों या देश एवं समाज को आपसी नफरत पर टिके किसी मध्ययुग के उनके ‘वैभवशाली अतीत’ में ले जाने के लिए आमादा सियासतदां और उनके उत्पाती गिरोह आप को गिरेबान पकड़ने के लिए आगे आने के लिए आमादा हों।
ऐसे घटाटोप भरे माहौल में प्रेमचंद का उद्बोधन जब वह ‘साहित्य के मयार बदलने की’, ‘साहित्य की कसौटी बदलने’ की बात करते हैं, एक तरह से आवाहन मालूम पड़ता है।
‘..हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो – जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’
मित्रों, आप सभी ने विख्यात पत्रकार परिनोय गुहा ठाकुरदा (प्रॉन्जय गुहा ठाकुरता) द्वारा ‘गैस वार्स’ पर लिखी किताब को लेकर अम्बानी समूह द्वारा 150 करोड डॉलर के मानहानि के मुकदमे के बारे में सुना होगा, मगर शायद ‘एयर इंडिया’ और ‘सहारा समूह’ को लेकर चली कार्रवाइयों पर अधिक चर्चा तक नहीं हो सकी है।
कहने का लुब्बेलुआब यह है कि हमारे मुल्क में विगत कुछ समयों से उछाल मार रही ‘आहत भावनाओं वाली ब्रिगेड’ के रणबांकुरों से लेकर कार्पोरेट सम्राटों तक और सरकारी अमलों के बीच एक अपवित्र गठबन्धन कायम हुआ है, जो असहमति की हर आवाज़ को कुचल देना चाहते हैं। और हाल के समय में मुल्क में जो सियासी बदलाव देखने को मिला है, उससे गोया ऐसी ताकतों को और अधिक उन्मादी होने का अवसर मिला है।
बचपन से हम सुनते आए थे कि किताबें पढ़ने के लिए होती हैं, सुनने के लिए होती हैं, गुनने के लिए होती है, मगर वक्त़ का फेर देखिए इन दिनों किताबों के लुगदी बनाने की बातें अधिक चल रही हैं। ‘हिन्दू धर्म का वैकल्पिक इतिहास’ के नाम से लिखी गयी अमेरिकी विदुषी वेंडी डोनिगर की किताब को प्रकाशक पेंग्विन द्वारा वापस लिए जाने और उसकी लुगदी बनाने की बात से जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह फिलवक्त़ रूकने का नाम नहीं ले रहा है, आलम तो यह है कि कई सालों से प्रकाशित और चर्चित किताब के कुछ अंश अचानक कुछ संगठनों को आक्षेपार्ह लग रहे हैं।
विडम्बना देखिए कि इस मुहिम में अदालत भी साथ दे रही है।
इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता कि आप खोजी पत्रकारिता करके किसी अडानी-अम्बानी के बारे में लिख रहे हैं या किसी धर्म के इतिहास को विज्ञान की कसौटी पर कस रहे हैं, आप साहित्य भी लिखेंगे तो उसमें मुमकिन है विचार जगत के इन पहरेदारों को कुछ नागवार गुजरे और वह कानूनी और गैरकानूनी किसी भी तरीके से आप पर शिकंजा कसने की कोशिश करें।

पिछले दिनों मैं महाराष्ट्र गया था, वहाँ किसी ने अदालत में दावा किया कि चर्चित लेखक आनन्द यादव ने तुकाराम और ज्ञानेश्वर पर जो उपन्यासनुमा किताबें लिखी हैं, उसने उसकी आस्था को चोट पहुंचायी है और अदालत ने भी किताबों के लुगदी बनाने का फरमान जारी किया है। मराठी साहित्य के ज्ञाता बता सकते हैं कि आनंद यादव, मराठी साहित्य जगत के स्थापित नाम हैं, सम्भवतः किसी समय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, अपने इन दोनों उपन्यासों के लिए उन्होंने काफी अनुसंधान भी किया है, मगर यह सभी बातें उनकी किताबों के लुगदी बनने को रोक नहीं सकतीं। हाँ, फिलवक्त उच्च अदालत का इन्तज़ार है कि वह इस मामले में क्या कहती है।
एक ऐसे वक्त़ में जब पत्रकारिता को सत्ता या सम्पत्तिशालियों की पीआर/पब्लिक रिलेशन मशीनरी में तब्दील करने के प्रयास चल रहे हों, साहित्य को ‘उन लोगों की जय बोलने के लिए’ कहा जा रहा हो, तब बकौल मुक्तिबोध यही बात दोहरानी पड़ेगी कि ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का वक्त़’ अब आ गया है।
3
किसी विचारक ने लिखा है कि ‘चीज़ों को बदलने की शुरूआत तभी हो सकती है, जब हम उन्हें ठीक से जानें’।
और जानना आंख मूंद कर नहीं – जैसा कि मनुष्य को गाफिल रखने वाले तमाम यथास्थितिवादी फलसफों में कहा जाता है, और तरह-तरह के टेलीसन्तों/महात्माओं के माध्यम से चौबीसों घण्टों प्रवचनों के जरिए सिखाया जाता है – बल्कि आंखें पूरी तरह खुली रख कर जानना। इन्सान की दुश्मन ताकतों की आंखों में आंखें डाल कर जानना। आज से ढाई हजार साल पहले भाग्यवाद को चुनौती देते हुए उन्होंने हमें बताया था कि ‘दुख है तो उसका कारण है और उसका निराकरण यही सम्भव है।’उसी तरह जानना जैसा कि बुद्ध ने अपने अन्तिम सन्देश में कहा था ‘अप्पो दीपो भव्’ अर्थात अपने दीपक आप बनो।
क्या है हमारे वक्त़ का वह नज़ारा जिससे हम सभी रूबरू हैं, जिसने इस समाज के विचारशील तबकों को, प्रगतिउन्मुख लोगों को, इन्साफ एव अमन के चाहने वालों को अन्दर तक बेचैन कर दिया है। दिलचस्प है कि वे लोग भी अन्दर ही अन्दर परेशां हैं, जिन्होंने अच्छे दिनों के इन्तज़ार में चुनावों के जरिए जबरदस्त उलटफेर को अंजाम दिया था; जो भारत के जनतंत्र की तवारीख के इस ऐतिहासिक मौके पर शायद बैरिकेड के उस तरफ खड़े थे, या कमसे कम दिग्भ्रम की स्थिति में थे।
आज वह भी मन मसोस कर कह रहे हैं कि हम फिर एक बार छले गए हैं।
हमारे सामने उपस्थित इस परिदृश्य को किस तरह सूत्रबद्ध किया जा सकता है ?

सुविधा के लिए मैं इसे राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक आयामों में बांटने की कोशिश करूंगा।
मुमकिन है कि बातचीत के अन्त में हमें इस सूत्रीकरण में कुछ थोड़ा बहुत संशोधन करना पड़े, मगर चूंकि हम कई सारे मसलों पर बात करने वाले हैं और जाहिर है कि विभिन्न किस्म के तथ्यों या जानकारियों, सूचनाओं के कोलाहल में सभी के लिए बातचीत का सूत्रा थामना मुश्किल हो, इसलिए मैं पहले ही निचोड़ अर्थात सारांश बयाँ कर रहा हूँ।
हम एक ऐसे वक्त़ से गुजर रहे हैं जब
– जनतंत्र बहुसंख्यकवाद में परिणत होता दिख रहा है
– नियंत्रित पूंजीवाद से नवउदारवादी पूंजीवाद की दिशा में रफ्तार तेज हो रही है, सरपट दौड़ते घोड़ों की तरह पूंजीवाद के रास्ते की तमाम बाधाएं दूर की जा रही है, और इन उन्मत्त घोड़ों की कदमों की नीचें विशाल शोषित-उत्पीडि़त जनों के जीने के तमाम अधिकारों को रौंदने की कोशिश हो रही है
– समुदाय बनाम व्यक्ति के चिरन्तन संघर्ष में फिलवक्त व्यक्ति कमजोर पड़ता दिख रहा है
एक बात और स्पष्ट कर दूँ, यह कोई अन्तिम सूत्रीकरण नहीं है। बातों का सिलसिला आगे बढ़े तो इसमें कई सारे आयाम जुड़ सकते हैं। संस्कृत का एक सुभाषित है ‘वादे वादे जायते तत्वबोधः‘ उसी तर्ज पर इस विचारमंथन से महज हलाहल ही नहीं बल्कि अमृत भी निकल सकता है, जिसकी आज सख्त जरूरत है भारतीय समाज को नयी संजीवनी देने के लिए।
4
कोई पूछ सकता है कि जनतंत्र के बहुसंख्यकवाद के परिणत होने को किस तरह समझा जा सकता है ?
पहले ‘बहुसंख्यकवाद’ के हमारे लिए क्या मायने हैं ?
कहने के लिए यह लफ्ज जनतंत्र जैसा ही प्रतीत होता है, शायद इसी वजह से जनतंत्र से इसकी विभाजक रेखा बहुत धुँधली लग सकती है, वैसे बारीकी में जाएं तो आप पाएंगे कि वह जनतंत्र को सर के बल खड़ा कर देता है। जनतंत्र इस मायने में गुणात्मक तौर पर अलग होता है क्योंकि वहाँ अल्पमत के अधिकारों के दमन की नहीं बल्कि सुरक्षा की गारंटी होती है। इसके बरअक्स बहुसंख्यकवाद अल्पमत को रौंद कर या कुचल कर या हाशिये पर डाल कर आगे बढ़ता है।
बहुसंख्यकवाद दरअसल पारम्पारिक राजनीतिक फलसफा या एजेण्डा है, जो दावा करता है कि आबादी के एक बहुमत को ( जो कहीं धर्म, कहीं भाषा, सामाजिक तबका या चिन्हित करनेवाला अन्य कोई कारक) समाज में एक हद तक वरीयता पाने का अधिकार है और उसे ऐसे निर्णय लेने का भी अधिकार है जो शेष समाज को प्रभावित करते हों। गाज़ा में अपने ही नागरिकों पर हवाई हमले करनेवाला इसराइल – जो औपचारिक तौर पर एक जनतंत्र है, मगर जहाँ अरब अवाम दोयम दर्जे की स्थिति में है – हमारे सामने बहुसंख्यकवादी राज्य की एक मिसाल है।
हमारा मुल्क जब आज़ाद हुआ और जिन दिनों संविधान का निर्माण किया जा रहा था तो नवस्वाधीन देश के कर्णधारों को इस बात का पूरा एहसास था कि थोड़ी ढील दी गयी तो जनतंत्र का रथ बहुसंख्यकवाद के रास्ते पर चल निकल सकता है। बंटवारे के चलते हुआ जबरदस्त हिंसाचार और उससे पैदा नफरत की भावना अभी मद्धिम नहीं हुई थी और इसीलिए मुल्क के पहले वजीरे आज़म जवाहरलाल नेहरू ने हमें आगाह किया था कि ‘एक बहुधर्मीय देश में बहुमत के धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ा जा सकता है और अल्पसंख्यक की हर आवाज़ को राष्ट्र के खिलाफ द्रोह के तौर पर पेश किया जा सकता है, जिसके प्रति हमें सावधान रहना होगा।’ धर्म को राष्ट्र की बुनियाद मान कर अलग हुए पाकिस्तान की तर्ज पर हमारी सरहद के भीतर ऐसे ही ‘राष्ट्र’ के निर्माण के लिए सक्रिय ताकतों को निशाने पर रखते हुए वह समझाते थे कि हमें स्वाधीन भारत से किसी ‘हिन्दू पाकिस्तान’ को गढ़ना नहीं है बल्कि धर्मनिरपेक्ष आधारों पर देश का निर्माण करना है।
डा अम्बेडकर, संविधानसभा की आखरी बैठक में भाषण की चन्द पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जिसमें उन्होंने साफ कहा था:
‘‘हम लोग अन्तर्विरोधों की एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हम समान होंगे और सामाजिक-आर्थिक जीवन में हम लोग असमानता का सामना करेंगे। राजनीति में हम एक व्यक्ति – एक वोट और एक व्यक्ति- एक मूल्य के सिद्धान्त को स्वीकार करेंगे। लेकिन हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, हमारे मौजूदा सामाजिक आर्थिक ढांचे के चलते हम लोग एक लोग-एक मूल्य के सिद्धान्त को हमेशा खारिज करेंगे। कितने दिनों तक हम अन्तर्विरोधों का यह जीवन जी सकते हैं ? कितने दिनों तक हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में बराबरी से इन्कार करते रहेंगे ।’’
अपनी बातों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा था:
“On the social plane, we have an India based on the principles of graded inequality, which means elevation of some and degradation of others. On the economic plane, we have a society in which there are some who have immense wealth as against many who live in abject poverty.”
कहने का तात्पर्य स्वाधीन भारत के कर्णधार इस बात के प्रति स्पष्ट थे कि हमें एक व्यक्ति एक वोट वाले राजनीतिक लोकतंत्र से एक व्यक्ति एक मूल्य वाले सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में अपनी यात्रा आगे बढ़ानी है। आज जब हम अपने इर्दगिर्द देखते हैं तो आज से ठीक 64 साल पहले देश को संविधान सौंपते वक्त जिस किस्म के भारत के निर्माण का तसव्वुर किया गया था, जिसकी कल्पना की गयी थी, उससे बिल्कुल अलहदा पसमंज़र फिलवक्त़ हमारे सामने है।
लोकसभा के लिए हाल में सम्पन्न चुनाव और नवगठित संसद इसकी एक छोटी बानगी प्रस्तुत करते हैं।
एक छोटा उदाहरण देना चाहूँगा आप सभी जानते ही हैं कि यह एक ऐसी संसद है जहाँ सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का सबसे कम प्रतिनिधित्व दिखता है। और पहली दफा एक ऐसी पार्टी हुकूमत में आयी है, जिसके 272 सांसदों में से महज दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से हैं, और जोर देने वाली बात यह है कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का एक भी सदस्य उसमें नहीं है। वे आधिकारिक तौर पर ऐसी बात नहीं कह सकते, मगर उन्होंने अन्दर ही अन्दर मान लिया है कि मुल्क को जिस तरह वह ढालना चाहते हैं, उसके लिए उन्हें उनकी जरूरत तक नहीं है।
बात किसी को बहुत छोटी लग सकती है, मगर देखें तो बहुत बड़ी भी मालूम पड़ सकती है। पुणे की सड़क पर जब नमाज़ अदा करके लौट रहे एक साफ्टवेयर इंजिनीयर को अतिवादियों ने पीट कर मार डाला, जिसकी राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया हुई, मगर हुकूमत सम्भालने वालों ने, उसके कर्णधारों ने – जो चुनावों के पहले अपने बयानों के जरिए, टिव्टर के जरिए- चौबीसों घण्टे मुखर दिखते थे, उन्होंने अपनी जुबां पर ताला लगाना ही मुनासिब समझा।
एक बहुधर्मीय समाज में एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल होने की लम्बी रवायत है। अभी ईद बीती है। आप ने गौर किया होगा कि सत्ताधारी पार्टी के उन लोगों ने भी उस टोपी को नहीं पहना- जिन्होंने पिछले साल पहनी थी।
कहीं न कहीं यह संकेत मिल रहा है कि आप के विश्वदृष्टिकोण में ‘अन्य’ कहे गये समुदायों, समूहों के लिए कोई जगह नहीं भी हो, आप उन्हें सारतः दोयम दर्जे के नागरिक बनाना चाहते हों, तो भी कोई बात नहीं, आप ‘हम’ कहे जा सकनेवाले समुदाय को गोलबन्द करके सिंहासन पर बिल्कुल जनतांत्रिक रास्ते से आरूढ़ हो सकते हैं।
यह अकारण नहीं कि केन्द्र की हुकूमत सम्भाली जमात के लोगों के सहमना/सहोदर संगठनों के अगुआओं ने खुलेआम यह कहा है कि अल्पसंख्यकों को अपनी हैसियत में रहना चाहिए। अपने आप में ऐसी बातें अपराध हैं, धारा 153 ए के अन्तर्गत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में शुमार होती हैं, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
मगर क्या महज खास पार्टी को, संगठन विशेष को ही इस स्थिति के लिए एकमात्र जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ?
क्या अपने आप को धर्मनिरपेक्षता का अलम्बरदार कहलाने वाली जमातों की, संगठनों की इस स्थिति के निर्माण में कोई भूमिका नहीं है। यह कहना जबरदस्त भूल होगी।
मैं हाल में ही संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट का निचोड़ प्रस्तुत करना चाहूँगा:
अल्पसंख्यक कल्याण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का हाल पिछले दिनों संसद के सामने पेश हुआ। पता चला कि इस सिलसिले में आठ साल पहले शुरू की गयी प्रधानमंत्री की 15 सूत्रीय योजना के कई बिन्दुओं पर अभी काम भी नहीं शुरू हो सका है। इतना ही नहीं बल्कि कई राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में इसके लाभार्थियों की संख्या शून्य है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम की ओर से इन योजनाओं के लिए आवंटित किए गए धन के आंकड़ों को आधार बना कर इस सम्बन्ध में सदन में जानकारी प्रस्तुत की गयी।
ध्यान रहे कि संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार की पहली पारी में तैयार की गयी सच्चर कमीशन की रिपोर्ट जब तक सामने नहीं आयी थी जिसने पहली दफा इस बात को सबूतों के आधार पर प्रमाणित किया कि अपने मुल्क में अल्पसंख्यक वंचना का अनुपात काफी ज्यादा है, तब तक कोई इस बात को मानने को भी तैयार नहीं था। रिपोर्ट के प्रकाशन का सकारात्मक नतीजा निकला कि केन्द्र सरकार को अल्पसंख्यक विकास के प्रति सक्रिय रूख अपनाना पड़ा। अब जबकि इसे शुरू हुए कुछ समय बीत गया है, तो जो तस्वीर उभरती है वह किसी भी मायने में उत्साहित करनेवाली नहीं है, आंकड़े यही बताते हैं।
संसद में इस सम्बन्ध में प्रस्तुत रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक 9 राज्यों ने/केन्द्रशासित प्रदेशों ने वित्त वर्ष 2013-2014 में इस योजना के तहत किसी भी अल्पसंख्यक उद्यमी को कुछ भी सहायता उपलब्ध नहीं करायी, जबकि इस तरह की सहायता उपलब्ध कराना 15 सूत्रीय कार्यक्रम का हिस्सा रहा है।
गौरतलब है कि यह स्थिति महज राज्यों द्वारा विकास कार्यक्रमों को संचालित करने में ही नहीं दिखतीं।
तीन साल पहले यह ख़बर आयी थी कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अल्पसंख्यकों को कर्जा मुहैया कराने में बैंक बहुत आनाकानी करते हैं। बैंकिंग लोकपाल कार्यालय में तथा सम्बधित अधिकारियों के यहाँ ऐसे तमाम केस दर्ज है जिसमें कर्जा देने में कोताही बरतने के मामले उजागर हुए हैं। इस सिलसिले में सभी प्रमुख बैंकों के अध्यक्षों एवं प्रबन्ध निदेशकों के साथ वित्त मंत्रालय द्वारा एक उच्चस्तरीय बैठक का इसीलिए आयोजन किया गया था ताकि वित्तीय समावेशन की सरकारी घोषणाओं एवं वास्तविक हकीकत के बीच व्याप्त अन्तराल की पड़ताल की जा सके। इतना ही नहीं उन्हीं दिनों राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के हवाले से यह विचलित करनेवाला तथ्य उजागर हुआ था कि शेडयूल्ड कमर्शियल बैंकों द्वारा खाता खोलने को लेकर भी अल्पसंख्यक समुदाय के साथ देश के पैमाने पर काफी आनाकानी की जाती है। अल्पसंख्यकों के खाते खोलने में की जा रही ढिलाई की सबसे अधिक मार छात्रों पर पड़ी थी।
इसे आप संयोग कह सकते हैं कि संसद में प्रस्तुत उपरोक्त रिपोर्ट के महज तीन दिन पहले देश के तीन राज्यों – महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु – के डायरेक्टर जनरल आफ पुलिस तथा इंटेलिजेन्स ब्युरो के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा मिल कर तैयार की गयी एक आन्तरिक रिपोर्ट के अंश अख़बारों में प्रकाशित हुए थे, जिन्होंने पुलिस बल में अल्पसंख्यकों के प्रति व्याप्त जबरदस्त पूर्वाग्रह का खुलासा किया था और यह भी कहा था कि अगर इसे जल्द ठीक नहीं किया गया तो मुल्क की आन्तरिक सुरक्षा के लिए इसके खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। ध्यान रहे कि प्रस्तुत रिपोर्ट एक तरह से पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों केा देश के विभिन्न हिस्सों से मिली सूचनाओं का सारांश एवं संकलन मात्रा है। इसमें समुदाय के साथ पुलिस की अन्तक्र्रिया, समुदाय के नेताओं के उद्गार और उनके द्वारा प्रकाशित लेखों पर भी गौर किया गया है। रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि ‘पुलिस एवं अल्पसंख्यक समुदाय के बीच के अन्तराल को पाटा जाए, उनके बीच अन्तक्र्रिया बढ़ायी जाए, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए स्टेण्डर्ड आपरेटिंग प्रोसिजर्स विकसित की जाए।
कहने का तात्पर्य यह है कि अगर हम जनतंत्र में समावेशी विकास को जरूरी मानते हैं, अगर हम संविधान की उस धारा को सही ठहराते हैं जिसने जाति, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि सभी आधारों पर भेदभाव समाप्ति का ऐलान किया और हक़ीकत में अपने आप को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर ऐलान और हक़ीकत के बीच अन्तराल ज्यादा बड़ा है, तो हम इस आरोप से कैसे बच सकते हैं कि हमारी स्लेट बिल्कुल साफ है। अपने मौनों से, अपनी भूलों से, अपनी समझदारीगत कमजोरियों से क्या हम भी कहीं न कहीं इस प्रक्रिया को फैसिलिटेट नहीं करते रहे हैं।
आगे …जारी

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