Posted by: Bagewafa | ستمبر 16, 2014

तुम्हारा डर———–1 फिलिस्तीनी डायरी -2014……..विनीत तिवारी

तुम्हारा डर———–1 फिलिस्तीनी डायरी -2014……..विनीत तिवारी

फिलिस्तीनी डायरी -2014……..विनीत तिवारी

एक स्थिति के बाद लाशों की गिनती के कोई मायने नहीं रह जाते

। एक स्थिति के बाद मरने वालों की अलग-अलग पहचान बताने के भी कोई मायने नहीं रह जाते।

जब हवा से हिलती पत्तियों से लेकर हर हरकत करने वाली चीज़ –

कुत्ता हो या इंसान,

जानदार हो या बेजान,

भूनी जा रही हो तो

ये बताने के क्या मायने हैं।

कि देखो, ये तो बेकसूर था,

या ये कि ये तो औरत थी,

हामला थी, या देखो,

ये तो बच्चा था, ये बुजुर्ग

और ये, ये तो मुर्दा ही था,

जिसे तुमने मार दिया।

सब कुछ को मार सकने की

ताक़त तुम्हारे पास है,

उस ताक़त पर तुम्हें भरोसा है,

फिर भी तुम डरते हो,

तुम डरते हो क्योंकि

तुम जानते हो,

बारूद से शहर उड़ाये

जा सकते हैं,

बदला जा सकता है

इंसानों को लाशों में

लेकिन तुम हमारी

आज़ादी की ख़्वाहिश और

हमारे वजूद की पहचान

हमारे हौसले को नहीं मार पाते।

तुम डरते हो क्योंकि

तुम जानते हो कि

फिलिस्तीन में

मुर्दा जिस्मों के भीतर भी

हौसले जि़ंदा बने रहते हैं

बेहिस आँखों के भीतर भी

सपने बड़े होते रहते हैं।

तुम डरते हो

और तुम सही डरते हो।

(सौजन्य:हस्तक्षेप)

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