Posted by: Bagewafa | اکتوبر 28, 2014

इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद -मौलाना मुहम्मद अली जौहरاسلام زندہ ہوتا ہے ہر کربلا کے بعد – مولانا محمد علی جوہر

اسلام زندہ ہوتا ہے ہر کربلا کے بعد – مولانا محمد علی جوہر

 

سرنامے میں مولانا محمد علی جوہر کے جس شعر کا مصرع ہے وہ شعر کسی بھی تعارف کا محتاج نہیں، یہ شعر ان خوش قسمت شعروں میں سے ہے جو نہ صرف خود زندہ و جاوید ہو جاتے ہیں بلکہ اپنے خالق کو بھی کر دیتے ہیں۔ وگرنہ مولانا محمد علی جوہر کی سیاسی حیثیت جو بھی ہے بطور شاعر کم ہی لوگ ان کو جانتے ہیں حالانکہ مولانا باقاعدہ شاعر تھے، جوہر تخلص کرتے تھے اور کلام بھی چھپ چکا ہے شاید "فیروز سنز” نے شائع کیا ہے۔ ان کا کلام تو میری نظر سے نہیں گزرا لیکن جس غزل کا یہ شعر ہے وہ غزل اور ایک مزید غزل "نقوش غزل نمبر”، لاہور 1985ء میں موجود ہے وہیں سے یہ غزل لکھ رہا ہوں۔

دورِ حیات آئے گا قاتل، قضا کے بعد
ہے ابتدا ہماری تری انتہا کے بعد

جینا وہ کیا کہ دل میں نہ ہو تیری آرزو
باقی ہے موت ہی دلِ بے مدّعا کے بعد

تجھ سے مقابلے کی کسے تاب ہے ولے
میرا لہو بھی خوب ہے تیری حنا کے بعد

لذّت ہنوز مائدہٴ عشق میں نہیں
آتا ہے لطفِ جرمِ تمنّا، سزا کے بعد
قتل حسینؑ اصل میں مرگ یزید ہے
اسلام زندہ ہوتا ہے ہر کربلا کے بعد

 

इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद -मौलाना मुहम्मद अली जौहर

सरनामे में मौलाना मुहम्मद अली जौहर के जिस शेअर का मिसरा है वो शेअर किसी भी तआरुफ़ का मुहताज नहीं, ये शेअर उन ख़ुशकिसमत शेअरों में से है जो ना सिर्फ़ ख़ुद ज़िंदा-ओ-जावेद हो जाते हैं बल्कि अपने ख़ालिक़ को भी कर देते हैं। वगरना मौलाना मुहम्मद अली जौहर की सयासी हैसियत जो भी है बतौर शायर कम ही लोग उन को जानते हैं हालाँकि मौलाना बाक़ायदा शायर थे, जौहर तख़ल्लुस करते थे और कलाम भी छिप चुका है शायद "फ़िरोज़ सन्ज़” ने शाय किया है। इन का कलाम तो मेरी नज़र से नहीं गुज़रा लेकिन जिस ग़ज़ल का ये शेअर है वो ग़ज़ल और एक मज़ीद ग़ज़ल "नुक़ूश ग़ज़ल नंबर”, लाहौर 1985-ए-में मौजूद है वहीं से ये ग़ज़ल लिख रहा हूँ।

दौर-ए-हयात आएगा क़ातिल, क़ज़ा के बाद
है इबतिदा हमारी तेरी इंतिहा के बाद

जीना वो किया कि दिल में ना हो तेरी आरज़ू
बाक़ी है मौत ही दिल-ए-बे मुद्दा के बाद

तुझ से मुक़ाबले की किसे ताब है विले
मेरा लहू भी ख़ूब है तेरी हिना के बाद

लज़्ज़त हनूज़ माइदा-ए-इशक़ में नहीं
आता है लुत्फ -जुर्म-ए-तमन्ना, सज़ा के बाद
क़तल ह्सैन असल में मर्ग यज़ीद है
इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद

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