Posted by: Bagewafa | فروری 4, 2015

दाइश(ISIS) जिहाद के नाम पर फ़साद फैला रही है: उल्माجہاد کے نام پر فساد پھیلا رہی ہے: علماء(ISIS)داعش

” सफ़ाह-ए-अव्वल” मशरिक़-ए-वुसता
दाइश जिहाद के नाम पर फ़साद फैला रही है: उल्मा
दुनिया के 126 मुमताज़ उल्मा ने दाइश की ख़िलाफ़त मुस्तर्द कर दी
जुमा 1 ज़ौ अलहजा 1435े – 26 सितंबर 2014म
उलार बया डाट नैट
इस्लामी दुनिया में ख़िलाफ़त अली मिनहाज अलंबोह की दावेदार तंज़ीम दौलत इस्लामीदाइश को जहां आलमी बिरादरी की जानिब से जंग का सामना है वहीं उसे एतिदाल पसंद इस्लामी दुनिया के जय्यद उलमाए किराम की जानिब से भी किसी किस्म की हिमायत नहीं मिल सकी है। अहलसुन्नत वलजमाअत मसलक के 126 जय्यद उलमाए किराम ने अपने एक मुत्तफ़िक़ा और मुशतर्का पैग़ाम में दाइश का फ़लसफ़ा जिहाद वख़लाफ़त मुसत्तरद करते हुए कहा है कि दाइश जिहाद के नाम पर दुनिया में फ़ित्ना वफ़साद फैला रही है।
उलार बया डाट नैट के मुताबिक़ सऊदी अरब और इस्लामी दुनिया के सिवा सौ मुमताज़ उलमाए किराम की जानिब से जारी एक मुशतर्का बयान में दाइश के सरबराह इबराहीम अवाद अलबदरी उल-मारूफ़ अबूबकर अलबग़दादी के नाम पैग़ाम में कहा है कि वो ताक़त के ज़रीये अपने मख़सूस ख़्यालात और नज़रियात दूसरों पर मुसल्लत करने का रास्ता तर्क करें क्योंकि तलवार के ज़रीये ग़ुस्से और रहमत वशफ़क़त में मुसावात क़ायम नहीं की जा सकती है। अल्लाह ताला ने अपनी ज़ात के लिए रहमत को लाज़िम किया है और आप तलवार के ज़रीये ये साबित करना चाहते हैं कि सिर्फ़ ताक़त के ज़रीये इस्लाम ग़ालिब किया जा सकता है। ताक़त के इस्तिमाल का फ़लसफ़ा अमन वाशती के पैग़ाम देने वाले इस्लाम की पहचान हरगिज़ नहीं है।
उलमाए किराम ने दाइश की तरीक़ा जिहाद की खुली मुख़ालिफ़त करते हुए कहा है कि दाइश के जंगजू एक जानिब अहलसुन्नत वालजमाअत की पैरवी के दावेदार हैं और दूसरी जानिब इसी मसलक की तालीमात की सरिया ख़िलाफ़वरज़ी कर रहे हैं। उल्मा ने अपने पैग़ाम में क़ुरआन सुन्नत की रोशनी में दाइश का फ़लसफ़ा जिहाद और ख़िलाफ़त मुस्तर्द किया और कहा है कि नबी अकरम सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ने बला जवाज़ किसी के ख़िलाफ़ ऐलान जंग करने और तलवार उठाने का हुक्म नहीं दिया। दाइश के जंगजू जिसे मुक़द्दस जिहाद क़रार दे रहे हैं वो जिहाद नहीं बल्कि जुर्म है।
उल्मा ने इस्लाम के तसव्वुर जिहाद और इस के शरई तरीका-ए-कार पर भी रोशनी डाली है और बताया है कि इस्लामी तरीक़ा जंग में कौन कौन सी क़यूद और शराइत हैं जिन की पाबंदी नागुज़ीर है। इस्लाम जंग में सफ़ीरों, औरतों, बच्चों, अहल-ए-किताब के क़तल की इजाज़त नहीं देता है। लाशों का मसला करने को हराम क़रार देता है। तकफ़ेरी फतवों की हौसलाशिकनी करता है। अनबया-ए-किराम और सहाबा जैसी बुज़ुर्ग हस्तीयों के मज़ारात को मिस्मार करने की मुमानअत करता है। ये कौनसा सा जिहाद और इस्लामी ख़िलाफ़त है जिस में इन तमाम मुमानअतों की खुली इजाज़त दी गई है।
इस्लाम दुनिया में तलवार के ज़रीये नहीं बल्कि दावत वतबलीग़ के ज़रीये फैला। उस की ज़िंदा मिसालें इंडोनेशिया। मलाईशीया और मग़रिबी और मशरिक़ी अफ़्रीक़ा की सूरत में हमारे सामने हैं। नीज़ जिहाद की इस्तिलाह किसी ऐसे इस्लाम दुश्मन के ख़िलाफ़ जंग के लिए इस्तिमाल की जाती है जिस से मुस्लमानों को ख़तरा लाहक़ हो। मुस्लमानों के ख़िलाफ़ जंग कौनसा जिहाद है।
उल्मा ने दाइश का तकफ़ेरी फ़लसफ़ा भी ग़ैर इस्लामी क़रार दिया। उन्हों ने वाज़िह किया कि इस्लामी तालीमात की रोशनी में जिस शख़्स ने कलिमा तुय्यबा पढ़ा है वो साहिब ईमान है और फ़िक़ही एतबार से उसे काफ़िर नहीं क़रार दिया जा सकता है। दाइश और इस से वाबस्ता लोगों ने इस्लाम की मर्ज़ी की तफ़सीर कर रखी है। मुस्लमान सिर्फ़ वही है जिसे वो मुस्लमान होने का सर्टीफ़िकेट जारी करें और बाक़ी तमाम दायरा इस्लाम से ख़ारिज हैं। नबी अकरम सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम का वाज़िह फ़रमान मौजूद है कि जिस ने एक मर्तबा ला इला इल्ला अल्लाह कह दिया उस की तकफ़ीर जायज़ नहीं है।


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جہاد کے نام پر فساد پھیلا رہی ہے: علماء(ISIS)داعش
دنیا کے 126 ممتاز علماء نے داعش کی خلافت مسترد کر دی
جمعہ 1 ذوالحجہ 1435هـ – 26 ستمبر 2014م
العربیہ ڈاٹ نیٹ
اسلامی دُنیا میں خلافت علی منہاج النبوہ کی دعویدار تنظیم دولت اسلامی‘‘داعش’’ کو جہاں عالمی برادری کی جانب سے جنگ کا سامنا ہے وہیں اسے اعتدال پسند اسلامی دنیا کے جید علمائے کرام کی جانب سے بھی کسی قسم کی حمایت نہیں مل سکی ہے۔ اہل سنت والجماعت مسلک کے 126 جید علمائے کرام نے اپنے ایک متفقہ اور مشترکہ پیغام میں داعش کا فلسفہ جہاد وخلافت مستر کرتے ہوئے کہا ہے کہ داعش جہاد کے نام پر دنیا میں فتنہ وفساد پھیلا رہی ہے۔
العربیہ ڈاٹ نیٹ کے مطابق سعودی عرب اور اسلامی دنیا کے سوا سو ممتاز علمائے کرام کی جانب سے جاری ایک مشترکہ بیان میں داعش کے سربراہ ابراہیم عواد البدری المعروف ابوبکر البغدادی کے نام پیغام میں کہا ہے کہ وہ طاقت کے ذریعے اپنے مخصوص خیالات اور نظریات دوسروں پر مسلط کرنے کا راستہ ترک کریں کیونکہ تلوار کے ذریعے غصے اور رحمت وشفقت میں مساوات قائم نہیں کی جا سکتی ہے۔ اللہ تعالیٰ نے اپنی ذات کے لیے رحمت کو لازم کیا ہے اور آپ تلوار کے ذریعے یہ ثابت کرنا چاہتے ہیں کہ صرف طاقت کے ذریعے اسلام غالب کیا جاسکتا ہے۔ طاقت کے استعمال کا فلسفہ امن وآشتی کے پیغام دینے والے اسلام کی پہچان ہر گز نہیں ہے۔
علمائے کرام نے داعش کی طریقہ جہاد کی کھلی مخالفت کرتے ہوئے کہا ہے کہ داعش کے جنگجو ایک جانب اہل سنت والجماعت کی پیروی کے دعوے دار ہیں اور دوسری جانب اسی مسلک کی تعلیمات کی صریح خلاف ورزی کر رہے ہیں۔ علماء نے اپنے پیغام میں قرآن سنت کی روشنی میں داعش کا فلسفہ جہاد اور خلافت مسترد کیا اور کہا ہے کہ نبی اکرم صلی اللہ علیہ وسلم نے بلا جواز کسی کے خلاف اعلان جنگ کرنے اور تلوار اٹھانے کا حکم نہیں دیا۔ داعش کے جنگجو جسے مقدس جہاد قرار دے رہے ہیں وہ جہاد نہیں بلکہ جرم ہے۔
علماء نے اسلام کے تصور جہاد اور اس کے شرعی طریقہ کار پر بھی روشنی ڈالی ہے اور بتایا ہے کہ اسلامی طریقہ جنگ میں کون کون سی قیود اور شرائط ہیں جن کی پابندی ناگزیر ہے۔ اسلام جنگ میں سفیروں، عورتوں، بچوں، اہل کتاب کے قتل کی اجازت نہیں دیتا ہے۔ لاشوں کا مثلہ کرنے کو حرام قرار دیتا ہے۔ تکفیری فتووں کی حوصلہ شکنی کرتا ہے۔ انبیاء کرام اور صحابہ جیسی بزرگ ہستیوں کے مزارات کو مسمار کرنے کی ممانعت کرتا ہے۔ یہ کونسا سا جہاد اور اسلامی خلافت ہے جس میں ان تمام ممانعتوں کی کھلی اجازت دی گئی ہے۔
اسلام دنیا میں تلوار کے ذریعے نہیں بلکہ دعوت وتبلیغ کے ذریعے پھیلا۔ اس کی زندہ مثالیں انڈونیشیا۔ ملائیشیا اور مغربی اور مشرقی افریقا کی صورت میں ہمارے سامنے ہیں۔ نیز جہاد کی اصطلاح کسی ایسے اسلام دشمن کے خلاف جنگ کے لیے استعمال کی جاتی ہے جس سے مسلمانوں کو خطرہ لاحق ہو۔ مسلمانوں کے خلاف جنگ کونسا جہاد ہے۔
علماء نے داعش کا تکفیری فلسفہ بھی غیر اسلامی قرار دیا۔ انہوں نے واضح کیا کہ اسلامی تعلیمات کی روشنی میں جس شخص نے کلمہ طیبہ پڑھا ہے وہ صاحب ایمان ہے اور فقہی اعتبار سے اسے کافر نہیں قرار دیاجاسکتا ہے۔ داعش اور اس سے وابستہ لوگوں نے اسلام کی مرضی کی تفسیر کر رکھی ہے۔ مسلمان صرف وہی ہے جسے وہ مسلمان ہونے کا سرٹیفکیٹ جاری کریں اور باقی تمام دائرہ اسلام سے خارج ہیں۔ نبی اکرم صلی اللہ علیہ وسلم کا واضح فرمان موجود ہے کہ جس نے ایک مرتبہ لا الھ الا اللہ کہہ دیا اس کی تکفیر جائز نہیں ہے

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