Posted by: Bagewafa | فروری 15, 2015

दर्द अंगेज़ हो गई है ग़ज़ल……— वसीम मलिक , सूरत

दर्द अंगेज़ हो गई है ग़ज़ल……— वसीम मलिक , सूरत

फिक़्र अंगेज़ हो गई है ग़ज़ल
कितनी ज़र खेज़ हो गई है ग़ज़ल

काट देती है नफरतों की जडें
तेग सी तेग हो गई है ग़ज़ल

मिल गया जैसे दामन-ए-यूसुफ
ऐसी नौखेज़ हो गई है ग़ज़ल

मीर की याद आ गई थी आज
दर्द अंगेज़ हो गई है ग़ज़ल

फ़लसफ़ा , फिक्र , ग़म , निशात ‘वसीम’
सब में आमेज़ हो गई है ग़ज़ल

(Courtesy:Facebook  wasim Malik)

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