Posted by: Bagewafa | مارچ 27, 2015

टीम इंडिया की जीत की खुशी में एक देशद्रोही की …! विश्वविजय

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टीम इंडिया की जीत की खुशी में एक देशद्रोही की …! विश्वविजय

देशभक्ति वाया क्रिकेट- देशभक्त

मार्च के अंत और अप्रैल के शुरुआती दिन थे। मौसम का मिजाज उतना गर्म नहीं था जितना देश में क्रिकेट प्रेमियों के बीच का माहौल। विश्वकप क्रिकेट मैच की शुरुआत हो चुकी थी। सेमीफाइनल और फाइनल मैच बाकी था। इस बार का सेमीफाइनल देश के क्रिकेट प्रेमियों के लिए फाइनल मैच से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था। सेमीफाइनल में भारत और पाकिस्तान की टीमें मोहाली के क्रिकेट मैदान में आमने-सामने थीं। जिनकी कूबत थी वह मोहाली में क्रिकेट का आंखों देखा करने मोहाली पहुंच चुके थे। देशभक्ति के प्रदर्शन के इतने बड़े जलसे में आखिर देश का प्रधानमंत्री न पहुंचे ऐसा कैसे हो सकता था। सो भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अपने दल-बल के साथ आमने-सामने थे। जिनकी कूबत नहीं थी वे अपने घर, पड़ोसी के घर या मोहल्ले की दुकान पर लगी टीवी पर अपनी नजरें गड़ाए हुए था। अमीर घराने जीत हार पर बड़ी बड़ी रकम सट्टा में लगाए हुए थे। देश के कुछ बड़े पूंजीपति अपने देश के खिलाड़ियों के मैच जीत जाने पर लाखों का इनाम देकर अपनी देशभक्ति जताना चाहते थे।
होली दीवाली बीत चुकी थी। इसके बावजूद अबीर गुलाल मोमबत्तियों के झालर और पटाखे खरीदे जा रहे थे। नंगे-अधनंगे बदन पर लड़के लड़कियों से लेकर बूढ़े जवान तक तिरंग पेंट करा रहे थे। तिरंगे की कीमत 15 अगस्त, 26 जनवरी के बाद बाजार में एक बार फिर बढ़ गई थी। देशी विदेशी कंपनियों ने अपने विज्ञापनों के आकर्षक प्रदर्शन के लिए पहले से तैयारी कर रखी थी। देशभक्तों ने मिठाइयां मंगा कर अपने घरों में रख ली थी। जो जितना बड़ा देशभक्त था उसके यहां मिठाइयों की मात्रा भी बड़ी थी। एक मशहूर मॉडल ने टीम इंडिया के जीत जाने पर निर्वस्त्र हो जाने की घोषणा कर अपनी देशभक्ति का इजहार कर दिया था। राष्ट्रगान के साथ मैच की शुरुआत हो चुकी थी।
सड़कें खाली हो चुकी थीं। इक्का दुक्का लोग ही नजर आ रहे थे। राम जी पंडित भारत की जीत के लिए सुबह सुबह ही नहा धो कर हनुमान जी के मंदिर में मन्नत मान आए थे। आज उनकों अपने अजीज दोस्त शर्मा जी की बहुत याद आ रही थी। जब शर्मा जी साथ थे तो उनके देशभक्ति के सभी कामों में कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। लेकिन आज वह जेल की सलाखों के पीछे थे। फिर भी पंडित जी ने मंदिर की ताख पर रखी कटोरी से लंबा टीका लगाते हुए कहा था, ‘हनुमानजी यदि इंडिया जीत जाएगी तो आपके चरणों में 101 किलो लड्डू चढ़ाऊंगा’। मंदिर से घर जाते हुए उन्होंने रामधनी हलवाई को लड्डू का आर्डर भी दे दिया। उनको अपनी भक्ति पर पूरा भरोसा था। बस उनको चिढ़ थी तो मुस्लिम कौम से। वह उस कौम को इंडिया का मानते ही नहीं थे। बात बात पर वह कहते कि ‘ ये कटवे खाते इंडिया का है और गाते पाकिस्तान का है’। अपने इस जुमले को साबित करने का उदाहरण वह ढूढ़ते फिरते थे। उनकी हर क्रियाकलाप पर पैनी नजर रखते। आज तो वह अपने पूरे रौ में थे। देश के सारे मुसलमान उनको रावण से कम आतताई नहीं लगते थे।
पंडित जी मैच शुरु होने से पहले ही मोहल्ले के मंदिर पर एक मीटिंग कर चुके थे। मंदिर के चबूतरे से सैकड़ों नौजवानों के हुजूम को संबोधित करते हुए उन्होंने मैच जीत जाने के बाद के कार्यक्रम की घोषणा की थी -‘जीतने के तुरंत बाद रात में सभी लोग अपने अपने घरों से रखे कान को बहरा बना देने वाला पटाखा छोड़ेंगे। यदि पटाखा कम आवाज करे तो देशी बम भी फोड़ सकते हैं। देशभक्ति में सब जायज है। सुबह सभी लोग तिरंगा लिए या अपने शरीर पर तिरंगा पेंट करा कर हनुमान मंदिर पहुंचेगें। वहां हनुमान के चरणों में 101 किलो लड्डू चढ़ाया जाएगा। हनुमान जी का भोग लगाने के बाद मोहल्ले भर में लड्डू का प्रसाद बांटा जाएगा।’
जैसे ही पंडित जी ने अपनी बात खत्म की तो कुछ लोगों ने अपनी ओर से भी 51-51 किलो लड्डू बांटने की घोषणा कर दी। अब तो 203 किलो लड्डू हो गया। पूरा मोहल्ला पेट भर लड्डू खाएगा। यह सोचते सोचते पंडित जी के मन में एक आशंका भी उठने लगी, यदि इंडिया हार गया तो? दिमाग में यह सवाल आते ही जवाब भी साथ-साथ आया। उन्होंने मीटिंग की समाप्ति पर तितर-बितर होती भीड़ को रोकते हुए कहा, ‘यदि हम हार गए तो सारा पटाखा पाकिस्तान में फोड़ेंगे।’ भीड़ में से किसी ने पूछा, ‘और बम?’ पंडित जी का जबाब था, ‘वह भी फोड़ा जाएगा।’ उनका पाकिस्तान मुस्लिमों का मुहल्ला और उनके घर थे। वह अक्सर इन मुहल्लों को पाकिस्तान के नाम से ही पुकारते थे। वह इस मुद्दे पर काफी सतर्क रहते थे। इसलिए ही मंदिर पर मीटिंग में आने के लिए किसी मुस्लिम को आने की सूचना नहीं दी गई थी।
इंडिया ने टॉस जीत लिया था। उसने पहले बैटिंग करने का निर्णय लिया। पंडित जी अपने ड्राइंगरूम में सोफा पर बैठ गए थे। मैच की समाप्ति से पहले उठना न पड़े इस खातिर दो पैकेट सिगरेट पास में रख लिया था। थोड़ी-थोड़ी देर पर चाय का आदेश अपनी पत्नी को दे चुके थे। पहले ओवर के शुरुआत में चौका लगने पर वह बहुत प्रसन्न हुए। पंडित जी की आदत में शुमार था जब चौके-छक्के लगते तो पंडित जी अपनी सीट से उठ जाते और खूब तालियां बजाते और कोई खिलाड़ी आउट होता तो चेहरे पर मातमी तनाव छा जाता। इस तनाव से उबरने के लिए वह डिब्बी से सिगरेट निकालते और माचिस से जलाकर थोड़ी देर तक सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाते और अपनी निराशा से उबरने का प्रयास करते।
टीम इंडिया का पहला विकेट गिर गया था। पंडित जी ने सिगरेट जला ली थी और चाय का आदेश दे दिया था। एक बार फिर वह अपने लंगोटिया यार शर्मा की याद में डूब गए। बचपन से जवानी तक क्रिकेट के खेल में हार जीत का मजा वे साथ साथ लेते हुए आए थे। शर्मा अपनी रोजी रोटी के लिए ड्रग स्मलिंग का काम करने लगे थे। पुलिस ने उनको पकड़ा और छोड़ देने के एवज में एक लाख रुपए की मांग की। इतनी रकम शर्मा जी दे सकने की स्थिति में नहीं थे। सो, पुलिस ने ड्रग स्मलिंग की विभिन्न धाराओं को लागू किया और उन्हें जेल भेज दिया। अदालत में उन्हें दस साल की सजा सुनाई गई। तब से शर्मा जी जेल के सलाखों में कैद थे। मैच के मुद्दे पर, वह भी भारत पाकिस्तान मैचों पर शर्मा जी और पंडित जी की राय एक थी। उनकी देशभक्ति का मतलब क्रिकेट में इंडिया की जीत से था। खासकर, पाकिस्तान के खिलाफ।
जेल की चहारदीवारियों के अन्दर रहते हुए भी शर्मा जी की देशभक्ति की परिभाषा नहीं बदली। जल जंगल जमीन को विदेशी कंपनियों को सौंपने, उद्योगधंधों को बहुराष्ट्रीय निगमों के हवाले करने और इनके खिलाफ आवाज उठाती किसान मजूदर जनता पर लाठी गोली चलाने वाली सरकारों को वे देशभक्त ही मानते थे। हां, यदि सरकार या व्यक्ति भारत-पाक मैच में भारत की जीत की खुशियों में शामिल न हो तो शर्मा जी के हिसाब से वह पक्का देशद्रोही है। उनकी ये धारणा रामचंद्र पंडित के लंबे सानिध्य से बनी और मजबूत हुई थी। जेल में लम्बा समय गुजारने से उनके काले बाल सफेद हो गए थे। दाढ़ी मूंछ के बाल पक गए थे। उनका हृष्टपुष्ट शरीर जेल के घटिया भोजन के चलते टूट गया था। लेकिन अब क्रिकेट के सवाल पर उनके विचार उतने ही पक्के थे।
शर्मा जी जेल के बाहर की परिस्थितियों को तो जेल में आने वाले नए-नए बंदियों की सुनी सुनाई बातों से या पंडित जी से मुलाकात पर हुई बातों से ही अंदाजा लगाते रहते थे। जेल में लम्बा समय गुजारते वक्त जेल की परिस्थितियों में हो रहे बदलाव को वह बहुत करीब से देख रहे थे। जब उनका जेल में दाखिला हुआ था तो बैरकों में बंदियों की संख्या बहुत कम थी। आज तो बैरकें ठसाठस भरी हुई थीं। बैरकों में पहले बिजली के पंखे नहीं थे। अब पंखे लग गये। बंदियों से पैसा वसूल कर अब बैरकों में टीवी भी लगा दी गई थी। यानी हर साल बंदियों की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी हो रही थी। साथ ही जेल में इन सुविधाओं को मुहैया कराने की एवज में जेल प्रशासन सुविधा शुल्क भी बढ़ाता जा रहा था। सन् 2011 की शुरुआत से बंदियों से प्रति माह बी क्लास के नाम पर वसूली की राशि बढ़ा कर 200 रुपए कर दिया गया था। मशक्कत कटाने की राशि बढ़कर 850 रुपए हो गई थी। मनचाही बैरक में लॉकअप लगवाने की चार्ज 1000 रुपए वसूला जाने लगा था। यह सुविधा शुल्क न देने पर शारिरिक मानसिक उत्पीड़न करना जेल प्रशासन का आम नियम बन गया था। शर्मा जी इस लूट से क्षुब्ध जरूर रहते थे लेकिन सीने पर पत्थर रखकर इस बर्दाश्त करने के सिवा उन्हें और कोई रास्ता नहीं था। इस बार प्रशासन ने डिस्क लगवा दिया था। इसके एवज में प्रत्येक बैरक से मोटी रकम वसूला जा चुका था। शर्मा जी इस मसले पर थोड़ी देर तक सोचते रहे और फिर मन को इस ओर हटाते हुए यह सोचा कि जब ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार और लूट है तो किया क्या जा सकता है। छोड़ो यह सब। अब क्रिकेट के रोमांचक मैच पर अपना ध्यान लगाओ!
बैरक में टीवी ऑन थी। क्रिकेट प्रेमी टी वी के पास बैठने की जगह बना चुके थे। जिन्हें बैठने की जगह नहीं मिली वे पीछे खड़े थे। इंडिया की बैटिंग में पड़ने वाले चौकों छक्कों पर बैरकें तालियों की गड़गड़ाहटों से गूंज रही थी। शर्मा जी को भी रामचंद्र पंडित बहुत याद आ रहे थे। वह सोच रहे थे कि काश आज हम जेल की ऊंची दीवारों से बाहर होते तो मजा ही कुछ और होता। शाम के पांच बजे होंगे शर्मा जी की नजर बैरक में नमाज अदा करते हुए कुछ मुस्लिम लोगों पर पड़ी। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया तपाक से व्यक्त की, ‘जरूर साले अल्ला मियां से पाकिस्तान की जीत जाने की दुआ मांग रहे होंगे।’ पास बैठे मैच का आनन्द ले रहे कुछ लोगों ने शर्मा जी की बात में बात मिलाई।
इंडिया अपनी पारी खेल चुकी थी। बीच के इंटरवल में शर्मा जी लघुशंका के लिए उठ खड़े हुए। बैरक में टीवी के विपरीत दिशा में बने टायलेट की ओर बढ़ते हुए उनकी नजर विकास पड़ी। विकास अपने फट्टे पर लेटे-लेटे कोई पत्रिका पढ़ रहा था। शर्मा जी को लगा कि यह तो ठीक नहीं है कि पूरा देश, यहां तक प्रधानमंत्री भी मैच देख रहा हो और इस विकास की क्या बिसात की वह मैच ही न देखे। उन्होंने तपाक से पूछ लिया, ‘तुम मैच नहीं देख रहे हो? देश जंग जीत रहा है और तुम यहां पड़े-पड़े पन्ने पलट रहे हो! देश से कोई लगाव नहीं है क्या?’ विकास ने उनकी ओर देखते हुए जवाब दिया, ‘शर्मा जी देश से लगाव तो है लेकिन क्रिकेट से नहीं। इतना सुनते ही शर्मा जी तमतमा उठे और बिना कॉमा, फुलस्टाप के देशभक्ति पर भाषण देने लगे। अपने भाषण का समापन करते हुए उन्होंने कहा, ‘जो क्रिकेट में टीम इंडिया के साथ नहीं है वह देशद्रोही है।’ विकास उनके इस निष्कर्ष पर तमतमा उठा। उसने कहा, ‘इस देश की प्राकृतिक संपदा को कौड़ियों के मोल विदेशी कंपनियों को सौंपे जाने पर आपकी देशभक्ति कहां थी? जनता की गाढ़ी कमाई को लूट कर विदेशी बैंकों में धन जमा करने वालों की देशभक्ति के बारे में आप क्या कहेंगे? ऊपर से नीचे तक आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी सरकारों को आप देशभक्त कहेंगे? ऐसी देशभक्ति पर लानत है।’ शर्मा जी विकास के तर्कों के आगे निरूत्तर हो गए थे। वह लघुशंका से निवृत्त होकर पुनः टीवी के पास पहुंच गए। अब पाकिस्तान की टीम बैटिंग कर रही थी। शर्मा जी मन ही मन शंकर जी से पाकिस्तान के हार जाने की मन्नतें मानी। अब पाकिस्तानी खिलाड़ियों के आउट होने पर बैरकों से तालियों की गड़गड़ाहटें आने लगी। हवा खामोश थी। सभी बंदी बैरकों में कैद किए जा चुके थे। बैरक की गेट पर ताले जड़ दिये गए थे। मैच में पाकिस्तानी टीम करारी टक्कर दे रही थी। सबकी सांसें टंग गई थीं। रात के लगभग 10 बजे थे अचानक सभी बैरकों से एक साथ तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जोरदार शोर शराबा शुरु हो गया। विकास की नींद खुल गई। इंडिया मैच जीत चुकी थी। जेल की चहारदीवारी के बाहर से पटाखों की आवाज सुनाई दे रही थी। शर्मा जी सोच रहे थे कि रामचंद्र आज पूरी रात जीत के जश्न में पटाखे और देशी बम छोड़ेगा। जीत का उत्सव मना कर बैरक में पहरेदारों के अलावा सभी सो गए। सुबह बैरक खोलते ही जेलर ने गिनती पर उपस्थित बंदियों को टीम इंडिया की जीत पर बधाई दी और इस खुशी में गलती के लिए सजा के तौर पर दौड़ा लगाने की सजा पाए बंदियों को दौड़ा रोक देने की घोषणा कर जेलर अपनी देशभक्ति का इजहार कर दिया।
उधर राम जी पंडित रात भर जीत की खुशी में पटाखे बम फोड़ते फोड़वाते रहे। मोबाइल में जितने नंबर थे उन पर बधाई संदेश को ‘अपने अन्य मित्र को भी एसएमएस करें’ की टिप्पणी के साथ भेजे गए। मोहल्ले के घरों में लगी बिजली की झालरें जगमगाने लगीं। मोमबत्तियों की लौ भी कुछ देर तक माहौल को रंगीन मिजाज किए रहीं। पंडित जी को सुबह होने का इंतजार था। वह घड़ी भी आ गई। इससे पहले पंडित जी नित्य क्रिया से निवृत्त हो स्नान ध्यान कर चुके थे।
पूरब में आसमान लाल हो रहा था। सूरज निकलने ही वाला था। मिठाइयां अबीर गुलाल आदि जरूरी सामान से मंदिर को सजाया जा रहा था। पंडित जी ने लड्डुओं को हनुमान जी के चरणों में सपर्पित कर दिया। उधर भीड़ धीरे धीरे जमने लगी। अबीर गुलाल उड़ाने का सिलसिला शुरु हो गया। सड़कों पर रौनक बढ़ गई थी। नंगे अधनंगे बदनों पर तिरंगा पेंट कराने वाले भी जमा हो गए। लड्डूओं को कई परात में रख दिया गया। जुलूस की शक्ल मिठाइयां बांटा जाने लगा। पंडित जी चिल्ला रहे थे, ‘सबको पेट भर खिलाओ। आखिर देश विजयी हुआ है। सबको मिठाई खानी ही पड़ेगी। जो न खाए समझो वह गद्दार है, देशद्रोही है।’
उधर जुलूस में जमने वाली की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। सभी अबीर गुलाल से रंगे हुए थे। जुलूस मोहल्ले से आगे निकल कर स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया।
ट्रेन से उतर कर गुप्ता जी घर जाने के लिए रिक्शे पर सवार हुए। फ्रेंच कट दाढ़ी रखने के शौकीन गुप्ता जी के ज्यादातर बाल सफेद हो गए थे। उनके हाथ में बैग था। वह जुलूस की जद में आ गए। जुलूस में से किसी ने रिक्शावाले को मिठाई दिया और इसके बाद वह गुप्ता जी की ओर बढ़ा। गुप्ता मिठाई लेने से मनाकर कुछ कहने के लिए आगे की ओर झुके कि भीड़ ने उन्हें नीचे खींच लिया, ‘साला देशद्रोही है, गद्दार है, जीत की खुशी में मिठाई खाने से मना करता है। पकड़ों साले को, मारो साले को,….।’ अकबकाए गुप्ता जी इस हमले के शिकार हो गए थे। उन्हें रिक्शा से नीचे गिरा दिया गया था। वह पसीने से तरबतर हो रहे थे। मार खाने के बीच वह कुछ कहना चाह रहे थे। लेकिन वहां बात सुनने का सब्र किसके पास था। गुप्ता जी का गला रूंध गया था। भीड़ को चीरते हुए पंडित जी गुप्ता जी के करीब पहुंच चुके थे। मारपीट को रोकते हुए उन्होंने आदेश दिया, ‘नंगा करो साले को। तभी पता चलेगा कि यह किस कौम का है।’ तभी जुलूस से बाहर आते एक गांधी टोपी पहने बूढ़े व्यक्ति ने उन्हें नंगा करने से रोका, ‘यह ठीक नहीं है। हां, इसको भर पेट लड्डू खिलाओ। यदि उसके मन में देश के प्रति कड़ुवाहट होगी तो लड्डू का प्रभाव उसे मीठा कर देगा।’ गुप्ता जी के मुंह में एक-एक कर लड्डू ठूंसे जाने लगे। बीच बीच में जबरदस्ती पानी भी पिलाया जाता रहा। जब गुप्ता जी के मुंह में और लड्डू ठूंसने की जगह नहीं बची तो पंडित जी ने आदेश दे दिया, ‘छोड़ो साले को।’ जुलूस आगे बढ़ गया।

गुप्ता जी की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। हाथ पैर की नसें फूलती से लगने लगी। दिल की धड़कन बढ़ गई। शरीर पसीने से तरबतर हो गया। लग रहा था शरीर में जान नहीं है। थोड़ी दूर चले ही थे कि लड़खड़ाने लगे। बहुत कोशिश की पर लड़खड़ाकर गिर पड़े। आस-पास गुजरने वालों ने उन्हें घेर लिया। बहुत सी बात पूछने लगे। गुप्ता जी किसी तरह आप बीती बता पाए, ‘मैं डाइबटीज का मरीज हूं। ब्लडप्रेशर भी है। यह जो जुलूस है उसने मुझे देशद्रोही और गद्दार ठहरा दिया और मुंह में मिठाइयां ठूंस दी। लगता मेरा डाइबटीज बढ़ गया है।’ उन्होंने विनती में अपने दोनों हाथ जोड़ दिए, ‘मुझे अस्पताल पहुंचा दीजिए!’ लोगों ने गुप्ता जी को उठा कर रिक्शा पर बिठा दिया। पास में पड़े बैग से बिखरे सामान(बच्चों के लिए खिलौने और मैरून कलर की एक साड़ी के अलावा उनके ऑफिस के कागजात भी थे) को समेट कर वापस बैग में रख दिया गया। एक दो लोग साथ गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया। दूसरे दिन अखबार के पहले पन्ने पर टीम इंडिया के जुनूनी जुलूस के फोटो के साथ एक और खबर छपी। इसका शीर्षक था: ‘ टीम इंडिया की जीत की खुशी में एक देशद्रोही की मौत।’
{विश्वविजय की जेल डायरी से}
Posted by: हस्तक्षेप 2015/03/26

विश्वविजय जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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