Posted by: Bagewafa | اپریل 11, 2015

फिरता है दर-दर आइना– वीनस केसरी

फिरता है दर-दर आइना– वीनस केसरी

उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना
झूठ को लेकिन लगे है अब भी ख़ंजर आइना

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है
पत्थरों के शह्र में घूमा था दिन भर आइना

ग़मज़दा हैं, ख़ौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ।

कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना

मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया
रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना

अपना अपना फ़ैसला है, अपना अपना हौसला
कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आइना

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