Posted by: Bagewafa | مئی 3, 2015

इतना सस्ता क्यों तुम्हारे मजदूर दिवस का मजदूर !……के. एम. भाई

इतना सस्ता क्यों तुम्हारे मजदूर दिवस का मजदूर !……के. एम. भाई

र गली हर चौराहा यह खुद से पूछ्ता है
क्या तुम्हारे मुल्क मे भी कोई मजदूर बिकता है
ये श्रम का भी क्या अजीब धंधा है
यहाँ इंसान ही इंसान के हाथों बिकता है
तुम्हारे मुल्क में रोटी इतनी सस्ती क्यों
कि थाली का जूठन हमारे पेट का निवाला बनता है
साहब और मजदूर का भी ये कैसा अटूट रिश्ता है
कि महलों के बीच हमारा बच्चा भूखा मरता है
तुम्हारे घर का कांच टूटे तो आवाज संसद तक उठती है
हमारी मौत पर एक आह तक नहीं निकलती
ये लोकतंत्र का भी क्या फलसफा है
लोक के नाम पर यहाँ तंत्र बिकता है
हमारे श्रम पर फल कोई और चखता है
ये जिस्म की आबरू का खेल कैसा
तुम्हारा घर का हर कोना परदे में रहता है और
हमारा जिस्म का सौदा खुलेआम होता है
हर गली हर चौराहा यह खुद से पूछ्ता है
क्या तुम्हारे मुल्क में भी कोई मजदूर बिकता है
क्या तुम्हारे मुल्क मे भी कोई मजदूर बिकता है ?

(सौजन्य:हस्तक्षेप)

 

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Responses

  1. काफी खूब सुन्दर ग़ज़ल


زمرے

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