Posted by: Bagewafa | مئی 8, 2015

वो शम्मा उजाला जिस ने किया………मौलाना जफरअली खान وہ شمع اُجالا جس نے کیا….. مولانا ظفر علی خان

نعت خواں: مہدی حسن و ہمنوا

شاعر: ظفر علی خان

وہ شمع اُجالا جس نے کیا چالیس برس تک غاروں میں
اِک روز جھلکنے والی تھی سب دنیا کے درباروں میں

رحمت کی گھٹائیں پھیل گئیں افلاک کے گنبد گنبد پر
وحدت کی تجلّی کوند گئی آفاق کے سینا زاروں میں

گر ارض و سما کی محفل میں لولاک لما کا شور نہ ہو
یہ رنگ نہ ہو گلزاروں میں یہ نوُر نہ ہو سیّاروں میں

وہ جنس نہیں ایمان جسے لے آئیں دکانِ فلسفہ سے
ڈھونڈے سے ملے گی عاقل کو یہ قرآں کے سیپاروں میں

جس میکدے کی ایک بوند سے بھی لب کج کلہوں کے تر نہ ہوئے
ہیں آج بھی ہم بے مایہ گدا اس میکدے کے سرشاروں میں

جو فلسفیوں سے کھل نہ سکا اور نکتہ وروں سے حل نہ ہوا
وہ راز اِک کملی والے نے بتلادیا چند اشاروں میں

ہیں کرنیں ایک ہی مشعل کی بوبکرؓ و عمرؓ عثمانؓ و علیؓ
ہم مرتبہ ہیں یارانؓ نبی کچھ فرق نہیں ان چاروںؓ میں

वो शम्मा उजाला जिस ने किया………मौलाना जफरअली खान

वो शम्मा उजाला जिस ने किया चालीस बरस तक गारों में
एक रोज़ झलकने वाली थी सब दुनिया के दरबारों में
रहमत की घटाऐं फैल गईं अफ़्लाक के गुंबद गुंबद पर
वहदत की तजल्ली कुविन्द गई आफ़ाक़ के सीनाज़ारों में
गर अर्ज़-ओ-समा की महफ़िल में लौलाक लमा का शोर ना हो
ये रंग ना हो गुलज़ारों में ये नूर ना हो सय्यारों में
वो जिन्स नहीं ईमान जिसे ले आएं दुकान-ए-फ़लसफ़ा से
ढ़ूंढ़े से मिलेगी आक़िल को ये कुरां के सीपारों में
जिस मैकदे की एक बूँद से भी लब कज कलहों के तर ना हुए
हैं आज भी हम बेमाया गदा इस मैकदे के सरशारों में
जो फ़लसफ़ियों से खुल ना सका और नुक्ता वरों से हल ना हुआ
वो राज़ एक कमली वाले ने बतला दिया चंद इशारों में
हैं किरणें एक ही मशअल की (अ)बुबकर-ओ-उमर ओ उसमान ओ- -अली
हम मर्तबा हैं यारानए नबी कुछ फ़र्क़ नहीं इन चारों में

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