Posted by: Bagewafa | اکتوبر 4, 2015

बाज़ार समझ रक्खा है….- शकील कादरी بازار سمجھ رکھا ہے…۔ شکیل قادری

बाज़ार समझ रक्खा है….- शकील कादरी

फूल को जिस ने यहाँ ख़ार समझ रक्खा है।
उस ने महफ़िल को भी बाज़ार समझ रक्खा है।
लोग कतरा के गुज़र जाते हैं शायद
मुझ को। एक गिरती हुई दीवार समझ रक्खा है।
अपने किर्दार को जो शख्स समझता है लिबास।
कौम ने क्यूँ उसे सरदार समझ रक्खा है ?
पाँव मैदाँ मे बढा लब पे लिए नामे खुदा ।
राह को किस लिए दुश्वार समझ रक्खा है ।
जावेदाँ जो है करुं किस लिए उन का मातम?
क्या मुझे तुम ने अज़ादार समझ रक्खा है
वक्त जब आएगा मैं जान लुटा दुँगा ‘शकील’।
आप ने किस लिए गद्दार समझ रक्खा है।

بازار سمجھ رکھا ہے…۔ شکیل قادری

پھول کو جس نے یہاں خار سمجھ رکھا ہے۔
اس نے محفل کو بھی بازار سمجھ رکھا ہے۔
لوگ کترا کے گزر جاتے ہیں شائد
مجھ ے۔ ایک گرتی ہوئی دیوار سمجھ رکھا ہے۔
اپنے کردار کو جو شخص سمجھتا ہے لباس۔
قوم نے کیوں اسے سردار سمجھ رکھا ہے ؟
پاؤں میداں مے بڑھا لب پہ لئے نامے خدا ۔
راہ کو کس لئے دشوار سمجھ رکھا ہے ۔
جاویداں جو ہے کروں کس لئے ان کا ماتم؟
کیا مجھے تم نے عزادار سمجھ رکھا ہے
وقت جب آئیگا میں جان لٹا دونگا ‘شکیل’۔
آپ نے کس لئے غدار سمجھ رکھا ہے۔

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