Posted by: Bagewafa | نومبر 5, 2015

दस्तूर:मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता…..हबीब जालिब دستور-میں نہیں مانتا، میں نہیں مانتا۔حبیب جالب

दस्तूर:मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता…..हबीब जालिब

दीप जिसका महल्लात ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साए में हर  मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता

मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता

फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता

तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर

मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता

دستور-میں نہیں مانتا، میں نہیں مانتا۔حبیب جالب

دیپ جس کا محلات ہی میں جلے
چند لوگوں کی خوشیوں کو لے کر چلے
وہ جو سائے میں ہر مصلحت کے پلے
ایسے دستور کو، صبح بےنور کو
میں نہیں مانتا، میں نہیں جانتا
میں بھی خائف نہیں تختہ دار سے
میں بھی منصور ہوں کہہ دو اغیار سے
کیوں ڈراتے ہو زنداں کی دیوار سے
ظلم کی بات کو، جہل کی رات کو
میں نہیں مانتا، میں نہیں جانتا
پھول شاخوں پہ کھلنے لگے،تم کہو
جام رندوں کو ملنے لگے،تم کہو
چاک سینوں کے سلنے لگے ،تم کہو
اِس کھلے جھوٹ کو، ذہن کی لوٹ کو
میں نہیں مانتا، میں نہیں  جانتا
تم نے لوٹا ہے صدیوں ہمارا سکوں
اب نہ ہم پر چلے گا تمھارا فسوں
چارہ گر میں تمہیں کس طرح سے کہوں
تم نہیں چارہ گر، کوئی مانے، مگر
میں نہیں مانتا، میں نہیں  جانتا

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