Posted by: Bagewafa | نومبر 10, 2015

तुम्हारी आँखों में इक रात बस गुज़ारी थी…….वसीम मलिक,सुरत

तुम्हारी आँखों में इक रात बस गुज़ारी थी…….वसीम मलिक

फिर उसके बाद कभी भी बुरी नज़र न लगी
कि माँ ने ऐसी हमारी नज़र उतारी थी

निहत्थे लोगों पे हमला बहादुरी है तो फिर
"वो जंग तुम भी न जीते जो हमने हारी थी”

फिर उसके बाद हमें नींद ही नहीं आई
तुम्हारी आँखों में इक रात बस गुज़ारी थी

क़रार छीन लिया ऐसे ज़िन्दगी ने मेरा
इसी के वास्ते क्या? ऐसी बेक़रारी थी

उसी के रास्ते में आए बहुत अंधेरे भी
कि जिसकी कहकशां ने नज़र उतारी थी

नज़र में रखता था जो सात आसमान ‘वसीम ‘
उस आदमी में भी किस दर्जा खाकसारी थी

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