Posted by: Bagewafa | دسمبر 25, 2015

अब कहां काफालए खाना बदोशां ठहरे….तस्लीम इलाही झुल्फीا ب کہاں قافلہ خانہ بدوشاں ٹھہر ے۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

अब कहां काफालए खाना बदोशां ठहरे….तस्लीम इलाही झुल्फी

पेहले सीनीके अंधेरेमें चिरागां ठहरे
बाद उसके मेरे घरमें कोई मेहमां ठहरे

हे फसील ऊंची बहुत,बंद है दर्वाजए शहर
अब कहां काफालए खाना बदोशां ठहरे

अपने असबाबमें ,एक बे सरो सामानी थी
शहरसे दूरही हम बे सरोसामां ठहरे

रूहके चारों तरफ जिस्मके हंगामे थे
ऐसे पथरवमें क्या आयना जां ठहरे

शहरमें कहत अब बखिया गरोंका झुल्फी
अप्ने हाथोमें जरा अपना गरीबां ठहरे

(सौजन्य:फैज अहम्द फैज बैरूत में पृ.125)

اب کہاں قافلہ خانہ بدوشاں ٹھہر ے۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

Zulfi 001(   فیض احمد فیض بیروت میں۔۔۔۔۔صفہ۔126   )

 

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