Posted by: Bagewafa | دسمبر 27, 2015

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है…..मिर्जा ग़ालिबہر ایک بات پہ کہتے ہو تم کہ تو کیا ہے ۔۔۔۔۔ مرزا غالب

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है…..मिर्जा ग़ालिब

 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न तुमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में "ग़ालिब” की आबरू क्या है


ہر ایک بات پہ کہتے ہو تم کہ تو کیا ہے ۔۔۔۔۔ مرزا غالب

ہر ایک بات پہ کہتے ہو تم کہ تو کیا ہے
تمہیں کہو کہ یہ اندازِ گفتگو کیا ہے

نہ شعلے میں یہ کرشمہ نہ برق میں یہ ادا
کوئی بتاؤ کہ وہ شوخِ تند خو کیا ہے

یہ رشک ہے کہ وہ ہوتا ہے ہم سخن تم سے
ورنہ خوفِ بد آموزیِ عدو کیا ہے

چپک رہا ہے بدن پر لہو سے پیراہن
ہمارے جَیب کو اب حاجتِ رفو کیا ہے

جلا ہے جسم جہاں، دل بھی جل گیا ہوگا
کریدتے ہو جو اب راکھ جستجو کیا ہے

رگوں میں دوڑتے پھرنے کے ہم نہیں قائل
جب آنکھ سے ہی* نہ ٹپکا تو پھر لہو کیا ہے

وہ چیز جس کے لیے ہم کو ہو بہشت عزیز
سوائے بادۂ گلفامِ مشک بو** کیا ہے

پیوں شراب اگر خم بھی دیکھ لوں دو چار
یہ شیشہ و قدح و کوزہ و سبو کیا ہے

رہی نہ طاقتِ گفتار اور اگر ہو بھی
تو کس امید پہ کہیے کہ آرزو کیا ہے

 

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زمرے

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