Posted by: Bagewafa | دسمبر 28, 2015

जशन-ए-मीलाद उन्नबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम एक लम्हा-ए-फ़िक्रिया…… मौलाना मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उसमानी

जशन-ए-मीलाद उन्नबी सलल्लाहेअलैहि वसल्लम एक लम्हा-ए-फ़िक्रिया……
मौलाना मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उसमानी

१२/ रबी उलअव्वल को ईदे मीलाद उन्नबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम मनाने का रिवाज कुछ अरसे से मुसलसल चला आरहा है, चूँकि अहदे सहाबा किराम रिदवानल्लाहे ताला अलैहिम अजमईन और क़ुरून-ए-ऊला में इस ईद का कोई पता निशान नहीं मिलता। इसलीए अकाबिर उलमाए हक़ हमेशा ये कहते आए हैं कि ये दिन मनाने की रस्म हम में ईसाईयों और हिंदूओं से आई है, तारीख़ इस्लाम के इबतिदाई दौर में इस की कोई बुनियाद नहीं मिलती, लिहाज़ा इस रस्म की हौसला-अफ़ज़ाई के बजाय हौसलाशिकनी करनी चाहिए, मुस्लमानों का असल काम ये है कि वो इन रस्मी मुज़ाहिरों के बजाय सरकार दो-आलम सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की तालीमात की तरफ़ मुतवज्जा हो, और एक दिन में ईद मीलाद मनाकर फ़ारिग़ होजाने के बजाय अपनी पूरी ज़िंदगी को आप सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की तालीमात के साँचे में ढालने की फ़िक्र करें।
ये उलमाए देवबंद और उलमाए अहल-ए-हदीस का मौक़िफ़ था और बरेलवी मकतब फ़िक्र के हज़रात इस से इख़तिलाफ़ करते थे लेकिन अब चंद सालों से जो सूरत-ए-हाल सामने आरही है, इस में ये मसला सिर्फ देवबंदी मकतब फ़िक्र का नहीं रहा, बल्कि हर उस मुस्लमान का मसला बन गया है जो सरवर-ए-कायनात सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की अज़मत-ओ-मुहब्बत और हुर्मत-ओ-तक़द्दुस का कोई एहसास अपने दिल में रखता हो, अब सिर्फ उलमाए देवबंद और उलमाए अहल-ए-हदीस ही को नहीं बल्कि उलमाए बरेली को भी इस पर पूरी संजीदगी के साथ ग़ौर करना चाहिए कि जश्न ईद मीलाद उन्नबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के नाम पर ये क़ौम दीनी तबाही के किस गढ़े की तरफ़ जा रही है, क्योंकि जिन हज़रात ने इबतिदा में महफ़िल मीलाद वग़ैरा को मुस्तहसिन क़रार दिया था, उनके चश्म-ए-तसव्वुर में भी ग़ालिबन वो बातें नहीं होंगी जो आज जश्न मीलाद-उन्नबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम का जुज्वए लाज़िम बनती जा रही हैं।
शुरू में महफ़िल मीलाद का तसव्वुर एक ऐसी मजलिस की हद तक महिदूद था जिसमें सरवर-ए-कायनात सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की विलादत बासआदत का बयान किया जाता हो, लेकिन इन्सान का नफ़स इस क़दर शरीर वाक़्य हुआ है कि जो काम वही की रहनुमाई के बग़ैर शुरू किया जाता है, वो इबतिदा में ख़ाह कितना मुक़द्दस नज़र आता हो, लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता इस में नफ़सानी लज़्ज़त के मवाक़े तलाश कर लेता है और इस का हुल्या बिगाड़ कर छोड़ता है, चुनांचे अब अल्लाह के महबूब तरीन पैग़ंबर सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के मुक़द्दस नाम पर जो कुछ होने लगा है, उसे सुनकर पेशानी अर्क़ अर्क़ होजाती है।
हर साल ईद मीलाद उन्नबी के नाम से सिर्फ कराची में ज़ुलम-ओ-जहालत के ऐसे ऐसे शर्मनाक मुज़ाहिरे किए जाते हैं कि उनके अंजाम के तसव्वुर से रूह काँप उठती है, मुख़्तलिफ़ महलों को रंगीन रौशनियों से दुल्हन बनाया जाता है और शहर के तक़रीबन तमाम होटलों में ईद मीलाद इस तरह मनाई जाती है कि लाऊड स्पीकर लगाकर बुलंद आवाज़ से शब-ओ-रोज़ रिकार्डिंग का तूफ़ान बरपा रहता है। बहुत से सिनेमा ईद मीलाद की ख़ुशी में सैंकड़ों बल्ब लगा कर उन अख़लाक़ सोज़ और बरहिना तस्वीरों को और नुमायां कर देते हैं जो अपनी हर हर अदा से सरकार दो-आलम सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के अहकाम की ना-फ़रमानी की बरमला दावत देती हैं और इन्ही मुक़ामात पर इन्सानियत की तस्वीरों के साय में शायद तबर्रुक के ख़्याल से ख़ाना काअबा और रौज़ा अक़्दस की तस्वीरें भी चस्पाँ कर दी जाती हैं, एक मुहल्ला में क़दम क़दम पर रौज़ा अतहर और मस्जिद नबवी की शबीहें बनाकर खड़ी की जाती हैं, जिन्हें कुछ बे फ़िक्रे नौजवान एक तफ़रीहगाह के तौर पर इस्तिमाल करते हैं और कुछ बेपर्दा औरतें उन्हें छू छूकर ख़ैर-ओ-बरकत हासिल करती हैं और और ज़ाहिर है कि जब पूरे मुहल्ला को रौशनियों में नहलाकर जगह जगह मेहराबें खड़ी करके और क़दम क़दम पर फ़िल्मी रिकार्ड बजाकर एक मेले का समां पैदा कर दिया जाये तो फिर औरतें और बच्चे ऐसे मेले को देखने के लिए क्यों ना पहुंचें जिसमें मेले का लुतफ़ भी है और (मआज़ल्लाह) ताज़ीम रसूल अल्लाह सलल्लाहे अलैहि वसल्लम का सवाब भी, चुनांचे रातों का देर तक यहां तफ़रीह बाज़ मर्दों, औरतों और बच्चों का ऐसा मख़लूत इजतिमा रहता है जिसमें बेपर्दगी, ग़ुंडा गर्दी और बे-हयाई को खुली छूट मिली होती है।
राक़िम उल-हरूफ़ एक रोज़ उस मुहल्ले से गुज़रते हुए ये दिलदोज़ मुनाज़िर अपनी आँखों से देख रहा था और इस आयत करानी के तसव्वुर से रूह काँप रही थी, जिसका तर्जुमा ये है:
और ऐसे लोगों से बिलकुल किनारा-कशी इख़तियार करलो जिन्हों ने अपने दीन को खेल तमाशा बना रखा है और दुनियावी ज़िंदगी ने उनको धोका में डाल दिया है और इस क़ुरआन के ज़रीये उनको नसीहत करो ताकि कोई शख़्स अपने किए में इस तरह गिरफ़्तार ना हो जाएगी कि अल्लाह के सिवा उस का कोई हिमायती और सिफ़ारिश करने वाला ना हो और अगर वो दुनिया-भर का मुआवज़ा दे डाले तब भी ना लिया जाये, ये वही लोग हैं जो अपने किए में गिरफ़्तार हुए, उनके लिए खौलता हुआ पानी पीने के लिए होगा और कुफ़्र के सबब दर्दनाक सज़ा होगी।
अल्लाह ताला हर मुस्लमान को इस आयत का मिस्दाक़ बनने से महफ़ूज़ रखे, लेकिन वाक़िया ये है कि इस मुहल्ले से गुज़रते हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे ख़ातिम-उन-नबिय्यीन सलल्लाहे अलैहि वसल्लम का लाया हुआ दीन पुकार पुकार कर ये फ़र्याद कर रहा है कि मुहम्मद अरबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के नाम लीवाओ! तुम गुमराही और बे-हिसी के किस अंधे ग़ार में जा गिरे हो? क्या सरवर-ए-कायनात सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के एहसानात का बदला यही है कि उन्ही की मुहब्बत-ओ-अज़मत के नाम पर उनकी एक एक तालीम को झटलाओ? उनके एक एक हुक्म की ना-फ़रमानी करो? और उनकी याद मनाने के बहाने जाहिलियत की इन तमाम रस्मों को ज़िंदा करके छोड़ो जिन्हें अपने क़दमों तले रौंदने के लिए आप सलल्लाहे अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए थे? ख़ुदा के लिए सोचो कि जिस ज़ात को साज़ो रबाब और चंग-ओ-बरबत के तोड़ने के लिए मबऊस किया गया था, उस के जशन-ए-विलादत में साज़ व रबाब से खेल कर तुम किस ग़ज़ब इलाही को दावत दे रहे हो? जिस ज़ात ने औरत के सर पर इफ़्फ़त-ओ-इस्मत का ताज रखा था और जिसने उस के गले में इज़्ज़त-ओ-आबरू के हार डाले थे, उस की मुहब्बत-ओ-तक़दीस के नाम पर तुम औरत को बेपर्दगी और बे-हयाई के किस मेले में खींच लाए हो? जिस ज़ात ने नाम-ओ-नमूद, रिया-ओ-नुमाइश, इसराफ़-ओ-तबज़ीर से मना किया था, ये नुमाइशें मुनाक़िद करके तुम किस की ख़ुशनुदी हासिल करना चाहते हो? अगर दीन की कोई सही ख़िदमत तुमसे नहीं हो सकती, अगर तुम अपनी आम ज़िंदगी में अल्लाह की ना-फ़रमानियों को तर्क नहीं कर सकते, अगर मुहम्मद अरबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की तालीमात तुम्हारे ऐशपरस्त मिज़ाज को बार मालूम होती हैं, तो तुम्हारी ज़िंदगी के बहुत से शोबे इस ऐशपरस्ती के लिए काफ़ी हैं, ख़ुदा के लिए अल्लाह के महबूब तरीन पैग़ंबर सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के नाम पर हुआ-ओ-हवस का ये बाज़ार लगाकर इस नबी रहमत सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की तालीमात का मज़ाक़ तो ना उड़ाओ, उस के तक़द्दुस और पाकीज़गी के आगे फ़रिश्तों की गर्दनें भी ख़म होजाती हैं, अपने गिरेबानों में मुँह डाल कर देखो कि रसूल करीम सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के एक एक हुक्म की ना-फ़रमानी करने के बाद तुम किस चीज़ की ख़ुशी में अपने दरोदीवार पर चिराग़ां कर रहे हो? क्या तुम्हें इस बात की ख़ुशी है कि तुमने अपनी अमली ज़िंदगी में इस दीन बरहक़ की कोई क़दर सही सालिम नहीं देखी? लेकिन ऐश-ओ-निशात की गूँजती हुई महफ़िलों में कौन था जो दीन मज़लूम की इस फ़र्याद को सन सकता?
जिन लोगों का मक़सद ही इस किस्म के हंगामों से ऐश-ओ-निशात का सामान पैदा करना है, उनका तो कोई ज़िक्र ही नहीं, लेकिन जो लोग वाक़ातन आँहज़रत सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की ताज़ीम-ओ-मुहब्बत ही के ख़्याल से इस किस्म के जश्न मनाते हैं, वो भी ये बात फ़रामोश कर रहे हैं कि इस्लाम और अकाबिर इस्लाम को दूसरे मज़ाहिब और उनके पेशवाओं पर क़ियास नहीं किया जा सकता। इस्लाम ने जहां हमें उनकी ताज़ीम और उनके तज़किरे को बरक़रार रखने का हुक्म दिया है, वहां हमें उस का तरीक़ा भी बताया है, ये वो दीन हक़ है जो हमें दूसरे मज़ाहिब की तरह रस्मी मुज़ाहिरों में उलझाने के बजाय ज़िंदगी के असली मक़सद की तरफ़ मुतवज्जा करता है और इस के लिए ये अकाबिर इस दुनिया में तशरीफ़ लाए थे। वर्ना अगर इस्लाम भी दूसरे मज़ाहिब की तरह उन रस्मी मुज़ाहिरों की तरह जाना जाता तो आज हम इस बात पर फ़ख़र महसूस ना कर सकते कि हमारा देन बफ़ज़ला ताला उसी शक्ल में महफ़ूज़ है जिस शक्ल में आँहज़रत सलल्लाहे अलैहि वसल्लम इसे लेकर दुनिया में तशरीफ़ लाए थे।
इस की वजह ये है कि जब किसी मज़हब के पैरोकार महिज़ ज़ाहिरी रस्मों और नुमाइशों में उलझ जाते हैं तो रफ़्ता-रफ़्ता इस मज़हब की असल तालीमात मिटती चली जाती हैं और बिलआख़िर बे-जान रसूम का एक ऐसा मलग़ूबा बाक़ी रह जाता है जिसका मक़सद इन्सानी नफ़सानी ख़ाहिशात की हुक्मरानी के सिवा कुछ नहीं होता और जो माद्दापरस्ती की बदतरीन शक्ल है, इन तमाम तक़रीबात का असल मक़सद तो ये होना चाहिए था कि उनके ज़रीया वो ख़ास शख़्सियत या वो ख़ास वाक़िया ज़हन में ताज़ा हो जिसकी याद में वो तक़रीब मुनाक़िद की जा रही है और फिर इस से अपनी ज़िंदगी में सबक़ हासिल किया जाये, लेकिन इन्सान का नफ़स बड़ा शरीर वाक़्य हुआ है, उसने उन तहवारों की असल रूह को तो भला कर नाबूद कर दिया और सिर्फ वो चीज़ें लेकर बैठ गया जिससे लज़्ज़त अंदोज़ी और ऐशपरस्ती की राह खुलती थी। इस की वज़ाहत एक मिसाल से हो सकेगी।
ईसाई कौमें हर साल 25दिसंबर को क्रिसमिस का जश्न मनाती हैं, ये जश्न दरअसल हज़रत-ए-ईसा अलैहिस-सलाम का जशन-ए-विलादत है और इस की इबतिदा इसी मुक़द्दस अंदाज़ से हुई थी कि इस दिन हज़रत-ए-ईसा अलैहिस-सलाम और आपकी तालीमात को लोगों में आम किया जाएगा, चुनांचे इब्तिदा-ए-में इस की तमाम तक़रीबात कलीसा में अंजाम पाती थीं और उनमें कुछ मज़हबी रसूम अदा की जाया करती थीं, रफ़्ता-रफ़्ता इस जश्न का सिलसिला कहाँ से कहाँ तक पहुंच गया? इस की मुख़्तसर दास्तान, जश्न-ओ-तक़रीबात की एक माहिर मुसन्निफ़ा हीज़ लुटावन है, इस से सुनिए, बरटानीका के मक़ाला क्रिसमिस में लिखती हैं:
कई सदीयों तक क्रिसमिस ख़ालिस्तन एक कलीसा का तहवार था, जिसे कुछ मज़हबी रसूम अदा करके मनाया जाता था, लेकिन जब ईसाई मज़हब बुत परस्तों के ममालिक में पहुंचा तो इस में सुरमानी नुक़्ता इन्क़िलाब की बहुत सी तक़रीबात शामिल हो गईं और इस का सबब ग्रेगोरी आज़म (अव्वल) की आज़ाद ख़्याली और इस के साथ मुबल्लग़ीन ईसाईयत का तआवुन था, इस तरह क्रिसमिस एक ऐसा तहवार बन गया जो बैयकवक़त मज़हबी भी था और लादीनी भी, इस में तक़द्दुस का पहलू भी था और लुतफ़ अंदोज़ी का सामान भी।
अब क्रिसमिस किस तरह मनाया जाने लगा? इस को बयान करते हुए मेरी हैर्ज़ लुटावन लिखती हैं:
रूमी लोग अपनी इबादत-गाहों और अपने घरों को सबज़ झाड़ीयों और फूलों से सजाते थे, डराविडस (पुराने ज़माने के पादरी) बड़े तज़क-ओ-एहतिशाम से अमरबेलें जमा करते और उसे अपने घरों में लटकाते, सेक्सन क़ौम के लोग सदाबहार पौदे इस्तिमाल करते।
उन्होंने आगे बताया है कि:
किस तरह शजर क्रिसमिस( Chirstmas Tree) का रिवाज चला, चिराग़ां और आतशबाज़ी के मश्ग़ले इख़तियार किए गए, क़ुर्बानी की इबादत की जगह शाह बलूत के दरख़्त ने ले ली, मज़हबी नग़मों की जगह आम ख़ुशी के नग़मे गाय गए और : मौसीक़ी क्रिसमिस का एक अज़ीम जुज बन गई।
मक़ाला निगार आगे रक़मतराज़ है:
अगरचे क्रिसमिस में ज़्यादा ज़ोर मज़हबी पहलू पर दिया गया था, लेकिन अवामी जोश-ओ-ख़ुरोश ने निशात अंगेज़ी को इस के साथ शामिल करके छोड़ा।
और फिर& गाना बजाना, खेल कूद, रक़्स, नाटक बाज़ी और परीयों के ड्रामे तक़रीबात का हिस्सा हो गए। (बरटानीका स, ६४२।इज ५, मतबूआ १९५०-ए-मक़ाला क्रिसमिस )
एक तरफ़ क्रिसमिस के इर्तिक़ा की ये मुख़्तसर तारीख़ ज़हन में रखीए और दूसरी तरफ़ इस तर्ज़-ए-अमल पर ग़ौर कीजीए, जो चंद सालों से हमने जश्न-ए-ईद मीलाद उन्नबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम मनाने के लिए इख़तियार किया हुआ है, क्या इस से ये हक़ीक़त बे-नक़ाब नहीं होती कि:
ईं रह कि तोमी रवी बह तुर्किस्तान अस्त
इस्लाम इस आलिमुलगै़ब का मुक़र्रर क्या हुआ द्दीन है जो इस कायनात के ज़र्रा ज़र्रा से बाख़बर है और जिसके इलम मुहीत के आगे माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल की सरहदें बेमानी हैं, वो इन्सानी नफ़स की उन पर-फ़रेब कारीयों से पूरी तरह वाक़िफ़ है जो तक़द्दुस का लुबादा ओढ़ कर इन्सानियत को गुमराह करती हैं, इसलिए उसने ख़ास ख़ास वाक़ियात की यादगार क़ायम करने के लिए इन तमाम तरीक़ों से परहेज़ का हुक्म दिया है, जो उनकी असल रूह को फ़ना करके उन्हें ऐश-ओ-इशरत की चंद ज़ाहिरी रसूम के लिए बहाना बना सकते हैं.चुनांचे सहाबा रिदवान अल्लाह ताला अलैहिम अजमईन और ताबईन के दौर में हमें कहीं नज़र नहीं आता कि उन्होंने सरवर-ए-कायनात सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की विलादत बासआदत जैसे अज़ीमुश्शान वाक़िया का कोई दिन मनाया हो, उस के बरख़िलाफ़ उनकी तमाम-तर तो जिहात आँहज़रत सलल्लाहे अलैहि वसल्लम की तालीमात को अपनाने और आप सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के पैग़ाम को फैलाने की तरफ़ मर्कूज़ रहें और इसी का नतीजा है कि चौदह सौ साल गुज़रने पर भी हम मुस्लमान बैठे हैं और अगर इस्लाम पर अमल करना चाहें तो ये दीन ठीक इसी तरह महफ़ूज़ है जिस तरह आप सलल्लाहे अलैहि वसल्लम ने सहाबा किराम अलैहिम अलरज़वान तक पहुंचाया था।
लिहाज़ा अगर हम अपने इस्लाफ़ के इस तर्ज़-ए-अमल को छोड़कर ग़ैर मुस्लिम अक़्वाम के दिन मनाने के तरीक़े को अपनाईंगे तो मतलब ये होगा कि हम दीन के नाम पर खेल तमाशों के इसी रास्ते पर जा रहे हैं जिससे इस्लाम ने बड़ी एहतियाती तदाबीर के साथ हमें बचाया था, आपको मालूम है कि इस्लाम ने ग़ैर मुस्लिम अक़्वाम की मुशाबहत से परहेज़ करने की जाबजा इंतिहाई तदबीर के साथ तलक़ीन फ़रमाई है। इंतिहा ये है कि आशूरा मुहर्रम का रोज़ा जो हरा एतबार से एक नेकी ही नेकी थी, इस में यहूदीयों की मुशाबहत से बचाने के लिए ये हुक्म दिया गया कि सिर्फ दस तारीख़ का रोज़ा ना रखा जाये, बल्कि उस के साथ नौ या ग्यारह तारीख़ का रोज़ा भी रखा जाये ताकि मुस्लमानों का रोज़ा आशूरा-ए-यहूद से मुमताज़ हो जाएगी।
ग़ौर फ़रमाईए! कि जिस दीन हनीफ़ ने इस बारीकबीनी के साथ ग़ैर मुस्लिम अक़्वाम की तक़लीद बल्कि मुशाबहत से बचाने की कोशिश की है, इस को ये कैसे गवारा हो सकता है कि सरवर-ए-कायनात सलल्लाहे अलैहि वसल्लम का यौम-ए-पैदाइश मनाने के लिए उनकी नक़्क़ाली शुरू कर दी जाये जिन्हों ने अपने दीन को बिगाड़ बिगाड़ कर खेल तमाशों में तबदील कर दिया है?
मज़कूरा बाला हक़ायक़ के पेश-ए-नज़र हम अपने मलिक के तमाम उल्मा, दीनी रहनुमाओं, मज़हबी जमातों और बा-असर मुस्लमानों से अपील करते हैं कि वो इस मसले पर पूरी संजीदगी के साथ ग़ौर फ़रमाएं, हमारी ये अपील सिर्फ अहल-ए-हदीस और देवबंदी मकतब फ़िक्र के हज़रात की हद तक महिदूद नहीं बल्कि हम बरेलवी मकतब फ़िक्र के हज़रात से भी यही गुज़ारिश करना चाहते हैं ईद मीलाद उन्नबी सलल्लाहे अलैहि वसल्लम के नाम पर जो अल-मनाक हरकतें अब शुरू हो गई हैं, वो यक़ीनन उनको भी गवारा नहीं होंगी

Courtesy: Deoband on line

 

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