Posted by: Bagewafa | فروری 13, 2016

आह निदा ! वाह निदा…….बागे वफा.अलविदा निदा….آہ ندا -واہ ندا۔ال ودا ندا۔۔۔باغ وفا

आह निदा ! वाह निदा.अलविदा निदा……बजमे वफा….बागे वफा…..آہ ندا  واہ ندا۔ال ودا ندا۔۔۔بزم وفا۔۔باغ وفا

241549C5-4F8E-47F3-A933-7170280A4AD9_w640_r1_s(जन्म: 12 अक्तूबर 1938……निधन: 08 फ़रवरी 2016)
(12 Octo.1938—-8 Feb.2016)

 

آہ۔۔! ندا فاضلی بھی ہم میں نہیں رہے

ندا فاضلی بیمار نہیں تھے۔ بس سینے میں اچانک درد کی شکایت ہوئی تو اسپتال پہنچایا گیا۔ لیکن، سوچ کے برخلاف، ان کا ہارٹ فیل ہوا اور ندا موت کے فرشتے کے ساتھ ہی ہو لئے۔۔اس لئے یہ خبر سب کو چونکا گئی
عالمی شہرت یافتہ شاعر جمیل الدین عالی انتقال کرگئے
’عالی صاحب‘ کی کمی پوری ادبی دنیا میں محسوس کی جائےگی: افتخار عارف
کچھ یادیں کچھ باتیں: افتخار عارف کے ساتھ ایک نشست

وسیم صدیقی
ممبئی کے باسی، نغمہ نگار اور ایک اچھے انسان۔۔ ندا فاضلی سے زندگی کا رشتہ کیا ٹوٹا؛ گویا، اردو شاعری کے دامن میں ٹکا ایک اور ستارہ نکل گیا۔ دنیا عشروں تک جس کے نغموں سے گونجتی رہی، وہ خود پیر 8 فروری کی صبح خاموشی کے ساتھ اس دنیا سے کنارہ کش ہوگیا۔

ندا فاضلی بیمار نہیں تھے۔ بس سینے میں اچانک درد کی شکایت ہوئی تو اسپتال پہنچایا گیا۔ لیکن، سوچ کے برخلاف، ان کا ہارٹ فیل ہوا؛ اور ندا موت کے فرشتے کے ساتھ ہی ہولئے۔۔ اس لئے، یہ خبر سب کو چونکا گئی۔

ندا فاضلی نے ریاست راجستھان کے شہر گوالیار میں 77سال پہلے سنہ 1938 میں زندگی کی پہلی اور ممبئی میں آخری سانس لی۔ ان کا اصل نام مقتدا حسن تھا۔ 1960ء میں ان کے والد کا انتقال ہوا تو باقی گھر والے پاکستان آبسے مگر ندا فاضلی اپنی زمین سے محبت کا رشتہ نہ توڑ سکے۔

ندا فاضلی نے ایک فلمی جریدے ’فلم فیئر‘ کو دیئے گئے اپنے انٹرویو میں بتایا تھا کہ انہیں فلمی نغموں کے لکھنے کی پہلی پیشکش فلم ’پاکیزہ‘ اور ’رضیہ سلطانہ‘ کے فلم ساز کمال امروہوی نے کی تھی۔ انہوں نے دھرمیندر اور ہیما مالنی کی فلم ’رضیہ سلطانہ‘ کے لئے دو گانے لکھنے کی آفر ہوئی تھی۔ پھر اس کے بعد تو گویا پوری فلم انڈسٹری کے لوگ انہی سے رجوع کرنے لگے۔

”تو اس طرح سے میری زندگی میں شامل ہے ۔۔۔“ اور ”کہیں کسی کو مکمل جہاں نہیں ملتا۔۔“جیسے شاندار گیت ندا فاضلی نے ہی تخلیق کئے۔ اس دور سے لیکر آج تک کے متعدد مقبول موسیقاروں، گلوکاروں اور گیت کاروں کے ساتھ کام کیا جن میں خیام، آر ڈی برمن، لتا منگیشکر اور ان جیسے بے شمار نامور لوگ۔

سنہ 80 کی دہائی کے آتے آتے وہ فلمی نغموں کے ساتھ ساتھ غزلوں کی دنیا میں بھی اپنے ہم عصروں کو پیچھے چھوڑ گئے۔

جگجیت سنگھ بھارت کے سرفہرست غزل گو شاعر تھے۔ انہوں نے ندا فاضلی کی بے شمار غزلوں کو اپنی آواز دی۔ جگجیت کی عادت تھی وہ غزل شروع کرنے سے پہلے اکثر غزل کے شاعر کا نام ضرور لیا کرتے تھے، خاص کر جبکہ غزل ندا فاضلی نے لکھی ہو۔ اس بہانے جگجیت کے جتنے بھی چاہنے والے تھے انہیں ندا فاضلی کا نام ازبر ہوگیا تھا۔

ندا فاضلی نے پانچ شعری مجموعے تخلیق کئے جن میں ’لفظوں کے پھول‘، ‘مور ناچ‘ اور ’دنیا ایک کھلونا ہے‘ نے خوب شہرت حاصل کی۔ ندا نے ’دوہے‘ بھی تحریر کیے مگر اردو زبان کے بجائے ہندی زبان میں۔ ندا کو اردو اور ہندی کے بعد جس زبان پر عبور حاصل تھا وہ انگریزی تھی۔ وہ انگریزی لٹریچر کے طالب علم بھی رہے تھے۔

ندا فاضلی کو پدم شری ایوارڈ دیا گیا اور 1998 میں نظم ‘کھویا ہوا سا کچھ’ پر انہیں ساہتیہ اکیڈمی ایوارڈ عطا کیا گیا، جبکہ میر تقی میر ایوارڈ کے لئے بھی انہی کو چونا گیا۔

Courtesy: http://www.urduvoa.com/content/nida-fazili-passes-away/3183510.html

1

تنہا تنہا ہم رو لیں گے محفل محفل گائیں گے…ندا فاضلی

تنہا تنہا ہم رو لیں گے محفل محفل گائیں گے
جب تک آنسو پاس رہیں گے تب تک گیت سنائیں گے

تم جو سوچو وہ تم جانو ہم تو اپنی کہتے ہیں
دیر نہ کرنا گھر جانے میں ورنہ گھر کھو جائیں گے

بچوں کے چھوٹے ہاتھوں کو چاند ستارے چھونے دو
چار کتابیں پڑھ کر وہ بھی ہم جیسے ہو جائیں گے

کن راہوں سے دور ہے منزل کون سا راستہ آسان ہے
ہم جب تھک کر رک جائیں گے اوروں کو سمجھائیں گے

اچھی صورت والے سارے پتھر دل ہوں ممکن ہے
ہم تو اُس دن رائے دیں گے جس دن دھوکہ کھائیں گے

2

جو آدمی بھی ملا بن کے اشتہار ملا

ذہانتوں کو کہاں کرب سے فرار ملا
جسے نگاہ ملی اس کو انتظار ملا

وہ کوئی راہ کا پتھر ہو یا حسین منظر
جہاں سے راستہ ٹھہرا وہیں مزار ملا

کوئی پکار رہا تھا کھلی فضاؤں سے
نظر اٹھائی تو چاروں طرف حصار ملا

ہر ایک سانس نہ جانے تھی جستجو کس کی
ہر ایک دیار مسافر کو بےدیار ملا

یہ شہر ہے کہ نمائش لگی ہوئی ہے کوئی
جو آدمی بھی ملا بن کے اشتہار ملا
3

سفر میں دھوپ تو ہوگی جو چل سکو تو چلو

سفر میں دھوپ تو ہوگی جو چل سکو تو چلو
سبھی ہیں بھیڑ میں تم بھی نکل سکو تو چلو

اِدھر اُدھر کئی منزل ہیں چل سکو تو چلو
بنے بنائے ہیں سانچے جو ڈھل سکو تو چلو

کسی کے واسطے راہیں کہاں بدلتی ہیں
تم اپنے آپ کو خود ہی بدل سکو تو چلو

یہاں کسی کو کوئی راستہ نہیں دیتا
مجھے گرا کے اگر تم سنبھل سکو تو چلو

یہی ہے زندگی کچھ خواب چند امیدیں
انہی کھلونوں سے تم بھی بہل سکو تو چلو

ہر ایک سفر کو ہے محفوظ راستوں کی تلاش
حفاظتوں کی روایت بدل سکو تو چلو

کہیں نہیں کوئی سورج ، دھواں دھواں ہے فضا
خود اپنے آپ سے باہر نکل سکو تو چلو

4

آج ذرا فرصت پائی تھی آج اسے پھر یاد کیا

آج ذرا فرصت پائی تھی آج اسے پھر یاد کیا
بند گلی کے آخری گھر کو کھول کے پھر آباد کیا

کھول کے کھڑکی چاند ہنسا پھر چاند نے دونوں ہاتھوں سے
رنگ اڑائے پھول کھلائے چڑیوں کو آزاد کیا

بات بہت معمولی سی تھی الجھ گئی خاموشی سے
اک ذرا سی ضد کی خاطر خود کو بہت برباد کیا

بڑے بڑے غم کھڑے ہوئے تھے رستہ روکے راہوں میں
چھوٹی چھوٹی خوشیوں سے ہی ہم نے دل کو شاد کیا

پڑھے لکھوں کی بات نہ مانی کام آئی حیرانی سی
سنا ہوا کو پڑھا ندی کو موسم کو استاد کیا

5

دن سلیقے سے اُگا ، رات ٹھکانے سے رہی

دن سلیقے سے اُگا ، رات ٹھکانے سے رہی
دوستی اپنی بھی کچھ روز زمانے سے رہی

چند لمحوں کو ہی بناتی ہیں مصور آنکھیں
زندگی روز تو تصویر بنانے سے رہی

اس اندھیرے میں تو ٹھوکر ہی اجالا دے گی
رات جنگل میں کوئی شمع جلانے سے رہی

فاصلہ چاند بنا دیتا ہے ہر پتھر کو
دور کی روشنی نزدیک تو آنے سے رہی

شہر میں سب کو کہاں ملتی ہے رونے کی فرصت
اپنی عزت بھی یہاں ہنسنے ہنسانے سے رہی

निदा फ़ाज़ली बीमार नहीं थे। बस सीने में अचानक दर्द की शिकायत हुई तो अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन, सोच के बरख़िलाफ़, उनका हार्ट फ़ेल हुआ और निदा मौत के फ़रिश्ते के साथ ही हो लिए।।इस लिए ये ख़बर सबको चौंका गई
आलमी शौहरत-ए-याफ़ता शायर जमील उद्दीन आली इंतिक़ाल कर गए
आली साहिब की कमी पूरी अदबी दुनिया में महसूस की जाएगी: इफ़्तिख़ार आरिफ़
कुछ यादें कुछ बातें: इफ़्तिख़ार आरिफ़ के साथ एक नशिस्त
वसीम सिद्दीक़ी
मुंबई के बासी, नग़मा निगार और एक अच्छे इन्सान।। निदा फ़ाज़ली से ज़िंदगी का रिश्ता क्या टूटा; गोया, उर्दू शायरी के दामन में टिका एक और सितारा निकल गया। दुनिया अशरों तक जिसके नग़मों से गूँजती रही, वो ख़ुद पैर 8 फरवरी की सुबह ख़ामोशी के साथ इस दुनिया से किनारा-कश हो गया।
निदा फ़ाज़ली बीमार नहीं थे। बस सीने में अचानक दर्द की शिकायत हुई तो अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन, सोच के बरख़िलाफ़, उनका हार्ट फ़ेल हुआ; और निदा मौत के फ़रिश्ते के साथ ही होलए।। इस लिए, ये ख़बर सबको चौंका गई।

निदा फ़ाज़ली ने रियासत राजिस्थान के शहर गवालयार में 77साल पहले सन 1938 में ज़िंदगी की पहली और मुंबई में आख़िरी सांस ली। उनका असल नाम मुक़तिदा हुस्न था। 1960ए- में उनके वालिद का इंतिक़ाल हुआ तो बाक़ी घर वाले पाकिस्तान आबुसे मगर निदा फ़ाज़ली अपनी ज़मीन से मुहब्बत का रिश्ता ना तोड़ सके।
निदा फ़ाज़ली ने एक फ़िल्मी जरीदे फ़िल्म फेयर को दिए गए अपने इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें फ़िल्मी नग़मों के लिखने की पहली पेशकश फ़िल्म पाकीज़ा और रज़ीया सुल्ताना के फ़िल्म साज़ कमाल अमरोहवी ने की थी। उन्होंने धर्मेन्द्र और हेमामालिनी की फ़िल्म रज़ीया सुल्ताना के लिए दो गाने लिखने की ऑफ़र हुई थी। फिर उस के बाद तो गोया पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग उन्ही से रुजू करने लगे।
तो इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है ।।। और कहीं किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।। जैसे शानदार गीत निदा फ़ाज़ली ने ही तख़लीक़ किए। इस दौर से लेकर आज तक के मुतअद्दिद मक़बूल मूसीक़ारों, गुलूकारों और गीतकारों के साथ काम किया जिनमें ख़य्याम, आर डी बरमन, लता मंगेशकर और उन जैसे बेशुमार नामवर लोग।
सन 80 की दहाई के आते आते वो फ़िल्मी नग़मों के साथ साथ ग़ज़लों की दुनिया में भी अपने हम-अस्रों को पीछे छोड़ गए।
जगजीत सिंह भारत के सर-ए-फ़हरिस्त ग़ज़लगो शायर थे। उन्होंने निदा फ़ाज़ली की बेशुमार ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी। जगजीत की आदत थी वो ग़ज़ल शुरू करने से पहले अक्सर ग़ज़ल के शायर का नाम ज़रूर लिया करते थे, ख़ासकर जबकि ग़ज़ल निदा फ़ाज़ली ने लिखी हो। इस बहाने जगजीत के जितने भी चाहने वाले थे उन्हें निदा फ़ाज़ली का नाम अज़बर हो गया था।
निदा फ़ाज़ली ने पाँच शेअरी मजमुए तख़लीक़ किए जिनमें लफ़्ज़ों के फूल, मोर नाच और दुनिया एक खिलौना है ने ख़ूब शौहरत हासिल की। निदा ने दोहे भी तहरीर किए मगर उर्दू ज़बान के बजाय हिन्दी ज़बान में। निदा को उर्दू और हिन्दी के बाद जिस ज़बान पर उबूर हासिल था वो अंग्रेज़ी थी। वो अंग्रेज़ी लिटरेचर के तालिब-इल्म भी रहे थे।
निदा फ़ाज़ली को पदम-श्री ऐवार्ड दिया गया और 1998 मैं नज़म खोया हुआ सा कुछ पर उन्हें साहित्य अकैडमी ऐवार्ड अता किया गया, जबकि मीर तक़ी मीर ऐवार्ड के लिए भी उन्हींको चूना गया.

1

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता – निदा फ़ाज़ली

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता

चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

2

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला – निदा फ़ाज़ली

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड़धानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

3
बात कम कीजे ज़ेहानत को छुपाए रहिए- निदा फ़ाज़ली

बात कम कीजे ज़ेहानत को छुपाए रहिए
अजनबी शहर है ये, दोस्त बनाए रहिए

दुश्मनी लाख सही, ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए

ये तो चेहरे की शबाहत हुई तक़दीर नहीं
इस पे कुछ रंग अभी और चढ़ाए रहिए

ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है
जिस जगह रहिए वहाँ मिलते मिलाते रहिए

कोई आवाज़ तो जंगल में दिखाए रस्ता
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाए रहिए
4
होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है -निदा फ़ाज़ली

होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िन्दगी क्या चीज़ है

उन से नज़रें क्या मिली रोशन फिजाएँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

ख़ुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाये उन से हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
5
नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर – निदा फ़ाज़ली

नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर
जो हाथ में नहीं है वो पत्थर तलाश कर.

सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर.

तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी
गुम-नाम जो हुए हैं वो लश्कर तलाश कर.

रहता नहीं है कुछ भी यहाँ एक सा सदा
दरवाज़ा घर का खोल के फिर घर तलाश कर.

कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन
फिर उस के बाद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर.
6

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी- निदा फ़ाज़ली

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया

बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया

बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बर्बाद किया

दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया

Hosh walonko khabar kiya

 

Advertisements

زمرے

%d bloggers like this: