Posted by: Bagewafa | مارچ 4, 2016

मुर्दे लौट आए हैं—-रवीश कुमार

मुर्दे लौट आए हैं—-रवीश कुमार

आधी रात से पहले के ठीक किसी वक्त में
जब हम मुर्दा हो रहे होते हैं
कुछ मुर्दे लौट रहे होते हैं
मुर्दा होते लोगों को और मुर्दा करने के लिए
हमारे लफ़्ज़ वैसे ही अकड़ गए हैं
जैसे मरने के बाद हमारा शरीर अकड़ जाता है
डराने के काम में सारे शब्दों को लगाया गया है
एक कारख़ाना है जहाँ रात दिन लोग
शब्दों को हथियार में बदल रहे हैं
सुबह होते ही किसी को मुर्दा करने निकल पड़ते हैं
ट्वीटर फेसबुक व्हाट्स अप पर हर जगह आँधी है
बेख़बर बेहोश लोगों को पता ही नहीं है
मुर्दा करने के पहले वे भी मुर्दा हो चुके हैं
सब मार दिये जायेंगे एक दिन जिस दिन उस दिन
मरे हुए को फिर निकाला जाएगा क़ब्रों से श्मशानो से
बाकी बचे लोगों को मारने के लिए
शब्दों लफ्ज़ों को हत्यारा बनाने के कारख़ाने में
मज़दूरों की बाहों के बगल से पसीना कहाँ निकलता है
उनके दिमाग़ की नसों में तेज़ होते रक्त प्रवाह से
कोई शब्द ख़ूनी बनकर टपकता है
जो गिर रहा होता है फेसबुक ट्वीटर और व्हाट्स अप पर
एक तंत्र बिछ गया है जिसके सब कलपुर्ज़े बनने के लिए भागे आ रहे हैं
बहुत से शवों को ज़िंदा घोषित किया गया है
बहुत से ज़िंदा शरीर को मुर्दा घोषित किया गया है
घड़ी में आधी रात का वक्त बजा चाहता है
कुछ लोग गए हैं श्मशान कोई मुर्दा लौट लाने के लिए
शब्दों की आहट में श्मशान का शोर छिपा है
टाइप करती उँगलियाँ प्रेतात्माओं के नृत्य सा नाच रही हैं
आप भी नाचिये, झूमिये और हो सके तो गाइये
मुर्दे लौट आए हैं
मुर्दे लौट आए हैं

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