Posted by: Bagewafa | مارچ 24, 2016

وطنیّت—–علامه محمد اقبالؒ—डॉ. अल्लामा इक़बाल (र . अ .) नेशनलिज़्म पर

وطنیّت—–علامه محمد اقبالؒ

اس دور میں مے اور ہے،جام اور ہے جم اور
ساقی نے بِناکی روِشِ لُطف و ستم اور
مسلم نے بھی تعمیر کیا اپنا حرم اور
تہذیب کے آزر نے ترشواے صنم اور
ان تازە خداوں میں بڑا سب سے وطن ہے
جو پیراہن اس کا ہے،وە مذہب ک کفن ہے

یە بت کہ تراشیدە تہذیبِ نوی ہے
غارت گرِ کاشانہ دینِ نَبوی ہے
بازو ترا توحید کی قوت سے قوی ہے
اسلام ترا دیس ہے، تُو مصطفَوی ہے
نظارە دیرینہ زمانے کو دِکھ دے
اے مصطفَوی خاک میں اِس بت کو مِلا دے!

ہو قید مقامی تو نتیجہ ہے تباہی
رہ بحر میں آزادِ وطن صُورتِ ماہی
ہےترکِ وطن سُنّتِ محبوبِ الٰہی
دے تُو بھی نبّوت کی صداقت پہ گواہی
گُفتارِ سیاست میں اور ہی کچھ ہے
ارشاد نبّوت میں اور ہی کچھ ہے

اقوامِ جہاں میں ہے رقابت تو اسی سے
تسخیر ہے مقصودِ تجارت تو اسی سے
خالی ہے صداقت سے سیاست تو اسی سے
کمزور کا گھر ہوتا ہے غارت تو اسی سے
اقوام میں مخلوقِ خدا بٹتی ہے اس سے
قومیّتِ اسلام کی جڑ کٹتی ہے اس سے

डॉ. अल्लामा इक़बाल (र . अ .) नेशनलिज़्म पर

 इस दौर में "मै” और है , "जाम” और है "जम” और

साक़ी ने बिना की, रविश-ए-लुत्फ़ व सितम और

मुस्लिम ने भी तामीर किया अपना हरम और
तहज़ीब के आज़र ने, तरश्वाए सनम और

इन ताज़ा खुदाओं में, बड़ा सब से, वतन है
जो पैराहन इस का है , वो मज़हब का कफ़न है

ये बुत के तराशीदा -ए -तहज़ीब -ए -नवी है

ग़ारत गरे काशाना -ए -दीन-ए-नबवी है

बाज़ू तेरा तौहीद की क़ुव्वत से क़वी है
इस्लाम तेरा देस है , तू मुस्तफ़वी है

नज्ज़ारा -ए -देरीना ज़माने को दिखा दे
ऐ मुस्तफ़वी ख़ाक में इस बुत को मिला दे

हो क़ैद -ए -मक़ामी तो नतीजा है तबाही
रहे बहर में आज़ाद -ए -वतन सूरत -ए -माही

है तर्क -ए -वतन सुन्नत -ए -महबूब -ए -इलाही
दे तू भी नबुव्वत की सदाक़त पे गवाही

गुफ़तार -ए -सियासत में वतन और ही कुछ है
इरशाद -ए -नबुव्वत में वतन और ही कुछ है

अक़वाम -ए -जहाँ में है रक़ाबत तो इसी से
तसख़ीर है मक़सूद-ए -तिजारत तो इसी से

ख़ाली है सदाक़त से सियासत तो इसी से
कमज़ोर का घर होता है ग़ारत तो इसी से

अक़वाम में मखलूक -ए -खुदा बटती है इस से
क़ौमिय्यत -ए -इस्लाम की जड़ कटती है इस से


زمرے

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