Posted by: Bagewafa | اپریل 30, 2016

या पेश-ए-सलीब-ओ-दार गिरी-.. मलिकज़ादा ‘मंजूर’ یا پیش صلیب و دار گری۔۔۔۔۔ملکزادہ منظور

یا پیش صلیب و دار گری۔۔۔۔۔ملکزادہ منظور

دیوار گری

या पेश-ए-सलीब-ओ-दार गिरी-.. मलिकज़ादा ‘मंजूर’

 

 ‘मंज़ूर’ लहू की बूँद कोई अब तक न मेरी बेकार गिरी

या रंग-ए-हिना बन कर चमकी या पेश-ए-सलीब-ओ-दार गिरी

 

औरों पे न जाने क्या गुज़री इस तेग़ ओ तबर के मौसम में

हम सर तो बचा लाए लेकिन दस्तार सर-ए-बाज़ार गिरी

 

जो तीर अँधेरे से थे चले वो सरहद-ए-जाँ को छू न सके

चलता था मैं जिस के साए में गर्दन पे वही तलवार गिरी

 

क्या जानिये कैसी थी वो हवा चौंका न शजर पत्ता न हिला

बैठा था मैं जिस के साए में ‘मंज़ूर’ वही दीवार गिरी

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