Posted by: Bagewafa | جون 16, 2016

पहने नकाब इतने हैं…….. सिया सचदेव پہنے نقاب اتنے ہیں……۔۔ سیا سچدیو

ہنے نقاب اتنے ہیں……۔۔ سیا سچدیو

کتاب زیست میں زحمت کے باب اتنے ہیں

ذرا سی عمر ملی ہے عزاب اتنے ہیں ۔

زفا فریب تڑپ درد غم کسک آنسو ۔۔

ہمارے سامنے بھی انتخاب اتنے ہیں

سمندروں کو بھی پل میں بہا کے لے جائے

ہماری آنکھ میں آنسو جناب اتنے ہیں

نکاب پوشوں کی بستی میں شخصیات کہاں

ہرایک شخص نے پہنے نقاب اتنے ہیں

ہمارے شعر کو دل کی نظر کی حاجت ہے

ہرایک لفظ میں حسنو شباب اتنے ہیں

ہمیں تلاش ہے تعبیر کی مگر ہمدم

چھپا لیا ہے سبھی کچھ یہ خواب اتنے ہیں

کبھی زبان کھلی تو بتائینگے ہم بھی

ترے سوال کے یوں تو جواب اتنے ہیں

تمام کانٹے بھرے ہیں ہمارے دامن میں

تمہارے واسطے لائے گلاب اتنے ہیں

میں چاہ کر بھی نہیں کر سکی کبھی پورے

تمہاری آنکھ میں پوشیدہ خواب اتنے ہیں

وفا کے بدلے وفا کیوں ‘سیہ’ نہیں ملتی

سوال ایک ہے لیکن جواب اتنے ہیں

 

पहने नकाब इतने हैं…….. सिया सचदेव

 

किताबे जीस्त में ज़हमत के बाब इतने हैं

ज़रा सी उम्र मिली है अज़ाब इतने हैं .

ज़फ़ा फरेब तड़प दर्द ग़म कसक आंसू ..

हमारे सामने भी इंतख़ाब इतने हैं

समन्दरों को भी पल में बहाके ले जाए

हमारी आँख में आंसू जनाब इतने हैं

नकाबपोशों की बस्ती में शख्सियात कहाँ

हरेक शख्स ने पहने नकाब इतने हैं

हमारे शेर को दिल की नज़र की हाजत है …

हरेक लफ्ज़ में हुस्नो-शबाब इतने हैं

हमें तलाश है ताबीर की मगर हमदम

छिपा लिया है सभी कुछ ये ख्वाब इतने हैं

कभी ज़ुबान खुली तो बताएँगे हम भी

तिरे सवाल के यूं तो जवाब इतने हैं

.तमाम कांटे भरे हैं हमारे दामन में

तुम्हारे वास्ते लाये गुलाब इतने हैं

मैं चाह कर भी नहीं कर सकी कभी पूरे

तुम्हारी आँख में पोशीदा ख़्वाब इतने हैं

वफ़ा के बदले वफ़ा क्यूँ ‘सिया’ नहीं मिलती

सवाल एक है लेकिन जवाब इतने हैं

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زمرے

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