Posted by: Bagewafa | اگست 28, 2016

हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमांनों का रोल- मुहम्मद फ़ारूक़ सलीमہندوستان کی جنگ آزادی میں مسلمانوں کا رول…..محمد فاروق سلیم..

हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमांनों का रोल- मुहम्मद फ़ारूक़ सलीम-

 वक़्त इशाअत: Sunday 14 August 2016 04:00 pm IST(Asia Times Urdu)

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बर्र-ए-सग़ीर हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानान हिंद का अज़ीम रोल सदियों का अहाता कर रहा है। बेशुमार मुसलमांनों ने इस जद्द-ओ-जहद में अपनी अज़ीम क़ुर्बानियां और अपनी जानों का नज़राना पेश किया और सख़्त से सख़्त तरीन मसाइब बर्दाश्त किए। हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में अहम किरदार अदा करने वाले मुजाहिदीन आज़ादी जिन्हों ने आज़ादी की आग में अपना सब कुछ झोंक दिया जिनको काले पानी और जिलावतनी की सज़ाएं हुईं फांसीयों पर लटकाया गया गोलीयों का निशाना बनाया गया हाथियों और घोड़ों के पैरों तले रौंदा गया.चूने के खोलते पानी और आग में ज़िंदा जलाया गया और क़ैद वबन्द की दर्दनाक अज़ीयत-नाक सऊबतें दी गईं उन लाखों मुसलमांनों में से कम अज़ कम मुंदरजा ज़ैल मुजाहिदीन आज़ादी कुव्वतो हरगिज़ हरगिज़ फ़रामोश नहीं किया जा सकता.अफ़सोस इस बात का है कि आज तारीख़ की किताबों में से उनके नाम तक निकाल दिए गए हैं।

बहादुर शाह ज़फ़र, बेगम हज़रत महल, शहज़ादा फ़िरोज़, शाह अबदुलअज़ीज़ ,मौलाना अहमद उल्लाह शाह ,मौलाना सदाक़त उल्लाहशाह अबदुलहक़, मौलाना मुहम्मद मियां, मंसूर ख़ान अबदुलग़फ़्फ़ार ख़ां ,शाह इस्माईल शहीद, मौलाना सना-उल्लाह अमृतसरी शेख़ उल-हिंद मौलाना महमूद उल-हसन(असीर मालटा) मुफ़्ती किफ़ायत अल्लाह देहलवी मौलाना शाह अता अल्लाह बुख़ारी, मौलाना हिफ़्जुर्रेहमान स्योहारवी,मौलाना अबदुलवहीद सिद्दीक़ी ,मौलाना आशिक़ फुलती ,मौलाना शौकत अली ,मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद हाजी इमदाद अल्लाह,शेख़ मुहम्मद अबदुल्लाह, हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी,हैदर अली टीपू सुलतान ,मौलाना रशीद अहमद गंगोही, मौलाना नूर अल्लाह बूढ्ढा नवी, इशफ़ाक़ अल्लाह ख़ां मौलाना मुहम्मद अली जोहर,मौलाना अहमद सईद देहलवी मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना अफजल हक़ ख़ैराबादी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अबवालमहासन ,मुहम्मद सज्जाद हकीम, ख़लील अलरहमान नार देहलवी, सय्यद अहमद शहीद शाह ,अबदुलग़नी हाफ़िज़, वली अल्लाह बेग, मुहम्मद नबी तसद्दुक़ हुसैन ख़ां शेरवानी ,डाक्टर मुख़तार अंसारी, हकीम अजमल ख़ां ,अबदुलकरीम बैगबख़शल्लाह अंसारी,बी अम्मां(वालिदा माजिदा मौलाना मुहम्मद अली जोहर) सर सय्यद अहमद ख़ां,शाह अबदुलहईअली साबिर ख़ां अमरोहवी, रफ़ी अहमद क़दवाई, फ़ख़र उद्दीन अली अहमद ,आसिफ़ अली बैरिस्टर ,नूर उद्दीनजनरल शाह नवाज़ ख़ां ,सितजुद्दौला.मौलाना सदाक़त अल्लाह,तफ़ज़्ज़ुल हुसैन, फ़र्ख़ आबादी, मौलवी इलाहीबख़्श, मुहम्मद अहमद जुमला ना मौलाना फ़ख़्रउद्दीन ,मौलाना सय्यद मुहम्मद मियांजनरल बख़्त ख़ां मुफ़्ती रसूल बख़श काकोरवी, सूबेदार मेजर नाहर ख़ां अहमद ख़ां खरल दिलावर, जंगबिरजीसक़दर ,शहज़ादा अज़ीम बेग, मुहम्मद शफ़ी रिसालदार ,क़ारी अबदुल्लाह मौलाना फ़ाखिर मियां इला हाबादी, शेख़ फ़ज़ल अली, ख़ां अबदुस्समद ख़ां ,मौलाना ज़फ़र अली ख़ां ,फ़ज़ल हक़, मौलाना अबदुलक़ादिर लुधियानवी, शेख़ अबदुलक़ादिर तमीज़ उद्दीन अहमद ख़ां ,मुहम्मद यूनुस ख़ां, शहवार ख़ां ,सय्यद रिफ़ाक़त हुसैन, नवाब महमूद ख़ां डाक्टर सैफ उद्दीन किचलो ,मौलाना अबदुलहक़ मदनी, मौलवी क्रीम अलीदीवान हुक्म अल्लाह अली बहादुर ख़ां ,मौलाना अमीर शाह ख़ां ,आग़ाज़ मिर्ज़ा लखनवी,शेख़ फ़ज़ल अलीमुहम्मद ,अकबर औसाफ़ हुसैन ग़ुलाम अली मुशर्रफ़ ख़ां अली बहादुर ख़ां अली नक़ी ख़ां मौलाना लियाक़त अली नवाब मजोख़ां मौलाना सय्यद मुहम्मद मियांजमील अहमद कनबोह सय्यद शब्बीर अली सय्यद गुलज़ार अली, मंज़ूर अहमद क़ुरैशी, नवाब महमूद ख़ां ,मिर्ज़ा शेर बैग, नवाब वली दाद ख़ां ,शेख़ इरादत बख़श, अली ख़ां मेवाती नाद अलीरजब अली, मौलाना अलौदीन,मौलाना फ़ैज़ अहमद बद एवनी, डिप्टी हिक्मत ल्लाह, डाक्टर वज़ीर ख़ांलाल ख़ां मेवाती, मुहम्मद अली बेग ,मीर मुदुन सरदार, काले ख़ां क़लंदर ख़ां हौलदार ,मौलाना अबदुलहलीम सिद्दीक़ी, मौलाना नूर उद्दीन बिहारी, मौलाना दाऊद ग़ज़नवी, पीर शहनशाह, मौलवी मज़हर अली ,क़ाज़ी अबदूल्लतीफ़ ख़्वाजा अबदुर्रहमान ग़ाज़ी याक़ूब हुस्न मौलाना उसमान ग़नी ,डाक्टर महमूद अबदुलक़य्यूम अंसारी निसार अहमद शेरवानी, शाह अबदुर्रहीम रायपूरी ,और हाफ़िज़ अबदुलहकीम वग़ैरा इस में शामिल थे।

1857 से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जो जद्द-ओ-जहद जारी थी इस में उल्मा पेश पेश थे। जद्द-ओ-जहद आज़ादी में नाकामी के बाद अंग्रेज़ों ने हिंदूस्तानियों से सख़्त इंतिक़ाम लेना शुरू किया चुनांचे पूरे मुल्क में क़तल वग़ारत गिरी और फांसीयों का सिलसिला शुरू हो गया। इस में तक़रीबन2 लाख मुसलमांन शहीद हुए जिनमें साढे़ इक्यावन हज़ार उल्मा थे। इन क़ुर्बानीयों के बावजूद मुजाहिदीन के अज़म व इसतक़लाल में कमी नहीं आई। उल्मा हक़ और मुजाहिदीन का मुतम्मा नज़र मुल्क की आज़ादी कामिल था जिसकी वजह से उन्होंने हर किस्म की क़ुर्बानी देकर अंग्रेज़ी हुकूमत को ख़त्म करने का मुसम्मम इरादा कर लिया था चुनांचे एक सदी पर मुहीत जद्द-ओ-जहद आज़ादी के दौरान जिसका आग़ाज़ 1757 से हुआ था हज़ारों मुसलमांनों ने बिरादरान वतन के साथ अपनी क़ुर्बानियां दीं जिसके नतीजा में अंग्रेज़ों का इक़तिदार ना सिर्फ हिन्दोस्तान बल्कि एशिया और अफ़्रीक़ा के इन ममालिक से भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गयाजहां उस का सूरज ग़ुरूब नहीं होता था। इस रूह फ़र्सा माहौल में मुसलमानान हिंद ने बर्तानवी सामराज के ख़िलाफ़ अपनी जद्द-ओ-जहद मज़ीद तेज़ कर दी। हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी जब मक्का मुकर्रमा से 1731 मैं वापिस हिन्दोस्तान वापिस आए तो उन्होंने ज़िंदगी के हर शोबा में एक हमागीर इन्क़िलाब को अपनी ज़िंदगी का नसब उल-ऐन क़रार दिया। शाह साहिब की इसी तहरीक का असर था कि शहीद टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों को हिन्दोस्तान से निकाल बाहर करने का बीड़ा उठाया। ख़ाक हिंद से उठकर सबसे पहले जिस शख़्स ने हिन्दोस्तान हिंदूस्तानियों का है का नारा बुलंद क्या वो टीपू सुलतान ही था जिसकी वसीअ उल-नज़री देख चुकी थी कि हिन्दोस्तान की तबाही का असल राज़ यहां की मुख़्तलिफ़ क़ौमों की नाइत्तिफ़ाक़ी में पिनहां है जिस पर अंग्रेज़ों के जारिहाना अज़ाइम पनप रहे हैं इसी लिए टीपू सुलतान ने आख़िरी सांस तक हिन्दुस्तानी अक़्वाम और हुकमरानों को मुत्तहिद करके अंग्रेज़ फ़ित्ना को जड़ से उखाड़ फेंकने की पूरी कोशिश की लेकिन अपने लोगों की ग़द्दारी और नासमझ दुश्मनों की साज़िशों ने टीपू सुलतान और इस की सलतनत ख़ुदादाद को जोबला शुबा अंग्रेज़ी इक़तिदार के बिसात की सबसे बड़ी चट्टान थी सफ़ाए हस्ती से मिटा दिया। चुनांचे4मई 1799को टीपू सुलतान मुल्क वमलत की बका और आज़ादी की ख़ातिर अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करते हुए शहीद हुआ तो अंग्रेज़ जनरल ने फ़र्त-ए-मसर्रत से ऐलान किया कि आज हिन्दोस्तान हमारा है।

हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी के उलुलअज़म फ़र्ज़ंद हज़रत शाह अबदुलअज़ीज़ देहलवी ने हिन्दोस्तान के दार-उल-हरब होने का फ़तवा दिया और हुसूल आज़ादी के लिए जद्द-ओ-जहद करना अपना फ़रीज़ा क़रार दिया। शाह अबदुलअज़ीज़ का फ़तवा एक आलिम दीन का शरई हुक्म था जिसने हिन्दुस्तानी अवाम में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ वो आग लगाई कि इस की हर चिंगारी बर्तानवी सामराज को ख़ाक में मिलाकर रही। उल्मा किराम के एक ग्रुप ने बज़रीया असलाह मुल्क को आज़ाद करवाने की तदबीर सोची चुनांचे उन्होंने सय्यद अहमद शहीद की क़ियादत में 1818से 1831तक पूरे मुल्क का दौरा किया और सूबा सरहद के क़रीब मोरचा लगाकर मुसलसल छः साल तक अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करते रहे और 10जनवरी 1831 को बाला कोट के मैदान कारज़ार में सय्यद अहमद शहीद और शाह इस्माईल शहीद ने जाम-ए-शहादत नोश किया।मार्का में किसी भी सिम्त से मुजाहिदीन आज़ादी के हौसले पस्त नहीं हुए बल्कि उन्होंने अपनी जद्द-ओ-जहद को मज़ीद तेज़ कर दिया और 11मई 1857को फ़ौज के सिपाहीयों ने हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत करके दिल्ली पर क़बज़ा करने का मन्सूबा बनाया। दिल्ली के मुख़्तलिफ़ उल्मा किराम ने जिहाद का फ़तवा देकर मुजाहिदीन आज़ादी में इन्क़िलाब की लहर दौड़ा दी।

1871मैं शेख़ उल-हिंद मौलाना महमूद उल-हसन ने एक अंजुमन क़ायम की जिसका मक़सद ना सिर्फ दार-उल-उलूम देवबंद के लिए चंदा फ़राहम करना था बल्कि अफ़राद को इन्क़िलाब हुर्रियत के लिए तैयार करना था। ये तहरीके रेशमी रूमाल तहरीक की पहली कड़ी थी। बादअज़ां उन्होंने 1909में जमियतुल अंसार क़ायम की जिसके पहले नाज़िम मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी थे। इन तहरीकों के ज़रीया अंदरून-ए-मुल्क बग़ावत और बैरून-ए-मुल्क से हमलों का प्रोग्राम था जिसके लिए 19फरवरी 1917-ए-की तारीख़ भी मुतय्यन कर दी गई थी। महाज़-ए-जंग की तैयारी के लिए मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी को काबुल रवाना कियागया जहां उन्होंने आज़ादी हकूमत-ए-हिन्द क़ायम की जिसके सदर राजा महिन्द्र परताब बनाए गए लेकिन बदक़िस्मती से इस खु़फ़ीया तहरीक का राज़ फ़ाश हो गया और शेख़ उल-हिंद और उनके रफ़क़ा वग़ैरा को गिरफ़्तार करके मालटा में क़ैद कर दिया गया जहां से वो 1920 में रहा हुए। जब शेख़ उल-हिंद और उनके रफ़क़ा बाद रिहाई के हिन्दोस्तान वापिस हुए तो कमेटी में उनका इस्तिक़बाल करने वालों में मौलाना अब्दुह लबारी फ़रंगी महली और मोहन दास करम चंद गांधी जी भी मौजूद थे। शेख़ उल-हिंद की मालटा में असीरी के दौरान 1919में हिन्दोस्तान में जमियते उल्मा-ए-हिंद क़ायम की गई जिसके पहले सदर मुफ़्ती किफ़ायत अल्लाह मुक़र्रर हुए। जमियते उल्मा-ए-हिंद जद्द-ओ-जहद आज़ादी में कांग्रेस के दोश बदोश थी। 8सितंबर 1920को जमियते उल्मा-ए-हिंद -की जानिब से तर्क मवालात का फ़तवा शाये हुआ जिस पर पाँच सौ उल्मा के दस्तख़त थे। ये फ़तवा ज़बत कर लिया गया। तहरीक अदम तआवुन के दौरान तक़रीबन 30हज़ार अफ़राद जेल गए जिनमें ज़्यादा तादाद उल्मा किराम और मुस्लिम मुजाहिदीन की थी।

19सितंबर 1921को कराची में ख़िलाफ़त कान्फ़्रैंस का इजलास ज़ेर-ए-सदारत मौलाना मुहम्मद अली मुनकक़िद हुआ जिसमें ये तजवीज़ पेश हुई कि अंग्रेज़ी फ़ौज की मुलाज़मत हराम है। इस तजवीज़ की ताईद मौलाना शौकत अली डाक्टर सैफ उद्दीन किचलो मौलाना हुसैन अहमद मदनी और जगत गुरु शंकर आचार्य ने की चूँकि ये तजवीज़ बर्तानवी हुकूमत के ख़िलाफ़ थी इस लिए इन तमाम लोगों को गिरफ़्तार करके कराची की अदालत में मुक़द्दमा चलाया गया और उनको दो दो साल क़ैद बामुशक़क़्त की सज़ा हुई। इसी ज़माना में मौलाना आज़ाद जो रांची की नज़रबंदी से रहा हुए थे मजलिस ख़िलाफ़त की कान्फ़्रैंस मुनाक़िद आगरा1921के सदारती ख़ुतबा में ये नज़रिया पेश किया कि मुल्क की आज़ादी और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जद्द-ओ-जहद के लिए हिंदू मुस्लिम इत्तिहाद निहायत ज़रूरी है चुनांचे वो इसी नज़रिया पर क़ायम रहे। दिसंबर1921में अहमदाबाद में कांग्रेस का इजलास हकीम अजमल ख़ां की सदारत में मुनाक़िद हुआ जिसमें मौलाना हसरत मोहानी ने आज़ादी कामिल की तहरीक पेश की जो अपनी नौईयत की अव्वलीन तहरीक थी। जमियते उल्मा-ए-हिंद हिंद ने अपने पिशावर के इजलास मुनक्किदा दिसंबर1927में साइमन कमीशन के बाईकॉट का फ़ैसला किया और कांग्रेस ने भी अपने मद्रास के इजलास मुनाक़िदा 26दिसंबर 1927 को इस कमीशन का बाईकॉट करना तै किया चुनांचे जब फरवरी 1928 में कमीशन हिन्दोस्तान आया तो पूरे मुल्क में इस के बाईकॉट का सिलसिला और एहितजाजी जलसे हुए और ये कमीशन नाकाम वापिस हो गया। दिसंबर 1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर के इजलास में मुकम्मल आज़ादी की क़रारदाद मंज़ूर की। गांधी जी की तहरीक नमक सत्याग्र्ह   और सिवल ना-फ़रमानी के दौरान दीगर क़ौमी कारकुनों के साथ जमियते उल्मा-ए-हिंद के अकाबिरीन मौलाना सय्यद मुहम्मद मियां मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद मौलाना हिफ्जुर्रेहमान और मौलाना सय्यद फ़ख़्ररुद्दीन वग़ैरा भी गिरफ़्तार हुए।

1930 मैं लंदन में मुनक्किद दूसरी गोल मेज़ कान्फ़्रैंस में मौलाना मुहम्मद अली जोहर ने आज़ादी कामिल का मुतालिबा किया और कहा जब तक हिन्दोस्तान आज़ाद नहीं होगा में इस ग़ुलाम मुल्क की सरज़मीन तक पर क़दम नहीं रखूँगा ।मैं आज़ादी का परवाना ले क रही जाऊँगा। ख़ुदा का करना ऐसा हुआ कि एक माह के अंदर ही मौलाना ने दाई अजल को लब्बैक कहा और मालिक-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।

आज जबकि सारा मुल़्क आज़ादी की 69वीं सालगिरा मना रहा है मुहासिबा करने और ग़ौरो फ़िक्र करने की ज़रूरत है कि समाजी इन्साफ़ ख़ासकर अक़ल्लीयतों के साथ इन्साफ़ की मंज़िल से अब भी हम कितने दूर हैं। जब तक मुस्लिम अकलियत को आज़ादी और तामीर वतरक़ी के समरात में उनका हिस्सा ना मिले आज़ादी अधूरी और जमहूरीयत ना-मुकम्मल ही समझी जाएगी।आज़ादी के बाद मुस्लिम अकलियत को जितना पीछे कर दिया गया है इस की मिसाल तारीख़-ए-आलम में नहीं मिल सकती। आने वाले बरसों में इस की तलाफ़ी और अकलियत के साथ इन्साफ़ होना चाहीए तब ही हम हक़ीक़ी माअनों में जशन-ए-आज़ादी मना सकें गे।

© 2010 ACTDPL, Punjabi University, Patiala (Punjab) India

ہندوستان کی جنگ آزادی میں مسلمانوں کا رول…..محمد فاروق سلیم

 

وقت اشاعت: Sunday 14 August 2016 04:00 pm IST

برصغیر ہندوستان کی جنگ آزادی میں مسلمانان ہند کا عظیم رول صدیوں کا احاطہ کر رہاہے۔ بے شمار مسلمانوں نے اس جدوجہد میں اپنی عظیم قربانیاں اور اپنی جانوں کا نذرانہ پیش کیا اور سخت سے سخت ترین مصائب برداشت کئے۔ ہندوستان کی جنگ آزادی میں اہم کردار ادا کرنے والے مجاہدین آزادی‘ جنہوں نے آزادی کی آگ میں اپنا سب کچھ جھونک دیا‘ جن کو کالے پانی اور جلاوطنی کی سزائیں ہوئیں‘ پھانسیوں پر لٹکایاگیا‘ گولیوں کانشانہ بنایاگیا‘ ہاتھیوں اور گھوڑوں کے پیروں تلے روندا گیا‘چونے کے کھولتے پانی اور آگ میں زندہ جلایاگیا اور قید وبند کی دردناک اذیت ناک صعوبتیں دی گئیں‘ ان لاکھوں مسلمانوں میں سے کم از کم مندرجہ ذیل مجاہدین آزادی کوتو ہرگز ہرگز فراموش نہیں کیاجاسکتا‘افسوس اس بات کا ہے کہ آج تاریخ کی کتابوں میں سے ان کے نام تک نکال دیئے گئے ہیں۔
بہادر شاہ ظفر ‘بیگم حضرت محل‘ شہزادہ فیروز‘ شاہ عبدالعزیز‘ مولانا احمد اللہ شاہ‘ مولانا صداقت اللہ‘شاہ عبدالحق‘ مولانا محمد میاں منصور‘ خان عبدالغفار خاں‘ شاہ اسماعیل شہید‘ مولانا ثناء اللہ امرتسری‘ شیخ الہند مولانا محمود الحسن(اسیر مالٹا) مفتی کفایت اللہ دہلوی‘ مولانا شاہ عطا اللہ بخاری‘ مولانا حفظ الرحمان سیوہاروی‘مولانا عبدالوحید صدیقی‘ مولانا عاشق پھلتی‘ مولانا شوکت علی‘ مولانا ابوالکلام آزاد‘ حاجی امداد اللہ‘شیخ محمد عبداللہ‘ حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلوی‘حیدر علی ‘ ٹیپو سلطان‘ مولانا رشید احمد گنگوہی‘ مولانا نور اللہ بڈھانوی‘ اشفاق اللہ خاں‘ مولانا محمد علی جوہر‘مولانا احمد سعید دہلوی‘ مولانا عبیداللہ سندھی‘ مولانا افضال الحق خیر آبادی‘ مولانا حسین احمد مدنی‘ مولانا ابوالمحاسن محمد سجاد‘ حکیم خلیل الرحمان ناردہلوی‘ سید احمد شہید‘ شاہ عبدالغنی‘ حافظ ولی اللہ بیگ ‘ محمد نبی‘ تصدق حسین خاں شیروانی‘ ڈاکٹر مختار انصاری‘ حکیم اجمل خاں‘ عبدالکریم بیگ‘بخش اللہ انصاری‘بی اماں(والدہ ماجدہ مولانا محمد علی جوہر) سرسید احمد خاں‘شاہ عبدالحئی‘علی صابر خاں امروہوی‘ رفیع احمد قدوائی‘ فخر الدین علی احمد‘ آصف علی‘ بیرسٹر نورالدین‘جنرل شاہ نواز خاں‘ سراج الدولہ‘ مولانا صداقت اللہ‘تفضل حسین فرخ آبادی‘ مولوی الٰہی بخش‘ محمد احمد جملانہ‘ مولانا فخرالدین ‘ مولانا سید محمد میاں‘جنرل بخت خاں‘ مفتی رسول بخش کاکوروی‘ صوبیدار میجر ناہر خاں‘ احمد خاں کھرل‘ دلاور جنگ‘برجیس قدر‘ شہزادہ عظیم بیگ‘ محمد شفیع رسالدار‘ قاری عبداللہ‘ مولانا فاخر میاں الہ آبادی‘ شیخ فضل علی خاں‘ عبدالصمد خاں‘ مولانا ظفر علی خاں‘ فضل حق‘ مولانا عبدالقادر لدھیانوی‘ شیخ عبدالقادر ‘تمیز الدین احمد خاں‘ محمد یونس خاں‘ شہوار خاں‘ سید رفاقت حسین‘ نواب محمود خاں‘ ڈاکٹر سیف الدین کچلو‘ مولانا عبدالحق مدنی‘ مولوی کریم علی‘دیوان حکم اللہ‘ علی بہادر خاں‘ مولانا امیر شاہ خاں‘ آغاز مرزا لکھنوی‘شیخ فضل علی‘محمد اکبر‘ اوصاف حسین‘ غلام علی‘ مشرف خاں‘ علی بہادر خاں‘ علی نقی خاں‘ مولانا لیاقت علی‘ نواب مجوخاں‘ مولانا سید محمد میاں‘جمیل احمد کنبوہ‘ سید شبیر علی‘ سید گلزار علی‘ منظور احمد قریشی‘ نواب محمود خاں‘ مرزا شیر بیگ‘ نواب ولی داد خاں‘ شیخ ارادت بخش‘ علی خاں میواتی‘ ناد علی‘رجب علی‘ مولانا علاؤ الدین‘مولانا فیض احمد بدایونی‘ ڈپٹی حکمت اللہ‘ ڈاکٹر وزیر خاں‘لال خاں میواتی‘ محمد علی بیگ‘ میر مدن‘ سردار کالے خاں‘ قلندر خاں حولدار‘ مولانا عبدالحلیم صدیقی‘ مولانا نورالدین بہاری‘ مولاناداؤد غزنوی‘ پیر شہنشاہ‘ مولوی مظہر علی‘ قاضی عبداللطیف ‘خواجہ عبدالرحمان غازی‘ یعقوب حسن‘ مولانا عثمان غنی‘ ڈاکٹر محمود‘ عبدالقیوم انصاری‘ نثار احمد شیروانی‘ شاہ عبدالرحیم رائے پوری اور حافظ عبدالحکیم وغیرہ اس میں شامل تھے۔
1857 سے انگریزوں کے خلاف جو جدوجہد جاری تھی‘ اس میں علماء پیش پیش تھے۔ جدوجہد آزادی میں ناکامی کے بعد انگریزوں نے ہندوستانیوں سے سخت انتقام لینا شروع کیا‘ چنانچہ پورے ملک میں قتل وغارت گری اور پھانسیوں کا سلسلہ شروع ہوگیا۔ اس میں تقریباً2 لاکھ مسلمان شہید ہوئے‘ جن میں ساڑھے اکیاون ہزار علماء تھے۔ ان قربانیوں کے باوجود مجاہدین کے عزم واستقلال میں کمی نہیں آئی۔ علماء حق اور مجاہدین کا مطمح نظر ملک کی آزادی کامل تھا‘ جس کی وجہ سے انہوں نے ہر قسم کی قربانی دے کر انگریزی حکومت کو ختم کرنے کا مصمم ارادہ کرلیاتھا‘ چنانچہ ایک صدی پر محیط جدوجہد آزادی کے دوران جس کا آغاز 1757 سے ہوا تھا‘ ہزاروں مسلمانوں نے برادران وطن کے ساتھ اپنی قربانیاں دیں‘ جس کے نتیجہ میں انگریزوں کا اقتدار نہ صرف ہندوستان‘ بلکہ ایشیا ا ور افریقہ کے ان ممالک سے بھی ہمیشہ کے لئے ختم ہوگیا‘جہاں اس کا سورج غروب نہیں ہوتا تھا۔ اس روح فرسا ماحول میں مسلمانان ہند نے برطانوی سامراج کے خلاف اپنی جدوجہد مزید تیز کردی۔ حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلوی جب مکہ مکرمہ سے 1731 میں واپس ہندوستان واپس آئے تو انہوں نے زندگی کے ہر شعبہ میں ایک ہمہ گیر انقلاب کو اپنی زندگی کا نصب العین قراردیا۔ شاہ صاحب کی اسی تحریک کا اثر تھا کہ شہید ٹیپو سلطان نے انگریزوں کو ہندوستان سے نکال باہر کرنے کا بیڑا اٹھایا۔ خاک ہند سے اٹھ کر سب سے پہلے جس شخص نے ’’ہندوستان ہندوستانیوں کا ہے‘‘ کا نعرہ بلند کیا‘ وہ ٹیپو سلطان ہی تھا‘ جس کی وسیع النظری دیکھ چکی تھی کہ ہندوستان کی تباہی کا اصل راز یہاں کی مختلف قوموں کی نااتفاقی میں پنہاں ہے‘ جس پر انگریزوں کے جارحانہ عزائم پنپ رہے ہیں‘ اسی لئے ٹیپو سلطان نے آخری سانس تک ہندوستانی اقوام اور حکمرانوں کو متحد کرکے انگریز فتنہ کو جڑ سے اکھاڑ پھینکنے کی پوری کوشش کی‘ لیکن اپنے لوگوں کی غداری اور ناسمجھ دشمنوں کی سازشوں نے ٹیپوسلطان اور اس کی سلطنت خدا داد کو جوبلا شبہ انگریزی اقتدار کے بساط کی سب سے بڑی چٹان تھی‘ صفحہ ہستی سے مٹادیا۔ چنانچہ4مئی 1799کوٹیپو سلطان ملک وملت کی بقاء اور آزادی کی خاطر انگریزوں سے مقابلہ کرتے ہوئے شہید ہوا‘ توانگریز جنرل نے فرط مسرت سے اعلان کیا کہ ’’آج ہندوستان ہمارا ہے‘‘۔
حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلوی کے اولوالعزم فرزند حضرت شاہ عبدالعزیز دہلوی نے ہندوستان کے دارالحرب ہونے کا فتویٰ دیا اور حصول آزادی کے لئے جدوجہد کرنا اپنا فریضہ قرا ردیا۔ شاہ عبدالعزیز کا فتوی ایک عالم دین کا شرعی حکم تھا‘ جس نے ہندوستانی عوام میں انگریزوں کے خلاف وہ آگ لگائی کہ اس کی ہرچنگاری برطانوی سامراج کو خاک میں ملاکر رہی۔ علماء کرام کے ایک گروپ نے بذریعہ اسلحہ ملک کو آزاد کروانے کی تدبیر سوچی‘ چنانچہ انہوں نے سید احمد شہید کی قیادت میں 1818سے 1831تک پورے ملک کا دورہ کیا اور صوبہ سرحد کے قریب مورچہ لگاکر مسلسل چھ سال تک انگریزوں سے مقابلہ کرتے رہے اور 10جنوری 1831 کو بالا کوٹ کے میدان کا رزار میں سید احمد شہید اور شاہ اسماعیل شہید نے جام شہادت نوش کیا۔معرکہ میں کسی بھی سمت سے مجاہدین آزادی کے حوصلے پست نہیں ہوئے‘ بلکہ انہوں نے اپنی جدوجہد کو مزید تیز کردیا اور 11مئی 1857کو فوج کے سپاہیوں نے حکومت کے خلاف بغاوت کرکے دہلی پر قبضہ کرنے کا منصوبہ بنایا۔ دہلی کے مختلف علماء کرام نے جہاد کا فتویٰ دے کر مجاہدین آزادی میں انقلاب کی لہر دوڑا دی۔
1871میں شیخ الہند مولانامحمود الحسن نے ایک انجمن قائم کی ‘ جس کا مقصد نہ صرف دارالعلوم دیوبند کے لئے چندہ فراہم کرناتھا‘ بلکہ افراد کو انقلاب حریت کے لئے تیار کرناتھا۔ یہ تحریک’’ریشمی رومال تحریک‘‘ کی پہلی کڑی تھی۔ بعد ازاں انہوں نے 1909میں جمعیۃ الانصار قائم کی‘ جس کے پہلے ناظم مولانا عبیداللہ سندھی تھے۔ ان تحریکوں کے ذریعہ اندرون ملک بغاوت اور بیرون ملک سے حملوں کا پروگرام تھا‘ جس کے لئے 19فروری 1917ء کی تاریخ بھی متعین کردی گئی تھی۔ محاذ جنگ کی تیاری کے لئے مولانا عبیداللہ سندھی کو کابل روانہ کیاگیا‘ جہاں انہوں نے آزادی حکومت ہند قائم کی‘ جس کے صدر راجہ مہندر پرتاب بنائے گئے‘ لیکن بدقسمتی سے اس خفیہ تحریک کا راز فاش ہوگیا اور شیخ الہند اور ان کے رفقاء وغیرہ کو گرفتار کرکے مالٹا میں قید کردیاگیا‘ جہاں سے وہ 1920 میں رہا ہوئے۔ جب شیخ الہند اور ان کے رفقاء بعد رہائی کے ہندوستان واپس ہوئے‘ تو کمیٹی میں ان کا استقبال کرنے والوں میں مولانا عبدالباری فرنگی محلی اور موہن داس کرم چند گاندھی جی بھی موجود تھے۔ شیخ الہند کی مالٹا میں اسیری کے دوران 1919میں ہندوستان میں جمعیۃ العلماء ہند قائم کی گئی‘ جس کے پہلے صدر مفتی کفایت اللہ مقرر ہوئے۔ جمعیۃ العلماء ہند جدوجہد آزادی میں کانگریس کے دو ش بدوش تھی۔ 8ستمبر 1920کو جمعیۃ العلماء کی جانب سے ترک موالات کا فتویٰ شائع ہوا ‘جس پر پانچ سو علماء کے دستخط تھے۔ یہ فتویٰ ضبط کرلیاگیا۔ تحریک عدم تعاون کے دوران تقریباً 30ہزار افراد جیل گئے‘ جن میں زیادہ تعداد علماء کرام اور مسلم مجاہدین کی تھی۔
19ستمبر 1921کو کراچی میں خلافت کانفرنس کا اجلاس زیر صدارت مولانا محمد علی منعقد ہوا‘ جس میں یہ تجویز پیش ہوئی کہ انگریزی فوج کی ملازمت حرام ہے۔ اس تجویز کی تائید مولانا شوکت علی‘ ڈاکٹر سیف الدین کچلو‘ مولانا حسین احمد مدنی اور جگت گرو شنکر آچاریہ نے کی‘ چونکہ یہ تجویز برطانوی حکومت کے خلاف تھی‘ اس لئے ان تمام لوگوں کو گرفتار کرکے کراچی کی عدالت میں مقدمہ چلایاگیااور ان کو دو دو سال قید بامشقت کی سزا ہوئی۔ اسی زمانہ میں مولانا آزادجو رانچی کی نظر بندی سے رہا ہوئے تھے‘ مجلس خلافت کی کانفرنس منعقدہ آگرہ1921کے صدارتی خطبہ میں یہ نظریہ پیش کیا کہ ملک کی آزادی اور انگریزی حکومت کے خلاف جدوجہد کے لئے ہندو مسلم اتحاد نہایت ضروری ہے‘ چنانچہ وہ اسی نظریہ پر قائم رہے۔ دسمبر1921میں احمد آباد میں کانگریس کا اجلاس حکیم اجمل خاں کی صدارت میں منعقد ہوا‘ جس میں مولانا حسرت موہانی نے آزادی کامل کی تحریک پیش کی‘ جو اپنی نوعیت کی اولین تحریک تھی۔ جمعیۃ علماء ہند نے اپنے پشاور کے اجلاس منعقدہ دسمبر1927میں سائمن کمیشن کے بائیکاٹ کا فیصلہ کیا اور کانگریس نے بھی اپنے مدراس کے اجلاس منعقدہ 26دسمبر 1927 کو اس کمیشن کا بائیکاٹ کرنا طے کیا‘ چنانچہ جب فروری 1928 میں کمیشن ہندوستان آیا ‘تو پورے ملک میں اس کے بائیکاٹ کا سلسلہ اور احتجاجی جلسے ہوئے اور یہ کمیشن ناکام واپس ہوگیا۔ دسمبر 1929 میں کانگریس نے اپنے لاہور کے اجلاس میں مکمل آزادی کی قرار داد منظور کی۔ گاندھی جی کی تحریک نمک ستیہ گرہ اور سول نافرمانی کے دوران دیگر قومی کارکنوں کے ساتھ جمعیۃ علماء کے اکابرین مولانا سید محمد میاں‘ مولانا ابوالکلام آزاد‘ مولانا حفظ الرحمان اور مولانا سید فخرالدین وغیرہ بھی گرفتارہوئے۔
1930 میں لندن میں منعقدہ دوسری گول میز کانفرنس میں مولانا محمد علی جوہر نے آزادی کامل کا مطالبہ کیا اور کہا جب تک ہندوستان آزاد نہیں ہوگا‘ میں اس غلام ملک کی سرزمین تک پر قدم نہیں رکھوں گا ۔میں آزادی کا پروانہ لے کرہی جاؤں گا۔ خدا کا کرنا ایسا ہوا کہ ایک ماہ کے اندر ہی مولانا نے داعی اجل کو لبیک کہا اور مالک حقیقی سے جاملے۔
آج جبکہ ساراملک آزادی کی 69ویں سالگرہ منارہا ہے‘ محاسبہ کرنے اور غوروفکر کرنے کی ضرورت ہے کہ سماجی انصاف‘ خاص کر اقلیتوں کے ساتھ انصاف کی منزل سے اب بھی ہم کتنے دور ہیں۔ جب تک مسلم اقلیت کو آزادی اور تعمیر وترقی کے ثمرات میں ان کا حصہ نہ ملے‘ آزادی ادھوری اور جمہوریت نامکمل ہی سمجھی جائے گی۔آزادی کے بعد مسلم اقلیت کو جتنا پیچھے کردیاگیا ہے ‘اس کی مثال تاریخ عالم میں نہیں مل سکتی۔ آنے والے برسوں میں اس کی تلافی اور اقلیت کے ساتھ انصاف ہوناچاہئے‘ تب ہی ہم حقیقی معنوں میں جشن آزادی مناسکیں گے۔


 

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