Posted by: Bagewafa | نومبر 11, 2016

بر صغیر کی تاریخ کا وہ نفیس کردار ابو الکلام آزاد बर-ए-सग़ीर की तारीख़ का वो नफ़ीस किरदार—- अबूल-कलाम आज़ाद

बर-ए-सग़ीर की तारीख़ का वो नफ़ीस किरदार—- अबूल-कलाम आज़ाद

वज़ीर तालीमात, भारत

ओहदा सँभाला

15 अगस्त, 1947-ए- 22 फरवरी, 1958वज़ीर आज़म जवाहर लाल नेहरू

ज़ाती तफ़सीलात

पैदाइश11 नवंबर 1888 -ए-

मक्का, हिजाज़ विलाएत, सलतनत उस्मानिया (अब सऊदी अरब)

वफ़ात 22 फरवरी 1958 (उम्र 69 साल)

दिल्ली, भारत क़ौमीयत भारत सियासी जमात इंडियन नैशनल कांग्रेस

शरीक-ए-हयात ज़ुलेखा बेगम

मज़हब इस्लाम

अबुल-कलाम मुहयुद्दीनअहमद आज़ाद : (पैदाइश 11 नवंबर,1888-ए- वफ़ात 22 फरवरी,1958-ए-) (बंगाली:*मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद का असल नाम मुहयुद्दी अहमद था उनके वालिद बुजु़र्गवार मुहम्मद ख़ैरउद्दीन उन्हें फ़ीरोज़ बख़त (तारीख़ी नाम) कह कर पुकारते थे।* *मौलाना 1888-ए-में मक्का मुअज़्ज़मा में पैदा हुए। वालिदा का ताल्लुक़ मदीना से था. सिलसिला नसब शेख़ जमाल उद्दीन से मिलता है जो अकबर-ए-आज़म के अह्द में हिन्दोस्तान आए और यहीं मुस्तक़िल सुकूनत इख़तियार करली।*

*1857ए- की जंग-ए-आज़ादी में आज़ाद के वालिद को हिन्दोस्तान से हिज्रत करनी पड़ी कई साल अरब में रहे। मौलाना का बचपन मक्का मुअज़्ज़मा और मदीना में गुज़रा। इबतिदाई तालीम वालिद से हासिल की। फिर जामिआ अज़हर(मिस्र) चले गए। चौदह साल की उम्र में उलूम मशरिक़ी का तमाम निसाब मुकम्मल कर लिया था। मौलाना की ज़हनी सलाहियतों का अंदाज़ा इस से होता है कि उन्होंने पंद्रह साल की उम्र में माहवार जरीदा लसान अल सिदक़ जारी किया। जिसकी मौलाना अलताफ़ हुसैन हाली ने भी बड़ी तारीफ़ की। 1914ए- में अलहलाल निकाला। ये अपनी तर्ज़ का पहला पर्चा था। तरक़्क़ी-पसंद सियासी तख़ैयुलात और अक़ल पर पूरी उतरने वाली मज़हबी हिदायत का गहवारा और बुलंद पाया संजीदा अदब का नमूना था।*

*मौलाना बैयक वक़त उम्दा इंशा पर्वाज, जादू बयान ख़तीब, बेमिसाल सहाफ़ी और एक बेहतरीन मुफ़स्सिर थे। अगरचे मौलाना सियासी मसलक में ऑल इंडिया कांग्रेस के हमनवा थे. लेकिन उनके दिल में मुस्लमानों का दर्द ज़रूर था। यही वजह थी कि तक़सीम के बाद जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के वक़ार को सदमा पहुंचने का अंदेशा हुआ तो मौलाना आगे बढ़े और इस के वक़ार को ठेस पहुंचाने से बचा लिया।*

*यौम तालीम*

*मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद, आज़ाद हिन्दोस्तान के पहले वज़ीर-ए-तालीम थे।उनके यौम-ए-पैदाइश 11 नवंबर, 1888-ए-को हिन्दोस्तान में क़ौमी यौम तालीम मनाया जाता है।*

*बशुक्रियह

ही उद्दीन अहमद अबुल-कलाम आज़ाद बर्रे-सग़ीर की तारीख़ का वो नफ़ीस किरदार है जो किसी तआरुफ़ का मुहताज नहीं, आप ग़ैर मुनक़सिम हिन्दोस्तान की अज़ीम और मुक़तदिर शख़्सियतों में से एक थे और यक़ीनन इलम व फ़रासत के इमाम थे। आप को समाज, मुआशरा, ज़बान ,कलाम, बयान ,मज़हब और बैन अल मज़हबी तकाबुलात और सियासत के पेच-ओ-ख़म पर उबूर हासिल था। आपने क़ुरआन की तफ़सीर लिखी, मज़हब को जाँचा,आबा-ए-की देरीना रसूमात को तर्क किया,सियासत के दश्त में आबला-पाई की,उसूल-ओ-नज़रियात को नया और मोतबर लब-ओ-लहजा दिया , सयासी बसीरत के मफ़ाहीम को नई रोशनी दी और ख़ुद-साख़्ता क़ाइदीन मिल्लत के इजतिमाई सयासी शऊर को बोना कर दिया।यक़ीनन ीह मुत्तहदा भारत का अज़ीम सरमाया था जिसे नफ़सपरसत सियासत दां समझ ना सके और आज निसफ़ सदी से ज़्यादा वक़्त गुज़र जाने के बावजूद भी उनके वीज़न,हालात की नब्ज़ शनाशी और उनकी अज़ीम सियासी बशीरत पर हम जैसे तालिब-इल्म उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने पर मजबूर हैं। मौलाना बैयक वक़त उम्दा इंशापर्दाज़, जादू बयान ख़तीब, बेमिसाल सहाफ़ी और एक बेहतरीन मुफ़स्सिर थे। अबुल-कलाम आज़ाद हर लिहाज़ से जामेअ शख़्सियत के मालिक थे उन पर अंग्रेज़ी लफ़्ज़ Polymath पूरा उतरता है जिस मैदान में क़दम रखा अपनी शख़्सियत ,इलम और साबित क़दमी की वजह से कामयाबी की मंज़िलें छूलें अपनों ने धुत्कारा, गालियां दें लेकिन इन्होंने हमेशा मुहज़्ज़ब लहजे में कलाम किया और अदब व लिहाज़ की हदूद की पासदारी मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद रहिमा अल्लाह मिल्लत-ए-इस्लामीया हिंद का रोशन चिराग़ हैं. जिसकी रोशनी बशीरत-ओ-बसारत को जिला देती है।

अब्बू उल-कलाम आज़ाद इलमदोस्त ,हुर्रियत पसंद और क़ौम परस्त मुस्लमान रहनुमा थे। ज़िंदगी का सफ़र 1888में शुरू हुआ। अमली ज़िंदगी का आग़ाज़1904से शुरू हुआ । 1923, 1930 और 1939मैं ऑल इंडिया नैशनल कांग्रेस के क़ाइम मक़ाम सदर मुक़र्रर किए गए। 1940 मैं कांग्रेस के(दुबारा।इब्न-ए-कलीम)सदर मुंतख़ब हुए और मुसलसल 1946 तक हिन्दोस्तान की सबसे बड़ी सयासी जमात के सरबराह रहे।

मौलाना आज़ाद बीस बरस की उम्र में आज़ादी की तहरीक में शामिल हुए। क़ैद-ओ-बंद का सिलसिला रांची बिहार से शुरू हुआ और क़िला अहमद नगर में 1945मैं ख़त्म हुआ। कल 68बरस और सात माह। इस में 9बरस और 8माह अंग्रेज़ की क़ैद काटी। गोया उम्र-ए-अज़ीज़ का हर सातवाँ रोज़ जेल में कटा।

मौलाना के नुक़्ता-ए-नज़र से सयासी मकालमे की मारूफ़ रिवायत में इख़तिलाफ़ भी किया जा सकता है और इस पर भी बात हो सकती है कि मौलाना आज़ाद अमली सियासत के जोड़ तोड़ से मावरा थे या नहीं? मौलाना की सियासी बशीरत, शराफ़त, बुलंद निगाही, इलमी हैसियत, वज़्अ-दारी और ख़ुद्दारी पर कोई सवाल उठाना किसी मुअर्रिख़ के लिए इतना आसान नहीं रहा, ताहम मुहम्मद अली जिनाह के सियासी कैरियर पर ये एक दाग़ है कि मुफ़ादात की बिसात पर खेले जा रहे सियासी खेल में मुस्लिम लीग की मज़हबी शनाख़्त को उजागर करने के लिए जब इन्होंने कांग्रेस को हिंदू जमात क़रार देना चाहा तो, मोहयुद्दीन अब्बू उल-कलाम आज़ाद को कांग्रेस का शो बॉय क़रार दे दिया।जबकि मौलाना को इस किस्म के हमलों का जवाब देने की आदत थी और ना ही मौलाना आज़ाद इसे ज़रूरी समझते थे। मुआमला वीज़न और शऊर का था लेकिन इस के बरख़िलाफ़ मौलाना ने अपनी तसनीफ़ में हैरानकुन तौर पर मुहम्मद अली जिनाह का एक से ज़्यादा मुक़ामात पर ना सिर्फ ये कि तज़किरा किया बल्कि मुतअद्दिद उमूर-ओ-मुआमलात में उनके नुक़्ता-ए-नज़र को मुस्तर्द करने के लिए माक़ूल लब वलहजा इख़तियार किया और उसूल वाक़लीत के मयार का पूरा लिहाज़ रखा है।

क़ायम-ए-पाकिस्तान से तक़रीबन सवा साल क़बल अप्रैल 1946 जरीदा चट्टान में क़ायम-ए-पाकिस्तान को लेकर मौलाना ने कुछ पेशीन गोईआं की थीं,ये इंटरव्यू शोरिश काश्मीरी ने लिया था। इंटरव्यू के इक़तिबासात दर्ज जे़ल हैं:

1। कई मुस्लिम ममालिक की तरह पाकिस्तान की नाअहल सियासी क़ियादत फ़ौजी आमिरों की राह हमवार करेगी।

2। बैरूनी कर्ज़ों का भारी बोझ होगा।

3। पड़ोसीयों से दोस्ताना ताल्लुक़ात का फ़ुक़दान होगा और जंग के इमकानात होंगे ।

4। दाख़िली शोरिश और इलाक़ाई तनाज़आत होंगे।

5। पाकिस्तान के सनअतकारों और नौ दुलत्तियों के हाथों क़ौमी दौलत की लूट मार होगी।

6। नौ दौलतियों के इस्तिहसाल के नतीजे में तबक़ाती जंग का तसव्वुर पैदा होगा।

7। नौजवानों की मज़हब से दूरी,अदम इतमीनान और नज़रिया पाकिस्तान का ख़ातमा हो जाएगा।

8पाकिस्तान पर कंट्रोल करने के लिए आलमी ताक़तों की साज़िशें बढ़ेंगी।

अक्तूबर 1947में जामा मस्जिद दिल्ली में मुस्लमानों के इजतिमा से ख़िताब करते हुए मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद ने ख़बरदार किया था कि:

मैं तुमसे ये नहीं कहता कि तुम हाकिमाना इक़तिदार के मदरसे से वफ़ादारी की सर्टीफिकट हासिल करो और कासालेसी की वही ज़िंदगी इख़तियार करो जो ग़ैर मुल्की हाकिमों के अह्द मैं तुम्हारा शआर रहा है। मैं कहता हूँ कि जो उजले नक़्श वनगार तुम्हें इस हिन्दोस्तान में माज़ी की यादगार के तौर पर नज़र आरहे हैं वो तुम्हारा ही क़ाफ़िला था, उन्हें भूलाओ नहीं ,उन्हें छोडो -नहीं, उनके वारिस बन कर रहो ओर समझ लो कि अगर तुम भागने के लिए तैयार नहीं तो फिर तुम्हें कोई ताक़त भगा नहीं सकती। आओ अह्द करो कि ये मुल़्क हमारा है। हम उस के लिए हैं ओ रास की तक़दीर के बुनियादी फ़ैसले हमारी आवाज़ के बग़ैर अधूरे ही रहेंगे।

यूपी से पाकिस्तान जानेवाले एक गिरोह से गुफ़्तगु करते हुए फ़रमाया था:

आप मादर-ए-वतन छोड़कर जा रहे हैं आपने सोचा उस का अंजाम क्या होगा? आपके इस तरह फ़रार होते रहने से हिन्दोस्तान में बसने वाले मुस्लमान कमज़ोर होजाएंगे और एक वक़्त ऐसा भी आसकता है जब पाकिस्तान के इलाक़ाई बाशिंदे अपनी अपनी जुदागाना हैसियतों का दावा लेकर उठ खड़े हो। बंगाली, पंजाबी, सिंध, बलोच और पठान ख़ुद को मुस्तक़िल कौमें क़रार देने लगीं। क्या उस वक़्त आपकी पोज़ीशन पाकिस्तान में बिन बुलाए मेहमान की तरह नाज़ुक और बे किसी की नहीं रह जाएगी? हिंदू आप का मज़हबी मुख़ालिफ़ तो हो सकता है ,क़ौमी मुख़ालिफ़ नहीं। आप इस सूरत-ए-हाल से निमट सकते हैं मगर पाकिस्तान में आपको किसी वक़्त भी क़ौमी और वतनी मुख़ालफ़तों का सामना करना पड़ जाये गा जिसके आगे आप बेबस होजाएंगे।

ये कोई जज़बाती अपील नहीं थी ना ही कोई नज़रियाती तक़रीर थी यहां मौलाना की सयासी बशीरत का नुक़्ता उरूज बोल रहा था और आपकी सयासी बसीरत मुस्तक़बिल में झांक रही थी। जबकि इस में कोई शुबा नहीं कि वो एक ऐसे दानिश्वर थे जिसकी निगाह-ए-दूर-रस ने भाँप लिया था कि मलिक की तक़सीम किसी तरह भी मुस्लमानों के लिए सूदमंद ना होगी।

मौलाना आज़ाद की सयासी बसीरत को सलाम किया जाना चाहिए कि सानिहा तक़सीम के बावजूद भी बड़ी हद तक मुल्क सैकूलरीज़म की राह पर गामज़न रहा और इस का सहरा बड़ी हद तक मौलाना के सर जाता है। मौलाना की क़ियादत, उनके तदब्बुर, उनकी शख़्सियत में मर्कूज़ हिन्दुस्तानी इमतिज़ाज , सैकूलरीज़म के लिए उनकी जिद्दो जहत- -मुसलसल और उनकी मुशतर्का तहज़ीब की ज़िंदा जावेद अलामत होने की बदौलत ही हिन्दोस्तान सिक्युलर बना रहा और मुल्क के मुस्लमानों की ख़ुशक़िसमती है कि मौलाना आज़ाद जैसी शख़्सियत ने उनकी रहनुमाई की ।लेकिन अलमीया ये है कि हिन्दुस्तानी क़ौमी तहरीक के अज़ीम रहनुमाओं में मौलाना आज़ाद की तालीमात को महिज़ अधूरा समझा गया है और अवाम की अक्सरीयत के सामने उनकी हैसियत बस एक क़ौम परस्त मुस्लिम रहनुमा की है। मौलाना आज़ाद रहिमअल्लाह की क़ौमी तहरीक एक जज़बाती यादगार,निशानी और भोली बसरी विरासत के तौर पर बाक़ी रह गई है जिसकी इज़्ज़त तो की जाती है मगर उसे वाज़िह और तन्क़ीदी तौर पर समझने का एहसास नहीं होता जबकि मौलाना आज़ाद पूरी ज़िंदगी सैकूलर ज़म की नुमाइंदगी करते रहे। सयासी बसीरत के नुक़्ता कमाल पर फ़ाइज़ आज़ाद के ख़ाबों का भारत एक मज़बूत ख़ुद-एधतिमादी से मामूर सैकूलर भारत था:दुनिया को हमारे इरादों के बारे में शक रहा हो मगर हमें अपने फ़ैसलों के बारे में शक नहीं गुज़रा। वक़्त का कोई उलझाओ, हालात का कोई उतार चढ़ाओ और मुआमलों की कोई चुभन हमारे क़दमों का रुख नहीं बदल सकती& इमाम उल-हिंद मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद।

अल्लामा शोरिश काश्मीरी के इन अशआर के साथ जो इन्होंने 10 मार्च 1958 मौलाना आज़ाद के मज़ार पर लिखा था:

कई दिमाग़ों का एक इंन्सां मैं सोचता हूँ कहाँ गया है

क़लम की अज़मत उजड़ गई है ज़बां से ज़ोर-ए-बयाँ गया है

उतर गए मंज़िलों के चेहरे, अमीर किया? कारवां गया है

मगर तरी मर्गे नागहां का मुझे अभी तक यक़ीं नहीं है

ये कौन उठा कि देर-ओ-काअबा शिकस्ता-दिल, ख़स्ता गाम पहुंचे

झुका के अपने दलों के पर्चम ख़वास पहुंचे अवाम पहुंचे

तरी लहद पे हो रब की रहमत, तरी लहद को सलाम पहुंचे

मगर तरी मर्गे नागहां का मुझे अभी तक यक़ीं है

بر صغیر کی تاریخ کا وہ نفیس کردار ابو الکلام آزاد

وزیر تعلیمات، بھارت

عہدہ سنبھالا

15 اگست، 1947ء – 22 فروری، 1958ءوزیر اعظم جواہر لعل نہرو

ذاتی تفصیلات

پیدائش11 نومبر 1888 ء

مکہ, حجاز ولایت, سلطنت عثمانیہ (اب سعودی عرب)

وفات22 فروری 1958 (عمر 69 سال)

دہلی، بھارت قومیت بھارت یسیاسی جماعت انڈین نیشنل کانگریس

شریک حیات زلیخہ بیگم

مذہب اسلام

ابوالکلام محی الدین احمد آزاد : (پیدائش 11 نومبر،1888ء – وفات 22 فروری،1958ء) (بنگالی:*مولانا ابوالکلام آزاد کا اصل نام محی الدین احمد تھا ان کے والد بزرگوار محمد خیر الدین انہیں فیروزبخت (تاریخی نام) کہہ کر پکارتے تھے۔* *مولانا 1888ء میں مکہ معظمہ میں پیدا ہوئے۔ والدہ کا تعلق مدینہ سے تھا سلسلہ نسب شیخ جمال الدین سے ملتا ہے جو اکبر اعظم کے عہد میں ہندوستان آئے اور یہیں مستقل سکونت اختیار کرلی۔*

*1857ء کی جنگ آزادی میں آزاد کے والد کو ہندوستان سے ہجرت کرنی پڑی کئی سال عرب میں رہے۔ مولانا کا بچپن مکہ معظمہ اور مدینہ میں گزرا۔ ابتدائی تعلیم والد سے حاصل کی۔ پھر جامعہ ازہر(مصر) چلے گئے۔ چودہ سال کی عمر میں علوم مشرقی کا تمام نصاب مکمل کر لیا تھا۔ مولانا کی ذہنی صلاحتیوں کا اندازا اس سے ہوتا ہے کہ انہوں نے پندرہ سال کی عمر میں ماہوار جریدہ لسان الصدق جاری کیا۔ جس کی مولانا الطاف حسین حالی نے بھی بڑی تعریف* *کی۔ 1914ء میں الہلال نکالا۔ یہ اپنی طرز کا پہلا پرچہ تھا۔ ترقی پسند سیاسی تخیلات اور عقل پر پوری اترنے والی مذہبی ہدایت کا گہوارہ اور بلند پایہ سنجیدہ ادب کا نمونہ تھا۔*

*مولانا بیک وقت عمدہ انشا پرداز، جادو بیان خطیب، بے مثال صحافی اور ایک بہترین مفسر تھے۔ اگرچہ مولانا سیاسی مسلک میں آل انڈیا کانگریس کے ہمنوا تھے لیکن ان کے دل میں مسلمانوں کا درد ضرور تھا۔ یہی وجہ تھی کہ تقسیم کے بعد جب علی گڑھ مسلم یونیورسٹی کے وقار کو صدمہ پہنچنے کا اندیشہ ہوا تو مولانا آگے بڑھے اور اس کے وقار کو ٹھیس پہنچانے سے بچا لیا۔*

*یومِ تعلیم*

*مولانا ابوالکلام آزاد، آزاد ہندوستان کے پہلے وزیر تعلیم تھے۔ان کے یوم پیدائش 11 نومبر، 1888ء کو ہندوستان میں قومی یومِ تعلیم منایا جاتا ہے۔*

*بشکریہ *

محی الدین احمدابوالکلام آزاد بر صغیر کی تاریخ کا وہ نفیس کردار ہے جو کسی تعارف کا محتاج نہیں، آپ غیرمنقسم ہندوستان کی عظیم اور مقتدر شخصیتوں میں سے ایک تھے اور یقینا علم وفراست کے امام تھے۔ آپ کوسماج، معاشرہ، زبان ،کلام، بیان ،مذہب اور بین المذاہبی تقابلات اور سیاست کے پیچ و خم پر عبور حاصل تھا۔ آپ نے قرآن کی تفسیر لکھی، مذہب کو جانچا،آباء کی دیرینہ رسومات کو ترک کیا،سیاست کے دشت میں آبلہ پائی کی،اصول و نظریات کو نیا اور معتبر لب و لہجہ دیا ، سیاسی بصیرت کے مفاہیم کو نئی روشنی دی اور خود ساختہ قائدین ملت کے اجتماعی سیاسی شعورکو بونا کردیا۔یقینا ًیہ متحدہ بھارت کا عظیم سرمایہ تھا جسے نفس پرست سیاست داں سمجھ نہ سکے اور آج نصف صدی سے زیادہ وقت گزر جانے کے باوجود بھی ان کے ویژن،حالات کی نبض شناشی اور ان کی عظیم سیاسی بصیرت پر ہم جیسے طالب علم انھیں خراج عقیدت پیش کرنے پر مجبور ہیں۔ مولانا بیک وقت عمدہ انشا پرداز، جادو بیان خطیب، بے مثال صحافی اور ایک بہترین مفسر تھے۔ ابوالکلام آزاد ہرلحاظ سے جامع شخصیت کے مالک تھے ان پر انگریزی لفظ Polymath پورا اترتا ہے جس میدان میں قدم رکھا اپنی شخصیت ،علم اور ثابت قدمی کی وجہ سے کامیابی کی منزلیں چھولیں اپنوں نے دھتکاراگالیاں دیں لیکن انھوں نے ہمیشہ مہذب لہجے میں کلام کیا اور ادب ولحاظ کی حدود کی پاسداری مولانا ابوالکلام آزاد رحمہ اللہ ملت اسلامیہ ہند کا روشن چراغ ہیں جس کی روشنی بصیرت و بصارت کو جلا دیتی ہے۔

ابو الکلام آزاد علم دوست ،حریت پسند اور قوم پرست مسلمان رہنما تھے۔ زندگی کا سفر 1888میں شروع ہوا۔ عملی زندگی کا آغاز1904سے شروع ہوا ۔ 1923، 1930 اور 1939میں آل انڈیا نیشنل کانگریس کے قائم مقام صدر مقرر کیے گئے۔ 1940 میں کانگریس کے(دوبارہ۔ابنِ کلیم)صدر منتخب ہوئے اورمسلسل 1946 تک ہندوستان کی سب سے بڑی سیاسی جماعت کے سربراہ رہے۔

مولانا آزاد بیس برس کی عمر میں آزادی کی تحریک میں شامل ہوئے۔ قید و بند کا سلسلہ رانچی بہار سے شروع ہوااور قلعہ احمد نگر میں 1945میں ختم ہوا۔ کل 68برس اور سات ماہ۔ اس میں 9برس اور 8ماہ انگریز کی قید کاٹی۔ گویا عمر عزیز کا ہر ساتواں روز جیل میں کٹا۔

مولانا کے نقطہ نظر سے سیاسی مکالمے کی معروف روایت میں اختلاف بھی کیا جاسکتا ہے اوراس پر بھی بات ہو سکتی ہے کہ مولانا آزاد عملی سیاست کے جوڑ توڑ سے ماورا تھے یا نہیں؟ مولانا کی سیاسی بصیرت، شرافت، بلند نگاہی، علمی حیثیت، وضع داری اور خودداری پر کوئی سوال اٹھانا کسی مورخ کے لیے اتنا آسان نہیں رہا، تاہم محمد علی جناح کے سیاسی کیرئیر پر یہ ایک داغ ہے کہ مفادات کی بساط پرکھیلے جارہے سیاسی کھیل میں مسلم لیگ کی مذہبی شناخت کو اجاگر کرنے کے لیے جب انھوں نے کانگریس کو ہندو جماعت قرار دینا چاہا تو محی الدین ابو الکلام آزاد کو کانگریس کا ”شوبوائے“ قرار دے دیا۔جبکہ مولانا کو اس قسم کے حملوں کا جواب دینے کی عادت تھی اور نہ ہی مولانا آزاد اسے ضروری سمجھتے تھے۔ معاملہ ویژن اور شعور کا تھالیکن اس کے برخلاف مولانا نے اپنی تصنیف میں حیران کن طور پر محمد علی جناح کا ایک سے زیادہ مقامات پر نہ صرف یہ کہ تذکرہ کیا بلکہ متعدد امور و معاملات میں ان کے نقطہ نظر کو مسترد کرنے کے لیے معقول لب ولہجہ اختیار کیا اوراصول وعقلیت کے معیار کا پورا لحاظ رکھا ہے۔

قیام پاکستان سے تقریبا سوا سال قبل اپریل 1946 جریدہ چٹان میں قیام پاکستان کو لے کر مولانا نے کچھ پیشین گوئیاں کی تھیں،یہ انٹرویو شورش کاشمیری نے لیا تھا۔ انٹرویو کے اقتباسات درج ذیل ہیں:

1۔ کئی مسلم ممالک کی طرح پاکستان کی نااہل سیاسی قیادت فوجی آمروں کی راہ ہموار کرے گی۔

2۔ بیرونی قرضوں کا بھاری بوجھ ہوگا۔

3۔ پڑوسیوں سے دوستانہ تعلقات کا فقدان ہوگا اور جنگ کے امکانات ہوں گے ۔

4۔ داخلی شورش اور علاقائی تنازعات ہوں گے۔

5۔ پاکستان کے صنعتکاروں اور نودلتیوں کے ہاتھوں قومی دولت کی لوٹ مار ہوگی۔

6۔ نودولتیوں کے استحصال کے نتیجے میں طبقاتی جنگ کا تصور پیدا ہوگا۔

7۔ نوجوانوں کی مذہب سے دوری،عدم اطمینان اور نظریہ پاکستان کا خاتمہ ہوجائے گا۔

8پاکستان پر کنٹرول کرنے کے لیے عالمی طاقتوں کی سازشیں بڑھیں گی۔

اکتوبر 1947میں جامع مسجد دہلی میں مسلمانوں کے اجتماع سے خطاب کرتے ہوئے مولانا ابوالکلام آزاد نے خبردارکیا تھا کہ:

”میں تم سے یہ نہیں کہتا کہ تم حاکمانہ اقتدار کے مدرسے سے وفاداری کی سرٹیفکٹ حاصل کرو اور کاسہ لیسی کی وہی زندگی اختیار کرو جو غیر ملکی حاکموں کے عہد میں تمہارا شعار رہا ہے۔ میں کہتا ہوں کہ جو اجلے نقش ونگار تمھیں اس ہندوستان میں ماضی کی یاد گار کے طور پر نظر آرہے ہیں وہ تمہارا ہی قافلہ تھا، انھیں بھلاوٴ نہیں ،انھیں چھوڑ و نہیں، ان کے وارث بن کر رہو او رسمجھ لو کہ اگر تم بھاگنے کے لیے تیار نہیں تو پھر تمھیں کوئی طاقت بھگا نہیں سکتی۔ آوٴ عہد کرو کہ یہ ملک ہمارا ہے۔ ہم اس کے لیے ہیں او را س کی تقدیر کے بنیادی فیصلے ہماری آواز کے بغیر ادھورے ہی رہیں گے۔“

یوپی سے پاکستان جانے والے ایک گروہ سے گفتگو کرتے ہوئے فرمایا تھا:

”آپ مادر وطن چھوڑ کر جارہے ہیں آپ نے سوچا اس کا انجام کیا ہوگا؟ آپ کے اس طرح فرار ہوتے رہنے سے ہندوستان میں بسنے والے مسلمان کمزور ہوجائیں گے اور ایک وقت ایسابھی آسکتا ہے جب پاکستان کے علاقائی باشندے اپنی اپنی جدا گانہ حیثیتوں کا دعویٰ لے کر اٹھ کھڑے ہوں۔ بنگالی، پنجابی، سندھ، بلوچ اور پٹھان خود کو مستقل قومیں قرار دینے لگیں۔ کیا اس وقت آپ کی پوزیشن پاکستان میں بن بلائے مہمان کی طرح نازک اور بے کسی کی نہیں رہ جائے گی؟ ہندو آپ کامذہبی مخالف تو ہوسکتا ہے ،قومی مخالف نہیں۔ آپ اس صورت حال سے نمٹ سکتے ہیں مگر پاکستان میں آپ کو کسی وقت بھی قومی اوروطنی مخالفتوں کا سامنا کرنا پڑجائے گا جس کے آگے آپ بے بس ہوجائیں گے۔“

یہ کوئی جذباتی اپیل نہیں تھی نہ ہی کوئی نظریاتی تقریر تھی یہاں مولانا کی سیاسی بصیرت کا نقطہ عروج بول رہا تھا اور آپ کی سیاسی بصیرت مستقبل میں جھانک رہی تھی۔ جبکہ اس میں کوئی شبہ نہیں کہ وہ ایک ایسے دانشور تھے جس کی نگاہِ دور رس نے بھانپ لیا تھا کہ ملک کی تقسیم کسی طرح بھی مسلمانوں کے لیے سودمند نہ ہوگی۔”

مولانا آزاد کی سیاسی بصیرت کو سلام کیا جانا چاہیے کہ سا نحہ تقسیم کے باوجود بھی بڑی حد تک ملک سیکولر زم کی راہ پر گامزن رہااور اس کا سہرا بڑی حد تک مولانا کے سر جاتا ہے۔ مولانا کی قیادت، ان کے تدبر، ان کی شخصیت میں مرکوز ہندوستانی امتزاج ، سیکولرزم کے لیے ان کی جہد مسلسل اور ان کی مشترکہ تہذیب کی زندہ جاوید علامت ہونے کی بدولت ہی ہندوستان سیکو لر بنا رہا اور ملک کے مسلمانوں کی خوش قسمتی ہے کہ مولانا آزاد جیسی شخصیت نے ان کی رہنمائی کی ۔لیکن المیہ یہ ہے کہ ہندوستانی قومی تحریک کے عظیم رہنماوٴں میں مولانا آزاد کی تعلیمات کو محض ادھورا سمجھا گیا ہے اور عوام کی اکثریت کے سامنے ان کی حیثیت بس ایک قوم پرست مسلم رہنما کی ہے۔ مولانا آزاد رحمہ اللہ کی قومی تحریک ایک جذباتی یادگار،نشانی اوربھولی بسری وراثت کے طور پر باقی رہ گئی ہے جس کی عزت تو کی جاتی ہے مگر اسے واضح اور تنقیدی طور پر سمجھنے کا احساس نہیں ہوتا جبکہ مولانا آزاد پوری زندگی سیکولرزم کی نمائندگی کرتے رہے۔ سیاسی بصیرت کے نقطہ کمال پر فائز آزاد کے خوابوں کا بھارت ایک مضبوط خود اعتمادی سے معمور سیکولر بھارت تھا:”دنیا کو ہمارے ارادوں کے بارے میں شک رہا ہو مگر ہمیں اپنے فیصلوں کے بارے میں شک نہیں گزرا۔ وقت کا کوئی الجھاوٴ، حالات کا کوئی اتار چڑھاوٴ اور معاملوں کی کوئی چبھن ہمارے قدموں کا رخ نہیں بدل سکتی“… امام الہند مولانا ابوالکلام آزاد۔

علامہ شورش کاشمیری کے ان اشعار کے ساتھ جو انھوں نے 10 مارچ 1958 مولانا آزاد کے مزار پر لکھاتھا:

کئی دماغوں کا ایک انساں میں سوچتا ہوں کہاں گیا ہے

قلم کی عظمت اجڑ گئی ہے زباں سے زور بیاں گیا ہے

اتر گئے منزلوں کے چہرے، امیر کیا؟ کارواں گیا ہے

مگر تری مرگ ناگہاں کا مجھے ابھی تک یقیں نہیں ہے

یہ کون اٹھا کہ دیر و کعبہ شکستہ دل، خستہ گام پہنچے

جھکا کے اپنے دلوں کے پرچم خواص پہنچے عوام پہنچے

تری لحد پہ ہو رب کی رحمت، تری لحد کو سلام پہنچے

ر تری مرگ ناگہاں کا مجھے ابھی تک یقیں نہیں ہے

(Courtesy:tesri Jang)

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زمرے

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