Posted by: Bagewafa | دسمبر 1, 2016

बुलबुल क़ो गुल मिले नहीं फ़स्ले बहार में—- शकील क़ादरी

बुलबुल क़ो गुल मिले नहीं फ़स्ले बहार में—- शकील क़ादरी

आख़िरी मुग़ल शहेनशाह और आज़ादी के सिपाही बहादूर शाह ज़फ़र की माज़िरत के साथ…. जिस के दो बेटों का सर अंग्रेज़ोने क़लम कर दिया था…

पेरोडी

 

धबरा रहा है दिल तेरा लंबी क़तार में

सब का यही तो हाल है नोटों के प्यार में.

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वोटों को कोसते रहो मोदी से क्या गिला

जो मिल रहा है यार वो ले लो उधार में

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कह दो पचास दिन से कहीं और जा बसे

“इतनी जगह कहाँ है दिले दाग़दार में”

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ख़ुद ही तमाचे मार के अब गाल रक्खो लाल

साहिबने जो लगा दिया तुम को क़तार में

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बनिये को ब्याज़ देके जो लाये थे कुछ हज़ार

अब वो भी चोरी हो गए सब्ज़ी बज़ार में

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बाज़ार, कारख़ानों पे छाई सियाह रात

आई है ऐसी मंदी हर इक कारोबार में

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बेहाल नोटबंदी से बस ऐसे हो गये

जैसे चढ़े हों सूली पे सब कू-ए-यार में

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है देशवासीयों का यही हाल ऐ “शकील”

बुलबुल क़ो गुल मिले नहीं फ़स्ले बहार में

(Courtesy:Facebook)

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