Posted by: Bagewafa | مارچ 8, 2017

گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں – قتیل شفائی….. गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं —-क़तील शिफ़ाई

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं —-क़तील शिफ़ाई

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गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं

हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

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बच निकलते हैं अगर आतिह-ए-सय्याद से हम

शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

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ख़ुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा

जिन को जलना हो वो आराअम से जल जाते हैं

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शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये

हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

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जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ

जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं

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रब्ता बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन

आशना जब तेरे पैग़ाम से जल जाते हैं

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گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں – قتیل شفائی

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گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں

ہم چراغوں کی طرح شام سے جل جاتے ہیں

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شمع جس آگ میں جلتی ہے نمائش کے لیے

ہم اُسی آگ میں گمنام سے جل جاتے ہیں

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خود نمائی تو نہیں شیوہء اربابِ وفا

جن کو جلنا ہو وہ آرام سے جل جاتے ہیں

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بچ نکلتے ہیں اگر آتشِ سیّال سے ہم

شعلہء عارضِ گلفام سے جل جاتے ہیں

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جب بھی آتا ہے مرا نام ترے نام کے ساتھ

جانے کیوں لوگ مرے نام سے جل جاتے ہیں

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رابتہ باہم پہ ہمیں کیا نہ کہیں گے دشمن

آشنا جب تیرے پیغام سے جل جاتے ہیں

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زمرے

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