Posted by: Bagewafa | ستمبر 6, 2017

जाने, तुम कैसी डायन हो — नागार्जुन

जाने, तुम कैसी डायन हो — नागार्जुन

 

जाने, तुम कैसी डायन हो !

अपने ही वाहन को गुप-चुप लील गई हो !

शंका-कातर भक्तजनों के सौ-सौ मृदु उर छील गई हो !

क्या कसूर था बेचारे का ?

नाम ललित था, काम ललित थे

तन-मन-धन श्रद्धा-विगलित थे

आह, तुम्हारे ही चरणों में उसके तो पल-पल अर्पित थे

जादूगर था जुगालियों का, नव कुबेर चवर्ण-चर्वित थे

जाने कैसी उतावली है,

जाने कैसी घबराहट है

दिल के अंदर दुविधाओं की

जाने कैसी टकराहट है

जाने, तुम कैसी डायन हो !

(1975)

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