Posted by: Bagewafa | ستمبر 9, 2017

ग़ज़ल शब्द का अर्थ :शकील कादरी

ग़ज़ल शब्द का अर्थ :शकील कादरी

 

गुजराती ज़बान में ग़ज़ल सर्जन की प्रवृत्ति को आज सो सवासो वर्ष से अधिक समय बीत चुका है किन्तु ग़ज़ल शब्द के अर्थ, ग़ज़ल स्वरूप की उत्पत्ति और ग़ज़ल की व्याख्या के संदर्भ में कईं तरह के भ्रम पाये जाते हैं। अरबी भाषा में किसी शब्द के उच्चार में सामान्य परिवर्तन कर दिया जाये तो शब्दार्थ बदल जाता है। गुजराती में देखा गया है कि ‘ग़ज़ल’ शब्द के साथ जिन शब्दों की थोड़ी बहुत उच्चारगत समानता है, उन शब्दों को भी ग़ज़ल के साथ जोड़ कर चर्चा की गई है। इस कारण ग़ज़ल शब्द के बारे में कुछ भ्रम पाये जाते हैं। इन भ्रमों को दूर करने के लिये ग़ज़ल की अर्थगत, स्वरूपगत और उभयलक्षी व्याख्याएं देखेंगे। यह व्याख्याएं देखने से पहेले यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि "ग़ज़ल” शब्द मूलत: अरबी भाषा का होने के बावजूद एक स्वतंत्र काव्यरूप के तौर पर इस का विकास इरान में हुआ था। फिर भी ग़ज़ल और ग़ज़ल विद्या में जिन पारिभाषिक शब्दों का उपयोग किया जाता है वह शब्द अरबी भाषा के ही रक्खे गयें। अरबी भाषा का स्वरूप गुजराती और हिन्दी भाषा से भिन्न प्रकार का है। अरबी भाषा में विभिन्न शब्द के मूल में तीन वर्ण होते हैं। इन्हीं मूल वर्णो (Root Word) से विभिन्न वज़्न या उच्चारगत समतुला वाले नाम, क्रियापद वग़ैरह शब्दों का निर्माण होता है। जैसे "क-त-ब” (کَ-تَ-َ بَ) एक मूल है, धातु है। जिस में तीन वर्ण हैं। जिस में से भूतकाल का एक रूप क-त-ब (کَتَبَ) बना है। जिस का अर्थ है "उसने लिक्खा”। "कतब” के बाद कतबतु (ُکتبت) "मैं ने लिक्खा”, कतबना (کتبنا) "हम दोनों ने लिक्खा” इत्यादि। यह भूतकाल के पुल्लिंग रूप हैं। इसी तरह स्रीलिंग रूप भी बनते हैं। इस के अलावा नाम भी बनते हैं जैसे "मक्तूब” ( مکتوب) अर्थात "लिक्खा हुआ”, और "मक्तब:” (مکتبہ) अर्थात "पाठशाला”। यह चर्चा समझ लेने के बाद ग़ज़ल शब्द के विषय में जो भ्रम प्रचलित हैं उन्हें दूर करने में आसानी होगी।

"ग़ज़ल” (غزل) शब्द की व्युत्पत्ति "मुग़ाज़ेलत” (مغازلت) या "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द से हुई है यह बात मंजुलाल मजुमदारने अपनी किताब ” गुजराती साहित्यना पद्यस्वरूपो”, रशीद मीरने "”१९४२ पछीनी गुजराती ग़ज़लनी सौंदर्य मीमांसा” नाम के महानिबंध में और और एम. एफ़. लोखंड़वालाने "फ़ारसी साहित्यनो इतिहास” में कही है, मगर वास्तव में अरबी में मुग़ाज़ल: (مُغازلہ) शब्द है, मुग़ाज़ेलत (مُغازلت) नहीं। जो उर्दू में आकर "मुग़ाजेलत”हो गया है। "मुग़ाज़ल:” अरबी क्रियापद है और यह क्रियापद स्वयम् तीन वर्ण के मूल धातु "ग़-ज़-ल” (غ- ز- ل) से बना है।

इसी तरह "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द भी "ग़-ज़-ल” (غ-ز-ل) मूल धातु से ही बना है। इस चर्चा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि "ग़ज़ल” शब्द "मुग़ाज़ेलत” या "तग़ज़्ज़ुल” से नहीं बना है बल्कि उस के विपरित ग़ज़ल से "तग़ज़्ज़ुल” और "मुग़ाज़ेलत” शब्द बने हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि "मुग़ाज़ल:”, ” मुग़ाजेलत”, और "तग़ज़्ज़ुल” यह तीनों शब्द ग़ज़ल से बने हैं, "ग़ज़ल” शब्द इन शब्दों से नहीं बना है। गुजराती भाषा के विद्वान जिसे "मुग़ाज़ेलत” कहते हैं और मूल शब्द बताते हैं वह स्वयम् मूल में "मुग़ाज़ल:” है और उस का वज़्न (शब्दोच्चार) :मुफ़ाअल:” पर आधारित है। "मुग़ाज़ल:” का अर्थ होता है, ":Talk with her, in an amatory and enticing manner, to flirt, to talk with beloved.” इस के मूल में "ग़.ज.ल”शब्द है। "ग़ज़ल” शब्द क्रियापद का मूलरूप है जिस का शाब्दिक अर्थ है, "The talk and actions and circumstances, occurring between the lover and the object of love.” "ग़ज़ल” संज्ञा का नाम के रूप में भी प्रयोग होता है और जब नाम "Noun” के रूप में उस का प्रयोग होता है तब वह ग़ज़ल काव्यस्वरूप को दर्शाता है।

इसी तरह "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द भी "ग़ज़ल” शब्द से ही बना है। "तग़ज़्ज़ुल” शब्द "तफ़व्वुल” (تفول)के वज़्न पर है। "तग़ज़्ज़ुल” का शाब्दिक अर्थ है, "To sport, To dally, To hold, amours talk with (lover’s), Erotic verses.” जो कि यह सामान्य अर्थ है। बाद में इस शब्द का उपयोग पारिभाषिक रूप में होने लगा। काव्यशास्र में मूलत: इश्क़िया- प्रेम और शृगार के तत्व हों उसे तग़ज़्ज़ुल कहा जाने लगा। जो ग़ज़ल का सही रंग है। इस चर्चा से स्पष्ट हुआ होगा कि "ग़ज़ल” से ही तग़ज़्ज़ुल और मुग़ाज़ेलत शब्द बने हैं। तग़ज़्जुल या मुग़ाज़ेलत से "ग़ज़ल” शब्द बना यह गुजराती शोधकर्ताओं का भ्रम है।

(1993 में पब्लिश्ड़ मेरी गुजराती किताब ‘ग़ज़ल:स्वरूपविचार’ के एक पन्ने का अनुवाद – शकील क़ादरी)

+ कहीं हिन्दी हिज्जे की ग़लती हो तो बताने की कृपा करें।

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