Posted by: Bagewafa | ستمبر 10, 2017

ग़ज़ल के संदर्भ में प्रचलित कथाओं की सच्चाई क्या है ?….. शकील क़ादरी

ग़ज़ल के संदर्भ में प्रचलित कथाओं की सच्चाई क्या है ?….. शकील क़ादरी

 

 

ग़ज़ल साहित्यस्वरूप के उद्भ़व के संदर्भ में एक कथा का उल्लेख बार बार किया गया है, और वो इस तरह प्रस्तुत किया गया है, ” ग़ज़ल का जन्म प्रेम-चर्चा के लिये ही हुआ था। अरब में ग़ज़ल नाम का एक आदमी था जिसने अपना समग्र जीवन इश्क़बाज़ी में व्यतित किया था। वह हंमेशा इश्क़ और सौंदर्य की ही बातें किया करता था और उसी विषय के शे’र पढ़ा करता था। तब से जिस कविता में प्रेम और सोंदर्य का उल्लेख हो एसी कविता को लोग उस आदमी की याद में ग़ज़ल कहने लगे।”

इस कथा का उल्लेख रामनरेश त्रिपाठीने अपनी पुस्तक ‘कविता कौमुदी”, कृष्णलाल मो. झवेरीने अपने संपादन "गुजरातनी ग़ज़लो”, मुकुंदलाल मुन्शीने "उत्तर भारत सांस्कृतिक संघ” की मुख पत्रिका "उत्तरा” और डॉ. रशीद मीरने अपने महानिबंध "१९४२ पछीनी गुजराती ग़ज़लनी सौंदर्य मीमांसा” में किया है। मगर किसीने भी इस कथा का स्रोत नहीं बताया है। यह कथा अरबी, फ़ारसी या उर्दू के किस पुस्तक में दर्ज है यह भी उल्लेख नही किया है। अरबी भाषा के किसी भी प्रतिष्ठित शब्द कोश में भी ग़ज़ल के बारे में एसा कोई संदर्भ नहीं मिलता। इस लिये यह कथा किसी के दिमाग़ की उपज लगती है। यह आदमी किस शह्र का था इस संदर्भ भी इन विद्वानों में मतभेद है। मुकुंदलाल मुन्शीने लिक्खा है कि वह पश्चिम एशिया में हुआ था। इन चारों लेखकों में से किसीने यह भी नहीं बताया है कि वह किस साल में हुआ था। यही कारण है कि यह कथा बिलकुल विश्वास करने योग्य नहीं है। इस संदर्भ में ग़ज़ल غزل की तरह लिक्खे जाने वाले शब्दों की जानकारी होना ज़रूरी है। क्यूँ कि अरबी में ग़ज़ल غَزَل और ग़ज़िल غَزِل यह दोनों शब्द लिखने के तीन वर्णों का ही उपयोग होता है। कभी मात्रा चिह्न नहीं भी दर्शाए जाते। इसी कारण अरबी, उर्दू नहीं जानने वाले अर्थ का अनर्थ कर बैठते हैं।

जैसे غزل ग़ज़ल का एक अर्थ "ऊन का ताना” भी होता है। वह भी लिक्खा ग़ज़ल غزل ही जाता है मगर जब "ज़” "ز” के उपर अरबी में हलचिह्न लगा दें तो वह ग़ज़्ल غَزْل हो जायेगा और उस का अर्थ होगा "ऊन कांतना”। अगर "ज़” के नीचे ह्रस्व "इ” की मात्रा ( ِ ) लगा दें तो ग़जिल غزل हो जायेगा और उस के अर्थ "औरतों से बातें करना / इश्क़ब़ाज़ी करना और इश्क़ब़ाज़ी करने वाला या वो आदमी जो हर चीज़ में कमज़ोर हो” भी होंगे। उसे ग़जील غَزِیل भी कहा जाता है। और यह "ग़ज़ील” शब्द किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं है। यह हर उस व्यक्ति के लिये इस्तेमाल होता है जो इश्क़बाज़ी करता हो या हर चीज़ में कमज़ोर हो। दूसरी बात यह है कि अरब में आम तौर पर लिखते और बोलते वक़्त व्यक्ति के नाम के साथ उस के पिता का भी नाम लिया जाता है, जैसे अरबी अरूज़ लिखने वाले ख़लील इब्ने अहमद, अरब का शाइर याअरब बिन कहेतान…इत्यादि। इस कारण किसी व्यक्तिविशेष का नाम "ग़ज़ल” नहीं हो यह संभावना नहीं है। इस संदर्भ में जब मैं ने संशोधन किया तो खुल कर एक बात यह सामने आई कि अल-ग़ज़ील उपनामधारी एक आदमी ई.स. ८४० में जेन में हुआ था जिस का सही नाम याह्या बिन बक़्री था। वह अत्यंत युवान और ख़ूबसूरत था इस लिये लोग उसे "अल-ग़ज़ीलالغَزِیل कहेते थें, ग़ज़ल غَزَل नहीं। यह आदमी न तो शाइर था और न तो इश्क़बाज़ी करने वाला। सिर्फ़ सौंदर्यवान था। इस व्यक्ति का ग़ज़ल काव्यस्वरूप से कोई संबंध नहीं मिलता। दूसरी महत्व की बात साल के संदर्भ में है वह यह कि यह आदमी इस्लाम की स्थापना के लगभग दो सो साल बाद हुआ था और उस से पहले भी तग़ज़्ज़ुल, मुग़ाज़ल: और ग़ज़ल शब्द अरबी में मौजूद थें। अरब में इस्लाम से पहेले जो क़सीदे लिक्खे जाते थे उन में तश्बीब और नसीब में तग़ज़्जुल भी था ही, सिर्फ़ इरानीयोंने इसी तश्बीब और नसीब वाले हिस्से को क़सीदों से जुदा कर के उस में रदीफ़ और तख़ल्लुस शुमार कर दिये और उसे ग़ज़ल नाम दे दिया। हमें यह भी जानना चाहिये कि अरबी क़सीदों में रदीफ़ नहीं थी। इस चर्चा से स्पष्ट हो जाता है कि ग़ज़ल नाम का एक आदमी जो कविता करता था उस कविता को ग़ज़ल कहा गया यह बात एक भ्रम और कल्पित कथा है। जिस का कोई प्रमाण अरबी, फ़ारसी और उर्दू के ग़ज़ल साहित्य में मिलता नहीं है।

ग़ज़ल शब्द ओर ग़ज़ल के स्वरूप के उदभव की इस चर्चा के बाद गुजराती, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में जो व्याख्याएं की गई हैं उन के बारे विश्लेषण किया जायेगा।

(शकील क़ादरी की १९९३ में प्रकट हुई गुजराती भाषा की किताब "ग़ज़ल:स्वरूपविचार से यह हिन्दी अनुवाद किया गया है।)

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