Posted by: Bagewafa | فروری 2, 2018

आज से पचास साल पहेली की मोहंमद अल्वी की एक ग़ज़ल: शहरो में

आज से पचास साल पहेली की मोहंमद अल्वी की एक ग़ज़ल: शहरो में

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अब वो रौनक़ न रही शहरो में  

ज़िंदगी तल्ख़ हुई शहरो में  

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चारसू फैल गया सन्नाटा

ख़ामशी दौड़ गई शहरो में  

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किस लिये गाँव  लोग आते हैं

जाने क्या बात हुई शहरो में  

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तुम भी यूसुफ़ हो चले जाओ ना

हुस्न बिकता है अभी शहरो में  

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अब भी घुंघरू की सदा आती है

रात के वक्त कईं शहरो में  

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शाम होते ही उतर आती है

आज भी लालपरी शहरो में  

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भूक ने साथ न छोड़ा ‘अल्वी’

भीक तक भी न मिली शहरो में  

 

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