Posted by: Bagewafa | اپریل 8, 2018

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?….. हुसैन हैदरी

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?….. हुसैन हैदरी

 

सड़क पर सिगरेट पीते वक़्त जो अजां सुनाई दी मुझको

तो याद आया के वक़्त है क्या और बात ज़हन में ये आई

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

मैं शिया हूं या सुन्नी हूं, मैं खोजा हूं या बोहरी हूं

मैं गांव से हूं या शहरी हूं, मैं बाग़ी हूं या सूफी हूं मैं क़ौमी हूं या ढोंगी हूं

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

मैं सजदा करने वाला हूं, या झटका खाने वाला हूं

मैं टोपी पहनके फिरता हूं, या दाढ़ी उड़ा के रहता हूं

मैं आयत कौल से पढ़ता हूं, या फ़िल्मी गाने रमता हूं

मैं अल्लाह अल्लाह करता हूं, या शेखों से लड़ पड़ता हूं

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

दकन से हुं,यु.पी से हुं,भोपालसे हुं,

दिल्हीसे हुं बंगाल से हुं

गुजरात से हुं,हर उंची नीची जात से हुं.

में ही जुलाहा मोची भी,

में दाकटर भी,दरजी भी

”मुझमें गीता का सार भी है

एक उर्दू का अखबार भी है

मेरा एक महीना रमजान भी है

मेंने किया गंगा स्नान भी है

अपने ही तौर से जीता हुं

दारु,सीगरेट भी पीता हुं

कोई नेता मेरी नस नस में नही

में कीसीके बस में नहीं

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

खूनी दरवाजा मुझमें है

भूल भुलैया मुझमें है

में बाबरीका एक गुंबद हुं

में शहरकी बीच में सरहद हुं

झुग्गियों में पलती गुरबत में

मद्रसों की तूती छ्त में

दंगो में भदकता शोला में

कुर्सीपर खून का धब्बा में

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

मंदिरकी चोखत मेरी है मस्जिदके किब्ले मेरे है

गुरुद्वारका दरबार मेंरा,इसु के गिरजे मेरे है

सौ में से 14 हूं लेकिन

14 ये कम नहीं पड़ते हैं

मैं पूरे सौ में बसता हूं

पूरे सौ मुझमें बसते हैं”

मुझे एक नजर से देख न तु

मेरे एक नही सो चहेरे है

सो रंग के किरदार है मेरे

सो कलम से लीखी कहाँनी मेरी 

में जीतना मुसलमां भाई

इतना हिंदुस्तानी हुं

और इसके आगे जो जवाब आया उसे जहनियत से सुनें, दिलों में बस चुकी हर उस आवाज को निकाल कर सुनें जो कहती है कि हर मुसलमां आतंकवादी है, क्योंकि…

…ये हिंदुस्तानी मुसलमां हैं.

 

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