Posted by: Bagewafa | جولائی 12, 2018

अनकहा इतिहास : अंग्रेजों की सबसे पहली लड़ाई उलेमा-ए-किराम के साथ

अनकहा इतिहास : अंग्रेजों की सबसे पहली लड़ाई उलेमा-ए-किराम के साथ

By Pradesh Hindi August 16, 2016

यह लेख जंगे आजादी का आगाज और मुसलमान उलेमा-ए-किराम का अहम किरदार की दूसरी कड़ी है।

सोलहवीं शताब्दी के खत्म होते होते अंग्रेजी सौदागर हिन्दुस्तान में पहुंच चुके थे। 31 दिसम्बर 1600 में क्वीन एलिजाबेथ की इजाजत से 100 सौदागरों ने 30000 पाउंड की रकम लगाकर East India Company की शुरुआत किया। पश्चिम बंगाल को कंपनी ने अपना हेडक्वॉर्टर बनाया और 150 साल तक अपनी सारी तवज्जो व्यवसाय में लगाया।

लेकिन जब औरंगजेब और मोहम्मद आजम शाह के बाद मुग़ल सल्तनत की बुनियाद कमजोर पड़ गई तो कंपनी ने अपना मुखौटा उतार फेंका और हुकूमत के निजाम में दखल अंदाजी शुरू कर दी।

 1757 में नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ पलासी की जंग में अंग्रेज़ी सेना खुल्लमखुल्ला मैदान में उतर आए और गद्दार मिर्जाफर की मदद से नवाब सिराजुद्दौला पराजित किया और पूरे बंगाल पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। फिर 1764 में अंग्रेजों के खिलाफ नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजय मिली और बिहार व बंगाल अंग्रेज के चपेट में चली गई। 1792 में टीपू सुल्तान के शहादत के बाद अंग्रेजों ने मैसूर पर कब्जा कर लिया। 1849 में पंजाब भी कंपनी के कब्जे में आ गया। इसतरह सिंध, आसाम, बर्मा, औध, रोहैलखन्ड, दक्षिणी भाग, अलीगढ़, उत्तरी भाग, मद्रास, पांडिचेरी, वगैरह अंग्रेजों के चपेट में आ गया और फिर वह वक्त भी आ गया जब दिल्ली पर भी कंपनी की हुकूमत कायम हो गई और मुग़ल बादशाह का सिर्फ़ नाम रह गया। इन इलाकों पर कब्जा जमाने के लिए अंग्रेजों ने क्या क्या तरकीबें अपनाया एनी बेसंत की जबानी सुनिए

"कंपनी वालों की लड़ाई सिपाहियों की लड़ाई न थी बल्कि सौदागरों की लड़ाई थी। हिन्दुस्तान को इंग्लिस्तान ने अपने तलवार से फतेह न किया बल्कि खुद हिन्दुस्तानियों के तलवार से और रिश्वतखोरी व साजिश, पाखंडता और दोरुखी पालिसी पर अमल कर के एक दूसरे से लड़ाकर उसने यह मुल्क हासिल किया है। "

(हिन्दुस्तान की कोशिश आजादी के लिए : 56)

मुल्क में ईस्ट इंडिया कंपनी के फैलती हुई जाल और बढ़ती हुई प्रभाव को सबसे पहले अगर किसी ने महसूस किया तो वह हजरत मौलाना शाह वलियूल्लाह देहलवी थें जिन्होंने देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीनने वाली हुकूमत को दरहम बरहम करने का खुफिया मिशन तैयार किया। उनके बनाए हुए मिशन के मुताबिक उनके बड़े बेटे मौलाना शाह अब्दुल अजीज देहलवी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का मुनज्जम आगाज किया और अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद फर्ज़ होने का फतवा जारी किया। यह फतवा मुल्क के कोने-कोने में जंगल के आग की तरह फैल गया।

1818 में जनता के तैयार करने के लिए मौलाना सैयद अहमद शहीद, मौलाना इस्माइल देहलवी, और मौलाना अब्दुल हई बुढानवी के परामर्श में एक दल गठित किया गया जिसने देश के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचकर लोगों को धार्मिक और राजनीतिक तौर पर जागरूक की, फिर अंग्रेजों से जिहाद के लिए 1820 / में मौलाना सैयद अहमद शहीद राय बरेलवी के नेतृत्व में मुजाहिदीन को रवाना किया गया, उन्होंने युद्ध की विशेषताओं के आधार पर जिहाद का केंद्र सूबा सरहद को बनाया, उद्देश्य अंग्रेजों से जिहाद था लेकिन पंजाब के राजा अंग्रेजों के वफादार थे, जिहाद के विरोधी थे और उसे विफल करने के उपाय कर रहे थे इसलिए पहले हजरत सैयद अहमद शहीद ने उन्हें संदेश भेजा कि "तुम हमारा साथ दो, दुश्मन (अंग्रेजों) के खिलाफ युद्ध करके हम देश तुम्हारे हवाले कर देंगे, हम देश व माल के तलबगार नहीं”। लेकिन राजा ने अंग्रेज की वफादारी न छोड़ें तो उससे भी जिहाद किया गया। 1831 / में बालाकोट के क्षेत्र में हज़रत मौलाना सैयद अहमद राय बरेलवी ने जाम शहादत को नोश किया, मगर उनके अनुयायियों ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि देश के विभिन्न पक्षों में अंग्रेज के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। 1857 /के युद्ध के लिए सैयद साहब के अनुयायियों ने फिजा प्रशस्त करने और फौज तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1857 / के स्वतंत्रता संग्राम में उलेमा-ए-किराम ने बाकायदा युद्ध में भाग लिया, यह उलेमा-ए-किराम हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी, हजरत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी और हज़रत सैयद अहमद शहीद के स्वर्ण चेन के स्वर्ण कड़ी थे। इस युद्ध के लिए उलेमा-ए-किराम ने जनता को जिहाद के लिए प्रोत्साहन दिलाने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में वाज और भाषण का बाजार गर्म कर दिया और जिहाद पर उभारने का कर्तव्य अंजाम दिया तथा एक सर्वसम्मत फतवा जारी करके अंग्रेजों से जिहाद को फर्जे ऐन ठहराया । इस फतवे ने जलते पर तेल का काम किया और पूरे देश में स्वतंत्रता की आग भड़क उठी, अकाबिर उलेमा देवबंद ने शामली के क्षेत्र में युद्ध में खुद भाग लिया। हज़रत मौलाना कासिम नानोतवी हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही और हाफिज जामिन शहीद ने हज़रत  हाजी इमदाद उल्लाह मुहाजीर मक्की के हाथ पर बैअत जिहाद की , फिर तैयारी शुरू कर दी गई, हज़रत हाजी साहब को इमाम बनाया गया, मौलाना मुनीर नानोतवी को सेना के दायें हाथ का और हाफिज जामिन थानवी को बायें बाजु का अधिकारी नियुक्त किया गया। मुजाहिदीन ने पहला हमला शेर अली सड़क पर अंग्रेजी सेना पर किया और माल व असबाब लूट लिया, दूसरा हमला 14 / सितंबर 1857 / को शामली (जानिए शामली युद्ध के अनकहे सच) में किया और जीत हासिल की, जब खबर आई कि तोब खाना सहारनपुर से शामली को भेजा गया है तो हज़रत हाजी साहब ने मौलाना गंगोही को चालीस पचास मुजाहिदीन के साथ कर दिया, सड़क बगीचे के किनारे से गुज़रती थी, मुजाहिदीन बगीचे में छिपे थे जब पलटन वहाँ से गुज़री तो मुजाहिदीन ने एक साथ फायर कर दिया, पलटन घबरागई और तोपखाना छोड़कर भाग गई। इसी अभियान में हाफिज जामिन थानवी साहब  शहीद हुए, सैयद हसन अस्करी साहब को सहारनपुर लाकर अंग्रेजों ने गोली मार दी। मौलाना रशीद अहमद साहब गंगोही मुजफ्फरनगर जेल में डाल दिए गए और मौलाना मुहम्मद कासिम साहब नानूतवी आगामी रणनीति तय करने के लिए अंडरग्राउंड चले गए।

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