Posted by: Bagewafa | اگست 21, 2018

बहावलपुर की अंग्रेज अदालत में मौलाना हुसेन अहमद मदनी….कदीर जाकिर

हावलपुर की अंग्रेज अदालत में मौलाना हुसेन अहमद मदनी….कदीर जाकिर

 

“हुसैन अहमद मदनी जब देवबंद से चला था तो अपना कफ़न साथ लेकर चला था

 एक मर्द-ए-मुजाहिद,मर्द-ए-कलंदर भरी अदालत में खड़ा हुआ है।“

 उस मर्द-ए-मुजाहिद ने अपना ख़िताब शुरू किया और भरी अदालत में बुलंद आवाज़ से कहा-

अंग्रेज़ की फ़ौज में दाख़िल होना हराम है,हराम है,हराम है।

 मौलाना जौहर उस मर्द-ए-मुजाहिद के पैरों में गिर पड़े और गिरकर कहा हज़रत बयान बदल दो लेकिन उस मर्द-ए-मुजाहिद की ज़बान से जो लफ़्ज़ निकले वो कमान से निकले हुए तीर की तरह थे जो कभी भी वापस नही आ सकते थे।

जानते हो वो मर्द-ए-मुजाहिद,मर्द-ए-कलंदर कौन था?

वो मर्द-ए-मुजाहिद थे शैख़ उल अरब वल अज्म हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी नवारल्लाहु मर्क़दह।

 अंग्रेज़ अफ़सरान को मर्द-ए-मुजाहिद मौलाना हुसैन अहमद मदनी के ख़िताबी फ़तवे पर गुस्सा आ गया।

 अंग्रेज़ अफ़सर कहने लगा हुसैन अहमद तुझे मालूम है इस गुस्ताख़ी की सज़ा क्या है?

मौलाना मदनी ने जवाब दिया तू ख़ुद ही तय कर ले।

 अंग्रेज़ अफ़सर फ़िर बोला कि इस गुस्ताख़ी की सज़ा सिर्फ़ मौत है।

 मौलाना मदनी ने अपने कांधे पर रखी सफ़ेद चादर को हवा में लहराया और कहा-

हुसैन अहमद मदनी जब देवबंद से चला था तो अपना कफ़न साथ लेकर चला था,

ऐ ख़्वार अंग्रेज़ ज़ालिम हुसैन अहमद तेरी धमकियों से डरने वाला नही है।

 मैंने जो कहा था वो दोबारा कहता हूँ अंग्रेज़ तेरी फ़ौज में शामिल होना हराम है,हराम है,हराम है।

 सन 1954 में हुक़ूमत-ए-हिन्दोस्तान ने मौलाना मदनी को पद्म भूषण से सम्मानित किया।

 सन 2012 में हज़रत मौलाना की नाम पर भारतीय डाक सेवा द्वारा एक डाक टिकट जारी किया गया।

 हज़रत मदनी जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली के फाउंडर मेम्बर में से एक थे।

 तेहरीक़ रेशमी रुमाल चलाने की सज़ा में वो अपने उस्ताद शैख़-उल-हिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन रह. के साथ माल्टा की जेल में रहे।

 उन्हें अपने उस्ताद के साथ असीर-ए-माल्टा का लक़ब भी मिला।

ये आज़ादी हमें यूँही ही नही मिली है,इस पर हज़रत शैख़ उल हिन्द,हज़रत शैख़ उल अरब वल अज्म,हज़रत हक़ीम-उल-उम्मत,हज़रत गंगोही,हज़रत नानौतवी,अल्लामा रहमतुल्लाह कैरानवी, अल्लामा शब्बीर अहमद उस्मानी,मुफ़्ती शफ़ी उस्मानी,मौलाना हिफ्ज़ुर्रहमान स्योहारवी, अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी,अमीर-ए-शरीयत शाह अताउल्लाह शाह बुख़ारी,उबैदुल्लाह सिंधी,मौलाना मोहम्मद अली जौहर,मौलाना शौकत अली,मौलाना मज़हर अली अज़हर और तमाम बड़े बड़े मुफ़्ती,मौलाना,मशाइख़ की कुर्बानियां लगी है।

 आज कितने हमारे भाई, दोस्त ऐसे है जिन्हें अपने इन बुज़ुर्गो,वलियो के नाम तक नही मालूम है।

 आज़ादी के ज़श्न का मौक़ा आता है,हम भगत सिंह की बात करते है,हम गांधी की बात करते है,हम चंद्र शेखर आज़ाद की बात करते है,हम मंगल पांडेय की बात करते है लेकिन हम अपने उन नायाब हीरो को भूले पड़े है जिन्होंने हमे आज़ाद देखने के लिए,इस वतन को आज़ाद देखने के लिए अपनी और अपने साथ लाखो उलेमाओं की जान की कुर्बानियां पेश की थी।

 सबसे पहले अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ जिहाद का फ़तवा सन 1803 में शाह अब्दुल अजीज़ देहलवी व तमाम बड़े उलेमाओ ने दिया था।

 सन 1857 में हाजी इम्दादुल्लाह मुहाजिर मक़्क़ी की क़यादत में अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ एक जंग लड़ी गई जिसमें हज़ारो लाखो उलेमाओ ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।

 आइये इस बार ज़श्न-ए-आज़ादी के मौके पर अपने उन असल आज़ादी के दीवानो को याद करें जिन्होंने हमे असल आज़ादी दिलाई है।

 सलाम पेश करिए,खिराज़-ए-अक़ीदत पेश करिए ऐसे तमाम परवानो को।

उलेमा-ए-हक़ ज़िंदाबाद जिंदाबाद

 नौमान चौधरी via Shadab Aalam Qureshi

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