Posted by: Bagewafa | نومبر 22, 2018

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं— क़तील शिफ़ाई

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं— क़तील शिफ़ाई

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zहुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं

उन की सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं

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उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन

देखने वाले उसे ताजमहल कहते हैं

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वो तेरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़

पंखुड़ी को जो तेरे लब का बदल कहते हैं

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पड़ गई पाँव में तक़दीर की ज़ंजीर तो क्या

हम तो उसको भी तेरी ज़ुल्फ़ का बल कहते हैं

(अमर उजाला, काव्य डेस्क) 

 


زمرے

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