Posted by: Bagewafa | جنوری 7, 2015

बुत हम को कहें काफिर, अल्लाह की मर्जी है…..-अकबर इलाहाबादीہنگامہ ہے کیوں برپا……اکبر الہ آبادی

ہنگامہ ہے کیوں برپا……اکبر الہ آبادی

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ہنگامہ ہے کیوں برپا تھوڑی سی جو پی لی ہے
ڈاکہ، تو نہیں ڈالا، چوری، تو نہیں کی ہے

نا تجربہ کاری سے واعظ کی یہ باتیں ہیں
اس رنگ کو کیا جانے، پوچھو تو کبھی پی ہے؟

اس مے سے نہیں مطلب، دل جس سے ہے بیگانہ
مقصود ہے اس مے سے دل ہی میں جو کھنچتی ہے

ہر ذرہ چمکتا ہے انوارِ الٰہی سے
ہر سانس یہ کہتی ہے ہم ہیں تو خدا بھی ہے

سورج میں لگے دھبہ فطرت کے کرشمے ہیں
بت ہم کو کہیں کافر، اللہ کی مرضی ہے

बुत हम को कहें काफिर, अल्लाह की मर्जी है…..-अकबर इलाहाबादी

हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

ना तजरुबे-कारी से वाएज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है !

उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे है बेगाना
मक़सूद है उस मय से दिल ही में जो खींचती है

ऐ शौक़ वही मय पी, ऐ होश ज़रा सो जा
मेहमान नज़र इस दम एक बर्क-ए-तजल्ली है

वां दिल में की सदमे दो, याँ जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है, अनवार-ए-इलाही से
हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा फितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफिर, अल्लाह की मर्जी है

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