मोदी सरकार को अबुतालिब रहमानी का पैगाम // Minority Media Centre

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अभिसार शर्मा का खौफ, Debate में नहीं आया BJP का प्रवक्ता, रेप के आरोपी BJP विधायक पर थी DEBATE

 

Judge Loya: अमित शाह ने क्या रविभवन में नई चाल खेली?…Rising Rahul

 

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟۔۔۔۔۔حسین حیدری

سڑک پر سگریٹ پیتے وقت جو اذاں سنائی دی مجھ کو

تو یاد آیا کے وقت ہے کیا اور بات ذہن میں یہ آئی

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟

میں شیعہ ہوں یا سنی ہوں، میں خوجہ ہوں یا بوہری ہوں

میں گاؤں سے ہوں یا شہری ہوں، میں باغی ہوں یا صوفی ہوں میں قومی ہوں یا ڈھونگی ہوں

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟

میں سجدہ کرنے والا ہوں، یا جھٹکا کھانے والا ہوں

میں ٹوپی پہن کے پھرتا ہوں، یا داڑھی اڑا کے رہتا ہوں

میں آیت قول سے پڑھتا ہوں، یا فلمی گانے رمتا ہوں

میں اللہ اللہ کرتا ہوں، یا شیخوں سے لڑ پڑتا ہوں

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟

میں ہندوستانی مسلماں ہوں

دکن سے ہوں،یوپی۔ سے ہوں ،بھوپال سے ہوں،

دلہی سے ہوں بنگال سے ہوں

گجرات سے ہوں،ہر اونچی نیچی جات سے میں ہندوستانی مسلمان ہوں

دکن سے ہوں،یو۔ سے ہوں،بھوپالسے ہوں ،

دلہی سے ہوں بنگال سے ہوں

گجرات سے ہوں،ہر اونچی نیچی جات سے ہوں ۔

میں ہی جلاہا موچی بھی،

میں داکٹر بھی،درجی بھی

”مجھ میں گیتا کا سار بھی ہے

ایک اردو کا اخبار بھی ہے

میرا ایک مہینہ رمضان بھی ہے

مین نے کیا گنگا سنان بھی ہے

اپنے ہی طور سے جیتا ہوں

دارو،سیگریٹ بھی پیتا ہوں

کوئی نیتا میری نس نس میں نہی

میں کیسی کے بس میں نہیں

میں ہندوستانی مسلماں ہوں

خونی دروازہ مجھ میں ہے

بھول بھلییا مجھ میں ہے

میں بابری کا ایک گنبد ہوں

میں شہر کی بیچ میں سرحد ہوں

جھگیوں میں پلتی غربت میں

مدرسوں کی طوطی چھت میں

دنگو میں بھڑکتا شولہ میں

کرسی پر خون کا دھبہ میں

میں ہندوستانی مسلمان ہوں

مندر کی چوکھت میری ہے مسجد کے قبلے میرے ہے

گردوارکا دربار مینرا،ایسو کے گرجے میرے ہے

سو میں سے 14 ہوں لیکن

14 یہ کم نہیں پڑتے ہیں

میں پورے سو میں بستہ ہوں

پورے سو مجھ میں بستے ہیں”

مجھے ایک نظر سے دیکھ نہ تو

میرے ایک نہی سو چہیرے ہے

سو رنگ کے کردار ہے میرے

سو قلم سے لیکھی کہانی میری

میں جتنا مسلماں ہوں بھائی

اتنا ہندوستانی ہوں۔

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?….. हुसैन हैदरी

 

सड़क पर सिगरेट पीते वक़्त जो अजां सुनाई दी मुझको

तो याद आया के वक़्त है क्या और बात ज़हन में ये आई

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

मैं शिया हूं या सुन्नी हूं, मैं खोजा हूं या बोहरी हूं

मैं गांव से हूं या शहरी हूं, मैं बाग़ी हूं या सूफी हूं मैं क़ौमी हूं या ढोंगी हूं

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

मैं सजदा करने वाला हूं, या झटका खाने वाला हूं

मैं टोपी पहनके फिरता हूं, या दाढ़ी उड़ा के रहता हूं

मैं आयत कौल से पढ़ता हूं, या फ़िल्मी गाने रमता हूं

मैं अल्लाह अल्लाह करता हूं, या शेखों से लड़ पड़ता हूं

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

दकन से हुं,यु.पी से हुं,भोपालसे हुं,

दिल्हीसे हुं बंगाल से हुं

गुजरात से हुं,हर उंची नीची जात से हुं.

में ही जुलाहा मोची भी,

में दाकटर भी,दरजी भी

”मुझमें गीता का सार भी है

एक उर्दू का अखबार भी है

मेरा एक महीना रमजान भी है

मेंने किया गंगा स्नान भी है

अपने ही तौर से जीता हुं

दारु,सीगरेट भी पीता हुं

कोई नेता मेरी नस नस में नही

में कीसीके बस में नहीं

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

खूनी दरवाजा मुझमें है

भूल भुलैया मुझमें है

में बाबरीका एक गुंबद हुं

में शहरकी बीच में सरहद हुं

झुग्गियों में पलती गुरबत में

मद्रसों की तूती छ्त में

दंगो में भदकता शोला में

कुर्सीपर खून का धब्बा में

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

मंदिरकी चोखत मेरी है मस्जिदके किब्ले मेरे है

गुरुद्वारका दरबार मेंरा,इसु के गिरजे मेरे है

सौ में से 14 हूं लेकिन

14 ये कम नहीं पड़ते हैं

मैं पूरे सौ में बसता हूं

पूरे सौ मुझमें बसते हैं”

मुझे एक नजर से देख न तु

मेरे एक नही सो चहेरे है

सो रंग के किरदार है मेरे

सो कलम से लीखी कहाँनी मेरी 

में जीतना मुसलमां भाई

इतना हिंदुस्तानी हुं

और इसके आगे जो जवाब आया उसे जहनियत से सुनें, दिलों में बस चुकी हर उस आवाज को निकाल कर सुनें जो कहती है कि हर मुसलमां आतंकवादी है, क्योंकि…

…ये हिंदुस्तानी मुसलमां हैं.

 

چلنا نہ آئے گا۔۔۔۔محمد خلیل الرحمان،خلیل

Posted by: Bagewafa | اپریل 4, 2018

रोटी और संसद – धूमिल

रोटी और संसद – धूमिल

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ–

‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’

मेरे देश की संसद मौन है।

क्या मोदी इस्राइल ‘मोसद’ के एजेंट हैं?… Azamgarh Express(Facebook)

ख़ास खबर गुजरात मुस्लिम नरसंहार पर विशेष: क्या मोदी इस्राइल ‘मोसद’ के एजेंट हैं?… Azamgarh Express(फ़केबूक)

  गुजरात मुस्लिम नरसंहार पर विशेष: क्या मोदी इस्राइल ‘मोसद’ के एजेंट हैं? पढ़ें अमरीश मिश्रा की रिपोर्ट

क्या भारत का प्रधानमन्त्री, ईज़राइल की गुप्तचर एजेन्सी ‘मोसाद’ का एजेंट है? जानिये 2002 गुजरात नरसंघार के दौरान, एहसान जाफरी की हत्या के पीछे की अनोखी साज़िश!

गुजरात नरसंहार पर विशेष: एहसान जाफरी के मरने के पहले मोदी जानते थे कि जाफरी को कैसे मारा जायेगा! इस लेख को पड़कर दिल दहल जाएगा, क्या…?

अहमदाबाद 28 फरवरी 2002 2 बजे के थोडा पहले..प्रदेश के डेप्युटी कमिश्नर Sanjiv Bhatt चिंतित थे…गोधरा रेल ‘हादसे’ के बाद (‘हादसा’ इसलिये क्यूंकि अब कुछ कट्टर भाजपा समर्थको को भी लग रहा है कि कारसेवको को ले जा रही बोगी मे आग भीतर से लगाई गई थी ना कि बाहर से मुसलमानो द्वारा.

पूरे अहमदाबाद और गुजरात मे सुनियोजित हमले भड़क चुके थे। मुस्लिम पुरुषो की बड़े पैमाने पर हत्या, मुस्लिम औरतो का बलात्कार और हत्या, मुस्लिम माओंं के गर्भ से बच्चोंं को चीर कर निकाल देना, मुस्लिम इलाको मे पानी भरकर उसके निवासियो को बिजली फैलाकर मारना…अच्छी तरह से तैयार, विहिप, बीजेपी, संघ और बजरंग दल के लोगो के संगठित समूह निर्मम तरीके से जघ्यन्ता पर उतर आये थे.

हथियार,पेट्रोल बम, साइकिल चेन, और तलवारो से लैस एक बड़ी भीड गुलबर्ग सोसायटी के चारो तरफ जमा हो चुकी थी और नारे लगा रही थी। इस सोसायटी मे एक असाधारण कवि, गंगा जमुनी तहजीब के नुमाइंदे और पूर्व कांग्रेस एमपी एहसान जाफरी का घर था.

जाफरी 1977 मे इंदिरा गांधी-विरोधी लहर के बावजूद, अहमदाबाद से लोक सभा चुनाव जीते थे। पर आज जाफरी शत्रुओंं से घिरे हुये थे। वह पहले भी साम्प्रदायिक दंगे झेल चुके थे, एक बार उनका घर भी जला दिया गया था।

पहले भी झेल चुके थे सांप्रदायिक दंगे

गुलबर्ग सोसायटी मे आने के बाद उन्होने 1980s के उत्तरार्ध मे दक्षिणपंथियो द्वारा प्रायोजित, साम्प्रदायिक दंगे देखे थे। फिर भी जाफरी को भारत की मिली जुली संस्कृति और इंडिया के लॉ ऐण्ड आर्डर पर पूरा भरोसा था। वह एक प्रगतिशील व्यक्ति और एक उदार मुसलमान थे.

जाफरी के कई पड़ोसी और पास की झुग्गी झोपड़ियों से तमाम मुस्लिम उनके यहाँ सुरक्षा की तलाश मे इस उम्मीद मे आये हुये थे कि पूर्व एमपी होने के नाते वो वहाँ सुरक्षित रहेंगे। जाफरी की पत्नी ज़किया जाफरी ने बाद मे मीडिया को बताया कि “उन्होने (एहसान जाफरी ने) मदद के लिये 100 से भी ज्यादा फोन काल किये थे.

गुजरात डीजीपी, अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर, प्रदेश मुख्य सचिव और दर्जनो और लोगोंं से मदद की गुहार लगायी। गुलबर्ग हत्याकांड से बचे एक गवाह ने भी बाद मे कोर्ट को बताया कि जाफरी ने सीएम नरेंद्र मोदी को भी फोन किया था.

“जब मैने उनसे पूंछा कि मोदी ने क्या कहा तो उन्होने (जाफरी) उत्तर दिया कि उसने मदद के बजाय गालियाँ दी”। डरे हुये जाफरी ने यहाँ तक कि उस समय दिल्ली, डेप्युटी पीएम लालकृष्ण आडवाणी को भी काल किया.

मोदी के एक भाजपाई करीबी जो उस दिन आडवाणी के साथ ही थे ने बाद मे प्रेस को बताया कि कैसे भाजपा नेता ने खुद मोदी के आफिस मे जाफरी के लिये फोन किया।

जानबूझ कर बनाया गया निशाना

करीब 2.30 PM तक पागल भीड गुलबर्ग सोसायटी का गेट तोडकर अंदर घुस चुकी थी। जाफरी के घर के बाहर एक बडी भीड़ जमा थी। वे औरतो का बलात्कार कर रहे थे और फिर उन्हे ज़िन्दा जला रहे थे। आदमियो को टुकड़ों मे काट रहे थे, बच्चो को भी नही बख्श रहे थे.

बाद मे कोर्ट मे जमा किये गये दस्तावेज़ों के अनुसार जाफरी को हमलावरो ने उनकी उंगलियाँ और टांग काटने के पूर्व, नंगा कर घुमाया…और फिर उनके शरीर को एक जलते चिता मे झोंक दिया। पुलिस की आफिशियल रिपोर्ट के अनुसार गुलबर्ग सोसायटी मे करीब 59 लोगो की हत्या हुई थी.

स्वतंत्र जांच के अनुसार करीब 69 या 70 लोग मारे गये। जाफरी की पत्नी ज़किया और कुछ अन्य लोग, जिन्होने खुद को ऊपरी कमरे मे खुद को बंद कर लिया था, बच गये। बाद मे, मोदी ने दावा किया कि उन्हे गुलबर्ग सोसायटी के बारे मे कोई जानकारी तब तक नही थी जब तक कि उन्हे पुलिस अधिकारियो ने शाम को नही बताया.

मोदी को सारी साजिश का पता था, साजिश कहीं और रची गयी थी

मोदी ने झूठ बोला! उस दिन खुद संजीव भट्ट ने मोदी को 2 बजे के पहले ही कई बार फोन किया था और बताया था कि गुलबर्ग सोसायटी के बाहर काफी भीड़ इकट्ठा हो गई है! अब, चिंतित भट्ट ने सीएम का सामना करने का फैसला किया.

मीटिंग के दौरान भट्ट ने मोदी से तुरंत दखल देने की अपील की परंतु मोदी का रवैया आश्चर्यचकित करने वाला था। मोदी ने पहले भट्ट को सुना और फिर बोले “संजीव, यह पता करो, कि क्या जाफरी को तड़ से (आवेश में) गोली चलाने की आदत है”? मुख्य मंत्री दफ्तर के बाहर, कारीडोर मे, संजीव भट्ट पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी और पूर्व गृह मंत्री नरेश रावल से मिले.

दोनो ही पूर्व मंत्रियो ने भट्ट से कहा कि एहसान जाफरी गुलबर्ग से फोन काल कर रहे हैं-और वो दो, मोदी से इसी सिलसिले में मिलने आये हैं। फिर, कुछ समय पश्चात, भट्ट को एक फोन आया। दूसरी तरफ से कहा गया कि जाफरी ने भीड़ पर फायर कर दिया.

जब भट्ट आफिस पहुंचे, तो उनकी टेबल पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट पड़ी थी जिसमे लिखा था कि ‘जाफरी ने आत्मरक्षा मे गोली चलाई थी’! अचानक संजीव भट्ट के दिमाग मे कौंधा–क्या मोदी को पता था कि कैसे पूरा एहसान जाफरी एपीसोड खेला जायेगा!

एहसान जाफरी का क़त्ल एक साजिश, संघ और मोसद का हाथ

असल मे एहसान जाफरी का क़त्ल एक साज़िश थी। जाफरी के कत्ल के पीछे की ताकतों मे ईज़राइल के ‘मोसाद’ का संदिग्ध था। साफ है कि जाफरी के व्यवहार का पहले ही अध्ययन किया जा जुका था। दुश्मन जानते थे कि जाफरी के पास गन थी.

राष्ट्र-विरोधी, भारत-विरोधी, दुश्मन ताक़तों ने जाफरी के कत्ल के लिये ऐसे हालात पैदा किये जिसमे या तो एहसान जाफरी अपनी गन निकालने के लिये बाध्य होंगे (खून की प्यासी भीड़ को रोकने के लिये) या फिर अगर जाफरी गन नही भी निकाले, तो भी बाद मे कहा जा सके कि जाफरी ने आत्मरक्षा मे गन निकाली थी और भीड ने इसलिये उन्हे मार डाला.

यहाँ संघ-मोसाद के शैतानी दिमाग का कारनामा देखिये–ज़किया जाफरी का कहना है कि एहसान ने कोई फायर नही किया, बल्कि खुद को भीड़ के हवाले कर दिया था, इस शर्त पर कि वे घर मे सुरक्षा के लिये जमा अन्य लोगो को जाने देंगे! इस तरह जाफरी की हत्या एक साज़िश के तहत हुई.

दिखाने के लिये एक माहौल बनाया गया कि उनकी हत्या इसलिये हुई क्योंकि उन्होने गन निकाली थी। इसी तर्क का इस्तेमाल हुआ था मोदी को क्लीन चिट देने के लिये! तो मोदी को जाफरी के मारे जाने के पहले से मालुम था कि जाफरी को कैसे मारा जायेगा! और ऐसा आदमी हमारा प्रधानमंत्री है.

लेखक अमरेश मिश्र के अपनी निजी विचार है इसका मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद: पंडित वी. एस. कुमार ने किया है. इसको लिखने पर इनको मुकद्दमे करने की धमकी भी मिल रही है. देखिये किस तरह से मोदी बीजेपी आईटी सेल वाले सच लिखने पर धमकियाँ दे रहे हैं. जिसकी लिंक निचे है। https://www.facebook.com/amaresh.misra.1/posts/917324118427371

 

आई न रास हमको _मोहम्मदअली वफा

 

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आई न रास हमको ये मौसम बहार की

 हमतो गरीब पतझड के विरां बागमें पले

 .

हमने कहां, गुल भरी कोइ शाख भी देखी,

हम तो दहकते सहराकी ये आगमें जले

 

 

 

 

آئ نہ راس ہمکو۔۔محمدعلی وفا

 

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 آئ نہ  راس  ہمکو یہ موسم  بہار  کی

 ہمتو غریب  پتجہڑکے ویراں باغ میں  پلے

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 ہمنے کہاں گل بھری کوئ شاخ بھی دیکھی

  ہم تو دہکتے صحرا  کی یہ آگ  میں  جلے

Modern Urdu Ghazal | Shamsur Rahman Faruqi and Ahmad Mahfooz | Jashn-e-Rekhta 4th Edition 2017

 

ہم امن چاہتے ہیں مگر ظلم کے خلاف۔۔۔۔۔۔۔ ساحر لدھیانوی

 

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ہم امن چاہتے ہیں مگر ظلم کے خلاف

گر جنگ لازمی ہے تو پھر جنگ ہی سہی

ظالم کو جو نہ روکے وہ شامل ہے ظلم میں

قاتل کو جو نہ ٹوکے’وہ قاتل کے ساتھ ہے

ہم سر بکف اٹھے ہیں کہ حق فتح یاب ہو

کہہ دو اسے جو لشکرِ باطل کے ساتھ ہے

اس ڈھنگ پر ہے زور’ تو یہ ڈھنگ ہی سہی

ظالم کی کوئی ذات’نہ مذہب نہ کوئی قوم

ظالم کے لب پہ ذکر بھی ان کا گناہ ہے

پھیلتی نہیں ہے شاخِ تبسم اس زمیں پر

تاریخ جانتی ہے زمانہ گواہ ہے

کچھ کور باطنوں کی نظر تنگ ہی سہی

یہ زر کی جنگ ہے نہ زمینوں کی جنگ ہے

یہ جنگ ہے بقا کے اصولوں کے واسطے

جو خون ہم نے نذر دیا ہے زمین کو

وہ خون ہے گلاب کے پھولوں کے واسطے

پُھوٹے گی صبحِ امن ‘ لہو رنگ ہی سہی

(انشا اللہ )

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हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ —–साहिर लुधियानवी

 

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 हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़

 गर जंग लाज़िमी है तो फिर जंग ही सही

ज़ालिम को जो ना रोके वो शामिल है ज़ुलम में

 क़ातिल को जो ना टोके वो क़ातिल के साथ है

हमसर ब-कफ़ उठे हैं कि हक़ फ़त्हयाब हो

 कह दो उसे जो लश्कर-ए-बातिल के साथ है

 इस ढंग पर है ज़ोर तो ये ढंग ही सही

ज़ालिम की कोई ज़ात न मज़हब न कोई क़ौम

ज़ालिम के लब पे ज़िक्र भी उनका गुनाह है

 फैलती नहीं है शाख़-ए-तबस्सुम इस ज़मीं पर

तारीख़ जानती है ज़माना गवाह है

 कुछ कौर बातिनों की नज़रतंग ही सही

 ये ज़र की जंग है ना ज़मीनों की जंग है

 ये जंग है बक़ा के उसूलों के वास्ते

 जो ख़ून हमने नज़र दिया है ज़मीन को

 वो ख़ून है गुलाब के फूलों के वास्ते

 फूटेगी सुबह-ए-अमन लहू रंग ही सही

 

कपिल सिब्बल ने बाबा रामदेव की धोती उतार दी Kapil Sibbal exposing Baba Ramdev

 

OBC बैंक में हुए 389 करोड़ के घोटाले को लेकर कांग्रेसी कपिल सिब्बल ने किया बड़ा खुलासा !

कौन है उत्तरदायी भारत विभाजन और कश्मीर समस्या के लिए? -राम पुनियानी

February 16,2018 05:25

मोदी की पार्टी के एक बड़े नेता जसवंत सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि पटेल ने परिस्थितियों के आगे झुकते हुए विभाजन को स्वीकार लिया….

हम सबको याद है कि मोदी की पार्टी के एक बड़े नेता जसवंत सिंह ने अपनी एक पुस्तक (जिन्ना, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस) में पटेल की भूमिका की चर्चा करते हुए लिखा था कि पटेल ने परिस्थितियों के आगे झुकते हुए विभाजन को स्वीकार लिया. यही कारण है कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में, मोदी ने इस पुस्तक को अपने राज्य में प्रतिबंधित कर दिया था.

राजनैतिक शक्तियां अपने एजेंडे को लागू करने के लिए इतिहास को तोड़ती-मरोड़ती तो हैं ही, वे अतीत की घटनाओं और उनकी निहितार्थों के सम्बन्ध में सफ़ेद झूठ बोलने से भी नहीं हिचकिचातीं. जहाँ तक इतिहास का प्रश्न है, उस पर यह सिद्धांत पूरी तरह से लागू होता है कि “तथ्य पवित्र हैं, मत स्वतंत्र है” अर्थात आप तथ्यों के साथ छेड़-छाड़ नहीं कर सकते परन्तु आप उनके बारे में कोई भी राय रखने के लिए स्वतंत्र है. परन्तु मोदी और उनके जैसे अन्यों के लिए “प्रेम और युद्ध में सब जायज है”. अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं पूरी करने और अपने राजनैतिक एजेंडे को लागू करने के प्रयास में मोदी सभी सीमायें पार कर रहे हैं. सरदार पटेल का महिमामंडन करने के लिए वे जवाहरलाल नेहरु का कद छोटा करने का प्रयास कर रहे हैं और इन दोनों नेताओं को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी सिद्ध करने पर आमादा हैं. उनके इस प्रयास के दो लक्ष्य हैं. पहला, चूँकि “मोदी परिवार” ने कभी स्वाधीनता आन्दोलन में भागीदारी नहीं की इसलिए वे पटेल को अपना बताकर इस कमी को पूरा करना चाहते हैं. यह इस तथ्य के बावजूद कि पटेल का यह स्पष्ट मत था कि मोदी के वैचारिक पितामह (हिन्दू महासभा- आरएसएस), महात्मा गाँधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार थे. “…इन दोनों संस्थाओं (आरएसएस और हिन्दू महासभा) की गतिविधियों के चलते, देश में ऐसा वातावरण बना जिसके कारण इतनी भयावह त्रासदी संभव हो सकी…आरएसएस की गतिविधियाँ, सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं”.

जहाँ तक देश के त्रासद विभाजन का प्रश्न हैं, ऐसी अनेक विद्वत्तापूर्ण पुस्तकें और लेख उपलब्ध हैं, जो हमें न केवल विभाजन की पृष्ठभूमि से परिचित करवाते हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि वह अनेक जटिल प्रक्रियाओं और कारकों का नतीजा था. यह सही है कि यह प्रक्रिया इतनी जटिल थी और इसके इतने विविध पहलू और कारण थे कि आप उनमें से किसी एक को चुन कर अपना मनमाना चित्र प्रस्तुत कर सकते हैं. जिन्ना के समर्थकों की दृष्टि में, देश के विभाजन के लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार थी. मोदी भी जिन्ना-समर्थकों की तरह, कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हैं.

विभाजन के पीछे तीन मूल कारण थे. इनमें से पहला था अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति. अंग्रेज़ यह जानते थे कि भारत के राजनैतिक नेतृत्व का समाजवाद की ओर झुकाव है और उन्हें डर था कि स्वाधीन भारत, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस के नेतृत्व वाले समाजवादी देशों के गठबंधन के साथ जुड़ सकता है. अपने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए अंग्रेज़ चाहते थे कि दुनिया के इस इलाके में एक ऐसा देश हो जो उनका पिछलग्गू बना रहे. और पाकिस्तान ने यह भूमिका बखूबी अदा की. अंग्रेजों के लिए अपना यह लक्ष्य पूरा करना इसलिए आसान हो गया क्योंकि सावरकर, जो कि मोदी की विचारधारा के मूल प्रतिपादक थे, ने द्विराष्ट्र सिद्धांत के स्थापना की. तीसरा कारण था जिन्ना की यह मान्यता कि चूँकि मुस्लिम एक अलग राष्ट्र हैं इसलिए उनका एक अलग देश होना चाहिए.

अपनी एक महत्वपूर्ण पुस्तक “गिल्टी मेन ऑफ़ इंडियास पार्टीशन” में लोहिया लिखते हैं…”हिन्दू कट्टरवाद, उन शक्तियों में शामिल था जो भारत के विभाजन का कारण बनीं…जो लोग आज चिल्ला-चिल्लाकर अखंड भारत की बात कर रहे हैं अर्थात आज का जनसंघ (भाजपा का पूर्व अवतार), और उसके पूर्ववर्तियों, जो हिन्दू धर्म की ‘गैर-हिन्दू” परंपरा के वाहक थे, ने भारत का विभाजन करने में अंग्रेजों और मुस्लिम लीग की मदद की. उन्होंने कतई यह प्रयास नहीं किया कि हिन्दू और मुस्लिम नज़दीक आयें और एक देश में रहें. बल्कि उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के परस्पर संबंधों को ख़राब करने के लिए हर संभव प्रयास किये. और दोनों समुदायों के बीच यही अनबन और मनमुटाव भारत के विभाजन की जड़ बनी…”.

समय के साथ जिन्ना ने भी अलग पाकिस्तान की अपनी मांग पर और अड़ियल रूख अपना लिया. नेहरु के यह कहने के बाद कि वे कैबिनेट मिशन योजना से बंधे हुए नहीं हैं, जिन्ना ने यह साफ़ कर दिया के वे अलग पाकिस्तान की अपनी मांग से पीछे हटने वाले नहीं हैं.

जिस समय अंग्रेज़ ये चालें चल रहे थे, गांधीजी देश में मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच धधक रही हिंसा की आग को बुझाने में व्यस्त थे. उन्होंने हिंदुस्तान-पाकिस्तान का मुद्दा सुलझाने का काम अपने विश्वस्त सहयोगियों सरदार पटेल और नेहरु के हाथों में सौंप दिया था. मौलाना अबुल कलाम आजाद अपनी विद्वतापूर्ण पुस्तक “इंडिया विन्स फ्रीडम” में लिखते हैं कि सरदार पटेल पहले ऐसे प्रमुख कांग्रेस नेता थे, जिन्होंने भारत के विभाजन की अंग्रेजों की योजना का समर्थन किया था. मौलाना ने कभी विभाजन को स्वीकार नहीं किया और गांधीजी ने अंततः भारी मन से इस योजना को अपनी स्वीकृति दी. उन्हें यह आशा थी कि भारत कभी न कभी फिर से एक हो जायेगा. मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य एमजे अकबर ने नेहरु की अपनी जीवनी “नेहरु – द मेकिंग ऑफ़ इंडिया” (1988) में लिखा “भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने रूमानी नेहरु के बहुत पहले देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया था” (पृष्ठ 406).

हम सबको याद है कि मोदी की पार्टी के एक बड़े नेता जसवंत सिंह ने अपनी एक पुस्तक (जिन्ना, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस) में पटेल की भूमिका की चर्चा करते हुए लिखा था कि पटेल ने परिस्थितियों के आगे झुकते हुए विभाजन को स्वीकार लिया. यही कारण है कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में, मोदी ने इस पुस्तक को अपने राज्य में प्रतिबंधित कर दिया था.

कश्मीर समस्या के बारे में जितना कम कहा जाये, उतना बेहतर होगा. यह समस्या ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज थी. कश्मीर एक मुस्लिम-बहुल राज्य था परन्तु वह पाकिस्तान का हिस्सा बनना नहीं चाहता था. पाकिस्तान की सेना के सहयोग से कबाइलियों  द्वारा राज्य पर आक्रमण करने के बाद वहां के महाराज हरिसिंह ने भारत की मदद मांगीं. शेख अब्दुल्ला यह चाहते थे कि भारत उनकी मदद करे. इस मामले में पटेल और नेहरु की सोच एक सी थी. पटेल तो कश्मीर घाटी पर भारत का दावा छोड़ने के लिए तक तैयार थे.

राजमोहन गाँधी ने पटेल की अपनी जीवनी (पटेल: ए लाइफ) में लिखा है कि पटेल इस सौदे के लिए तैयार थे कि अगर जिन्ना, हैदराबाद और जूनागढ़ को भारत का हिस्सा बन जाने दें तो भारत, कश्मीर के पाकिस्तान में विलय पर कोई आपत्ति नहीं करेगा. वे पटेल की जूनागढ़ के बहाउद्दीन कॉलेज में दिए गए एक भाषण को उद्दत करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि “हम कश्मीर पर राजी हो जायेगें, अगर वे हैदराबाद के बारे में हमारी बात मान लें”, (पृष्ठ 407-8). यह भाषण पटेल ने जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद दिया था.

पटेल-नेहरु संबंधों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण कथन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि मोटे तौर पर, कश्मीर सहित सभी मामलों में पटेल और नेहरु की सोच एक सी थी. मोदी एक झूठ को बार-बार दोहरा कर, उसे सच सिद्ध करना चाहते हैं. वह सिर्फ इसलिए क्योंकि उसमें उन्हें अपना फायदा नज़र आता है.

(कुछ सन्दर्भ सुधीन्द्र कुलकर्णी की पुस्तक “मोदीस डिसलाइक फॉर नेहरु कैननोट ओब्लिटीरेट द फैक्ट्स” से)

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

سانس کا اعتبار مت کرنا۔۔۔ قمر اعجاز

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حد سے زیادہ بھی پیار مت کرنا

 دل ہر ایک پہ نثار مت کرنا

 .

 کیا خبر کس جگہ پہ رک جائے

 سانس کا اعتبار مت کرنا

 .

 آئینے کی نظر نہ لگ جائے

 اس طرح سے شرنگار مت کرنا

 .

 تیر تیری طرف ہی آئیگا

 تو ہوا میں شکار مت کرنا

 .

 ڈوب جانے کا جسمیں خطرہ ہے

 ایسے دریا کو پار مت کرنا

 .

 دیکھ طوبہ کا در کھلا ہے ابھی

 کل کا تو انتظار مت کرنا

 .

 مجھ کو خنزر نے یہ کہاں ہے اعجاز

 تو اندھیرے میں وار مت کرنا

सास का एतबार मत करना….कमर एजाज

 .

हद से ज्यादा भी प्यार मत करना

 दिल हर एक पे निसार मत करना

 .

 क्या खबर किस जगह पे रुक जाये

 सास का एतबार मत करना

 .

 आईने की नज़र न लग जाये

 इस तरह से श्रृंगार मत करना

 .

 तीर तेरी तरफ ही आएगा

 तू हवा में शिकार मत करना

 .

 डूब जाने का जिसमे खतरा है

 ऐसे दरिया को पार मत करना

.

 देख तौबा का दर खुला है अभी

 कल का तू इंतज़ार मत करना

 .

 मुझको खंज़र ने ये कहाँ है एजाज़

 तू अँधेरे में वार मत करना

मीडिया झुक सकता है मगर लोकतंत्र नहीं : हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बोले रवीश कुमार

इतनी दूर से बुलाया वो भी सुनने के लिए जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है. इंटरव्यू की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि अब सिर्फ स्पीच और स्टैंडअप कॉमेडी का ही सहारा रह गया है. सवालों के जवाब नहीं हैं बल्कि नेता जी के आशीर्वचन रह गए हैं.

ख़बर न्यूज़ डेस्क, Updated: 10 फ़रवरी, 2018 7:59 PM

मीडिया झुक सकता है मगर लोकतंत्र नहीं : हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बोले रवीश कुमार

हावर्ड यूनिवर्सिटी में रवीश कुमार

एनडीटीवी के एडिटर रवीश कुमार ने शनिवार को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शिरकत की. वहां उन्‍होंने हिंदी में अपनी बात रखी. वहां उन्‍हें इंडिया कॉन्‍फ्रेंस 2018 में हिस्‍सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया था. उन्‍होंने वहां अपनी स्‍पीच में देश के वर्तमान हालात से लेकर छात्रों से जुड़े विषयों पर भी अपनी बात रखी. पढ़ें रवीश कुमार की पूरी स्‍पीच…

आप सभी का शुक्रिया. इतनी दूर से बुलाया वो भी सुनने के लिए जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है. इंटरव्यू की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि अब सिर्फ स्पीच और स्टैंडअप कॉमेडी का ही सहारा रह गया है. सवालों के जवाब नहीं हैं बल्कि नेता जी के आशीर्वचन रह गए हैं. भारत में दो तरह की सरकारें हैं. एक गवर्नमेंट ऑफ इंडिया. दूसरी गर्वनमेंट ऑफ मीडिया. मैं यहां गवर्नमेंट ऑफ मीडिया तक ही सीमित रहूंगा ताकि किसी को बुरा न लगे कि मैंने विदेश में गर्वनमेंट ऑफ इंडिया के बारे में कुछ कह दिया. यह आप पर निर्भर करता है कि मुझे सुनते हुए आप मीडिया और इंडिया में कितना फ़र्क कर पाते हैं.

एक को जनता ने चुना है और दूसरे ने ख़ुद को सरकार के लिए चुन लिया है. एक का चुनाव वोट से हुआ है और एक का रेटिंग से होता रहता है. यहां अमरीका में मीडिया है, भारत में गोदी मीडिया है. मैं एक-एक उदाहरण देकर अपना भाषण लंबा नहीं करना चाहता और न ही आपको शर्मिंदा करने का मेरा कोई इरादा है. गर्वनमेंट ऑफ मीडिया में बहुत कुछ अच्छा है. जैसे मौसम का समाचार. एक्सिडेंट की ख़बरें. सायना और सिंधु का जीतना, दंगल का सुपरहिट होना. ऐसा नहीं है कि कुछ भी अच्छा नहीं है. चपरासी के 14 पदों के लिए लाखों नौजवान लाइन में खड़े हैं, कौन कहता है उम्मीद नहीं है. कॉलेजों में छह छह साल में बीए करने वाले लाखों नौजवान इंतज़ार कर रहे हैं, कौन कहता है कि उम्मीद नहीं बची है. उम्मीद ही तो बची हुई है कि उसके पीछे ये नौजवान बचे हुए हैं.

एक डरा हुआ पत्रकार लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है. एक डरा हुआ पत्रकार आपका हीरो बन जाए, इसका मतलब आपने डर को अपना घर दे दिया है. इस वक्त भारत के लोकतंत्र को भारत के मीडिया से ख़तरा है. भारत का टीवी मीडिया लोकतंत्र के ख़िलाफ़ हो गया है. भारत का प्रिंट मीडिया चुपचाप उस क़त्ल में शामिल है जिसमें बहता हुआ ख़ून तो नहीं दिखता है, मगर इधर-उधर कोने में छापी जा रही कुछ काम की ख़बरों में क़त्ल की आह सुनाई दे जाती है.

सीबीआई कोर्ट के जज बी एच लोया की मौत इस बात का प्रमाण है कि भारत का मीडिया किसके साथ है. कैरवान पत्रिका की रिपोर्ट आने के बाद दिल्ली के एंकर आसमान की तरफ देखने लगे और हवाओं में नमी की मात्रा वाली ख़बरें पढ़ने लगे थे. यहां तक कि इस डर का शिकार विपक्षी पार्टियां भी हो गईं हैं. उनके नेताओं को बड़ी देर बाद हिम्मत आई कि जज लोया की मौत के सवालों की जांच की मांग की जाए. जब हिम्मत आई तब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच जज लोया के मामले की सुनवाई कर रही थी. इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी ने जब जज लोया से संबंधित पूर्व जजों की मौत पर सवाल उठाया तो उसे दिल्ली के अख़बारों ने नहीं छापा, चैनलों ने नहीं दिखाया.

ऐसा नहीं है कि गर्वनमेंट ऑफ मीडिया सवाल करना भूल गया. उसने राहुल गांधी के स्टार वार्स देखने पर कितना बड़ा सवाल किया था. आप कह सकते हैं कि गर्वनमेंट ऑफ इंडिया चाहती है कि विपक्ष का नेता सीरीयस रहे. लेकिन जब वह नेता सीरीयस होकर जज लोया को लेकर प्रेस कांफ्रेंस कर देता है तो मीडिया अपना सीरीयसनेस भूल जाता है. दोस्तों याद रखना मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात कर रहा हूं, विदेश में गर्वनमेंट ऑफ इंडिया की बात नहीं कर रहा हूं.

मीडिया में क्या कोई ख़ुद से डर गया है या किसी के डराने से डर गया है, यह एक खुला प्रश्न है. डर का डीएनए से कोई लेना देना नहीं है, कोई भी डर सकता है, ख़ासकर फर्ज़ी केस में फंसाना और कई साल तक मुकदमों को लटकाना जहां आसान हो, वहां डर सिस्टम का पार्ट है. डर नेचुरल है. गांधी ने जेल जाकर हमें जेल के डर से आज़ाद करा दिया. ग़ुलाम भारत के ग़रीब से ग़रीब और अनपढ़ से अनपढ़ लोग जेल के डर से आज़ाद हो गए. 2जी में दो लाख करोड़ का घोटाला हुआ था, मगर जब इसके आरोपी बरी हो गए तो वो जनाब आज तक नहीं बोल पाए हैं. जिनकी किताब का नाम है NOT JUST AN ACCOUNTANT, THE DIARY OF NATIONS CONSCIENCE KEEPER. जब 2जी के आरोपी बरी हुए, सीबीआई सबूत पेश नहीं कर पाई तब मैंने पहली बार देखा, किसी किताब को कवर को छिपते हुए. आपने देखा है ऐसा होते हुए. लगता है कि किताब कह रही है कि ये बात सही निकली कि ये सिर्फ एकाउंटेंट नहीं हैं, मगर ये बात झूठ है कि वे नेशंस के कांशिएंस कीपर हैं.

एक डरा हुआ मीडिया जब सुपर पावर इंडिया का हेडलाइन लगाता है तब मुझे उस पावर से डर लगता है. मैं चाहता हूं कि विश्व गुरु बनने से पहले कम से कम उन कॉलेजों में गुरु पहुंच जाएं, जहां 8500 लड़कियां पढ़ती हैं मगर पढ़ाने के लिए 9 टीचर हैं. फिर आप कहेंगे कि क्या कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है. क्या यह अच्छा नहीं है कि बिना टीचर के भी हमारी लड़कियां बीए पास कर जा रही हैं. क्या आप ऐसा हावर्ड में करके दिखा सकते हैं? कैंब्रिज में दिखा सकते हैं, आक्सफोर्ड में दिखा सकते हैं, क्या आप येल और कोलंबिया में ऐसा करके दिखा सकते हैं?

मीडिया ने इंडिया के बेसिक क्वेश्चन को छोड़ दिया है. इसलिए मैंने कहा कि इतनी दूर से आकर मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात करूंगा ताकि आपको न लगे कि मैं गर्वनमेंट ऑफ इंडिया की बात कर रहा हूं. मैं इंडिया की नहीं मीडिया की आलोचना कर रहा हूं. आप I और M में कंफ्यूज़ मत कर जाना.

एक ही मालिक के दो चैनल हैं. एक ही चैनल में दो एंकर हैं. एक सांप्रदायिकता फैला रहा है, एक किसानों की बात कर रहा है. एक झूठ फैला रहा है, एक टूटी सड़कों की बात कर रहा है. सवाल, हम जैसे सवाल करने वाले से है, जवाब हम जैसों के पास नहीं है. आप उनसे पूछिए जो आप तक मीडिया को लेकर आते हैं, जो आप तक इंडिया लेकर आते हैं. फेक न्यूज़ आज ऑफिशियल न्यूज़ है. न्यूज़ रूम में रिपोर्टर समाप्त हो चुके हैं. रिपोर्टर का इस्तेमाल हत्यारे के रूप में होता है. एक चैनल में एक सांसद के पीछ चार पांच रिपोर्टर एक साथ भेज दिया. देखने से लगा कि सारा मीडिया उसके पीछे पड़ा है. यह नया दौर है. डरा हुआ मीडिया अपने कैमरों से आपको डराने निकला है.

चैनलों पर सांप्रदायिकता भड़काने वाले एंकरों को जगह मिल रही है. इन एंकरों के पास सरकार के लिए कोई सवाल नहीं है, सिर्फ एक ही क्वेश्चन सबके पास है. इस सवाल का नाम है हिन्दू मुस्लिम क्वेश्चन, HMQ. भारत के न्यूज़ एंकर राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिक हो चुके हैं. इस हद तक कि जब उदयपुर में नौजवान भगवा झंडा लेकर अदालत की छत पर चढ़ जाते हैं तो एंकर चुप हो गए हैं. क्या हम ऐसा भारत चाहते थे, चाहते हैं? अदालत जिस संविधान के तहत है, उसी संविधान की एक धारा से मीडिया अपनी आज़ादी का चरणामृत ग्रहण करता है. चरणामृत तो समझते होंगे. गर्वनमेंट ऑफ मीडिया के पास एक ही एजेंडा है. हिन्दू मुस्लिम क्वेश्चन. इससे जुड़े फेक न्यूज़ की इतनी भरमार है कि आप आल्ट न्यूज़ डॉट इन पर पढ़ सकते हैं. अब तो फेक न्यूज़ दूसरी तरफ़ से बनने लगे हैं.

My dear friends, believe me, Media is trying to murder our hard earned democracy. Our Media is a murderer. यह समाज में ऐसा असंतुलन पैदा कर रहा है, अपनी बहसों के ज़रिए ऐसा ज़हर बो रहा है जिससे हमारे लोकतंत्र के भीतर भय का माहौल बना रहे. जिससे एक भीड़ कभी भी कहीं भी ट्रिगर हो जाती है और आपको ओवरपावर कर देती है. आप कहेंगे कि क्या इतना बुरा है, कुछ भी अच्छा नहीं है. मुझे पता है कि आपको बीच बीच में पॉज़िटिव अच्छा लगता है. एक पोज़िटिव बताता हूं. भारत का लोकतंत्र मीडिया के झुक जाने से नहीं झुक जाता है. वह मीडिया के मिट जाने से नहीं मिट जाएगा. वह न तो आपातकाल में झुका न वह गोदी मीडिया के काल में झुकेगा. भारत का लोकतंत्र हमारी आत्मा है. हमारा ज़मीर है. आत्मा अमर है. आप गीता पढ़ सकते हैं. मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात कर रहा हूं.

आपकी तरह मैं भी भारत को लेकर सपने देखता हूं. मगर जागते हुए. सामने की हकीकत ही मेरे लिए सपना है. मैं एक ऐसे भारत का सपना देखता हूं जो हकीकत का सामना कर सके. सोचिए ज़रा हम आज कल अतीत के सवालों मे क्यों उलझे हैं. अगर इन सवालों का सामना ही करना है तो क्या हम ठीक से कर रहे हैं, क्या इन सवालों का सामना करने की जगह टीवी का स्टुडियो है? या क्लासरूम है, कांफ्रेंस रूम हैं, और सामना हम किस तरह से करेंगे, क्या हम आज हिसाब करेंगे, क्या हम आज क़त्लेआम करेंगे? तो क्या आप अपने घर से एक हत्यारा देने के लिए तैयार हैं? नफ़रत की यह आंधी हर घर में एक हत्यारा पैदा कर जाएगी, वो आपका भाई हो सकता है, बेटा हो सकता है, दोस्त हो सकता है, पड़ोसी हो सकता है, क्या आपने मन बना लिया है? क्या हमने सीखा है कि इतिहास का सामना कैसे किया जाए? हम क्लास रूम में नहीं, सड़क और टीवी स्टुडियो में इतिहास का हिसाब करने निकले हैं. नेहरू को मुसलमान बना देने से या अकबर को पराजित बना देने से आप इतिहास नहीं बदल देते, इतिहास जब शिक्षा मंत्री के आदेश से बदलने लगे तो समझिए कि वह मंत्री केमिस्ट्री का भी अच्छा विद्यार्थी नहीं रहा होगा. क्या आप यहां हार्वर्ड में बैठकर इस बात को स्वीकार कर सकते हैं कि इतिहास के क्लास रूम में कोई मंत्री आकर इतिहास बदल दे. प्रोफेसर के हाथ से किताब लेकर, अपनी किताब पढ़ने के लिए दे दे. क्या आप बर्दाश्त करेंगे? जब आप खुद के लिए यह बर्दाश्त नहीं कर सकते तो भारत के लिए कैसे कर सकते हैं?

ज़रूर इतिहास में नई बहस चलनी चाहिए, नए शोध होने चाहिए. लेकिन हम वैसा कर रहे हैं. एक फिल्म पर हमने तीन महीने बहस की है. इतनी बहस हमने भारत की ग़रीबी पर नहीं की, भारत की संभावनाओं पर नहीं की, हमने तीन महीने एक फिल्म पर बहस की. तलवारें लेकर लोग स्टुडियो में आ गए, अब किसी दिन बंदूकें लेकर आएंगे.

महाराणा की हार के बाद भी लोगों ने महान विजेता के रूप में स्वीकार किया था. उनकी वीरता की गाथा पर उस हार का कोई असर ही नहीं था, जिसे एक शिक्षा मंत्री ने अपनी ताकत से बदलने की कोशिश की. लोक श्रुतियों में अपराजेय महाराणा के लिए किताबों में बड़ी हार है. मुझे नहीं लगता कि महाराणा प्रताप जैसे बहादुर क़ाग़ज़ पर हार की जगह जीत लिख देने से खुश होते. जो वीर होता है वो हार को भी गले लगाता है. पर यह सही है कि पब्लिक में इतिहास को लेकर वैसी समझ नहीं है जैसी क्लास रूम में है. क्लास रूम में भी भारी असामनता है. इतिहास के लाखों छात्रों को अच्छी किताबें नहीं मिलीं, शिक्षक नहीं मिले इसलिए सबने किताब की जगह कूड़ा उठा लिया. कूड़े को इतिहास समझ लिया. हम आज भी इतिहास को गौरव गान और गौरव भाव के बिना नहीं समझ पाते हैं. सोने की चिड़िया था हमारा देश. विश्व गुरु था देश. ये सब विशेषण हैं, इतिहास नहीं है. SUPERLATIVES CANT BE HISTORY.

वैसे इस तीन महीने में भारत मे जितने इतिहासकार पैदा हुए हैं, उतने ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज अपने कई सौ साल के इतिहास में पैदा नहीं कर पाए होंगे. भारत में आप बस जलाकर, पोस्टर फाड़कर इतिहासकार बन सकते हैं. किसी फिल्म का प्रदर्शन रुकवा कर आप इतिहासकार बन सकते हैं. तीन साल में हमने जिनते इतिहासकार पैदा किए हैं, उनके लिए अब हमारे पास उतनी यूनिवर्सटी भी नहीं हैं.

अंग्रेज़ों की कल्पना थी कि भारत के इतिहास को हिन्दू इतिहास मुस्लिम इतिहास में बदल दो. आज बहुत से लोग अंग्रेज़ी हुकूमत की सोच को पूरा कर रहे हैं. वो वापस इतिहास को हिन्दू बनाम मुसलमान के खांचे में ले जा रहे हैं. वर्तमान पर पर्दा डालने के लिए इतिहास से वैसे मुद्दे लाए जा रहे हैं जिनके ज़रिए नागरिक का, मतदाता का धार्मिक पहचान बनाई जा सके. हम क्यों अपनी भारतीयता कभी अनेकता में एकता में खोजते खोजते, धार्मिक एकरूपता में खोजने लगते हैं? हम संविधान से अपनी पहचान क्यों नहीं हासिल करते, जिसके लिए हमने सौ साल की लड़ाई लड़ी. दिन रात बहस किए, लाखों लोग जेल गए.

अगर बहुतों को लगता है कि इस सवाल पर बहस होनी चाहिए तो क्या हम सही तरीके से अपने सवाल रख रहे हैं, बहस कर रहे हैं, क्या उसका मंच अख़बार तक न पढ़ने वाले ये एंकर होंगे. आख़िर क्यों बहुसंख्यक धर्म इतिहास के किरदारों पर धार्मिक व्याख्या थोपना चाहता है? कभी मीडिया के स्पेस में हमारी भारतीयता मिले सुर मेरा तुम्हारा से बनती थी, आज हमारा सुर हमारा, तुम्हारा सुर तुम्हारा या तुम्हारा सुर कुछ नहीं, हमारा ही सुर तुम्हारा.

हम भारतीयों का भारतीय होने का बोध और इतिहास बोध दोनों संकट से गुज़र रहा है. हमें एक खंडित नागरिकता के बोध के साथ तैयार किए जा रहे हैं. जिसके भीतर फेक न्यूज़ और फेक हिस्ट्री के ज़रिए ऐसी पोलिटिकिल प्रोग्रामिंग की जा रही है कि किसी भी शहर में छोटे छोटे समूह में लोगों को ट्रिगर किया जा सकता है. क्या आप इतिहास का बदला ले सकते हैं तो फिर आप न्याय की मूल अवधारणा के खिलाफ जा रहे हैं जो कहता है कि खून का बदला खून नहीं होता है. अगर हम खून का बदला खून की अवधारणा पर जाएंगे तो हमारे चारों तरफ हिंसा ही हिंसा होगी.

इस समय भारत में दो तरह के पोलिटिकल आइडेंटिटि हैं. एक जो धार्मिक आक्रामकता से लैस है और दूसरा तो धार्मिक आत्मविश्वास खो चुका है. एक डराने वाला है और डरा हुआ है. यह असंतुलन आने वाले समय में हमारे सामने कई चुनौतियां लाने वाला हैं जिन्हें हम ख़ूब पहचानते हैं. हमने इसके नतीजे देखे हैं, भुगते भी हैं. अलग-अलग समय पर अलग-अलग समुदायों ने भुगते हैं. हमारी स्मृतियों से पुराने ज़ख़्म मिटते भी नहीं कि हम नए ज़ख़्म ले आते हैं.

जैसे हिन्दुस्तान एक टू इन वन देश है. जिसे हमारी सरकारी ज़ुबान में इंडिया और भारत के रूप में पहचान मिल चुकी है. उसी तरह हमारी पहचान धर्म और जाति के टू इन वन पर आधारित है. आप इन जाति संगठनों की तरफ से भारत को देखिए, आप उसका चेहरा सबके सामने देख नहीं पाएंगे. आप जाति का चेहरा चुपके से घर जाकर देखते हैं. हमने जाति को ख़त्म नहीं किया. हमने आज़ाद भारत में नई नई CAST COLONIES बनाई हैं. ये CAST COLONIES CONCRETE की हैं. इसके मुखिया उस आधुनिक भारत में पैदा हुए लोग हैं. पूछिए खुद से कि आज क्यों समाज में ये जाति कोलोनी बन रही हैं.

आज का मतलब 2018 नहीं और न ही 2014 है. हम भारत का गौरव करते हैं, धर्म का गौरव करते हैं, जाति का गौरव करते हैं. हम अपने भीतर हर तरह की क्रूरता को बचाते रहना चाहते हैं. क्या जाति वाकई गौरव करने की चीज़ है? इस सवाल का जवाब अगर हां है तो हम संविधान के साथ धोखा कर रहे हैं, अपने राष्ट्रीय आंदोलन की भावना के साथ धोखा कर रहे हैं. टीम इंडिया का राजनीतिक स्लोगन कास्ट इंडिया, रीलीजन इंडिया में बदल चुका है.

आंध्र प्रदेश में ब्राह्ण जाति की एक कोपरेटिव सोसायटी बनी है. इसका मिशन है ब्राह्मणों की विरासत को दोबारा से जीवित करना और उसे आगे बढ़ाना. ब्राह्मणों की विरासत क्या है, राजपूतों की विरासत क्या है? तो फिर दलितों की विरासत भीमा कोरेगांव से क्या दिक्कत है? फिर मुग़लों की विरासत से क्या दिक्कत है जहां इज़राइल के राष्ट्र प्रमुख भी अपनी पत्नी के साथ दो पल गुज़ारना चाहते हैं. आप इस सोसायटी की वेबसाइट http://www.apbrahmincoop.com पर जाइये. मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू इसकी पत्रिका लांच कर रहे हैं क्योंकि इस सोसायटी का मुखिया उनकी पार्टी का सदस्य है.

इस सोसायटी के लक्ष्य वहीं हैं जो एक सरकार के होने चाहिए. जो हमारी आर्थिक नीतियों के होने चाहिए. क्या हमारी नीतियां इस कदर फेल रही हैं कि अब हम अपनी अपनी जातियों का कोपरेटिव बनाने लगे हैं. इसका लक्ष्य है ग़रीब ब्राह्मण जातियों का सेल्फ हेल्फ ग्रुप बनाना, उन्हें बिजनेस करने, गाड़ी खरीदने का लोन देना. इसके सदस्य सिर्फ ब्राह्मण समुदाय से हो सकते हैं. आईएएस हैं, पेशेवर लोग हैं. इसके चेयमैन आनंद सूर्या भी ब्राह्मण हैं. अपना परिचय में खुद को ट्रेड यूनियन नेता और बिजनेसमैन लिखते हैं. दुनिया में बिजनैस मैन शायद ही ट्रेड यूनियन नेता बनते हैं. वे बीजेपी, भारतीय मज़दूर संघ, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, जनता दल सेकुलर में रह चुके हैं. जहां उन्होंने सीखा है कि ब्राह्ण समुदाय को नैतिक और राजनीतिक समर्थन कैसे देना है. हमें पता ही नहीं था समाजवादी पार्टी में लोग ये सब भी सीखते हैं. 2003 से वे टीडीपी में हैं.

यह अकेला ऐसा संस्थान नहीं है. विदेशों में भी और भारत में भी ऐसे अनेक जातिगत संगठन कायम हैं. इनके अध्यक्षों की राजनीतिक हैसियत किसी नेता से अधिक है. इस स्पेस के बाहर बिना इस तरह की पहचान के लिए नेता बनना असंभव है. बंगलुरू में तो 2013 में सिर्फ ब्राह्मणों के लिए वैदिक सोसायटी बननी शुरू हो गई थी. सोचिए एक टाउनशिप है सिर्फ ब्राह्मणों का. ये एक्सक्लूज़न हमें कहां ले जाएगा, क्या यह एक तरह का घेटो नहीं है. 2700 घर ब्राहमणों के अलग से होंगे. ये तो फिर से गांवों वाला सिस्टम हो जाएगा. ब्राह्मणों का अलग से. क्या यह घेटो नहीं है?

आज़ाद भारत में यह क्यों हुआ? अस्सी के दशक में जब हाउसिंग सोसायटी का विस्तार हुआ तो उसे जाति और खास पेशे के आधार पर बसाया गया. दिल्ली में पटपड़गंज है, वहां पर जाति, पेशा, इलाका और राज्य के हिसाब से कई हाउसिंग सोसायटी आपको मिलेगी. तो फिर हम संविधान के आधार पर भारतीय कैसे बन रहे थे. क्या बिना जाति के समर्थन के हम भारतीय नहीं हो सकते.

जयपुर के विद्यानगर में जातियों के अलग अलग हॉस्टल बने हैं. श्री राजपूत सभा ने अपनी जाति के लड़कों के लिए हॉस्टल बनाए हैं. लड़कियों के भी हैं. यादवों के भी अलग हॉस्टल हैं. मीणा जाति के भी अलग छात्रावास हैं. ब्राह्मण जाति के भी अलग हॉस्टल हैं. अब आप बतायें, इन हॉस्टल से निकल जो भी आगे जाएगा वो अपने भीतर किसकी पहचान को आगे रखेगा. क्या उसकी पहचान का संविधान आधारित भारतीयता से टकराव नहीं होगा? खटिक छात्रावस भी है जो सरकार ने बनाए हैं. क्यों राज्य सरकारों को दलितों के लिए अलग से हॉस्टल बनाने की ज़रूरत पड़ी? क्या हमारी जातियों के ऊंचे तबके ने संविधान के आधार पर भारत को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, क्या वह संविधान आधारित नागरिकता को पसंद नहीं करता है? क्या जातियों को कोई ऐसा समूह है जो धर्म के सहारे अपना वर्चस्व फिर से हासिल करना चाहता है? क्या कोई ऐसा भी समूह है जो अब पहले से कई गुना ज़्यादा ताकत से इस वर्चस्व को चुनौती दे रहा है?

भारत की राजनीति की तरह मीडिया भी इन्हीं कास्ट कॉलोनी से आता है. उसके संपादक भी इसी कास्ट कालोनी से आते हैं. उन्हें पब्लिक में जाति की पहचान ठीक नहीं लगती मगर उन्हें धर्म की पहचान ठीक लगती है. इसलिए वे धर्म की पहचान के ज़रिए जाति की पहचान ठेल रहे हैं. यह काम वही कर सकता है जो लोकतंत्र में यकीन नहीं रखता हो क्योंकि जाति लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है. गर्वनमेंट ऑफ मीडिया में सब कुछ ठीक नहीं है. पोज़िटिव यही है कि लोकतंत्र के ख़िलाफ़ यह पूरी आज़ादी से बोल रहा है. भाईचारे के ख़िलाफ़ पूरी आज़ादी से बोल रहा है. हमारी गर्वनमेंट ऑफ मीडिया आज़ाद है. पहले से कहीं आज़ाद है. इसी पोज़िटिव नोट पर मैं अपना भाषण समाप्त कर रहा हूं.

कुल मिलाकर हम यथास्थिति को प्रमोट कर रहे हैं. धर्म के गौरव को हम राष्ट्र बता रहे हैं. आप चाहें तो डार्विन को रिजेक्ट कर सकते हैं. आप चाहें तो गणेश पूजा को ही मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई घोषित कर सकते हैं.

कासगंज हिंसा…… हिमांशु कुमार

 

कासगंज हिंसा का शिकार हुए चंदन पर ब्लॉगर हिमांशु कुमार ने किए विचार व्यक्त, कहा अगर कोई दंगाई….

मुजफ्फरनगर में दंगे हुए उसके बाद मैं वहां काम करने गया. दंगों की वजह दो जाट लड़कों की मौत बताई गई थी. मैंने उस गांव में जाकर जब लोगों से बात की तो पता चला कि मारे गए दोनों जाट लड़के एक मुस्लिम लड़के शाहनवाज की हत्या करने आए थे.

और उनके साथ चार लोग और भी थे. बाकी के वह चारों हत्यारे निकल भागने में सफल हुए. यह दोनों हत्यारे भीड़ के हत्थे चढ़ गए. भीड़ में हिंदू और मुसलमान दोनों थे. मामला सिर्फ इन दो जाट लड़कों की मौत को लेकर ही बनाया गया.

लेकिन जिस मुस्लिम लड़के की हत्या इन लोगों ने कर दी. उस शाहनवाज़ की हत्या के आरोप में आज तक किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया. जबकि मारे गए दो जाट लड़कों में से एक का पिता जो पुराना हिस्ट्रीशीटर रहा है

उसने उस मुस्लिम लड़के को मारा था. लेकिन आज तक ना स्थानीय पुलिस, ना जि़ला अदालत, ना सुप्रीम कोर्ट किसी ने भी यह नहीं कहा कि मारे गए लड़के शाहनवाज की हत्या की रिपोर्ट क्यों नहीं लिखी गई ?

और उस की हत्या के आरोप में आज तक कोई गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ ? सजा तो जाने ही दीजिए. इसी तरह सहारनपुर में शब्बीरपुर में जो दलितों की बस्ती राजपूतों ने जलाई.

आग लगाते समय अपनी ही दंगाई भीड़ के भगदड़ में सांस घुटने से एक राजपूत लड़के की मौत हुई. उसे लेकर दलितों को बुरी तरह पीटा गया. घर जला दिए गए. संपत्ति का नुकसान किया.

ठीक इसी तरह कासगंज में दंगा करने गया लड़का मारा गया. नफरत फैलाते समय. दंगा करते समय. हत्या करते समय. अगर कोई हत्यारा या दंगाई मारा जाता है. तो उसे शहीद क्यों घोषित करते हो ?

सिर्फ इसलिए क्योंकि आप कमजोर अल्पसंख्यक समुदाय. या दलित जातियों को खलनायक. और खुद को बहुत महान नायक और देशभक्त घोषित करना चाहते हो.

और इस महानता के कारण इस देश पर हमेशा राज करते रहना चाहते हो. अपनी चालाकी समझो यार. जिस दिन तुम्हारी यह चालाकी लोगों की समझ में आ जाएगी

उस दिन शर्म से कहां मूंह छिपाओगे ?

नेहरू से झगड़े की बात सोच भी नहीं सकता-पटेल ! नेहरू और पटेल में झगड़ा था-बीजेपी !

  

भाजपाः पटेल को बड़ा दिखाने के लिए नेहरू को छोटा करने की साजिश   

राम पुनियानी

पिछले कुछ वर्षों से 31 अक्टूबर के आसपास, संघ परिवार, सरदार वल्लभभाई पटेल का महिमामंडन करने वाले बयानों की झड़ी लगा देता है। सन 2017 का अक्टूबर भी इसका अपवाद नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘‘मैं भाजपा से हूं और सरदार पटेल कांग्रेस में थे परंतु मैं फिर भी उनकी विचारधारा का पालन करता हूं और उनके दिखाए रास्ते पर चलता हूं। उनकी विचारधारा किसी पार्टी की नहीं है।’’ इसके साथ ही, जवाहरलाल नेहरू का कद छोटा करने के प्रयास भी हो रहे हैं। मोदी ने कहा कि नेहरू ने सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में भाग नहीं लिया। मोदी-भाजपा के यह प्रयास एक राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा हैं।

भाजपा जिस विचारधारा को मानती है, उस विचारधारा से जुड़े किसी संगठन या नेता ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया था। जाहिर है कि भाजपा को एक ऐसे नायक की ज़रूरत है जो स्वाधीनता संग्राम सैनानी रहा हो। इसके लिए उन्होंने सरदार पटेल को चुना है। नेहरू एक अत्यंत ऊँचे कद के नेता थे और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के हामी थे। भाजपा और उससे जुड़े संगठन, नेहरू की भूमिका को कम करके दिखाना चाहते हैं। इसी एजेंडे के तहत वे बार-बार इस आशय के वक्तव्य जारी करते हैं जिनसे ऐसा लगे कि नेहरू और पटेल के बीच गंभीर मतभेद थे। इन वक्तव्यों के ज़रिए, पटेल का महिमामंडन किया जाता है और नेहरू का कद घटाने का प्रयास। भाजपा का स्वाधीनता संग्राम के दो वरिष्ठतम नेताओं को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने का यह प्रयास अत्यंत घृणित है।

मोदी का यह दावा कि वे पटेल की विचारधारा के हामी हैं और उनके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं एक बड़ा झूठ है। पटेल एक भारतीय राष्ट्रवादी और गांधीजी के अनन्य अनुयायी थे। इसके विपरीत, मोदी, आरएसएस की विचारधारा में रंगे हुए हैं, जिसका मूल एजेंडा हिन्दू राष्ट्रवाद है। पटेल, आरएसएस की विचारधारा की बांटने वाली प्रवृत्ति से अच्छी तरह वाकिफ थे। वे जानते थे कि आरएसएस घृणा फैलाने के अलावा कुछ नहीं करता। महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ने लिखा ‘‘…इन दोनों (आरएसएस और हिन्दू महासभा) संगठनों, विशेषकर पहले, की गतिविधियों के चलते देश में इस तरह का वातावरण बन गया जिसके कारण इतनी भयावह त्रासदी संभव हो सकी… आरएसएस की गतिविधियां शासन और राज्य के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं।’’

भाजपा के पटेल और नेहरू को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी, बल्कि शत्रु बताने का प्रयास निंदनीय है। सच यह है कि दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते थे और एक-दूसरे के पूरक थे। उनके बीच किसी तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं थी। पटेल जानते थे कि नेहरू की लोकप्रियता जबरदस्त है। एक रैली, जिसमें पटेल और नेहरू दोनों ने भाग लिया था, में उमड़ी विशाल भीड़ पर टिप्पणी करते हुए पटेल ने अमरीकी पत्रकार विन्सेंट शीएन से कहा था कि ‘‘वे जवाहर के लिए आए थे मेरे लिए नहीं’’। इसके साथ ही, पटेल कांग्रेस संगठन की रीढ़ थे। गांधी, जिन्हें राष्ट्र ने देश का पहला प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार दिया था, ने इस पद के लिए नेहरू को चुना क्योंकि वे जानते थे कि नेहरू को वैश्विक राजनीति की बेहतर समझ है और वे जनता के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं।

नेहरू को छोटा सिद्ध करने के लिए मोदी किस हद तक जा सकते हैं यह इस बात से जाहिर है कि उन्होंने कहा कि नेहरू ने पटेल के अंतिम संस्कार में भाग नहीं लिया था। ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ ने पटेल के अंतिम संस्कार की खबर प्रमुखता से अपने मुखपृष्ठ पर छापी थी। इसमें कहा गया था कि इस मौके पर राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मौजूद थे। समाचारपत्र में नेहरू की सरदार पटेल को श्रद्धांजलि भी प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरदार पटेल ने भारत को स्वाधीनता दिलवाने और राष्ट्र के रूप में उसके निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक वीडियो क्लिप पोस्ट की थी जिसमें नेहरू को पटेल के अंतिम संस्कार में भाग लेते दिखाया गया था। मोरारजी देसाई ने अपनी आत्मकथा (खंड1, पृष्ठ 271, अनुच्छेद 2) में इस अवसर पर पंडित नेहरू की उपस्थिति की चर्चा की है। इन तथ्यों के सामने आने के बाद मोदी अपनी बात से पलट गए और यह दावा किया गया कि उनकी बात को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया था परंतु इससे यह साफ है कि मोदी और उनके साथी, नेहरू की नकारात्मक छवि बनाने के लिए कितने आतुर हैं।

कांग्रेस-नेहरू और पटेल के बीच खाई थी यह बताने के लिए प्रयासों के तहत मोदी ने गुजरात के खेड़ा में बोलते हुए कहा कि कांग्रेस ने देश के विभाजन को सुगम बनाया। तथ्य यह है कि उस समय कांग्रेस की ओर से जो दो बड़े नेता चर्चाओं में भाग ले रहे थे वे थे सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू। जसवंत सिंह ने जिन्ना पर लिखी अपनी पुस्तक में विभाजन के लिए नेहरू-पटेल को दोषी बताया था। विभाजन कई जटिल कारकों का नतीजा था। अब, जहां पटेल की प्रशंसा की जा रही है वहीं कांग्रेस को विभाजन के लिए दोषी बताया जा रहा है। यह सरासर झूठ है क्योंकि तत्समय जो भी निर्णय लिए गए थे उसमें नेहरू और पटेल की बराबर भागीदारी थी। व्ही.पी. मेनन, जिन्होंने विभाजन की योजना तैयार की थी, ने लिखा है कि ‘‘पटेल ने भारत के विभाजन को दिसंबर 1946 में ही स्वीकार कर लिया था। नेहरू इसके लिए छह माह बाद राज़ी हुए।’’

नेहरू और पटेल अलग-अलग रास्तों पर चल रहे थे यह प्रचार पहले भी किया जाता रहा है – यहां तक कि दोनो के जीवनकाल में भी। नेहरू ने पटेल को लिखा कि वे इस तरह की अफवाहों से विक्षुब्ध हैं और उन्हें इससे पीड़ा होती है। इसके जवाब में पटेल ने 5 मई, 1948 को अपने पत्र में नेहरू को लिखा, ‘‘आपके पत्र ने मेरे मन को गहरे तक छू लिया… हम दोनों जीवन भर एक साथ मिलकर एक ही उद्देश्य के लिए काम करते आए हैं। हमारे दृष्टिकोणों और स्वभाव में चाहे जो भी अंतर रहे हों परंतु हमारे परस्पर प्रेम और एक-दूसरे के प्रति सम्मान के भाव और हमारे देश के हित उनसे हमेशा ऊपर रहे’’। उन्होंने संसद में बोलते हुए कहा, ‘‘मैं सभी राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रधानमंत्री के साथ हूं। लगभग चैथाई सदी तक हम दोनों ने हमारे गुरू (गांधी) के चरणों में बैठकर भारत की स्वाधीनता के लिए एक साथ संघर्ष किया। आज जब महात्मा नहीं हैं तब हम आपस में झगड़ने की बात सोच भी नहीं सकते।’’

कश्मीर के मुद्दे पर भी यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि दोनों के बीच मतभेद थे और अगर पटेल की चलती तो वे बल प्रयोग कर कश्मीर को भारत का हिस्सा बना लेते। आईए, हम देखें कि सरदार वल्लभभाई पटेल का इस मुद्दे पर क्या कहना था। बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए 30 अक्टूबर, 1948 को पटेल ने कहा, ‘‘कई लोग ऐसा मानते हैं कि अगर किसी क्षेत्र में मुसलमानों का बहुमत है तो वह पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहिए। वे इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि हम कश्मीर में क्यों हैं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत सीधा सा है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग यह चाहते हैं कि हम वहां रहें। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम उनकी ज़मीन पर रहें, उसके बाद हम एक मिनिट पर वहां नहीं रूकेंगे… हम कश्मीर के लोगों का दिल नहीं तोड़ सकते (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)’’।

जैसा कि पटेल के पत्रों और संसद में दिए गए उनके वक्तव्यों से जाहिर है, इन दोनों महान नेताओं का आपस में जबरदस्त तालमेल और घनिष्ठता थी और वे एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। भाजपा का झूठा प्रचार कभी सफल नहीं होगा।

राम पुनियानी आईआईटी मुंबई के पूर्व प्रोफेसर और चर्चित समाजविज्ञानी हैं।

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया ) 

यह भी पढ़ें–

नेहरू जैसा त्याग और बलिदान किसी ने नहीं किया, मैं उनका वफ़ादार-पटेल

जम्‍मू कश्‍मीर में अनुच्‍छेद 370 पर पटेल और मुखर्जी दोनों सहमत थे, भाजपा झूठ बोलती है!

 

Posted by: Bagewafa | فروری 2, 2018

exclusive Lecture of journalist ravish kumar

exclusive Lecture of journalist ravish kumar

आज से पचास साल पहेली की मोहंमद अल्वी की एक ग़ज़ल: शहरो में

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अब वो रौनक़ न रही शहरो में  

ज़िंदगी तल्ख़ हुई शहरो में  

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चारसू फैल गया सन्नाटा

ख़ामशी दौड़ गई शहरो में  

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किस लिये गाँव  लोग आते हैं

जाने क्या बात हुई शहरो में  

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तुम भी यूसुफ़ हो चले जाओ ना

हुस्न बिकता है अभी शहरो में  

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अब भी घुंघरू की सदा आती है

रात के वक्त कईं शहरो में  

 .

शाम होते ही उतर आती है

आज भी लालपरी शहरो में  

.

भूक ने साथ न छोड़ा ‘अल्वी’

भीक तक भी न मिली शहरो में  

 

بہت پیارے انسان تسلیم اِلاہی زلفی۔۔۔۔۔۔۔۔محمد علوی

अच्छे दिन कब आएँगे——मोहम्मद अल्वी

.

 

अच्छे दिन कब आएँगे

क्या यूँ ही मर जाएँगे

 .

अपने-आप को ख़्वाबों से

कब तक हम बहलाएँगे

बम्बई में ठहरेंगे कहाँ

दिल्ली में क्या खाएँगे

 .

खिलते हैं तो खिलने दो

फूल अभी मुरझाएँगे

.

कितनी अच्छी लड़की है

बरसों भूल न पाएँगे

 .

मौत न आई तो ‘अल्वी’

छुट्टी में घर जाएँगे

اچھے دن کب آئیں گے………محمد علوی

 .

 

اچھے دن کب آئیں گے

کیا یوں ہی مر جائیں گے

 .

اپنے آپ کو خوابوں سے

کب تک ہم بہلائیں گے

.

بمبئی میں ٹھہریں گے کہاں

دلی میں کیا کھائیں گے

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کھلتے ہیں تو کھلنے دو

پھول ابھی مرجھائیں گے

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کتنی اچھی لڑکی ہے

برسوں بھول نہ پائیں گے

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موت نہ آئی تو علویؔ

چھٹی میں گھر جائیں گے

اس فتنہ مغرب کے وفادار پہ لعنت۔۔۔۔۔۔صالح اچھا

अघोषित आपातकाल” पर रविश कुमार के विचार

जज प्रेस कांफ्रेस के बीच आखिरकार बचाने का सवाल…………रविश कुमार

 

لاتا ہے مجھے رقص میں ‘ گرداب کو چُھونا۔۔۔۔۔نسرین سید

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کام آیا مِرے خوب ، تہہِ آب کو چُھونا

 مِلتا ہے کسے، گوہرِ نایاب کو چُھونا ؟

 .

 بڑھتی ہے طلب عشق میں’ دیدار ہو جتنا

 کرتا ہے فزوں پیاس یہاں ، آب کو چُھونا

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لاتی ہے مجھے وَجد میں’ افلاک کی گردش

 لاتا ہے مجھے رقص میں ‘ گرداب کو چُھونا

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اسباب میسّر تھے مجھے سارے جہاں کے

 خواہش میں کہاں تھا مگر اسباب کو چُھونا

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سپنوں کی دعا دینا ۔۔۔۔ مِری آنکھ کو ہم دم !

نرمی سے ۔۔۔ ذرا دیدہِء بے خواب کو چُھونا

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کیا چیز تڑپ ہے’ دلِ مضطر سے نہ پوچھو

 جانو گے ‘ کبھی پارہ ء بے تاب کو چُھونا

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اک لَمس ترا ‘ زندگی پھونکے مِرے تن میں

 چُھونا ‘ ذرا ۔۔۔۔۔ اِس ماہیء بے آب کو چُھونا

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شب ہوتے ہی بن جاتی ہوں میں نور کا منبع

 راس آ گیا مجھ کو ‘ کسی مَہ تاب کو چُھونا

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نسرین! مِلا جب سے ۔۔ وہ اک لَمسِ ملائم

 بھاتا ہی نہیں ‘ اطلس و کم خواب کو چُھونا

Posted by: Bagewafa | جنوری 11, 2018

Why BJP cries for Muslim women……Aijaz Zaka Syed

 

Why BJP cries for Muslim women

Aijaz Zaka Syed

How does a party that presided over the mass rape and slaughter of Muslim women get away with presenting itself as their champion and protector? Not only is the BJP known for its ‘love’ of all things Muslim, Islamophobia is at the core of its ideology, its very purpose of existence.

Even if one ignores the Parivar’s role in thousands of anti-Muslim riots and historic crimes such as the destruction of Babri Masjid in December 1992, how can one shut one’s eyes to all that has happened under the Parivar over the past three and half years?

From lynchings and coldblooded killings of Muslims in broad daylight to rising hate attacks at the hands of the ruling party men and even senior leaders, these past few years would go down as one of the darkest periods in the country’s history. All this has happened with the knowledge and complicit inaction, if not the blessings, of those at the top.

So it takes breathtaking audacity for the Parivar to beat their chest and shed tears for Muslim women. It is like the Nazis crying over the predicament of Jews they sent to the gas chamber!

The triple talaq bill that the BJP using its brute majority in Parliament bulldozed through without any debate or amendments suggested by the lone Muslim MP Asaduddin Owaisi would create a law that in the name of protecting Muslim women punishes Muslim men. More important, it shuts out all possibilities of reconciliation between the partners.

As Dr. Javed Jamil argues, the bill introduced by the BJP government does not ban triple talaq (divorce) but validates it, making the divorce valid but punishable under law with at least 3-year imprisonment: “The argument being presented is that the Bill is in tune with Qur’anic injunctions. It is not.

Of course, the Qur’an prescribes a method of talaq, which allows reconciliation within three months and the talaq becomes operable only after the period of Iddah (extended till the completion of the prenatal, natal and also postnatal period). The bill passed by Lok Sabha instead of rejecting triple talaq and directing the husband to follow the proper procedure accepts it as valid meaning that talaq has taken place and punishes the husband with three years’ imprisonment.”

According to another scholar M. Burhanuddin Qasimi, the bill indeed criminalizes the Islamic concept of divorce as a whole and not just triple talaq. The definition of Talaq Bid’ah in the bill is ambiguous and utterly confusing. It covers all forms of talaq, which is enforceable with immediate effect. Thus the bill is against Qur’an and all juristic schools of Islamic Shariah. It is against Islam and practices of all Muslims around the world.

Writing in Indian Express, legal luminary Prof Faizan Mustafa notes that the government is doing a huge disservice to Muslim women as no husband on return from jail is likely to retain the wife on whose complaint he has gone to prison. “The bill will lead to more divorces. The remedy to tackle triple divorce is thus worse than the disease. The bill also obliterates the distinction between “major” and “minor” crimes by providing the excessive and disproportionate punishment of three years.”

But if things have come to such a pass allowing an Islamophobic regime to take advantage of the situation, the Indian Muslim community has no one to blame but its own leadership. Even when it had been apparent that the current regime in Delhi is out to exploit the issue, the Muslim leadership and wise men of Muslim Personal Law Board took no steps to counter the mischievous government narrative.

They just sat around waiting for the government to ambush the community. They did not mobilize the public opinion including among the Muslims on the issue. No one thought of approaching opposition lawmakers, against the BJP’s machinations. As a result, the Congress ended up supporting the government in Lok Sabha.

It was only when the lower house passed the Bill without any resistance that the Muslim leadership woke up to rally the support of opposition parties like the DMK and even the NDA ally, Telugu Desam. The Congress also realized the massive opposition within the Muslim community to the Bill. It was this last minute resistance that helped block the Bill in Rajya Sabha, the upper house in which the BJP remains weak.

This episode once again exposes the utter bankruptcy and shocking incompetence of Indian Muslim leadership. This at a time when the community faces unprecedented threats and challenges on every front, more importantly, from a very hostile government. Their very existence and identity is at stake.

These challenges call for a mature and forward-looking leadership that is not only familiar with the new political realities but is also alive to the needs and aspirations of its people, majority of whom are young.

The Muslim leadership needs to focus on immediate reforms to put an end to the abuse of divorce laws by reckless, irresponsible men. Although the practice of divorce in Indian Muslim society is still very negligible and almost non-existent when compared to other communities, including the Hindus and Christians, the Muslim Law Board can no long afford inaction on the issue.

Indeed, it should have initiated these reforms of its own volition to stop such regressive practices. Especially when most Ulema advice against instant divorce. Many Muslim countries have banned it.

By failing to act in time, the Board presented the Parivar with a perfect opportunity to target the Shariah, portraying Islam and all Muslims as unreasonable and anti-women. It handed the regime a big stick to beat Muslims with.

This when the Parivar is yet to break their silence over the inhuman treatment of Hindu women, including 60 million widows. Every year thousands of Hindu women are burned alive for dowry. Thousands more are killed in their mothers’ womb for being born of a ‘wrong gender.’ The Muslim society is not perfect of course. But it is largely free of many of these evils and hateful patriarchal practices.

That said, there is no denying that the community needs to change with changing times and it should not wait for the government — least of all one led by the BJP — to dictate reforms to it. Change must come from within.

I have highest respect for the Islamic scholars and intellectuals of the

Muslim Personal Law Board and Muslim Majlise Mushawarat, the umbrella body of Muslim organizations. However, they have wasted a lot of time and opportunities to confront the new realities of a new India. It is time they prepared themselves for the challenges of a fast evolving world by becoming more transparent and accountable.

These highest representative bodies of Muslims must open their doors to more broadminded intellectuals and well-wishers of the community from more diverse backgrounds. Above all, they must accommodate more women, making themselves representative of a 200-million strong community. The times they are a-changing and we must change with them.

— Aijaz Zaka Syed is an independent journalist and former newspaper editor. Email: aijaz.syed@hotmail.com

Posted by: Bagewafa | جنوری 10, 2018

کفن بیچ دیںگے…محمدعلی وفا

کفن بیچ دیںگے…محمدعلی وفا

 

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موقع ملا تو چمن بیچ دیںگے

گر بس چلے تو گگن بیچ دیںگے

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یہ ڈاکو،اچکے،ظالم وطن کے

قبر بیچ دیںگے، کفن بیچ دیںگے

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آنچل بہن کا ،اور غیرتے دختر

مانکا کبھی پیرہن بیچ دیںگے

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ممکن نہی کے یہ بیچے ہمالہ

یہ آب گنگو جمن بیچ دیںگے

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دشمن وطن کے ،لوٹیرے سیاسی

ڈر ہے وفا یہ وطن بیچ دیںگے

Posted by: Bagewafa | جنوری 9, 2018

How a pastor became a Muslimto……The Deen Show

How a pastor became a Muslimto……The Deen Show

Angry Asaduddin Owaisi उतरे ट्रिपल तलाक़के सामने लाखो लोगोके साथ मैदान मे-मोदी शाह के होश उड़े

عمر گزری رہ گزر کے آس پاس….رسا چغتائی

عمر گزری رہ گزر کے آس پاس

رقص کرتے اس نظر کے آس پاس

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زلف کھلتی ہے تو اٹھتا ہے دھواں

آبشار چشم تر کے آس پاس

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کوندتی ہیں بجلیاں برسات میں

طائر بے بال و پر کے آس پاس

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رات بھر آوارہ پتے اور ہوا

رقص کرتے ہیں شجر کے آس پاس

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چھوڑ آیا ہوں متاع جاں کہیں

غالباً اس رہ گزر کے آس پاس

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بال بکھرائے یہ بوڑھی چاندنی

ڈھونڈتی ہے کیا کھنڈر کے آس پاس

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اس گلی میں ایک لڑکا آج بھی

گھومتا رہتا ہے گھر کے آس پاس

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ایک صورت آشنا سائے کی دھوپ

پڑ رہی ہے بام و در کے آس پاس

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کیسے پر اسرار چہرے ہیں رساؔ

خواب گاہ شیشہ گر کے آس پاس

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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास–रसा चुग़ताई

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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास

रक़्स करते उस नज़र के आस-पास

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ज़ुल्फ़ खुलती है तो उठता है धुआँ

आबशार-ए-चश्म-ए-तर के आस-पास

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कौंदती हैं बिजलियाँ बरसात में

ताइर-ए-बे-बाल-ओ-पर के आस-पास

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रात भर आवारा पत्ते और हवा

रक़्स करते हैं शजर के आस-पास

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छोड़ आया हूँ मता-ए-जाँ कहीं

ग़ालिबन उस रहगुज़र के आस-पास

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बाल बिखराए ये बूढ़ी चाँदनी

ढूँडती है क्या खंडर के आस-पास

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इस गली में एक लड़का आज भी

घूमता रहता है घर के आस-पास

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एक सूरत-आश्ना साए की धूप

पड़ रही है बाम-ओ-दर के आस-पास

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कैसे पुर-असरार चेहरे हैं ‘रसा’

ख़्वाब-गाह-ए-शीशा-गर के आस-पास

Posted by: Bagewafa | جنوری 3, 2018

Gauhar Raza, Shankar Shad Mushaira 2017,Hello Mushaira

نیا حکم نامہ ۔۔۔جاوید اختر

جس زبان میں جوش، فیض و مجاز جیسے شاعر موجود ہوں اس زبان کی شاعری کے بارے میں یہ تصور ہی نہیں کیا جا سکتا ہے کہ سماج میں ظلم و استبداد کا دور دورہ ہو اور اردو شاعر خاموش تماشائی بنا دیکھتا رہے۔

اردو شاعری سے بغاوت کی بو نہ آئے تو پھر وہ اردو شاعری ہی نہیں۔ جس زبان میں جوش، فیض و مجاز جیسے شاعر موجود ہوں اس زبان کی شاعری کے بارے میں یہ تصور ہی نہیں کیا جا سکتا ہے کہ سماج میں ظلم و استبداد کا دور دورہ ہو اور اردو شاعر خاموش تماشائی بنا دیکھتا رہے۔ مودی راج میں سنگھ کے پرچم تلے چل رہے ’موب لنچنگ‘ جیسے شرمناک واقعات کے خلاف اردو شاعری میں بہت ساری آوازیں اٹھتی رہیں۔ لیکن اردو شاعری کے باغیانہ تیور کو جس خوبصورتی سے جاوید اختر نے سنہ 2017 میں کہی اپنی نظم میں ظاہر کیا وہ اردو شاعری کو چار چاند لگانے والی بات ہے۔ جاوید اختر کو ان کے فن شاعری کے لیے سنہ 2017 کا بہترین شاعر کہا جائے تو قطعاً غلط نہ ہوگا۔ اس نظم پر جاوید اختر کو مبارکباد کے ساتھ پیش خدمت ہے سنہ 2017 کی سب سے بہترین اردو نظم ’’نیا حکم نامہ‘‘۔

 

کسی کا حکم ہے

ساری ہوائیں

ہمیشہ چلنے سے پہلے بتائیں

کہ ان کی سمت کیا ہے؟

ہواؤں کو بتانا یہ بھی ہوگا

چلیں گی جب تو کیا رفتار ہوگی

کہ آندھی کی اجازت اب نہیں ہے

ہماری ریت کی سب یہ فصیلیں

یہ کاغذ کے محل جو بن رہے ہیں

حفاظت ان کی کرناہے ضروری

اور آندھی ہے پرانی ان کی دشمن

یہ سب ہی جانتے ہیں

کسی کا حکم ہے

 

دریا کی لہریں

ذرا یہ سرکشی کم کرلیں

اپنی حد میں ٹھہریں

ابھرنا اور بکھرنا

اور بکھر کر پھر ابھرنا

غلط ہے ان کا یہ ہنگامہ کرنا

یہ سب ہے صرف وحشت کی علامت

بغاوت کی علامت

بغاوت تو نہیں برداشت ہوگی

یہ وحشت تو نہیں برداشت ہوگی

اگر لہروں کو ہے دریا میں رہنا

تو ان کو ہوگا اب چپ چاپ بہنا

کسی کا حکم ہے

اس گلستاں میں بس

اب اک رنگ کے ہی پھول ہوں گے

کچھ افس ہوں گے

جو یہ طے کریں گے

گلستاں کس طرح بننا ہے کل کا

یقیناً پھول یک رنگی تو ہوں گے

مگر یہ رنگ ہوگا

کتنا گہرا، کتنا ہلکا

یہ افسر طے کریں گے

کسی کو کوئی یہ کیسے بتائے

گلستاں میں کہیں بھی

پھول یک رنگی نہیں ہوتے

کبھی ہوہی نہیں سکتے

کہ ہر اک رنگ میں چھپ کر

بہت سے رنگ رہتے ہیں

 

جنہوں نے باغ

یک رنگی بنانا چاہے تھے

ان کو ذرا دیکھو

کہ جب اک رنگ میں

سو رنگ ظاہر ہوگئے ہیں تو

وہ اب کتنے پریشاں ہیں

وہ کتنے تنگ رہتے ہیں

کسی کو کوئی یہ کیسے بتائے

 

ہوائیں اور لہریں

کب کسی کا حکم سنتی ہیں

ہوائیں

حاکموں کی مٹھیوں میں

ہتھکڑی میں قید خانوں میں

نہیں رکتیں

 

یہ لہریں

روکی جاتی ہیں

تو

 دریا جتنا بھی ہو پر سکوں

بے تاب ہوتا ہے

اور اس بے تابی کا اگلا قدم

سیلاب ہوتا ہے

کسی کو یہ کوئی کیسے بتائے

 

 

नया हुक्मनामा—-जावेद अख़तर

 जिस ज़बान में जोश, फ़ैज़-ओ-मजाज़ जैसे शायर मौजूद हो ,इस ज़बान की शायरी के बारे में ये तसव्वुर ही नहीं किया जा सकता है कि समाज में ज़ुलम-ओ-इस्तिबदाद का दौर दौरा हो और उर्दू शायर ख़ामोश तमाशाई बना देखता रहे।

 उर्दू शायरी से बग़ावत की बू ना आए तो फिर वो उर्दू शायरी ही नहीं। जिस ज़बान में जोश, फ़ैज़-ओ-मजाज़ जैसे शायर मौजूद हो इस ज़बान की शायरी के बारे में ये तसव्वुर ही नहीं किया जा सकता है कि समाज में ज़ुलम-ओ-इस्तिबदाद का दौर दौरा हो और उर्दू शायर ख़ामोश तमाशाई बना देखता रहे। मोदी राज में सिंह के पर्चम तले चल रहे मोब लंचिंग जैसे शर्मनाक वाक़ियात के ख़िलाफ़ उर्दू शायरी में बहुत सारी आवाज़ें उठती रहीं। लेकिन उर्दू शायरी के बाग़ियाना तेवर को जिस ख़ूबसूरती से जावेद अख़तर ने सन 2017 में कही अपनी नज़म में ज़ाहिर क्या, वो उर्दू शायरी को चार चांद लगाने वाली बात है। जावेद अख़तर को उनके फ़न्न-ए-शाइरी के लिए सन 2017 का बेहतरीन शायर कहा जाये तो क़तअन ग़लत ना होगा। इस नज़म पर जावेद अख़तर को मुबारकबाद के साथ पेश-ए-ख़िदमत है सन 2017 की सबसे बेहतरीन उर्दू नज़म नया हुक्मनामा।

 

 किसी का हुक्म है

 सारी हवाएं

 हमेशा चलने से पहले बताएं

 कि उनकी सिम्त किया है?

हवाओं को बताना ये भी होगा

 चलेंगी जब तो क्या रफ़्तार होगी

 कि आंधी की इजाज़त अब नहीं है

 हमारी रेत की सब ये फ़सीलें

 ये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैं

हिफ़ाज़त उनकी करना है ज़रूरी

 और आंधी है पुरानी उनकी दुश्मन

 ये सब ही जानते हैं

 किसी का हुक्म है

 दरिया की लहरें

 ज़रा ये सरकशी कम करलीं

 अपनी हद में ठहरें

 उभरना और बिखरना

 और बिखर कर फिर उभरना

 ग़लत है उनका ये हंगामा करना

 ये सब है सिर्फ वहशत की अलामत

बग़ावत की अलामत

बग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगी

 ये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगी

 अगर लहरों को है दरिया में रहना

 तो उनको होगा अब चुप-चाप बहना

 किसी का हुक्म है

 इस गुलसिताँ में बस

 अब इक रंग के ही फूल होंगे

 कुछ एफिस होंगे

 जो ये तै करेंगे

 गुलसिताँ किस तरह बनना है कल का

यक़ीनन फूल यक-रंगी तो होंगे

 मगर ये रंग होगा

 कितना गहिरा, कितना हल्का

 ये अफ़्सर तै करेंगे

 किसी को कोई ये कैसे बताए

 गुलसिताँ में कहीं भी

 फूल यक-रंगी नहीं होते

 कभी होहि नहीं सकते

 कि हर इक रंग में छिप कर

 बहुत से रंग रहते हैं

 जिन्हों ने बाग़

 यक-रंगी बनाना चाहे थे

 उनको ज़रा देखो

 कि जब इक रंग में

 सो रंग ज़ाहिर हो गए हैं तो

 वो अब कितने परेशां हैं

 वो कितने तंग रहते हैं

 किसी को कोई ये कैसे बताए

 हवाएं और लहरें

 कब किसी का हुक्म सुनती हैं

 हवाएं

 हाकिमों की मुट्ठियों में

 हथकड़ी में क़ैद-ख़ानों में

 नहीं रुकतीं

 ये लहरें

 रोकी जाती हैं

 तो

 दरिया जितना भी हो पर-सुकूँ

 बे-ताब होता है

 और इस बे-ताबी का उगला क़दम

 सेलाब होता है

 किसी को ये कोई कैसे बताए

 

تجھے کیوں فکر ہے اے گل۔۔۔۔۔ علامہ محمد اقبال

 

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تجھے کیوں فکر ہے اے گل دل صد چاک بلبل کی

تو اپنے پیرہن کے چاک تو پہلے رفو کر لے

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تمنا آبرو کی ہو اگر گلزار ہستی میں

تو کانٹوں میں الجھ کر زندگی کرنے کی خو کر لے

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صنوبر باغ میں آزاد بھی ہے، پا بہ گل بھی ہے

انھی پابندیوں میں حاصل آزادی کو تو کر لے

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تنک بخشی کو استغنا سے پیغام خجالت دے

نہ رہ منت کش شبنم نگوں جام وسبو کر لے

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نہیں یہ شان خود داری ، چمن سے توڑ کر تجھ کو

کوئی دستار میں رکھ لے ، کوئی زیب گلو کر لے

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چمن میں غنچۂ گل سے یہ کہہ کر اڑ گئی شبنم

مذاق جور گلچیں ہو تو پیدا رنگ و بو کر لے

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اگر منظور ہو تجھ کو خزاں ناآشنا رہنا

جہان رنگ و بو سے، پہلے قطع آرزو کر لے

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اسی میں دیکھ ، مضمر ہے کمال زندگی تیرا

جو تجھ کو زینت دامن کوئی آئینہ رو کر لے

 

तुझे क्यों फ़िक्र है ए गुल—- अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

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 तुझे क्यों फ़िक्र है ए गुल दिले सद चाक बुलबुल की

 तु अपने पैरहन के चाक तो पहले रफ़ू कर ले

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 तमन्ना आबरू की हो अगर गुलज़ारे हस्ती में

 तो कांटों में उलझ कर ज़िंदगी करने की खू कर ले

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सनोबर बाग़ में आज़ाद भी है, पा ब-गुल भी है

 इन्ही पाबंदीयों में हासिल आज़ादी को तु कर ले

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तुनुक बख़शी को इस्ति़ग़ना से पैग़ाम खिजालत दे

 ना रह मिन्नतकशे शबनम निगों जामो सबु कर ले

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 नहीं ये शान ख़ुद्दारी , चमन से तोड़ कर तुझको

 कोई दस्तार में रख ले , कोई जे़ब गुलू कर ले

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 चमन में ग़ुंचा-ए-गुल से ये कह कर उड़ गई शबनम

मज़ाक़ जौर गुलचीं हो तो पैदा रंग-ओ-बू कर ले

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 अगर मंज़ूर हो तुझको ख़िज़ां नाआशना रहना

 जहान-ए-रंग-ओ-बू से, पहले क़ता आरज़ू कर ले

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 इसी में देख , मुज़म्मिर है कमाल-ए-ज़िंदगी तेरा

 जो तुझको ज़ीनत दामन कोई आईना-ए-रु कर ले

ہر ایک بات یہ کہتے ہو تم کہ تو کیا ہے۔۔۔۔۔۔مرزا غالب

हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’……मिर्जा गालिब

 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू[1] क्या है

न शो’ले[2] में ये करिश्मा न बर्क़[3] में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू[4] क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न[5] तुमसे
वर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़िए-अ़दू[6] क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन[7]
हमारी जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू[8] क्या है

जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू[9] क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं क़ायल[10]
जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त[11] अज़ीज़[12]
सिवाए वादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू[13] क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम[14] भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू[15] क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार[16] और अगर हो भी
तो किस उमीद[17] पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शह का मुसाहिब[18], फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में "ग़ालिब” की आबरू[19] क्या है

क्या भाजपा भारत का संविधान बदलना चाहती है?आरफ़ा ख़ानम शेरवानी

 

 

 

धर्मनिरपेक्षता और संविधान को लेकर केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के बयान पर वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा ख़ानम शेरवानी (Arfa Khanum) का नज़रिया.

Yashwant Sinha ने छोड़ी BJP, कहा- लोकतंत्र खतरे में है। Quint Hindi….Quint

Posted by: Bagewafa | اپریل 9, 2018

Prime time ..9April2018……Ravish Kumar

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