मीडिया झुक सकता है मगर लोकतंत्र नहीं : हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बोले रवीश कुमार

इतनी दूर से बुलाया वो भी सुनने के लिए जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है. इंटरव्यू की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि अब सिर्फ स्पीच और स्टैंडअप कॉमेडी का ही सहारा रह गया है. सवालों के जवाब नहीं हैं बल्कि नेता जी के आशीर्वचन रह गए हैं.

ख़बर न्यूज़ डेस्क, Updated: 10 फ़रवरी, 2018 7:59 PM

मीडिया झुक सकता है मगर लोकतंत्र नहीं : हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बोले रवीश कुमार

हावर्ड यूनिवर्सिटी में रवीश कुमार

एनडीटीवी के एडिटर रवीश कुमार ने शनिवार को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में शिरकत की. वहां उन्‍होंने हिंदी में अपनी बात रखी. वहां उन्‍हें इंडिया कॉन्‍फ्रेंस 2018 में हिस्‍सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया था. उन्‍होंने वहां अपनी स्‍पीच में देश के वर्तमान हालात से लेकर छात्रों से जुड़े विषयों पर भी अपनी बात रखी. पढ़ें रवीश कुमार की पूरी स्‍पीच…

आप सभी का शुक्रिया. इतनी दूर से बुलाया वो भी सुनने के लिए जब कोई किसी की नहीं सुन रहा है. इंटरव्यू की विश्वसनीयता इतनी गिर चुकी है कि अब सिर्फ स्पीच और स्टैंडअप कॉमेडी का ही सहारा रह गया है. सवालों के जवाब नहीं हैं बल्कि नेता जी के आशीर्वचन रह गए हैं. भारत में दो तरह की सरकारें हैं. एक गवर्नमेंट ऑफ इंडिया. दूसरी गर्वनमेंट ऑफ मीडिया. मैं यहां गवर्नमेंट ऑफ मीडिया तक ही सीमित रहूंगा ताकि किसी को बुरा न लगे कि मैंने विदेश में गर्वनमेंट ऑफ इंडिया के बारे में कुछ कह दिया. यह आप पर निर्भर करता है कि मुझे सुनते हुए आप मीडिया और इंडिया में कितना फ़र्क कर पाते हैं.

एक को जनता ने चुना है और दूसरे ने ख़ुद को सरकार के लिए चुन लिया है. एक का चुनाव वोट से हुआ है और एक का रेटिंग से होता रहता है. यहां अमरीका में मीडिया है, भारत में गोदी मीडिया है. मैं एक-एक उदाहरण देकर अपना भाषण लंबा नहीं करना चाहता और न ही आपको शर्मिंदा करने का मेरा कोई इरादा है. गर्वनमेंट ऑफ मीडिया में बहुत कुछ अच्छा है. जैसे मौसम का समाचार. एक्सिडेंट की ख़बरें. सायना और सिंधु का जीतना, दंगल का सुपरहिट होना. ऐसा नहीं है कि कुछ भी अच्छा नहीं है. चपरासी के 14 पदों के लिए लाखों नौजवान लाइन में खड़े हैं, कौन कहता है उम्मीद नहीं है. कॉलेजों में छह छह साल में बीए करने वाले लाखों नौजवान इंतज़ार कर रहे हैं, कौन कहता है कि उम्मीद नहीं बची है. उम्मीद ही तो बची हुई है कि उसके पीछे ये नौजवान बचे हुए हैं.

एक डरा हुआ पत्रकार लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है. एक डरा हुआ पत्रकार आपका हीरो बन जाए, इसका मतलब आपने डर को अपना घर दे दिया है. इस वक्त भारत के लोकतंत्र को भारत के मीडिया से ख़तरा है. भारत का टीवी मीडिया लोकतंत्र के ख़िलाफ़ हो गया है. भारत का प्रिंट मीडिया चुपचाप उस क़त्ल में शामिल है जिसमें बहता हुआ ख़ून तो नहीं दिखता है, मगर इधर-उधर कोने में छापी जा रही कुछ काम की ख़बरों में क़त्ल की आह सुनाई दे जाती है.

सीबीआई कोर्ट के जज बी एच लोया की मौत इस बात का प्रमाण है कि भारत का मीडिया किसके साथ है. कैरवान पत्रिका की रिपोर्ट आने के बाद दिल्ली के एंकर आसमान की तरफ देखने लगे और हवाओं में नमी की मात्रा वाली ख़बरें पढ़ने लगे थे. यहां तक कि इस डर का शिकार विपक्षी पार्टियां भी हो गईं हैं. उनके नेताओं को बड़ी देर बाद हिम्मत आई कि जज लोया की मौत के सवालों की जांच की मांग की जाए. जब हिम्मत आई तब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच जज लोया के मामले की सुनवाई कर रही थी. इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी ने जब जज लोया से संबंधित पूर्व जजों की मौत पर सवाल उठाया तो उसे दिल्ली के अख़बारों ने नहीं छापा, चैनलों ने नहीं दिखाया.

ऐसा नहीं है कि गर्वनमेंट ऑफ मीडिया सवाल करना भूल गया. उसने राहुल गांधी के स्टार वार्स देखने पर कितना बड़ा सवाल किया था. आप कह सकते हैं कि गर्वनमेंट ऑफ इंडिया चाहती है कि विपक्ष का नेता सीरीयस रहे. लेकिन जब वह नेता सीरीयस होकर जज लोया को लेकर प्रेस कांफ्रेंस कर देता है तो मीडिया अपना सीरीयसनेस भूल जाता है. दोस्तों याद रखना मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात कर रहा हूं, विदेश में गर्वनमेंट ऑफ इंडिया की बात नहीं कर रहा हूं.

मीडिया में क्या कोई ख़ुद से डर गया है या किसी के डराने से डर गया है, यह एक खुला प्रश्न है. डर का डीएनए से कोई लेना देना नहीं है, कोई भी डर सकता है, ख़ासकर फर्ज़ी केस में फंसाना और कई साल तक मुकदमों को लटकाना जहां आसान हो, वहां डर सिस्टम का पार्ट है. डर नेचुरल है. गांधी ने जेल जाकर हमें जेल के डर से आज़ाद करा दिया. ग़ुलाम भारत के ग़रीब से ग़रीब और अनपढ़ से अनपढ़ लोग जेल के डर से आज़ाद हो गए. 2जी में दो लाख करोड़ का घोटाला हुआ था, मगर जब इसके आरोपी बरी हो गए तो वो जनाब आज तक नहीं बोल पाए हैं. जिनकी किताब का नाम है NOT JUST AN ACCOUNTANT, THE DIARY OF NATIONS CONSCIENCE KEEPER. जब 2जी के आरोपी बरी हुए, सीबीआई सबूत पेश नहीं कर पाई तब मैंने पहली बार देखा, किसी किताब को कवर को छिपते हुए. आपने देखा है ऐसा होते हुए. लगता है कि किताब कह रही है कि ये बात सही निकली कि ये सिर्फ एकाउंटेंट नहीं हैं, मगर ये बात झूठ है कि वे नेशंस के कांशिएंस कीपर हैं.

एक डरा हुआ मीडिया जब सुपर पावर इंडिया का हेडलाइन लगाता है तब मुझे उस पावर से डर लगता है. मैं चाहता हूं कि विश्व गुरु बनने से पहले कम से कम उन कॉलेजों में गुरु पहुंच जाएं, जहां 8500 लड़कियां पढ़ती हैं मगर पढ़ाने के लिए 9 टीचर हैं. फिर आप कहेंगे कि क्या कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है. क्या यह अच्छा नहीं है कि बिना टीचर के भी हमारी लड़कियां बीए पास कर जा रही हैं. क्या आप ऐसा हावर्ड में करके दिखा सकते हैं? कैंब्रिज में दिखा सकते हैं, आक्सफोर्ड में दिखा सकते हैं, क्या आप येल और कोलंबिया में ऐसा करके दिखा सकते हैं?

मीडिया ने इंडिया के बेसिक क्वेश्चन को छोड़ दिया है. इसलिए मैंने कहा कि इतनी दूर से आकर मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात करूंगा ताकि आपको न लगे कि मैं गर्वनमेंट ऑफ इंडिया की बात कर रहा हूं. मैं इंडिया की नहीं मीडिया की आलोचना कर रहा हूं. आप I और M में कंफ्यूज़ मत कर जाना.

एक ही मालिक के दो चैनल हैं. एक ही चैनल में दो एंकर हैं. एक सांप्रदायिकता फैला रहा है, एक किसानों की बात कर रहा है. एक झूठ फैला रहा है, एक टूटी सड़कों की बात कर रहा है. सवाल, हम जैसे सवाल करने वाले से है, जवाब हम जैसों के पास नहीं है. आप उनसे पूछिए जो आप तक मीडिया को लेकर आते हैं, जो आप तक इंडिया लेकर आते हैं. फेक न्यूज़ आज ऑफिशियल न्यूज़ है. न्यूज़ रूम में रिपोर्टर समाप्त हो चुके हैं. रिपोर्टर का इस्तेमाल हत्यारे के रूप में होता है. एक चैनल में एक सांसद के पीछ चार पांच रिपोर्टर एक साथ भेज दिया. देखने से लगा कि सारा मीडिया उसके पीछे पड़ा है. यह नया दौर है. डरा हुआ मीडिया अपने कैमरों से आपको डराने निकला है.

चैनलों पर सांप्रदायिकता भड़काने वाले एंकरों को जगह मिल रही है. इन एंकरों के पास सरकार के लिए कोई सवाल नहीं है, सिर्फ एक ही क्वेश्चन सबके पास है. इस सवाल का नाम है हिन्दू मुस्लिम क्वेश्चन, HMQ. भारत के न्यूज़ एंकर राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिक हो चुके हैं. इस हद तक कि जब उदयपुर में नौजवान भगवा झंडा लेकर अदालत की छत पर चढ़ जाते हैं तो एंकर चुप हो गए हैं. क्या हम ऐसा भारत चाहते थे, चाहते हैं? अदालत जिस संविधान के तहत है, उसी संविधान की एक धारा से मीडिया अपनी आज़ादी का चरणामृत ग्रहण करता है. चरणामृत तो समझते होंगे. गर्वनमेंट ऑफ मीडिया के पास एक ही एजेंडा है. हिन्दू मुस्लिम क्वेश्चन. इससे जुड़े फेक न्यूज़ की इतनी भरमार है कि आप आल्ट न्यूज़ डॉट इन पर पढ़ सकते हैं. अब तो फेक न्यूज़ दूसरी तरफ़ से बनने लगे हैं.

My dear friends, believe me, Media is trying to murder our hard earned democracy. Our Media is a murderer. यह समाज में ऐसा असंतुलन पैदा कर रहा है, अपनी बहसों के ज़रिए ऐसा ज़हर बो रहा है जिससे हमारे लोकतंत्र के भीतर भय का माहौल बना रहे. जिससे एक भीड़ कभी भी कहीं भी ट्रिगर हो जाती है और आपको ओवरपावर कर देती है. आप कहेंगे कि क्या इतना बुरा है, कुछ भी अच्छा नहीं है. मुझे पता है कि आपको बीच बीच में पॉज़िटिव अच्छा लगता है. एक पोज़िटिव बताता हूं. भारत का लोकतंत्र मीडिया के झुक जाने से नहीं झुक जाता है. वह मीडिया के मिट जाने से नहीं मिट जाएगा. वह न तो आपातकाल में झुका न वह गोदी मीडिया के काल में झुकेगा. भारत का लोकतंत्र हमारी आत्मा है. हमारा ज़मीर है. आत्मा अमर है. आप गीता पढ़ सकते हैं. मैं गर्वनमेंट ऑफ मीडिया की बात कर रहा हूं.

आपकी तरह मैं भी भारत को लेकर सपने देखता हूं. मगर जागते हुए. सामने की हकीकत ही मेरे लिए सपना है. मैं एक ऐसे भारत का सपना देखता हूं जो हकीकत का सामना कर सके. सोचिए ज़रा हम आज कल अतीत के सवालों मे क्यों उलझे हैं. अगर इन सवालों का सामना ही करना है तो क्या हम ठीक से कर रहे हैं, क्या इन सवालों का सामना करने की जगह टीवी का स्टुडियो है? या क्लासरूम है, कांफ्रेंस रूम हैं, और सामना हम किस तरह से करेंगे, क्या हम आज हिसाब करेंगे, क्या हम आज क़त्लेआम करेंगे? तो क्या आप अपने घर से एक हत्यारा देने के लिए तैयार हैं? नफ़रत की यह आंधी हर घर में एक हत्यारा पैदा कर जाएगी, वो आपका भाई हो सकता है, बेटा हो सकता है, दोस्त हो सकता है, पड़ोसी हो सकता है, क्या आपने मन बना लिया है? क्या हमने सीखा है कि इतिहास का सामना कैसे किया जाए? हम क्लास रूम में नहीं, सड़क और टीवी स्टुडियो में इतिहास का हिसाब करने निकले हैं. नेहरू को मुसलमान बना देने से या अकबर को पराजित बना देने से आप इतिहास नहीं बदल देते, इतिहास जब शिक्षा मंत्री के आदेश से बदलने लगे तो समझिए कि वह मंत्री केमिस्ट्री का भी अच्छा विद्यार्थी नहीं रहा होगा. क्या आप यहां हार्वर्ड में बैठकर इस बात को स्वीकार कर सकते हैं कि इतिहास के क्लास रूम में कोई मंत्री आकर इतिहास बदल दे. प्रोफेसर के हाथ से किताब लेकर, अपनी किताब पढ़ने के लिए दे दे. क्या आप बर्दाश्त करेंगे? जब आप खुद के लिए यह बर्दाश्त नहीं कर सकते तो भारत के लिए कैसे कर सकते हैं?

ज़रूर इतिहास में नई बहस चलनी चाहिए, नए शोध होने चाहिए. लेकिन हम वैसा कर रहे हैं. एक फिल्म पर हमने तीन महीने बहस की है. इतनी बहस हमने भारत की ग़रीबी पर नहीं की, भारत की संभावनाओं पर नहीं की, हमने तीन महीने एक फिल्म पर बहस की. तलवारें लेकर लोग स्टुडियो में आ गए, अब किसी दिन बंदूकें लेकर आएंगे.

महाराणा की हार के बाद भी लोगों ने महान विजेता के रूप में स्वीकार किया था. उनकी वीरता की गाथा पर उस हार का कोई असर ही नहीं था, जिसे एक शिक्षा मंत्री ने अपनी ताकत से बदलने की कोशिश की. लोक श्रुतियों में अपराजेय महाराणा के लिए किताबों में बड़ी हार है. मुझे नहीं लगता कि महाराणा प्रताप जैसे बहादुर क़ाग़ज़ पर हार की जगह जीत लिख देने से खुश होते. जो वीर होता है वो हार को भी गले लगाता है. पर यह सही है कि पब्लिक में इतिहास को लेकर वैसी समझ नहीं है जैसी क्लास रूम में है. क्लास रूम में भी भारी असामनता है. इतिहास के लाखों छात्रों को अच्छी किताबें नहीं मिलीं, शिक्षक नहीं मिले इसलिए सबने किताब की जगह कूड़ा उठा लिया. कूड़े को इतिहास समझ लिया. हम आज भी इतिहास को गौरव गान और गौरव भाव के बिना नहीं समझ पाते हैं. सोने की चिड़िया था हमारा देश. विश्व गुरु था देश. ये सब विशेषण हैं, इतिहास नहीं है. SUPERLATIVES CANT BE HISTORY.

वैसे इस तीन महीने में भारत मे जितने इतिहासकार पैदा हुए हैं, उतने ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज अपने कई सौ साल के इतिहास में पैदा नहीं कर पाए होंगे. भारत में आप बस जलाकर, पोस्टर फाड़कर इतिहासकार बन सकते हैं. किसी फिल्म का प्रदर्शन रुकवा कर आप इतिहासकार बन सकते हैं. तीन साल में हमने जिनते इतिहासकार पैदा किए हैं, उनके लिए अब हमारे पास उतनी यूनिवर्सटी भी नहीं हैं.

अंग्रेज़ों की कल्पना थी कि भारत के इतिहास को हिन्दू इतिहास मुस्लिम इतिहास में बदल दो. आज बहुत से लोग अंग्रेज़ी हुकूमत की सोच को पूरा कर रहे हैं. वो वापस इतिहास को हिन्दू बनाम मुसलमान के खांचे में ले जा रहे हैं. वर्तमान पर पर्दा डालने के लिए इतिहास से वैसे मुद्दे लाए जा रहे हैं जिनके ज़रिए नागरिक का, मतदाता का धार्मिक पहचान बनाई जा सके. हम क्यों अपनी भारतीयता कभी अनेकता में एकता में खोजते खोजते, धार्मिक एकरूपता में खोजने लगते हैं? हम संविधान से अपनी पहचान क्यों नहीं हासिल करते, जिसके लिए हमने सौ साल की लड़ाई लड़ी. दिन रात बहस किए, लाखों लोग जेल गए.

अगर बहुतों को लगता है कि इस सवाल पर बहस होनी चाहिए तो क्या हम सही तरीके से अपने सवाल रख रहे हैं, बहस कर रहे हैं, क्या उसका मंच अख़बार तक न पढ़ने वाले ये एंकर होंगे. आख़िर क्यों बहुसंख्यक धर्म इतिहास के किरदारों पर धार्मिक व्याख्या थोपना चाहता है? कभी मीडिया के स्पेस में हमारी भारतीयता मिले सुर मेरा तुम्हारा से बनती थी, आज हमारा सुर हमारा, तुम्हारा सुर तुम्हारा या तुम्हारा सुर कुछ नहीं, हमारा ही सुर तुम्हारा.

हम भारतीयों का भारतीय होने का बोध और इतिहास बोध दोनों संकट से गुज़र रहा है. हमें एक खंडित नागरिकता के बोध के साथ तैयार किए जा रहे हैं. जिसके भीतर फेक न्यूज़ और फेक हिस्ट्री के ज़रिए ऐसी पोलिटिकिल प्रोग्रामिंग की जा रही है कि किसी भी शहर में छोटे छोटे समूह में लोगों को ट्रिगर किया जा सकता है. क्या आप इतिहास का बदला ले सकते हैं तो फिर आप न्याय की मूल अवधारणा के खिलाफ जा रहे हैं जो कहता है कि खून का बदला खून नहीं होता है. अगर हम खून का बदला खून की अवधारणा पर जाएंगे तो हमारे चारों तरफ हिंसा ही हिंसा होगी.

इस समय भारत में दो तरह के पोलिटिकल आइडेंटिटि हैं. एक जो धार्मिक आक्रामकता से लैस है और दूसरा तो धार्मिक आत्मविश्वास खो चुका है. एक डराने वाला है और डरा हुआ है. यह असंतुलन आने वाले समय में हमारे सामने कई चुनौतियां लाने वाला हैं जिन्हें हम ख़ूब पहचानते हैं. हमने इसके नतीजे देखे हैं, भुगते भी हैं. अलग-अलग समय पर अलग-अलग समुदायों ने भुगते हैं. हमारी स्मृतियों से पुराने ज़ख़्म मिटते भी नहीं कि हम नए ज़ख़्म ले आते हैं.

जैसे हिन्दुस्तान एक टू इन वन देश है. जिसे हमारी सरकारी ज़ुबान में इंडिया और भारत के रूप में पहचान मिल चुकी है. उसी तरह हमारी पहचान धर्म और जाति के टू इन वन पर आधारित है. आप इन जाति संगठनों की तरफ से भारत को देखिए, आप उसका चेहरा सबके सामने देख नहीं पाएंगे. आप जाति का चेहरा चुपके से घर जाकर देखते हैं. हमने जाति को ख़त्म नहीं किया. हमने आज़ाद भारत में नई नई CAST COLONIES बनाई हैं. ये CAST COLONIES CONCRETE की हैं. इसके मुखिया उस आधुनिक भारत में पैदा हुए लोग हैं. पूछिए खुद से कि आज क्यों समाज में ये जाति कोलोनी बन रही हैं.

आज का मतलब 2018 नहीं और न ही 2014 है. हम भारत का गौरव करते हैं, धर्म का गौरव करते हैं, जाति का गौरव करते हैं. हम अपने भीतर हर तरह की क्रूरता को बचाते रहना चाहते हैं. क्या जाति वाकई गौरव करने की चीज़ है? इस सवाल का जवाब अगर हां है तो हम संविधान के साथ धोखा कर रहे हैं, अपने राष्ट्रीय आंदोलन की भावना के साथ धोखा कर रहे हैं. टीम इंडिया का राजनीतिक स्लोगन कास्ट इंडिया, रीलीजन इंडिया में बदल चुका है.

आंध्र प्रदेश में ब्राह्ण जाति की एक कोपरेटिव सोसायटी बनी है. इसका मिशन है ब्राह्मणों की विरासत को दोबारा से जीवित करना और उसे आगे बढ़ाना. ब्राह्मणों की विरासत क्या है, राजपूतों की विरासत क्या है? तो फिर दलितों की विरासत भीमा कोरेगांव से क्या दिक्कत है? फिर मुग़लों की विरासत से क्या दिक्कत है जहां इज़राइल के राष्ट्र प्रमुख भी अपनी पत्नी के साथ दो पल गुज़ारना चाहते हैं. आप इस सोसायटी की वेबसाइट http://www.apbrahmincoop.com पर जाइये. मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू इसकी पत्रिका लांच कर रहे हैं क्योंकि इस सोसायटी का मुखिया उनकी पार्टी का सदस्य है.

इस सोसायटी के लक्ष्य वहीं हैं जो एक सरकार के होने चाहिए. जो हमारी आर्थिक नीतियों के होने चाहिए. क्या हमारी नीतियां इस कदर फेल रही हैं कि अब हम अपनी अपनी जातियों का कोपरेटिव बनाने लगे हैं. इसका लक्ष्य है ग़रीब ब्राह्मण जातियों का सेल्फ हेल्फ ग्रुप बनाना, उन्हें बिजनेस करने, गाड़ी खरीदने का लोन देना. इसके सदस्य सिर्फ ब्राह्मण समुदाय से हो सकते हैं. आईएएस हैं, पेशेवर लोग हैं. इसके चेयमैन आनंद सूर्या भी ब्राह्मण हैं. अपना परिचय में खुद को ट्रेड यूनियन नेता और बिजनेसमैन लिखते हैं. दुनिया में बिजनैस मैन शायद ही ट्रेड यूनियन नेता बनते हैं. वे बीजेपी, भारतीय मज़दूर संघ, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, जनता दल सेकुलर में रह चुके हैं. जहां उन्होंने सीखा है कि ब्राह्ण समुदाय को नैतिक और राजनीतिक समर्थन कैसे देना है. हमें पता ही नहीं था समाजवादी पार्टी में लोग ये सब भी सीखते हैं. 2003 से वे टीडीपी में हैं.

यह अकेला ऐसा संस्थान नहीं है. विदेशों में भी और भारत में भी ऐसे अनेक जातिगत संगठन कायम हैं. इनके अध्यक्षों की राजनीतिक हैसियत किसी नेता से अधिक है. इस स्पेस के बाहर बिना इस तरह की पहचान के लिए नेता बनना असंभव है. बंगलुरू में तो 2013 में सिर्फ ब्राह्मणों के लिए वैदिक सोसायटी बननी शुरू हो गई थी. सोचिए एक टाउनशिप है सिर्फ ब्राह्मणों का. ये एक्सक्लूज़न हमें कहां ले जाएगा, क्या यह एक तरह का घेटो नहीं है. 2700 घर ब्राहमणों के अलग से होंगे. ये तो फिर से गांवों वाला सिस्टम हो जाएगा. ब्राह्मणों का अलग से. क्या यह घेटो नहीं है?

आज़ाद भारत में यह क्यों हुआ? अस्सी के दशक में जब हाउसिंग सोसायटी का विस्तार हुआ तो उसे जाति और खास पेशे के आधार पर बसाया गया. दिल्ली में पटपड़गंज है, वहां पर जाति, पेशा, इलाका और राज्य के हिसाब से कई हाउसिंग सोसायटी आपको मिलेगी. तो फिर हम संविधान के आधार पर भारतीय कैसे बन रहे थे. क्या बिना जाति के समर्थन के हम भारतीय नहीं हो सकते.

जयपुर के विद्यानगर में जातियों के अलग अलग हॉस्टल बने हैं. श्री राजपूत सभा ने अपनी जाति के लड़कों के लिए हॉस्टल बनाए हैं. लड़कियों के भी हैं. यादवों के भी अलग हॉस्टल हैं. मीणा जाति के भी अलग छात्रावास हैं. ब्राह्मण जाति के भी अलग हॉस्टल हैं. अब आप बतायें, इन हॉस्टल से निकल जो भी आगे जाएगा वो अपने भीतर किसकी पहचान को आगे रखेगा. क्या उसकी पहचान का संविधान आधारित भारतीयता से टकराव नहीं होगा? खटिक छात्रावस भी है जो सरकार ने बनाए हैं. क्यों राज्य सरकारों को दलितों के लिए अलग से हॉस्टल बनाने की ज़रूरत पड़ी? क्या हमारी जातियों के ऊंचे तबके ने संविधान के आधार पर भारत को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, क्या वह संविधान आधारित नागरिकता को पसंद नहीं करता है? क्या जातियों को कोई ऐसा समूह है जो धर्म के सहारे अपना वर्चस्व फिर से हासिल करना चाहता है? क्या कोई ऐसा भी समूह है जो अब पहले से कई गुना ज़्यादा ताकत से इस वर्चस्व को चुनौती दे रहा है?

भारत की राजनीति की तरह मीडिया भी इन्हीं कास्ट कॉलोनी से आता है. उसके संपादक भी इसी कास्ट कालोनी से आते हैं. उन्हें पब्लिक में जाति की पहचान ठीक नहीं लगती मगर उन्हें धर्म की पहचान ठीक लगती है. इसलिए वे धर्म की पहचान के ज़रिए जाति की पहचान ठेल रहे हैं. यह काम वही कर सकता है जो लोकतंत्र में यकीन नहीं रखता हो क्योंकि जाति लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है. गर्वनमेंट ऑफ मीडिया में सब कुछ ठीक नहीं है. पोज़िटिव यही है कि लोकतंत्र के ख़िलाफ़ यह पूरी आज़ादी से बोल रहा है. भाईचारे के ख़िलाफ़ पूरी आज़ादी से बोल रहा है. हमारी गर्वनमेंट ऑफ मीडिया आज़ाद है. पहले से कहीं आज़ाद है. इसी पोज़िटिव नोट पर मैं अपना भाषण समाप्त कर रहा हूं.

कुल मिलाकर हम यथास्थिति को प्रमोट कर रहे हैं. धर्म के गौरव को हम राष्ट्र बता रहे हैं. आप चाहें तो डार्विन को रिजेक्ट कर सकते हैं. आप चाहें तो गणेश पूजा को ही मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई घोषित कर सकते हैं.

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कासगंज हिंसा…… हिमांशु कुमार

 

कासगंज हिंसा का शिकार हुए चंदन पर ब्लॉगर हिमांशु कुमार ने किए विचार व्यक्त, कहा अगर कोई दंगाई….

मुजफ्फरनगर में दंगे हुए उसके बाद मैं वहां काम करने गया. दंगों की वजह दो जाट लड़कों की मौत बताई गई थी. मैंने उस गांव में जाकर जब लोगों से बात की तो पता चला कि मारे गए दोनों जाट लड़के एक मुस्लिम लड़के शाहनवाज की हत्या करने आए थे.

और उनके साथ चार लोग और भी थे. बाकी के वह चारों हत्यारे निकल भागने में सफल हुए. यह दोनों हत्यारे भीड़ के हत्थे चढ़ गए. भीड़ में हिंदू और मुसलमान दोनों थे. मामला सिर्फ इन दो जाट लड़कों की मौत को लेकर ही बनाया गया.

लेकिन जिस मुस्लिम लड़के की हत्या इन लोगों ने कर दी. उस शाहनवाज़ की हत्या के आरोप में आज तक किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया. जबकि मारे गए दो जाट लड़कों में से एक का पिता जो पुराना हिस्ट्रीशीटर रहा है

उसने उस मुस्लिम लड़के को मारा था. लेकिन आज तक ना स्थानीय पुलिस, ना जि़ला अदालत, ना सुप्रीम कोर्ट किसी ने भी यह नहीं कहा कि मारे गए लड़के शाहनवाज की हत्या की रिपोर्ट क्यों नहीं लिखी गई ?

और उस की हत्या के आरोप में आज तक कोई गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ ? सजा तो जाने ही दीजिए. इसी तरह सहारनपुर में शब्बीरपुर में जो दलितों की बस्ती राजपूतों ने जलाई.

आग लगाते समय अपनी ही दंगाई भीड़ के भगदड़ में सांस घुटने से एक राजपूत लड़के की मौत हुई. उसे लेकर दलितों को बुरी तरह पीटा गया. घर जला दिए गए. संपत्ति का नुकसान किया.

ठीक इसी तरह कासगंज में दंगा करने गया लड़का मारा गया. नफरत फैलाते समय. दंगा करते समय. हत्या करते समय. अगर कोई हत्यारा या दंगाई मारा जाता है. तो उसे शहीद क्यों घोषित करते हो ?

सिर्फ इसलिए क्योंकि आप कमजोर अल्पसंख्यक समुदाय. या दलित जातियों को खलनायक. और खुद को बहुत महान नायक और देशभक्त घोषित करना चाहते हो.

और इस महानता के कारण इस देश पर हमेशा राज करते रहना चाहते हो. अपनी चालाकी समझो यार. जिस दिन तुम्हारी यह चालाकी लोगों की समझ में आ जाएगी

उस दिन शर्म से कहां मूंह छिपाओगे ?

नेहरू से झगड़े की बात सोच भी नहीं सकता-पटेल ! नेहरू और पटेल में झगड़ा था-बीजेपी !

  

भाजपाः पटेल को बड़ा दिखाने के लिए नेहरू को छोटा करने की साजिश   

राम पुनियानी

पिछले कुछ वर्षों से 31 अक्टूबर के आसपास, संघ परिवार, सरदार वल्लभभाई पटेल का महिमामंडन करने वाले बयानों की झड़ी लगा देता है। सन 2017 का अक्टूबर भी इसका अपवाद नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘‘मैं भाजपा से हूं और सरदार पटेल कांग्रेस में थे परंतु मैं फिर भी उनकी विचारधारा का पालन करता हूं और उनके दिखाए रास्ते पर चलता हूं। उनकी विचारधारा किसी पार्टी की नहीं है।’’ इसके साथ ही, जवाहरलाल नेहरू का कद छोटा करने के प्रयास भी हो रहे हैं। मोदी ने कहा कि नेहरू ने सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में भाग नहीं लिया। मोदी-भाजपा के यह प्रयास एक राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा हैं।

भाजपा जिस विचारधारा को मानती है, उस विचारधारा से जुड़े किसी संगठन या नेता ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया था। जाहिर है कि भाजपा को एक ऐसे नायक की ज़रूरत है जो स्वाधीनता संग्राम सैनानी रहा हो। इसके लिए उन्होंने सरदार पटेल को चुना है। नेहरू एक अत्यंत ऊँचे कद के नेता थे और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के हामी थे। भाजपा और उससे जुड़े संगठन, नेहरू की भूमिका को कम करके दिखाना चाहते हैं। इसी एजेंडे के तहत वे बार-बार इस आशय के वक्तव्य जारी करते हैं जिनसे ऐसा लगे कि नेहरू और पटेल के बीच गंभीर मतभेद थे। इन वक्तव्यों के ज़रिए, पटेल का महिमामंडन किया जाता है और नेहरू का कद घटाने का प्रयास। भाजपा का स्वाधीनता संग्राम के दो वरिष्ठतम नेताओं को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने का यह प्रयास अत्यंत घृणित है।

मोदी का यह दावा कि वे पटेल की विचारधारा के हामी हैं और उनके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं एक बड़ा झूठ है। पटेल एक भारतीय राष्ट्रवादी और गांधीजी के अनन्य अनुयायी थे। इसके विपरीत, मोदी, आरएसएस की विचारधारा में रंगे हुए हैं, जिसका मूल एजेंडा हिन्दू राष्ट्रवाद है। पटेल, आरएसएस की विचारधारा की बांटने वाली प्रवृत्ति से अच्छी तरह वाकिफ थे। वे जानते थे कि आरएसएस घृणा फैलाने के अलावा कुछ नहीं करता। महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ने लिखा ‘‘…इन दोनों (आरएसएस और हिन्दू महासभा) संगठनों, विशेषकर पहले, की गतिविधियों के चलते देश में इस तरह का वातावरण बन गया जिसके कारण इतनी भयावह त्रासदी संभव हो सकी… आरएसएस की गतिविधियां शासन और राज्य के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं।’’

भाजपा के पटेल और नेहरू को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी, बल्कि शत्रु बताने का प्रयास निंदनीय है। सच यह है कि दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते थे और एक-दूसरे के पूरक थे। उनके बीच किसी तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं थी। पटेल जानते थे कि नेहरू की लोकप्रियता जबरदस्त है। एक रैली, जिसमें पटेल और नेहरू दोनों ने भाग लिया था, में उमड़ी विशाल भीड़ पर टिप्पणी करते हुए पटेल ने अमरीकी पत्रकार विन्सेंट शीएन से कहा था कि ‘‘वे जवाहर के लिए आए थे मेरे लिए नहीं’’। इसके साथ ही, पटेल कांग्रेस संगठन की रीढ़ थे। गांधी, जिन्हें राष्ट्र ने देश का पहला प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार दिया था, ने इस पद के लिए नेहरू को चुना क्योंकि वे जानते थे कि नेहरू को वैश्विक राजनीति की बेहतर समझ है और वे जनता के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं।

नेहरू को छोटा सिद्ध करने के लिए मोदी किस हद तक जा सकते हैं यह इस बात से जाहिर है कि उन्होंने कहा कि नेहरू ने पटेल के अंतिम संस्कार में भाग नहीं लिया था। ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ ने पटेल के अंतिम संस्कार की खबर प्रमुखता से अपने मुखपृष्ठ पर छापी थी। इसमें कहा गया था कि इस मौके पर राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मौजूद थे। समाचारपत्र में नेहरू की सरदार पटेल को श्रद्धांजलि भी प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरदार पटेल ने भारत को स्वाधीनता दिलवाने और राष्ट्र के रूप में उसके निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक वीडियो क्लिप पोस्ट की थी जिसमें नेहरू को पटेल के अंतिम संस्कार में भाग लेते दिखाया गया था। मोरारजी देसाई ने अपनी आत्मकथा (खंड1, पृष्ठ 271, अनुच्छेद 2) में इस अवसर पर पंडित नेहरू की उपस्थिति की चर्चा की है। इन तथ्यों के सामने आने के बाद मोदी अपनी बात से पलट गए और यह दावा किया गया कि उनकी बात को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया था परंतु इससे यह साफ है कि मोदी और उनके साथी, नेहरू की नकारात्मक छवि बनाने के लिए कितने आतुर हैं।

कांग्रेस-नेहरू और पटेल के बीच खाई थी यह बताने के लिए प्रयासों के तहत मोदी ने गुजरात के खेड़ा में बोलते हुए कहा कि कांग्रेस ने देश के विभाजन को सुगम बनाया। तथ्य यह है कि उस समय कांग्रेस की ओर से जो दो बड़े नेता चर्चाओं में भाग ले रहे थे वे थे सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू। जसवंत सिंह ने जिन्ना पर लिखी अपनी पुस्तक में विभाजन के लिए नेहरू-पटेल को दोषी बताया था। विभाजन कई जटिल कारकों का नतीजा था। अब, जहां पटेल की प्रशंसा की जा रही है वहीं कांग्रेस को विभाजन के लिए दोषी बताया जा रहा है। यह सरासर झूठ है क्योंकि तत्समय जो भी निर्णय लिए गए थे उसमें नेहरू और पटेल की बराबर भागीदारी थी। व्ही.पी. मेनन, जिन्होंने विभाजन की योजना तैयार की थी, ने लिखा है कि ‘‘पटेल ने भारत के विभाजन को दिसंबर 1946 में ही स्वीकार कर लिया था। नेहरू इसके लिए छह माह बाद राज़ी हुए।’’

नेहरू और पटेल अलग-अलग रास्तों पर चल रहे थे यह प्रचार पहले भी किया जाता रहा है – यहां तक कि दोनो के जीवनकाल में भी। नेहरू ने पटेल को लिखा कि वे इस तरह की अफवाहों से विक्षुब्ध हैं और उन्हें इससे पीड़ा होती है। इसके जवाब में पटेल ने 5 मई, 1948 को अपने पत्र में नेहरू को लिखा, ‘‘आपके पत्र ने मेरे मन को गहरे तक छू लिया… हम दोनों जीवन भर एक साथ मिलकर एक ही उद्देश्य के लिए काम करते आए हैं। हमारे दृष्टिकोणों और स्वभाव में चाहे जो भी अंतर रहे हों परंतु हमारे परस्पर प्रेम और एक-दूसरे के प्रति सम्मान के भाव और हमारे देश के हित उनसे हमेशा ऊपर रहे’’। उन्होंने संसद में बोलते हुए कहा, ‘‘मैं सभी राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रधानमंत्री के साथ हूं। लगभग चैथाई सदी तक हम दोनों ने हमारे गुरू (गांधी) के चरणों में बैठकर भारत की स्वाधीनता के लिए एक साथ संघर्ष किया। आज जब महात्मा नहीं हैं तब हम आपस में झगड़ने की बात सोच भी नहीं सकते।’’

कश्मीर के मुद्दे पर भी यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि दोनों के बीच मतभेद थे और अगर पटेल की चलती तो वे बल प्रयोग कर कश्मीर को भारत का हिस्सा बना लेते। आईए, हम देखें कि सरदार वल्लभभाई पटेल का इस मुद्दे पर क्या कहना था। बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए 30 अक्टूबर, 1948 को पटेल ने कहा, ‘‘कई लोग ऐसा मानते हैं कि अगर किसी क्षेत्र में मुसलमानों का बहुमत है तो वह पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहिए। वे इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि हम कश्मीर में क्यों हैं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत सीधा सा है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग यह चाहते हैं कि हम वहां रहें। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम उनकी ज़मीन पर रहें, उसके बाद हम एक मिनिट पर वहां नहीं रूकेंगे… हम कश्मीर के लोगों का दिल नहीं तोड़ सकते (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)’’।

जैसा कि पटेल के पत्रों और संसद में दिए गए उनके वक्तव्यों से जाहिर है, इन दोनों महान नेताओं का आपस में जबरदस्त तालमेल और घनिष्ठता थी और वे एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। भाजपा का झूठा प्रचार कभी सफल नहीं होगा।

राम पुनियानी आईआईटी मुंबई के पूर्व प्रोफेसर और चर्चित समाजविज्ञानी हैं।

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया ) 

यह भी पढ़ें–

नेहरू जैसा त्याग और बलिदान किसी ने नहीं किया, मैं उनका वफ़ादार-पटेल

जम्‍मू कश्‍मीर में अनुच्‍छेद 370 पर पटेल और मुखर्जी दोनों सहमत थे, भाजपा झूठ बोलती है!

 

Posted by: Bagewafa | فروری 2, 2018

exclusive Lecture of journalist ravish kumar

exclusive Lecture of journalist ravish kumar

आज से पचास साल पहेली की मोहंमद अल्वी की एक ग़ज़ल: शहरो में

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अब वो रौनक़ न रही शहरो में  

ज़िंदगी तल्ख़ हुई शहरो में  

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चारसू फैल गया सन्नाटा

ख़ामशी दौड़ गई शहरो में  

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किस लिये गाँव  लोग आते हैं

जाने क्या बात हुई शहरो में  

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तुम भी यूसुफ़ हो चले जाओ ना

हुस्न बिकता है अभी शहरो में  

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अब भी घुंघरू की सदा आती है

रात के वक्त कईं शहरो में  

 .

शाम होते ही उतर आती है

आज भी लालपरी शहरो में  

.

भूक ने साथ न छोड़ा ‘अल्वी’

भीक तक भी न मिली शहरो में  

 

بہت پیارے انسان تسلیم اِلاہی زلفی۔۔۔۔۔۔۔۔محمد علوی

अच्छे दिन कब आएँगे——मोहम्मद अल्वी

.

 

अच्छे दिन कब आएँगे

क्या यूँ ही मर जाएँगे

 .

अपने-आप को ख़्वाबों से

कब तक हम बहलाएँगे

बम्बई में ठहरेंगे कहाँ

दिल्ली में क्या खाएँगे

 .

खिलते हैं तो खिलने दो

फूल अभी मुरझाएँगे

.

कितनी अच्छी लड़की है

बरसों भूल न पाएँगे

 .

मौत न आई तो ‘अल्वी’

छुट्टी में घर जाएँगे

اچھے دن کب آئیں گے………محمد علوی

 .

 

اچھے دن کب آئیں گے

کیا یوں ہی مر جائیں گے

 .

اپنے آپ کو خوابوں سے

کب تک ہم بہلائیں گے

.

بمبئی میں ٹھہریں گے کہاں

دلی میں کیا کھائیں گے

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کھلتے ہیں تو کھلنے دو

پھول ابھی مرجھائیں گے

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کتنی اچھی لڑکی ہے

برسوں بھول نہ پائیں گے

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موت نہ آئی تو علویؔ

چھٹی میں گھر جائیں گے

اس فتنہ مغرب کے وفادار پہ لعنت۔۔۔۔۔۔صالح اچھا

अघोषित आपातकाल” पर रविश कुमार के विचार

जज प्रेस कांफ्रेस के बीच आखिरकार बचाने का सवाल…………रविश कुमार

 

لاتا ہے مجھے رقص میں ‘ گرداب کو چُھونا۔۔۔۔۔نسرین سید

.

کام آیا مِرے خوب ، تہہِ آب کو چُھونا

 مِلتا ہے کسے، گوہرِ نایاب کو چُھونا ؟

 .

 بڑھتی ہے طلب عشق میں’ دیدار ہو جتنا

 کرتا ہے فزوں پیاس یہاں ، آب کو چُھونا

.

لاتی ہے مجھے وَجد میں’ افلاک کی گردش

 لاتا ہے مجھے رقص میں ‘ گرداب کو چُھونا

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اسباب میسّر تھے مجھے سارے جہاں کے

 خواہش میں کہاں تھا مگر اسباب کو چُھونا

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سپنوں کی دعا دینا ۔۔۔۔ مِری آنکھ کو ہم دم !

نرمی سے ۔۔۔ ذرا دیدہِء بے خواب کو چُھونا

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کیا چیز تڑپ ہے’ دلِ مضطر سے نہ پوچھو

 جانو گے ‘ کبھی پارہ ء بے تاب کو چُھونا

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اک لَمس ترا ‘ زندگی پھونکے مِرے تن میں

 چُھونا ‘ ذرا ۔۔۔۔۔ اِس ماہیء بے آب کو چُھونا

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شب ہوتے ہی بن جاتی ہوں میں نور کا منبع

 راس آ گیا مجھ کو ‘ کسی مَہ تاب کو چُھونا

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نسرین! مِلا جب سے ۔۔ وہ اک لَمسِ ملائم

 بھاتا ہی نہیں ‘ اطلس و کم خواب کو چُھونا

Posted by: Bagewafa | جنوری 11, 2018

Why BJP cries for Muslim women……Aijaz Zaka Syed

 

Why BJP cries for Muslim women

Aijaz Zaka Syed

How does a party that presided over the mass rape and slaughter of Muslim women get away with presenting itself as their champion and protector? Not only is the BJP known for its ‘love’ of all things Muslim, Islamophobia is at the core of its ideology, its very purpose of existence.

Even if one ignores the Parivar’s role in thousands of anti-Muslim riots and historic crimes such as the destruction of Babri Masjid in December 1992, how can one shut one’s eyes to all that has happened under the Parivar over the past three and half years?

From lynchings and coldblooded killings of Muslims in broad daylight to rising hate attacks at the hands of the ruling party men and even senior leaders, these past few years would go down as one of the darkest periods in the country’s history. All this has happened with the knowledge and complicit inaction, if not the blessings, of those at the top.

So it takes breathtaking audacity for the Parivar to beat their chest and shed tears for Muslim women. It is like the Nazis crying over the predicament of Jews they sent to the gas chamber!

The triple talaq bill that the BJP using its brute majority in Parliament bulldozed through without any debate or amendments suggested by the lone Muslim MP Asaduddin Owaisi would create a law that in the name of protecting Muslim women punishes Muslim men. More important, it shuts out all possibilities of reconciliation between the partners.

As Dr. Javed Jamil argues, the bill introduced by the BJP government does not ban triple talaq (divorce) but validates it, making the divorce valid but punishable under law with at least 3-year imprisonment: “The argument being presented is that the Bill is in tune with Qur’anic injunctions. It is not.

Of course, the Qur’an prescribes a method of talaq, which allows reconciliation within three months and the talaq becomes operable only after the period of Iddah (extended till the completion of the prenatal, natal and also postnatal period). The bill passed by Lok Sabha instead of rejecting triple talaq and directing the husband to follow the proper procedure accepts it as valid meaning that talaq has taken place and punishes the husband with three years’ imprisonment.”

According to another scholar M. Burhanuddin Qasimi, the bill indeed criminalizes the Islamic concept of divorce as a whole and not just triple talaq. The definition of Talaq Bid’ah in the bill is ambiguous and utterly confusing. It covers all forms of talaq, which is enforceable with immediate effect. Thus the bill is against Qur’an and all juristic schools of Islamic Shariah. It is against Islam and practices of all Muslims around the world.

Writing in Indian Express, legal luminary Prof Faizan Mustafa notes that the government is doing a huge disservice to Muslim women as no husband on return from jail is likely to retain the wife on whose complaint he has gone to prison. “The bill will lead to more divorces. The remedy to tackle triple divorce is thus worse than the disease. The bill also obliterates the distinction between “major” and “minor” crimes by providing the excessive and disproportionate punishment of three years.”

But if things have come to such a pass allowing an Islamophobic regime to take advantage of the situation, the Indian Muslim community has no one to blame but its own leadership. Even when it had been apparent that the current regime in Delhi is out to exploit the issue, the Muslim leadership and wise men of Muslim Personal Law Board took no steps to counter the mischievous government narrative.

They just sat around waiting for the government to ambush the community. They did not mobilize the public opinion including among the Muslims on the issue. No one thought of approaching opposition lawmakers, against the BJP’s machinations. As a result, the Congress ended up supporting the government in Lok Sabha.

It was only when the lower house passed the Bill without any resistance that the Muslim leadership woke up to rally the support of opposition parties like the DMK and even the NDA ally, Telugu Desam. The Congress also realized the massive opposition within the Muslim community to the Bill. It was this last minute resistance that helped block the Bill in Rajya Sabha, the upper house in which the BJP remains weak.

This episode once again exposes the utter bankruptcy and shocking incompetence of Indian Muslim leadership. This at a time when the community faces unprecedented threats and challenges on every front, more importantly, from a very hostile government. Their very existence and identity is at stake.

These challenges call for a mature and forward-looking leadership that is not only familiar with the new political realities but is also alive to the needs and aspirations of its people, majority of whom are young.

The Muslim leadership needs to focus on immediate reforms to put an end to the abuse of divorce laws by reckless, irresponsible men. Although the practice of divorce in Indian Muslim society is still very negligible and almost non-existent when compared to other communities, including the Hindus and Christians, the Muslim Law Board can no long afford inaction on the issue.

Indeed, it should have initiated these reforms of its own volition to stop such regressive practices. Especially when most Ulema advice against instant divorce. Many Muslim countries have banned it.

By failing to act in time, the Board presented the Parivar with a perfect opportunity to target the Shariah, portraying Islam and all Muslims as unreasonable and anti-women. It handed the regime a big stick to beat Muslims with.

This when the Parivar is yet to break their silence over the inhuman treatment of Hindu women, including 60 million widows. Every year thousands of Hindu women are burned alive for dowry. Thousands more are killed in their mothers’ womb for being born of a ‘wrong gender.’ The Muslim society is not perfect of course. But it is largely free of many of these evils and hateful patriarchal practices.

That said, there is no denying that the community needs to change with changing times and it should not wait for the government — least of all one led by the BJP — to dictate reforms to it. Change must come from within.

I have highest respect for the Islamic scholars and intellectuals of the

Muslim Personal Law Board and Muslim Majlise Mushawarat, the umbrella body of Muslim organizations. However, they have wasted a lot of time and opportunities to confront the new realities of a new India. It is time they prepared themselves for the challenges of a fast evolving world by becoming more transparent and accountable.

These highest representative bodies of Muslims must open their doors to more broadminded intellectuals and well-wishers of the community from more diverse backgrounds. Above all, they must accommodate more women, making themselves representative of a 200-million strong community. The times they are a-changing and we must change with them.

— Aijaz Zaka Syed is an independent journalist and former newspaper editor. Email: aijaz.syed@hotmail.com

Posted by: Bagewafa | جنوری 10, 2018

کفن بیچ دیںگے…محمدعلی وفا

کفن بیچ دیںگے…محمدعلی وفا

 

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موقع ملا تو چمن بیچ دیںگے

گر بس چلے تو گگن بیچ دیںگے

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یہ ڈاکو،اچکے،ظالم وطن کے

قبر بیچ دیںگے، کفن بیچ دیںگے

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آنچل بہن کا ،اور غیرتے دختر

مانکا کبھی پیرہن بیچ دیںگے

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ممکن نہی کے یہ بیچے ہمالہ

یہ آب گنگو جمن بیچ دیںگے

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دشمن وطن کے ،لوٹیرے سیاسی

ڈر ہے وفا یہ وطن بیچ دیںگے

Posted by: Bagewafa | جنوری 9, 2018

How a pastor became a Muslimto……The Deen Show

How a pastor became a Muslimto……The Deen Show

Angry Asaduddin Owaisi उतरे ट्रिपल तलाक़के सामने लाखो लोगोके साथ मैदान मे-मोदी शाह के होश उड़े

عمر گزری رہ گزر کے آس پاس….رسا چغتائی

عمر گزری رہ گزر کے آس پاس

رقص کرتے اس نظر کے آس پاس

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زلف کھلتی ہے تو اٹھتا ہے دھواں

آبشار چشم تر کے آس پاس

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کوندتی ہیں بجلیاں برسات میں

طائر بے بال و پر کے آس پاس

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رات بھر آوارہ پتے اور ہوا

رقص کرتے ہیں شجر کے آس پاس

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چھوڑ آیا ہوں متاع جاں کہیں

غالباً اس رہ گزر کے آس پاس

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بال بکھرائے یہ بوڑھی چاندنی

ڈھونڈتی ہے کیا کھنڈر کے آس پاس

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اس گلی میں ایک لڑکا آج بھی

گھومتا رہتا ہے گھر کے آس پاس

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ایک صورت آشنا سائے کی دھوپ

پڑ رہی ہے بام و در کے آس پاس

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کیسے پر اسرار چہرے ہیں رساؔ

خواب گاہ شیشہ گر کے آس پاس

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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास–रसा चुग़ताई

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उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास

रक़्स करते उस नज़र के आस-पास

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ज़ुल्फ़ खुलती है तो उठता है धुआँ

आबशार-ए-चश्म-ए-तर के आस-पास

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कौंदती हैं बिजलियाँ बरसात में

ताइर-ए-बे-बाल-ओ-पर के आस-पास

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रात भर आवारा पत्ते और हवा

रक़्स करते हैं शजर के आस-पास

.

छोड़ आया हूँ मता-ए-जाँ कहीं

ग़ालिबन उस रहगुज़र के आस-पास

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बाल बिखराए ये बूढ़ी चाँदनी

ढूँडती है क्या खंडर के आस-पास

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इस गली में एक लड़का आज भी

घूमता रहता है घर के आस-पास

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एक सूरत-आश्ना साए की धूप

पड़ रही है बाम-ओ-दर के आस-पास

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कैसे पुर-असरार चेहरे हैं ‘रसा’

ख़्वाब-गाह-ए-शीशा-गर के आस-पास

Posted by: Bagewafa | جنوری 3, 2018

Gauhar Raza, Shankar Shad Mushaira 2017,Hello Mushaira

نیا حکم نامہ ۔۔۔جاوید اختر

جس زبان میں جوش، فیض و مجاز جیسے شاعر موجود ہوں اس زبان کی شاعری کے بارے میں یہ تصور ہی نہیں کیا جا سکتا ہے کہ سماج میں ظلم و استبداد کا دور دورہ ہو اور اردو شاعر خاموش تماشائی بنا دیکھتا رہے۔

اردو شاعری سے بغاوت کی بو نہ آئے تو پھر وہ اردو شاعری ہی نہیں۔ جس زبان میں جوش، فیض و مجاز جیسے شاعر موجود ہوں اس زبان کی شاعری کے بارے میں یہ تصور ہی نہیں کیا جا سکتا ہے کہ سماج میں ظلم و استبداد کا دور دورہ ہو اور اردو شاعر خاموش تماشائی بنا دیکھتا رہے۔ مودی راج میں سنگھ کے پرچم تلے چل رہے ’موب لنچنگ‘ جیسے شرمناک واقعات کے خلاف اردو شاعری میں بہت ساری آوازیں اٹھتی رہیں۔ لیکن اردو شاعری کے باغیانہ تیور کو جس خوبصورتی سے جاوید اختر نے سنہ 2017 میں کہی اپنی نظم میں ظاہر کیا وہ اردو شاعری کو چار چاند لگانے والی بات ہے۔ جاوید اختر کو ان کے فن شاعری کے لیے سنہ 2017 کا بہترین شاعر کہا جائے تو قطعاً غلط نہ ہوگا۔ اس نظم پر جاوید اختر کو مبارکباد کے ساتھ پیش خدمت ہے سنہ 2017 کی سب سے بہترین اردو نظم ’’نیا حکم نامہ‘‘۔

 

کسی کا حکم ہے

ساری ہوائیں

ہمیشہ چلنے سے پہلے بتائیں

کہ ان کی سمت کیا ہے؟

ہواؤں کو بتانا یہ بھی ہوگا

چلیں گی جب تو کیا رفتار ہوگی

کہ آندھی کی اجازت اب نہیں ہے

ہماری ریت کی سب یہ فصیلیں

یہ کاغذ کے محل جو بن رہے ہیں

حفاظت ان کی کرناہے ضروری

اور آندھی ہے پرانی ان کی دشمن

یہ سب ہی جانتے ہیں

کسی کا حکم ہے

 

دریا کی لہریں

ذرا یہ سرکشی کم کرلیں

اپنی حد میں ٹھہریں

ابھرنا اور بکھرنا

اور بکھر کر پھر ابھرنا

غلط ہے ان کا یہ ہنگامہ کرنا

یہ سب ہے صرف وحشت کی علامت

بغاوت کی علامت

بغاوت تو نہیں برداشت ہوگی

یہ وحشت تو نہیں برداشت ہوگی

اگر لہروں کو ہے دریا میں رہنا

تو ان کو ہوگا اب چپ چاپ بہنا

کسی کا حکم ہے

اس گلستاں میں بس

اب اک رنگ کے ہی پھول ہوں گے

کچھ افس ہوں گے

جو یہ طے کریں گے

گلستاں کس طرح بننا ہے کل کا

یقیناً پھول یک رنگی تو ہوں گے

مگر یہ رنگ ہوگا

کتنا گہرا، کتنا ہلکا

یہ افسر طے کریں گے

کسی کو کوئی یہ کیسے بتائے

گلستاں میں کہیں بھی

پھول یک رنگی نہیں ہوتے

کبھی ہوہی نہیں سکتے

کہ ہر اک رنگ میں چھپ کر

بہت سے رنگ رہتے ہیں

 

جنہوں نے باغ

یک رنگی بنانا چاہے تھے

ان کو ذرا دیکھو

کہ جب اک رنگ میں

سو رنگ ظاہر ہوگئے ہیں تو

وہ اب کتنے پریشاں ہیں

وہ کتنے تنگ رہتے ہیں

کسی کو کوئی یہ کیسے بتائے

 

ہوائیں اور لہریں

کب کسی کا حکم سنتی ہیں

ہوائیں

حاکموں کی مٹھیوں میں

ہتھکڑی میں قید خانوں میں

نہیں رکتیں

 

یہ لہریں

روکی جاتی ہیں

تو

 دریا جتنا بھی ہو پر سکوں

بے تاب ہوتا ہے

اور اس بے تابی کا اگلا قدم

سیلاب ہوتا ہے

کسی کو یہ کوئی کیسے بتائے

 

 

नया हुक्मनामा—-जावेद अख़तर

 जिस ज़बान में जोश, फ़ैज़-ओ-मजाज़ जैसे शायर मौजूद हो ,इस ज़बान की शायरी के बारे में ये तसव्वुर ही नहीं किया जा सकता है कि समाज में ज़ुलम-ओ-इस्तिबदाद का दौर दौरा हो और उर्दू शायर ख़ामोश तमाशाई बना देखता रहे।

 उर्दू शायरी से बग़ावत की बू ना आए तो फिर वो उर्दू शायरी ही नहीं। जिस ज़बान में जोश, फ़ैज़-ओ-मजाज़ जैसे शायर मौजूद हो इस ज़बान की शायरी के बारे में ये तसव्वुर ही नहीं किया जा सकता है कि समाज में ज़ुलम-ओ-इस्तिबदाद का दौर दौरा हो और उर्दू शायर ख़ामोश तमाशाई बना देखता रहे। मोदी राज में सिंह के पर्चम तले चल रहे मोब लंचिंग जैसे शर्मनाक वाक़ियात के ख़िलाफ़ उर्दू शायरी में बहुत सारी आवाज़ें उठती रहीं। लेकिन उर्दू शायरी के बाग़ियाना तेवर को जिस ख़ूबसूरती से जावेद अख़तर ने सन 2017 में कही अपनी नज़म में ज़ाहिर क्या, वो उर्दू शायरी को चार चांद लगाने वाली बात है। जावेद अख़तर को उनके फ़न्न-ए-शाइरी के लिए सन 2017 का बेहतरीन शायर कहा जाये तो क़तअन ग़लत ना होगा। इस नज़म पर जावेद अख़तर को मुबारकबाद के साथ पेश-ए-ख़िदमत है सन 2017 की सबसे बेहतरीन उर्दू नज़म नया हुक्मनामा।

 

 किसी का हुक्म है

 सारी हवाएं

 हमेशा चलने से पहले बताएं

 कि उनकी सिम्त किया है?

हवाओं को बताना ये भी होगा

 चलेंगी जब तो क्या रफ़्तार होगी

 कि आंधी की इजाज़त अब नहीं है

 हमारी रेत की सब ये फ़सीलें

 ये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैं

हिफ़ाज़त उनकी करना है ज़रूरी

 और आंधी है पुरानी उनकी दुश्मन

 ये सब ही जानते हैं

 किसी का हुक्म है

 दरिया की लहरें

 ज़रा ये सरकशी कम करलीं

 अपनी हद में ठहरें

 उभरना और बिखरना

 और बिखर कर फिर उभरना

 ग़लत है उनका ये हंगामा करना

 ये सब है सिर्फ वहशत की अलामत

बग़ावत की अलामत

बग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगी

 ये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगी

 अगर लहरों को है दरिया में रहना

 तो उनको होगा अब चुप-चाप बहना

 किसी का हुक्म है

 इस गुलसिताँ में बस

 अब इक रंग के ही फूल होंगे

 कुछ एफिस होंगे

 जो ये तै करेंगे

 गुलसिताँ किस तरह बनना है कल का

यक़ीनन फूल यक-रंगी तो होंगे

 मगर ये रंग होगा

 कितना गहिरा, कितना हल्का

 ये अफ़्सर तै करेंगे

 किसी को कोई ये कैसे बताए

 गुलसिताँ में कहीं भी

 फूल यक-रंगी नहीं होते

 कभी होहि नहीं सकते

 कि हर इक रंग में छिप कर

 बहुत से रंग रहते हैं

 जिन्हों ने बाग़

 यक-रंगी बनाना चाहे थे

 उनको ज़रा देखो

 कि जब इक रंग में

 सो रंग ज़ाहिर हो गए हैं तो

 वो अब कितने परेशां हैं

 वो कितने तंग रहते हैं

 किसी को कोई ये कैसे बताए

 हवाएं और लहरें

 कब किसी का हुक्म सुनती हैं

 हवाएं

 हाकिमों की मुट्ठियों में

 हथकड़ी में क़ैद-ख़ानों में

 नहीं रुकतीं

 ये लहरें

 रोकी जाती हैं

 तो

 दरिया जितना भी हो पर-सुकूँ

 बे-ताब होता है

 और इस बे-ताबी का उगला क़दम

 सेलाब होता है

 किसी को ये कोई कैसे बताए

 

تجھے کیوں فکر ہے اے گل۔۔۔۔۔ علامہ محمد اقبال

 

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تجھے کیوں فکر ہے اے گل دل صد چاک بلبل کی

تو اپنے پیرہن کے چاک تو پہلے رفو کر لے

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تمنا آبرو کی ہو اگر گلزار ہستی میں

تو کانٹوں میں الجھ کر زندگی کرنے کی خو کر لے

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صنوبر باغ میں آزاد بھی ہے، پا بہ گل بھی ہے

انھی پابندیوں میں حاصل آزادی کو تو کر لے

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تنک بخشی کو استغنا سے پیغام خجالت دے

نہ رہ منت کش شبنم نگوں جام وسبو کر لے

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نہیں یہ شان خود داری ، چمن سے توڑ کر تجھ کو

کوئی دستار میں رکھ لے ، کوئی زیب گلو کر لے

.

چمن میں غنچۂ گل سے یہ کہہ کر اڑ گئی شبنم

مذاق جور گلچیں ہو تو پیدا رنگ و بو کر لے

.

اگر منظور ہو تجھ کو خزاں ناآشنا رہنا

جہان رنگ و بو سے، پہلے قطع آرزو کر لے

.

اسی میں دیکھ ، مضمر ہے کمال زندگی تیرا

جو تجھ کو زینت دامن کوئی آئینہ رو کر لے

 

तुझे क्यों फ़िक्र है ए गुल—- अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

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 तुझे क्यों फ़िक्र है ए गुल दिले सद चाक बुलबुल की

 तु अपने पैरहन के चाक तो पहले रफ़ू कर ले

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 तमन्ना आबरू की हो अगर गुलज़ारे हस्ती में

 तो कांटों में उलझ कर ज़िंदगी करने की खू कर ले

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सनोबर बाग़ में आज़ाद भी है, पा ब-गुल भी है

 इन्ही पाबंदीयों में हासिल आज़ादी को तु कर ले

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तुनुक बख़शी को इस्ति़ग़ना से पैग़ाम खिजालत दे

 ना रह मिन्नतकशे शबनम निगों जामो सबु कर ले

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 नहीं ये शान ख़ुद्दारी , चमन से तोड़ कर तुझको

 कोई दस्तार में रख ले , कोई जे़ब गुलू कर ले

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 चमन में ग़ुंचा-ए-गुल से ये कह कर उड़ गई शबनम

मज़ाक़ जौर गुलचीं हो तो पैदा रंग-ओ-बू कर ले

.

 अगर मंज़ूर हो तुझको ख़िज़ां नाआशना रहना

 जहान-ए-रंग-ओ-बू से, पहले क़ता आरज़ू कर ले

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 इसी में देख , मुज़म्मिर है कमाल-ए-ज़िंदगी तेरा

 जो तुझको ज़ीनत दामन कोई आईना-ए-रु कर ले

ہر ایک بات یہ کہتے ہو تم کہ تو کیا ہے۔۔۔۔۔۔مرزا غالب

हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’……मिर्जा गालिब

 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू[1] क्या है

न शो’ले[2] में ये करिश्मा न बर्क़[3] में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू[4] क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न[5] तुमसे
वर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़िए-अ़दू[6] क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन[7]
हमारी जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू[8] क्या है

जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू[9] क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं क़ायल[10]
जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त[11] अज़ीज़[12]
सिवाए वादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू[13] क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम[14] भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू[15] क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार[16] और अगर हो भी
तो किस उमीद[17] पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शह का मुसाहिब[18], फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में "ग़ालिब” की आबरू[19] क्या है

क्या भाजपा भारत का संविधान बदलना चाहती है?आरफ़ा ख़ानम शेरवानी

 

 

 

धर्मनिरपेक्षता और संविधान को लेकर केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के बयान पर वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा ख़ानम शेरवानी (Arfa Khanum) का नज़रिया.

Posted by: Bagewafa | دسمبر 23, 2017

SSTV New year 2018 TV Mushayera-2….Taslim Elahi Zulfi

Posted by: Bagewafa | دسمبر 23, 2017

SSTV New year 2018 TV Mushayera……..Taslim Elahi Zulfi

نالہ ہے بلبل شوريدہ ترا خام ابھي۔۔۔۔۔۔۔۔۔ علامہ محمد اِقبال

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نالہ ہے بلبل شوريدہ ترا خام ابھي

اپنے سينے ميں اسے اور ذرا تھام ابھي

پختہ ہوتي ہے اگر مصلحت انديش ہو عقل

عشق ہو مصلحت انديش تو ہے خام ابھي

بے خطر کود پڑا آتش نمردو ميں عشق

عقل ہے محو تماشائے لب بام ابھي

عشق فرمودئہ قاصد سے سبک گام عمل

عقل سمجھي ہي نہيں معني پيغام ابھي

شيوئہ عشق ہے آزادي و دہر آشوبي

تو ہے زناري بت خانہء ايام ابھي

عذر پرہيز پہ کہتا ہے بگڑ کر ساقي

ہے ترے دل ميں وہي کاوش انجام ابھي

سعي پيہم ہے ترازوئے کم و کيف حيات

تيري ميزاں ہے شمار سحر و شام ابھي

ابر نيساں! يہ تنک بخشي شبنم کب تک

مرے کہسار کے لالے ہيں تہي جام ابھي

بادہ گردان عجم وہ ، عربي ميري شراب

مرے ساغر سے جھجکتے ہيں مے آشام ابھي

خبر اقبال کي لائي ہے گلستاں سے نسيم

نو گرفتار پھڑکتا ہے تہ دام ابھي

حیرت الاہابادی کے ایک شعر پر تضمین…… محمدعلی وفا ن

آگاہ اپنی موت سے کوئی بشر نہیں

سامان ہے سو برس کا پل کی خبر نہیں

 حیرت الاہابادی

نظر نہیں

بیخبر اعمال پر کیوں تیری نظر نہیں

ہے نیند کیسی جس کی کوئی سحر نہیں

تیرے سفر کی اب یہاں کوئی ڈگر نہیں

آگاہ اپنی موت سے کوئی بشر نہیں

سامان ہے سو برس کا پل کی خبر نہیں

– محمدعلی وفا

हैरत इलाहाबादी के एक शे’र पर तजमीन — मुहम्मदअली वफा

 

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीँ

सामान है सो बरसका  पलकी खबर नहीँ

                —- हैरत इलाहाबादी

नजर नहीँ

बेखबर आमाल पर क्युं तेरी नजर नहीँ

 है नींद  कैसी  जीसकी कोई सहर नहीँ

तेरे सफर की अब यहां कोई डगर नहीँ

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीँ

सामान है सो बरसका  पलकी खबर नहीँ

–                    — मुहम्मदअली वफा

अपनी नज़रों से वार करते रहो……..शकील क़ादरी

.

 है तुम्हें इख़्तियार करते रहो

मौत का कारोबार करते रहो

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शाह को दरकिनार करते रहो

हम फ़कीरों से प्यार करते रहो

 .

जाँ हमारी है उस के क़ब्ज़े में

वार तुम बार-बार करते रहो

 .

जिस में डूबो तो हो ख़ुदा राज़ी

ऐसे दरिया भी पार करते रहो

 .

हो जाओ कहीं शिकार उस के

नफ़्स का तुम शिकार करते रहो

.

चैन मिलता है बेक़रारी में

तुम मुझे बेक़रार करते रहो

 .

इश्क़ मे एक क्या हज़ारों दिल

हों अगर तो निसार करते रहो

 .

जाने जाँ दिल मेरा तड़पता है

अपनी नज़रों से वार करते रहो

.

वो क़यामत से पहेले आएगा

"यार का इंतेज़ार करते रहो”

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हर इरादे को फ़ित्नगर के तुम

अज़्म से तार-तार करते रहो

 .

मैं हूँ शाइर शऊर है मुझ में

तुम मेरा एतबार करते रहो

 .

है तक़ाज़ा ‘शकील’ दुनिया का

क़ल्ब को सोगवार करते रहो

اپنی نظروں سے وار کرتے رہو۔۔۔۔۔شکیل قادری

.

ہے تمہیں اختیار کرتے رہو

موت کا کاروبار کرتے رہو

 .

شاہ کو درکنار کرتے رہو

ہم فقیروں سے پیار کرتے رہو

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جاں ہماری ہے اس کے قبضے میں

وار تم باربار کرتے رہو

.

جس میں ڈوبو تو ہو خدا راضی

ایسے دریا بھی پار کرتے رہو

 .

ہو جاؤ کہیں شکار اس کے

نفس کا تم شکار کرتے رہو

.

چین ملتا ہے بیقراری میں

تم مجھے بےقرار کرتے رہو

.

عشق مے ایک کیا ہزاروں دل

ہوں اگر تو نثار کرتے رہو

 .

جانے جاں دل میرا تڑپتا ہے

اپنی نظروں سے وار کرتے رہو

 .

وہ قیامت سے پہیلے آئیگا

"یار کا انتظار کرتے رہو”

 .

ہر ارادے کو فتن گر کے تم

عزم سے تار تار کرتے رہو

میں ہوں شاعر شعور ہے مجھ میں

تم میرا اعتبار کرتے رہو

 .

ہے تقاضہ ‘شکیل’ دنیا کا

قلب کو سوگوار کرتے رہو

 

 

मोहब्बत भी तन्हाईये दाएमी है…….खुमार बाराबंकवी

न हारा है इश्क़ और,न दुनिया थकी है

दीया जल रहा है, हवा चल रही है

सुकूँ ही सुकूं है ख़ुशी ही ख़ुशी है

तेरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है

वो मौजूद हैं और उनकी कमी है

मोहब्बत भी तन्हाईये दाएमी है

खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है

जिसे इश्क़ कहते हैं शायद यही है

चिराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं

नया है ज़माना नई रोशनी है

जफ़ाओं पे घुट घुट के चुप रहने वालो

ख़मोशी जफ़ाओं की ताईद भी है

मेरे राहबर मुझको गुमराह कर दे

सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है

‘ख़ुमार’ ए बला नोश तू और तौबा

तुझे ज़ाहिदों की नज़र लग गई है

محبت بھی تنہائی یہ دائمی ہے۔۔۔۔خمار بارہ بنکوی۔

ہ ہارا ہے عشق اور نہ دنیا تھکی ہے

دیا جل رہا ہے ہوا چل رہی ہے

سکوں ہی سکوں ہے، خوشی ہی خوشی ہے

ترا غم سلامت، مجھے کیا کمی ہے

وہ موجود ہیں اور ان کی کمی ہے

محبت بھی تنہائی یہ دائمی ہے

کھٹک گدگدی کا مزا دے رہی ہے

جسے عشق کہتے ہیں شاید یہی ہے

چراغوں کے بدلے مکاں جل رہے ہیں

نیا ہے زمانہ، نئی روشنی ہے

جفاؤں پہ گھُٹ گھُٹ کے چُپ رہنے والو

خموشی جفاؤں کی تائید بھی ہے

مرے راہبر! مجھ کو گمراہ کر دے

سنا ہے کہ منزل قریب آ گئی ہے

خمارِ بلا نوش! تُو اور توبہ!

تجھے زاہدوں کی نظر لگ گئی ہے۔

اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے۔۔۔۔۔کیفی اعظمی۔

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    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    زندگی جہد میں ہے صبر کے قابو میں نہیں

    نبضِ ہستی کا لہو کانپتے آنسو میں نہیں

    اڑنے کھلنے میں ہے نکہت خمِ گیسو میں نہیں

    جنت اک اور ہے جو مرد کے پہلو میں نہیں

    اس کی آزاد روش پر بھی مچلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    گوشے گوشے میں سلگتی ہے چتا تیرے لئے

    فرض کا بھیس بدلتی ہے قضا تیرے لئے

    قہر ہے تیری ہر اک نرم ادا تیرے لئے

    زہر ہی زہر ہے دنیا کی ہوا تیرے لئے

    رُت بدل ڈال اگر پھلنا پھولنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    قدر اب تک تری تاریخ نے جانی ہی نہیں

    تجھ میں شعلے بھی ہیں، اشک فشانی ہی نہیں

    تو حقیقت بھی ہے دلچسپ کہانی ہی نہیں

    تیری ہستی بھی ہے اک چیز جوانی ہی نہیں

    اپنی تاریخ کا عنوان بدلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    توڑ کر رسم کے بت بندِ قدامت سے نکل

    ضعفِ عشرت سے نکل وہمِ نزاکت سے نکل

    نفس کے کھینچے ہوئے حلقہء عظمت سے نکل

    قید بن جائے محبت، تو محبت سے نکل

    راہ کا خار ہی کیا گل بھی کچلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    تو فلاطون و ارسطو ہے، تو زہرہ پروین

    تیرے قبضے میں ہےگردوں تری ٹھوکرمیں زمیں

    ہاں اُٹھا جلد اُٹھا، پائے مقدر سے جبیں

    میں بھی رکنے کا نہیں تو بھی رکنے کا نہیں

    لڑکھڑائے گی کہاں تک کہ سنبھلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

 

    

उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे – कैफ़ी आज़मी

 ۔

۔۔

उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 क़ल्ब-ए-माहौल[1] में लर्ज़ां[2] शरर-ए-जंग[3] हैं आज

 हौसले वक़्त के और ज़ीस्त[4] के यक-रंग हैं आज

 आबगीनों[5] में तपाँ[6] वलवला-ए-संग[7] हैं आज

 हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़[8] ओ हम-आहंगल[9] हैं आज

 जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन[10] की बहार

 तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार[11]

तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार[12]

ता-बा-कै[13] गिर्द तिरे वहम ओ तअय्युन[14] का हिसार[15]

कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत[16] से निकलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है

 तपती साँसों की हरारत[17] से पिघल जाती है

 पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

 बन के सीमाब[18] हर इक ज़र्फ़[19] में ढल जाती है

 ज़ीस्त[20] के आहनी[21] साँचे में भी ढलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 ज़िंदगी जोहद[22] में है सब्र के क़ाबू में नहीं

 नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं

 उड़ने खुलने में है निकहत[23] ख़म-ए-गेसू[24] में नहीं

 जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

 उस की आज़ाद रविश[25] पर भी मचलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 गोशे-गोशे[26] में सुलगती है चिता तेरे लिए

 फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा[27] तेरे लिए

 क़हर[28] है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए

 ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए

 रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 क़द्र अब तक तेरी तारीख़[29] ने जानी ही नहीं

 तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी[30] ही नहीं

 तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

 तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

 अपनी तारीख़ का उनवान[31] बदलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत[32] से निकल

 ज़ोफ़-ए-इशरत[33] से निकल वहम-ए-नज़ाकत[34] से निकल

 नफ़्स[35] के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत[36] से निकल

 क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल

 राह का ख़ार[37] ही क्या गुल[38] भी कुचलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तोड़ ये अज़्म-शिकन[39] दग़दग़ा-ए-पंद[40] भी तोड़

 तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद[41] भी तोड़

 तौक़[42] ये भी है ज़मुर्रद[43] का गुलू-बंद भी तोड़

 तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद[44] भी तोड़

 बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तू फ़लातून[45] ओ अरस्तू है तू ज़ेहरा[46] परवीं[47]

तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं

[48] तिरी ठोकर में ज़मीं

 हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर[49] से जबीं[50]

मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं

 लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

اب حرف تمانا کو سماعت نہ ملےگی۔۔۔۔پیرزادہ قاسم

 

 .

 

اب حرف تمنا کو سماعت نہ ملے گی

بیچوگے اگر خواب تو قیمت نہ ملے گی

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تشہیر کے بازار میں اے تازہ خریدار

زیبائشیں مل جائیں گی قامت نہ ملے گی

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لمحوں کے تعاقب میں گزر جائیں گی صدیاں

یوں وقت تو مل جائے گا مہلت نہ ملے گی

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سوچا ہی نہ تھا یوں بھی اسے یاد رکھیں گے

جب اس کو بھلانے کی بھی فرصت نہ ملے گی

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تا عمر وہی کار زیاں عشق رہا یاد

حالانکہ یہ معلوم تھا اجرت نہ ملے گی

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تعبیر نظر آنے لگی خواب کی صورت

اب خواب ہی دیکھو گے بشارت نہ ملے گی

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آئینہ صفت وقت ترا حسن ہیں ہم لوگ

کل آئنے ترسیں گے تو صورت نہ ملے گی

 

समाअत न मिलेगी…पीरजादह क़सिम

अब हर्फ़-ए-तमन्ना को समाअत न मिलेगी

बेचोगे अगर ख़्वाब तो क़ीमत न मिलेगी

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तशहीर के बाज़ार में ऐ ताज़ा ख़रीदार

ज़ेबाइशें मिल जाएँगी क़ामत न मिलेगी

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लम्हों के तआक़ुब में गुज़र जाएँगी सदियाँ

यूँ वक़्त तो मिल जाएगा मोहलत न मिलेगी

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सोचा ही न था यूँ भी उसे याद रखेंगे

जब उस को भुलाने की भी फ़ुर्सत न मिलेगी

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ता-उम्र वही कार-ए-ज़ियाँ इश्क़ रहा याद

हालाँकि ये मालूम था उजरत न मिलेगी

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ताबीर नज़र आने लगी ख़्वाब की सूरत

अब ख़्वाब ही देखोगे बशारत न मिलेगी

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आईना-सिफ़त वक़्त तिरा हुस्न हैं हम लोग

कल आइने तरसेंगे तो सूरत न मिलेगी

ابابیل نہیں آئیں۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

Posted by: Bagewafa | دسمبر 5, 2017

नेहरू —- कैफ़ी आज़मी

नेहरू —- कैफ़ी आज़मी

मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं

फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला

जैसे सहरा में चश्मा कहीं

या समुन्दर में मीनार-ए-नूर

या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में

फ़िक्र सदियों अकेली अकेली रही

ज़ेहन सदियों अकेला अकेला मिला

 

और अकेला अकेला भटकता रहा

हर नए हर पुराने ज़माने में वो

बे-ज़बाँ तीरगी में कभी

और कभी चीख़ती धूप में

चाँदनी में कभी ख़्वाब की

उस की तक़दीर थी इक मुसलसल तलाश

ख़ुद को ढूँडा किया हर फ़साने में वो

 

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई

क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा

ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो

ज़िंदगी का हो कोई जिहाद

वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद

सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

 

जिन तक़ाज़ों ने उस को दिया था जनम

उन की आग़ोश में फिर समाया न वो

ख़ून में वेद गूँजे हुए

और जबीं पर फ़रोज़ाँ अज़ाँ

और सीने पे रक़्साँ सलीब

बे-झिझक सब के क़ाबू में आया न वो

 

हाथ में उस के क्या था जो देता हमें

सिर्फ़ इक कील उस कील का इक निशाँ

नश्शा-ए-मय कोई चीज़ है

इक घड़ी दो घड़ी एक रात

और हासिल वही दर्द-ए-सर

उस ने ज़िन्दाँ में लेकिन पिया था जो ज़हर

उठ के सीने से बैठा न इस का धुआँ

۔دو غزلین نیرنگ خیال جون ۔1984۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی۔

آگرہ(اینڈیا)۔تسلیم اِلاہی زلفی

(CourtesyFacebook)

(Courtesy:Shahafat 17Nove.17)

تیر کی طرح سے آغوش کماں تک آؤ……علی سردار جعفری

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میں جہاں تم کو بلاتا ہوں وہاں تک آؤ

میری نظروں سے گزر کر دل وجاں تک آؤ

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پھر یہ دیکھو که زمانے کی ہوا ہے کیسی

ساتھ میرے میرے فردوس جواں تک آؤ

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تیغ کی طرح چلو چھوڑ کے آغوش نیام

تیر کی طرح سے آغوش کماں تک آؤ

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پھول کے گرد فرو باغ میں مانند نسیم

مثل پروانہ کسی شم تپاں تک آؤ

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لو وہ صدیوں کے جہنم کی حدیں ختم ہوئی

اب ہے فردوس ہی فردوس جہاں تک آؤ

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چھوڑ کر وہم وگماں حسن یقیں تک پہنچو

پر یقیں سے بھی کبھی وہم وگماں تک آؤ

 .

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तीर की तरह से आगोश-ए-कमां तक आओ…..अली सरदार जाफरी

 

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मैं जहां तक तुम को बुलाता हूं, वहां तक आओ

मेरी नजरों से गुजर कर, दिल-ओ-जां तक आओ

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फिर ये देखो कि, जमाने की हवा है कैसी

साथ मेरे, मेरे फिरदौस-ए-जवां तक आओ

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तेग की तरह चलो छोड़ के आगोश-ए- नियाम

तीर की तरह से आगोश-ए-कमां तक आओ

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फूल के गिर्द फिरो बाग में मानिंद-ए-नसीम

मिस्ल-ए-परवाना किसी शाम-ए-तपन तक आओ

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लो वो सदियों के जहन्नम की हदें खत्म हुईं

अब है फिरदौस ही फिरदौस जहां तक आओ

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छोड़ कर वहम-ओ-गुमान, हुस्न-ए-यकीं तक पहुंचो

पर यकीं से भी कभी वहम-ओ-गुमां तक आओ

सच_न_बोलना ☆ बाबा नागार्जुन |

 

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,

डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!

जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!

सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!

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जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है

भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!

बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे

जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।

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ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,

फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!

बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!

भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

 .

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,

अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!

सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर

एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

 .

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,

देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!

जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,

काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

 .

माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!

बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!

मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,

ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

 .

रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,

कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!

नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,

जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!

 .

सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,

भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!

माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,

हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!

क़त्लगाह पर —- शकील क़ादरी

 

कातिल को है ग़ुरूर बहुत क़त्लगाह पर

लेकिन फ़क़ीर की है नज़र ख़ानक़ाह पर

.

इल्ज़ाम रौशनी के परिंदों के क़त्ल का

साबित करोगे कैसे? है आलमपनाह पर

 .

लगता है उस की आँखों में महेफ़ूज़ है हया

पर्दा जो डालता है किसी के गुनाह पर

.

इन्सानीयत का चाहने वाला हूँ इस लिये

सब कुछ लुटा रहा हूँ किसी की निगाह पर

 .

जितने परिंदे ज़ख़्मी हैं तीरों से सब के सब

इल्ज़ाम ज़ख़्म देने का धरते हैं शाह पर

 .

मैं हूँ फ़क़ीर कासे में अपना ही सर लिये

बेख़ौफ़ चल रहा हूँ ख़ुदा तेरी राह पर

 .

इन्साफ़ की तवक़्क़ो अदालत से क्या रखें

उसने यक़ीन कर लिया झूटे गवाह पर

.

लगता है शाह को है परिंदों से दुश्मनी

नोंचे हुए पड़े हैं यहाँ गाह-गाह पर

 .

नटवर था श्याम और सियाहफ़ाम थे बिलाल

फिर नाज़ क्यूँ न हो मुझे रंगे-सियाह पर

 .

सरमद का मैं मुरीद हूँ कहेता हूँ शान से

अल्लाह पर यक़ीं है, नहीं बादशाह पर

 .

होने न देगी ज़ुल्म किसी पर ‘शकील’ अब

है मुझ को एतेबार वतन की सिपाह पर

قتل گاہ پر۔۔۔۔۔۔ شکیل قادری

قاتل کو ہے غرور بہت قتل گاہ پر

لیکن فقیر کی ہے نظر خانقاہ پر

.

الزام روشنی کے پرندوں کے قتل کا

ثابت کروگے کیسے؟ ہے عالمپناہ پر

 .

لگتا ہے اس کی آنکھوں میں محیفوز ہے حیا

پردہ جو ڈالتا ہے کسی کے گناہ پر

 .

انسانیت کا چاہنے والا ہوں اس لئے

سب کچھ لٹا رہا ہوں کسی کی نگاہ پر

.

جتنے پرندے زخمی ہیں تیروں سے سب کے سب

الزام زخم دینے کا دھرتے ہیں شاہ پر

 .

میں ہوں فقیر کاسے میں اپنا ہی سر لئے

بیخوف چل رہا ہوں خدا تیری راہ پر

 .

انصاف کی توقع عدالت سے کیا رکھیں

اسنے یقین کر لیا جھوٹے گواہ پر

 .

لگتا ہے شاہ کو ہے پرندوں سے دشمنی

نونچے ہوئے پڑے ہیں یہاں گاہ گاہ پر

 .

نٹ ور تھا شیام اور سیاہ فام تھے بلال

پھر ناز کیوں نہ ہو مجھے رنگے سیاہ پر

 .

سرمد کا میں مرید ہوں کہیتا ہوں شان سے

اللہ پر یقیں ہے، نہیں بادشاہ پر

 .

ہونے نہ دیگی ظلم کسی پر ‘شکیل’ اب

 ہے مجھکو اِعتبار  وطن کے سپا ہ پر

ہاتھ خالی ہیں ترے شہر سے جاتے جاتے….. راحتؔ اندوری

.

ہاتھ خالی ہیں ترے شہر سے جاتے جاتے

جان ہوتی تو مری جان لٹاتے جاتے

..

اب تو ہر ہاتھ کا پتھر ہمیں پہچانتا ہے

عمر گزری ہے ترے شہر میں آتے جاتے

.

اب کے مایوس ہوا یاروں کو رخصت کر کے

جا رہے تھے تو کوئی زخم لگاتے جاتے

.

رینگنے کی بھی اجازت نہیں ہم کو ورنہ

ہم جدھر جاتے نئے پھول کھلاتے جاتے

.

میں تو جلتے ہوئے صحراؤں کا اک پتھر تھا

تم تو دریا تھے مری پیاس بجھاتے جاتے

.

مجھ کو رونے کا سلیقہ بھی نہیں ہے شاید

لوگ ہنستے ہیں مجھے دیکھ کے آتے جاتے

.

ہم سے پہلے بھی مسافر کئی گزرے ہوں گے

کم سے کم راہ کے پتھر تو ہٹاتے جاتے

ہहाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते—- राहत इंदौरी

 

.

 हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते

 जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते

.

 अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है

 उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते-जाते

.

 अब के मायूस हुआ यारों को रुख़स्त कर के

 जा रहे थे तो कोई ज़ख़म लगाते जाते

.

 रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वर्ना

 हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते

.

 मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था

 तुम तो दरिया थे मरी प्यास बुझाते जाते

.

 मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद

 लोग हंसते हैं मुझे देख के आते-जाते

.

 हमसे पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे

 कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 28, 2017

آستانے تلاش کرتاہے۔۔۔۔۔عرشد عثمانی

آستانے تلاش کرتاہے۔۔۔۔۔ارشد عثمانی

بیگانہ ملا۔۔۔۔کلیم عاجز

 

آشنا غم سے ملا راحت سے بیگانہ ملا

دل بھی ہم کو خوبیٔ قسمت سے دیوانہ ملا

۔

بلبل و گل شمع و پروانہ کو ہم پر رشک ہے

۔درد جو ہم کو ملا سب سے جدا گانہ ملا

۔

ہم نے ساقی کو بھی دیکھا پیر مے خانہ کو بھی

کوئی بھی ان میں نہ راز آگاہ مے خانہ ملا

۔

سب نے دامن چاک رکھا ہے بقدر احتیاج

ہم کو دیوانوں میں بھی کوئی نہ دیوانہ ملا

۔

ہم تو خیر آشفتہ ساماں ہیں ہمارا کیا سوال

وہ تو سنوریں جن کو آئینہ ملا شانہ ملا

۔

کیا قیامت ہے کہ اے عاجزؔ ہمیں اس دور میں

طبع شاہانہ ملی منصب فقیرانہ ملا  

राहत से बेगाना मिला—–कलीम आजिज़

 

आश्ना ग़म से मिला राहत से बेगाना मिला

दिल भी हम को ख़ूबी-ए-क़िस्मत से दीवाना मिला

۔

बुलबुल-ओ-गुल शम-ओ-परवाना को हम पर रश्क है

दर्द जो हम को मिला सब से जुदा-गाना मिला

۔

हम ने साक़ी को भी देखा पीर-ए-मय-ख़ाना को भी

कोई भी इन में न राज़-आगाह-ए-मय-ख़ाना मिला

۔

सब ने दामन चाक रक्खा है ब-क़द्र-ए-एहतियाज

हम को दीवानों में भी कोई न दीवाना मिला

۔

हम तो ख़ैर आशुफ़्ता-सामाँ हैं हमारा क्या सवाल

वो तो सँवरें जिन को आईना मिला शाना मिला

۔

क्या क़यामत है कि ऐ ‘आजिज़’ हमें इस दौर में

तब्अ’ शाहाना मिली मंसब फ़क़ीराना मिला

दुनिया का महान इस्लामी विश्वविद्यालय.. दारुल उलूम देवबन्द

इस्लामी दुनिया में दारुल उलूम देवबन्द का एक विशेष स्थान है जिसने पूरे क्षेत्र को ही नहीं, पूरी दुनिया के मुसलमानों को परभावित किया है। दारुल उलूम देवबन्द केवल इस्लामी विश्वविद्यालय ही नहीं एक विचारधारा है, जो अंधविश्वास, कूरीतियों व अडम्बरों के विरूद्ध इस्लाम को अपने मूल और शुद्ध रूप में प्रसारित करता है। इसलिए मुसलमानों में इस विचाधारा से प्रभावित मुसलमानों को ”देवबन्दी“ कहा जाता है।

देवबन्द उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण नगरों में गिना जाता है जो आबादी के लिहाज़ से तो एक लाख से कुछ ज़्यादा आबादी का एक छोटा सा नगर है। लेकिन दारुल उलूम ने इस नगर को बड़े-बड़े नगरों से भारी व सम्मानजनक बना दिया है, जो न केवल अपने गर्भ में एतिहासिक पृष्ठ भूमि रखता है, अपितु आज भी साम्प्रदायिक सौहार्द, धर्मनिरपेक्षता एवं देशप्रेम का एक अजीब नमूना प्रस्तुत करता है।

आज देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति व इस्लामी शिक्षा एवं संस्कृति में जो समन्वय आज हिन्दुस्तान में देखने को मिलता है उसका सीधा-साधा श्रेय देवबन्द दारुल उलूम को जाता है। यह मदरसा मुख्य रूप से उच्च अरबी व इस्लामी शिक्षा का केंद्र बिन्दु है। दारुल उलूम ने न केवल इस्लामिक शोध व सहित्य के संबंध में विशेष भूमिका निभायी है, बल्कि भारतीय पर्यावरण में इस्लामिक सोच व संस्कृति को नवीन आयाम तथा अनुकूलन दिया है।

दारुल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी द्वारा रखी गयी थी। वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेज़ों के विरूद्ध लड़े गये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी न पाये थे और अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज़ कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रेजों ने अपनी संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गये थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के प्रहार होने लगे थे। चारो ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जाये, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्षा जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्षा की जाये। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज उस समय तक विशाल एवं ज़ालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुक़ाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाये। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवश्यकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवश्यकता थी जो धर्म व जाति से उपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें।

इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढ़ाया उनमें दारुल उलूम देवबन्द के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। स्वर्गीये मौलाना महमूद हसन (विख्यात अध्यापक व संरक्षक दारुल उलूम देवबन्द) उन सैनानियों में से एक थे जिनके क़लम, ज्ञान, आचार व व्यवहार से एक बड़ा समुदाय प्रभावित था, इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शैखुल हिन्द (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभूषित किया गया था, उन्हों ने न केवल भारत में वरन विदेशों (अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र) में जाकर भारत व ब्रिटिश साम्राज्य की भत्र्सना की और भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध जी खोलकर अंग्रेज़ी शासक वर्ग की मुख़ालफत की। बल्कि शेखुल हिन्द ने अफ़ग़ानिस्तान व इरान की हकूमतों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उदाहरणतयः यह कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व इरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध लड़ने पर तैयार हो तो ज़मीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।

शेखुल हिन्द ने अपने सुप्रिम शिष्यों व प्रभावित व्यक्तियों के मध्यम से अंग्रेज़ के विरूद्ध प्रचार आरंभ किया और हजारों मुस्लिम आंदोलनकारियों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल कर दिया। इनके प्रमुख शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबैदुल्ला सिंधी थे जो जीवन पर्यन्त अपने गुरू की शिक्षाअों पर चलते रहे, और अपने देशप्रेमी भावनाओं व नीतियों के कारण ही भारत के मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों व आंदोलनकारियों में एक भारी स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं।

सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की स्र्वप्रथम स्वंतत्र सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना गया। यहीं पर रहकर उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की एक शाख क़ायम की जो बाद में (1922 ई. में) मूल कांग्रेस संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस में विलय कर दी गयी। शेखुल हिन्द 1915 ई. में हिजाज़ (सऊदी अरब का पहला नाम था) चले गये, उन्होने वहां रहते हुए अपने साथियों द्वारा तुर्की से संपर्क बना कर सैनिक सहायता की मांग की।

सन 1916 ई. में इसी संबंध में शेखुल हिन्द इस्तमबूल जाना चहते थे। मदीने में उस समय तुर्की का गवर्नर ग़ालिब पाशा तैनात था उसने शेखुल हिन्द को इस्तमबूल के बजाये तुर्की जाने की लिए कहा परन्तु उसी समय तुर्की के युद्धमंत्री अनवर पाशा हिजाज़ पहुंच गये।

शेखुल हिन्द ने उनसे मुलाक़ात की और अपने आंदोलन के बारे में बताया। अनवर पाशा ने भातियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और अंग्रेज साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध करने की एक गुप्त योजना तैयार की। हिजाज़ से यह गुप्त योजना, गुप्त रूप से शेखुल हिन्द ने अपने शिष्य मौलाना उबैदुल्ला सिंधी को अफगानिस्तान भेजा, मौलाना सिंधी ने इसका उत्तर एक रेशमी रूमाल पर लिखकर भेजा, इसी प्रकार रूमालों पर पत्र व्यवहार चलता रहा। यह गुप्त सिलसिला ”तहरीक ए रेशमी रूमाल“ के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। इसके सम्बंध में सर रोलेट ने लिखा है कि “ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों पर हक्का बक्का थी“।

सन 1916 ई. में अंग्रेज़ों ने किसी प्रकार शेखुल हिन्द को मदीने में गिरफ्तार कर लिया। हिजाज़ से उन्हें मिश्र लाया गया और फिर रोम सागर के एक टापू मालटा में उनके साथयों मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उज़ैर गुल हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद सहित जेल में डाल दिया था। इन सबको चार वर्ष की बामुशक्कत सजा दी गयी। सन 1920 में इन महान सैनानियों की रिहाई हुई।

शेखुल हिन्द की अंग्रेजों के विरूद्ध तहरीके-रेशमी रूमाल, मौलाना मदनी की सन 1936 से सन 1945 तक जेल यात्रा, मौलाना उजै़रगुल, हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद का मालटा जेल की पीड़ा झेलना, मौलाना सिंधी की सेवायें इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण हैं कि दारुल उलूम ने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई है। इस संस्था ने ऐसे अनमोल रत्न पैदा किये जिन्होंने अपनी मात्र भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया। ए. डब्ल्यू मायर सियर पुलिस अधीक्षक (सीआई़डी राजनैतिक) पंजाब ने अपनी रिपोर्ट नं. 122 में लिखा था जो आज भी इंडिया आफिस लंदन में सुरक्षित है कि ”मौलाना महमूद हसन (शेखुल हिन्द) जिन्हें रेशमी रूमाल पर पत्र लिखे गये, सन 1915 ई. को हिजरत करके हिजाज़ चले गये थे, रेशमी ख़तूत की साजिश में जो मौलवी सम्मिलित हैं, वह लगभग सभी देवबन्द स्कूल से संबंधित हैं।

गुलाम रसूल मेहर ने अपनी पुस्तक ”सरगुज़स्त ए मुजाहिदीन“ (उर्दू) के पृष्ठ नं. 552 पर लिखा है कि ”मेरे अध्ययन और विचार का सारांश यह है कि हज़रत शेखुल हिन्द अपनी जि़न्दगी के प्रारंभ में एक रणनीति का ख़ाका तैयार कर चुके थे और इसे कार्यान्वित करने की कोशिश उन्होंने उस समय आरंभ कर दी थी जब हिन्दुस्तान के अंदर राजनीतिक गतिविधियां केवल नाममात्र थी“।

उड़ीसा के गवर्नर श्री बिशम्भर नाथ पाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि दारुल उलूम देवबन्द भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केंद्र बिन्दु जैसा ही था, जिसकी शाखायें दिल्ली, दीनापुर, अमरोत, कराची, खेडा और चकवाल में स्थापित थी। भारत के बाहर उत्तर पशिमी सीमा पर छोटी सी स्वतंत्र रियासत ”यागि़स्तान“ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था, यह आंदोलन केवल मुसलमानों का न था बल्कि पंजाब के सिक्खों व बंगाल की इंकलाबी पार्टी के सदस्यों को भी इसमें शामिल किया था।

इसी प्रकार असंख्यक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दारुल उलूम देवबन्द स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भी देश प्रेम का पाठ पढ़ता रहा है जैसे सन 1947 ई. में भारत को आज़ादी तो मिली, परन्तु साथ-साथ नफरतें आबादियों का स्थानांतरण व बंटवारा जैसे कटु अनुभव का समय भी आया, परन्तु दारुल उलूम की विचारधारा टस से मस न हुई। इसने डट कर इन सबका विरोध किया और इंडियन नेशनल कांग्रेस के संविधान में ही अपना विश्वास व्यक्त कर #पाकिस्तान का विरोध किया तथा अपने देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण दिया। आज भी दारुल उलूम अपने देशप्रेम की विचार धारा के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।

दारुल उलूम #देवबन्द में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा, भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है। दारुल उलूम देवबन्द ने अपनी स्थापना से आज (हिजरी 1283 से 1424) सन 2002 तक लगभग 95 हजार महान विद्वान, लेखक आदि पैदा किये हैं।

दारुल उलूम में इस्लामी दर्शन, अरबी, फारसी, उर्दू की शिक्षा के साथ साथ किताबत (हाथ से लिखने की कला) दर्जी का कार्य व किताबों पर जिल्दबन्दी, उर्दू, अरबी, अंग्रेज़ी, हिन्दी में कम्प्यूटर तथा उर्दू पत्रकारिता का कोर्स भी कराया जाता है। दारुल उलूम में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा व साक्षात्कार से गुज़रना पड़ता है। प्रवेश के बाद शिक्षा मुफ्त दी जाती है।

दारुल उलूम देवबन्द ने अपने दार्शन व विचारधारा से मुसलमानों में एक नई चेतना पैदा की है जिस कारण देवबन्द स्कूल का प्रभाव भारतीय महादीप पर गहरा है।

#IndianMuslims

پتھروں کا نگر ہے بچا آئینہ۔۔۔۔۔۔۔ قمرایجاز

 

پتھروں کا نگر ہے ؛ بچا آئینہ ،

کر رہا ہے یہی التجا آئینہ

دیکھ کر لوگ تجھ کو سنورنے لگے،

اپنے کردار کو تو بنا آئینہ

گھر کے آئینے کی قدر گھٹ جائیگی ،

لایا بازار سے گر نیا آئینہ

بھید چہرے کے کھل جائیں گے دیکھنا،

سامنے جب تیرے آئیگا آئینہ

لاکھ چہرے کو اپنے چھپائے مگر،

جانتا ہے تیری ہر ادا آئینہ

ہر طرف بےظمیروں کا بازار ہے،

تو کسی کو وہاں نہ دکھا آئینہ

آئینہ تجھ سے کہتا ہے ایجاز یہ ،

پہلے خود دیکھ،لے پھر دکھا آئینہ

पत्थरों का नगर है बचा आईना…….कमर एजाझ

पत्थरों का  नगर  है ; बचा आईना ,

कर रहा  है  यही  इल्तिजा  आईना  !

देख कर लोग  तुझको  सँवरने लगे,

अपने क़िरदार को तू  बना  आईना  !

घर के आईने की  क़द्र  घट जाएगी ,

लाया बाज़ार  से गर  नया  आईना !

भेद चेहरे   के   खुल जायेंगे  देखना,

सामने जब   तेरे   आयेगा  आईना  !

लाख चेहरे  को अपने छुपाये  मगर,

जानता है   तेरी  हर  अदा   आईना  !

हर तरफ  बे-ज़मीरों का  बाज़ार  है,

तू किसीको  वहाँ  न दिखा  आईना  !

आईना तुझसे  कहता है ये  झाजिये ,

पहेले खुद देख,ले फिर दिखा आईना !

***

 

 

 

 

آشناغم سے ملا راحت سے بیگانہ ملا……..کلیم عاجز

آآشنا غم سے ملا راحت سے بیگانہ ملا

دل بھی ہم کو خوبیٔ قسمت سے دیوانہ ملا

.

بلبل و گل شمع و پروانہ کو ہم پر رشک ہے

درد جو ہم کو ملا سب سے جدا گانہ ملا

.

ہم نے ساقی کو بھی دیکھا پیر مے خانہ کو بھی

کوئی بھی ان میں نہ راز آگاہ مے خانہ ملا

.

سب نے دامن چاک رکھا ہے بقدر احتیاج

ہم کو دیوانوں میں بھی کوئی نہ دیوانہ ملا

.

ہم تو خیر آشفتہ ساماں ہیں ہمارا کیا سوال

وہ تو سنوریں جن کو آئینہ ملا شانہ ملا

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کیا قیامت ہے کہ اے عاجزؔ ہمیں اس دور میں

طبع شاہانہ ملی منصب فقیرانہ ملا   

आश्ना ग़म से मिला राहत से बेगाना मिला—–कलीम आजिज़

 

आश्ना ग़म से मिला राहत से बेगाना मिला

दिल भी हम को ख़ूबी-ए-क़िस्मत से दीवाना मिला

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बुलबुल-ओ-गुल शम-ओ-परवाना को हम पर रश्क है

दर्द जो हम को मिला सब से जुदा-गाना मिला

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हम ने साक़ी को भी देखा पीर-ए-मय-ख़ाना को भी

कोई भी इन में न राज़-आगाह-ए-मय-ख़ाना मिला

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सब ने दामन चाक रक्खा है ब-क़द्र-ए-एहतियाज

हम को दीवानों में भी कोई न दीवाना मिला

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हम तो ख़ैर आशुफ़्ता-सामाँ हैं हमारा क्या सवाल

वो तो सँवरें जिन को आईना मिला शाना मिला

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क्या क़यामत है कि ऐ ‘आजिज़’ हमें इस दौर में

तब्अ’ शाहाना मिली मंसब फ़क़ीराना मिला

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 19, 2017

AMU Tarana(Aligharh Muslim University)…..Asrarul Haque "Mjaz”

AMU Tarana(Aligharh Muslim University)…..Asrarul Haque "Mjaz”

majaz[1]

یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں
یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں
سرشارنگاہ نرگس ہوں، پابستہء گیسوئے سنبل ہوں

یہ میرا چمن
یہ میرا چمن
یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

جو طاق حرم میں روشن ہے، وہ شمع یہاں بھی جلتی ہے
اس دشت کے گوشے گوشے سے، اک جوئے حیات ابلتی ہے
یہ دشت جنوں دیوانوں کا، یہ بزم وفا پروانوں کی
یہ شہر طرب رومانوں کا، یہ خلد بریں ارمانوں کی
فطرت نے سکھائی ہے ہم کو، افتاد یہاں پرواز یہاں
گائے ہیں وفا کے گیت یہاں، چھیڑا ہے جنوں کا ساز یہاں

یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

اس بزم میں تیغیں کھینچیں ھیں، اس بزم میں ساغر توڑے ہیں
اس بزم میں آنکھ بچھائی ہے، اس بزم میں دل تک جوڑے ہیں
ہر شام ہے شام مصر یہاں، ہر شب ہے شب شیراز یہاں
ہے سارے جہاں کا سوز یہاں، اور سارےجہاں کا ساز یہاں
زرات کا بوسہ لینے کو، سو بار جھکا آکاش یہاں
خود آنکھ سے ہم نے دیکھی ہے، باطل کی شکست فاش یہاں

یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں
یہ میرا چمن
یہ میرا چمن
یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

جو ابر یہاں سے اٹھے گا، وہ سارے جہاں پر برسے گا
ہر جوئے رواں پر برسے گا، ہر کوہ گراں پر بارسے گا
ہر سروثمن پر بر سے گا، ہر دشت و دمن پر برسے گا
خود اپنے چمن پر برسے گا، غیروں کے چمن پر برسے گا
ہر شہر طرب پر گرجے گا، ہر قصر طرب پر کڑکے گا

یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے گا
یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے گا
یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے گا
برسے گا، برسے گا، برسے گا۔

از: اسرار الحق مجاز لکھنؤی

नज़र-ए-अलीगढ़
असरारुल हक़ मजाज़

सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरिगस हूँ, पाबस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूँ।
ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ।

हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है।

जो ताक़-ए-हरम में रौशन है, वो शमआ यहाँ भी जलती है।
इस दत के गोशे-गोशे से, इक जू-ऐ-हयात उबलती है।

इस्लाम के इस बुत-ख़ाने में, अस्नाम भी है और आज़र भी।
तहज़ीब के इस मैख़ाने में, शमशीर भी है और साग़र भी।

याँ हुस्न की बर्क़ चमकती है, या नूर की बारिश होती है।
हर आह यहाँ एक नग़मा है, हर अश्क़ यहाँ इक मोती है।

हर शाम है, शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है, शब-ए-शीराज़ यहाँ।
है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ, और सारे जहाँ का साज़ यहाँ।

ये दश्ते जुनूं दीवानों का, ये बज़्मे वफ़ा परवानों की।
ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों की।

फ़ितरत ने सिखाई है हमको, उफ़ताद यहाँ परवाज़ यहाँ।
गाए हैं वफ़ा के गीत यहाँ, छेड़ा है जुनूं का साज़ यहाँ।

इस फ़र्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं।
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं।

इस बज़्म में तेगें खींची हैं, इस बज़्म में सागर तोड़े हैं।
इस बज़्म में आँख बिछाई है, इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैं।

इस बज़्म में नेजे़ फेंके हैं, इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैं।
इस बज़्म में गिरकर तड़पे हैं, इस बज़्म में पीकर झूमे हैं।

आ-आके हज़ारों बार यहाँ, खुद आग भी हमने लगाई है।
फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हम ही ने बुझाई है।

याँ हमने कमंदें डाली हैं याँ हमने शबख़ूँ मारे हैं।
याँ हमने क़बाएँ नोची हैं, याँ हमने ताज उतारे हैं।

हर आह है ख़ुद तासीर यहाँ, हर ख़्याब है ख़ुद ताबीर यहाँ।
तदबीर के पाए संगी पर, झुक जाती है तक़दीर यहाँ।

ज़र्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ।
ख़ुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ।

इस गुल कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली है।
फिर अब्र गरजने वाला है, फिर बर्क़ कड़कने वाली है।

जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा।
हर जू-ऐ-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा।

हर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा।
ख़ुद अपने चमन पर बरसेगा, ग़ैरों के चमन पर बरसेगा।

हर शहर-ए-तरब पर गरजेगा, हर क़स्रे तरब पर कड़केगा।
ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा।
(1936)

Published on May 17, 2008

AMU Tarana — composed by Asrar-ul-Haque "Majaz” and music by Khan Ishtiaque. This is Rev 1 — with better quality Audio that is provided by Mr. Ahmad Zaib (Alig).

آیئنہ بات کرنے پہ مجبور ہو گیا۔۔۔۔۔۔بشیر بدر

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया —-बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया

.

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के

दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

.

महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये

लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया

.

तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना

आईना बात करने पे मज़बूर हो गया

.

सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल

वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया

.

कुछ फल जरूर आयेंगे रोटी के पेड़ में

जिस दिन तेरा मतालबा मंज़ूर हो गया

 

फिर वही शख्स बोला, बोला जुल्म के खिलाफ…..बाकी सब "सेक्युलर” तुम्हारे जलते दुकान/मकान की आग में पकौड़ा तल रहे थे….

 

वतनको खून दे दिया_ मोहंमदअली वफा

ईंफाल जो मांगा वतनको खून दे दिया,

फिर भी हमारी कद्र के दिये नही जले.

अब्दुल हमीद, अशफाकुल्लाह भी मिटे,

आझाद, मदनी,शेखको तो कौन जानता.

मुहम्मदअली जौहर भी याद न आये,

आझादी या मौत का फतवा दिया हमें.

बुखारी अताउल्लाह भी मीटे जमीन से,

कौन पूछता हसरत मोहानी के नाम को.

अंसारी,अजमलखां,किचलु भी नदारद,

झाकिर,फखरुद्दीन, को तो कौन जानता.

किदवाईके अहसां भी भूल गये तुम,

कर्नल आझाद हिन्द कभी याद न आया.

शिकवा नहीं दिलके फफोले है ये ‘वफा’

आझादी ए मुल्कका किस्सा है ये वफा.

कुछ्भी हो वतन अपना है ,आन दे देंगे,

भारत की हिफाजत के लिये जान दे देंगे.

ईंफाल=प्रस्वेद

मदनी=मौलान हुसेन अहमद मदनी(देवबंद)रेशमी रूमालकी तहरीकमें शेखुल हिन्द महमदुलहसन के साथ माल्टा  (युरोप) में ढाई साल तक जेल  काटी.

शेख= शेखुल हिन्द महमदुलहसन (रेशमी रूमाल की तहरीकके रुहेरवां)

रेशमी रूमाल नी तहरीक= भारत की आझादी की लीये  शेखुल हिन्द महमदुलहसन, मौलाना हुसेन अहमद मदनी(देवबंद)और उनके वफादार साथीओं की एक जां बाज तहरीक.

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