गाय औऱ हिंदुत्व : मिथक और वास्तविकता

 

अगर कोई झूठ और धोखाधड़ी में महारत हासिल करने के लिए किसी गुरुकुल या यूनिवर्सिटी की तलाश में है तो निश्चित ही आरएसएस से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। …

शम्सुल इस्लाम

June 16,2017 10:44

गाय औऱ हिंदुत्व : मिथक और वास्तविकता

शम्सुल इस्लाम

‘राम’, ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ (मुसलमानों व ईसाइयों को ज़ोर-ज़बरदस्ती हिंदू बनाना) जैसे मुद्दों के बाद हिंदुत्ववादी ताकतों के हाथ में अब गो- रक्षा का हथियार है। पवित्र गाय को बचाने के नाम पर मुसलमानों व दलितों को हिंसक भीड़ द्वारा घेरकर मारने, उनके अंग भंग कर देने और उनके साथ लूटपाट करने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। याद रहे कि ऐसी कई घटनाओं का तो पता ही नहीं चल पाता है।

डींग हांकने या अपनी बहादुरी दिखाने के लिए इन हिंसक तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो उस मारपीट तथा जुल्म व प्रताड़ना की तस्वीर दिखाते हैं, जिसे देख-सुन कर विभाजन के समय की क्रूरतापूर्ण हिंसक घटनाएं याद आ जाती हैं। इन्हें देख के साफ लगता है कि इन हिंसक व अराजक तत्वों को सरकार का वरदहस्त प्राप्त है तथा इन्हें कानून का कोई डर नहीं है।

यह शर्मनाक वीडियोज हमें दिखा रहे हैं कि कैसे यह हिंदूवादी हिंसक तत्व किसी को पीट-पीट कर मार डालने या उसे अधमरा कर देने पर खुशियां मनाते, उसका आनंद लेते हैं।

गो-रक्षा का धार्मिक कर्तव्य निभाने वाले यह आपराधिक तत्व सही मायनों में हत्यारे होने के साथ लुटेरे भी हैं। यह इससे सिद्ध हो जाता है,जब हम उन्हें प्रताड़ितों को घेरकर मारने से पहले उन की पूँजी और सामान की लूटमार करते देखते हैं।

आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक और नीतिकार, हमारे प्रधानमंत्री द्वारा अगस्त 2016 में गो माता के इन अराजक व हिंसक भक्तों को असामाजिक तत्व ठहरा दिए जाने के बावजूद इनका हिंसक तांडव जारी है।

प्रधामंत्री ने कहा था –

    ‘यह देख मुझे बहुत गुस्सा आता है कि लोग गो रक्षा के नाम पर दुकानें चला रहे हैं… कुछ लोग रात के समय अनैतिक कार्यों में लिप्त रहते हैं और दिन में वह गो र क्षकों का आवरण ओढ़ लेते हैं।’

प्रधानमंत्री द्वारा की गई इस सख्त टिप्पणी को लगभग एक साल होने को आया लेकिन गाय के नाम पर की जाने वाली हिंसा इस अरसे में और बढ़ गई तथा देश के बड़े हिस्से में फैल गई है। यह ज्यादा भीषण हो गई और अनियंत्रित भी। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री ने दिखावे के लिए यह बातें बोली हों, ताकि इन आपराधिक कृत्यों के खिलाफ समाज में पनप रहा गुस्सा कम किया जा सके। दूसरा यह कि उक्त गो रक्षक असामाजिक तत्व नहीं हैं, बल्कि वास्तविक गो-रक्षक हैं जिन्हें प्रधान-मंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है। परंतु इसमें कोई शक नहीं कि इन गैंगस्टर्स को आरएसएस तथा प्रशासन का वरदहस्त प्राप्त है।

दुर्भाग्य से न्याय पालिका, जिसके बारे में माना जाता है कि वह देश के शासकों को विधि सम्मत रूप से शासन करने पर बाध्य करेगी, कई बार उसने जनहित के मुद्दों पर प्रभावशाली काम किए भी, लेकिन पता नहीं क्यों इस बार वह इन आपराधिक तत्वों के आगे चुप है। बल्कि राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने ‘गो- भक्तों’ द्वारा किए गए अपराधों की पड़ताल करने के बजाय (गो-रक्षा के नाम पर की जाने वाली हिंसा में राजस्थान प्रथम स्थान पर है। कुछ समय पहले ही वहां इन गो रक्षकों ने पहलू खान को बर्बरता-पूर्वक तरीक़े से मार डाला। इस घटना का पूरा वीडियो भी अपलोड किया गया था।) गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने तथा उसकी हत्या करने वाले को मृत्यु दंड देने के निर्देश जारी किए।

भारत के गृह-मंत्री राजनाथ सिंह ने तो, जो आरएसएस के महत्वपूर्ण विचारक भी हैं, गाय की पवित्रता पर एक नई ‘ वैज्ञानिक’ खोज तक का हवाला दे डाला। आरएसएस पदाधिकारियों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा जारी एक रिपोर्ट का जिक्र किया और कहा कि "गाय में 80 प्रतिशत जींस ऐसे पाए गए हैं, जो इंसानों में भी मौजूद हैं।” साथ ही उन्होंने भारतीय नागरिकों से "गाय की रक्षा और उसकी पूजा करने” का आह्वान भी किया।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आरएसएस के यह स्वयंसेवक, राजनाथ सिंह इस मामले में न केवल अध्-कचरी सोच वाले बल्कि पक्षपाती और गलत भी थे। विश्वस्तरीय प्रतिष्ठित पत्रिकासाइंस की खोज के आधार पर भारत के एक प्रमुख अंगरेजी दैनिक ने यह स्पष्ट किया है कि अन्य कई पशुओं के जींस, गाय के जींस से ज्यादा मानव जींस से मिलते हैं। चिंपांज़ी (गोरीले ), बिल्ली, चूहे व कुत्ते में क्रमशः 96, 90, 85 और 84 प्रतिशत जींस मानव जींस के समान मिलते हैं। केवल यह प्राणी ही नहीं, फलों में भी यही स्थिति है, जैसे केले में 60 प्रतिशत जींस मानव जींस के समान होते हैं। अब देखना यह है कि राजनाथ सिंह कब इन्हें भी पवित्र घोषित करते हैं। हमें उनसे यह जानने की भी जरूरत है कि अल्पसंख्यक और दलित इंसान हैं या नहीं, उनमें भी गौ-माता के जींस हैं या नहीं, और उनकी जानें हिंसक भीड़ से बचाई जाना जरूरी है कि नहीं।

गो-रक्षकों के ताजा शिकार आईआईटी-एम (चैन्ने स्थित) के बीफ खाने वाले लोग हुवे हैं। संस्थान के केंपस में आरएसएस के विद्यार्थी संगठन (abvp अभाविप) के कार्यकर्ताओं ने इन पर प्राणघातक हमला किया। हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं द्वारा गाय के नाम पर लगातार किए जा रहे इन हिंसक हमलों से एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट है कि यह फासीवादी तत्व हमारे आज के भारत के बारे में कुछ नहीं जानते तथा भारतीय इतिहास के मामले में भी निरे जाहिल हैं। खासतौर से भारत के वेदिक इतिहास से तो यह पूरी तरह अनभिग्य हैं, जिसे यह स्वर्ण काल के रूप में निरूपित करते हैं।

अगर कोई झूठ और धोखाधड़ी में महारत हासिल करने के लिए किसी गुरुकुल या यूनिवर्सिटी की तलाश में है तो निश्चित ही आरएसएस से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। इस क्षेत्र में उनकी दक्षता से किसी की कोई तुलना नहीं की जा सकती। भारत के हिंदुओं द्वारा बीफ ग्रहण करने के बारे में वे वास्तविकताओं को झुठला कर जिस प्रकार की बातें करते हैं, उनसे एक बार फिर उनकी यह विशेषग्यता सिद्ध हो रही है। वे ऐतिहासिक तथ्यों को आपराधिक रूप से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हुए यह दावा करते हैं कि भारत में बीफ खाने का चलन मुस्लमान/ईसाई शासकों के आगमन के बाद से शुरू हुआ तथा इन शासकों ने हिंदुओं और उनकी पवित्र धार्मिक मान्यताओं का निरादर करने के लिए भारत में बीफ खाने पर जोर दिया।

एक प्रश्न कि “हमारे देश (भारत) में गो वध कैसे प्रारंभ हुआ?” के उत्तर में पूरी तरह झूट बोलते बेशर्मी से, आरएसएस के महान गुरु, गोलवालकर ने कहा: “इसका प्रारंभ हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं के आगमन के साथ हुआ। लोगों को गुलामी के लिए तैयार करने के लिए उन्होंने सोचा कि हिंदुओं के आत्म सम्मान से जुड़ी हर चीज का निरादर करो…इसी सोच के चलते गो-वध भी शुरू किया गया।”

यहाँ यह जानना रोचक होगा कि आरएसएस ने अपनी स्थापना (1925 ) से लेकर भारत की आज़ादी तक, अंग्रेजी राज में कभी भी गौ-वध बंद करने के लिए किसी भी तरह का आंदोलन नहीं चलाया।

इस तरह के दुष्प्रचार ने बीफ खाने या इसका व्यवसाय करने वाली देश के दो अलप-संख्याक समुदायों और दलितों को आतंकित करने में महती भूमिका निभाई। यहां इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हिन्दुत्वादी राजनीति के उत्थान के साथ ही गाय ऐसा संवेदनशील मुद्दा बना दिया गया, जिसने देश में मुसलमानों व दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काने के ज्यादातर मामलों में केंद्रीय भूमिका निभाई।

नाज़ी दुष्प्रचारक पॉल जोसेफ गोएबल्स के भारतीय उत्तराधिकारियों के लिए, जो यह दावा करते हैं कि भारत में बीफ खाना मुसलमानों/ईसाइयों के आगमन के साथ शुरू हुआ, भारतीय इतिहास के वैदिक काल का हिंदू लेखकों द्वारा किया गया वर्णन निरर्थक ही था।

आरएसएस द्वारा हिंदुत्ववादी विचारक के रूप में प्रतिष्ठित स्वामी विवेकानंद ने प्साडेना, कैलिफोर्निया (अमेरिका) के शेक्सपीयर क्लब में 2 फरवरी 1900 को ‘बुद्धिस्ट इंडिया’ के विषय पर अपने संबोधन में कहाः

    “आप अचंभित रह जाएंगे यदि प्राचीन वर्णनों के आधार पर मैं कहूं कि वह अच्छा हिंदू नहीं है, जो बीफ नहीं खाता है। महत्वपूर्ण अवसरों पर उसे आवश्यक रूप से बैल की बलि देना व उसे खाना चाहिए।”

अच्छे दिन : जनसंख्या सफाये के लिए इससे बेहतर राजकाज और राजधर्म नहीं हो सकता

इस कथन को वेदिक काल के इतिहास व संस्कृति विशेषग्य सी कुन्हन राजा की बात से बल मिलता है। महत्वपूर्ण यह है कि राजा ने यह शोध कार्य विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के अंतर्गत किया है। इसमें उन्होंने कहा हैः

    “वेदिक आर्यंस, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे, मछली, मांस, यहां तक कि बीफ भी खाते थे। एक सम्मानित अतिथि के आतिथ्य सत्कार में बीफ परोसा जाता था। हालांकि वेदिक आर्यंस बीफ खाते थे लेकिन उसके लिए दुधारू गायों का वध नहीं किया जाता था। ऐसी गायों के लिए अग्नय (जिन्हें मारना नहीं है) का शब्द इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन एक अतिथि गोघना (जिसके लिए गो-वध किया जाना है) माना जाता था। उस समय केवल बैल, बांझ गाय और बछड़ों का वध किया जाता था।”

गोरक्षा आंदोलन बन गया है, फिर बंटवारे का सबब #Beefgate #Dadri

भारतीय राजनीति, धर्म और संस्कृति के विशेषज्ञ व अद्भुत शोधकर्ता, डॉ अम्बेडकर ने इस विषय पर ‘क्या हिंदुओं ने कभी बीफ नहीं खाया?’ शीर्षक से उत्कृष्ट लेख लिखा है। वे लोग जो वास्तव में प्राचीन भारत को जानना-समझना तथा अल्पसंख्यकों को किनारे कर उनका सफाया करने के लिए गढ़े जाने वाले मिथकों की असलियत जानना चाहते हैं, उन्हें डॉ. अम्बेडकर का यह ऐतिहासिक आलेख जरूर पढ़ना चाहिए।

अनेकानेक वेदिक काल और उत्तर-वैदिक काल की हिंदू पांडुलिपियों का अध्ययन करने के बाद डॉ. अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि “जब भी पढ़े-लिखे ब्राह्मण इस पर बहस करें कि हिंदुओं ने कभी बीफ नहीं खाया और वे तो गाय को पवित्र मानते हैं तथा उन्होंने सदा ही गो-वध का विरोध किया है तो उनकी बात को स्वीकार करना असंभव है।”

हे राम! यह सैन्य राष्ट्र में कारपोरेट नरबलि का समय !

दिलचस्प बात यह है कि आं अम्बेडकर के अनुसार गायों की बलि इसलिए दी जाती थी, उनका मांस इसलिए खाया जाता था, कि वे पवित्र थीं। उन्होंने लिखा: “ऐसा नहीं था कि वेदिक काल में गाय को पवित्र नहीं माना जाता था, बल्कि उसके पवित्र होने के चलते ही वाजस्नेयी संहिता में यह निर्देश दिए गए हैं कि बीफ खाना चाहिए।” (धर्म शास्त्र विचार इन मराठी, पृ. 180)। यह कि ऋग्वेद के आर्यंस आहार के लिए गायों का वध करते थे और उनका बीफ खाना ऋग्वेद से ही सिद्ध होता है। ऋग्वेद (x. 86.14) में इंद्रा कहती हैः ‘उन्होंने एक बार 20 बैलों का वध किया’। ऋग्वेद (x.91.14) में है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई। ऋग्वेद से ही यह भी पता चलता है कि गायों का वध तलवार या कुल्हाड़ी से किया जाता था।”

अपने लेख का समापन आंबेडकर ने इन शब्दों पर किया हैः

“इन सब सबूतों के रहते किसी को संदेह नहीं हो सकता कि एक समय था जब हिंदू, चाहे वे ब्राह्मण हों या अन्य न सिर्फ मांसभक्षी थे बल्कि वे बीफ भी खाते थे।”

अंतिम फैसला : महेशचंद्र शर्मा जी, मोदी मार्का विकास में गो-वंश की नहीं, गो-वध की ही जगह है

हिंदुत्ववादियों द्वारा भारत के कमजोर वर्गों के विरुद्ध की जा रही हिंसा आरएसएस के दोग़लेपन को ही उजागर करती है, जो उसकी रीति-नीति का अभिन्न अंग है। वास्तव में तो, किसी भी मुद्दे पर दो-तीन तरह की बातें करना तो आरएसएस के लिए बहुत कम ही माना जायेगा। हिंदुत्ववादी संगठन, खास कर आरएसएस से जुड़े, साधारण इन्साफ पसंद भारतीयों की, बेधड़क हत्याएं कर रहे हैं, न केवल गो-वध के लिए बल्कि इन पशुओं के परिवहन करने पर भी। हद तो यह है कि उन दलितों को भी मौत के घाट उतरा जा रहा है, जो क़ानूनी तौर पर मुर्दा गायों की खाल उतर रहे थे। इसी के समानांतर आरएसएस/भाजपा की सत्ता वाले राज्य गोवा, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर हैं, जहां गो वध वैद्य है और बीफ वहां के मुख्य आहार में शामिल है। आरएसएस का तरीका कुछ ऐसा है कि कुछ क्षेत्रों में गो-वध की बात तो दूर रही, गऊ के साथ पाए जाने पर आपको ‘नर्क’ भेजा जा सकता है और कुछ क्षेत्रों में इस से जुड़े लोग गो-वध कराते हुवे राज कर रहे हैं। याद रहे हमारे देश में केरल जैसे राज्य भी हैं जहाँ बीफ़ ‘सेक्युलर’ खाना है!

यह सरकार भारत विरोध में खड़ी है

इस बात के दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं कि गाय के धंधे और बीफ पर रोक ने, पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों में घिरे, अपने अस्तित्व के लिए जूझते किसानों के लिए और मुसीबतें पैदा कर दी हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसानों की आत्महत्या दर 30 प्रतिशत बढ़ गई। ऐसे में गाय के विक्रय पर रोक लगाना किसानों को कुएं में धक्के देना जैसा है।

मोदी जी, गाय बचाओगे या देश : कहीं देश बाँटने का हथियार न बन जाए गाय

बतौर किसान नेता राजनीति में पदार्पण करने वाले चर्चित राजनीतिज्ञ, शरद पवार गौ-सेवा के बारे में एक अद्भुत प्रस्ताव लाए हैं। उनका कहना है कि आरएसएस के निर्देश पर मोदी सरकार गायों के क्रय-विक्रय व गो-वध पर रोक लगा रही है। इससे प्रभावित होने वाले किसानों को चाहिए कि वे अपने यहां की बांझ या बेकार गायें आरएसएस को सौंप दें, ताकि वह भी गौमाता की अच्छे-से सेवा करने के पवित्र काम में हिस्सेदारी सके। आरएसएस को इससे कोई समस्या भी नहीं होगी, क्यों कि भारत सरकार के बाद सब से ज़्यादा ज़मीनें इसी के पास हैं।

मोरों ने किया सामूहिक आत्महत्या करने का फैसला

पवार ने यह मांग भी की है कि आरएसएस को नागपुर के रेशम बाग स्थित अपना मुख्यालय, एक गोशाला में तब्दील कर लेना चाहिए, जिससे गरीब किसानों पर इन गायों का पेट भरने का बोझ न पड़े तथा आरएसएस को गायों की सेवा का पुण्य मिलता रहे।

इस पवित्र युद्ध का एक स्पष्ट एजेंडा मांस के कारोबार से जुड़े कुरैशियों (मुस्लमान), खटीक (हिन्दू ) और चमड़े के कारोबार से जुड़े दलितों की आर्थिक व्यवस्था ध्वस्त करना भी है। इससे फुटकर व्यापार की तरह होने वाला यह असंगठित उद्योग मर जाएगा। जिस का नतीजा यह होगा कि भारत जैसी बड़ी मंडी विश्व की उन बड़ी मांस कम्पनिओं के हवाले कर दी जाएगी जो प्रोसेस्ड मांस कारोबार पर एकाधिकार रखते हैं।

मांस के लिए मवेशी व्यापार पर रोक का हिंदुत्ववादी एजेंडा

आरएसएस अनेक मुँहों से बोलते हुए, अनेक गुप्त एजेंडों पर काम करने के फ़ासीवादी संस्कृति को निभाने में माहिर है। देशवासियों को विभाजित करने वाला कोई एक एजेंडा जब अपना प्रभाव खोने लगता है या ज्यादा विवादित होने लगता है, तब वे थैले से कोई दूसरा एजेंडा निकाल लेता है। ‘राम मंदिर’, ‘घर वापसी’, ‘लव जिहाद’ और अब बारी है गाय के नाम पर देश को बांटने की। गाय का मुद्दा देश का एकमात्र मुद्दा बन गया है। यह मुद्दा असल में ध्यान भटकाने के लिए छलावा मात्र है। गरीबी, बेरोजगारी, दंगे, अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों से ध्यान भटकाने का। आरएसएस-भाजपा से जुड़ा शासक वर्ग समझता है कि वे सब लोगों को हर समय मूर्ख बनाते रहेंगे। निश्चि ही वे गलत सिद्ध होंगे। लेकिन जब तक इन का पर्दाफ़ाश होगा, तब तक तो लोकतांत्रिक-धर्म निरपेक्ष भारत और इसके लोगों का बुरा हाल हो चुका होगा।

[अंग्रेज़ी से अनुवाद: जावेद आलम, इंदौर]

Prime time Ravish 5jun17 ; सरकार द्वारा NDTV को डराने की कोशिश ?? | NDTV CBI Raid

 دیکھتا رہا۔۔۔۔ محمد علی وفا

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نفرت قدے کے بام کو دیکھتا رہا

زہر سے بھرے  جام کو دیکھتا رہا

 .

دن بھی گزارا تیری ظلمتیں لئے

میں الجھنوں کی شام کو دیکھتا رہا۔

 .

جب ہوا ذکر ٹوٹے ہوئے دل کا

 تیرے ہی نام کو دیکھتا رہا

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اب خریدے کہاں سے یہ غریب دل

تیرے لگائے دام کو دیکھتا رہا

 .

دسرونکی طرف وفا نظریں نہیں اٹھی

میں میرے ہی کام کو دیکھتا رہا

देखता रहा—मुहम्मदअली वफा

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नफरतकदे के बाम को देखता रहा

ज़हरसे भरे   जाम को देखता रहा

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दिन भी गुजारा तेरी जुल्म्तें लिये

में उल्झनों की शाम को देखता रहा.

 .

जब हुआ जिकर तूटे हुए दिल का

एक  तेरे ही नाम को देखता रहा

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अब खरीदे कहां से ये गरीब दिल

तेरे लगाये   दाम को देखता रहा

 .

दुसरोंकी तरफ वफा नजरें नहीं उठी

में  मेरे ही काम को देखता रहा

برسوں کے بعد بھی۔۔۔۔۔محمدعلی وفا

बरसों के बाद भी- मुहम्मद अली वफा

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जालिम रहा है आसमां बरसों के बाद भी

अदावत भरा है ये झमां बरसों के बाद भी

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पानी बने बहता रहा  दरिया  ये खूनका

फिर भी नही कोइ आशनां बरसों के बाद भी

 .

बेठे रहे तुम हाथ बांधे आती शरम नहीं

कुछ भी नहीं तुमको अयां बरसों के बाद भी

 .

अबभी सहर को ढुंढते हो वो भी रातको

तुम पर  हसेगी ये शमां बरसों के बाद भी

 .

मोहिद बने रहना यहां  होता गूनाह कया

जारी अभी तक ईमतेहां  बरसों के बाद भी

 .

हमतो बने  बारिश कदे  जंगल जरा देखो

कटते रहे हमतो यहां बरसों के बाद भी

 .

मांगा पसीना तो हमारा खूने जिगर  दिया

फिरभी बने हम ही निशां बरसों के बाद भी

 .

घर भी गये लूटे यहां  असमत भी लूट गइ

मिलता नहीं कोइ पासबां बरसों के बाद भी

 .

आई कभी खद्दर कभी तो  रंगे जाफरां

दुश्मन बने बूढे जवां बरसों के बाद भी

 .

खंजर रहे  कातिल के हमही  पर घूमते

बन कर रहे मझलुम यहां  बरसों के बाद भी

 .

महरुम था ये चमन  बहारों की फसल से

छाई रही हमपर खिझां बरसों के बाद भी

दिलके फफोले ‘वफा’ खोलुं अब जा कर कहां

हसते रहे सब  सुन बयां बरसों के बाद भी

جینے کے بہانے سبھی رسوا یہاں ہوئے۔۔۔۔۔۔۔۔محمد علی وفا

This Ghazal was read on Mehman tv Mushayera by SSTV ,Toronto on 25 May 2017.It will be aired from SSTV Toronto on rogrs cable 851 on Eid dy

जलने दे मेरे दोस्त_मोहंमदअली’वफा’

 

चलताहुं  जीस तरह में चलने दे मेरे दोस्त
जलता हुं तेरी यादमें जलने दे मेरे दोस्त.

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वल्लाह पुछ्ना नही मंझिल का भी पता
मेरे कदमको युंही मचलने दे मेरे दोस्त.

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होता हुं तुलुअ में मगर मेरी अदासे

तारिक्यां छानेको है ढलने दे मेरे दोस्त.

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हो जाए खूश्क ही न तेरे अश्ककी तरह
दरियाओंको इन आंखसे बहने दे मेरे दोस्त

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ईसरार से रुकता नहीं खुशियोंका काफला
गमके बादलोंको भी घिरने दे मेरे दोस्त.

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जीनेके बहाने तो सभी रुस्वा यहां हुए
ईज्जत के साथ मोत से मरने दे मेरे दोस्त.

ऊर्दु मुशायेरा– 25 th May 2017 Toronto,Canada اردو مشایرا

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(Courtesy:Urdu daily Inquilab,Mumbai)

لبل کو کیا خبر ہے کٹیگی زباں کہاں ۔۔۔۔ شکیل قادری

 .

محفوظ ہے چمن میں کوئی آشیاں کہاں

بلبل کو کیا خبر ہے کٹیگی زباں کہاں

 .

شامل تھے کارواں میں گئے وہ جواں کہاں

چلتی ہے زندہ لاشیں کسی میں ہے جاں کہاں

 .

ہے لامکاں تو پھر تجھے سجدہ کرں کدھر

موجود ہے تو آ تجھے ڑھونڑھوں کہاں کہاں

 .

بچوں کے اس سوال کا دو گے جواب کیا

کھو آئے ہو بزرگوں کے سارے نشاں کہاں

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مرتے ہوئے کسانوں کی آنکھوں میں جھانک کر

میں ڑھونڈھتا ہوں ہے میرا ہندوستاں کہاں

 .

ہونے کو قتل بارہا پہنچا میں اس کے گھر

لیکن میرا رفیق ہوا مہرباں کہاں

 .

رنگے جوانی میں نے بھی دیکھیں بہت حسیں

غالب کی طرح کر سکا لیکن بیاں کہاں

 .

دل میں نہ رکھو اس کو محبت کی آگ ہے

ہو جائیگی عیاں یہ رہیگی نہاں کہاں

ایرانی رنگ، بو عرب، ہندوی بدن

آخر غزل تمہاری ہوئی ہے جواں کہاں

 .

قدموں کے ہوں نشاں تو انہیں جا کے دیکھ لوں

لیکن تیری نظر کے میں ڑھوں ڑھوں نشاں کہاں

.

ہر آدمی کا جسم یہاں پتھروں کا ہے

کھولی ‘شکیل’ کانچ کی تم نے دکاں کہاں

 

बुलबुल को क्या ख़बर है कटेगी ज़ुबाँ कहाँ—–शकील क़ादरी

.

महेफ़ूज़  है  चमन  में   कोई  आशियाँ  कहाँ

बुलबुल को क्या ख़बर है कटेगी ज़ुबाँ  कहाँ

 .

शामिल  थे  कारवाँ  में  गये  वो  जवाँ कहाँ

चलती  है  ज़िंदा  लाशें किसी में है जाँ कहाँ

 .

है लामकाँ तो फिर तुझे सजदा करुँ किधर

मोजूद  है  तो  आ   तुझे  ढ़ूँढ़ूं  कहाँ  कहाँ

 .

बच्चों के इस सवाल का दोगे जवाब क्या

खो  आये  हो  बुज़ुर्गों के सारे निशाँ कहाँ

 .

मरते हुए किसानों की आँखों में झाँक कर

मैं   ढ़ूँढता  हूँ   है   मेरा  हिन्दोस्ताँ  कहाँ

 .

होने को क़त्ल बारहा पहुँचा मैं उस के घर

लेकिन  मेरा  रफ़ीक़  हुआ  महरबाँ  कहाँ

 .

रंगे   जवानी   मैं   ने  भी   देखें   बहुत  हंसी

ग़ालिब की तरह कर सका लेकिन बयाँ कहाँ

 .

दिल में न रक्खो इस को मुहब्बत की आग है

हो   जायेगी   अयाँ   ये  रहेगी   निहाँ  कहाँ

.

ईरानी   रंग,    बू-ए-अरब,    हिन्दवी   बदन

आख़िर  गज़ल  तुम्हारी  हुई  है  जवाँ  कहाँ

 .

क़दमों  के  हों  निशाँ  तो उन्हें जा के देखलूँ

लेकिन  तेरी  नज़र  के  मैं  ढ़ूँढ़ूं  निशाँ कहाँ

.

हर  आदमी का  जिस्म  यहाँ पत्थरों का है

खोली  ‘शकील’  काँच की तुमने दुकाँ कहाँ

हम ना होंगे जब महफिल में –संदीप करोसिया

 .

 

जीते जी आराम कहाँ है ।।

 मरकर भी विश्राम कहाँ है ।।

 

हमने प्यार किया हम दोषी ।।

 आपके सर इल्जाम कहाँ है ।।

.

रूके रूके हैं सारे पुर्जे ।।

 जाने चक्का जाम कहाँ है ।।

.

शहर नहीं सारी दुनिया में ।।

 हम जैसे बदनाम कहाँ है ।।

.

हमको क्यों बुलाएंगे वो ।।

 अभी हमारा नाम कहाँ है ।।

.

हम ना होंगे जब महफिल में ।।

 सब पूछेंगे श्याम कहाँ है ।।

(Courtesy:Face book Dr.Aziz Burney)

 

شرم آنکھوں میں رہے اور خطا ہوجائے…..ڈاکٹر نزہت انجم

 

جام ایسا تری آنکھوں سے عطا ہوجائے
ہوش موجود رہے اور نشہ ہوجائے

اس طرح میری طرف میرا مسیحا دیکھے
درد دل ہی میں رہے اور دوا ہوجائے

زندگانی کو ملے کوئی ہُنر ایسا بھی
سب میں موجود بھی ہو اور فنا ہوجائے

معجزہ کاش دیکھا دیں یہ نگاہیں میری
لفظ خاموش رہے، بات ادا ہوجائے

اس طرح جرم کے احساس کو بیدار کرو
جسم آزاد رہے اور سزا ہوجائے

اُس کو میں دیکھوں تو اِس طرح سے دیکھوں نزہت
شرم آنکھوں میں رہے اور خطا ہوجائے

 

शर्म आँखों में रहे और ख़ता हो जाए—– डाक्टर नुज़हत अंजुम

 

जाम ऐसा तरी आँखों से अता हो जाए
होश मौजूद रहे और नशा हो जाए

इस तरह मेरी तरफ़ मेरा मसीहा देखे
दर्द-ए-दिल ही में रहे और दवा हो जाए

ज़िंदगानी को मिले कोई हुनर ऐसा भी
सब में मौजूद भी हो और फ़ना हो जाए

मोजिज़ा काश देखा दें ये निगाहें मेरी
लफ़्ज़ ख़ामोश रहे, बात अदा हो जाए

इस तरह जुर्म के एहसास को बेदार करो
जिस्म आज़ाद रहे और सज़ा हो जाए

इस को मैं देखूं तो इस तरह से देखूं नुज़हत
शर्म आँखों में रहे और ख़ता हो जाए

سوجاتے ہے ٖفٹ پاتھ پہ اخبار بچھا کر—- منور رانا

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ہنستے ہوئے ماں باپ کی گالی نہیں کھاتے

بچے ہے تو کیو شوق سے مٹھی نہیں کھاتے

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تجھ سے نہیں ملنے کا ارادہ تو ہے لیکن

تجھ سے نہ ملیں گے یہ قسم بھیں نہی کھاتے

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سو جاتے ہے فٹ پاتھ پہ اخبار بچھا کر
مزدور کبھی نیند کی گولی نہی کھاتے

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بچے بھی غریبی کو سمجھنے لگے شاید
اب جاگ بھی جاتے ہے تو سحری نہیں کھاتے

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دعوت تو بڑی چیز ہے ہم جیسے قلندر

ہر ایک کے پیسے کی دوا بھی نہیں کھاتے

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اللہ غریبوں کا مددگار ہے ‘رانا’

ہم لوگو کے بچے کبھی سردی نہیں کھاتے

सो जाते है फुटपाथ पे अखबार बिछाकर—मुनव्वर राना

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हसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे है तो क्यो शौक से मिट्ठी नहीं खाते

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तुझ से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन

तुझसे न मिलेंगे ये कसम भीं नही खाते

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सो जाते है फुटपाथ पे अखबार बिछाकर
मजदूर कभी नींद की गोली नही खाते

.

बच्चे भी गरीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते है तो सहरी नहीं खाते

.

दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे कलंदर
हर एक के पैसे की दवा भी नहीं खाते

.

अल्लाह गरीबो का मददगार है ‘राना’
हम लोगो के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते

Posted by: Bagewafa | اپریل 29, 2017

اب بھی نہ جاگے تو۔۔۔۔ظفر آغا

 

>تمہاری راہ میں مٹی کے گھر نہیں آتے۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔وسیم بریلوی

 

تمہاری راہ میں مٹی کے گھر نہیں آتے

اسی لئے تو تمہیں ہم نظر نہیں آتے

محبتوں کے دنوں کی یہی خرابی ہے
یہ روٹھ جائیں تو پھر لوٹ کر نہیں آتے

جنہیں سلیقہ ہے تہذیب غم سمجھنے کا
انہیں کے رونے میں آنسو نظر نہیں آتے

خوشی کی آنکھ میں آنسو کی بھی جگہ رکھنا
برے زمانے کبھی پوچھ کر نہیں آتے

بساتے عشق پہ بڑھنا کسے نہیں آتا
یہ اور بات که بچنے کے گھر نہیں آتے

وسیم ذہن بناتے ہیں تو وہی اخبار
جو لیکے ایک بھی اچھی خبر نہیں آتے

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते– वसीम बरेलवी

 

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

वसीम जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

غم عاشقی تیرا شکریہ…….عرش ملسیانی

.

کبھی اس مکاں سے گزر گیا

کبھی اس مکاں سے گزر گیا

.

تیرے آستان کی تلاش میں

میں ہر آستاں سے گزر گیا

.

جسے لوگ کہتے ہیں، زندگی

وہ تو حادثوں کا ہجوم ہے

.

یہ تو کہیے میرا ہی کام تھا

کہ میں درمیاں سے گزر گیا

.

یہ تو میرا ذوق کمال ہے

مگر اس کو دیکھ میرے خدا

.

تو نے روکا مجھ کو جہاں جہاں

میں وہاں وہاں سے گزر گیا

.

کبھی تیرا در کبھی دربدر

کبھی عرش پر کبھی فرش پر

.

غم عاشقی تیرا شکریہ

میں کہاں کہاں سے گزر گیا

.

کبھی اس مکاں سے گزر گیا

کبھی اس مکاں سے گزر گیا

गमे आशिकी तेरा शुक्रिया…..अर्श मलसियानी

 .

कभी इस मकां से गुज़र गया

 कभी इस मकां से गुज़र गया

 .

 तेरे आस्तां की तलाश में

 मैं हर आस्तां से गुज़र गया

 .

 जिसे लोग कहते हैं, ज़िंदगी

 वो तो हादिसों का हुजूम है

 .

 ये तो कहीए मेरा ही काम था

 कि मैं दरमियां से गुज़र गया

 .

 ये तो मेरा ज़ौक़ कमाल है

 मगर उस को देख मेरे ख़ुदा

 तो ने रोका मुझको जहां-जहां

 मैं वहां वहां से गुज़र गया

.

 कभी तेरा दर कभी दरबदर

 कभी अर्श पर कभी फ़र्श पर

 .

 गुम-ए-आशिक़ी तेरा शुक्रिया

 मैं कहां कहां से गुज़र गया

 .

 कभी इस मकां से गुज़र गया

 कभी इस मकां से गुज़र गया

یاد آتی ہے رات بھر۔۔۔۔۔۔۔فیض احمد فیض۔۔مخدم

(Courtesy:Urdu daily..Rabta Times 8 April2017)

Azamgarh Express
6 hrs ·

गौ भक्तों की असलियत तो देखते जाए
गाये के नाम पर दोसरो को मारने वाले इसपर जवाब कौन देगा !

जिनको इंसान से प्रेम नही हो सकता वो जानवर से किया प्रेम करेंगे

 دل ہی دُکھانے کے لئے آ—-۔ احمد فراز

.

رنجش ہی سہی دل ہی دُکھانے کے لئے آ
آ پھر سے مجھے چھوڑ کے جانے کے لئے آ

.

کچھ تو مرے پندارِ محبت کا بھرم رکھ

تُو بھی تَو کبھی مجھ کو منانے کے لئے آ

.

پہلے سے مراسم نہ سہی پھر بھی کبھی تَو
رسم و رہِ دنیا ہی نبھانے کیلئے آ

.

کس کس کو بتائیں گے جدائی کا سبب ہم
تُو مجھ سے خفا ہے تَو زمانے کے لئے آ

.

اک عمر سے ہوں لذتِ گریہ سے بھی محروم
اے راحتِ جاں مجھ کو رلانے کے لئے آ

.

اب تک دلِ خوش فہم کو تجھ سے ہیں امیدیں
یہ آخری شمعیں بھی بجھانے کے لئے آ

.

مانا کہ محبت کا چھپانا ہے محبت
چپکے سے کسی روز جتانے کے لیے آ

.

جیسے تمہیں آتے ہیں نہ آنے کے بہانے

ایسے ہی کسی روز نہ جانے کے لیے آ

 

दिल ही दु:खानेके लिए आ – अहमद फ़राज

 .

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

 .

कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ

.

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

 .

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

 .

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम

ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ

 .

अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें

ये  आखरी  शमआ बुझानेके  लिए  आ

.

New Challenges Before the Indian Nation
— Abhay Kumar Dubey (Recorded) Courtesy:Ali Sorab

मौजूदा सियासी हालात और आम आदमी की राय!
Farrah Sakeb,नवेद चौधरी,Anwar Khan,Ali Zakir,Nisar Sahab,इस्माइल साहब,Shaan Gahlot,Gulzar Sahab,Asif Rn !!

ربِ کونین میرے دل کی دعائیں سُن

 

ربِ کونین میرے دل کی دعائیں سُن لے

میں ہوں بے چین میرے دل کی صدائیں سُن لے

شان اعلٰی ہے تیری مالک و مُختار ہے تُو

مجھ کو معلو م ہے دنیا کا مدد گار ہے تُو

میں ہوں محتاج مجھے علم کی دولت دے دے

اپنے انمول خزانے سے انعمت دے دے

میں ہوں کمزور مجھے دولتِ ایماں دے دے

ناتواں بندے سے بھی دین کی خدمت لے لے

جلوہءِ حق سے میرے دل کو فِروزاں کر دے

نور اسلام کا چہرے پہ نمایا ں کر دے

ربِ کونین میرے دل کی دعائیں سُن لے

میں ہوں بے چین میرے دل کی صدائیں سُن لے

میں پریشان ہوں سرمایہ ِ راحت دے دے

اپنے محبوب کی سچی محبت دے دے

جس کے صدقے میں دو عالم کو بنایا تُو نے

میرے محبوب جسے کہہ کر بلایا تُو نے

واسطہ اُس کا گناہ گار کی بخشش کر دے

اپنے اس بندہِ نادل پہ نوازش کر دے

نور اسلام کا چہرے پہ منور کر دے

آمین

रब-ए-कौनैन मेरे दिल की दुआएं सुन ले

 

 

 रब-ए-कौनैन मेरे दिल की दुआएं सुन ले

 मैं हूँ बेचैन मेरे दिल की सदाएँ सुन ले

 शान आला है तेरी मालिक-ओ-मुख़तार है तू

 मुझको मालूम है दुनिया का मददगार है तू

 मैं हूँ मुहताज मुझे इलम की दौलत दे दे

 अपने अनमोल खज़ाने से अनामत दे दे

 मैं हूँ कमज़ोर मुझे दौलत-ए-ईमां दे दे

 नातवां बंदे से भी दीन की ख़िदमत ले-ले

जिलौ हुइ हक़ से मेरे दिल को फ़रोज़ां कर दे

 नूर इस्लाम का चेहरे पे नुमायां कर दे

 रब-ए-कौनैन मेरे दिल की दुआएं सुन ले

 मैं हूँ बेचैन मेरे दिल की सदाएँ सुन ले

 मैं परेशान हूँ सरमायाॱएॱ राहत दे दे

 अपने महबूब की सच्ची मुहब्बत दे दे

 जिसके सदक़े में दो-आलम को बनाया तू ने

 मेरे महबूब जिसे कह कर बुलाया तू ने

 वास्ता उस का गुनाहगार की बख़शिश कर दे

 अपने इस बंदा-ए-ना दिल पे नवाज़िश कर दे

 नूर इस्लाम का चेहरे पे मुनव्वर कर दे

Posted by: Bagewafa | مارچ 18, 2017

बारिश, हां वही बारिश

बारिश, हां वही बारिश 

बारिश, हां वही बारिश

बारिश, हां वही बारिश, वही बारिश जो आसमान से आती थी,
बूंदों में गाती थी, पहाड़ों से फिसलती थी, नदियों में चलती थी,नहरों में मचलती थी, बारिश…
हां, हां वही बारिश, जो आजकल कहीं खो गई है, या फिर थककर सो गई है,
शायद ऐसा भी हो सकता है, बिना आंसू बादल रो सकता है
हमने भी कितने पेड़ तोड़ दिए, संसद की कुर्सियों में जोड़ दिए,
हमने कुएं बुझा दिए, नदियां सूखा दीं, विकास की ताकत से कुदरत झुका दी।
शुक्र है, अब बच्चे शर्म से नहीं मरेंगे, चुल्लू भर पानी के लिए जरूर दुआ करेंगे,
हम शेख चिल्ली नहीं, हम कहां साख पर बैठे हैं,
हम सब अपने शहरों में गांव की राख पर बैठे हैं,
शहर में आज भी पानी कम नहीं, मगर पता नहीं क्यों हमारी आंखें नम नहीं,
जवान देश की मिट्टी के लिए, किसान खेत की मिट्टी के लिए परेशान है,जाग रहा है पता नहीं शहरों की भीड़ में ,कौन किसके लिए जाग रहा है, किसके लिए भाग रहा है।
किसान की समस्या खत्म नहीं होती, पैकेज तो हर साल अस्सी है,
एक भी काम नहीं आता, छुटकारे के लिए बस, एक रस्सी है,
परेशान दोनों हैं, हम सास बहू के रिश्तों में, और किसान लोन की किश्तों में।
बैंक, बीमार, पेस्टीसाइड, दहेज, मंत्रालय, किसान कहां-कहां भटक सकता है,
इंसानों से अच्छा तो आज सूखा पेड़ है, कम से कम उससे लटक तो सकता है।
लेकिन कब तक, कब तक हाथों पर हाथ धरे बारिश का इंतजार करें?
मेंढक की शादी से दिल बहलाएं, नंदी बैल की हां में हां मिलाएं कब तक?
सुना था राजस्थाना में एक जुहरे वाला बाबा है..सहरा से पानी लेककर आया है,राजिंद्रसिंह नाम है दुनिया में छाया है..हमारी बीच भी कोई होगा न..बारिश वाला बाबा.

फिल्मों में बहुत देखे हैं, हां वही, वो आ गया है, सस्ती, सुंदर, टिकाऊ बारिशवाला,
वो फिल्मी नहीं है, हमने कहां उसे ठीक से जाना है, कोई भगवान नहीं, कोई बाबा नहीं, बस हमारा नाना है।
अब हम जान नहीं देंगे, जान लगा देंगे, बारिश को बुलाने के काम में, हमारे अपने नाम में,
उम्मीद है गांव को देख आपकी भीगी आंखें सरकार ही नहीं, भगवान को भी जगा देंगी
अगले साल सस्ती सुंदर टिकाऊ बारिश हम सबको भिगा देगी, हम सबको भिगा देगी

2-बारिश !

हां मेरे दोस्त वही बारिश.
वही बारिश जो आसमान से आती है
बूंदों मैं गाती है
पहाड़ों से फिसलती है
नदियों मैं चलती है
नहरों मैं मचलती है
कुंए पोखर से मिलती है
खप्रेलो पर गिरती है
गलियों मैं फिरती है
मोड़ पर संभालती है
फिर आगे निकलती है व
ही बारिश
ये बारिश अक्सर गीली होती है
इसे पानी भी कहते हैं उर्दू में
आप मराठी में पानी
तमिळ में कन्नी कन्नड़ में नीर
बंगला में… जोल केह्ते हैं
संस्‍कृत में जिसे वारि
नीर जीवन पै अमृत पै अम्बु भी केह्ते हैं
ग्रीक में इसे aqua pura
अंग्रेजी में इसे water फ्रें
च में औ’ और केमिस्ट्री में H2O केह्ते हैं
ये पानी आंखों से ढलता है तो आंसू कहलता है
लेकिन चेहरे पर चढ़ जाये तो रुबाब बन जाता है
हां…कोई शर्म से पानी पानी हो जाता है
और कभी कभी यह पानी सरकारी फाइलों में अपने कुंए समेत चोरी हो जाता है
पानी तो पानी है
पानी जिन्दगानी है
इसलिए जब रूह की नदी सूखी हो
और मन का हिरण प्यासा हो
दीमाग में लगी हो आग
और प्यार की घागर खाली हो
तब मैं….हमेशा ये बारिश नाम का गीला पानी लेने की राय देता हूं
मेरी मानिए तो
ये बारिश खरीदिये
सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश
सिर्फ 5 हज़ार रुपये में
इस्से कम में दे कोई तो चोर की सज़ा वो मेरी
आपकी जूती सिर पर मेरी
मेरी बारिश खरीदये
सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश

 

قیامت کبھی کبھی ۔۔۔۔۔۔ ناصر کاظمی

.

ہوتی ہے تیرے نام سے وحشت کبھی کبھی

برہم ہوئی ہے یوں بھی طبیعت کبھی کبھی

.

اے دل کسے نصیب یہ توفیقِ اضطراب

ملتی ہے زندگی میں یہ راحت کبھی کبھی

تیرے کرم سے اے اَلمِ حسن آفریں

دل بن گیا ہے دوست کی خلوت کبھی کبھی

جوشِ جنوں میں درد کی طغیانیوں کے ساتھ

اشکوں میں ڈھل گئی تری صورت کبھی کبھی

.

تیرے قریب رہ کے بھی دل مطمئن نہ تھا

گزری ہے مجھ پہ یہ بھی قیامت کبھی کبھی

.

کچھ اپنا ہوش تھا نہ تمہارا خیال تھا

یوں بھی گزر گئ شبِ فرقت کبھی کبھی

.

اے دوست ہم نے ترکِ محبّت کے باوجود

محسوس کی ہے تیری ضرورت کبھی کبھی

.

क़यामत कभी कभी —-नासिर काज़मी

 .

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

बरहम हुई है यूँ भी तबीअत कभी कभी

.

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब

मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी

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तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-आफ़रीं

दिल बन गया है दोस्त की ख़ल्वत कभी कभी

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जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़्यानियों के साथ

अश्कों में ढल गई तिरी सूरत कभी कभी

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तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था

गुज़री है मुझ पे ये कयामत  कभी कभी

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कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था

यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी कभी

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ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद

महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी

طشتری میں باپ نے پایا جواں بیٹے کا سر۔۔۔۔۔۔ شکیل قادری

 

چھین کر ہونٹوں سے پریوں کی کہانی لے گئی

مفلسی معصوم بچوں کی نشانی لے گئی

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طشتری میں باپ نے پایا جواں بیٹے کا سر

چھین کر جب بدنصیبی راجدھانی لے گئی

.

چھین لی ہے چاندنی نے تیرے چہرے کی چمک

اور گھنے بالوں کی خوشبو رات رانی لے گئی

.

گاؤں سے اس شہر میں پنہاری کل جو آئی تھی

اپنے قوزے میں وہ میری خاندانی لے گئی

.

اس کو کر دے گا بڈھاپا ہی مکمل اب ‘شکیل’

نا مکمل جو کہانی نوجوانی لے گئی

 .

 

 

 .

तश्तरी में बापने पाया जवाँ बेटे का सर…शकील क़ादरी

छीन कर होंटों से परियों की कहानी ले गई

मुफ़्लिसी मासूम बच्चों की निशानी ले गई

 .

तश्तरी में बापने पाया जवाँ बेटे का सर

छीन कर जब बदनसीबी राजधानी ले गई

 .

छीन ली है चाँदनीने तेरे चह्रे की चमक

और घने बालों की ख़ुश्बू रातरानी ले गई

.

गाँव से इस शह्र में पनिहारी कल जो आई थी

अपने क़ूज़े में वो मेरी ख़ानदानी ले गई

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उस को कर देगा बुढापा ही मुकम्मिल अब ‘शकील’

नामुकम्मिल जो कहानी नौजवानी ले गई

میرے ہاتھوں میں لکیروں کے سوا کچھ بھی نہیں۔۔۔۔۔۔راجیش ریڈی

.

.

 

زندگی تو نے لہو لے کے دیا کچھ بھی نہیں

تیرے دامن میں میرے واسطے کیا کچھ بھی نہیں

.

میرے اِن ہاتھوں کی چاہو تو تلاشی لے لو

میرے ہاتھوں میں لکیروں کے سوا کچھ بھی نہیں

 .

یا خدا اب کے یہ کس رنگ سے آئی ہے بہار

زرد ہی زرد ہے پیڑوں پہ ، ہرا کچھ بھی نہیں

.

دل بھی اک ضد پہ اڑا ہے کسی بچے کی طرح

یا تو سب کچھ ہی اِسے چاہئے یا کچھ بھی نہیں

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं—– राजेश रेड्डी

 .

.

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं|

तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं|

 .

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशि ले लो,

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं|

 .

या ख़ुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार,

ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं|

.

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,

या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं|

Syed Shahabuddin: the most misunderstood politician

 Original_syed-shahabuddin

The misunderstood leader, politician, intellectual, activist.

Syed Shahabuddin happens to be one of the most misunderstood politicians and is probably the worst victim of hostile media. Given his contribution and services to the Indian Muslims he does not deserve the ungratefulness as being so ignorantly displayed by some of us.

With a gold medal from Patna University and successful diplomatic career, had he compromised on his principles he would surely have become president or at least vice president of India and would now be living a peaceful and comfortable life earning praises from everyone, including media network.

After being nominated as a Janata Dal MP in the Rajya Sabha he articulated Muslims’ grievances, asked questions and kept an open eye on all the ills pestering Indian Muslims. Undeterred by the hostility of the media as well as his own party he kept on speaking and writing on Muslim issues and paid the price by never being able to return to the parliament. In this respect (being in a secular party and still articulating Muslims’ issues), except Maulana Hifzurrehman Saheb, he has no match in post-independent India. It was him who, in the 80s assembled Muslim MPs, from all the parties, and met the then Prime Minister Mrs Indira Gandhi to highlight the problems being faced by Muslims in India. I still remember an editorial in the Times of India headed, “Playing with fire” in which Shahabuddin Saheb was viciously vilified.

No Muslim or non-Muslim politician has written so much on Muslim issues as Shahabuddin. One of his most outstanding contributions to the Muslim community is the Muslim India, a journal of research and documentation that no research scholar working on Indian Muslims can afford to ignore.

There is not a single thing, either in his writings or speeches that would put him in the category of either a communalist or a fundamentalist. A communalist! What an absurd idea? Only because he stood to protect Muslim personal law – a right enshrined in the constitution of India he was branded so. Because in the wake of Moradabad riots, 1980, his was the most courageous speech in the parliament. Because he spoke against the Hindutva fascists. And when he demanded ban on Salman (Shaitan) Rushdi’s novel, he was even called a fundamentalist (sic).

Four years ago a friend of mine, Dr Hilal Ahmed, during his PhD at the the School of Oriental and African Studies (SOAS), London, wrote a well-researched paper, based on Shahabuddin’s editorials published in Muslim India. When he showed it to his supervisor, a leading expert on Indian politics the gentleman remarked that so far his impression of Shahabuddin Saheb was based on media reports and that was the first time he had actually read his writings. “From this he comes out to be a brilliant political thinker”, the expert told my friend.

But such is the ungrateful nature of our community that a professor from the Department of Political Science of AMU met Hilal Saheb at a seminar and himself requested him to contribute to his journal. Hilal Saheb abridged the aforementioned paper and sent it to the learned Professor. However, the Professor refused to publish the paper saying that in his view neither Shahabuddin was an intellectual nor an activist.

(courtesy: Milli Gazette)

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं —-क़तील शिफ़ाई

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गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं

हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

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बच निकलते हैं अगर आतिह-ए-सय्याद से हम

शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

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ख़ुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा

जिन को जलना हो वो आराअम से जल जाते हैं

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शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये

हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

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जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ

जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं

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रब्ता बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन

आशना जब तेरे पैग़ाम से जल जाते हैं

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گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں – قتیل شفائی

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گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں

ہم چراغوں کی طرح شام سے جل جاتے ہیں

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شمع جس آگ میں جلتی ہے نمائش کے لیے

ہم اُسی آگ میں گمنام سے جل جاتے ہیں

 .

خود نمائی تو نہیں شیوہء اربابِ وفا

جن کو جلنا ہو وہ آرام سے جل جاتے ہیں

.

بچ نکلتے ہیں اگر آتشِ سیّال سے ہم

شعلہء عارضِ گلفام سے جل جاتے ہیں

 .

جب بھی آتا ہے مرا نام ترے نام کے ساتھ

جانے کیوں لوگ مرے نام سے جل جاتے ہیں

 .

رابتہ باہم پہ ہمیں کیا نہ کہیں گے دشمن

آشنا جب تیرے پیغام سے جل جاتے ہیں

नजीब की मांकी फरियाद…….इमरान प्रतापगढी

 

 .

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,

समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली

.

मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,

तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली

.

वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे,

वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे

.

यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है,

तडप करके ये एक मॉं कह रही है

कोई पूँछता ही नहीं हाल मेरा…..!

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा

 .

उसे ले के वापस चली जाऊँगी मैं,

पलट कर कभी फिर नहीं आऊँगी मैं

.

बुढापे का मेरे सहारा वही है,

वो बिछडा तो ज़िन्दा ही मर जाऊँगी मैं

.

वो छ: दिन से है लापता ले के आये,

कोई जा के उसका पता ले के आये

 .

वही है मेरी ज़िन्दगी का कमाई,

वही तो है सदियों का आमाल मेरा

.

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा!

 .

ये चैनल के एंकर कहॉं मर गये हैं,

ये गॉंधी के बंदर कहॉं मर गये हैं

.

मेरी चीख़ और मेरी फ़रियाद कहना,

ये मोदी से इक मॉं की रूदाद कहना

 .

कहीं झूठ की शख़्सियत बह ना जाये,

ये नफ़रत की दीवार छत बह ना जाये

.

है इक मॉं के अश्कों का सैलाब साहब,

कहीं आपकी सल्तनत बह ना जाये

 .

उजड सा गया है गुलिस्तॉं वतन का

नहीं तो था भारत से ख़ुशहाल मेरा

 .

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा।

نجیب کی ماں کی فریاد۔۔۔۔عمران پرتاپ گھڑی

 

سنا تھا که بیحد سنہری ہے دہلی،

سمندر سی خاموش گہری ہے دہلی

 .

مگر ایک ماں کی صدا سن نہ پائے،

تو لگتا ہے گونگی ہے بحری ہے دہلی

 .

وہ آنکھوں میں اشکوں کا دریا سمیٹے،

وہ امید کا اک نظریہ سمیٹے

 .

یہاں کہہ رہی ہے وہاں کہہ رہی ہے،

تڑپ کرکے یہ ایک ماں کہہ رہی ہے

 .

کوئی پوچھتا ہی نہیں حال میرا…۔۔!

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا

.

اسے لے کے واپس چلی جاؤنگی میں،

پلٹ کر کبھی پھر نہیں آؤنگی میں

 .

بڈھاپے کا میرے سہارا وہی ہے،

وہ بچھڑا تو زندہ ہی مر جاؤنگی میں

 .

وہ کئ: دن سے ہے لاپتہ لے کے آئے،

کوئی جا کے اسکا پتہ لے کے آئے

 .

وہی ہے میری زندگی کا کمائی،

وہی تو ہے صدیوں کا اعمال میرا

 .

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا!

 .

یہ چینل کے اینکر کہاں مر گئے ہیں،

یہ گاندھی کے بندر کہاں مر گئے ہیں

.

میری چیخ اور میری فریاد کہنا،

یہ مودی سے اک ماں کی روداد کہنا

 .

کہیں جھوٹھ کی شخصیت بہہ نہ جائے،

یہ نفرت کی دیوار چھت بہہ نہ جائے

 .

ہے اک ماں کے اشکوں کا سیلاب صاحب،

کہیں آپکی سلطنت بہہ نہ جائے

 .

اجڑ سا گیا ہے گل ستاں وطن کا

نہیں تو تھا بھارت سے خوشحال میرا

 .

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا۔

.

تھا کتنا دل خراش اداسی کا قہقہہ۔۔۔۔۔کفیل اعظم امروہوی

۔

تنہائی کی گلی میں ہواوٴں کا شور تھا

آنکھوں میں سو رہا تھا اندھیرا تھکا ہوا

۔

سینے میں جیسے تیر سا پیوست ہو گیا

تھا کتنا دل خراش اداسی کا قہقہہ

۔

یوں بھی ہوا که شہر کی سڑکوں پہ بار ہا

ہر شخص سے میں اپنا پتہ پوچھتا پھرا

۔

برسوں سے چل رہا ہے کوئی میرے ساتھ ساتھ

ہے کون شخص اس سے میں اک بار پوچھتا

۔

دل میں اتر کے بجھ گئی یادوں کی چاندنی

آنکھوں میں انتظار کا سورج پگھل گیا

۔

چھوڑی ہے ان کی چاہ تو اب لگ رہا ہے یوں

جیسے میں اتنے روز اندھیروں میں قید تھا

۔

میں نے ذرا سی بات کہی تھی مذاق میں

تم نے ذرا سی بات کو اتنا بڑھا لیا

۔

کمرے میں پھیلتا رہا سگریٹ کا دھواں

میں بند کھڑکیوں کی طرف دیکھتا رہا

۔

‘اعظم یہ کس کی سمت بڑھے جا رہے ہیں لوگ

اس شہر میں تو میرے سوا کوئی بھی نہ تھا

۔

था कितना दिल-ख़राश उदासी का क़हक़हा—–कफील आजम अमरोहवी

तन्हाई की गली में हवाओं का शोर था

आँखों में सो रहा था अँधेरा थका हुआ

.

सीने में जैसे तीर सा पैवस्त हो गया

था कितना दिल-ख़राश उदासी का क़हक़हा

.

यूँ भी हुआ कि शहर की सड़कों पे बार-हा

हर शख़्स से मैं अपना पता पूछता फिरा

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बरसों से चल रहा है कोई मेरे साथ साथ

है कौन शख़्स उस से मैं इक बार पूछता

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दिल में उतर के बुझ गई यादों की चाँदनी

आँखों में इंतिज़ार का सूरज पिघल गया

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छोड़ी है उन की चाह तो अब लग रहा है यूँ

जैसे मैं इतने रोज़ अँधेरों में क़ैद था

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मैं ने ज़रा सी बात कही थी मज़ाक़ में

तुम ने ज़रा सी बात को इतना बढ़ा लिया

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कमरे में फैलता रहा सिगरेट का धुआँ

मैं बंद खिड़कियों की तरफ़ देखता रहा

.

‘आज़र’ ये किस की सम्त बढ़े जा रहे हैं लोग

इस शहर में तो मेरे सिवा कोई भी न था

کیفی اعظمی اچھے شاعر ،بڑے اِنسان۔۔۔۔محمد وصی اللہ حسینی

k1k2k3kaifi4(Courtesy:Daily Shahafat Urdu daily)

ہواوں کو بلایا ہے دیوں کی پیروی کرنے۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

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تحلیل ۔۔۔۔۔۔۔ اختر الایمان

میری ماں اب مٹی کے ڈھیر کے نیچے سوتی ہے

اسکے جملے، اسکی باتوں،

جب وہ زندہ تھی، کتنا برہم  کرتی تھی

میری روشن تبئی ، اسکی جہالت

ہم دونوں کے بیچ ایک دیوار تھی جیسے

‘رات کو خوشبو کا جھونکا آئے، ذکر نہ کرنا

پیروں کی سواری جاتی ہے’

‘دن میں بگولوں کی زد میں مت آنا

سائے کا اثر ہو جاتا ہے’

‘بارش پانی میں گھر سے باہر جانا تو چوکس رہنا

بجلی گر پڑتی ہے،تو پہلوٹی کا بیٹا ہے’

جب تو میرے پیٹ میں تھا، میں نے ایک سپنا دیکھا تھا

تیری عمر بڑی لمبی ہے

لوگ محبت کرکے بھی تجھ سے ڈرتے رہینگے

میری ماں اب ڈھیروں من مٹی کے نیچے سوتی ہے

سانپ سے میں بیحد خاہف ہوں

ماں کی باتوں سے گھبراکر میں نے اپنا سارا زہر اگل ڈالا ہے

لیکن جب سے سب کو معلوم ہوا ہے میرے اندر کوئی زہر نہیں ہے

اکثر لوگ مجھے احمق کہتے ہیں

तहलील ….. अख़्तर-उल-ईमान

 

मेरी माँ अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है

उसके जुमले, उसकी बातों,

जब वह ज़िंदा थी, कितना बरहम (ग़ुस्सा) करती थी

मेरी रोशन तबई (उदारता), उसकी जहालत

हम दोनों के बीच एक दीवार थी जैसे

 

‘रात को ख़ुशबू का झोंका आए, जि़क्र न करना

पीरों की सवारी जाती है’

‘दिन में बगूलों की ज़द में मत आना

साये का असर हो जाता है’

‘बारिश-पानी में घर से बाहर जाना तो चौकस रहना

बिजली गिर पड़ती है- तू पहलौटी का बेटा है’

 

जब तू मेरे पेट में था, मैंने एक सपना देखा था-

तेरी उम्र बड़ी लंबी है

लोग मोहब्बत करके भी तुझसे डरते रहेंगे

 

मेरी माँ अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है

साँप से मैं बेहद ख़ाहिफ़ हूँ

माँ की बातों से घबराकर मैंने अपना सारा ज़हर उगल डाला है

लेकिन जब से सबको मालूम हुआ है मेरे अंदर कोई ज़हर नहीं है

अक्सर लोग मुझे अहमक कहते हैं ।

اب وہ پہلی سی رفاقات نہ سہی۔۔۔۔۔۔انیس امروہوی

maslahat-anees-amrohvi

 

कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहता कि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए: मुनव्वर राना

 

munawwar-rana

इस मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इनको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए.

(मुनव्वर राणा की फेसबुक वॉल से साभार)

जब पंडित नेहरू ने मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद से यह कहा था कि हम आपको रामपुर से खड़ा कर रहे हैं. मौलाना ने पूछा कि रामपुर से क्यों? नेहरू कहने लगे क्योंकि वो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. इस पर मौलाना ने कहा कि मैं वहां से खड़ा होना पसंद नहीं करूंगा. मैं हिंदुस्तान का लीडर हूं, मुसलमानों का लीडर नहीं हूं. फिर वे गुरुदासपुर, पंजाब से लड़े और जीतकर लोकसभा में आए थे.

अब हम ये नहीं कहते कि भाजपा ने लोकसभा या विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट क्यों नहीं दिया? उन्होंने नहीं दिया या हो सकता है मांगने वाले गए ही न हों. अब अगर वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे का ख़्वाब सही में देखना चाहते थे तो ये होना चाहिए था कि पांच ऐसी सीटों से जो अल्पसंख्यकों की न हों, वहां से पांच मुसलमानों को जितवा कर सदन में पहुंचाते तो उत्तर प्रदेश में ही नहीं, पूरे मुल्क़ में उनकी इज़्ज़त बढ़ती. यह संदेश जाता कि पार्टी वाकई सबका विकास चाहती है. पार्टी की ग़लती ये नहीं है कि उसने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया. पार्टी की ग़लती ये है कि उसे कुछ ऐसे उम्मीदवार जितवाने चाहिए थे जो मुसलमान होते लेकिन मुस्लिम बहुल सीट से न लड़कर ऐसी सीट से लड़ते जहां हिंदू या दूसरी क़ौमें रहती हैं.

एक तरफ़ तो भाजपा भी कहती है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है, दूसरी तरफ़ वह मुसलमानों से दूरी बनाकर रखती है. जब मुसलमानों को आप साथ लेंगे ही नहीं तो कैसे मुसलमान आपके साथ आएंगे

मैंने साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाया तो बार-बार ये कहा था कि मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इसको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. ‘मैं दुश्मन ही सही आवाज़ दे मुझको मुहब्बत से, सलीक़े से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है.’

तो बात यह है कि भाजपा मुसलमानों का कुछ सीटों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके यह संदेश दे सकती थी कि उसके प्रति जैसा सोचा जाता है, वह वैसी नहीं है. इससे अच्छा संदेश जाता. एक पार्टी जो सत्ता में है, उसके लिए ये मुश्किल काम नहीं था. लेकिन वे योगी, साक्षी और इस तरह के लोगों को ज़ंजीर के बग़ैर खुला छोड़ देते हैं. हमने तो ये देखा है कि समाज में, घर में, आंगन में कोई भी आदमी ऐसी वैसी बात करता है तो उसे फ़ौरन डांट दिया दिया जाता है. मुहल्ले का कोई आदमी ऐसी बदतमीज़ी करता है तो सभी नाराज़ होते हैं. बजाय इसके कि ऐसे लोगों को डांट-फटकार कर बैठा दिया जाए, अचानक दो पागल क़िस्म के लीडर खड़े हो जाते हैं, बेवकूफ़ी भरे बयान देते हैं और आपकी राय ये होती है कि ये उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है. तो ऐसा व्यक्ति आपके पास क्यों है जो आपके ख़िलाफ़ राय दे रहा हो. इसका मतलब ये है कि आप ये चाहते ही हैं कि इस मुल्क़ में इत्तेहाद होने ही न पाए.

इतनी बड़ी जीत लेकर भारतीय जनता पार्टी आई थी, अगर वो चाहती तो सूरत बदल सकती थी. जब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाया तो मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाया था तो मैंने कहा कि मैं अकेले नहीं आऊंगा, और भी बड़े लोगों ने लौटाया है, उनको भी बुलाइए. मुझसे मीडिया ने पूछा कि अगर आप जाएंगे तो प्रधानमंत्री से क्या कहेंगे? हमने कहा, हम कोई बात नहीं करेंगे. हम प्रधानमंत्री का हाथ पकड़ेंगे और उनको दादरी ले जाएंगे. अख़लाक़ के घर के पास ले जाकर उनसे कहेंगे कि ‘काले कपड़े नहीं पहने है तो इतना कर ले, इक ज़रा देर को कमरे में अंधेरा कर ले.’ क्योंकि एक इंसान की मौत एक क़ौम की मौत है, एक क़ौम की मौत एक मुल्क़ की मौत है, एक मुल्क़ की मौत पूरी दुनिया की मौत है.

मैं एक शायर और एक हिंदुस्तानी की हैसियत से यही कहना चाहता हूं कि अगर ये चाहें तो सबको मुहब्बत करें और सब इनको मुहब्बत करें. लेकिन ये पूरे मुल्क़ पर हुक़ूमत करना ही नहीं चाहते. ये सिर्फ़ हिंदू पर हुक़ूमत करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हम अपने 65 बरस के तजुर्बे से कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी हुक़ूमत इतिहास के पन्नों में नक़लीपन के साथ भले रह जाए, असल में वो ज़िंदा रहती नहीं है.

जैसी राजनीति भाजपा करती है उसका अंजाम ये हो सकता है कि हिंदुस्तान उतना ही रह जाएगा जितने को काउ बेल्ट कहते हैं. ये जो पांच छह सूबे हैं, यही हिंदुस्तान कहलाएगा. जो बंगाली है उसका बंगाल हो जाएगा. जो मद्रासी है उसका मद्रास हो जाएगा. जो असमिया है उसका असम हो जाएगा, जो गुजराती है उसका गुजरात हो जाएगा. बाक़ी हिंदुस्तान उतने ही नक़्शे में रह जाएगा जितने में काउ बेल्ट है. क्योंकि अगर आप एक क़ानून पूरे मुल्क़ में नहीं चला सकते तो ये तय है कि फिर आप पूरे मुल्क़ को एक नहीं रख सकते. आप गोवा में बीफ़ खाने की पूरी इजाज़त देते हैं, लेकिन वही बीफ़ खाता हुआ आदमी मुंबई एयरपोर्ट पर उतर जाए तो उसको 5 साल की सज़ा हो जाती है. इसका मतलब गोवा अलग मुल्क़ है और मुंबई अलग मुल्क़ है!

ये तय करना पड़ेगा कि यह पूरा एक मुल्क़ है या जो जहां जैसा चाहे वैसा मुल्क़ है! हमने तो जो नक़्शा देखा है वह तो यही है कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है लेकिन ये नारे लिखवाने से काम नहीं चलता.

इस देश में फिलहाल ऐसी कोई सियासी पार्टी नहीं है जो मुसलमानों को यह भरोसा दिला सके कि यह आपका मुल्क है और आप यहां सुरक्षित हैं. हालांकि, वोट के लिए सब ऐसा कहते हैं. लेकिन अगर ऐसा है तो पूरे मुल्क़ में एक बार इस पर भी वोटिंग करा ली जाए कि मुसलमानों को यहां रखना चाहिए या नहीं. तब उन लोगों को अफ़सोस होगा जो ऐसा चाहते हैं क्योंकि 80 प्रतिशत हिंदू कहेंगे कि नहीं, ये हमारे भाई हैं, हमारे जैसे हैं, यहीं पैदा हुए हैं, यहीं रहना है, यहीं जीना-मरना है. ये यहां का चांद देखकर नमाज़ पढ़ते हैं, यहां की ज़मीन पर सज़दा करते हैं, तो ये हमारे साथ यहीं रहेंगे. लेकिन ये जो सियासी लोग हैं ये अपने फ़ायदे के लिए कभी कह देते हैं कि ठीक है, कभी कह देते हैं कि नहीं ठीक है. चुनाव आता है तो दुकानें खुल जाती हैं, वोट बिकते हैं. क्या दाढ़ी वाला, क्या टोपी वाला, चोटी वाला, सबकी ख़रीद-फ़रोख़्त होती है.

यह बहुत मौजूं सवाल है कि आज मुसलमानों में मज़बूत लीडरशिप क्यों नहीं है. मेरे ख़्याल से लीडर मांएं नहीं जनतीं, लीडर क़ौमें ख़ुद पैदा कर लेती हैं. हालात लीडर पैदा करते हैं. लीडर बनने के लिए ऐतबार ज़रूरी है, लीडर वह हो सकता है जिसपर लोग ऐतबार करें. मुसलमानों के यहां सूरत-ए-हाल ये हो गई है कि ख़रीद-फ़रोख़्त ने लीडर नहीं बनने दिया. हम आपसे चाहे जैसी बात करें लेकिन मुझे कहीं का मेंबर बना दिया जाए, मुझे लाल बत्ती दे दी जाए तो हम बिक जाते हैं. हम इतने कम दाम में बिकने लगे कि उतने कम दाम में आला ज़ात की तवायफ़ भी नहीं मिलती है. इसलिए हमारे यहां लीडर नहीं पैदा हो पाए.

हमने जब साहित्य अकादमी अवार्ड वापस किया था तब हमारी आंखों में वो इंक़लाब था, मेरे लहज़े में वो शफ़्फ़ाकी थी, मेरी आवाज़ में वो अंगारे थे कि 24 घंटे के अंदर मुझे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने मिलने को बुला लिया. लेकिन हमने मना कर दिया. हमने कहा कि अवॉर्ड लौटाने वाले और भी लोग हैं जो ज्ञान में हमसे बड़े हैं, उम्र में हमसे बड़े हैं, उन्हें भी बुलाया जाए. अगर यही लोग कुछ दिन के लिए हमारे साथ खड़े हो जाते तो इस मुल्क़ में कोई भी फ़ैसला हो सकता था.

हम चीख़ते रहते हैं कि मुल्क़ में फ़िरक़ापरस्ती का क़ानून होना चाहिए कि जो पकड़ा जाए उसे उसके शहर से एक हज़ार किलोमीटर के फ़ासले पर जेल में रखा जाए. रातों-रात ये जो सोम और बालियान जैसे लीडर पैदा हो जाते हैं, वो इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि वे जेल जाते हैं तो उन्हें छुड़ाने के लिए पचास हज़ार लोग पहुंचते हैं तो वे रातों-रात हीरो हो जाते हैं. इसी तरह कोई मुसलमान ग़ैर-मुसलमान को मार देता है तो उसके साथ दस हज़ार मुसलमान खड़े हो जाते हैं. फिर वो मुसलमानों का लीडर बन जाता है.

भगवान एक बच्चा पैदा करने के लिए एक औरत की कोख़ उधार लेता है, नौ महीने इंतज़ार करता है तब एक बच्चा पैदा होता है. हमारे मुल्क़ में एक मुसलमान रात में एक हिंदू को मार दे तो सुबह वह मुसलमानों का लीडर बन जाता है. इसी तरह हिंदू रात में मुसलमान का क़त्ल कर दे तो सुबह हिंदुओं का लीडर हो जाता है. यह इस मुल्क़ के लिए मुफ़ीद नहीं है.

मैं तो समझता हूं, जैसा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि इस देश में 25 साल के लिए सैन्य शासन लागू कर देना चाहिए. अभी जो है पूरे मुल्क़ में ख़ौफ़ का आलम रहता है. ज़रा-ज़रा सी बात पर हिंदू-मुस्लिम, जाति, धर्म और दुनिया भर के झगड़े, भ्रष्टाचार, बेईमानियां दूर करने के लिए सेना का शासन ज़रूरी है. देश को सेना के हाथ में दे देना चाहिए और ये जो हर पांच साल में चुनाव होता है, इसे भी बंद कर देना चाहिए.

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि चुनाव का कोई मतलब नहीं है. चुनाव में अगर कोई रिक्शेवाला खड़ा न हो सके, कुछ रुपये महीने पाने वाला पत्रकार न खड़ा हो सके, एक जूते गांठने वाला मोची न खड़ा हो सके तो चुनाव का कोई मतलब नहीं. यह तय होना चाहिए कि जिस आदमी की संपत्ति 25 लाख से ज़्यादा हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकता. ये जो 15-20 करोड़ की संपत्ति वाले लोग चुनाव लड़ते हैं, ये उनकी वो रक़म है जो वे काग़ज़ पर दिखाते हैं. आयकर विभाग छापा मारता है तो कहता है कि हमने नौ करोड़ पकड़े, इसका मतलब है कि वह नब्बे करोड़ का आदमी होगा. ये चुनाव और जम्हूरियत बस पैसे वालों का खेल बनकर रह गया है. हमारे ज़माने में मंत्री तक एक टूटी-फूटी जीप में चलते थे. आज तो सभासद भी करोड़ों की गाड़ी में चलता है. बंद एसी गाड़ी में चलने वाले मंत्री को मालूम ही नहीं है कि नंगे पांव चलने वालों की परेशानी क्या होती है.

मैं यह लिखना चाहता हूं कि इस मुल्क़ की आबादी 130 करोड़ है. सौ करोड़ यहां पर जानवर रहते हैं. तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा आदि की व्यवस्था है. सौ करोड़ लोग ऐसे है जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा, आवास आदि का कुछ ठीक नहीं है. ये जानवरों की तरह जी रहे हैं. आप जानवरों को भी वोटरों में शामिल कर लेते हैं. इसका मतलब आपको गिनती नहीं आती. आप जानवरों को इंसानों में शामिल कर रहे हैं या फिर इंसानों को जानवरों में शामिल कर रहे हैं.

हम तो यही चाहेंगे कि शासन कोई करे, लेकिन हमारा मुल्क़ बचा रहे. उसे नेता चलाए, सेना चलाए, औरत चलाए, मर्द चलाए, लेकिन मुल्क़ सुरक्षित होना चाहिए. हर आदमी सुरक्षित होना चाहिए. इस देश का मुसलमान कभी नहीं कहता कि हमको कोई दाढ़ी वाला प्रधानमंत्री लाकर दे दीजिए. आज़ादी के बाद जिन्ना की वजह से मुसलमान इस बात से अलर्ट हो गया कि उसका लीडर हिंदू ही है. ये जो झोलाछाप ओवैसी वगैरह हैं, ये तो वोटकटवा हैं, बकौल लालू प्रसाद यादव. ये सिर्फ़ मुसलमान का वोट काटकर किसी को जितवा देते हैं. इनको इसी बात का पैसा मिलता है. कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहता कि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए. वह तो सिर्फ़ यह चाहता है कि दंगे न हों. बिहार में मुसलमानों ने नीतीश की सरकार बनाई तो उसे विश्वास है कि वे दंगा नहीं होने देंगे. यूपी में आज मुसलमान मायावती की तरफ़ देख रहे हैं क्योंकि उनको यह पता है कि मायावती के शासन में दंगा नहीं होता.

ऐसी ही इंदिरा गांधी की हुक़ूमत थी. अगर इंदिरा गांधी को बाबरी मस्ज़िद गिरानी होती तो वे ख़ुद जहाज़ में बैठतीं और बम फिंकवा देतीं. अगर नहीं गिरानी होती तो चाहे दस हज़ार लोगों को मारना पड़ता, वे वहां किसी को दाख़िल नहीं होने देतीं. हुक़ूमतें ऐसी ही चलती हैं. आप औरंगज़ेब को गाली देते हैं लेकिन इतिहास पढ़िए तो सबसे बड़ा हिंदुस्तान तो उसी की हुक़ूमत में था. म्यांमार से नेपाल, गोवा, काबुल, कंधार, ये सब उसी की हुक़ूमत में थे. ज़ाहिर-सी बात है कि मुग़लों ने इतनी बड़ी-बड़ी हुक़ूमतें बना दी थीं तो क्यों बना दी थीं? क्योंकि उनको इस मुल्क़ से मुहब्बत हो गई थी. वरना ऐसा भी हो सकता था कि वे हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा रखते लेकिन अपना हेडक्वार्टर क़ाबुल में बना लेते. लेकिन वे हिंदुस्तान आए और इसी मिट्टी में दफ़्न हो गए.

हम कहते हैं कि हिंदुस्तान का जो आदमी यह दावा करता है कि हम बहुत बड़े राष्ट्रवादी हैं वह जहां जी चाहे हमसे बैठकर बात कर ले. इंशाअल्लाह, वह राष्ट्रद्रोही निकलेगा, राष्ट्रवादी हमीं निकलेंगे. आप कहते हैं कि भारत माता की जय, अरे साहब हम तो दिन में 94 बार नमाज़ पढ़कर इस मिट्टी पर सज़दा करते हैं और इस मिट्टी को चूमते हैं. क्या इतनी बार इस मिट्टी को आप भी चूमते हैं? जिस दिन आप सौ बार चूमने लगें तब कहिएगा कि आप हमसे बड़े हिंदुस्तानी हैं. जब बंटवारा हुआ, हमारे पुरखों ने कहा कि हम पाकिस्तान नहीं जाएंगे. यह हमारी सरज़मीं है, हम अपने पुरखों की क़ब्र के पास बैठे रहेंगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएंगे.

अब आज हालत यह है कि कोई झूठा मसला होता है बस अख़बार में छप जाता है कि फलां आदमी आतंकवादी है, इसके तार वहां से हैं, इसको इतना पैसा आया है. उसे पकड़ कर बंद कर देते हैं. सब मान लेते हैं कि वह आतंकवादी है. इस देश की दशा इतनी ख़राब है कि अगर आज पुलिस मुझे पकड़ ले कि यह आतंकवादी है तो लोग मान लेंगे कि हां यह आतंकवादी होगा. जब 12 बरस बाद हमको छोड़ा जाएगा तब तक हम अपने पांव पर चलने लायक नहीं बचेंगे. ऐसा सैकड़ों नौजवानों के साथ हो चुका है. क़ानून यह होना चाहिए कि जब आप किसी को 12 बरस या 20 बरस बाद बेक़सूर कहकर छोड़ रहे हैं तो उसे 50 करोड़ का हर्ज़ाना भी देना चाहिए.

पुलिस एक 18 बरस के लड़के को पकड़ती है, फिर उसे 20 साल बाद बूढ़ा करके छोड़ देती है कि यह निर्दोष है. तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है. जब यहां ऐसा क़ानून चलता है तो यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना हो गया. अगर इस तहख़ाने को हम ठीक नहीं करेंगे तो यह सबके लिए नुकसान करेगा.

यहां पर किसी भी मुसलमान को कह देते हैं कि पाकिस्तानी है. अरे आप अरबी कह दीजिए तो हम मान भी लें कि हां, अरब से आए थे. पैदल चल के आए थे. पाकिस्तान से हमारा क्या लेना देना? पाकिस्तान तो जितना हमारा है, उतना ही आपका है. वह तो हिंदुस्तान का हिस्सा था. हमें आप पाकिस्तानी क्यों कहेंगे? अगर हम पाकिस्तानी हैं तो आप पहले पाकिस्तानी हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है. हम तो इस मुल्क़ को मादरे-वतन कहते ही हैं. हमारा मुल्क़ तो ये है ही, हमारी मां भी यही है. यह मां का वतन है और मुसलमान इस मुल्क़ से बेपनाह मोहब्बत करते हैं.

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

 

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اُردو ہے میرا نام ۔۔۔۔۔۔ اقبال اشعر

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اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی
میں ’میر‘ کی ہمراز ہوں، ’غالب‘ کی سہیلی

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دکّن کے ’ولی‘ نے مجھے گودی میں کھلایا
’سودا‘ کے قصیدوں نے میرا حسن بڑھایا

ہے ’میر‘ کی عظمت کہ مجھے چلنا سکھایا
میں ’داغ‘ کے آنگن میں کھلی بن کے چمیلی

اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی

غالب‘ نے بلندی کا سفر مجھ کو سکھایا

حالی‘ نے مروت کا سبق یاد دلایا
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اقبال‘ نے آئینۂ حق مجھ کو دکھایا
’مومن‘ نے سجائی میرے خوابوں کی حویلی

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اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی

ہے ’ذوق‘ کی عظمت کہ دیئے مجھ کو سہارے

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چکبست‘ کی الفت نے میرے خواب سنوارے
’فانی‘ نے سجائے میری پلکوں پہ ستارے
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اکبر‘ نے رچائی میری بے رنگ ہتھیلی
اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی

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کیوں مجھ کو بناتے ہو تعصب کا نشانہ
میں نے تو کبھی خود کو مسلماں نہیں مانا

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دیکھا تھا کبھی میں نے بھی خوشیوں کا زمانہ

اپنے ہی وطن میں ہوں مگر آج اکیلی

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اردو ہے میرا نام میں ’خسرو ‘ کی پہیلی

 

उर्दू है मेरा नाम……इकबल अशअर

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उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली…
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो की पहेली

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मैं मीर की हमराज हूँ ,ग़ालिब की सहेली
दक्कन की वली ने मुझे गोदी में खिलाया

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सौदा के क़सीदो ने मेरा हुस्न बढ़ाया
है मीर की अज़मत कि मुझे चलना सिखाया

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मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली

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ग़ालिब ने बुलंदी का सफर मुझको सिखाया
हाली ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया

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इक़बाल ने आइना-ए-हक़ मुझको दिखाया
मोमिन ने सजाई मेरी ख्वाबो की हवेली॥

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उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली॥॥
है ज़ौक़ की अजमत कि दिए मुझको सहारे

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चकबस्त की उल्फत ने मेरे ख़्वाब संवारे
फानी ने सजाये मेरी पलकों पे सितारे

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अकबर ने रचाई मेरी बेरंग हथेली
उर्दू है मेरा नाम ..

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क्यों मुझको बनाते हो तास्सुब का निशाना
मैंने तो कभी खुद को मुसलमाँ नही माना

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देखा था कभी मैंने खुशियों का ज़माना
अपने ही वतन में हूँ आज अकेली

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उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली…

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Posted by: Bagewafa | فروری 12, 2017

بول محبت بول۔۔۔۔۔۔صالح اچھا

یہاں ہر بات اپنے رنگ میں سمجھائ جاتی ہے۔۔صالھ اچھا

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غنیم سے بھی عداوت میں حد نہیں مانگی۔۔۔۔۔۔۔ احمد فراز

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غنیم سے بھی عداوت میں حد نہیں مانگی

کہ ہار مان لی لیکن مدد نہیں مانگی

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ہزار شکر کہ ہم اہل حرف زندہ نے

مجاوران ادب سے سند نہیں مانگی

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بہت ہے لمحۂ موجود کا شرف بھی مجھے

سو اپنے فن سے بقائے ابد نہیں مانگی

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قبول وہ جسے کرتا وہ التجا نہیں کی

دعا جو وہ نہ کرے مسترد نہیں مانگی

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میں اپنے جامۂ صد چاک سے بہت خوش ہوں

کبھی عبا و قبائے خرد نہیں مانگی

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شہید جسم سلامت اٹھائے جاتے ہیں

جبھی تو گور کنوں سے لحد نہیں مانگی

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میں سر برہنہ رہا پھر بھی سر کشیدہ رہا

کبھی کلاہ سے توقیر قد نہیں مانگی

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عطائے درد میں وہ بھی نہیں تھا دل کا غریب

فرازؔ میں نے بھی بخشش میں حد نہیں مانگی

गनीम से भी अदावत में हद नहीं माँगी —- अहमद फ़राज़

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गनीम से भी अदावत में हद नहीं माँगी

कि हार मान ली, लेकिन मदद नहीं माँगी

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हजार शुक्र कि हम अहले-हर्फ़-जिन्दा ने

मुजाविराने-अदब से सनद नहीं माँगी

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बहुत है लम्हा-ए-मौजूद का शरफ़ भी मुझे

सो अपने फ़न से बकाये-अबद नहीं माँगी

क़बूल वो जिसे करता वो इल्तिजा नहीं की

दुआ जो वो न करे मुस्तरद, नहीं माँगी

मैं अपने जाम-ए-सद-चाक से बहुत खुश हूँ

कभी अबा-ओ-क़बा-ए-ख़िरद नहीं माँगी

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शहीद जिस्म सलामत उठाये जाते हैं

तभी तो गोरकनों से लहद नहीं माँगी

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मैं सर-बरहना रहा फिर भी सर कशीदा रहा

कभी कुलाह से तौक़ीद-ए- सर नहीं माँगी

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अता-ए-दर्द में वो भी नहीं था दिल का ग़रीब

`फ़राज’ मैंने भी बख़्शिश में हद नहीं माँगी

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औरंगजेब यदि किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहते तो इसके लिए शिवाजी का पोता शाहू जी सब से आसान शिकार था!….. मोहम्मद आरिफ दगिया

 

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” जो है नाम वाला , वही तो बदनाम है “-ये अल्फाज़ मुग़ल बादशाह औरंगजेब के ऊपर सबसे ज्यादा फिट बैठते हैं . जिस शख्स की कभी ” तहज्जुद ” की नमाज़ क़ज़ा नहीं होती थी …..जिसके शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों की संख्या सभी मुग़ल बादशाहों की तुलना में सबसे ज्यादा थी …. जिसने कट्टर मुसलमान होते हुए भी कई मंदिरों के लिए दान और जागीरें दीं…. जिसने शिवाजी को क़ैद में रखने के बावजूद मौत के घाट नहीं उतारा , जबकि ऐसा करना उनके लिए मुश्किल नहीं था …. जो खुद को हुकूमत के खजाने का सिर्फ ” चौकीदार ” 16426293_834414706696254_1747179301452394796_n (1)11403437_488205441330315_1600211412164008075_nसमझता था ( मगर वह आजकल के चौकीदारों की तरह नहीं था ) और अपनी जीविकोपार्जन के लिए वह टोपियाँ सिलता और कुरान शरीफ के अनुवाद करता था ///. औरंगजेब ऐसा बादशाह है जिसके साथ इतिहास और तास्सुबी इतिहास कारों ने कभी न्याय नहीं किया . एक ऐसा बादशाह , जिसे भारतीय इतिहास में सब से ज्यादा बदनाम किया गया है ;मगर जो अपने खानदान के तमाम बादशाहों में सबसे ज्यादा मुत्तकी , परहेज़गार ,इंसाफपसंद , खुदा से डरने वाला , हलाल रिजक खाने वाला और तहज्जुदगूज़ार बन्दा था /

उस बादशाह का नाम है -औरंगजेब ( रहमतुल्लाह अलैह ),जिनका मजारे पाक औरंगाबाद ( महाराष्ट्र ) में है ///

….क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हिन्दू धर्म के सिद्धांतों ,कर्मकांडों का यथाविधि पालन करने वाले व्यक्ति को ” समर्पित हिन्दू ” कहा जाता है , कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों पर मजबूती से चलने वाले इंसान को ” समर्पित कामरेड ” कहा जाता है ,बुद्ध के आदर्शों पर चलने वाले भंते जी या बौद्ध को ” समर्पित बौद्ध ” कहा जाता है ……मगर इस्लाम के सिद्धांतों पर चलने वाले आदमी को ” समर्पित मुसलमान ” नहीं कहा जाता , बल्कि उसे ” कट्टर मुसलमान ” की उपाधि दी जाती है ???इसी भेदभाव का शिकार औरंगजेब जैसे बादशाह को भी होना पड़ा और आज तक उनके साथ ये लक़ब जुड़ा है कि वह एक कट्टर मुसलमान था ,जो एक मन जनेऊ प्रतिदिन उतरवा कर ही खाना खाता था .जबकी इस बात के खंडन के लिए अँगरेज़ इतिहासकार प्रोफेसर अर्नाल्ड ने अपनी किताब ” प्रीचिंग ऑफ़ इस्लाम ” में लिखा है -“औरंगजेब के दौर के इतिहास में जहाँ तक मैंने तफ्तीश और पड़ताल की है ,मुझको पता चला है कि कहीं भी , किसी भी हिन्दू को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाए जाने का कोई प्रमाण नहीं है .”

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मुंशी इश्वरी प्रसाद अपनी मशहूर किताब ” तारीखे हिन्द ” में लिखते हैं–” परमात्मा की शान है कि औरंगजेब जितना रिआया का खैर ख्वाह था , इतिहास में उसे उतना ही ज्यादा बदनाम किया गया है . कोई उसे ज़ालिम कहता है , कोई खुनी , मगर हकीक़त में वह ” आलमगीर ” का ही लकब पाने का अधिकारी है .”

भारत में मुसलमानों की हुकुमत करीब 600 साल तक रही . दिल्ली मुसलमानों की राजधानी थी. वहां हर तरह की ताकत मुसलमानों के हाथ में थी. अगर मुस्लिम बादशाह हिन्दुओं को तलवार केबल पर मुसलमान बनाना चाहते तो वे सबसे पहले दिल्ली और आसपास के हिदुओ को ही मुसलमान बनाते , क्युकी ऐसा करने से उनकी हुकुमत को भी एक तरह से सुरक्षा मिल जाती क्युकी आसपास कोई दुश्मन आबादी ही नहीं रह जाती जो हुकुमत के खिलाफ विद्रोह कर सके . मगर यह एक आश्चर्यजनक तथ्य हमें नज़र आता है कि दिल्ली और उसके आसपास 50 मील की आबादी हमेशा बहुसंख्यक हिन्दुओं की ही रही और वे भी खुशहाल और इज्ज़त के साथ रहते आये थे . यह बात पंडित सुन्दर लाला शर्मा ने ” गाँधी की क़ुरबानी से सबक ” नामक लेख में व्यक्त किया है ///

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औरंगजेब यदि किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहते तो इसके लिए उनके सबसे बड़े दुश्मन शिवाजी का पोता शाहू जी सब से आसान शिकार था जो 7 साल की उम्र में क़ैद हो कर आया था .मगर औरंगजेब ने शाहू जी की परवरिश एक मराठा राजकुमार की तरह की और कभी भी उनके धर्मांतरण का कोई प्रयास नहीं किया .बल्कि उन्होंने खुद व्यक्तिगत रूचि ले कर शाहू जी की शादी बहादुर जी मराठा की बेटी के साथ धूमधाम से की, जैसे कोई बाप अपने बेटे की शादी कराता है .///

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नीचे की पंक्तियों में मैं औरंगजेब के वे तारीखी शब्द उद्धृत कर रहा हूँ ,जो उनके ऊपर लगे कट्टरता और धर्मान्तरण के आरोपों को पूरी तरह गलत साबित करते हैं और औरंगजेब की एक ऐसी छवि प्रस्तुत करते हैं , जिसे इतिहास लिखने वाले अपराधियों ने हमेशा दुनिया वालों से छुपाने का गुनाह किया है —

“संभाजी के इस बेटे शाहू जी की शिक्षा -दीक्षा का प्रबंध किया जाये .इसके लिए दक्षिण से अच्छे पंडित बुलावा लिए जाएँ .उनकी शिक्षा -दीक्षा मराठा रीती-रिवाजों के अनुसार की जाए …….और हाँ , शिवाजी की बेगम हमारी क़ैद में हैं .वे चाहें तो दक्षिण से अपने ख़ास दास-दासियों को अपने पास बुलावा सकती है जो एक राजा की बीवी के साथ रहा करते हैं .उनको यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वे एक मुसलमान की क़ैद में हैं .”

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आगे औरंगज़ेब ( रहमतुल्लाह अलैह ) कहते हैं —

“शिवाजी ने हमसे ताजिंदगी दुश्मनी निभाई , शायद यही अल्लाह की मर्ज़ी थी , मगर उनके बाद उनकी बेगमों और बच्चों को यह एहसास नहीं होना चाहिए की हम उनसे भी दुश्मनी रखते हैं . यह बात सारी दुनिया को बता दी जाये कि हमारी दुश्मनी भी सिर्फ शिवाजी से थी , मगर उनके बाद उनकी बेगमों और बच्चों से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है ” ///

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इसके बाद भी अगर कोई व्यक्ति या संगठन औरंगजेब को धार्मिक रूप से कट्टर और धर्मान्तरण का जुनूनी कहता है यही कहा जा सकता है कि वह पूर्वाग्रह से युक्त है ……और मैं सोचता हूँ कि शक की तरह पूर्वाग्रह भी एक ऐसा मर्ज़ है , जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास नहीं रहा होगा . किसी सड़क पर से औरंगजेब के नाम की तख्ती को हटा लेने से इतिहास में उनके नाम की तख्ती पर पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कलम जब निष्पक्ष हो कर इस देश का इतिहास लिखेगी तो वह लिखेगी कि औरंगजेब कट्टर नहीं था बल्कि जिन्होंने उनके नाम की तख्ती को हटाने का काम किया है , वे सबसे बड़े कट्टर , धर्मांध , असहिष्णु और पूर्वाग्रही प्राणी थे ///

(मोहम्मद आरिफ दगिया )( https://www.muslimissues.com)

دل بہلتا نہیں_ مُحمّد علی وفا

 

خوابوں کی بارات سے دِل بہلتا نہیں

خُوشیوں کی خیرات سے دِل بہلتا نہیں

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برسے نہیں تُم برسنے کے زمانے میں

بے موسمی برسات سے دِل بہلتا نہیں

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آئیں ہیں تو کُچھ کہو کے دِل تڑپ اٹھے

یہ بے تُکے اِرشاد سے دِل بہلتا نہیں

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دِل کی گھٹن بڑھ گئ دیِدارسے تیرے

بے رُخی سی رات سے دِل بہلتا نہیں

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شورو شرابا بن گئ   تیری کہا نی بھی

اب کسی بھی بات سے دل بہلتا نہیں

दिल बहलता नहि_मुहम्मदअली वफा 

 

ख्वाबोंकी बारात से दिल बहलता नहि

खूशियोंकी खैरात से दिल बहलता नहि

 

 

बरसे नहि   तुम  तो बरसने के जमाने में

बे मौसमी बरसात से दिल .बहलता नहि

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आयें है तो कुछ कहो  के दिल तडप उठे

बे तूके  ईरशाद से दिल बहलता नहि

 .

 

दिलकी घुंटन बढ गई दिदारसे तेरे

बे रूखीसी रात से दिल बहलता नहि

 

शोरो शराबा बना गई  तेरी कहानी भी

अब कीसीभी बात से दिल बहलता नहि

.میخانے سے شراب_محمدعلی وفا

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کون لا کر دے ہمیں اسکا بھی کچھ جواب

ساقی اٹھا کے لے گیا میخانے سے شراب

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انکی نظر نے اور بھی رسوا کیا ہمیں

ورنہ فرست تھی کہاں کے دیکھتے شباب

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کھو گئے تھے ہم کبھی غبارے خواب میں

واللہ پوچھیے نہی ان راتوں کا حساب

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شرما کے چاند چاندنی بستر لپٹ گئے

اٹھ گیا علل صبح سرج کا جب نقاب

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خوشبو کہاں سے بھر گئی سانس میں یہ میرے

برسو ہوئے ہم نے تو دیکھا نہیں گلاب

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ظلمت کدے میں جب گئے صحرا بھی لے گئے

اور چاندنی نے رات بھر اتارا نہیں حجاب

 

मौखाने से शराब._मुहम्मद अली वफा

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कौन ला कर दे हमें उसका भी कुछ जवाब

साकी उठाके ले गया मौखाने से शराब

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उनकी नजर ने और भी रुस्वा किया हमें

वरना फुरसत थी  किसे कि देखते शबाब

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खो गये थे हम कभी गुबारे खवाब में

वल्लाह पूछिये नही उन रातोंका हिसाब

 .

शरमाके चांद चांदनी बिस्तर लिपट गये

उठ गया अलल सबह सुरजका जब निकाब

खूश्बु कहां से भर गई अब सांसो मे  मेरे

बरसो हुए हमने तो دदेखा नहीं गुलाब

 .

जुलमत कदे में हम जो गये सहरा भी ले गये

और चांदनी ने रात भर उतारा नहीं हिजाब

مکتبوں میں کہیں رعنائی افکار بھی ہے۔۔۔۔ علامہ اقبال

 

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مکتبوں میں کہیں رعنائی افکار بھی ہے

خانقاہوں میں کہیں لذت اسرار بھی ہے

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منزل رہ رواں دور بھی دشوار بھی ہے

کوئی اس قافلہ میں قافلہ سالار بھی ہے

 .

بڑھ کے خیبر سے ہے یہ معرکۂ دین و وطن

اس زمانے میں کوئی حیدر کرار بھی ہے

 .

علم کی حد سے پرے بندۂ مومن کے لیے

لذت شوق بھی ہے نعمت دیدار بھی ہے

 .

پیر مے خانہ یہ کہتا ہے کہ ایوان فرنگ

سست بنیاد بھی ہے آئینہ دیوار بھی ہے

मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है …. अल्लामा इक़बाल

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मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है

ख़ानक़ाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है

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मंज़िल-ए-रह-रवाँ दूर भी दुश्वार भी है

कोई इस क़ाफ़िले में क़ाफ़िला-सालार भी है

 .

बढ़ के ख़ैबर से है ये मारका-ए-दीन-ओ-वतन

इस ज़माने में कोई हैदर-ए-कर्रार भी है

 .

इल्म की हद से परे बंदा-ए-मोमिन के लिए

लज़्ज़त-ए-शौक़ भी है नेमत-ए-दीदार भी है

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पीर-ए-मै-ख़ाना ये कहता है के ऐवान-ए-फ़रंग

सुस्त-बुनियाद भी है आईना-दीवार भी है

اذانوں میں دلکشی نہ رہے…آغا شورش کاشمیری

فضا میں رنگ، ستاروں میں روشنی نہ رہے

ہمارے بعد یہ،  ممکن ہے زندگی نہ رہے

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خیالِ خاطرِ احباب واہمہ ٹھہرے

اِس انجمن میں کہیں رسمِ دوستی نہ رہے

 .

فقیہہ شہر کلامِ خُدا کا تاجر ہو

خطیبِ شہر کو قرآں سے آگہی نہ رہے

 .

قبائے صُوفی و مُلّا کا نرْخ سستا ہو

بِلال چُپ ہو، اذانوں میں دلکشی نہ رہے

 .

نوادراتِ قلم پر ہو مُحْتسب کی نظر

مُحیط ہو شبِ تاریک، روشنی نہ رہے

 .

اِس انجمن میں عزیزو! یہ عین ممکن ہے

ہمارے بعد چراغوں میں روشنی نہ رہے

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अजानों में दिल-कशी न रहे….. आग़ा शोरिश काश्मीरी

 

 

फ़िज़ा में रंग, सितारों में रोशनी न रहे

हमारे बाद ये, मुम्किन है ज़िंदगी न रहे

 .

ख़्याल-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब वाहिमा ठहरे

इस अंजुमन में कहीं रस्म-ए-दोस्ती न रहे

 

फ़क़ीहे शहर कलाम-ए-ख़ुदा का ताजिर हो

ख़तीब-ए-शहर को क़ुरआँ से आगही न रहे

 .

क़बाए सूओफ़ी-ओ-मुल्ला का नर॒ख़ सस्ता हो

बिलाल चुप हो, अजानों में दिल-कशी न रहे

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नवादरात-ए-क़लम पर हो मुह॒तसिब की नज़र

मुहीत हो शब-ए-तारीक, रोशनी न रहे

.

इस अंजुमन में अज़ीज़ो! ये ऐन-मुमकिन है

हमारे बाद चराग़ों में रोशनी न रहे

جو چل سکو تو کوئی ایسی چال چل جانا —— احمد فراز

 

جو چل سکو تو کوئی ایسی چال چل جانا

مجھے گماں بھی نہ ہو اور تم بدل جانا

 .

یہ شول گی ہو بدن کی تو کیا کیا جائے

سو لازمی ہے تیرے پیرہن کا جل جانا

 .

تمھیں کرو کوئی درماں یہ وقت آ پہنچا

کہ اب تو چارا گروں کا بھی ہاتھ مل جانا

ابھی ابھی جو جدائی کی شام آئی تھی

ہمیں عجیب لگا زندگی کا ڈھل جانا

 .

سجی سجائی ہوئی موت زندگی تو نہیں

مورخوں نے مقابر کو بھی محل جانا

 .

یہ کیا کہ تو بھی اسی ساعت جوال میں ہے

کہ جس طرح ہے سبھی سور جوں کو ڈھل جانا

 .

ہر اک عشق کے بعد اور اسکے عشق کے بعد

فراز اتنا آساں بھی نہ تھا سنبھل جانا

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना —— अहमद फ़राज़

 

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना

मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना

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ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये

सो लाजमी है तेरे पैरहन का जल जाना

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तुम्हीं करो कोई दरमाँ, ये वक्त आ पहुँचा

कि अब तो चारागरों का भी हाथ मल जाना

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अभी अभी जो जुदाई की शाम आई थी

हमें अजीब लगा ज़िन्दगी का ढल जाना

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सजी सजाई हुई मौत ज़िन्दगी तो नहीं

मुअर्रिखों ने मकाबिर को भी महल जाना

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ये क्या कि तू भी इसी साअते-जवाल में है

कि जिस तरह है सभी सूरजों को ढल जाना

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हर इक इश्क के बाद और उसके इश्क के बाद

फ़राज़ इतना आसाँ भी ना था संभल जाना


شوق ہے اسکو خود نمائی کا …۔ داغ دہلوی

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شوق ہے اسکو خود نمائی کا

اب خدا حافظ اس خدائی کا

 .

وصل پیغام ہے جدائی کا

موت انجام آشنائی کا

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دے دیا رنج اک خدائی کا

ستیا ناش ہو جدائی کا

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کسی بندے کو دردے عشق نہ دے

واسطہ اپنی کبریائی کا

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صلح کے بعد وہ مزا نہ رہا

روز سامان تھا لڑائی کا

 .

اپنے ہوتے عدو پہ آنے دیں

کیوں الزام بیوفائی کا

 .

اشک آنکھوں میں داغ ہے دل میں

یہ نتیجہ ہے آشنائی کا

 .

ہنسی آتی ہے اپنے رونے پہ

اور رونا ہے جگ ہنسائی کا

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اڑ گئے ہوش دام میں پھنس کر

قید کیا نام ہے رہائی کا


शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का …. दाग़ देहलवी

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शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का

अब ख़ुदा हाफ़िज़, इस ख़ुदाई का

 .

वस्ल पैग़ाम है जुदाई का

मौत अंजाम आशनाई का

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दे दिया रंज इक ख़ुदाई का

सत्यानाश हो जुदाई का

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किसी बन्दे को दर्दे-इश्क़ न दे

वास्ता अपनी क़िब्रियाई का

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सुलह के बाद वो मज़ा न रहा

रोज़ सामान था लड़ाई का

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अपने होते अदू पे आने दें

क्यों इल्ज़ाम बेवफ़ाई का

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अश्क़ आँखों में दाग़ है दिल में

ये नतीजा है आशनाई का

 .

हँसी आती है अपने रोने पे

और रोना है जग हँसाई का

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उड़ गये होश दाम में फँस कर

क़ैद क्या नाम है रिहाई का

وطن کو خون دے دیا_ محمد علی وفا

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انفعال جو مانگا وطن کو خوں دے دیا
پھر بھی ہماری قدر کے دئیے نہی جلے

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عبدالحمید اشفاق اللہ بھی مٹے

آزاد ،مدنی،شیخ کو تو کون جانتا

.

محمد علی جوہر بھی یاد نہ آئے

آزادی یا موت کا فتویٰ دیا ہمیں

.

بخاری عطاء اللہ بھی میٹے زمین سے

کون پچھتا حسرت موہانی کے نام کو

.

انصاری، خاں،کچلو بھی ندارد

فخرالدین,ذاکرکو تو کون جانتا

.

قدوائ کے احساں بھی بھول گئے تم

کرنل آزاد ہند کبھی یاد نہ آیا

,

شکوہ نہیں دل کے پھپولے ہیں یہ ‘وفا’

آزادی اے ملک کا قصہ ہے یہ فا

..

.کچھ بھی ہو وطن اپنا ہے آن دے دینگے،
بھارت کی حفاظت کے لئے جان دے دینگے۔

انفال=پسینہ مدنی=مولانا حسین احمد مدنی(دیوبند)ریشمی رومال کی تحریک میں شیخ الہند مولانا محمود الحسن کے ساتھی مالٹا(یورپ) میں ڈھائی سال سے زیادہ جیل کی سؤ بت برداست کی
شیخ= شیخ الہند مولانا محمود الحسن (ریشمی رومال تحریک کے روحِ رواں)
ریشمی رومال کی تحریک= بھارت کی آزادی کے لئے شیخ الہند مولانا محمود الحسن ، مولنا حسین احمد مدنی(دیوبند)انکے جان نثار ساتھییوںکی کی ایک اہم تحریک
کرنل=کرنل شہ نواز( آز
اد ہند فوج ،نیتاجی سبھاش چندر بوجھ کے با وفا ساتھی،نہرو کی کیبینیٹ میں وزیر بھی بنے تھے)

वतनको खून दे दिया_ मोहंमदअली ‘वफा’

ईंफाल जो मांगा वतनको खून दे दिया,
फिर भी हमारी कद्र के दिये नही जले.

अब्दुल हमीद, अशफाकुल्लाह भी मिटे,
आझाद, मदनी,शेखको तो कौन जानता

मुहम्मदअली जौहर भी याद न आये,
आझादी या मौत का फतवा दिया हमें.

बुखारी, अताउल्लाह भी मीटे जमीन से,
कौन पूछता हसरत मोहानी के नाम को.

अंसारी,अजमलखां,किचलु भी नदारद,
झाकिर,फखरुद्दीन, को तो कौन जानता.

किडवाईके अहसां भी भूल गये तुम,
कर्नल आझाद हिन्द कभी याद न आया.

शिकवा नहीं दिलके फफोले है ये ‘वफा’
आझादी ए मुल्कका किस्सा है ये वफा.

कुछ्भी हो वतन अपना है ,आन दे देंगे,
भारत की हिफाजत के लिये जान दे देंगे.

ईंफाल=पसीना मदनी=मौलान हुसेन अहमद मदनी(देवबंद)रेशमी रूमालकी तहरीक में शेखुल हिन्द महमदुलहसन के साथे माल्टा(युरोप) में ढाई साला से ज्यादा जेल की सउबत बरदास्त की.
शेख= शेखुल हिन्द महमदुलहसन (रेशमी रूमाल तहरीक के रुहे रवां)
रेशमी रूमाल की तहरीक= भारत की आझादी के लिये शेखुल हिन्द महमदुलहसन, मौलान हुसेन अहमद मदनी(देवबंद)उनके जानींसार साथीओ की एक अहम तेहरीक..
कर्नल=कर्नल शहनवाझ( आझाद हिन्द फौज ,नेताजी सुभाष चन्द्र बोझ के बा वफा साथी,नहेरु की केबीनेट में मंत्री भी बने थे)

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Posted by: Bagewafa | جنوری 25, 2017

Happy republic day 26 Jan.2017

happy-rep-17

 تمام عمر چلا ہوں مگر چلا نہ گیا – نقش لایلپری

 

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تمام عمر چلا ہوں مگر چلا نہ گیا
تیری گلی کی طرف کوئی راستہ نہ گیا
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تیرے خیال نے پہنا شفق کا پیراہن
میری نگاہ سے رنگوں کا سلسلہ نہ گیا
۔
بڑا عجیب ہے افسانۂ محبت بھی
زباں سے کیا یہ نگاہوں سے بھی کہا نہ گیا
۔
ابھر رہے ہیں فزاؤں میں صبح کے آثار
یہ اور بات میرے دل کا ڈوبنا نہ گیا
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کھلے دریچوں سے آیا نہ ایک جھونکا بھی
گھٹن بڑھی تو ہواوٴں سے دوستانہ گیا
۔
کسی کے ہجر سے آگے بڑھی نہ عمر میری
وہ رات بیت گئی ‘نقش’ رت جگا نہ گی گیا

तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया – नक़्श लायलपुरी

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तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया

तेरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया

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तेरे ख़याल ने पहना शफ़क का पैराहन

मेरी निगाह से रंगों का सिलसिला न गया

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बड़ा अजीब है अफ़साना-ए-मुहब्बत भी

ज़बाँ से क्या ये निगाहों से भी कहा न गया

 .

उभर रहे हैं फ़ज़ाओं में सुब्ह के आसार

ये और बात मेरे दिल का डूबना न गया

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खुले दरीचों से आया न एक झोंका भी

घुटन बढ़ी तो हवाओं से दोस्ताना गया

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किसी के हिज्र से आगे बढ़ी न उम्र मेरी

वो रात बीत गई ‘नक्श़’ रतजगा न गया

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