گھر بسا کر بھی مسافر کے مسافر ٹھہرے …۔قیصر الجعفری

 

گھر بسا کر بھی مسافر کے مسافر ٹھہرے

لوگ دروازوں سے نکلے کے مہاجر ٹھہرے

دل کے مدفن پہ نہیں کوئی بھی رونے والا

اپنی درگاہ کے ہم خود ہی مجاور ٹھہرے

اس بیاباں کی نگاہوں میں مروت نہ رہی

کون جانے کے کوئی شرط سفر پھر ٹھہرے

پتیاں ٹوٹ کے پتھر کی طرح لگتی ہیں

ان درختوں کے تلے کون مسافر ٹھہرے

خشک پتے کی طرح جسم اڑا جاتا ہے

کیا پڑی ہے جو یہ آندھی میری خاطر ٹھہرے

شاخ گل چھوڑ کے دیوار پہ آ بیٹھے ہیں

وہ پریندے جو اندھیروں کے مسافر ٹھہرے

اپنی بربادی کی تصویر اتاروں کیسے

چند لمحوں کے لئے بھی نہ مناظر ٹھہرے

تشنگی کب کے گناؤں کی سزا ہے ‘قیصر’

وہ کنواں سوکھ گیا جس پہ مسافر ٹھہرے

घर बसा कर भी मुसाफिर के मुसाफिर ठहरे ….क़ैसरउल जाफ़री

 घर बसा कर भी मुसाफिर के मुसाफिर ठहरे

लोग दरवाज़ों से निकले के मुहाजिर ठहरे

दिल के मदफन पे नहीं कोई भी रोने वाला

अपनी दरगाह के हम ख़ुद ही मुजाविर ठहरे

इस बयाबाँ की निगाहों में मुरव्वत न रही

कौन जाने के कोई शर्त-ए-सफर फिर ठहरे

पत्तियाँ टूट के पत्थर की तरह लगती हैं

उन दरख़्तों के तले कौन मुसाफिर ठहरे

ख़ुश्क पत्ते की तरह जिस्म उड़ा जाता है

क्या पड़ी है जो ये आँधी मेरी खातिर ठहरे

शाख-ए-गुल छोड़ के दीवार पे आ बैठे हैं

वो परिेंदे जो अँधेरों के मुसाफिर ठहरे

अपनी बर्बादी की तस्वीर उतारूँ कैसे

चंद लम्हों के लिए भी न मनाज़िर ठहरे

तिश्नगी कब के गुनाओं की सज़ा है ‘कैसर’

वो कुआँ सूख गया जिस पे मुसाफिर ठहरे

آیئے آسمان کی اور چلے۔۔۔۔حنیف ترین

asmankiaur-chale

आयें आस्मांकी और चले……हनीफ तरीन

ayrchale-hindi

شیخادم آبووالاکی اردو شاعری

 میں نے پکڑاتو ہے تیرا دامن

جان نکلیگی اب میرے تن سے

ایک ٹوکڑا ہے میرے کفن کا

میرے ہاتھومیں دامن نہیں ہے

٭ ٭ ٭ ٭

کوئی آئے نہ آئے ہمیں کیا

آج آدم اٹھانا ہے ڑیرا

ہم بھٹکتے مسافر جو ٹھہرے

اپنا کوئی نشیمن نہیں ہے

٭ ٭ ٭ ٭

سلسلہ فطرت کا توڑا ہے نہ توڑا جائیگا

موت کے قدمومیں بھی تم زندگی بن کے رہو

٭ ٭ ٭ ٭

رِشتے نہ کبھی یہ ٹوٹینگے

سایہ ہے نہ تن سے چھوٹینگے

دیوانے چلے تو ساتھ انکے

ویرانے بھی گلشن تک پہنچے

٭ ٭ ٭ ٭

پہلی نظرکا پیار

تو پہیلاہی پیار ہے

پھر کس طرح مرینگے

ہمیں کوچھ  پتہ نہیں

٭ ٭ ٭ ٭

موت منزل کی داستاں ہوگی

زندگی گردیہ کارواں ہوگی

٭ ٭ ٭ ٭

زندگی نے موت سے پردہ کیا

اے کفن تنے تو شرمندہ کیا

٭ ٭ ٭ ٭

موت کو ڈھونڈھا کئے

 تھے ہم کہاں

وہ تھی ہاتھونکی لکیروں میں چھپی

शेखादम आबुवालाकी उर्दू शायरी

मैंने पकडातो है तेरा दामन

जान निकलेगी अब मेरे तनसे

 

एक टूकडा है मेरे कफन का

मेरे हाथोमें दामन नहीं है

*   *     *   *

 

कोई आये न आये हमें क्या

आज आदम उठाना है डेरा

 

हम भटकते मुसाफिर जो ठहरे

अपन कोई नशेमन नहीं है

*   *     *   *

सिलसिला फितरतका तोडा है न तोडा जायेगा

मौतके कदमोंपे भी तुम जिन्दगी बनके रहो

*   *     *   *

रिश्ते न कभी ये टूटेंगे

सायें है न तन से छूटेंगे

 

दीवाने चले तो साथ उनके

वीराने भी गुलशन तक पहुंचे

*   *     *   *

पहली नजरका प्यार

तो पहेलाही प्यार है

 

फीर ईस तरह मरेंगे

हमें कूछ पता नहीं

*   *     *   *

मौत मन्झिलकी दास्तां होगी

जिन्दगी गर्दे कारवां होगी

*   *     *   *

जिन्दगीने मौतसे परदा किया

ऐ कफन तुने तो शरमिन्दा किया

*   *     *   *

मौतको ढुंढा किये थे हम कहां

वो थी हाथोंकी लकीरों में छिपी

کتنا مشکل ہے رستے کو گھر بولنا۔۔۔۔۔۔طاہر فراز

 

جب کبھی بولنا، وقت پر بولنا

مدّتوں سوچنا، مختصر بولنا

ڈال دے گا ہلاکت میں اک دن تجھے

اے پرندے تیرا شاخ پر بولنا

پہلے کچھ دور تک ساتھ چل کے پرکھ

پھر مجھے ہم سفر، ہمسفر بولنا

عمر بھر کو مجھے بے صدا کر گیا

تیرا اک بار منہ پھیر کر بولنا

میری خانہ بدوشی سے پوچھے کوئی

کتنا مشکل ہے رستے کو گھر بولنا

عمر بھر تجھ کو رکھے گا گرمِ سفر

منزلوں کو تیرا رہگزر بولنا

کیوں ہے خاموش، سونے کی چڑیا بتا

لگ گئی تجھ کو کس کی نظر بولنا

 


कितना मुश्किल है रास्ते को घर बोलना……. ताहिर फ़राज़

 

जब कभी बोलना ,वक़्त पर बोलना

मुद्दतों सोचना,मुख़्तसर बोलना

 

डाल देगा हलाकत में एक दिन तुझे

ऐ परिंदे तेरा शाख पर बोलना

 

पहले कुछ दूर साथ चल के परख

फिर मुझे हमसफ़र हमसफ़र बोलना

 

उम्र भर को मुझे बेसदा कर गया

तेरा एक बार मुंह फेर कर बोलना

 

मेरी खानाबदोशी से पूछे कोई

कितना मुश्किल है रास्ते को घर बोलना

 

क्यूँ है खामोश सोने की चिड़िया बता
लग गयी तुझको किसकी नज़र बोलना

Listen him:

لائی حیات آئے قضا لے چلی چلے ۔ ابراہیم ذوق

 

         لائی حیات آئے قضا لے چلی چلے

        اپنی خوشی نہ آئے، نہ اپنی خوشی چلے

        بہتر تو ہے یہی کہ نہ دنیا سے دل لگے

        پر کیا کریں جو کام نہ بے دل لگی چلے

        ہو عمرِ خضر بھی تو کہیں گے بوقتِ مرگ

        ہم کیا رہے یہاں ابھی آئے ابھی چلے

        دنیا نے کس کا راہِ فنا میں دیا ہے ساتھ

        تم بھی چلے چلو یونہیں جب تک چلی چلے

        نازاں نہ ہو خِرد پہ جو ہونا ہے وہ ہی ہو

        دانش تری نہ کچھ مری دانشوری چلے

        کم ہوں گے اس بساط پہ ہم جیسے بدقمار

        جو چال ہم چلے سو نہایت بری چلے

        جاتے ہوائے شوق میں ہیں اس چمن سے ذوق

      اپنی بلا سے بادِ صبا اب کبھی چلے

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले— इब्राहीम ज़ौक़

 

लायी हयात आये, क़ज़ा  ले चली, चले

अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले

 

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे

पर क्या करें जो काम न बे-दिल्लगी चले

 

कम होंगे इस बिसात  पे हम जैसे बद-क़िमार

जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले

 

हो उम्रे-ख़िज़्र  भी तो भी कहेंगे ब-वक़्ते-मर्ग

हम क्या रहे यहाँ अभी आये अभी चले

 

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ

तुम भी चले चलो युँ ही जब तक चली चले

 

नाज़ाँ न हो ख़िरद पे जो होना है वो ही हो

दानिश तेरी न कुछ मेरी दानिशवरी चले

 

जा कि हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से ‘ज़ौक़’

अपनी बला से बादे-सबा अब कहीं चले

हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमांनों का रोल- मुहम्मद फ़ारूक़ सलीम-

 वक़्त इशाअत: Sunday 14 August 2016 04:00 pm IST(Asia Times Urdu)

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बर्र-ए-सग़ीर हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानान हिंद का अज़ीम रोल सदियों का अहाता कर रहा है। बेशुमार मुसलमांनों ने इस जद्द-ओ-जहद में अपनी अज़ीम क़ुर्बानियां और अपनी जानों का नज़राना पेश किया और सख़्त से सख़्त तरीन मसाइब बर्दाश्त किए। हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में अहम किरदार अदा करने वाले मुजाहिदीन आज़ादी जिन्हों ने आज़ादी की आग में अपना सब कुछ झोंक दिया जिनको काले पानी और जिलावतनी की सज़ाएं हुईं फांसीयों पर लटकाया गया गोलीयों का निशाना बनाया गया हाथियों और घोड़ों के पैरों तले रौंदा गया.चूने के खोलते पानी और आग में ज़िंदा जलाया गया और क़ैद वबन्द की दर्दनाक अज़ीयत-नाक सऊबतें दी गईं उन लाखों मुसलमांनों में से कम अज़ कम मुंदरजा ज़ैल मुजाहिदीन आज़ादी कुव्वतो हरगिज़ हरगिज़ फ़रामोश नहीं किया जा सकता.अफ़सोस इस बात का है कि आज तारीख़ की किताबों में से उनके नाम तक निकाल दिए गए हैं।

बहादुर शाह ज़फ़र, बेगम हज़रत महल, शहज़ादा फ़िरोज़, शाह अबदुलअज़ीज़ ,मौलाना अहमद उल्लाह शाह ,मौलाना सदाक़त उल्लाहशाह अबदुलहक़, मौलाना मुहम्मद मियां, मंसूर ख़ान अबदुलग़फ़्फ़ार ख़ां ,शाह इस्माईल शहीद, मौलाना सना-उल्लाह अमृतसरी शेख़ उल-हिंद मौलाना महमूद उल-हसन(असीर मालटा) मुफ़्ती किफ़ायत अल्लाह देहलवी मौलाना शाह अता अल्लाह बुख़ारी, मौलाना हिफ़्जुर्रेहमान स्योहारवी,मौलाना अबदुलवहीद सिद्दीक़ी ,मौलाना आशिक़ फुलती ,मौलाना शौकत अली ,मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद हाजी इमदाद अल्लाह,शेख़ मुहम्मद अबदुल्लाह, हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी,हैदर अली टीपू सुलतान ,मौलाना रशीद अहमद गंगोही, मौलाना नूर अल्लाह बूढ्ढा नवी, इशफ़ाक़ अल्लाह ख़ां मौलाना मुहम्मद अली जोहर,मौलाना अहमद सईद देहलवी मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना अफजल हक़ ख़ैराबादी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अबवालमहासन ,मुहम्मद सज्जाद हकीम, ख़लील अलरहमान नार देहलवी, सय्यद अहमद शहीद शाह ,अबदुलग़नी हाफ़िज़, वली अल्लाह बेग, मुहम्मद नबी तसद्दुक़ हुसैन ख़ां शेरवानी ,डाक्टर मुख़तार अंसारी, हकीम अजमल ख़ां ,अबदुलकरीम बैगबख़शल्लाह अंसारी,बी अम्मां(वालिदा माजिदा मौलाना मुहम्मद अली जोहर) सर सय्यद अहमद ख़ां,शाह अबदुलहईअली साबिर ख़ां अमरोहवी, रफ़ी अहमद क़दवाई, फ़ख़र उद्दीन अली अहमद ,आसिफ़ अली बैरिस्टर ,नूर उद्दीनजनरल शाह नवाज़ ख़ां ,सितजुद्दौला.मौलाना सदाक़त अल्लाह,तफ़ज़्ज़ुल हुसैन, फ़र्ख़ आबादी, मौलवी इलाहीबख़्श, मुहम्मद अहमद जुमला ना मौलाना फ़ख़्रउद्दीन ,मौलाना सय्यद मुहम्मद मियांजनरल बख़्त ख़ां मुफ़्ती रसूल बख़श काकोरवी, सूबेदार मेजर नाहर ख़ां अहमद ख़ां खरल दिलावर, जंगबिरजीसक़दर ,शहज़ादा अज़ीम बेग, मुहम्मद शफ़ी रिसालदार ,क़ारी अबदुल्लाह मौलाना फ़ाखिर मियां इला हाबादी, शेख़ फ़ज़ल अली, ख़ां अबदुस्समद ख़ां ,मौलाना ज़फ़र अली ख़ां ,फ़ज़ल हक़, मौलाना अबदुलक़ादिर लुधियानवी, शेख़ अबदुलक़ादिर तमीज़ उद्दीन अहमद ख़ां ,मुहम्मद यूनुस ख़ां, शहवार ख़ां ,सय्यद रिफ़ाक़त हुसैन, नवाब महमूद ख़ां डाक्टर सैफ उद्दीन किचलो ,मौलाना अबदुलहक़ मदनी, मौलवी क्रीम अलीदीवान हुक्म अल्लाह अली बहादुर ख़ां ,मौलाना अमीर शाह ख़ां ,आग़ाज़ मिर्ज़ा लखनवी,शेख़ फ़ज़ल अलीमुहम्मद ,अकबर औसाफ़ हुसैन ग़ुलाम अली मुशर्रफ़ ख़ां अली बहादुर ख़ां अली नक़ी ख़ां मौलाना लियाक़त अली नवाब मजोख़ां मौलाना सय्यद मुहम्मद मियांजमील अहमद कनबोह सय्यद शब्बीर अली सय्यद गुलज़ार अली, मंज़ूर अहमद क़ुरैशी, नवाब महमूद ख़ां ,मिर्ज़ा शेर बैग, नवाब वली दाद ख़ां ,शेख़ इरादत बख़श, अली ख़ां मेवाती नाद अलीरजब अली, मौलाना अलौदीन,मौलाना फ़ैज़ अहमद बद एवनी, डिप्टी हिक्मत ल्लाह, डाक्टर वज़ीर ख़ांलाल ख़ां मेवाती, मुहम्मद अली बेग ,मीर मुदुन सरदार, काले ख़ां क़लंदर ख़ां हौलदार ,मौलाना अबदुलहलीम सिद्दीक़ी, मौलाना नूर उद्दीन बिहारी, मौलाना दाऊद ग़ज़नवी, पीर शहनशाह, मौलवी मज़हर अली ,क़ाज़ी अबदूल्लतीफ़ ख़्वाजा अबदुर्रहमान ग़ाज़ी याक़ूब हुस्न मौलाना उसमान ग़नी ,डाक्टर महमूद अबदुलक़य्यूम अंसारी निसार अहमद शेरवानी, शाह अबदुर्रहीम रायपूरी ,और हाफ़िज़ अबदुलहकीम वग़ैरा इस में शामिल थे।

1857 से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जो जद्द-ओ-जहद जारी थी इस में उल्मा पेश पेश थे। जद्द-ओ-जहद आज़ादी में नाकामी के बाद अंग्रेज़ों ने हिंदूस्तानियों से सख़्त इंतिक़ाम लेना शुरू किया चुनांचे पूरे मुल्क में क़तल वग़ारत गिरी और फांसीयों का सिलसिला शुरू हो गया। इस में तक़रीबन2 लाख मुसलमांन शहीद हुए जिनमें साढे़ इक्यावन हज़ार उल्मा थे। इन क़ुर्बानीयों के बावजूद मुजाहिदीन के अज़म व इसतक़लाल में कमी नहीं आई। उल्मा हक़ और मुजाहिदीन का मुतम्मा नज़र मुल्क की आज़ादी कामिल था जिसकी वजह से उन्होंने हर किस्म की क़ुर्बानी देकर अंग्रेज़ी हुकूमत को ख़त्म करने का मुसम्मम इरादा कर लिया था चुनांचे एक सदी पर मुहीत जद्द-ओ-जहद आज़ादी के दौरान जिसका आग़ाज़ 1757 से हुआ था हज़ारों मुसलमांनों ने बिरादरान वतन के साथ अपनी क़ुर्बानियां दीं जिसके नतीजा में अंग्रेज़ों का इक़तिदार ना सिर्फ हिन्दोस्तान बल्कि एशिया और अफ़्रीक़ा के इन ममालिक से भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गयाजहां उस का सूरज ग़ुरूब नहीं होता था। इस रूह फ़र्सा माहौल में मुसलमानान हिंद ने बर्तानवी सामराज के ख़िलाफ़ अपनी जद्द-ओ-जहद मज़ीद तेज़ कर दी। हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी जब मक्का मुकर्रमा से 1731 मैं वापिस हिन्दोस्तान वापिस आए तो उन्होंने ज़िंदगी के हर शोबा में एक हमागीर इन्क़िलाब को अपनी ज़िंदगी का नसब उल-ऐन क़रार दिया। शाह साहिब की इसी तहरीक का असर था कि शहीद टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों को हिन्दोस्तान से निकाल बाहर करने का बीड़ा उठाया। ख़ाक हिंद से उठकर सबसे पहले जिस शख़्स ने हिन्दोस्तान हिंदूस्तानियों का है का नारा बुलंद क्या वो टीपू सुलतान ही था जिसकी वसीअ उल-नज़री देख चुकी थी कि हिन्दोस्तान की तबाही का असल राज़ यहां की मुख़्तलिफ़ क़ौमों की नाइत्तिफ़ाक़ी में पिनहां है जिस पर अंग्रेज़ों के जारिहाना अज़ाइम पनप रहे हैं इसी लिए टीपू सुलतान ने आख़िरी सांस तक हिन्दुस्तानी अक़्वाम और हुकमरानों को मुत्तहिद करके अंग्रेज़ फ़ित्ना को जड़ से उखाड़ फेंकने की पूरी कोशिश की लेकिन अपने लोगों की ग़द्दारी और नासमझ दुश्मनों की साज़िशों ने टीपू सुलतान और इस की सलतनत ख़ुदादाद को जोबला शुबा अंग्रेज़ी इक़तिदार के बिसात की सबसे बड़ी चट्टान थी सफ़ाए हस्ती से मिटा दिया। चुनांचे4मई 1799को टीपू सुलतान मुल्क वमलत की बका और आज़ादी की ख़ातिर अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करते हुए शहीद हुआ तो अंग्रेज़ जनरल ने फ़र्त-ए-मसर्रत से ऐलान किया कि आज हिन्दोस्तान हमारा है।

हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी के उलुलअज़म फ़र्ज़ंद हज़रत शाह अबदुलअज़ीज़ देहलवी ने हिन्दोस्तान के दार-उल-हरब होने का फ़तवा दिया और हुसूल आज़ादी के लिए जद्द-ओ-जहद करना अपना फ़रीज़ा क़रार दिया। शाह अबदुलअज़ीज़ का फ़तवा एक आलिम दीन का शरई हुक्म था जिसने हिन्दुस्तानी अवाम में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ वो आग लगाई कि इस की हर चिंगारी बर्तानवी सामराज को ख़ाक में मिलाकर रही। उल्मा किराम के एक ग्रुप ने बज़रीया असलाह मुल्क को आज़ाद करवाने की तदबीर सोची चुनांचे उन्होंने सय्यद अहमद शहीद की क़ियादत में 1818से 1831तक पूरे मुल्क का दौरा किया और सूबा सरहद के क़रीब मोरचा लगाकर मुसलसल छः साल तक अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करते रहे और 10जनवरी 1831 को बाला कोट के मैदान कारज़ार में सय्यद अहमद शहीद और शाह इस्माईल शहीद ने जाम-ए-शहादत नोश किया।मार्का में किसी भी सिम्त से मुजाहिदीन आज़ादी के हौसले पस्त नहीं हुए बल्कि उन्होंने अपनी जद्द-ओ-जहद को मज़ीद तेज़ कर दिया और 11मई 1857को फ़ौज के सिपाहीयों ने हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत करके दिल्ली पर क़बज़ा करने का मन्सूबा बनाया। दिल्ली के मुख़्तलिफ़ उल्मा किराम ने जिहाद का फ़तवा देकर मुजाहिदीन आज़ादी में इन्क़िलाब की लहर दौड़ा दी।

1871मैं शेख़ उल-हिंद मौलाना महमूद उल-हसन ने एक अंजुमन क़ायम की जिसका मक़सद ना सिर्फ दार-उल-उलूम देवबंद के लिए चंदा फ़राहम करना था बल्कि अफ़राद को इन्क़िलाब हुर्रियत के लिए तैयार करना था। ये तहरीके रेशमी रूमाल तहरीक की पहली कड़ी थी। बादअज़ां उन्होंने 1909में जमियतुल अंसार क़ायम की जिसके पहले नाज़िम मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी थे। इन तहरीकों के ज़रीया अंदरून-ए-मुल्क बग़ावत और बैरून-ए-मुल्क से हमलों का प्रोग्राम था जिसके लिए 19फरवरी 1917-ए-की तारीख़ भी मुतय्यन कर दी गई थी। महाज़-ए-जंग की तैयारी के लिए मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी को काबुल रवाना कियागया जहां उन्होंने आज़ादी हकूमत-ए-हिन्द क़ायम की जिसके सदर राजा महिन्द्र परताब बनाए गए लेकिन बदक़िस्मती से इस खु़फ़ीया तहरीक का राज़ फ़ाश हो गया और शेख़ उल-हिंद और उनके रफ़क़ा वग़ैरा को गिरफ़्तार करके मालटा में क़ैद कर दिया गया जहां से वो 1920 में रहा हुए। जब शेख़ उल-हिंद और उनके रफ़क़ा बाद रिहाई के हिन्दोस्तान वापिस हुए तो कमेटी में उनका इस्तिक़बाल करने वालों में मौलाना अब्दुह लबारी फ़रंगी महली और मोहन दास करम चंद गांधी जी भी मौजूद थे। शेख़ उल-हिंद की मालटा में असीरी के दौरान 1919में हिन्दोस्तान में जमियते उल्मा-ए-हिंद क़ायम की गई जिसके पहले सदर मुफ़्ती किफ़ायत अल्लाह मुक़र्रर हुए। जमियते उल्मा-ए-हिंद जद्द-ओ-जहद आज़ादी में कांग्रेस के दोश बदोश थी। 8सितंबर 1920को जमियते उल्मा-ए-हिंद -की जानिब से तर्क मवालात का फ़तवा शाये हुआ जिस पर पाँच सौ उल्मा के दस्तख़त थे। ये फ़तवा ज़बत कर लिया गया। तहरीक अदम तआवुन के दौरान तक़रीबन 30हज़ार अफ़राद जेल गए जिनमें ज़्यादा तादाद उल्मा किराम और मुस्लिम मुजाहिदीन की थी।

19सितंबर 1921को कराची में ख़िलाफ़त कान्फ़्रैंस का इजलास ज़ेर-ए-सदारत मौलाना मुहम्मद अली मुनकक़िद हुआ जिसमें ये तजवीज़ पेश हुई कि अंग्रेज़ी फ़ौज की मुलाज़मत हराम है। इस तजवीज़ की ताईद मौलाना शौकत अली डाक्टर सैफ उद्दीन किचलो मौलाना हुसैन अहमद मदनी और जगत गुरु शंकर आचार्य ने की चूँकि ये तजवीज़ बर्तानवी हुकूमत के ख़िलाफ़ थी इस लिए इन तमाम लोगों को गिरफ़्तार करके कराची की अदालत में मुक़द्दमा चलाया गया और उनको दो दो साल क़ैद बामुशक़क़्त की सज़ा हुई। इसी ज़माना में मौलाना आज़ाद जो रांची की नज़रबंदी से रहा हुए थे मजलिस ख़िलाफ़त की कान्फ़्रैंस मुनाक़िद आगरा1921के सदारती ख़ुतबा में ये नज़रिया पेश किया कि मुल्क की आज़ादी और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जद्द-ओ-जहद के लिए हिंदू मुस्लिम इत्तिहाद निहायत ज़रूरी है चुनांचे वो इसी नज़रिया पर क़ायम रहे। दिसंबर1921में अहमदाबाद में कांग्रेस का इजलास हकीम अजमल ख़ां की सदारत में मुनाक़िद हुआ जिसमें मौलाना हसरत मोहानी ने आज़ादी कामिल की तहरीक पेश की जो अपनी नौईयत की अव्वलीन तहरीक थी। जमियते उल्मा-ए-हिंद हिंद ने अपने पिशावर के इजलास मुनक्किदा दिसंबर1927में साइमन कमीशन के बाईकॉट का फ़ैसला किया और कांग्रेस ने भी अपने मद्रास के इजलास मुनाक़िदा 26दिसंबर 1927 को इस कमीशन का बाईकॉट करना तै किया चुनांचे जब फरवरी 1928 में कमीशन हिन्दोस्तान आया तो पूरे मुल्क में इस के बाईकॉट का सिलसिला और एहितजाजी जलसे हुए और ये कमीशन नाकाम वापिस हो गया। दिसंबर 1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर के इजलास में मुकम्मल आज़ादी की क़रारदाद मंज़ूर की। गांधी जी की तहरीक नमक सत्याग्र्ह   और सिवल ना-फ़रमानी के दौरान दीगर क़ौमी कारकुनों के साथ जमियते उल्मा-ए-हिंद के अकाबिरीन मौलाना सय्यद मुहम्मद मियां मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद मौलाना हिफ्जुर्रेहमान और मौलाना सय्यद फ़ख़्ररुद्दीन वग़ैरा भी गिरफ़्तार हुए।

1930 मैं लंदन में मुनक्किद दूसरी गोल मेज़ कान्फ़्रैंस में मौलाना मुहम्मद अली जोहर ने आज़ादी कामिल का मुतालिबा किया और कहा जब तक हिन्दोस्तान आज़ाद नहीं होगा में इस ग़ुलाम मुल्क की सरज़मीन तक पर क़दम नहीं रखूँगा ।मैं आज़ादी का परवाना ले क रही जाऊँगा। ख़ुदा का करना ऐसा हुआ कि एक माह के अंदर ही मौलाना ने दाई अजल को लब्बैक कहा और मालिक-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।

आज जबकि सारा मुल़्क आज़ादी की 69वीं सालगिरा मना रहा है मुहासिबा करने और ग़ौरो फ़िक्र करने की ज़रूरत है कि समाजी इन्साफ़ ख़ासकर अक़ल्लीयतों के साथ इन्साफ़ की मंज़िल से अब भी हम कितने दूर हैं। जब तक मुस्लिम अकलियत को आज़ादी और तामीर वतरक़ी के समरात में उनका हिस्सा ना मिले आज़ादी अधूरी और जमहूरीयत ना-मुकम्मल ही समझी जाएगी।आज़ादी के बाद मुस्लिम अकलियत को जितना पीछे कर दिया गया है इस की मिसाल तारीख़-ए-आलम में नहीं मिल सकती। आने वाले बरसों में इस की तलाफ़ी और अकलियत के साथ इन्साफ़ होना चाहीए तब ही हम हक़ीक़ी माअनों में जशन-ए-आज़ादी मना सकें गे।

© 2010 ACTDPL, Punjabi University, Patiala (Punjab) India

ہندوستان کی جنگ آزادی میں مسلمانوں کا رول…..محمد فاروق سلیم

 

وقت اشاعت: Sunday 14 August 2016 04:00 pm IST

برصغیر ہندوستان کی جنگ آزادی میں مسلمانان ہند کا عظیم رول صدیوں کا احاطہ کر رہاہے۔ بے شمار مسلمانوں نے اس جدوجہد میں اپنی عظیم قربانیاں اور اپنی جانوں کا نذرانہ پیش کیا اور سخت سے سخت ترین مصائب برداشت کئے۔ ہندوستان کی جنگ آزادی میں اہم کردار ادا کرنے والے مجاہدین آزادی‘ جنہوں نے آزادی کی آگ میں اپنا سب کچھ جھونک دیا‘ جن کو کالے پانی اور جلاوطنی کی سزائیں ہوئیں‘ پھانسیوں پر لٹکایاگیا‘ گولیوں کانشانہ بنایاگیا‘ ہاتھیوں اور گھوڑوں کے پیروں تلے روندا گیا‘چونے کے کھولتے پانی اور آگ میں زندہ جلایاگیا اور قید وبند کی دردناک اذیت ناک صعوبتیں دی گئیں‘ ان لاکھوں مسلمانوں میں سے کم از کم مندرجہ ذیل مجاہدین آزادی کوتو ہرگز ہرگز فراموش نہیں کیاجاسکتا‘افسوس اس بات کا ہے کہ آج تاریخ کی کتابوں میں سے ان کے نام تک نکال دیئے گئے ہیں۔
بہادر شاہ ظفر ‘بیگم حضرت محل‘ شہزادہ فیروز‘ شاہ عبدالعزیز‘ مولانا احمد اللہ شاہ‘ مولانا صداقت اللہ‘شاہ عبدالحق‘ مولانا محمد میاں منصور‘ خان عبدالغفار خاں‘ شاہ اسماعیل شہید‘ مولانا ثناء اللہ امرتسری‘ شیخ الہند مولانا محمود الحسن(اسیر مالٹا) مفتی کفایت اللہ دہلوی‘ مولانا شاہ عطا اللہ بخاری‘ مولانا حفظ الرحمان سیوہاروی‘مولانا عبدالوحید صدیقی‘ مولانا عاشق پھلتی‘ مولانا شوکت علی‘ مولانا ابوالکلام آزاد‘ حاجی امداد اللہ‘شیخ محمد عبداللہ‘ حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلوی‘حیدر علی ‘ ٹیپو سلطان‘ مولانا رشید احمد گنگوہی‘ مولانا نور اللہ بڈھانوی‘ اشفاق اللہ خاں‘ مولانا محمد علی جوہر‘مولانا احمد سعید دہلوی‘ مولانا عبیداللہ سندھی‘ مولانا افضال الحق خیر آبادی‘ مولانا حسین احمد مدنی‘ مولانا ابوالمحاسن محمد سجاد‘ حکیم خلیل الرحمان ناردہلوی‘ سید احمد شہید‘ شاہ عبدالغنی‘ حافظ ولی اللہ بیگ ‘ محمد نبی‘ تصدق حسین خاں شیروانی‘ ڈاکٹر مختار انصاری‘ حکیم اجمل خاں‘ عبدالکریم بیگ‘بخش اللہ انصاری‘بی اماں(والدہ ماجدہ مولانا محمد علی جوہر) سرسید احمد خاں‘شاہ عبدالحئی‘علی صابر خاں امروہوی‘ رفیع احمد قدوائی‘ فخر الدین علی احمد‘ آصف علی‘ بیرسٹر نورالدین‘جنرل شاہ نواز خاں‘ سراج الدولہ‘ مولانا صداقت اللہ‘تفضل حسین فرخ آبادی‘ مولوی الٰہی بخش‘ محمد احمد جملانہ‘ مولانا فخرالدین ‘ مولانا سید محمد میاں‘جنرل بخت خاں‘ مفتی رسول بخش کاکوروی‘ صوبیدار میجر ناہر خاں‘ احمد خاں کھرل‘ دلاور جنگ‘برجیس قدر‘ شہزادہ عظیم بیگ‘ محمد شفیع رسالدار‘ قاری عبداللہ‘ مولانا فاخر میاں الہ آبادی‘ شیخ فضل علی خاں‘ عبدالصمد خاں‘ مولانا ظفر علی خاں‘ فضل حق‘ مولانا عبدالقادر لدھیانوی‘ شیخ عبدالقادر ‘تمیز الدین احمد خاں‘ محمد یونس خاں‘ شہوار خاں‘ سید رفاقت حسین‘ نواب محمود خاں‘ ڈاکٹر سیف الدین کچلو‘ مولانا عبدالحق مدنی‘ مولوی کریم علی‘دیوان حکم اللہ‘ علی بہادر خاں‘ مولانا امیر شاہ خاں‘ آغاز مرزا لکھنوی‘شیخ فضل علی‘محمد اکبر‘ اوصاف حسین‘ غلام علی‘ مشرف خاں‘ علی بہادر خاں‘ علی نقی خاں‘ مولانا لیاقت علی‘ نواب مجوخاں‘ مولانا سید محمد میاں‘جمیل احمد کنبوہ‘ سید شبیر علی‘ سید گلزار علی‘ منظور احمد قریشی‘ نواب محمود خاں‘ مرزا شیر بیگ‘ نواب ولی داد خاں‘ شیخ ارادت بخش‘ علی خاں میواتی‘ ناد علی‘رجب علی‘ مولانا علاؤ الدین‘مولانا فیض احمد بدایونی‘ ڈپٹی حکمت اللہ‘ ڈاکٹر وزیر خاں‘لال خاں میواتی‘ محمد علی بیگ‘ میر مدن‘ سردار کالے خاں‘ قلندر خاں حولدار‘ مولانا عبدالحلیم صدیقی‘ مولانا نورالدین بہاری‘ مولاناداؤد غزنوی‘ پیر شہنشاہ‘ مولوی مظہر علی‘ قاضی عبداللطیف ‘خواجہ عبدالرحمان غازی‘ یعقوب حسن‘ مولانا عثمان غنی‘ ڈاکٹر محمود‘ عبدالقیوم انصاری‘ نثار احمد شیروانی‘ شاہ عبدالرحیم رائے پوری اور حافظ عبدالحکیم وغیرہ اس میں شامل تھے۔
1857 سے انگریزوں کے خلاف جو جدوجہد جاری تھی‘ اس میں علماء پیش پیش تھے۔ جدوجہد آزادی میں ناکامی کے بعد انگریزوں نے ہندوستانیوں سے سخت انتقام لینا شروع کیا‘ چنانچہ پورے ملک میں قتل وغارت گری اور پھانسیوں کا سلسلہ شروع ہوگیا۔ اس میں تقریباً2 لاکھ مسلمان شہید ہوئے‘ جن میں ساڑھے اکیاون ہزار علماء تھے۔ ان قربانیوں کے باوجود مجاہدین کے عزم واستقلال میں کمی نہیں آئی۔ علماء حق اور مجاہدین کا مطمح نظر ملک کی آزادی کامل تھا‘ جس کی وجہ سے انہوں نے ہر قسم کی قربانی دے کر انگریزی حکومت کو ختم کرنے کا مصمم ارادہ کرلیاتھا‘ چنانچہ ایک صدی پر محیط جدوجہد آزادی کے دوران جس کا آغاز 1757 سے ہوا تھا‘ ہزاروں مسلمانوں نے برادران وطن کے ساتھ اپنی قربانیاں دیں‘ جس کے نتیجہ میں انگریزوں کا اقتدار نہ صرف ہندوستان‘ بلکہ ایشیا ا ور افریقہ کے ان ممالک سے بھی ہمیشہ کے لئے ختم ہوگیا‘جہاں اس کا سورج غروب نہیں ہوتا تھا۔ اس روح فرسا ماحول میں مسلمانان ہند نے برطانوی سامراج کے خلاف اپنی جدوجہد مزید تیز کردی۔ حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلوی جب مکہ مکرمہ سے 1731 میں واپس ہندوستان واپس آئے تو انہوں نے زندگی کے ہر شعبہ میں ایک ہمہ گیر انقلاب کو اپنی زندگی کا نصب العین قراردیا۔ شاہ صاحب کی اسی تحریک کا اثر تھا کہ شہید ٹیپو سلطان نے انگریزوں کو ہندوستان سے نکال باہر کرنے کا بیڑا اٹھایا۔ خاک ہند سے اٹھ کر سب سے پہلے جس شخص نے ’’ہندوستان ہندوستانیوں کا ہے‘‘ کا نعرہ بلند کیا‘ وہ ٹیپو سلطان ہی تھا‘ جس کی وسیع النظری دیکھ چکی تھی کہ ہندوستان کی تباہی کا اصل راز یہاں کی مختلف قوموں کی نااتفاقی میں پنہاں ہے‘ جس پر انگریزوں کے جارحانہ عزائم پنپ رہے ہیں‘ اسی لئے ٹیپو سلطان نے آخری سانس تک ہندوستانی اقوام اور حکمرانوں کو متحد کرکے انگریز فتنہ کو جڑ سے اکھاڑ پھینکنے کی پوری کوشش کی‘ لیکن اپنے لوگوں کی غداری اور ناسمجھ دشمنوں کی سازشوں نے ٹیپوسلطان اور اس کی سلطنت خدا داد کو جوبلا شبہ انگریزی اقتدار کے بساط کی سب سے بڑی چٹان تھی‘ صفحہ ہستی سے مٹادیا۔ چنانچہ4مئی 1799کوٹیپو سلطان ملک وملت کی بقاء اور آزادی کی خاطر انگریزوں سے مقابلہ کرتے ہوئے شہید ہوا‘ توانگریز جنرل نے فرط مسرت سے اعلان کیا کہ ’’آج ہندوستان ہمارا ہے‘‘۔
حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلوی کے اولوالعزم فرزند حضرت شاہ عبدالعزیز دہلوی نے ہندوستان کے دارالحرب ہونے کا فتویٰ دیا اور حصول آزادی کے لئے جدوجہد کرنا اپنا فریضہ قرا ردیا۔ شاہ عبدالعزیز کا فتوی ایک عالم دین کا شرعی حکم تھا‘ جس نے ہندوستانی عوام میں انگریزوں کے خلاف وہ آگ لگائی کہ اس کی ہرچنگاری برطانوی سامراج کو خاک میں ملاکر رہی۔ علماء کرام کے ایک گروپ نے بذریعہ اسلحہ ملک کو آزاد کروانے کی تدبیر سوچی‘ چنانچہ انہوں نے سید احمد شہید کی قیادت میں 1818سے 1831تک پورے ملک کا دورہ کیا اور صوبہ سرحد کے قریب مورچہ لگاکر مسلسل چھ سال تک انگریزوں سے مقابلہ کرتے رہے اور 10جنوری 1831 کو بالا کوٹ کے میدان کا رزار میں سید احمد شہید اور شاہ اسماعیل شہید نے جام شہادت نوش کیا۔معرکہ میں کسی بھی سمت سے مجاہدین آزادی کے حوصلے پست نہیں ہوئے‘ بلکہ انہوں نے اپنی جدوجہد کو مزید تیز کردیا اور 11مئی 1857کو فوج کے سپاہیوں نے حکومت کے خلاف بغاوت کرکے دہلی پر قبضہ کرنے کا منصوبہ بنایا۔ دہلی کے مختلف علماء کرام نے جہاد کا فتویٰ دے کر مجاہدین آزادی میں انقلاب کی لہر دوڑا دی۔
1871میں شیخ الہند مولانامحمود الحسن نے ایک انجمن قائم کی ‘ جس کا مقصد نہ صرف دارالعلوم دیوبند کے لئے چندہ فراہم کرناتھا‘ بلکہ افراد کو انقلاب حریت کے لئے تیار کرناتھا۔ یہ تحریک’’ریشمی رومال تحریک‘‘ کی پہلی کڑی تھی۔ بعد ازاں انہوں نے 1909میں جمعیۃ الانصار قائم کی‘ جس کے پہلے ناظم مولانا عبیداللہ سندھی تھے۔ ان تحریکوں کے ذریعہ اندرون ملک بغاوت اور بیرون ملک سے حملوں کا پروگرام تھا‘ جس کے لئے 19فروری 1917ء کی تاریخ بھی متعین کردی گئی تھی۔ محاذ جنگ کی تیاری کے لئے مولانا عبیداللہ سندھی کو کابل روانہ کیاگیا‘ جہاں انہوں نے آزادی حکومت ہند قائم کی‘ جس کے صدر راجہ مہندر پرتاب بنائے گئے‘ لیکن بدقسمتی سے اس خفیہ تحریک کا راز فاش ہوگیا اور شیخ الہند اور ان کے رفقاء وغیرہ کو گرفتار کرکے مالٹا میں قید کردیاگیا‘ جہاں سے وہ 1920 میں رہا ہوئے۔ جب شیخ الہند اور ان کے رفقاء بعد رہائی کے ہندوستان واپس ہوئے‘ تو کمیٹی میں ان کا استقبال کرنے والوں میں مولانا عبدالباری فرنگی محلی اور موہن داس کرم چند گاندھی جی بھی موجود تھے۔ شیخ الہند کی مالٹا میں اسیری کے دوران 1919میں ہندوستان میں جمعیۃ العلماء ہند قائم کی گئی‘ جس کے پہلے صدر مفتی کفایت اللہ مقرر ہوئے۔ جمعیۃ العلماء ہند جدوجہد آزادی میں کانگریس کے دو ش بدوش تھی۔ 8ستمبر 1920کو جمعیۃ العلماء کی جانب سے ترک موالات کا فتویٰ شائع ہوا ‘جس پر پانچ سو علماء کے دستخط تھے۔ یہ فتویٰ ضبط کرلیاگیا۔ تحریک عدم تعاون کے دوران تقریباً 30ہزار افراد جیل گئے‘ جن میں زیادہ تعداد علماء کرام اور مسلم مجاہدین کی تھی۔
19ستمبر 1921کو کراچی میں خلافت کانفرنس کا اجلاس زیر صدارت مولانا محمد علی منعقد ہوا‘ جس میں یہ تجویز پیش ہوئی کہ انگریزی فوج کی ملازمت حرام ہے۔ اس تجویز کی تائید مولانا شوکت علی‘ ڈاکٹر سیف الدین کچلو‘ مولانا حسین احمد مدنی اور جگت گرو شنکر آچاریہ نے کی‘ چونکہ یہ تجویز برطانوی حکومت کے خلاف تھی‘ اس لئے ان تمام لوگوں کو گرفتار کرکے کراچی کی عدالت میں مقدمہ چلایاگیااور ان کو دو دو سال قید بامشقت کی سزا ہوئی۔ اسی زمانہ میں مولانا آزادجو رانچی کی نظر بندی سے رہا ہوئے تھے‘ مجلس خلافت کی کانفرنس منعقدہ آگرہ1921کے صدارتی خطبہ میں یہ نظریہ پیش کیا کہ ملک کی آزادی اور انگریزی حکومت کے خلاف جدوجہد کے لئے ہندو مسلم اتحاد نہایت ضروری ہے‘ چنانچہ وہ اسی نظریہ پر قائم رہے۔ دسمبر1921میں احمد آباد میں کانگریس کا اجلاس حکیم اجمل خاں کی صدارت میں منعقد ہوا‘ جس میں مولانا حسرت موہانی نے آزادی کامل کی تحریک پیش کی‘ جو اپنی نوعیت کی اولین تحریک تھی۔ جمعیۃ علماء ہند نے اپنے پشاور کے اجلاس منعقدہ دسمبر1927میں سائمن کمیشن کے بائیکاٹ کا فیصلہ کیا اور کانگریس نے بھی اپنے مدراس کے اجلاس منعقدہ 26دسمبر 1927 کو اس کمیشن کا بائیکاٹ کرنا طے کیا‘ چنانچہ جب فروری 1928 میں کمیشن ہندوستان آیا ‘تو پورے ملک میں اس کے بائیکاٹ کا سلسلہ اور احتجاجی جلسے ہوئے اور یہ کمیشن ناکام واپس ہوگیا۔ دسمبر 1929 میں کانگریس نے اپنے لاہور کے اجلاس میں مکمل آزادی کی قرار داد منظور کی۔ گاندھی جی کی تحریک نمک ستیہ گرہ اور سول نافرمانی کے دوران دیگر قومی کارکنوں کے ساتھ جمعیۃ علماء کے اکابرین مولانا سید محمد میاں‘ مولانا ابوالکلام آزاد‘ مولانا حفظ الرحمان اور مولانا سید فخرالدین وغیرہ بھی گرفتارہوئے۔
1930 میں لندن میں منعقدہ دوسری گول میز کانفرنس میں مولانا محمد علی جوہر نے آزادی کامل کا مطالبہ کیا اور کہا جب تک ہندوستان آزاد نہیں ہوگا‘ میں اس غلام ملک کی سرزمین تک پر قدم نہیں رکھوں گا ۔میں آزادی کا پروانہ لے کرہی جاؤں گا۔ خدا کا کرنا ایسا ہوا کہ ایک ماہ کے اندر ہی مولانا نے داعی اجل کو لبیک کہا اور مالک حقیقی سے جاملے۔
آج جبکہ ساراملک آزادی کی 69ویں سالگرہ منارہا ہے‘ محاسبہ کرنے اور غوروفکر کرنے کی ضرورت ہے کہ سماجی انصاف‘ خاص کر اقلیتوں کے ساتھ انصاف کی منزل سے اب بھی ہم کتنے دور ہیں۔ جب تک مسلم اقلیت کو آزادی اور تعمیر وترقی کے ثمرات میں ان کا حصہ نہ ملے‘ آزادی ادھوری اور جمہوریت نامکمل ہی سمجھی جائے گی۔آزادی کے بعد مسلم اقلیت کو جتنا پیچھے کردیاگیا ہے ‘اس کی مثال تاریخ عالم میں نہیں مل سکتی۔ آنے والے برسوں میں اس کی تلافی اور اقلیت کے ساتھ انصاف ہوناچاہئے‘ تب ہی ہم حقیقی معنوں میں جشن آزادی مناسکیں گے۔


 

नई दिल्ली. 2002 के गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़े करने वाले बर्खास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने बर्खास्ती पर एक कविता के जरिए प्रतिक्रिया दी है. कविता का सार ये है कि वो सच के साथ हैं और सरकार झूठ के साथ इसलिए दोनों में समझौता नहीं हो सकता था.

 भट्ट ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर अंग्रेजी में यह कविता छापी है जिसे आउटलुक हिन्दी की वेबसाइट ने हिंदी अनुवाद करके छापा है.

पढ़ें भट्ट की कविता

इसलिए लड़ाई शुरू होने दो ……..संजीव भट्ट

 

 मेरे पास सिद्धांत हैं और कोई सत्‍ता नहीं

तुम्‍हारे पास सत्‍ता है और कोई सिद्धांत नहीं

तुम्‍हारे तुम होने

और मेरे मैं होने के कारण

समझौते का सवाल ही नहीं उठता

इसलिए लड़ाई शुरू होने दो …

 

मेरे पास सत्‍य है और ताकत नहीं

तुम्‍हारे पास ताकत है और कोई सत्‍य नहीं

तुम्‍हारे तुम होने

और मेरे मैं होने के कारण

समझौते का सवाल ही नहीं उठता

इसलिए शुरू होने दो लड़ाई …

 

तुम मेरी खोपड़ी पर भले ही बजा दो डंडा

मैं लड़ूंगा

तुम मेरी हड्डि‍यां चूर-चूर कर डालो

फिर भी मैं लड़ूंगा

तुम मुझे भले ही जिंदा दफन कर डालो

मैं लड़ूंगा

सच्‍चाई मेरे अंदर दौड़ रही है इसलिए

मैं लड़ूंगा

अपनी अंतिम दम तोड़ती सांस के साथ भी

मैं लड़ूंगा …

 

मैं तब तक लड़ूंगा, जब तक

झूठ से बनाया तुम्‍हारा किला

ढह कर गिर नहीं जाता

जब तक जो शैतान तुमने अपने झूठों से पूजा है

वह सच के मेरे फरिश्‍ते के सामने घुटने नहीं टेक देता

 

 

 Original English version

 

So let the battle begin…Sanjiv Bhatt

 

I have principle and no power

You have power and no principle

You being you

And I being I

Compromise is out of the question

So let the battle begin…

I have truth and no force

You have force and no truth

You being you

And I being I

Compromise is out of the question

So let the battle begin…

You may club my skull

I will fight

You may crush my bones

I will fight

You may bury me alive

I will fight

With truth running through me

I will fight

With every ounce of my strength

I will fight

With my last dying breath

I will fight…

I will fight till the

Castle that you built with your lies

Comes tumbling down

Till the devil you worshiped with your lies

Kneels down before my angel of truth

.

shaukat thaanavee

शौकत थानवी——राजकुमार केसवानी

 

उर्दू की अदबी तारीख़ में जिन लोगों ने तंज़-ओ-मज़ाह (हास्य-व्यंग) के फ़न को एक आला मकाम दिलाने में अहम रोल अदा किया है उनमे एक नाम हमेशा बड़ा नुमाया रहा है – शौकत थानवी। हिंदुस्तान की आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद तक के दो अलग-अलग वक़्फ़ों में शौकत थानवी अपने हम-उम्र और कम-उम्र तंज़-ओ-मज़ाह नवीसों; पितरस बुख़ारी, शफ़ीक़-उर-रहमान, चिराग़ हसन ‘हसरत’, अब्दुल मजीद ‘सालिक़’, कन्हैयालाल कपूर, फिक्र तौंसवी के साथ बाकायदा अपनी तेज़ रफ़्तारी के साथ लिखते रहे। इसी बाकायदगी और तेज़ रफ़्तारी का नतीजा है कि अपने मुख्तसिर से 59 साला दुनियावी सफ़र में पूरी साठ किताबों का सरमाया छोड़ गए।

हक़ीक़तन देखा जाए तो शौकत थानवी तंज़ से कहीं ज़्यादा मज़ाह के लेखक थे। लेकिन न जाने कब और कैसे तंज़-ओ-मज़ाह या हास्य-व्यंग के दो लफ़्ज़ आपस में इस क़दर जोड़कर रख दिए गए हैं कि ‘फ़ेवीकाल’ के इस मज़बूत जोड़ की वजह से दो अलग-अलग खानों में रखी जाने वाली चीज़ें भी रिवायतन एक साथ रखी जाती रही हैं।

इस सिलसिले में एक दिलचस्प बात यह भी है कि उर्दू में तंज़-ओ-मज़ाह की रिवायत बहुत पुरानी नहीं है। कदीमी दौर की दास्तानों में मिलने वाले उथले किस्म के हल्के वज़न के मज़ाहिया जुमलों को अदबी तौर पर ज़माना पहले ख़ारिज किया जा चुका है।

”उर्दू नस्र (गद्य) में तंज़-ओ-मज़ाह की तारीख़ ज़्यादा पुरानी नहीं, उसके अव्वलीन वाज़े और शऊरी नक़ूश (चिन्ह) ग़ालिब की नस्र में ही दिखाई देते हैं। गरचे बाज़ क़दीम दास्तानो में भी ज़राफ़त (हंसी-ठठोल्) और शोख़ियों के छींटे जा-बजा मिलते हैं, लेकिन इनकी हैसियत सतही फ़िकरेबाज़ी, मसख़रेपन, सस्ती नक़्ल और तान-ओ-तश्नीह (ताने मारना और बुरा भला कहना) से ज़्यादा नहीं।” (डाक्टर अनवर पाशा – ‘उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की रिवायत’)

इसी बात की ताईद करते हुए डाक्टर मुश्ताक़ अहमद आज़मी कहते हैं; ”ग़ालिब के मिज़ाज की ख़ुसूसियत यही थी कि वो ज़बूं हाली (बदहाली) पर, ग़लत बात पर, इंसानी कमज़ोरियों पर, यहां तक कि अपने आप पर भी हंस सकें। उन्होने ख़ुद को ‘ग़ालिब ख़स्ता’ और ‘बादा ख़्वार’ जैसे अलक़ाब दे डाले हैं।”

ग़ालिब के ही दौर में लखनऊ से ‘अवध पंच’ जैसा तंज़ो-मज़ाह को पाएदारी देने वाला कारनामा अंजाम दिया गया। तंज़-ओ-मज़ाह को अवाम में जिस रफ़्तार से मक़बूलियत मिली उसी के बाइस मुंशी नवल किशोर जैसे उर्दू के बलंद पाया इंसान ने भी अपने कारनामे ‘अवध अख़बार’ को कामयाबी की अगली सीढ़ी पर पहुंचाने की गरज़ से पंडित रतन नाथ सरशार को अपने अख़बार का एडीटर मुकर्रर किया और ‘फ़साना-ए-आज़ाद’ जैसी दिलचस्प दास्तान को रोज़ाना छापकर अपने मक़सद में कामयाबी हासिल की। इसी कामयाबी को याद करते हुए ही मुंशी नवल किशोर ने बाद के सालों में शौकत थानवी को भी ‘अवध अख़बार’ में बाइज़्ज़त जगह दी।

असल में शौकत थानवी ने इतने सारे कारनामे अंजाम दिए हैं कि उन्हें महज़ एक मज़ाह नवीस मानकर पेश करना एक नामुनासिब सी बात होगी। असल में वे सबसे पहले बाकायदा एक संजीदा शायर, पत्रकार, ड्रामा निगार, कालमिस्ट, कहानीकार, नाविल निगार, फिल्म लेखक, अदाकार, रेडियो के फीचर निगार और न जाने क्या-क्या थे। ऐसा मालूम होता है कि उन्होने अदब का कोई डिसीप्लिन अपनी पहुंच से बाहर नहीं रहने दिया। वह भी उस हालत में जब स्कूली तालीम के नाम पर उनका नाम महज़ नवें दर्जे तक ही दर्ज पाया जाता है।

शौकत थानवी ने अपने शुरूआती दिनों के बारे में जानकारी अपने किताब ‘मा बदौलत’ में दी है, जिसे बाद के सालों लाहौर से प्रकाशित उर्दू के अज़ीम रिसाले ‘नक़ूश’ ने अपने 1964 के ‘आप बीती’ अंक में भी शाया किया है।

”…कितनी सच्ची बात कही है जिसने भी कही है कि हर ज़माने में और दुनिया के हर गोशे में एक क़ुत्ब (ऋषि – धुर्व तारा को उर्दू में क़ुत्ब तारा कहा जाता है) और एक अहमक साथ-साथ पैदा हुआ करता है। और अक्सर तो यह भी देखा गया है कि एक ही घर में एक भाई क़ुत्ब होता है तो दूसरा अहमक। अब ज़रा इस कुल्लिये (मिसाल) की सदाक़त मुलाहिज़ा हो कि कहां कृश्न मुरारी और कहां एक अदबी मदारी। ज़माना एक न सही मगर मुकाम एक ही है। कृश्न का स्थान बिंद्राबन ज़िला मथुरा जन्म भूमि बनता है, किसकी? … शौकत थानवी की।

यह एक तारीख़ी लतीफ़ा नहीं बल्कि एक जीता-जागता वाक़्या है। बिंद्राबन के कोतवाल साहब मुंशी सिद्दीक़ अहमद मरहूम जो पहले तो औलाद की तरफ़ से मायूस हो चुके थे मगर शादी के बारह साल बाद औलाद हुई भी तो लड़की। अपने अरमान की तक्मील के लिए फिर चार साल तक बेचारे को इंतज़ार करना पड़ा। यहां तक कि 2 फरवरी 1904 को सुबह होने से क़ब्ल ही उनकी ये तमन्ना भी पूरी हो गई और औलाद नरेना (आशय नर से) से भी निस्फ़ बेहतर (बेटर हाफ़, पत्नी) की गोद पुर हो गई। सिपाहियों ने गोले दाग़े, भांडों ने ढोल बजाए। नटों ने करतब दिखाए। एक हफ़्ते तक चहल-पहल रही। अक़ीक़े के दिन नाम रखा गया – मुहम्मद उमर और तारीख़ी नाम निकला तस्ख़ीर अहमद। ये उन्हीं हज़रत का नाम और तारीख़ी नाम है जिनको अब शौकत थानवी कहा जाता है। थानवी इसलिए नहीं कहा जाता कि पैदाइश बिंद्राबन के थाने में हुई बल्कि इसलिए कि थाना भवन ज़िला मुज़फ्फर नगर इस ख़ानदान का वतन है।”

शौकत थानवी ने अगर समाजी हालात और समाज के लोगों को अपने तंज़ का निशाना बनाया तो पूरी ईमानदारी बरतते हुए ख़ुद को और अपने ख़ानदान को भी इससे बरी नहीं रखा। उन्होने अपने कोतवाल पिता के रिश्वतखोरी की लानत में मुब्तला होने को भी खुलकर कोसा है और उसका मज़ाक़ भी उड़ाया है। अपनी किताब ‘मा बदौलत’ में एक जगह लिखते हैं; ”वालिद साहब की रिश्वत की तमाम आमदनी डाक्टरों की फ़ीस और दवाइयों की कीमत में सर्फ (ख़र्च) हो जाती थी। हराम बजाए हराम क्योंकर सर्फ न होता?”

शौकत थानवी की इस दास्तान में मौजूद ‘वालिद साहब’ का यह किरदार, बाप होने के अलावा उस दौर का एक ऐसा नुमाइंदा चेहरा भी बनकर सामने आता है जो इस हक़ीक़त को पहचानने का मौका देता है कि उस दौर में भी किस तरह रिश्वतखोरी के कारोबार में लगे लोगों के लिए हर तरफ़ बहार थी। बीसवीं सदी की उस पहली दहाई में ही इन कोतवाल साहब मुंशी सिद्दीक़ अहमद तरक्की हासिल करके लखनऊ से भोपाल पहुंच गए। उन्हें यू.पी. पुलिस से डेपूटेशन पर भोपाल में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल बना दिया गया।

”मैने अपनी होश की आंखें भोपाल के एक आलीशान मकान में खोलीं। बड़े लाड़-प्यार में ज़िंदगी के दिन गुज़र रहे थे कि मालूम नहीं किसने वालिद साहब को यह मश्विरा दिया कि लड़के की तालीम शुरू होना चाहिये। और आख़िरकार एक मास्टर साहब बुलाए गए। मालूम होता था बंदर का तमाशा शुरू करेंगे। इन हज़रत ने मौलवी मोहम्मद इस्माईल मेरठी की रीडरों को रटाना शुरू किया। मगर कुछ ही दिन पढ़ा सके थे कि एक दिन वालिद साहब ने उनको पढ़ाते हुए किसी लफ़्ज़ के ग़लत तलफ़्फ़ुज़ पर जो ग़ौर किया तो उसी दिन मास्टर साहब का हिसाब कर दिया गया। उसके बाद एक और मास्टर साहब आए जो चौथे दिन इसलिए निकाल दिए गए कि वो ज़रा सख़्त किस्म के आदमी थे। और मारपीट में हाथ खुला हुआ था।

अब एक और मास्टर साहब आए जिनका इस्म मुबारक मीर अमजद अली था। छोटा सा क़द। नाक की फुंगी पर रुपहली एनक। मुंह में कुछ दांत और बाकी पान। जेब में घड़ी और घड़ी की ज़ंजीर में लटका हुआ क़ुतुबनुमा। आलम यह था हमारे इन मास्टर साहब का कि तशरीफ़ लाए, अंदर से उनके लिए चाय आ गई। वो नोश फ़रमाई। पान आ गए, वो मुंह में रख लिए। और फ़िर किताब सामने रखकर हम लगे झूमने और वो लगे ऊंघने।

कभी-कभी ऊघते-ऊंघते एक नारा बुलंद किया – आर ए टी – रैट, रैट मायने चूहा और फिर ऊंघ गए। अगर वो बिल्कुल सो गए तो हमने उनके चेहरे पर रोशनाई से कुछ गुल-बूटे बना दिए। और अगर वो जागते रहे तो हम स्लेट पर मु$र्गे की तस्वीर बनाते रहे। और मुंह से बकते रहे। आर ए टी – रैट, रैट माने चूहा। मगर फ़लक कज रफ़्तार (ज़ालिम आसमान) को हमारा यह स्वराज्य पसंद न आया। और एक दिन वालिद साहब ने निहायत हैरत से यह मंज़र देखा कि साहबज़ादे आंख मूंची धप खेल रहे हैं। चुनांचे मास्टर साहब दूसरे दिन ही हटा दिए गए।

वालिद साहब ने लोगों के कहने-सुनने में आकर आख़िर हमारा दाख़िला एलेक्ज़ेंड्रा हाई स्कूल जमात अतफ़ाल (कच्ची पहली जो अब केजी कहलाता है) में करा दिया। अब हम सियाह शेरवानी और नीले साफ़े में एक सिपाही के साथ एलेक्जेंड्रा हाई स्कूल जाने लगे। (शौकत थानवी – पुस्तक ‘मा बदौलत)

लेकिन अलेक्ज़ेंड्रा स्कूल जाने का यह सिलसिला भी ज़्यादा अरसे तक कायम न रह सका। मुंशी सिद्दीक़ अहमद वापस लखनऊ लौट गए। वहां पर भी पहली कोशिश घर पर ही तालीम दिलाने की हुई लेकिन काफ़ी वक़्त ज़ाया करने के बाद आख़िर एक स्कूल में दाख़िला दिलाया। छठी जमात के बाद दूसरे स्कूल में पहुंचा दिया गया, जहां तालीम का मैयार ज़रा बेहतर था।

ज़ाहिर है इन तमाम कोशिशों के पीछे मां-बाप की यह तमन्ना काम कर रही थी कि साहबज़ादे पढ़-लिख कर बाप से भी ऊंचे किसी ओहदे पर पहुंचे। कहते हैं कि आसमानों के राज़ ज़मीं पर भले ही ज़रा देर में खुलते हों लेकिन पालने से कूद निकले पूत अक्सर इन राज़दारियों के पर्दे अपने हाथ-पांव चलाकर और ज़रा-ज़रा इन पर्दों को हटाकर दे ही देते हैं। शौकत थानवी ने भी भरे-पूरे बचपन में ही अपनी हरकतों से आने वाले वक़्तों का नक्शा खेंच दिया था।

गवर्नमेंट हाई स्कूल, हुस्नाबाद के इन दिनों में ही पढ़ाई-लिखाई से भी ज़्यादा स्कूल में अपने उस्तादों की नकलें करना और सबको हंसाना उनका बेहद पसंदीदा मशग़ला था। ज़ाहिरा तौर पर उनके मास्टर और हेड मास्टर सैयद जीन अलाबाद अपनी नाराज़गी दिखाते लेकिन बाद को खुलकर हंसते और हूबहू नक़्ल करने की उमर की काबलियत की दाद भी देते। नतीजतन स्कूल के सालाना जलसे में ही उन्हें नकलों को दोहराने के लिए उसे बाकायदा मौका दिया जाता। लेकिन हंसी-ठठे का यह सिलसिला उमर के नवीं क्लास के बाद स्कूल छोड़ते ही ख़त्म हो गया।

अजब बात यह थी कि इसी उम्र में हंसी-ठठा, नक्काली के शौक के बीच में ही संजीदा शायरी की तरफ़ भी रुझान पैदा हो गया। अपनी इसी शायरी को बड़े शौक से स्कूल के अपने दोस्तों को सुना-सुना कर अपना रुतबा कायम कर लिया।

शौकत थानवी के रिश्ते के एक बड़े भाई थे अरशद थानवी जो ख़ुद भी एक अदीब थे। भोपाल वाले दिनों में उन्होने ही शौकत थानवी के लिए एक अदबी रिसाला ‘फूल’ का सालाना चंदा देकर पढऩे-लिखने का शौक़ पैदा किया था। जब वे लखनऊ पहुंचे और उन्हें पता लगा कि उनका छोटा भाई शायरी करने लगा है तो उन्हें एकदम यकीन न हुआ। लिहाज़ा उन्होने इम्तिहान की ग़रज़ से एक मिसरा देकर शेर पूरा कर दिखाने को कहा।

मिसरा यूं था;

 

सब चांद सितारे मांद हुए ख़ुर्शीद का नूर ज़हूर हुआ

शौकत थानवी ने इस मिसरे को पूरा किया तो शेर कुछ यूं बना।

सब चांद सितारे मांद हुए ख़ुर्शीद का नूर ज़हूर हुआ

ग़मनाक स्याही रात की थी अब इसका अंधेरा दूर हुआ

 

ज़ाहिर है बड़े भाई को बेहद ख़ुशी हुई। उन्होने शौकत से ग़ज़ल पूरी करवा के उसे छपने भेज दिया। एक बार जो ग़ज़ल छपी तो चस्का सा लग गया। फिर तो एक के बाद एक धड़ाधड़ ग़ज़लें रिसाला ‘तिरछी नज़र’ में छपती चली गईं। तब उन्होने अपना शेरी तख़ल्लुस पसंद किया ‘शौकत’। इस तरह पूरा नाम हो गया मोहम्मद उमर ‘शौकत’ थानवी।

इस तख़ल्लुस के चुनाव को लेकर भी थानवी जी ने अपनी एक पुस्तक ‘कुछ यादें, कुछ बातें’ में यूं बयान किया है।

”…मैने शौकत तख़ल्लुस क्यों रखा…बात ये कि जिस ज़माने में शायर बन रहा था, अली ब्रादरान और महात्मा गांधी का बड़ा नाम था। अब या तो मैं अपना तख़ल्लुस ‘गांधी’ रख सकता था, वरना अली ब्रादरान में से किसी का नाम अपने तख़ल्लुस के लिए मुंतख़िब (चुन) सकता था। मौलाना मुहम्मद अली के दोनो अजज़ा ( ) मुझे तख़ल्लुस के लिए मुनासिब नहीं मालूम हुए, अलबता मौलाना शौकत अली का शौकत मेरे दिल में उतर गया।”

शायरी के इस शुरूआती मरहले पर एक बेहद मज़ेदार किस्सा शौकत थानवी के दरपेश आया, जिसका बयान ख़ुद उन्होने किसी वक़्त रेडियो पर किया था। मेरे इल्म में यह किस्सा हाल ही में जारी हुई एक पुस्तक ‘शीश महल’ में जनाब मुश्ताक़ अहमद आज़मी के एक मज़मून की वजह से आया है।

”मेरी एक ग़ज़ल छप गई। कुछ न पूछिए मेरी ख़ुशी का आलम। मैंने वह रिसाला खोल कर एक मेज़ पर रख दिया था कि हर आने-जाने वाले की नज़र इस ग़ज़ल पर पड़ सके। मगर शामत एमाल कि सबसे पहले नज़र वालिद साहब की पड़ी। उन्होने यह ग़ज़ल पढ़ते ही ऐसा शोर मचाया कि गोया चोर पकड़ लिया हो। वालिदा मुहतरमा को बुलाकर कहा ‘आपके साहबज़ादे फ़रमाते हैं कि –

 

हमेशा ग़ैर की इज़्ज़त तेरी महफ़िल में होती है

तेरे कूचे में हम जाकर ज़लीलो-ख़्वार होते हैं

 

मैं पूछता हूं कि ये जाते ही क्यों हैं। किससे पूछ कर जाते हैं। वालिदा बिचारी सहम कर रह गईं और ख़ौफ़ज़दा आवाज़ में कहा, ‘ग़लती से चला गया होगा। मुख़्तसिर यह कि अब मैं शौकत थानवी बन चुका था। और अब कोई ताकत मुझे शौकत थानवी होने से बाज़ न रख सकती थी।”

1928 में वालिद साहब की मौत के बाद शौकत थानवी पर घर की ज़िम्मेदारी आन पड़ी। इसी ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए उन्होने एक उर्दू अख़बार; रोज़नामा ‘हमदम’ में नौकरी हासिल कर ली। उस वक़्त के नामवर अदीब सैयद जालिब देहलवी अख़बार के एडीटर थे। इसी नौकरी के दौरान उमर को मज़मून लिखने का चस्का लगा। वो अक्सर ताज़ा तरीन हालात पर मज़ाहिया किस्म के मज़ामीन लिखकर सैयद जालिब देहलवी की नज़रसानी के लिए पेश कर देते। अक्सर ही नतीजे में उनकी नीली स्याही से लिखी तहरीर सैयद साहब की लाल स्याही की ज़द्द में आकर सुर्ख हो जाती। लेकिन शौकत थानवी बनने को बेताब उमर मियां भी कहां हिम्मत हारने वाले थे। वे रोज़ लिखते और रोज़ ही इस्लाह के लिए उसे सैयद साहब के सामने पेश कर देते।

आखिऱ आने वाला वह दिन भी एक दिन आ ही गया जिस दिन शौकत थानवी का नाम मज़ाहनिगारों के फहरिस्त में बाकायदा शामिल होना था। सैयद साहब ने हुकुम फ़रमाया कि ‘हमदम’ के लिए शौकत थानवी अब से एक मज़ाहिया कालम ‘दो दो बातें’ लिखा करेंगे।

शौकत थानवी के लिए ‘दो दो बातें’ असल में ज़माने से ‘दो दो हाथ’ कर लेने की एक मनचली ख़्वाहिश का हक़ीक़ी शक्ल लेने जैसा था। लिहाज़ा उसे ज़ाया करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था और वह हुआ भी नहीं। थोड़े ही अर्से में उनके कालम ने उन्हे अपने सबसे बड़े आलोचक-उस्ताद सैयद जालिब देहलवी की दाद भी दिला दी।

‘दो दो बातें’ लिखने के साथ ही साथ शौकत थानवी ने उन दिनो दीगर रिसालों के लिए भी लिखना शुरू कर दिया। इसी सिलसिले में उनका एक अफ़साना ‘स्वदेशी रेल’ लाहौर के मशहूरो-मारूफ़ रिसाले ‘नैरंगे ख़याल’ के 1930 के सालनामे (वार्षिकी) में छपा और छपते ही सारे हिंदुस्तान में घर-घर की बात बनकर छा गया। उसे जिस क़दर पसंद किया गया और सराहा गया उतना ही उसका चर्चा भी हुआ। हालत यह हुई कि हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगाली बल्कि मुल्क की कमोबेश हर भाषा के अख़बारों और रिसालों ने उर्दू से इसका तर्जुमा करके एक लंबे अरसे तक इसे ख़ूब छापते रहे और शौकत थानवी के नाम और काम को घर-घर पहुंचाते रहे।

‘स्वदेशी रेल’ असल में मुल्क की असल आज़ादी से पूरे 17 साल पहले, आज़ादी के बाद बनने वाले हालात का खेंचा गया एक तसव्वुरी नक्शा है। इस नक्शे में हर चीज़ ग़फ़लत, बद-हवासी, बद-इंतिज़ामी और बेईमानी की ज़द्द में आकर आम आदमी (इस जगह रेल के मुसाफ़िर) किस तरह एक अफ़रा-तफ़री के माहौल में फ़ंसकर रह जाते हैं।

जैसा कि अक्सर होता है, वैसा इस मामले भी हुआ। ‘स्वदेशी रेल’ की इस हर बेमिसाल कामयाबी के बाद शौकत थानवी को दाद के साथ ही साथ कुछ मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। स्वराज की लड़ाई लडऩे वालों और उनके हमदर्दों में से एक तबके ने शौकत थानवी को अंग्रेज़ों का पिट्ठू कहकर उसकी निंदा की। इसके पीछे तर्क यह था कि शौकत थानवी इस तरह के ख़ाक़े पेश करके अवाम में अंग्रेज़ी सरकार के हक़ में और स्वराज के ख़िलाफ़ माहौल बना रहे हैं। बहरहाल, आज के हालात देखकर महसूस होता है कि गोया वक़्त ने शौकत थानवी की उस ख़ौफनाक तस्वीर के हक़ में ही फ़ैसला सुना दिया है।

शौकत थानवी को न जाने किस तरह आने वाले वक़्त का इल्हाम सो गया मालूम होता है, जिसके डर से वह ख़्वाबों के बहाने ज़हन में उगते ख़ौफ़नाक मंज़रों को अफ़सानों और शायरी की शक्ल में पेश करने में लगे थे। इसकी एक और मिसाल उनकी एक नज़्म है – ”ख़्वाबे-आज़ादी।” इस नज़्म को पढ़कर ही आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि शौकत थानवी असल आज़ादी से पहले ही आज़ादी के ख़याल ही से किस तरह ख़ौफ़ खाए हुए थे।

 

अपनी आज़ादी का देखा ख़्वाब मैने रात को

याद करता हूं मैं अपने ख़्वाब की हर बात को

मैने यह देखा कि मैं हर क़ैद से आज़ाद हूं

यह हुआ महसूस जैसे ख़ुद मैं ज़िंदाबाद हूं

जितनी थी पाबंदियां, वो ख़ुद मेरी पाबंद हैं

वह जो माई-बाप थे हाकिम, वो सब फ़र्ज़ंद हैं    (फ़र्ज़ंद-बेटा)

मुल्क अपना, क़ौम अपनी, और सब अपने ग़ुलाम

आज करना है मुझे आज़ादियों का एहतराम

जिस जगह लिखा है ”मत थूको”, मैं थूकूंगा ज़रूर

अब सज़ावार-ए-सज़ा होगा न कोई क़सूर

इक ट्रेफिक के पुलिस वाले की कब है यह मजाल

वो मुझे रोके, मैं रुक जाऊं, यही है ख़्वाबो-ख़याल

मेरी सड़कें हैं तो मैं जिस तरह से चाहूं, चलूं

जिस जगह चाहे रुकूं, और जिस जगह चाहे मरूं

साईकल में रात को बती जलाऊं किसलिए ?

नाज़ इस क़ानून का आख़िर उठाऊं किसलिए ?

रेल अपनी है तो आख़िर क्यों टिकिट लेता फिरूं

कोई तो समझाए मुझको यह तकक्लुफ़ उठाऊं किसलिए

क्यों न रिश्वत लूं कि जब हाकिम हूं मैं सरकार का

थानवी हरगिज़ नहीं हूं, अब मैं थानेदार हूं

घी में चर्बी के मिलाने की है आज़ादी मुझे

अब डरा सकती नहीं गाहक की बरबादी मुझे

 

‘स्वदेशी रेल’ की बेपनाह मक़बूलियत से दूसरी मुश्किल जो शौकत थानवी के दरपेश आई वह थी ख़ुद को दोहराने का कारोबारी दबाव। मुल्क भर के तमाम अखबारात और रिसालों ने शौकत थानवी से ‘स्वदेशी रेल’ की तर्ज़ पर दुनिया की हर चीज़ को ‘स्वदेशी’ के साथ जोड़कर पेश करें।

”स्वदेशी रेल की मक़बूलियत के बाद जिसको देखिए वह हमसे यही मुतालिबा करता की कोई स्वदेशी चीज़ लिख दो। और तो और खुद एडीटर ‘नैरंगे खयाल’ ने ‘स्वदेशी रेल’ का दूसरे हिस्से का मुतालिबा किया। हमने इन तमाम फरमाइशों की तामील कर दी। मगर इनमे किसी मे वह बात पैदा न हो सकी। दरअसल मज़ामीन का लिखना ही हमारी ग़लती थी मगर यह बात उस वक़्त न हम खुद समझ सके न कोई हमको समझा सका। अब पढऩे वाले हमसे ‘स्वदेशी रेल’ तलब नहीं कर रहे बल्कि उससे आगे कुछ मांग रहे हैं।” (शौकत थानवी)

इसी कामयाबी के बीच ‘हमदम’ ने दम तोड़ दिया। शौकत थानवी को एक बार फिर रोज़गार की तलाश में भटकना पड़ा। इसी तलाश के नतीजे में इस बार वह जा पहुंचे मुंशी नवल किशोर के ‘अवध अख़बार’ के दफ़्तर। इस वक़्त वहां एक असिस्टेंट एडीटर की जगह ख़ाली थी। इस ख़ाली जगह को शौकत थानवी ने भर दिया। उनकी दीगर ज़िम्मेवारियों के साथ ही साथ ‘हमदम’ वाला उनका मशहूर कालम ‘दो दो बातें’ लिखना भी शामिल था।

इस मकाम तक आते-आते शौकत थानवी अपने दौर के बेपनाह मशहूर अदीबों में शुमार होने लगे थे। शायरी का रियाज़ उनके उस्ताद मौलाना अब्दुल बारी ‘आसी’ की निगहबानी में चल ही रहा था उस पर ‘स्वदेशी रेल’ जैसे कारनामों से उनका नाम एक नई ऊंचाई दे डाली थी। मुशायरों में बुलाए जाते तो अपनी पाएदार आवाज़ और पढऩे के एक ख़ास अंदाज़ की वजह से अक्सर महफ़िल लूट ले जाते।

इस क़दर बड़ी कामयाबी मिलने पर अक्सर इंसान के बहकने का ख़तरा बना रहता है। शौकत थानवी भी इस बला से पूरी तरह बच न सके। उन्होने नसीम अनहोनवी जैसे कुछ दोस्तों के साथ मिलकर ख़ुद का एक हफ़्तावार अख़बार शुरू किया। उस दौर के कामयाब तरीन ‘अवध पंच’ की  तर्ज़ पर नाम रखा ‘सरपंच’। यह कोशिश काफ़ी हद तक कामयाब तो थी शायद उस क़दर नहीं जिस क़दर सोचा गया था। आख़िर एक साल के बाद ‘सरपंच’ भी बंद हो गया।

इससे भी दिल नहीं भरा तो 1936 में उत्तर प्रदेश के ब्रिटिश हुकूमत के तरफ़दार  ज़मींदारों की माली इमदाद लेकर एक बार फिर अख़बार शुरू किया। इस बार यह एक रोज़नामा था जिसका नाम था ‘तूफ़ान’। नतीजा एक बार फिर वही निकला। एक साल बाद यह अख़बार भी बंद करना पड़ा।

हालांकि इन तमाम मिसएडवेंचर्स के बीच भी शौकत थानवी के लिखने की रफ़्तार बराबर कायम रही। धड़ाधड़ एक के बाद एक किताबें मंज़रे आम पर आती रहीं और बाकायदा कामयाब होती रहीं। मज़ाहिया अफ़सानों और मज़ामीन की किताबों की एक सीरीज़ ‘मौजे तब्बसुम’, ‘सैलाबे तब्बसुम’, ‘तूफ़ाने तब्बसुम’ और ‘बहरे तब्बसुम’ एक के बाद एक जिस रफ़्तार से बुक स्टाल्स तक पहुंच रही थीं उसी तेज़ रफ़्तारी से शेल्फ़ से ग़ायब भी होती जातीं।

शौकत थानवी की इस सीरीज़ के सिलसिले में उनके एक दोस्त प्रोफ़ेसर रशीद अहमद सिद्दीक़ी ने एक किस्सा बयान किया है। कहते हैं कि इस ‘तब्बसुम’ वाली सीरीज़ के दौर में ही शौकत थानवी ने उनसे फ़रमाइश की कि वो उनकी नई किताब का कोई नाम तजवीज़ करें। ”…इतिफ़ाक़ से उस ज़माने में मेरा गुज़र चांदनी चौक से देहली मेें हुआ. एक जगह साईन बोर्ड पर नज़र पड़ी ‘चप्पल ही चप्पल’, मैं उछल पड़ा…. मैने फ़ौरा ही शौकत साहब को लिखा कि ‘तब्बसुम ही तब्बसुम’ कैसा रहेगा लेकिन शौकत साहब ने ‘दुनिया-ए-तब्बसुम’ मौज़ूं समझा। मैं क्या करता अपना सा मुंह लेकर रह गया।”

शौकत थानवी के बारे में जानने लायक एक बेहद अहम बात यह है कि वो कमाल के लिखाड़ इंसान थे। लिखने बैठते तो उनकी रफ़्तार तूफ़ानों की रफ़्तार को ललकारती हुई सी होती। उस पर तुर्रा यह कि एक बार जो लिख दिया सो लिख दिया उसे दूसरी बार नज़र भर देखने की ज़हमत भी न उठाते। और कमाल यह कि इस रफ़्तार में भी उनके लिखे किसी भी पन्ने पर एक लफ़्ज़ की भी कांट-छांट न होती।

उनके स्कूली दौर के एक दोस्त ग़ुलाम अहमद ‘फ़ुर्कत’ ने एक दिलचस्प किस्सा बयान किया है। इससे पहले कि मैं उनका बयान पेश करूं, शौकत थानवी के किरदार की एक बेहद अहम बात बयान कर दूं। वह यह कि उन्हें ताश के खेल से बड़ा लगाव था। अपनी तमाम मसरूफ़ियात के बीच भी इस खेल के लिए वक़्त ज़रूर निकालते थे। ‘फ़ुर्कत’ साहब के इस बयान में भी ताश के खेल का ज़िक्र शामिल है।

”एक रोज़ शौकत मुस्तफ़ा मंज़िल (लखनऊ) में रमी खेल रहे थे कि लाहौर के एक बहुत बड़े पब्लिशर ने एक ख़ास नुमाइंदा भेजकर शौकत से फ़रमाइश की कि वह तीन रोज़ के भीतर-भीतर एक-डेढ़ सौ पेज का उपन्यास लिखकर भेज दें। शौकत ने खेलते ही में उनसे वादा कर लिया कि परसों शाम को रवानगी से पहले आपको सामग्री मिल जाएगी। जो लोग खेल रहे थे, उन्होने कहा कि क्या कोई उपन्यास लिख रखा है जो तुमने वादा कर लिया। बोले – नहीं, डेढ़ सौ पन्नों की ही तो बात है। कल का पूरा दिन पड़ा है। हो जाएंगे।” जब वह साहब चले गए तो शौकत ने डाक्टर साहब से कहा – ”यार ! दूसरे कमरे में एक टेबल-लैंप रखवा दो।” आप यकीन मानिए तीसरे दिन जब वह पब्लिशर का नुमाइंदा जाने को हुआ तो शौकत ने फुल-स्केप के 50 पेज दोनो तरफ़ बारीक से हरूफ़ में लिखे हुए उसके हवाले करते हुए पांच सौ रुपए का चेक उससे ले लिया।

यह एक हक़ीक़त है कि वह बला के ज़हीन और तेज़ दिमाग़ वाले थे कि जब कोई अफ़साना या मज़मून लिखने बैठते तो यों लगता जैसे उनकी कलम कोई लिखा-लिखाया सबक सुनाती जा रही है। फिर न वो अपने लिखे तो दुहराते और न उसमे किसी किस्म की तरमीम (संशोधन) करते।”

शौकत थानवी के सिलसिले में क़ाबिले-दाद बात यह है कि उनके अफ़साने में ‘स्वदेशी रेल’ की रफ़्तार चाहे जितनी बुरी रही हो उनके लिखने की रफ़्तार और उनका मैयार दोनो में बेमिसाल इज़ाफ़ा होता रहा। जहां शुरूआती तौर पर उनकी लेखनी में तंज़ का एक मद्धम सा रिसाव दिखाई देता है वहीं बाद के सालों में वह उबूर हासिल कर लिया कि यह कमोबेश हर जुमले में नज़र आने लगता है।

मसलन भोपाल से तालुक़ रखने वाले उर्दू के एक पुराने शायर सुहा मुजद्दिदी पर लिखा उनका लिखा ख़ाक़ा। ज़रा इस अंदाज़े बयां की सिफ़त देखिए, मालूम होता है कि एक इंसान हर लफ़्ज़ के साथ लगातार हमारी नज़रों के सामने जिस्मानी शक्ल में आ खड़ा हुआ है।

”हिंदुस्तान के जितने बड़े, उतने ही छोटे शायर।

बचपन से नाम सुनते आते थे। कलाम सुनकर झूमते थे और मिलने को दिल चाहता था। आख़िर अजीबो-ग़रीब तरीके पर मुलाक़ात हो गई। नाम बताने की ज़रूरत नहीं। बहरहाल हम एक जगह हम इसलिए बुलाए गए थे कि हमारी ग़ज़लों के दो रिकार्ड भर कर उनकी प्रूफ़ कापी आती होती थी और मक़सद यह था कि हम भी सुन लें। चुनांचे वह रिकार्ड सुनते रहे। रिकार्ड सुनने के बाद ग्रामोफ़ोन बंद जो किया गया तो ढकने के बंद होने के बाद पता चला कि उस तरफ़ एक साहब बैठे हुए थे, जो इतने मुख़्तसिर थे कि ग्रामोफ़ोन के ढकने की वजह से नज़र न आ सके। तारुफ़ कराया गया कि आप ही मौलाना सुहा हैं।”

अब ज़रा ग़ौर करें कि शौकत थानवी किस तरह इस शख़्स, जिसे वे बचपन से मिलना चाहते थे, के जिस्म से आगे बढ़कर उस जिस्म के अंदर मौजूद सलाहियतों का ज़िक्र किस तरह करते हैं।

”क़ुदरत ने इतने से जिस्म में सभी कुछ मुहैया कर दिया है। मगर दिमाग़ जिस्म की तनासुब से (तुलना में) बहुत बड़ा अता किया है। अदब उर्दू में मौलाना को बहुत बड़ा दर्जा हासिल है…. मौलाना की अदाएं बाज़ औक़ात इतनी दिलकश होती हैं कि इनसे खिलौने की तरह खेलने को दिल चाहता है। और कभी-कभी मौलाना ऐसे क़ाबू से बाहर हो जाते हैं कि समझ में नहीं आता कि इनको क्योंकर संभाला जाए।”

शौकत थानवी बड़े बाग़ो-बहार इंसान थे। ज़ाती ज़िंदगी में भी उनका अंदाज़े गुफ़्तगू पुर-कशिश और पुर-लुत्फ़ होता था। फिर वो महफ़िल दोस्तों की हो या कोई अदबी नशिस्त। और तो और अंजाने लोगों के बीच भी उनका यही किरदार बना रहता था। इस सिलसिले में उनके कई लतीफ़े मशहूर हैं।

एक मर्तबा शौकत थानवी एक किताब फ़रोश की दुकान पर उसके साथ बैठे थे। तभी एक ग्राहक ने शौकत थानवी की एक किताब पसंद करके ख़रीद ली। दुकानदार ने चुटकी लेते हुए ग्राहक से कहा – ”आपने जिस लेखक की किताब ख़रीदी है यह वही साहब हैं। सूरत से चाहे जितने बेवक़ूफ़ दिखते हों लेकिन उतने बिल्कुल भी नहीं हैं।

शौकत थानवी ने बिना परेशान हुए ग्राहक को समझाया – ”मुझमें और मेरी किताबें बेचने वालों में यही बुनियादी फ़र्क है। यह जितने बेवक़ूफ़ है, सूरत से उतने बिल्कुल नज़र नहीं आते।”

इसी तरह जब वो एक बार रेल में अपनी बीबी के साथ सफ़र कर रहे थे तो अपने कम्पार्टमेंट में पहुंच कर देखा कि ऊपर के बर्थ पर एक बेहद मोटा सा आदमी पहले से ही मौजूद था। वे अपनी सीट से उठकर खड़े हुए और उस मोटे शख़्स को बड़े ग़ौर से देखते रहे। फ़िर उसे देखते-देखते ही धीरे से कुछ बुदबुदाए।

मोटे मुसाफ़िर ने सवाल किया कि क्या वो उससे कुछ कह रहे थे? शौकत थानवी ने जवाब में फ़रमाया – ‘जी आप ही से मुख़ातिब था। मैं पूछ रहा था कि आपकी नज़र में कोई लड़की है?

मोटे ने हैरत से पूछा – ”क्यों?”

जवाब मिला – ”जी मैं उससे शादी करना चाहूंगा।”

मोटे ने उनकी बीबी की तरफ़ देखते हुए कहा – ”मगर आपकी बीबी तो आपके साथ है।”

शौकत थानवी ने आख़िरी वार करते हुए जवाब दिया – ”फिलहाल तो है। लेकिन मेरा अंदाज़ है कि अगर आपने नीचे उतरने की कोशिश की तो गिरेंगे ज़रूर। और गिरेंगे भी मेरी बीबी के ऊपर। ऐसे में उसका शहीद होना तो यकीनी है। इसलिए सोचा आप ही से मदद लेकर पहले ही दूसरा इंतज़ाम कर लूं।

ज़ाहिर है जवाब पर मोटे मुसाफ़िर के अलावा तमाम मुसाफ़िर दिल खोलकर हंसे और उस वज़नदार मुसाफ़िर ने नीचे उतरने की कोई कोशिश ही नहीं की।

बात भले ही लतीफे के तौर पर कही गई हो लेकिन असल ज़िंदगी में शौकत थानवी ने दूसरी बीबी वाला कारनामा कर दिखाया था। उनकी पहली बीवी अर्शे मुनीर एक बड़े आला और मज़बूत किरदार की औरत थीं। रेडियो पाकिस्तान और पाकिस्तान टी.वी. की बेहद मशहूर सदाकारा और अदाकारा के तौर पर याद की जाती हैं। अपनी तलाक़शुदा ज़िंदगी में तमाम जद्दो-जहद के साथ अपने वक़ार को कायम रखा। बच्चों को अकेले दम पर पाला। उनका एक बेटा रशीद उमर थानवी टीवी का मशहूर अदाकर होने के साथ ही साथ पाकिस्तान टीवी के यादगार सीरियल ‘ख़ुदा की बस्ती’ के प्रोड्यूसर भी थे। यह सीरियल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, जमीलुद्दीन आली और ‘ख़ुदा की बस्ती’ के लेखक शौक़त सिदीक़ी की निगरानी में बनाया गया था।

रेडियो और टीवी से इस ख़ानदान का असल रिश्ता शौकत थानवी की वजह से ही कायम हुआ था। अख़बारों और रिसालों में नौकरी और फ़िर मालकियत के तजुर्बों के बाद आल इंडिया रेडियो, लखनऊ में बाकायदा नौकरी कर ली। उनकी कलम के पैनेपन से यहां भी उनको कामयाबी मिली और उनकी शोहरत में इज़ाफ़ा किया। यहां रहते हुए उन्होने नवाबी रहन-सहन, शान-ओ-शौकत भरी ज़िंदगी और उनकी हास्यासपद हरकतों को निशाना बनाते हुए बाकायदा एक सीरीज़ कर डाली। इसके नतीजे में उन पर हमले भी हुए।

दूसरी बड़ी जंग के दौरान उत्तर प्रदेश में चीफ़ पब्लिसिटी आफ़ीसर भी रहे। लेकिन यह भी एक मुख़्तसिर से वक़्त के लिए। अब उनके लाहौर जाने की बारी थी। शौकत थानवी को इस तरह लाहौर खेंचकर ले जाने जाने वाले शख़्स का नाम था इम्तियाज़ अली ‘ताज’। इम्तियाज़ अली ‘ताज’ उस दौर के बेहद मक़बूल अदीब, ड्रामानिगार और अदाकार थे। उर्दू में उनकी पहचान ‘चचा छक्कन’ से और बकाया दुनिया में ‘अनारकली’ के लेखक के तौर पर है। वे बंटवारे से पहले और बाद भी फ़िल्मी दुनिया से जुड़े रहे। 1943 में उन्होने अपने ही साथ शौकत थानवी को दलसुख पंचोली के पंचोली आर्ट पिक्चर्स में आने के लिए राज़ी किया।

फिर 1947 में बंटवारा हुआ तो उन्होने पाकिस्तान में ही रहने का फ़ैसला किया। पाकिस्तान में रेडियो पाकिस्तान, लाहौर से वाबस्ता हो गए। इस जगह एक बार फ़िर इम्तियाज़ अली ‘ताज’ की सलाह पर उन्होने एक रेडियो प्रहसन की सीरीज़ ‘क़ाज़ी जी’ लिखा, जो बेहद मक़बूल हुआ। यह प्रहसन 1947-48 में प्रोग्राम ‘पाकिस्तान हमारा है’ के तहत हर रोज़ रात आठ बजे से साढ़े आठ बजे के बीच प्रसारित होता था।

पाकिस्तान में कुछ अर्से अख़बार रोज़नामा ‘जंग’ में नौकरी करने के बाद फ़िल्मों के लिए भी लिखते रहे। 1953 में ‘ख़ानदान'(42), ‘ज़ीनत'(45) और ‘जुगनू’ (47) जैसी फ़िल्मों के डायरेक्टर शौकत हुसैन रिज़वी ने शौकत थानवी की एक कहानी पर फिल्म ‘गुलनार’ प्रोड्यूस करने का ऐलान किया। इस फ़िल्म के डायरेक्टर के तौर पर शौकत थानवी के दोस्त इम्तियाज़ अली ‘ताज’ मौजूद थे। फ़िल्म में शौकत थानवी, जो रेडियाई ड्रामों में ज़माने से काम करते रहे थे, ने पहली बार ख़ुद भी एक किरदार अदा किया था। इससे पहले 1943 में पंचोली आर्ट के लिए बतौर लेखक और 1948 की फ़िल्म ‘बरसात की एक रात’ के लिए कुछ गीत ज़रूर लिखे थे।

‘गुलनार’ में हालांकि मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहां मौजूद थीं और मास्टर ग़ुलाम हैदर का संगीत था फिर भी फ़िल्म बहुत कामयाब न हो पाई। लेकिन शौकत थानवी इस मकाम तक आते-आते कामयाबियों और नाकामियों से मुतासिर होने वाले दौर से काफ़ी आगे निकल आए थे। लिहाज़ा उन्होने फिर से कलम का ज़ोर आज़माया और बड़ी कामयाबी से लिखते हुए 4 मई 1963 को इस दुनिया से कूच करने से पहले कोई 60 किताबों को अपनी नज़रों के ही सामने धड़ले से बिकते हुए देख गए।

पिछली पचास और साठ की दहाई में एक रुपए वाली पाकेट बुक्स के दौर में शौकत थानवी हिंदी में भी ख़ूब छपे और ख़ूब बिके। इसी दौर में उर्दू के अनेक लेखकों को हिंदी ने अपनी भाषा के लेखक की तरह पूरे अदब और एहतराम से एक इज़्ज़त का मकाम दिया।

(सौजन्य: ‘पहल’ एप्रील2016)

دل سے اتر جائے گا۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔احمد فراز

Faraz

آزادئ ہند میں اردو زبان کا کردار۔۔۔۔۔۔۔فضل اللہ سیف اللہ

وقت اشاعت: Wednesday 10 August 2016 10:41 pm IST Asia Times Urdu

فضل اللہ سیف اللہ

 یہ بات مکمل طور پر عیاں ہے کہ ہر قوم اپنا اظہارخیال اپنی زبان کے ذریعے کرتی ہے.اس سلسلے میں ہماری مادری زبان اردو نے بھی ہندوستان کی جنگ آزادی میں بہت اہم رول ادا کیا ہے۔ جب ہمارا ملک غلامی کی زنجیروں میں جکڑا ہوا تھا،اس دوران سرزمین ہند نے اپنی کوکھ سے بے شمار شاعروں, ادیبوں اور سیاست دانوں کو جنم دیا.اس کی بدولت ہندوستانیوں میں نئے جوش اور ولولے جنم لیے اور پھر انہوں نے ہندوستان کی آزادی کے لئے اپنی شاعری اور شعلہ بار تقریروں سے غلامی کی زنجیروں سے ہمیں آزادی دلانے میں اہم کردار ادا کیا.

        شاعروں اور ادیبوں کی پرجوش تحریروں نے ہندوستانی لوگوں کے ذہنوں کو یکسر بدل ڈالا۔ سرسید احمد خاں, مولانا ابوالکلام آزاد, علامہ اقبال, مولانا محمد علی جوہر, حسرت موہانی, نظیر اکبر آبادی یہ تمام انیسویں صدی کے جانباز ہیں جنہوں نے بیسویں صدی کے اثرات مرتب کیے۔

       سرسید احمد خاں کو ہندوستان کی تاریخ میں مسلمانوں کے قائدین میں شمار کیا جاتا ہے۔ سرسید نے اپنے ملک میں اتحاد برقرار رکھنے کی خاطر اور ہندوستانیوں میں آزادی کی روح پھونکنے کے لئے مختلف رسالے اور اخبارات شائع کیے۔ جن میں ان کے معروف رسالہ “تہذیب الاخلاق” کو کافی اہمیت حاصل ہوئی جو اردو کی صحافتی, ادبی اور تاریخی دنیا میں ایک سنگ میل کی حیثیت رکھتا ہے۔ ہندوستان کی آزادی کی خاطر ہمارے ان رہنماؤں نے اپنے مختلف رسالوں اور مضامین کے ذریعے وہ خدمات انجام دی ہیں جو ہمیشہ اور ہر زمانہ میں قدر کی نگاہ سے یاد کی جائیں گے. ہزاروں ان مسلم جانبازوں و سر فروشوں کو جنھوں نے گلشن آزادی کی لہلہاہٹ کے لئے سر زمین ہند پر اپنے پاکیزہ خون سے آبیاری کی تھی، فراموشی کی کھائیوں میں گرادینے کے باوجود آج بھی جنگ آزادی میں اردو کا کردار روز روشن کی طرح تابناک اور جمہوریہ ہند پر سایہ فگن ہے اور جب تک ہندوستان رہےگا اس کے معتبر نام تاریخ ہند کے افق پر مثل سورج پوری آب وتاب کے ساتھ روشن رہیں گے.

        اس سلسلے میں چند رسالے اور اخبارات جیسے “البلاغ” اور “الہلال” جس کے مدیرعظیم سیاسی شخصیت اور قومی یکجہتی کے علمبردار مولانا ابو الکلام آزاد تھے, “ہمدرد” کے مدیر مولانا محمد علی جوہر اور “زمیندار” کے مولانا ظفر علی خان مدیر تھے . یہ تمام رسالے اور اخبارات اس وقت سب سے بڑے فتنے فرنگیت کے بڑھتے ہوئے سیلاب کا ڈٹ کر مقابلہ کررہے تھے اور ان کے علاوہ بھی انہوں نے اپنے مضامین شائع کرکے جنگ آزادی میں اپنا اہم رول ادا کیا.

     علامہ اقبال پر حب الوطنی کا جذبہ مکمل طور پر غالب تھا۔ ان کی حب الوطنی کا اظہار ان کی نظم “ہمالہ ،صدائے درد، “ترانہء ہندی” اور “شوالہ” سے خوب خوب ہوتا ہے.

        منشی پریم چند کی افسانہ نگاری نے بھی اس سلسلے میں نہایت اہم کردار ادا کیا ہے۔ انہوں نے حب الوطنی کے جذبے سے سرشار ہوکر ایک افسانہ “رموز وطن” قلم بند کیا۔ اس طرح یہ حقیقت عیاں ہوجاتی ہے کہ ملک کی آزادی کے لئے اردو زبان نے مخلص رہنماؤں اور بزرگوں کے ذریعے محنت و لگن کے ساتھ ملک اور قوم کی خوب خدمات انجام دی ہیں. جس طرح آزادی حاصل کرنے میں ہمارے رہنما پیش پیش رہے اسی طرح اپنی زبان کی اہمیت کو بھی انہوں نے برقرار رکھا.اس وقت “زبان اردو ” کسی عصبیت کی شکار نہیں ہوئ تھی. وہ تو بس ملک کی زبان سمجھی جاتی تھی.

     مگر آہ…..!  جس زبان نے آزادی کی فضا میں سانسیں لینامقدر کیا،آج وہی زبان تعصب و تنگ نظری کی بهینٹ چڑهہ چکی ہے. بقول شاعر :

ظلم اردو پہ ہوتا ہے اور اس نسبت سے

لوگ اردو کو مسلماں سمجھ لیتے ہیں.

       لیکن خیر !! یہ تو دنیا کی بڑی مجاہد زبان ثابت ہوئی  ہے اور ہورہی ہے. انگریزوں کی بربریت سے نبرد آزما ہونے کا معاملہ ہو یا پهر آزادی کے بعد اپنوں سے ہی زخم کهانے کی بات ہو. اردو پورے استحکام  کے ساتهہ اپنے ولولہ انگیز عزم کا ببانگ دہل اعلان کرتی ہے اور کہتی ہے کہ :

اردو کہتی ہے کس سے کینہ ہے مجهے

ہر قوم کا ہر لفظ نگینہ ہے مجهے

میں جام شہادت تو پیوں گی لیکن

اس دور میں شہید ہوکے جینا ہے مجهے

         اگر ہم اپنی شناخت قائم رکھنا چاہتے ہیں تو ہمیں اپنی زبان کی بھی قدر کرنی ہوگی اور اس کی اہمیت و ضرورت کو عام کرنا ہوگا،کیونکہ اردو زبان کی ترقی میں ہی ہماری ترقی اور پہچان چھپی ہے. اقبال کے استاذ شاعر داغ دہلوی نے کہاتها:

اردو ہے جس کا نام ہمیں جانتے ہیں داغ

سارے جہاں میں دھوم ہماری زباں کی ہے

      “اردو زبان” یہی وہ زبان ہے جس نے تحریک آزادی میں روح پھونکنے کا کام کیا تھا.

“إنقلاب زندہ باد!” 

یہ نعرہ کسے یاد نہیں؟ مگر حیف! یہ یاد نہیں کہ یہ نعرہ اردو زبان کی ہی دین ہے.

     آؤ مل کر ایک بار پھر سے سبهوں کو یہ إحساس دلائیں :

اردو زندہ باد!

        انقلاب زندہ باد!

              ہندوستان زندہ باد!

راگھونگر بھوارہ

مدھوبنی (بہار)

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आज़ाद ई हिंद में उर्दू ज़बान का किरदार……फ़ज़ल अल्लाह सैफ-अल्लाह(एसियन टाईम्सउर्दू)

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वक़्त इशाअत: Wednesday 10 August 2016 10:41 pm IST Asia Times Urdu

फ़ज़ल अल्लाह सैफ-अल्लाह(एसियन टाईम्सउर्दू)

ये बात मुकम्मल तौर पर अयाँ है कि हर क़ौम अपना इज़हार-ए-ख़याल अपनी ज़बान के ज़रीये करती है.इस सिलसिले में हमारी मादरी ज़बान उर्दू ने भी हिन्दोस्तान की जंग-ए-आज़ादी में बहुत अहम रोल अदा किया है। जब हमारा मुल़्क गु़लामी की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था,इस दौरान सरज़मीने हिंद ने अपनी कोख से बेशुमार शाइरों, अदीबों और सियासतदानों को जन्म दिया.इस की बदौलत हिंदूस्तानियों में नए जोश और वलवले जन्म लिए और फिर उन्होंने हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए अपनी शायरी और शोला-बार तक़रीरों से गु़लामी की ज़ंजीरों से हमें आज़ादी दिलाने में अहम किरदार अदा किया.

शाइरों और अदीबों की पुरजोश तहरीरों ने हिन्दुस्तानी लोगों के ज़हनों को यकसर बदल डाला। सर सय्यद अहमद ख़ां, मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद, अल्लामा इक़बाल, मौलाना मुहम्मद अली जोहर, हसरत मोहानी, नज़ीर अकबराबादी ये तमाम उन्नीसवीं सदी के जाँबाज़ हैं जिन्हों ने बीसवीं सदी के असरात मुरत्तिब किए।

सर सय्यद अहमद ख़ां को हिन्दोस्तान की तारीख़ में मुस्लमानों के क़ाइदीन में शुमार किया जाता है। सर सय्यद ने अपने मुल्क में इत्तिहाद बरक़रार रखने की ख़ातिर और हिंदूस्तानियों में आज़ादी की रूह फूँकने के लिए मुख़्तलिफ़ रिसाले और अख़बारात शाय किए। जिनमें उनके मारूफ़ रिसाला “तहज़ीब उल-ईख़लाक़” को काफ़ी एहमीयत हासिल हुई जो उर्दू की सहाफ़ती, अदबी और तारीख़ी दुनिया में एक संग-ए-मील की हैसियत रखता है। हिन्दोस्तान की आज़ादी की ख़ातिर हमारे उन रहनुमाओं ने अपने मुख़्तलिफ़ रिसालों और मज़ामीन के ज़रीये वो ख़िदमात अंजाम दी हैं जो हमेशा और हर ज़माना में क़दर की निगाह से याद की जाऐंगे. हज़ारों इन मुस्लिम जाँबाज़ों-ओ-सर फ़रोशों को जिन्होंने गुलशन आज़ादी की लहलहाहट के लिए सरज़मीन हिंद पर अपने पाकीज़ा ख़ून से आबयारी की थी, फ़रामोशी की खाइयों में गिरा देने के बावजूद आज भी जंग-ए-आज़ादी में उर्दू का किरदार रोज़-ए-रौशन की तरह ताबनाक और जमहूरीया हिंद पर साया-फ़गन है और जब तक हिन्दोस्तान रहेगा उस के मोतबर नाम तारीख़ हिंद के उफक़ पर मिसले सूरज पूरी आब व ताब के साथ रोशन रहेंगे.

इस सिलसिले में चंद रिसाले और अख़बारात जैसे “अलबलाग़” और “अलहिलाल” जिसके मुदीर अज़ीम सयासी शख़्सियत और क़ौमी यकजहती के अलमबरदार मौलाना अब्बू उल-कलाम आज़ाद थे, “हमदरद” के मुदीर मौलाना मुहम्मद अली जोहर और “ज़मींदार” के मौलाना ज़फ़र अली ख़ान मुदीर थे . ये तमाम रिसाले और अख़बारात उस वक़्त सबसे बड़े फ़ित्ने फ़रनगीत के बढ़ते हुए सेलाब का डट कर मुक़ाबला कर रहे थे और उनके इलावा भी उन्होंने अपने मज़ामीन शाय करके जंग-ए-आज़ादी में अपना अहम रोल अदा किया.

अल्लामा इक़बाल पर हुब्ब-उल-व्तनी का जज़बा मुकम्मल तौर पर ग़ालिब था। उनकी हुब्ब-उल-व्तनी का इज़हार उनकी नज़म “हिमाला ,सदा-ए-दर्द, “तराना-ए-हिन्दी” और “शिवाला” से ख़ूब ख़ूब होता है.

मुंशी प्रेम चंद की अफ़साना निगारी ने भी इस सिलसिले में निहायत अहम किरदार अदा किया है। उन्होंने हुब्ब-उल-व्तनी के जज़बे से सरशार हो कर एक अफ़साना “रमूज़ वतन” क़लम-बंद किया। इस तरह ये हक़ीक़त अयाँ होजाती है कि मलिक की आज़ादी के लिए उर्दू ज़बान ने मुख़लिस रहनुमाओं और बुज़ुर्गों के ज़रीये मेहनत-ओ-लगन के साथ मलिक और क़ौम की ख़ूब ख़िदमात अंजाम दी हैं. जिस तरह आज़ादी हासिल करने में हमारे रहनुमा पेश पेश रहे इसी तरह अपनी ज़बान की एहमीयत को भी उन्होंने बरक़रार रखा.इस वक़्त “ज़बान उर्दू ” किसी असबीयत की शिकार नहीं होई थी. वो तो बस मलिक की ज़बान समझी जाती थी.

मगर आह…..! जिस ज़बान ने आज़ादी की फ़िज़ा में साँसें लेना मुक़द्दर क्या,आज वही ज़बान तास्सुब-ओ-तंगनज़री की बेईनट चड़ेआ चुकी है. बाक़ौल शायर :

ज़ुलम उर्दू पे होता है और इस निसबत से

लोग उर्दू को मुसलमाँ समझ लेते हैं.

लेकिन ख़ैर !! ये तो दुनिया की बड़ी मुजाहिद ज़बान साबित हुई है और हो रही है. अंग्रेज़ों की बरबरीयत से नबर्द-आज़मा होने का मुआमला हो या पैर आज़ादी के बाद अपनों से ही ज़ख़म केआने की बात हो. उर्दू पूरे इस्तिहकाम के सातेआ अपने वलवला अंगेज़ अज़म का बबानग दहल ऐलान करती है और कहती है कि :

उर्दू कहती है किस से कीना है मुझे

हर क़ौम का हर लफ़्ज़ नगीना है मुझे

मैं जाम-ए-शहादत तो पियूँगी लेकिन

इस दौर में शहीद होके जीना है मुझे

अगर हम अपनी शनाख़्त क़ायम रखना चाहते हैं तो हमें अपनी ज़बान की भी क़दर करनी होगी और इस की एहमीयत-ओ-ज़रूरत को आम करना होगा,क्योंकि उर्दू ज़बान की तरक़्क़ी में ही हमारी तरक़्क़ी और पहचान छपी है. इक़बाल के उस्ताज़ शायर दाग़ देहलवी ने कहातेआ:

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़

सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है

“उर्दू ज़बान” यही वो ज़बान है जिसने तहिरीक-ए-आज़ादी में रूह फूँकने का काम किया था.

“इनक़लाब ज़िंदाबाद!”

ये नारा किसे याद नहीं? मगर हैफ़! ये याद नहीं कि ये नारा उर्दू ज़बान की ही देन है.

आओ मिलकर एक-बार फिर से सुबेओं को ये थहसास दिलाएँ :

उर्दू ज़िंदाबाद!

इन्क़िलाब ज़िंदाबाद!

हिन्दोस्तान ज़िंदाबाद!

राघव नगर भवारा

मधोबनी (बिहार)

मैं कोई मुल्क नहीं हूं कि जला दोगे मुझे……कैफी आजमी

kaifi

اگست ۔۸۔۲۰۱۶ سانحہ کوئٹہ سے متاثر ہو کر ایک نظم۔۔۔۔صالح اچھا

Dagdar hai.Atchchha

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सबक़ एक कविता…….रवीश कुमार

सबक़ अब तुम सबक़ नहीं रहे

माँ बाप

गुरु

दोस्त

ज़िंदगी

से हम सीखते रहे सबक़

इम्तहानों के दिनों में जाग जाग कर

रटते रहे सबक़

ठोकरों ने सबक सिखाया

सबक़ ने ठोकरों से बचाया

सिखाने वाले बदल गए हैं

धमकाने वाले आ गए हैं

मंत्री भी सबक सिखलाते हैं

कौन कौन सिखा सकता है

उचक उचक बतलाते हैं

सबक़ का मतलब कॉफ़ी है

सबक़ का मतलब टॉफ़ी है

सबक़ का मतलब धमकी है

साहिबाने हिन्द का ऐसा ही फ़रमान है

सीख लें ख़ुद से वर्ना सीखा देंगे

फौज है गुंडों की

सबके पीछे लगा देंगे

बस बोल कर देखो

बोलती बंद करा देंगे

सबक़ का अब मतलब बदल गया है

गुंडों के आने से बिज़नेस खिसक गया है

रहना है मुल्क में तो याद रखना ये सबक़

सबक़ का नाम देश है

देश का नाम सबक़ है

गुंडों का नाम सबक़ है

सबक़ का नाम गुंडा है

नाम काम सब एक हैं

राम नाम सत्य है

राम नाम सत्य है

(सौजन्य:कस्बा)

फ़रिश्ते आदमी होने की जुस्तजू करते…शकील क़ादरी

 

वफ़ा की राह में अश्कों से गर वज़ू करते।

गिरेबाँ चाक न होता न तुम रफू करते।

 

किसी का इश्क़ जो पाने की आरज़ू करते।

तुम अपनी आँखों को रो रो के सुर्ख़रू करते।

 

नबी की पैरवी यारो जो हूबहू करते।

तो लोग आप का चर्चा भी कू-ब-कू करते।

 

रमूज़े इश्क़ से वाक़िफ़ नहीं हुए वरना

फ़रिश्ते आदमी होने की जुस्तजू करते।

 

सरापा आप भी दीवाने मीर हो जाते

ग़ज़ल के लह्जे में मुझ से जो ग़ुफ़्तगू करते।

 

किया है क़त्ल मुझे तूने अपनी नज़रों से

भला ये काम कभी तेरे जंगजू करते।

 

ख़ुदा की याद में निकले तो बन गए शबनम

इन आँसूओं को भला कैसे फिर लहू करते।

 

अगर ये जानते गुलचीं ही क़त्ल कर देगा

तो गुल कभी न तमन्ना-ए-रंगो-बू करते।

 

तुम्हारे लम्स ने नश्तर दिये हैं हाथों पर

तुम्हारे ज़ख़्म को किस तरह हम रफू करते।

 

‘शकील’ उम्र गुज़ारोगे क्या इशारों में

कभी तो दूबदू होकर भी ग़ुफ़्तगू करते।

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فرشتے آدمی ہونے کی جستجو کرتے…شکیل قادری

وفا کی راہ میں اشکوں سے گر وضو کرتے۔

گریباں چاک نہ ہوتا نہ تم رفو کرتے۔

کسی کا عشق جو پانے کی آرزو کرتے۔

تم اپنی آنکھوں کو رو رو کے سرخ رو کرتے۔

نبی کی پیروی یارو جو ہوبہو کرتے۔

تو لوگ آپ کا چرچا بھی کوبہ کو کرتے۔

رموزے عشق سے واقف نہیں ہوئے ورنہ

فرشتے آدمی ہونے کی جستجو کرتے۔

سراپا آپ بھی دیوانے میر ہو جاتے

غزل کے لہجے میں مجھ سے جو گفتگو کرتے۔

کیا ہے قتل مجھے تونے اپنی نظروں سے

بھلا یہ کام کبھی تیرے جنگجو کرتے۔

خدا کی یاد میں نکلے تو بن گئے شبنم

ان آنسوؤں کو بھلا کیسے پھر لہو کرتے۔

اگر یہ جانتے گل چیں ہی قتل کر دیگا

تو گل کبھی نہ تمناٴ رنگو بو کرتے۔

تمہارے لمس نے نشتر دئیے ہیں ہاتھوں پر

تمہارے زخم کو کس طرح ہم رفو کرتے۔

‘شکیل’ عمر گزارو گے کیا اشاروں میں

کبھی تو دو بدو ہوکر بھی گفتگو کرتے۔

 ہے رشک ایک خلق کو جوہر کی موت پر

یہ اسکی دین ہے جسے پروردگار دے

۔۔۔۔۔۔۔محمدعلی جوہر

ہو گیا لبریز جوہر کا بھی جامِ زندگی۔۔۔۔۔۔ آل احمد سرور

مرتے مرتے بھی دکھا دی تونے سب کو شانے حق

کسر باطل کانپ اٹھا سن کر تیرا اعلان حق

مشکلیں پیش آئیں لاکھوں گو دل بیمار کو

قومیت کا راستہ دکھلا دیا اغیار کو

دے چکا جب ساری دنیا کو پیام زندگی

ہو گیا لبریز جوہر کا بھی جامِ زندگی

زرہ زرہ ہند کا سن کر جسے مدہوش تھا

آہ وہ نغمہ ہمیشہ کے لئے خاموش تھا

 جسکی تابانی سے بزمِ زندگی روشن ہوئی

آہ وہ شمع اپنے جلووں سے تہی دامن ہوئی

 ساحلِ دریا کے ہر زرہ کو لاکر ہوش میں

موج مضطر ہوگئی پھر بحر کی آغوش میں

हे रश्क एक खल्क को जौहर की मौत पर

यह उसकी देन है जिसे परवरदिगार दे

……….मौलाना मुहम्मदअली जौहर

हो गया लबरेज जौहर का भी जामे जिंदगी……प्रोफेसर आले अहमद सरवर

 

मरते मरते भी दिखा दी तूने सबको शाने हक

कसर बातिल कांप उठा सुनकर तेरा एलाने हक

 

मुश्किलें पेश आईं लाखों गो दिल बीमार को

कौमियत का रास्ता दिखला दिया अगयार को

 

दे चुका जब सारी दुनिया को पयामे जिंदगी

हो गया लबरेज जौहर का भी जामे जिंदगी

 

जर्रा जर्रा हिन्द का सुनकर जिसे मदहोश था

आह वह नगमा हमेशा के लिए खामोश था

 

जिसकी ताबानी से बज्मे जिंदगी रौशन हुई

आह वह शमा अपने जलवों से तही दामन हुई

 

साहिले दरिया के हर जर्रा को लाकर होश में

मौज मुजतर होगई फिर बहर की आगोश में

 

साहिले दरिया के हर जर्रा को लाकर होश में

मौज मुजतर होगई फिर बहर की आगोश में

अमेरिका ने पाला-पोसा ISIS को! वीडियो में देखें सच्चाई

in देश / on November 17, 2015 at 7:52 pm /
नई दिल्ली।कुख्यात आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) आज दुनिया भर में आतंक का पर्याय बन चुका है। मगर क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरूआत कब और कैसे हुई! एक ऎसी थ्योरी सामने आई है, जिसके मुताबिक इस्लामिक स्टेट के खिलाफ जंग छेडने वाले अमेरिका ने ही इसे जन्म दिया और इसे हथियार देकर आगे बढाया।
Ben Swann नाम के यूट्यूब चैनल द्वारा एक वीडियो जारी किया गया है जिसमें बताया गया है कि कैसे इस्लामिक स्टेट एक छोटे से संगठन से आतंकियों का सबसे खौफनाक संगठन बन गया। इस वीडियो को देखकर आप भी चौंक जाएंगे। फरवरी 2015 में पोस्ट किया गया यह वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। आप भी देखिए कैसे बना और पनपा इस्लामिक स्टेट-

Orginally from Burbodhan Dist:Surat,India ..and Lived in Karachi since child hood.now residing in Brampton,Canada has gifted Bagewafa two of his poetry collection.Thanks a lot to Swaleh Atchha saheb.for his courtesy and love.

1-Dhoopki Chadar

DhoopA 001

DhoopB 001

2-:Meri Koshishen meri khwahishein

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मेरा वतन वही है —–अल्लामा इक़बाल

 

चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे हक़ सुनाया,

नानक ने जिस चमन में बदहत का गीत गाया,

तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया,

जिसने हेजाजियों से दश्ते अरब छुड़ाया,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

 

सारे जहाँ को जिसने इल्मो-हुनर दिया था,

यूनानियों को जिसने हैरान कर दिया था,

मिट्टी को जिसकी हक़ ने ज़र का असर दिया था

तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

 

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से,

फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से,

बदहत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकां से,

मीरे-अरब को आई ठण्डी हवा जहाँ से,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

 

बंदे किलीम जिसके, परबत जहाँ के सीना,

नूहे-नबी का ठहरा, आकर जहाँ सफ़ीना,

रफ़अत है जिस ज़मीं को, बामे-फलक़ का ज़ीना,

जन्नत की ज़िन्दगी है, जिसकी फ़िज़ा में जीना,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

 

गौतम का जो वतन है, जापान का हरम है,

ईसा के आशिक़ों को मिस्ले-यरूशलम है,

मदफ़ून जिस ज़मीं में इस्लाम का हरम है,

हर फूल जिस चमन का, फिरदौस है, इरम है,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

میرا وطن وہی ہے۔۔۔۔۔۔۔عللامہ اقبال

ur_hindustaanii-bachchon-kaa-qaumii-giit-allama-iqbal-nazms

میری کھُلی ہوئ آنکھوکو کوئ خواب تو دے۔۔۔۔۔۔کشور ناہید

kishwarB

EID TV MUSHAIRA
Toronto, Canada.
Telecaster Tasleem Elahi Zulfi presenting EID TV MUSHAIRA with Toronto prominent Poets on 24/7 TV Channel Rogers Cable 851 in Toronto Canada.
This Mushaira should be on air Eid Day from 2 – 4 pm Toronto time. pt.1

 

ہنے نقاب اتنے ہیں……۔۔ سیا سچدیو

کتاب زیست میں زحمت کے باب اتنے ہیں

ذرا سی عمر ملی ہے عزاب اتنے ہیں ۔

زفا فریب تڑپ درد غم کسک آنسو ۔۔

ہمارے سامنے بھی انتخاب اتنے ہیں

سمندروں کو بھی پل میں بہا کے لے جائے

ہماری آنکھ میں آنسو جناب اتنے ہیں

نکاب پوشوں کی بستی میں شخصیات کہاں

ہرایک شخص نے پہنے نقاب اتنے ہیں

ہمارے شعر کو دل کی نظر کی حاجت ہے

ہرایک لفظ میں حسنو شباب اتنے ہیں

ہمیں تلاش ہے تعبیر کی مگر ہمدم

چھپا لیا ہے سبھی کچھ یہ خواب اتنے ہیں

کبھی زبان کھلی تو بتائینگے ہم بھی

ترے سوال کے یوں تو جواب اتنے ہیں

تمام کانٹے بھرے ہیں ہمارے دامن میں

تمہارے واسطے لائے گلاب اتنے ہیں

میں چاہ کر بھی نہیں کر سکی کبھی پورے

تمہاری آنکھ میں پوشیدہ خواب اتنے ہیں

وفا کے بدلے وفا کیوں ‘سیہ’ نہیں ملتی

سوال ایک ہے لیکن جواب اتنے ہیں

 

पहने नकाब इतने हैं…….. सिया सचदेव

 

किताबे जीस्त में ज़हमत के बाब इतने हैं

ज़रा सी उम्र मिली है अज़ाब इतने हैं .

ज़फ़ा फरेब तड़प दर्द ग़म कसक आंसू ..

हमारे सामने भी इंतख़ाब इतने हैं

समन्दरों को भी पल में बहाके ले जाए

हमारी आँख में आंसू जनाब इतने हैं

नकाबपोशों की बस्ती में शख्सियात कहाँ

हरेक शख्स ने पहने नकाब इतने हैं

हमारे शेर को दिल की नज़र की हाजत है …

हरेक लफ्ज़ में हुस्नो-शबाब इतने हैं

हमें तलाश है ताबीर की मगर हमदम

छिपा लिया है सभी कुछ ये ख्वाब इतने हैं

कभी ज़ुबान खुली तो बताएँगे हम भी

तिरे सवाल के यूं तो जवाब इतने हैं

.तमाम कांटे भरे हैं हमारे दामन में

तुम्हारे वास्ते लाये गुलाब इतने हैं

मैं चाह कर भी नहीं कर सकी कभी पूरे

तुम्हारी आँख में पोशीदा ख़्वाब इतने हैं

वफ़ा के बदले वफ़ा क्यूँ ‘सिया’ नहीं मिलती

सवाल एक है लेकिन जवाब इतने हैं

واقعہ، قتل عام تک پہنچا۔۔۔۔۔۔نسرین سید

Harfe HusnaB

ہمیں آزاد کہاں رکھا ہے۔۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زُلفی

Abad

Posted by: Bagewafa | جون 5, 2016

کیا تھا۔۔۔۔۔صالح اچھا

کیا تھا۔۔۔۔۔صالح اچھا

Kyatha,Swaleh Atcha

न वो बाबरी मस्जिद थी न बाबर ने मंदिर तोड़ा था—- रवीश कुमार

रवीश कुमार June 03, 2016

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बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद से जुड़ा कोई व्यक्ति जो ख़ुद को सनातनी हिन्दू मानता हो और विवादित स्थान पर राम के मंदिर का निर्माण चाहता हो ताकि वो सरयू में स्नान कर वहां पूजापाठ कर सके, वो पांच छह साल के गहन अध्ययन के बाद, तमाम दस्तावेज़ों को जुटाते हुए अपने हाथों से 700 पन्ने की किताब लिखे और उस किताब में बाबर को अच्छा बताया जाए और कहा जाए कि जो मस्जिद गिराई गई वो बाबरी मस्जिद नहीं थी तो उसे पढ़ते हुए आप तय नहीं कर पाते कि यह किताब बाबरी मस्जिद ध्वंस की सियासत पर तमाचा है या उन भोले लोगों के चेहरे पर जो नेताओं के दावों को इतिहास समझ लेते हैं।

Ayodhya Revisited नाम से किशोर कुणाल ने जो किताब लिखी है। किशोर कुणाल चाहते हैं कि वहां मंदिर बने लेकिन अयोध्या को लेकर जो ग़लत ऐतिहासिक व्याख्या हो रही है वो भी न हो। क्या एक किताब चाहे वो सही ही क्यों न हो, दशकों तक बाबरी मस्जिद के नाम पर फैलाई गई ज़हर का असर कम कर सकती है? बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद सिर्फ मंदिर मस्जिद का विवाद नहीं है। इसके बहाने भारत के नागरिकों के एक बड़े हिस्से को बाबर से जोड़ कर मुल्क के प्रति उनकी निष्ठा और संवैधानिक दावेदारियों को खारिज करने का प्रयास किया गया। अच्छा हुआ यह किताब किसी मार्क्सवादी इतिहासकार ने नहीं लिखी है। किशोर कुणाल ने लिखी है जिनकी सादगी, धार्मिकता और विद्वता पर विश्व हिन्दू परिषद और संघ परिवार के लोग भी संदेह नहीं कर सकते। इस किताब को बारीकी से पढ़ा जाना चाहिए। मसला जटिल है और इसकी इतिहासकारों की समीक्षा बाकी है। मैं आपके लिए सिर्फ सार रूप पेश कर रहा हूं। यह चेतावनी ज़रूरी है क्योंकि इस मसले पर कोई पढ़ना नहीं चाहता। सब लड़ना चाहते हैं।

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Ayodhya Revisited का फार्वर्ड सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायधीश जस्टिस जे बी पटनायक ने लिखा है। इसके तीन चैप्टरों के मुखड़े इस विवाद के न जाने कितने मुखौटे उतार देते हैं। इसके तीसरे चैप्टर का मुखड़ा है Babur was not a religious fanatic, चौथे चैप्टर का मुखड़ा है Babur had no role either in the demolition of any temple at Ayodhya or in the construction of mosque और पांचवे चैप्टर का मुखड़ा Inscriptions on the structure were fake and fictitious

मार्क्सवादी इतिहासकार स्व राम शरण शर्मा के विद्यार्थी रहे किशोर कुणाल का कहना है कि इस विवाद में इतिहास का बहुत नुकसान हुआ। वो इस ज़हरीले विवाद से अयोध्या के इतिहास को बचाना चाहते हैं। उनके अनुसार मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भी सही साक्ष्य नहीं रखे और उनकी सही व्याख्या नहीं की और मंदिर समर्थकों ने तो ख़ैर इतिहास को इतिहास ही नहीं समझा। झूठे तथ्यों को ऐतिहासिक बताने की दावेदारी करते रहे।

मैं पिछले दो दशकों से ऐतिहासिक तथ्यों की झूठी और भ्रामक व्याख्या के कारण अयोध्या के वास्तविक इतिहास की मौत का मूक दर्शक बना हुआ हूं। नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों में हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक वार्ताकार के रूप में मैंने अपना कर्तव्य निष्ठा के साथ निभाया लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चल रही सुनवाई के आख़िरी चरणों में मुझे लगा कि अयोध्या विवाद में हस्तक्षेप करना चाहिए और मैंने इस थीसीस को तैयार किया है।

किशोर कुणाल ने अपनी किताब में बताया है कि कैसे विश्व हिन्दू परिषद के इतिहासकारों ने बहादुर शाह आलमगीर की अनाम बेटी की लिखित किताब बहादुर शाही को साक्ष्य बनाने का प्रयास किया। जबकि औरंगज़ेब के बेटे बहादुर शाह को कभी आलमगीर का ख़िताब ही नहीं मिला। बहादुर शाह की एक बेटी थी जो बहुत पहले मर चुकी थी। मिर्ज़ा जान इस किताब के बारे में दावा करता है कि उसने बहादुर शाही के कुछ अंश सुलेमान शिकोह के बेटे की लाइब्रेरी में रखी एक किताब से लिए हैं। कुणाल दावा करते हैं कि सुलेमान शिकोह का कोई बेटा ही नहीं था। मिर्जा जान ने 1855 में एक किताब लिखी है वो इतनी भड़काऊ थी कि उसे ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था। कुणाल बराबरी से विश्व हिन्दू परिषद और मार्क्सवादी इतिहासकारों की गड़बड़ियों को उजागर करते हैं।

उन्होंने बताया है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों का दावा ग़लत था दशरथ जातक में राम सीता को भाई बहन बताया गया है। कुणाल साक्ष्यों को रखते हुए कहते हैं कि शुरूआती बौद्ध टेक्स्ट में राम को आदर के साथ याद किया गया है। कहीं अनादर नहीं हुआ है। उनका कहना है कि जातक कथाओं के गाथा हिस्से के बारीक अध्ययन से साबित होता है कि राम के बारे में कुछ आपत्तिजनक नहीं है। उन्होंने बी एन पांडे के कुछ दावों को भी चुनौती दी है। कुणाल ने मार्क्सवादी इतिहासकारों की आलोचना स्थापित इतिहासकार कहकर की है जिन्होंने असहमति या सत्य के के किसी भी दावे को स्वीकार नहीं किया।विश्व हिन्दू परिषद के इतिहासकारों के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा है कि मैं इन्हें राष्ट्रवादी या रूढ़ीवादी इतिहासकार की जगह उत्साही इतिहासकार कहना पसंद करता हूं। वैसे इस किताब में कार्ल मार्क्स का भी ज़िक्र है और वो भी अच्छे संदर्भ में !

कुणाल बताते हैं कि सोमनाथ में मंदिर तोड़ने और लूट पाट के बाद भी वहां के शैव पशुपतचार्या ने मस्जिद का निर्माण कराया बल्कि आस पास दुकानें भी बनाईं ताकि व्यापार और हज के लिए जाने वाले मुसलमानों को दिक्कत न हो। वहीं वे कहते हैं कि कई पाठकों के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होगा कि 1949 में निर्जन मस्जिद में राम लला की मूर्ति रखने वाले बाबा अभिरामदासजी को 1955 में बाराबंकी के एक मुस्लिम ज़मींदार क़य्यूम किदवई ने 50 एकड़ ज़मीन दान दिया था। कुणाल बताते हैं कि इन विवादों से स्थानीय स्तर पर दोनों समुदायों में दूरी नहीं बढ़ी। वे एक दूसरे से अलग-थलग नहीं हुए।

लोगों को जानकर हैरानी होगी कि तथाकथित बाबरी मस्जिद का 240 साल तक किसी भी टेक्स्ट यानी किताब में ज़िक्र नहीं आता है।कुणाल बार बार तथाकथित बाबरी मस्जिदकहते हैं जिसे हमारी राजनीतिक चेतना में बाबरी मस्जिद के नाम से ठूंस दिया गया है और जिसके नाम पर न जाने कितने लोग एक दूसरे को मार बैठे। उनका दावा है कि मस्जिद के भीतर जिस शिलालेख के मिलने का दावा किया जाता है वो फर्ज़ी है। इस बात को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस एस यू ख़ान ने भी स्वीकार किया था। इस मामले की क़ानूनी प्रक्रिया अंतिम रूप से पूरी नहीं हुई है ।

उस तथाकथित बाबरी मस्जिद के निर्माण में बाबर की कोई भूमिका नहीं थी।कुणाल की किताब का बाबर धर्मांध नहीं था। पूरे सल्तनत काल और मुगल काल के बड़े हिस्से में अयोध्या के तीन बड़े हिन्दू धार्मिक स्थल सुरक्षित रहे। विवादित स्थल पर मंदिर का तोड़ना औरंगजेब के समय हुआ न कि बाबर के समय। कुणाल के अनुसार 1813 साल में एक शिया धर्म गुरु ने शिलालेख में हेरफेर किया था जिसके अनुसार बाबर के कहने पर मीर बाक़ी ने ये मस्जिद बनाई थी। कुणाल इस शिलालेख को फर्ज़ी बताते हैं। वे इस किताब में हर बात के समर्थन में प्रमाण देते चलते हैं।

इस किताब को पढ़कर लग रहा है कि लेखक मंदिर निर्माण के हिन्दूवादी संगठनों के दोहरेपन से भी खिन्न हैं । उन्हें लगता है कि अनाप शनाप तथ्यों को इतिहास इसलिए बताया जा रहा है ताकि झगड़ा चलता रहे। इसलिए निर्दोष बाबर के ख़िलाफ़ उस अपराध के लिए दशकों तक नफ़रत फैलाई गई जो उसने की ही नहीं”, यह मामूली बात नहीं है । कुणाल बाबर को उदारवादी और बेख़ौफ़ योद्धा कहते हैं। हम आप जानते हैं कि मौजूदा राजनीति में बाबर का नाम लेते ही किस किस तरह की बातें ज़हन में उभर आती हैं। क्या वो संगठन और नेता कुणाल के इन दावों को पचा पायेंगे जिन्होंने बाबरी की औलादोंकहते हुए अनगिनत भड़काऊ तकरीरें की थीं? बाबरी मस्जिद ध्वंस के पहले और बाद में ज़माने तक पानी नहीं ख़ून बहा है।

कुणाल ने अयोध्या का बड़ा ही दिलचस्प इतिहास लिखा है । पढ़ने लायक है । कुणाल के अयोध्या में सिर्फ राम नहीं हैं । रहीम भी हैं । अयोघ्या के इतिहास को बचाने और बाबर को निर्दोष बताने में कुणाल ने अपनी ज़िंदगी के कई साल अभिलेखागारों में लगा दिये मगर साक्ष्यों को तोड़ने मरोड़ने वाली राजनीति इस सनातनी रामानन्दी इतिहासकार की किताब को कैसे स्वीकार करेगी। उनकी इस किताब को पढ़ते हुए यही सोच रहा हूं कि कुणाल के अनुसार बाबर ने मंदिर नहीं तोड़ा, वो बाबरी मस्जिद नहीं थी लेकिन अयोध्या के इतिहास को जिन लोगों ने ध्वस्त किया वो कौन थे बल्कि वौ कौन हैं। वो आज कहां हैं और अयोध्या कहां हैं।

ttp://naisadak.org/neither-was-babri-masjid-nor-babar-destroyed-it/

آخری سرحد کے بعد بھلا کوئی کہاں جائے…. فلسطینی شاعر محمود درویش کی ایک نظم کاترجمہ

زمین ہم پر تنگ ہوتی جا رہی ہے

ہمیں دھکیل رہی ہے ایسی گلیوں میں

جہاں دیوارسے دیوار لگتی ہے

سو گذرنے کا یہی اک رستہ ہے

کہ ہم اپنے اعضا کاٹ کر پھینک دیں

زمیں ہمیں بھینچ رہی ہے

کاش ہم اس زمیں پر اگی

کوئی فصل ہی ہوتے

اسی میں گرتے ، اسی سے اگ آتے

کاش زمین ماں ہوتی

ماں جیسی مہرباں ہوتی

کاش ہمارے وجود پتھر ہوتے

ان سے آئینے تراش کر ہم اپنے خوابوں کا عکس بن جاتے

ہم نے دیکھا ہے ان لوگوں کا چہرہ

جن کےبچوں کا خون

اپنی روح کے دفاع کی آخری جنگ میں

ہمارے ہاتھوں سے ہو گا

ہم ان کے بچوں کا بھی ماتم کرتے ہیں

ہم نے دیکھا ہے ان لوگوں کا چہرہ

جو ہمارے بچوں کو

اس آخری پناہ گاہ سے بھی دیس نکالا دیں گے

آخری سرحد کے بعد بھلا کوئی کہاں جائے

آخری آسمان کے بعدپرندے

کس جانب پرواز کریں ؟

ہوا کے آخری چھونکے کے بعد

پھول کہاں جا کر سانس لیں ؟

ہم اک لہو رنگ چیخ سے دے جائیں گے

اپنے ہونے کا ثبوت

ہم اپنے گیتوں کے ہاتھ کاٹ دیں گے

لیکن ہمارا بدن گاتا ہی رہے گا

ہمارا مرنا یہیں پر ہے

اسی آخری مقام پر۔۔۔۔۔

یہیں پر ہمارا خون اگائے گا

زیتون کا درخت

(Source:Net)

काश हमारे वजूद पत्थर होते—फ़लस्तीनी शायर महमूद दरवेश की एक नज़म का तर्जुमा

ज़मीन हम पर तंग होती जा रही है
हमें धकेल रही है ऐसी गलीयों में
जहां दीवार से दीवार लगती है
सो गुज़रने का यही इक रस्ता है
कि हम अपने आज़ा (अवयव) काट कर फेंक दें
ज़मीं हमें भींच रही है
काश हम इस ज़मीं पर उगी
कोई फ़सल ही होते
इसी में गिरते , इसी से उग आते
काश ज़मीन माँ होती
माँ जैसी मेहरबाँ होती
काश हमारे वजूद पत्थर होते
उनसे आईने तराश कर हम अपने ख्वाबों का अक्स बन जाते
हमने देखा है उन लोगों का चेहरा
जिन के बच्चों का ख़ून
अपनी रूह के दिफ़ा की आखरी जंग में
हमारे हाथों से होगा
हम उनके बच्चों का भी मातम करते हैं
हमने देखा है उन लोगों का चेहरा
जो हमारे बच्चों को
इस आखरी पनाह-गाह से भी देश निकाल देंगे
आखरी सरहद के बाद भला कोई कहाँ जाये
आखरी आसमान के बाद परिंदे
किस जानिब परवाज़ करें ?
हुआ के आखरी झोंके के बाद
फूल कहाँ जा कर सांस लें ?
हम इक लहू रंग चीख़ से दे जाऐंगे
अपने होने का सबूत
हम अपने गीतों के हाथ काट देंगे
लेकिन हमारा बदन गाता ही रहेगा
हमारा मरना यहीं पर है
इसी आखरी मुक़ाम पर।।।।।
यहीं पर हमारा ख़ून उगाएगा
ज़ैतून का दरख़्त.

कस्बा

 

मेरा नाम निसार है और मैं एक ज़िंदा लाश हूँ…रवीश कुमार


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“मैंने जेल के भीतर अपनी ज़िंदगी के 8,150 दिन बिताये हैं। मेरे लिए ज़िंदगी ख़त्म हो चुकी है। आप जो देख रहे हैं वो एक ज़िंदा लाश है। “

 

क्या ये पंक्ति इतनी सामान्य है कि इसे पढ़ने के बाद किसी को फर्क़ ही नहीं पड़ा हो। जिस दिन के इंडियन एक्सप्रेस में मुज़ामिल जलील की यह कहानी छपी है उस दिन बेहतरीन संसाधनों और रिसर्च टीम से लैस मीडिया के नायंकर ( एंकर और नायक से मिलकर बना एक नया शब्द है) इस कहानी से बेख़बर रहे। इंडियन एक्सप्रेस तो सब पढ़ते हैं फिर भी इस बात से समाज, संस्था, मीडिया, राजनीति और पत्रकारों में शांति पसरी रही। इसका मतलब है कि अब हम सामान्य होने लगे हैं। एक आदमी जो ख़ुद को ज़िंदा लाश की तरह दिखाना चाहता है, हम उसकी लाश को देखकर सामान्य होने लगे हैं। हमें न तो मर चुके को देख कर फर्क पड़ता है न ही मरे जैसे को देखकर।

निसार की कहानी तन्मय की कहानी से हार गई। तन्मय ने भारत रत्नों का कथित रूप से अपमान कर दिया था जिसे लेकर तमाम चैनलों की प्राइम रातें बेचैन हो गईं थीं। आख़िर वे भारत रत्न के साथ हुए अपमान को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। राष्ट्रपति के द्वारा मनोनित सांसद रियालिटी टीवी में फूहड़ हंसी हंसते हैं,सब बर्दाश्त कर लेते हैं। चुने गए सांसद साबुन तेल और शैंपू का विज्ञापन कर रहे हैं क्या किसी को फर्क पड़ता है। क्या किसी ने पूछा कि स्टुडियो में जितना घंटा देते हैं क्या ये सांसद जनता के बीच भी उतने ही आराम से बतियाते हैं। भारत रत्न से पुरस्कृत नायक पंखा घड़ी और लेमचूस का विज्ञापन करते हैं क्या किसी को फर्क पड़ता है। क्या भारत सरकार अपने भारत रत्नों के रहने-खाने का प्रबंध नहीं कर सकती जिससे उन्हें बिल्डलर से लेकर बर्तन तक का विज्ञापन न करना पड़े। मुझे नहीं मालूम कि भारत रत्नों की चिन्ता में ये सवाल आए या नहीं लेकिन मुझे तन्मय की हरकतों पर भी कुछ नहीं कहना है।

आज़ादी और ज़िम्मेदारी का मुद्दा चलता रहेगा। कुछ लतीफे अपमानजनक न भी हो तो इतने घटिया तो होते ही हैं कि सुनकर चुप रहा जाए। मगर इंटरनेट पर राजनीतिक रूप से गाली गलौज की संस्कृति को पचाने और नज़रअंदाज़ करने का लेक्चर देने वाले भी इस बहस में कूद पड़े। हो सकता है कि यह गंभीर मुद्दा हो और राष्ट्र की प्राइम रातों की हसीन चर्चाओं से इसका निपटारा हुआ हो लेकिन बिना किसी प्रमाणित सबूत के निसार की ज़िंदगी के 23 साल जेल में बीत गए। क्या उसके साथ जो मज़ाक हुआ वो किसी तन्मय के फूहड़ मज़ाक से कम भद्दा था। अगर हमें भद्दे मज़ाक की फिकर है तब तो फिर नासिर का ही मसला नायंकरों के मुखमंडलों पर छा जाना चाहिए था।

निसार-उद-द्दीन अहमद 23 साल पहले बाबरी मस्जिद ध्वंस की पहली बरसी पर हुए धमाके के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस घटना में दो यात्री मारे गए और 11 घायल हो गए थे। फार्मेसी के छात्र नासिर को पुलिस ने कर्नाटक के गुलबर्गा से उठा लिया। उसका भाई ज़हीर भी साज़िश के आरोप में उठा लिया गया। 23 साल तक जेल में रहा लेकिन पुलिस एक भी सबूत पेश नहीं कर पाई।

निसार ने कहा है कि वो 20 साल का था जब जेल में बंद कर दिया गया। आज 43 साल का है। तब उसकी छोटी बहन 12 साल की थी जिसकी शादी हो चुकी है। अब उसकी बेटी 12 साल की है। मेरी भतीजी एक साल की थी अबउसकी शादी हो चुकी है। मेरी रिश्ते की बहन मुझसे दो साल छोटी थी, अब वो दादी बन चुकी है। मेरी ज़िंदगी से एक पूरी पीढ़ी चली गई है।

15 जनवरी 1994 को उसे कर्नाटक के गुलबर्गा से उठाकर हैदराबाद लाया गया था। कर्नाटक पुलिस को भी पता नहीं था कि निसार को गिरफ्तार किया गया है। जब निसार के घरवालों को पता चला तो मुकदमा लड़ने की तैयारी में जुट गए। उसके पिता मुकदमा लड़ते लड़ते 2006 में चल बसे। ज़हीर को भी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी मगर फेफड़े में कैंसर के कारण वो बाहर आ गया। वो कैंसर से लड़ता रहा और अपने भाई की बेगुनाही के लिए।

निसार को पहले पुलिस ने उसे हैदराबाद में 1993 में एक मुस्लिम संस्थान में हुए धमाके के आरोप में गिरफ्तार किया। बाद में दोनों भाइयों को कई और धमाकों में आरोपी बनाकर टाडा लगा दिया गया। इकबालिया बयान के दम पर पुलिस ने दावा किया कि निसार ने एपी एक्सप्रेस में बम रखने की बात कबूल कर ली है। कर्नाटक और हैदराबाद पुलिस जांच कर ही रही थी कि यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। 21 मई 1996 को हैदराबाद की कोर्ट ने इन पर लगाए गए टाडा के प्रावधानों को हटा दिया और कहा कि बिना किसी गंभीरता के टाडा के प्रावधान लगा दिये गए हैं।

पत्रकार मुज़ामिल जलील को निसार ने बताया है कि डीसीपी के वी रेड्डी और इंस्पेक्टर बी श्यामा ने उसका बयान लिखवाया था, उस पर दस्तख़त तक नहीं थे। हैदराबाद के ट्रायल कोर्ट ने 2007 में ही सभी को छोड़ दिया था लेकिन उन्हीं इकबालिया बयानों के आधार पर निसार और 15 आरोपियों को अजमेर की टाडा अदालत ने आजीवन करावास सुना दी। क्या ये अजीब नहीं है कि एक सबूत एक कोर्ट के लिए बेकार है दूसरे कोर्ट के लिए आजीवन कारावास के लायक। दो राज्य के टाडा कोर्ट हैं। इतना अंतर कैसे आ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एफ मोहम्मद इब्राहीम कैफुल्ला और जस्टिस उदय उमेश ललित ने चारों आरोपियों के इकबालिया बयान को देखा और कहा कि इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। निसार की भूमिका न तो इकबालिया बयान से ज़ाहिर होती है न इसके खिलाफ अन्य दूसरे सबूत मिले हैं। 12 साल लग गए अजमेर की अदालत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से निरस्त कराने में। मैं इस स्टोरी को पढ़ते वक्त सन्न रह गया। निसार से ज़्यादा उन अफसरों और वकीलों के बारे में सोचने लगा। क्या उन अफसरों के हाथ नहीं कांपे होंगे, किसी बेगुनाह की ज़िंदगी बर्बाद करते हुए। इनके दिल और ईमान पर कोई बोझ पड़ता ही नहीं होगा।

बात सिर्फ निसार की नहीं है, किसी नरेश की भी हो सकती है। अगर यह निसार के लिए आसान है तो किसी नरेश को भी हुकूमतें हमेशा के लिए जेल में सड़ा सकती हैं। आखिर आम जनता किस संस्था की जांच या फैसले पर यकीन करे। उस ज़िंदा लाश का हम क्या करें जो 43 साल के निसार की शक्ल में बाहर आया है। हम देखें या न देखें। काश कि सुप्रीम कोर्ट आरोप मुक्त करने के साथ साथ उनसे भी सवाल करता जो इतने सालों तक बिना सबूत के किसी को जेल में सड़ाते रहे।

आए दिन ऐसे नौजवानों को जेल से रिहा होने की ख़बरें पढ़ता रहता हूं। न तो इनके लिए कांग्रेस बोलती है न बीजेपी न समाजवादी पार्टी। रिहाई मंच जैसी संस्था अपने दम पर लड़ती रहती है । जब कोई राजनीतिक दल बेकसूरों के हक में बोलने का साहस नहीं कर पाता है तो कैसे मान लें कि हिन्दू मुस्लिम मसले पर इनके बीच कोई समझौता नहीं है। जबकि इन्हीं बातों को लेकर देश में कितना हिन्दू मुसलमान विवाद हुआ। लोगों की ज़हन में कितना ज़हर घोला गया ।

क्या टीवी डिबेट से कुछ हल निकलेगा? क्या ये सारा कसूर चैनलों के डिबेट करने या न करने को लेकर है ? क्या हम ऐसी कोई व्यवस्था या किसी व्यवस्था में डिबेट से सुधार ला पाए हैं? टीवी चैनलों के डिबेट एक तरह से व्यवस्था और संस्था के वर्चुअल विकल्प बनते जा रहे हैं। व्यवस्था तो वही रहेगी चलो डिबेट में निपटाते हैं। वहां हम अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर भड़ास निकाल लेते हैं। हर दिन एक नया डिबेट होता है। हर दिन एक नई कुश्ती होती है। हम बेहतर की जगह बदतर होते जा रहे हैं। नागरिक उदासीनता की पराकाष्ठा की मिसाल हैं ये बहसें ।

निसार को भी अपने बाकी बची लाश के साथ न्यूज़ चैनलों की प्राइम रातों के डिबेट देखने चाहिए। जीने के लिए कोई ज़रिया न भी हो तो मरने का ऐसा सहारा कहाँ मिलेगा। हम ऐसी कौन सी संस्था बना पाए जिसकी निष्पक्षता कांग्रेस बीजेपी के आने जाने से मुक्त हो। क्या कोई ऐसी संस्था है? क्या कांग्रेस अपने शासन के समय निसार के साथ जो हुआ उसकी ज़िम्मेदारी लेगी? क्या बीजेपी अक्षरधाम हमले में गिरफ्तार मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम की ज़िम्मेदारी लेगी जिसे एक ऐसे आरोपों में 11 साल जेल की सज़ा काटनी पड़ी जो साबित ही न हो सके। आप पाठक सोचिये कि हम ज़हर तो पी लेते हैं लेकिन क्या हम देख पाते हैं कि हिन्दू मुसलमान की सियासी पुड़िया के भीतर कितने बेकसूर हिन्दू मुसलमान चूरण की तरह इस्तमाल किये जा रहे हैं। नहीं देखना चाहते तो डिबेट देखिये।

Courtesy: http://naisadak.org/my-name-is-nisar/

دشت میں ظلم کی برسات کبھی تو ہوگی۔۔شکیل قادری

 

دو بدو اس سے ملاقات کبھی تو ہوگی۔

موت کے ساتھ میری بات کبھی تو ہوگی۔

 

حکمِ ربی سے جو روشن ہیں میری آنکھوں میں

ان چراغوں کے لئے رات کبھی تو ہوگی۔

 

میرے ہونٹوں کو خدا حسنِ سخن کر دے عطا

بزم میں بارِشہ نغمات کبھی تو ہوگی۔

 

روزو شب سر میں ہتھیلی پہ لئے پھرتا ہوں

دشت میں ظلم کی برسات کبھی تو ہوگی۔

 

باغ میں مل نہ سکے، دارو رسن پر لیکن

آپ سے میری ملاقات کبھی تو ہوگی۔

 

بس اسی آس میں کرتا ہوں تیرے در کا طواف

بارش لطفو عنایات کبھی تو ہوگی۔

 

ایہ خدا دے صفت شو’لا بیانی مجھ کو

تیرے لب پہ یہ مناجات کبھی تو ہوگی۔

 

مجھ کو رغبت ہے شکیل اس لئے آبو گل سے

ان میں تحلیل میری ذات کبھی تو ہوگی۔

 

दश्त में ज़ुल्म की बरसात कभी तो होगी.—शकील क़ादरी

 

दूबदू उस से मुलाक़ात कभी तो होगी.

मौत के साथ मेरी बात कभी तो होगी.

 

हुक्मे रब्बी से जो रौशन हैं मेरी आँखों में

उन चराग़ों के लिये रात कभी तो होगी.

 

मेरे होंटों को ख़ुदा हुस्ने सुख़न कर दे अता

बज़्म में बारिशे नग़मात कभी तो होगी.

 

रोज़ो-शब सर मैं हथेली पे लिये फिरता हूँ

दश्त में ज़ुल्म की बरसात कभी तो होगी.

 

बाग़ में मिल न सके, दारो रसन पर लेकिन

“आप से मेरी मुलाक़ात कभी तो होगी.”

 

बस इसी आस में करता हूँ तेरे दर का तवाफ़

बारिशे लुत्फ़ो-इनायात कभी तो होगी.

 

अय ख़ुदा दे सिफ़ते शो’ला बयानी मुझ को

तेरे लब पे ये मुनाजात कभी तो होगी.

 

मुझ को रग़्बत है शकील इस लिये आबो-गिल से

इन में तह्लील मेरी ज़ात कभी तो होगी.

 

 

دشت میں پیاس بجھاتے ہوئے مرجاتے ہیں – عباس تابش

دشت میں پیاس بجھاتے ہوئے مرجاتے ہیں

ہم پرندے کہیں جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم ہیں سوکھے ہوئے تالاب پہ بیٹھے ہوئے ہنس

جو تعلق کو نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

گھر پہنچتا ہے کوئی اور ہمارے جیسا

ہم ترے شہر سے جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

کس طرح لوگ چلے جاتے ہیں اُٹھ کر چپ چاپ

ہم تو یہ دھیان میں لاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ان کے بھی قتل کا الزام ہمارے سر ہے

جو ہمیں زہر پلاتے ہوئے مر جاتے ہیں

یہ محبت کی کہانی نہیں مرتی لیکن

لوگ کردار نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم ہیں وہ ٹوٹی ہوئی کشتیوں والے تابش

جو کناروں کو ملاتے ہوئے مر جاتے ہیں

दश्त में प्यास बुझाते हुए मरजाते हैं – अब्बास ताबि

 

दश्त में प्यास बुझाते हुए मरजाते हैं

हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं

 

हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस

जो ताल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं

 

घर पहुंचता है कोई और हमारे जैसा

हम तेरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं

 

किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप-चाप

हम तो ये ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं

 

उनके भी क़तल का इल्ज़ाम हमारे सर है

जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं

 

ये मुहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

 

हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले ताबिश

जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं

۔کوئی کہانی اور ہے۔۔۔منوررانا۔

ہاں اجازت ہے اگر کوئی کہانی اور ہے

ان کٹوروں میں ابھی تھوڑا سا پانی اور ہے

مذہبی مزدور سب بیٹھے ہیں ان کو کام دو

اک عمارت شہر میں کافی پرانی اور ہے

خامشی کب چیخ بن جائے کسے معلوم ہے

ظلم کر لو جب تلک یہ بے زبانی اور ہے

خشک پتے آنکھ میں چبھتے ہیں کانٹوں کی طرح

دشت میں پھرنا الگ ہے باغبانی اور ہے

پھر وہی اکتاہٹیں ہوں گی بدن چوپال میں

عمر کے قصے میں تھوڑی سی جوانی اور ہے

بس اسی احساس کی شدت نے بوڑھا کر دیا

ٹوٹے پھوٹے گھر میں اک لڑکی سیانی اور ہے

 

कोई कहानी और है–. मुनव्वर राना

 

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है
इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है

मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं उनको काम दो
इक इमारत शहर में काफ़ी पुरानी और है

ख़ामुशी कब चीख़ बन जाये किसे मालूम है
ज़ुलम कर लो जब तिलक ये बेज़बानी और है

ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं कांटों की तरह
दश्त में फिरना अलग है बाग़बानी और है

फिर वही उक्ताहटें होंगी बदन चौपाल में
उम्र के क़िस्से में थोड़ी सी जवानी और है

बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया
टूटे फूटे घर में इक लड़की सियानी और है

 ہمیشہ اسلام تھا جس پہ نازاں۔۔۔۔مولاناالطاف حسین حالی

Hali

یہ کوئی کھیل نہیں ہے مقابلہ دل کا۔۔۔۔داغ دہلوی

زباں ہلاؤ تو ہو جائے فیصلہ دل کا

اب آچکا ہے لبوں پر معاملہ دل کا

کسی سے کیا ہو تپش میں مقابلہ دل کا

جگر کو آنکھ دکھاتا ہے آبلہ دل کا

خدا کے واسطے کرلو معاملہ دل کا

کہ گھر کے گھر ہی میں ہو جائے فیصلہ دل کا

تم اپنے ساتھ ہی تصویر اپنی لے جاؤ

نکال لیں گے کوئی اور مشغلہ دل کا

قصور تیری نگہہ کا ہے کیا خطا اُس کی

لگاوٹوں نے بڑھایا ہے حوصلہ دل کا

نہ جان دیتے بن آئے نہ زندہ رہتے بنے

بگڑ گیا ہے یہ کیسا معاملہ دل کا

شباب آتے ہی اے کاش موت بھی آتی

ابھارتا ہے اسی سن میں ولولہ دل کا

کئے ہیں تونے دلِ اہل انجمن بے تاب

روا روی میں ہے مصروف قافلہ دل کا

جو مصنفی ہے جہاں میں تو منصفی تیری

اگر معاملہ ہے تو معاملہ دل کا

ملی بھی ہے کبھی عاشق کی داد دنیا میں

ہوا بھی ہے کبھی کم بخت فیصلہ دل کا

نگاہِ مست کو تم ہوشیار کردینا

یہ کوئی کھیل نہیں ہے مقابلہ دل کا

ہماری آنکھ میں بھی اشک گرم ایسے ہیں

کہ جن کے آگے بھرے پانی آبلہ دل کا

اگرچہ جان پہ بن بن گئی محبت میں

کسی کے منہ پہ نہ رکھا کبھی گلہ دل کا

ازل سے تابہ ابد عشق ہے اسی کے لیے

ترے مٹائے مٹے گا نہ سلسلہ دل کا

کروں تو داور محشر کے سامنے فریاد

تجھی کو سونپ نہ دے وہ معاملہ دل کا

نہ آئیں خضر کبھی آپ بھول کر بھی ادھر

جناب من! نہیں آسان مرحلہ دل کا

کچھ اور بھی تجھے اے داغ بات آتی ہے

وہی بتوں کی شکایت، وہی گلہ دل کا

 

 ये कोई खेल नहीं है मुक़ाबिला दिल का….दाग दहेल्वी

 

ज़बाँ हिलाओ तो हो जाए,फ़ैसला दिल का

अब आ चुका है लबों पर मुआमला दिल का

 

किसी से क्या हो तपिश में मुक़ाबला दिल का

जिगर को आँख दिखाता है आबला दिल का

 

कुसूर तेरी निगाह का है क्या खता उसकी

लगावटों ने बढ़ाया है हौसला दिल का

 

शबाब आते ही ऐ काश मौत भी आती

उभरता है इसी सिन में वलवला दिल का

 

निगाहे-मस्त को तुम होशियार कर देना

ये कोई खेल नहीं है मुक़ाबिला दिल का

 

हमारी आँख में भी अश्क़े-गर्म ऐसे हैं

कि जिनके आगे भरे पानी आबला दिल का

 

अगरचे जान पे बन-बन गई मुहब्बत में

किसी के मुँह पे न रक्खा मुआमला दिल का

 

करूँ तो दावरे-महशर के सामने फ़रियाद

तुझी को सौंप न दे वो मुआमला दिल का

 

कुछ और भी तुझे ऐ `दाग़’ बात आती है

वही बुतों की शिकायत वही गिला दिल का

 

 

موت کا اشتعرہ۔۔۔۔پروین شاکرکی نظموں میں۔۔۔۔۔۔کشور ناہید

Parvin Shakir15may 15 Jadeed KhabarPl.double click the image to read.

(courtesy:jadeed Khabar16 may2016))

تذکرہ مجذوب ……..شکیل فاروقی جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے – خواجہ عزیز الحسن مجذوب

 

        جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے

        یہ عبرت کی جا ہے تماشہ نہیں ہے

 

        جہاں میں ہیں عبرت کے ہر سُو نمونے

        مگر تجھ کو اندھا کیا رنگ و بُو نے

        کبھی غور سے بھی دیکھا ہے تو نے

        جو معمور تھے وہ محل اب ہیں سُونے

 

        جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے

        یہ عبرت کی جا ہے تماشہ نہیں ہے

 

        ملے خاک میں اہلِ شاں کیسے کیسے

        مکیں ہو گٔیٔے لا مکاں کیسے کیسے

        ھؤے ناموَر بے نشاں کیسے کیسے

        زمیں کھا گٔیٔ آسماں کیسے کیسے

 

        جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے

        یہ عبرت کی جا ہے تماشہ نہیں ہے

 

        اجل نے نہ کسریٰ ہی چھوڑا نہ دارا

        اسی سے سکندرسا فاتح بھی ہارا

        ہر ایک چھوڑ کے کیاکیا حسرت سدھارا

        پڑا رہ گیا سب یہیں ٹھاٹ سارا

 

        جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے

        یہ عبرت کی جا ہے تماشہ نہیں ہے

 

        تجھے پہلے بچپن میں برسوں کھلایا

        جوانی نے پھر تجھ کو مجنوں بنایا

        بڑھاپے نے پھر آ کے کیا کیا ستایا

        اجل تیرا کر دے گی بالکل صفایا

 

        جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے

        یہ عبرت کی جا ہے تماشہ نہیں ہے

 

        یہی تجھ کو دھُن ہے رہُوں سب سے بالا

        ہو زینت نرالی ہو فیشن نرالا

        جیا کرتا ہے کیا یونہی مرنے والا؟

        تجھے حسنِ ظاہر نے دھوکے میں ڈالا

 

 

        کؤی تیری غفلت کی ہے انتہا بھی؟

        جنون چھوڑ کر اب ہوش میں آ بھی

        جگہ جی لگانے کی دنیا نہیں ہے

        یہ عبرت کی جا ہے تماشہ نہیں ہے

 

تذکرہ مجذوب

شکیل فاروقی

 پیر ۱۱ مارچ ۲۰۱۳

 قد لمبا اور کشیدہ، رنگ نہایت صاف اور گورا، بدن پتلا اور چھریرا، ناک نقشہ تیکھا اور باریک، چہرے پر براق جیسی سفید داڑھی، گھنی اور سیدھی، شخصیت میں مقناطیسی جاذبیت و کشش، جسم پر کلی دار کرتا اور شرعی پاجامہ اور سر پر پانچ کلیوں والی چکن یا ململ کی ٹوپی، طبیعت میں بلا کی نفاست، نزاکت اور صفائی و سادگی، موسم گرما میں عموماً اعلیٰ قسم کی چکن کا کرتا اور موسم سرما میں انگرکھا یا شیروانی زیب تن فرمائے، مزاجاً نہایت شگفتہ خاطر، چہرہ ہنس مکھ اور کھلتا ہوا، طبیعت میں ہر وقت گلوں کی سی تازگی اور جولانی، آنکھوں میں بے پناہ چمک اور معصومیت، باتوں میں شہد جیسی شیرینی اور زبان سر بسر ٹکسالی اور کھری۔ یہ تھے خواجہ عزیز الحسن غوریؒ جوکہ حضرت مولانا محمد اشرف علی تھانویؒ کے خلیفہ خاص تھے اور شاعری میں مجذوب تخلص فرماتے تھے۔

 خواجہ مجذوب کی شخصیت عشق حقیقی سے لبریز اور دیگر شعراء سے بالکل ہٹ کر تھی، ان کا کلام سب سے انوکھا اور نرالا تھا بڑے بڑے قادر الکلام شعراء ان کے معترف اور بے شمار سخن شناس اور اہل ذوق ان کے حلقہ بگوش اور گرویدہ تھے۔ انتہا تو یہ ہے کہ خود آپ کے شیخ حضرت تھانویؒ کو آپ کے اشعار بے حد پسند اور مرغوب تھے، خصوصاً درج ذیل شعر جس کے بارے میں حضرت والا نے ایک مرتبہ یہ فرمایا تھا کہ اگر میرے پاس ایک لاکھ روپے ہوتے تو میں اس شعر کے عوض آپ کو بلاتامل دے دیتا:

ہر تمنا دل سے رخصت ہوگئی

اب تو آجا اب تو خلوت ہوگئی

 معرفت کے اس شعر کو صرف وہی شخص سمجھ سکتا ہے اور اس سے پوری طرح لطف اندوز ہوسکتا ہے جس کے دل میں خالق کائنات کی تڑپ موجزن ہو، اور جس نے اپنے آپ کو اللہ تعالیٰ کی ذات کے لیے وقف کردیا ہو، اور اپنے محبوب حقیقی کی طلب میں اپنا سب کچھ نچھاور کردیا ہو۔ اسی کیفیت میں ڈوبا ہوا خواجہ صاحب کا ایک اور شعر ملاحظہ فرمایئے:

ساری دنیا کی نگاہوں سے گرا ہے مجذوبؔ

تب کہیں جا کے ترے دل میں جگہ پائی ہے

 عارفین ان کے کلام کو معرفت کی نظر سے دیکھ کر سنتے تھے اور سر دھنتے تھے جب کہ سخنور اور سخن شناس ان کے اشعار کی باریکیوں اور نزاکتوں کو محسوس کرکے انھیں داد پر داد دیا کرتے تھے۔ خواجہ صاحب کے اشعار کی جاذبیت اور اثر آفرینی کا بنیادی سبب واردات قلب سے عبارت ہے ۔

ایک تو حسن تغزل سے لبریز عارفانہ کلام اوپر سے مجذوب صاحب کا منفرد پرسوز ترنم گویا سونے پر سہاگے والی بات تھی۔نہ وہ سناتے ہوئے تھکتے تھے اور نہ سامعین کی تشنگی کم ہونے کا نام لیتی تھی۔ شعروشاعری کی ان مجالس کا اختتام نماز یا کھانے کے وقت پر ہوتا تھا۔ اپنا درج ذیل شعر اثر ترنم کے ساتھ پڑھتے اور خود بھی لطف اٹھاتے اور سامعین کو بھی لطف اندوز فرماتے تھے:

 زیست کیا ہے ابتدائے درد ِدل

موت کیا ہے انتہائے درد ِدل

 

مجذوبؔ صاحب جس مشاعرے میں شریک ہوتے،اپنے کلام اور منفرد ترنم سے اسے لوٹ لیتے، ہر طرف سے سبحان اللہ اور مکرر مکرر کی تحسین آفریں صدائیں بلند ہوتیں۔ایک مرتبہ موصوف ایک مشاعرے میں سامعین کے درمیان موجود تھے کہ کسی کو آپ کی موجودگی کا علم ہوگیا۔ ذرا سی دیر میں منتظمین مشاعرہ کو اس کی مخبری ہوگئی۔ مجذوب صاحب اس وقت معمولی سے کپڑوں میں ملبوس تھے، مشاعرہ طرحی تھا۔ اچانک اسٹیج سے اعلان ہوا کہ اوپر تشریف لے آئیں۔ اس وقت انھیں بڑی پریشانی اور کشمکش لاحق ہوگئی، کپڑے میلے اور اوپر سے طرحی مشاعرے کی تیاری بالکل صفر۔ اسی دوران اسٹیج سے یہ اعلان ہوا کہ اگر آنے میں تاخیر کی تو ہم خود آپ کو تلاش کرلیں گے۔ چاروناچار اسی حالت میں اسٹیج پر جانا پڑا۔ آپ کا اوپر پہنچنا تھا کہ پورا پنڈال فلک شگاف تالیوں سے گونج اٹھا۔ مجذوبؔ صاحب نے معذرت کی کہ مشاعرہ طرحی ہے اور انھوں نے اس کی کوئی تیاری نہیں کی ہے، مگر ان کا یہ عذر یہ کہہ کر مسترد کردیا گیا کہ آپ تمام پابندیوں سے مستثنیٰ ہیں۔ چنانچہ آپ نے اپنی ایک مرصح غزل سنائی اور ہر ایک شعر پر داد پر داد وصول کی۔ اس غزل کے چند اشعار ملاحظہ فرمائیں:

کوئی مزا ‘ مزا نہیں‘ کوئی خوشی‘ خوشی نہیں

تیرے بغیر زندگی‘ موت ہے‘ زندگی نہیں

میکشو! یہ تو میکشی‘ رندی ہے میکشی نہیں

آنکھوں سے تم نے پی نہیں‘ آنکھوں کی تم نے پی نہیں

بیٹھا ہوں میں جھکائے سر‘ نیچی کیے ہوئے نظر

بزم میں سب سہی مگر‘ وہ جو نہیں کوئی نہیں

سردی کا موسم اپنے شباب پر تھا اور محفل گرم تھی کہ کسی نے خواجہ صاحب کی خدمت مین تاپنے کے لیے ازراہ محبت و عقیدت انگیٹھی بھجوادی۔ خواجہ صاحب بڑے محظوظ ہوئے اور قدر افزائی کے طور پر برجستہ یہ اشعار کہے:

انگیٹھی تم نے انگاروں بھری کیوں ہائے بھجوا دی

دہکتی آگ سینے کی میرے اف اور بھڑکا دی

کیا تھا کم بڑی مشکل سے جوش اشعار پڑھنے کا

میں ٹھنڈا پڑ گیا تھا پھر طبیعت میری گرما دی

ایک کمسن بچے پر شفقت کی نظر پڑی تو بے ساختہ یہ فرمایا:

ترے گال کیا ہیں ڈبل روٹیاں ہیں

نہیں کوئی پڑی فقط بوٹیاں ہیں

 خواجہ صاحب کا کچھ کلام تو ان کی زندگی میں ہی اشاعت پذیر ہوا اور کچھ ان کی وفات کے بعد سید مولانا ظہور الحسن نے تلاش کر کرکے ایک مجموعے کی صورت میں ’’کشکول مجذوب‘‘ کے عنوان سے چھاپ دیا جس میں غیر طبع شدہ کلام شامل ہے۔

 خواجہ عزیز الحسن مجذوبؔ نے بہ لحاظ پیشہ اسسٹنٹ انسپکٹر سرشتہ تعلیم کی حیثیت سے سرکاری خدمات انجام دیں اور دوران ملازمت طویل رخصت حاصل کرکے اپنے پیرومرشد حکیم الامت حضرت مولانا اشرف علما تھانویؔ کی سوانح حیات تحریر فرمائی جوکہ تین جلدوں پر مشتمل ہے۔ اس کی آخری جلد کے اختتامی حصے میں اپنے حالات زندگی بھی قلم بند فرمائے۔ خواجہ صاحب کے کلام میں ان قطعات کو خصوصی اہمیت حاصل ہے جو ان کے شیخ حضرت تھانویؒ کے درس و تعلیمات پر مشتمل ہیں۔اور اب چلتے چلتے مجذوبؔ صاحب کا یہ خوبصورت شعر ملاحظہ فرمائیے اور جی بھر کر داد دیجیے:

کلام مجذوبؔ والہانہ‘ ہمیشہ دہرائے گا زمانہ

 کسی حسیں کا نہیں فسانہ‘ یہ ایک عاشق کی داستاں ہے

اتھو مرنے کا حق استعمال کرو۔۔۔۔حبیب جالب

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हमें कुछ और मत पढवाओ, हम कुरआन पढ़ते हैं…….डॉ.राहत इन्दोरी

 

यही ईमान लिखते हैं, यही ईमान पढ़ते हैं

हमें कुछ और मत पढवाओ, हम कुरआन  पढ़ते हैं

यहीं के सारे मंजर हैं, यहीं के सारे मौसम हैं,

वो अंधे हैं, जो इन आँखों में पाकिस्तान पढ़ते हैं

2

हमें पहचानते हो,हमको हिंदुस्तान कहते  हैं

मगर कुछ लोग जाने क्युं हमें महेमान कहते  हैं

मेरे अंदरसे एक एक करके  सब कुछ हो गया  रुखसत

मगर एक चीज बाकी  है जीसे  ईमान कहते  हैं

मसीहा दर्दके हमदर्द हो जाये तो क्या होगा

रवादारी के जजबे  खत्म हो जायें तो क्या  होगा

जो ये लाखों करोंडों पांच वकतों के नमाजी  है

अगर सचमुचमें दहशत गर्द हो जाये तो क्या  होगा

 

ہمیں کچھ اور مت پڑھواؤ، ہم قرآن پڑھتے ہیں۔۔۔۔۔۔۔راحت اندوری

 

یہی ایمان لکھتے ہیں، یہی ایمان پڑھتے ہیں
ہمیں کچھ اور مت پڑھواؤ، ہم قرآن پڑھتے ہیں

یہیں کے سارے منظر ہیں، یہیں کے سارے موسم ہیں،
وہ اندھے ہیں، جو ان آنکھوں میں پاکستان پڑھتے ہیں

2

ہمیں پہچانتے ہو،ہم کو ہندوستان کہتے ہیں
مگر کچھ لوگ جانے کیوں ہمیں مہمان کہتے ہیں

میرے اندر سے ایک ایک کرکے سب کچھ ہو گیا رخصت
مگر ایک چیز باقی ہے جیسے ایمان کہتے ہیں

مسیحا درد کے ہمدرد ہو جائے تو کیا ہوگا
رواداری کے جذبے ختم ہو جائیں تو کیا ہوگا

جو یہ لاکھوں کرونڈوں پانچ وقتوں کے نمازی ہے
اگر سچمچمیں دہشت گرد ہو جائے تو کیا ہوگا

 

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सारे बीमार चले आते हैं तेरी जानिब —मुनव्वर राना

अपने हकीम साहब मरहूम भी क्या चीज़ थे, अल्लाह उनकी मग़फिरत करे. इस अदा से झूठ बोलते थे कि सच्चाई बगलें झांकने लगती थी. हर जुमले में तहदारी और इतनी परतें होती थीं कि प्याज की खेती करने वाले भी पैदावार बढ़ाने के लिए उनसे मशविरा करते थे हर चंद कि मैंने किसी भी प्याज के काश्तकार को उन्हें मशविरा देते तो नहीं देखा लेकिन कोई भी होटल वाला उनसे सलाद के पैसे नहीं लेता था. जब भी मौसूफ़ से इस मेहरबानी की वजह पूछी जाती तो पहले हंस कर टाल जाते थे, लेकिन तफ़तीश की यलगार से उकता कर मुस्कुराते हुए कहते थे कि कूचए अरबाबे निशात में फ्रेंच लैटर के पैसे नहीं लिए जाते, सलासत के साथ बलागत और उसके साथ-साथ मानी आफ़रीनी उनके गुफ़्तगू का ख़ासा थी, मौसूफ इबहाम के जत्ररिए जदीदियत की तीसरी मंजिल माबाद जदीदियत का संगे बुनियाद रखते हुए भी शेर के मिसरों को कभी दोलख़्त नहीं होने देते थे. नफ़ासत पसंदी का ये आलम था कि इत्र भी ऐसा इस्तेमाल करते थे जो रुसवाई की तरह फैले, उनका कहना था कि ऐसे मुश्क से क्या फायदा कि गवाही के लिए हिरन ले कर घूमना पड़े. इत्र हमेशा एक मख़सूस दूकान से लेते थे. अक्सर फ़रमाते थे, कि इत्र फरोश और जिस्म फरोश अगर अपनी तब़ीयत से नवाज़ दे तो नवाजिश है वरना समझ लो साजि़श है. ज़ुमले को इबहाम की तंग गली से निकालने की कोशिश में ये भी फ़रमाते थे कि यूं तो इत्र की फुरेरी खोंस देना और हवा में बोसा उछाल कर गाहक तक पहुंचा देना, इत्र फ़रोशों के पेशे में शामिल है. लेकिन बक़ौल बशीर ‘बद्र’- कभी यूं भी आ मेरी आंख में कि मेरी नज़र को खबर न हो मुझे एक रात नवाज दे मगर उसके बाद सहर न हो हालांकि बशीर ‘बद्र’ के सिलसिले में जब भी गुफ्तगू होती थी तो हकीम साहब हमेशा यही फरमाते थे कि आदमी कलम के बग़ैर, औरत दुपट्टे के बग़ैर, सिपाही तलवार के बग़ैर और बशीर ‘बद्र’ मुनाफिक़त के बगैर नंगे सर मालूम होते है, साथ में ये भी फरमाते थे कि सर को यहां हशू-ओ-ज़ायद समझा जाए.किसी भी मौजू की तरफ़दारी और मुख़ालिफ़त पर एक साथ गुफ़्तगू कर सकते थे, सियासत को मच्छरदानी में मच्छर का शिकार कहते थे, मच्छरदानी को टट्टी की आड़ में शिकार कहते थे, जदीद शायरी के मसौदे को क़ारूरे की तरह देखते थे. साहिबे क़ारूरा के हाथ में क़ारूरा होता था और हाथ हक़ीम साहब के हाथ में. जिस हाथ से मैंने तेरी जुल्फों को छुआ था छुप छुप के उसी हाथ को मैं चूम रहा हूं (मुशीर झिंझानवी) तरन्नुम से पढ़ने वालों को सरअत अंज़ाल (नज़ले की जमा) का शिकार कहते थे बहुत जूदगो शायर को भी सरअत अंज़ाल (यहां नज़ले की जमा नहीं है) का नतीजा कहते थे, दवा दोनों को एक ही देते थे, फ़ीस मुशायरे के रेट के मुताबिक़ लेते थे. मुशायरे से वापसी पर हमेशा गुस्ल करते थे, कभी वजह नहीं बताते थे, लेकिन शर्मिदा शर्मिदा से रहते थे, मुशायरे में शायरात की कसरत से कन्वीनर को खानदानी पसमंज़र समझ लेते थे. कई ऐसे ही मुशायरों को कन्वीनर को ख़ानदानी पसमंज़र समझ लेते थे. कई ऐसे ही मुशायरों को कन्वीनरों ने महफि़ले मुशायरा में हकीम साहब को देख कर मुशायरे से तौबा कर ली थी, क्योंकि हक़ीम साहब से उनकी दैरीना शनासाई निकली. उनमें से कई हज़रात ने कूचए अरबाबे निशात की आखि़री मंजि़ल तक सिर्फ़ उनकी रहबरी ही नहीं की थी बल्कि चिराग़े राह भी बन चुके थे. कई शायरात के डी.एन.ए. टेस्ट पर ज़ोर देते थे. लेकिन चंूकि दिल के अच्छे थे लिहाज़ा हर शायरा अच्छी लगती थी. रूमानी शायर को अपना रक़ीबे-रुसिया समझते थे. कभी कभी मूड मंे होते तो ये भी कहते थे कि उल्लू, तवाईफ और शायर, रात में ही अच्छे लगते हैं. दिन में तो ये सब एक जैसे दिखाई देते हैं. मुशायरे को मुजरे और नौटंकी का क्रास ब्रीड कहते थे. अक्सर अपनी शे’री सलाहीयत मनवाने के लिए जुमले में जदीदियत का चूना तेज करते हुए उस पर तोप चाची का कत्था भी उंड़ेल देते थे, ज़ायके को मज़ीद मौअतबर बनाने के लिए गुलकन्द का इस्तेमाल भी करते थे. मतला को अंधे ज़रगर के हाथों का बना हुआ झुमका कहते थे. बकि़या शे’रों को मेले की मिठाई और तख़ल्लुस को नाक की कील कहते थे. मुशायरे की शायरी को चरसी चाय और ख़ूबसूरत शायरत को जर्सी गाय कहते थे. ज़्यादा दाद मांगने वाले शायरों को फ़क़ीरों का नुतफ़ा और ना शायरों को रद्दी फ़रोश कहते थे. रिसाले के मुदीर को बैसाखी, सफ़हात को करंसी, तारीफ़ी ख़ूतूत को गीव एण्ड टेक और एकेडमियों को नक़ली कारतूस का कारख़ाना कहते थे. शायरों के मोबाइल रखने पर सख़्त ऐतराज़ करते थे. ऐसे शायरों की अलग फ़हरिस्त बना रखी थी जो पाख़ाने में भी मोबाइल ले कर जाते हैं लेकिन अक्सर जल्दी बाज़ी में पानी ले जाना भूल जाते थे और ये बात भी मुशायरे से लौटने के बाद याद आती थी. कई ऐसे शायरों से भी बाख़बर थे जिन्होंने नमाज़ पढ़ना सिर्फ इसलिए छोड़ रखी थी कि वहां मोबाइल बंद करना पड़ता था. स्टेज पर मोबाइल से बातें करने को सिगरेट पीकर दूसरों के मुंह पर धुआं छोड़ना कहते थे. ऐसे बेक़रार शायरों से भी बख़ूबी वाकि़फ़ थे जो मन्दिर की घन्टी बजने पर भी मोबाइल कान में लगा लेते हैं- ‘कैस’ तस्वीर पर्दे में भी उरियां निक़ला इश्क़ को जज़्बात की आबरू कहते थे. झाडि़यों की लुका छिपी से शदीद नफ़रत करते थे, उनका कहना था कि सच्चा इश्क़ तो वही है कि चाहे आदमी टूट जाए लेकिन सारी जवानी वजू ने टूटे, इश्क़ को ख़ुश रंग चिडि़यों का शिकार समझने वालों से शदीद नफ़रत करते थे. बीड़ी से ज़्यादा जब खुद सुलग उठते तो कहते थे कि फ्रेंच लैदर जेब में रख कर घूमने वाली क़ौमें क्या जानें कि गुलाब की शाख से उलझ कर रह जाने वाले आंचल का एक टुकड़ा आशिक़ के लिए कायनात के बराबर होता है. इश्क़ तो वह पाक़ीज़ा जज़्बा है जो एक बाज़ारी औरत के आंचल के बोसे के इंतिज़ार में भी सारी उम्र गुज़ार देता है. इश्क़ की ये दीवानगी अगर बाज़ार में मिलने वाली चीज़ होती तो लैला की पीठ पर मजनूं के ज़ख़्मों के निशान न होते, और अगर हुस्न की मंजि़ल भी दौलत होती तो फ़रहाद दूध की नहर निकालने के बजाए मुल्कों पर क़ब़्ज़ा करने के लिए तलवार लिए क़त्लों-ग़ारत गिरी कर रहा होता.क्लासीकल शायरी के रसिया थे, लेकिन रंगीन शायरी से अज़ली बैर था, फ़रमाते थे कि रंगीन ग़ज़ल महबूब के जिस्म का इश्तहार होती है. पराई बहू बेटियों का तज़किरा ग़ज़ल में करना लफ़्ज़ों से ब्लू फिल्म बनाने के मुतरादिफ़ है, अक्सर समझाते थे कि रंगीन ग़ज़ल महबूब की रुसवाई का सबब है, शहवत को भड़काने का मसाला है, जे़हनी अय्याशी का सामान है. मुशायरे और मुजरे को एक निगाह से देखते थे, मुशायरे को अदब की राम लीला कहते हैं. शायरों की टीम को नाटक मंडली और नकीबे मुशायरा को चोबदार कहते थे, ये कहते हुए इतना बुरा मंुह बनाते थे कि तनक़ीद गाली जैसे मालूम होती थी. ग़रज़ ये कि हकीम साहब की शख़्सीयत ‘छुटती नहीं है मुंह से ये काफि़र लगी हुई’ जैसी थी. उनकी जली कटी सुनकर कभी-कभी तो जी चाहता था कि आइंदा उनकी सूरत भी ने देखने की सूरत निकाली जाए. लेकिन हक़ीम साहब तो इक़तिदार के नशे की तरह मेरे जे़हनो दिल से क्या मोटर साईकिल तक से नहीं उतरते थे. नाराज़ होते थे तो ‘हम अपना मुंह इधर कर लें तुम अपना मुंह उधर कर लो.’ के पेशेनज़र मोटर साईकिल पर इस तरह बैठते थे सड़क पर बेहिजाबाना इज़हारे इश्क़ करने वाले कई जानवर भी शर्मिदा हो जाते थे. हमेशा समझाते थे कि ऐसे हर एक घर से दूर रहा करो जहां बीवेयर आॅफ डाग लिखा हो. क्यांेकि ज़रूरी नहीं कि उस घर में कुत्ता भी मौजूद हो. यूं भी इस बोर्ड के लिए कई घरों में कुत्ते की ज़रूरत ही नहीं होती. वफ़ादारी की वजह से कुत्तों का बहुत एहतराम करते थे, कभी आदमी को कुत्ता नहीं कहते थे उनका ख़याल था कि इससे वफ़ादारी के आबगीने को ठेस पहुंचती है. सियासी लीडरों की तरफ तो निगाह भी नहीं उठाते थे. कहते थे कि ये इतने नंगे होते हैं कि वजू टूट सकता है, ज़्यादा पढ़े लिखे लोगों से ऐसे बिदकते थे जैसे घोड़ा सांप से. नक़्क़ादों को हमेशा दूकान कहते थे, और तनक़ीद को लाल पेड़ा…. जब कोई इस तरकीबो-तलमीह के बारे मे पूछता तो कहते कि हफ़्ते भर की बची हुई मिठाई को फिर से फेंट लपेट कर लाल पेड़ा तैयार किया जाता है और तनक़ीद भी झूठी सच्ची लफ़जि़यात से तैयार की जाती है. कभी कभी तो उनका फ़लसफ़ा आईने की तरह सच बोलता हुआ लगता था. एक दिन बहुत ही अच्छे मूड में थे मेरे लिए अपने पास से चाय मंगवाई, दो अदद सिगरेट भी, नौकर से बचे हुए पैसे भी नहीं लिए, पहले तो नमकीन चने के कुछ दाने मेरे मुंह में रखवा कर अपना नमक ख़्वार बनाया फिर अपनी माचिस से मेरी सिगरेट ऐसे जलाई, जैसे गुजरात में बस्तियां जलाई जाती है. कम्प्यूटर से निकले फोटो की तरह मुस्कुराए फिर कहने लगे कि एक नुक्ता समझ लो, अगर किसी की बुराई जुबानी की जाए तो ग़ीबत है और उसे तहरीर के जे़वरात से आरास्ता कर के क़ाग़ज के राज सिंहासन पर बिठा दो तो तनक़ीद कहलाती है. दिल्ली में इसकी कई दुकानेें हैं, हालांकि उन दूकानों पर कोई साईन बोर्ड नहीं होता लेकिन तलाश करने में बिल्कुल दुशवारी नहीं होती. क्योंकि जिस्म फ़रोशी का भी काई साईन बोर्ड नहीं होता. जिस्म तो खुद ही ऐसा साईन बोर्ड होता है जिस पर तहरीर तो कुछ नहीं होता लेकिन सब कुछ पढ़ लिया जाता है. हकीम साहब, किसी भी तनक़ीद निगार को अच्छी नज़र से नहीं देखते थे. तनक़ीद ने भी हकीम साहब को कभी नज़र भर के नहीं देखा. नाक़दीन का कहना था कि तनक़ीद उसी जगह अपनी कुटिया बनाती है जहां तख़्लीक़ हो और हकीम साहब तख़्लीक़ी ऐतबार से बिल्कुल ही कल्लाशं है. लेकिन उन बातों को हकीम साहब निसवानी गीबत कहते थे. जबकि हकीम साहब तो यहां तक कहते थे कि मुझ पर नज़र पड़ते ही तनक़ीद निगार अपनी चश्मे बसीरत से यूं महरूम हो जाते है, जैसे हामला औरत को देख कर सांप. किसी ने हकीम साहब से अज़ राहे मज़ाक पूछ लिया कि क्या आप कभी हामला भी हो चुके है, ज़ाहिर है कि हकीम साहब से ये पूछना सांप की दुम पर पंाव रखने के बराबर है. लेकिन हकीम साहब की इसी अदा पर तो हम लोग मरते थे कि वह इस जुमले को ऐसे पी गए जैसे चिराग़ तेल पी जाता है. जैसे मज़दूर सरमाए दारों की गाली पी जाते हैं, जैसे घरेलू उलझनें चेहरे का आब पी जाती है, जैसे मग़रिबी औरतें हंसते हुए शराब पी जाती हैं. थोड़ी देर तक इधर उधर देखते रहे फिर बोले कि उर्दू तनक़ीद निगारों का यही तो फूहड़पन है कि ज़बानों बयान, मुहावरे बंदी, तलमीहात, इबहाम और इशारियत से कतई नावाकिफ होते है और उर्दू तनक़ीद में अंग्रेजी के कुछ गढ़े हुए जुमले और झूठे सच्चे फार्मी अण्डे जैसे अंग्रेजों का नाम लिख कर उर्दू शायरी को कीट्स, वुड्ज वर्थ की शायरी के बदन का मैल साबित करने की कोशिश करते हैं. बल्कि भी-कभी तो ‘शिबली’ की तहरीर को एक नुक़्ते की मदद से ‘शैली’ की तहरीर साबित कर देते हैं. ऐसे नाक़दीने-अदब को टूडी बच्चे कहते है जो अंग्रेजी के पहिए की मदद से अपनी अदबी गाड़ी खींचते हैं. एक दिन किसी ने इत्तिफ़ाक़न पूछ लिया कि हकीम साहब अदब में अब बड़े लोग क्यों नहीं पैदा हो रहे हैं, ये सवाल सुनते ही बच्चों की तरह खिलखिला कर हंस दिए फिर फरमाया कि अदब में बड़े लोग इसलिए पैदा नहीं हो रहे हैं कि हमारी तनक़ीद छोटे लोगों पर लिख रही है, हर शायर अपने साथ खुद साख़्ता कि़स्म के नक़्क़ाद लेकर चलता है. जैसे माफि़या अपने साथ दबंगो को लेकर चलते है या ज़्यादातर ये ख़ुद साख़्ता नाक़दीन अब उन लोगों पर लिखना पसंद करते थे जो उनकी सब्ज़ी के झोले में फ़ार्मी मुर्गे रख कर लाते हैं. बल्कि बवक्त़े ज़रूरत फ़ार्मी अण्डे तक देने को तैयार रहते है. ज़ाहिर है कि जब अदब फ़ार्मी अण्डे और मुगऱ्ी में उलझ जाएगा तो क़लम भी पेशेवर मौलवी की तकरीर होकर रह जाएगा. ऐसे घटिया अदबी बाजार में अच्छा अदब तलाश करना, ज़नख़ों के मेले में निरोध बेचना है. हकीम साहब तक़रीबन बेक़ाबू हो चुके थे. मगर बातें पते की कह रहे थे. कहने लगे उर्दू अदम में तनक़ीद उस नील गाय की तरह है जिसे भोले भाले शायर व अदीब उस पर उम्मीद पाल लेते हैं कि आगे चल कर ये दूध देगी. लेकिन ये तनक़ीदी नील गाएं अदब के लहलहाते खेत को चर जाती हैं. सांस लेने को रूके और फिर गोया हुए कि तनक़ीद की बेलगाम घोड़ी सिर्फ़ दौलत, अदबी इक़तिदार और गै़र मुल्की करंसी के कोड़ो से ही काबू में आ सकती है. फिर सबसे अफ़सोस की बात ये है कि हम ने उर्दू के हर तनक़ीद निगार को कई चीजे़ बेचते और बहुत सी ज़रूरी ओैर गैर जरूरी चीजें़ खरीदते देखा है लेकिन आज तक यानी 68 बरस की उम्र होने को आ गई, उसे कोई उर्दू रिसाला, कोई शेरी मजमूआ, कोई कहानियों की किताब यहां तक कि उर्दू का अख़बार भी ख़रीदते नहीं देखा और जिस ज़बान के अदीब व दानिशवर उर्दू ज़बान की बक़ा के लिए सौ पचास रुपये नहीं ख़र्च कर सकते, उस ज़बान की हिफ़ाज़त की गारंटी कौन ले सकता है. लिहाज़ा ये समझ लिया जाए कि उर्दू मर चुकी है.- कुछ रोज़ से हम सिर्फ़ यही सोच रहे हैं हम लाश हैं और गिद्ध हमें नोच रहे हैं।। (मुनव्वर राना)(गुफ्तगू के सितंबर 2012 अंक में प्रकाशित)

 

انصاف کو سولی پہ چھڑھانے پہ تلے ہو۔۔۔۔۔۔۔۔۔صالح اچھا

Tule hai !

تُلاکھوں سمندروں میں بجھایا گیا مجھے…نشتر خانقاہی

 

سو بار لوہے دلے٭ سے مٹایا گیا مجھے

میں تھا وہ حرف حق که بھلایا گیا مجھے

لکھے ہوئے کفن سے میرا تن ڈھکا گیا

بےکتبا٭ مقبروں میں دبایا گیا مجھے

محروم کرکے سانولی مٹی کے لمس سے

خوش رنگ پتھروں مے اگایا گیا مجھے

پنہاں تھی میرے جسم میں کئی سورجوں کی آنچ

لاکھوں سمندروں میں بجھایا گیا مجھے

کس کس کے گھر کا نور تھی میرے لہو کی آگ

جب بجھ گیا تو پھر سے جلایا گیا مجھے

میں بھی تو اک سوال تھا حل ڈھونڈتے میرا

یہ کیا که چٹکیوں میں اوڑایا گیا مجھے


लाखों समुंदरों में बुझाया गया मुझे….निश्तर ख़ानक़ाही

 

सौ बार लौहे-दिल* से मिटाया गया मुझे

मैं था वो हर्फ़े-हक़ कि भुलाया गया मुझे

 

लिक्खे हुए कफ़न से मेरा तन ढका गया

बे-कतबा* मक़बरों में दबाया गया मुझे

 

महरूम करके साँवली मिट्टी के लम्स से

खुश रंग पत्थरों मे उगाया गया मुझे

 

पिन्हाँ थी मेरे जिस्म में कई सूरजों की आँच

लाखों समुंदरों में बुझाया गया मुझे

 

किस-किसके घर का नूर थी मेरे लहू की आग

जब बुझ गया तो फिर से जलाया गया मुझे

 

मैं भी तो इक सवाल था हल ढूँढते मेरा

ये क्या कि चुटकियों में ऊड़ाया गया मुझे

یا پیش صلیب و دار گری۔۔۔۔۔ملکزادہ منظور

دیوار گری

या पेश-ए-सलीब-ओ-दार गिरी-.. मलिकज़ादा ‘मंजूर’

 

 ‘मंज़ूर’ लहू की बूँद कोई अब तक न मेरी बेकार गिरी

या रंग-ए-हिना बन कर चमकी या पेश-ए-सलीब-ओ-दार गिरी

 

औरों पे न जाने क्या गुज़री इस तेग़ ओ तबर के मौसम में

हम सर तो बचा लाए लेकिन दस्तार सर-ए-बाज़ार गिरी

 

जो तीर अँधेरे से थे चले वो सरहद-ए-जाँ को छू न सके

चलता था मैं जिस के साए में गर्दन पे वही तलवार गिरी

 

क्या जानिये कैसी थी वो हवा चौंका न शजर पत्ता न हिला

बैठा था मैं जिस के साए में ‘मंज़ूर’ वही दीवार गिरी

 

خشک پھولوں کو کتابوں میں نہ رکھے کوئی …پروین شاکر

 

 عکس خوشبو ہوں، بکھرنے سے نہ روکے کوئی

اور بکھر جائوں تو مجھ کو نہ سمیٹے کوئی

 

کانپ اٹھتی ہوں میں یہ سوچ کے تنہائی میں

میرے چہرے پہ ترا نام نہ پڑھ لے کوئی

 

جس طرح خواب مرے ہو گئے ریزہ ریزہ

اس طرح سے نہ کبھی ٹوٹ کے بکھرے کوئی

 

میں تو اس دن سے ہراساں ہوں کہ جب حکم ملے

خشک پھولوں کو کتابوں میں نہ رکھے کوئی

 

اب تو اس راہ سے وہ شخص گزرتا بھی نہیں

اب کس اُمید پہ دروازے سے جھانکے کوئی

 

کوئی آہٹ، کوئی آواز، کوئی چاپ نہیں

دل کی گلیاں بڑی سنسان ہیں، آئے کوئی

 

 

ख़ुशक फूलों को किताबों में ना रखे कोई… प्रवीन शाकिर

 

अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से ना रोके कोई

और बिखर जाऊं तो मुझको ना समेटे कोई

 

काँप उठती हूँ में ये सोच के तन्हाई में

मेरे चेहरे पे तेरा नाम ना पढ़ ले कोई

 

जिस तरह ख्वाब मेरे हो गए रेज़ा रेज़ा

इस तरह से ना कभी टूट के बिखरे कोई

 

मैं तो इस दिन से हिरासाँ हूँ कि जब हुक्म मिले

ख़ुशक फूलों को किताबों में ना रखे कोई

 

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं

अब किस उमीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

 

कोई आहट, कोई आवाज़, कोई चाप नहीं

दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं, आए कोई

 

کیا خبر کب سپردِ خاک ہو جائں گے ہم۔۔۔۔۔وسیم ملک

پاک ہو جائنگے ہم

Posted by: Bagewafa | مارچ 31, 2016

منظر بدل گئے۔۔۔۔ملکزادہ جاوید

منظر بدل گئے۔۔۔۔ملکزادہ جاوید

Ghar badal gae

یاد آتاہے مجھے میرا بیاباں یارو۔۔۔۔صالح اچھا

 

آج انسان کا دشمن ہوا انساں یارو

کیوں مسلط ہواہرایک پہ شیطاں یارو

اب تو ہر صُبح ہوئی اشکِ بداماں لوگو

اب تو ہر شام ہوئی شامِ غریباں یارو

اس طرح ذہن اندھیروں کے ہوئے ہیں عادی

اب اُجالانہیں بھاتاکسی عنواں یارو

موسمِ وحشتِ دل ایسا کہاں آیاتھا

اپنے ہی ہاتھ میں ہے اپناگریباں یارو

کرگئی خوف زدہ اتنی ہوائے وحشت

اب تو یہ شہر لگے شہرِخموشاں یارو

ان اندھیروں میں ستاتاہے یہی ایک خیال

کیاکبھی ہوگی یہاں صُبحِ درخشاں یارو

جب بھی چلتی ہے گلستاں میں ہوائے دہشت

یاد آتاہے مجھے میرا بیاباں یارو

بے سبب تو نہیں صالحؔ کی المناک غزل

ایک مدت سے ہے وہ اشکِ بداماں یارو


याद आता है मुझे मेरा बयाबां यारो….. सालिह अच्छा

 

आज इन्सान का दुश्मन हुआ इंसां यारो

क्यों मुसल्लत हुआ हर एक पे शैताँ यारो

अब तो हर सुबह हुई इश्क़-ए-ब-दामाँ लोगो

अब तो हर शाम हुई शाम-ए-ग़रीबां यारो

इस तरह ज़हन अंधेरों के हुए हैं आदी

अब उजालानहीं भाता किसी उनवाँ यारो

मौसम-ए-वहशत-ए-दिल ऐसा कहाँ आया था

अपने ही हाथ में है अपना गरीबां यारो

कर गई ख़ौफ़-ज़दा इतनी हवा-ए-वहशत

अब तो ये शहर लगे शहर-ए-ख़मोशां यारो

इन अंधेरों में सताता है यही एक ख़्याल

क्या कभी होगी यहां सुबह-ए-दरख़शां यारो

जब भी चलती है गुलसिताँ में हवाए दहश्त

याद आता है मुझे मेरा बयाबां यारो

बेसबब तो नहीं सालह की उल-मनाक ग़ज़ल

एक मुद्दत से है वो इश्क़-ए-ब-दामाँ यारो

 

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وطنیّت—–علامه محمد اقبالؒ

اس دور میں مے اور ہے،جام اور ہے جم اور
ساقی نے بِناکی روِشِ لُطف و ستم اور
مسلم نے بھی تعمیر کیا اپنا حرم اور
تہذیب کے آزر نے ترشواے صنم اور
ان تازە خداوں میں بڑا سب سے وطن ہے
جو پیراہن اس کا ہے،وە مذہب ک کفن ہے

یە بت کہ تراشیدە تہذیبِ نوی ہے
غارت گرِ کاشانہ دینِ نَبوی ہے
بازو ترا توحید کی قوت سے قوی ہے
اسلام ترا دیس ہے، تُو مصطفَوی ہے
نظارە دیرینہ زمانے کو دِکھ دے
اے مصطفَوی خاک میں اِس بت کو مِلا دے!

ہو قید مقامی تو نتیجہ ہے تباہی
رہ بحر میں آزادِ وطن صُورتِ ماہی
ہےترکِ وطن سُنّتِ محبوبِ الٰہی
دے تُو بھی نبّوت کی صداقت پہ گواہی
گُفتارِ سیاست میں اور ہی کچھ ہے
ارشاد نبّوت میں اور ہی کچھ ہے

اقوامِ جہاں میں ہے رقابت تو اسی سے
تسخیر ہے مقصودِ تجارت تو اسی سے
خالی ہے صداقت سے سیاست تو اسی سے
کمزور کا گھر ہوتا ہے غارت تو اسی سے
اقوام میں مخلوقِ خدا بٹتی ہے اس سے
قومیّتِ اسلام کی جڑ کٹتی ہے اس سے

डॉ. अल्लामा इक़बाल (र . अ .) नेशनलिज़्म पर

 इस दौर में “मै” और है , “जाम” और है “जम” और

साक़ी ने बिना की, रविश-ए-लुत्फ़ व सितम और

मुस्लिम ने भी तामीर किया अपना हरम और
तहज़ीब के आज़र ने, तरश्वाए सनम और

इन ताज़ा खुदाओं में, बड़ा सब से, वतन है
जो पैराहन इस का है , वो मज़हब का कफ़न है

ये बुत के तराशीदा -ए -तहज़ीब -ए -नवी है

ग़ारत गरे काशाना -ए -दीन-ए-नबवी है

बाज़ू तेरा तौहीद की क़ुव्वत से क़वी है
इस्लाम तेरा देस है , तू मुस्तफ़वी है

नज्ज़ारा -ए -देरीना ज़माने को दिखा दे
ऐ मुस्तफ़वी ख़ाक में इस बुत को मिला दे

हो क़ैद -ए -मक़ामी तो नतीजा है तबाही
रहे बहर में आज़ाद -ए -वतन सूरत -ए -माही

है तर्क -ए -वतन सुन्नत -ए -महबूब -ए -इलाही
दे तू भी नबुव्वत की सदाक़त पे गवाही

गुफ़तार -ए -सियासत में वतन और ही कुछ है
इरशाद -ए -नबुव्वत में वतन और ही कुछ है

अक़वाम -ए -जहाँ में है रक़ाबत तो इसी से
तसख़ीर है मक़सूद-ए -तिजारत तो इसी से

ख़ाली है सदाक़त से सियासत तो इसी से
कमज़ोर का घर होता है ग़ारत तो इसी से

अक़वाम में मखलूक -ए -खुदा बटती है इस से
क़ौमिय्यत -ए -इस्लाम की जड़ कटती है इस से

 

نیاز و ناز کے جھگڑے مٹائے جاتےہیں۔۔۔۔۔ جگرؔ مراد آبادی

۔۔۔۔۔

نیاز و ناز کے جھگڑے مٹائے جاتے ہیں

ہم اُن میں اور وہ ہم میں سمائے جاتے ہیں

شروعِ راہِ محبت، ارے معاذ اللہ

یہ حال ہے کہ قدم ڈگمگائے جاتے ہیں

یہ نازِ حسن تو دیکھو کہ دل کو تڑپا کر

نظر ملاتے نہیں، مسکرائے جاتے ہیں

مرے جنون تمنا کا کچھ خیال نہیں

لجائے جاتے ہیں، دامن چھڑائے جاتے ہیں

جو دل سے اُٹھتے ہیں شعلے وہ رنگ بن بن کر

تمام منظر فطرت پہ چھائے جاتے ہیں

میں اپنی آہ کے صدقے کہ میری آہ میں بھی

تری نگاہ کے انداز پائے جاتے ہیں

رواں رواں لئے جاتی ہے آرزوئے وصال

کشاں کشاں ترے نزدیک آئے جاتے ہیں

کہاں منازلِ ہستی، کہاں ہم اہلِ فنا

ابھی کچھ اور یہ تہمت اُٹھائے جاتے ہیں

مری طلب بھی اسی کے کرم کا صدقہ ہے

قدم یہ اُٹھتے نہیں ہیں اُٹھائے جاتے ہیں

الہٰی ترکِ محبت بھی کیا محبت ہے

بھلاتے ہیں انہیں، وہ یاد آئے جاتے ہیں

سنائے تھے لب ِ نے سے کسی نے جو نغمے

لبِ جگر سے مکرر سنائے جاتے ہیں

 

नियाज़-ओ-नाज़ के झगड़े मिटाए जाते हैं।…जिगर मुरादाबादी

नियाज़-ओ-नाज़ के झगड़े मिटाए जाते हैं
हम उन में और वो हम में समाय जाते हैं

शुरूअ राह-ए-मुहब्बत, अरे मआज़-अल्लाह
ये हाल है कि क़दम डगमगाए जाते हैं

ये नाज़-ए-हुस्न तो देखो कि दिल को तड़पा कर
नज़र मिलाते नहीं, मुस्कुराए जाते हैं

मेरे जुनून-ए-तमन्ना का कुछ ख़्याल नहीं
लजाए जाते हैं, दामन छुड़ाए जाते हैं

जो दिल से उठते हैं शोले वो रंग बन-बन कर
तमाम मंज़र-ए-फ़ितरत पे छाए जाते हैं

मैं अपनी आह के सदक़े कि मेरी आह में भी
तेरी निगाह के अंदाज़ पाए जाते हैं

रवां रवां लिए जाती है आरज़ू-ए-विसाल
कशां कशां तेरे नज़दीक आए जाते हैं

कहाँ मनाज़िल-ए-हस्ती, कहाँ हम अहल-ए-फ़ना
अभी कुछ और ये तोहमत उठाए जाते हैं

मेरी तलब भी इसी के करम का सदक़ा है
क़दम ये उठते नहीं हैं उठाए जाते हैं

इलाही तर्क-ए-मुहब्बत भी किया मुहब्बत है
भुलाते हैं उन्हें, वो याद आए जाते हैं

सुनाए थे लबॱएॱ ने से किसी ने जो नग़मे
लब-ए-जिगर से मुकर्रर सुनाए जाते हैं

हमेशा देर कर देता हूँ मैं — मुनीर नियाज़ी

 हमेशा देर कर देता हूँ मैं

 ज़रूरी बात कहनी हो

कोई वादा निभाना हो

उसे आवाज़ देनी हो

उसे वापस बुलाना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

 

मदद करनी हो उसकी

यार का धाढ़स बंधाना हो

बहुत देरीना[1] रास्तों पर

किसी से मिलने जाना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

 

बदलते मौसमों की सैर में

दिल को लगाना हो

किसी को याद रखना हो

किसी को भूल जाना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

 

किसी को मौत से पहले

किसी ग़म से बचाना हो

हक़ीक़त और थी कुछ

उस को जा के ये बताना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

 

ہمیشہ دیر کردیتا ہوں میں۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ منیر نیازی

ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں میں

ضروری بات کہنی ہو

کوئی وعدہ نبھانا ہو

اسے آواز دینی ہو،

اسے واپس بلانا ہو

ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں میں

مدد کرنی ہو اس کی،

یار کی ڈھارس بندھانا ہو

بہت دیرینہ رستوں پر

کسی سے ملنے جانا ہو

ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں میں

بدلتے موسموں کی سیر میں

دل کو لگانا ہو

کسی کو یاد رکھنا ہو،

کسی کو بھول جانا ہو

ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں میں

کسی کو موت سے پہلے

کسی غم سے بچانا ہو

حقیقت اور تھی کچھ

اس کو جا کے يہ بتانا ہو

ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں میں

 

 

जो दिल में ‘दाग़’ न होते तो दाग़ देहलवी की शायरी इतनी रौशन होती?…..सत्याग्रह

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आज दाग़ देहलवी की पुण्यतिथि (25 मई 1831 – 17 मार्च 1905) है. वे ऐसे शायर रहे जिन्हें गालिब और जौक जैसे उस्तादों की शागिर्दी और संगत मिली पर उन्होंने इनसे अलग अपना एक मुकाम बनाया था

शरीर पर जख्म हों तो जाहिर है काफी तकलीफ होती है. जख्म भर जाने के बाद उसका दाग़ रह जाता है जो उस हादसे की स्मृतिभर होता है. यह जख्म या दुर्घटना को याद तो दिलाता है लेकिन पर हादसे की तकलीफ नहीं देता. क्या हो गर जख्म दिल पर लगे हों? अव्वल तो ये आसानी भरते नहीं, भर भी जाएं तो इनके दाग़ जेहन से कभी मिटते नहीं और ये दाग़ ताउम्र हादसे की याद दिलाते हैं, वह भी पूरे दर्द के साथ. मशहूर शायर दाग़ देहलवी की जिंदगी कुछ ऐसे ही दागों बनी थी, भरी थी.

दाग़ देहलवी का असल नाम नवाब मिर्जा खां था. ‘दाग़’ नाम उन्होंने अपने भीतर के शायर के लिए चुना. देहलवी यानी दिल्ली का या दिल्लीवाला, इसे उन्होंने अपना तखल्लुस बनाया. वह दिल्ली जो लगातार उनसे एक खेल खेलती रही. जो कभी तो मां की तरह उन्हें सीने में छिपाती रही तो कभी किसी बेवफा प्रेमिका की तरह उन्हें अपने दिल से बेदखल करती रही.

रामपुर में रहते हुए दाग़ को नर्तकी मुन्नीबाई से प्यार हो गया. ये प्यार भी कोई ऐसा-वैसा प्यार नहीं था. मुन्नीबाई लखनऊ के नवाब हैदर अली को बेहद अजीज थीं

दाग़ के दिल में बस दाग़ ही दाग़ थे. बहुत छोटी-सी उम्र में पिता को खो देने का दाग़. फिर मां का बहादुरशाह जफ़र के बेटे मिर्जा फखरू से दूसरे निकाह का गम. फिर उस दिल्ली को छोड़ने के लिए मजबूर होना जो उनके लिए किसी महबूबा से कम नहीं थी. इसी दिल्ली को 1857 में ग़दर के वक़्त लाशों से पटा हुआ देखने का दुख भी उनके दिल में जज्ब था.

मां की मौत के बाद दाग़ मौसी के पास रामपुर आ गए थे. इस स्थान परिवर्तन का गम भी उन्हें जिंदगीभर रहा. यहीं पचास साल की उम्र में उन्हें नर्तकी मुन्नीबाई से प्यार हो गया. ये प्यार भी कोई ऐसा-वैसा प्यार नहीं था. मुन्नीबाई लखनऊ के नवाब हैदर अली को बेहद अजीज थीं. इस प्यार में दाग़ के लिए नवाब की ताकत और रुतबे का कोई ख्याल न रहा और उन्होंने हैदर अली को पैगाम भिजवा दिया – दाग़ हिजाब के तीरे नजर का घायल है / आपके दिल को बहलाने को और भी सामां होंगे / दाग़ बिचारा हिजाब को न पाए तो और कहां जाए.’

नवाब हैदर अली भी कोई छोटे दिल के मालिक नहीं थे. उन्हें शायरी और शायरों की तहेदिल से कद्र करना आता था. ‘दाग़ साहब आपकी शायरी से ज्यादा हमें मुन्नीबाई अजीज नहीं’ इस पैगाम के साथ उन्होंने मुन्नीबाई को दाग़ के पास भेज दिया पर मुन्नीबाई दाग़ और हैदर अली की तरह प्यार को जीवन में सबकुछ समझनेवाली नही थीं. उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं थी. वे उसे अपनी इसी जिन्दगी में पूरा भी देखना चाहती थीं सो एक दिन दाग़ को तंगहाली में छोड़कर चलती बनीं और अपने एक जवान साजिंदे से शादी रचा ली.

उनकी मां ने जब बहादुरशाह जफ़र के बेटे मिर्जा फखरू से निकाह किया था तो इस घटना से उन्हें एक ग़म जरूर बैठा लेकिन इसके बाद के साल ही उनकी जिंदगी के सबसे सुनहरे साल थे

वक्त का पहिया सही दिशा में घूमा और दाग़ की जिंदगी में फिर से प्रसिद्धि और रुतबे वाले दिन आ गए. मुन्नीबाई उस साजिन्दे को छोड़कर फिर उनके पास वापस आ गईं. पोपले मुंह और बिना दांतोंवाली 73 वर्षीय मुन्नीबाई के लिए दाग़ के दिल में अब भी जगह थी. उन्होंने मुन्नीबाई को फिर स्वीकार कर लिया. पता नहीं यह दाग़ का बड़प्पन था या फिर टूटकर किसी को प्यार करने खूबी लेकिन जो भी हो इन सब दाग़ों ने मिलकर उनके शायरी को वह मुकाम दिया जिसे देखकर यह कहने का मन हो आता है – दाग़ के दिल के दाग़ अच्छे थे.

किसी भी तरह के प्रेम में दखल और बेदखली का यह खेल दाग़ की जिन्दगी का एक आम किस्सा रहा. वह चाहे जिन्दगी से प्रेम हो या फिर सचमुच का प्रेम या उनका दिल्ली प्रेम, सब उनसे इसी मतलबी अंदाज में मिलते और जुदा होते रहे. पर उन्होंने जिसे भी प्यार किया हमेशा के लिए किया.

उनकी मां ने जब बहादुरशाह जफ़र के बेटे मिर्जा फखरू से निकाह किया था तो इस घटना से उन्हें एक ग़म जरूर बैठा लेकिन इसके बाद के साल ही उनकी जिंदगी के सबसे सुनहरे साल थे. तकरीबन 12 साल के वक़्त का यह टुकडा दाग़ के दाग़ बनने की कहानी है. इस दौरान उन्हें राजकुमारों जैसा पाला गया, शानदार तहजीब और तालीम दी गई. ग़ालिब, मोमिन, जौक, शेफ्ता जैसे उस्ताद उन्हें उर्दू और ग़जल सिखाते थे. 12 वर्ष की नन्हीं-सी उम्र में उन्होंने अपनी शायरी के हुनर से इन बड़े-बड़े उस्तादों को चौंका दिया था. इतना ज्यादा कि उनके लिए मिर्जा ग़ालिब को भी यह कहना पडा – ‘दाग़ ने न सिर्फ भाषा को पढ़ा, बल्कि उसे तालीम भी दी.’

दाग़ साहब ने गजलों को फ़ारसी के कठिन और मुश्किल शब्दों की पकड़ से छुड़ाते हुए उस समय की आम बोलचाल की भाषा उर्दू के आसान शब्दों में पिरोया था

वह दाग़ ही थे जिन्होंने इन अजीम शायरों की छाप अपनी गजलों और शायरी पर नहीं पड़ने दी. जबकि इतने बड़े उस्तादों की नक़ल भी उन्हें उस वक्त ठीक-ठाक मुकाम तो दिला ही देती. दाग़ ने अपनी शायरी की राह खुद तलाशी. उन्होंने शेफ्ता की शायरी के नाटकीय अंदाज से परहेज किया. ग़ालिब की दार्शनिकता को खुद के शायर पर हावी नहीं होने दिया. मोमिन के उलझाव में खुद को बिना उलझाए हुए ही निकल आए. जौक की नैतिकता से भी उन्होंने खुद को खूब दूर रखा था. यह बाद उनके इन अल्फाज में दिखती है – ‘लुत्फ़-ए-मयकशी तुम क्या जानो, हाय कमबख्त तुमने पी ही नहीं.’ या फिर – ‘साकिया तिश्नगी की ताब नहीं, जहर दे दे अगर शराब नहीं.’

वैसे दाग़ किसी की नक़ल करते भी तो क्यों. उन्होंने शुरू से ही ऐसा लिखा कि लोग उनकी ही नक़ल करते रहे. इसके उदाहरण बहुत से शायरों के कलाम और फ़िल्मी गीतों में मिल जाएंगे. बिना किसी शायर का नाम लिए हम यहां ऐसे दो उदाहरण देख सकते हैं –

दाग़ – ‘सबलोग जिधर वो है उधर देख रहे हैं / हम तो बस देखनेवालों की नजर देख रहे हैं.’

1973 में आई फिल्म सबक का गीत – ‘हम जिधर देख रहें हैं, सब उधर देख रहे हैं / हम तो बस देखने वालों की नजर देख रहे हैं.’

दाग़ – लीजिये सुनिए अब अफ़साना ये फुरक़त मुझ से / आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया.’

1962 में आई फिल्म आरती का गीत – आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया / की मेरे दिल पे पड़ा था कभी गम का साया.’

दाग़ साहब ने गजलों को फ़ारसी के कठिन और मुश्किल शब्दों की पकड़ से छुड़ाते हुए उस समय की आम बोलचाल की भाषा उर्दू के आसान शब्दों में पिरोया था. यह कितना कठिन काम था यह दाग़ जानते थे. इस बात का गुमान भी उन्हें कहीं-न-कहीं था और उन्होंने कहा भी – ‘नहीं खेल-ए-दाग़ यारों से कह दो / कि आती है उर्दू जुबान आते-आते.’ और ‘उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़ / हिन्दोस्तां में धूम हमारी जबां से है.’ उनके शेर सीधी-सादी भाषा में साफ सुथरे तरीके से कहे गए शेर थे. जैसे बेहद चर्चित एक शेर का यह अंदाज देखें- ‘तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था?’ और इसके साथ दाग़ बेहद विनम्र, स्पष्टवादी और विनोदी स्वभाव के भी थे. यह उनके सिवाय और कौन कह सकता था – ‘जिसमें लाखों बरस की हूरें हो, ऐसी जन्नत का क्या करे कोई?’

प्रेम के हर अंदाज को अपने शब्द देनेवाला यह शायर उसे हर रंग में अपनी शायरी में पिरोता रहा. मिलना – खो जाना जिसके लिए उस तरह का अर्थ रखते ही नहीं थे. वह तो उसी का हो गया था और ताउम्र बना रहा जो दरअसल उसका था ही नहीं. प्रेम में नाकमयाब होना शायद इस अजीम शायर की किस्मत थी. फिर भी उसने उसका गिला कभी नहीं किया. किसी और से कभी रिश्ता न किया, न निभाया. और कभी जो गिला किया भी तो बड़े मासूम और दिलफरेब से भोले अंदाज में –

‘आप पछताए नहीं जौर से तौबा न करें
आपके सर की कसम दाग़ का हाल अच्छा है’

यह मत भूलो अगली नस्लें जलता रौशन शोला होती हैं۔—गौहर रजा

 

धर्म में लिपटी वतन परस्ती क्या क्या स्वांग रचाएगी

मसली कलियाँ, झुलसा गुलशन, ज़र्द ख़िज़ाँ दिखलाएगी

यूरोप जिस वहशत से अब भी सहमा सहमा रहता है

खतरा है वह वहशत मेरे मुल्क में आग लगायेगी

जर्मन गैसकदों से अबतक खून की बदबू आती है

अंधी वतन परस्ती हम को उस रस्ते ले जायेगी

अंधे कुएं में झूट की नाव तेज़ चली थी मान लिया

लेकिन बाहर रौशन दुनियां तुम से सच बुलवायेगी

नफ़रत में जो पले बढे हैं, नफ़रत में जो खेले हैं

नफ़रत देखो आगे आगे उनसे क्या करवायेगी

फनकारो से पूछ रहे हो क्यों लौटाए हैं सम्मान

पूछो, कितने चुप बैठे हैं, शर्म उन्हें कब आयेगी

यह मत खाओ, वह मत पहनो, इश्क़ तो बिलकुल करना मत

देश द्रोह की छाप तुम्हारे ऊपर भी लग जायेगी

यह मत भूलो अगली नस्लें जल्ता रौशन शोला होती हैं

आग कुरेदोगे, चिंगारी दामन तक तो आएगी

 

یہ مت بھولو اگلی نسلیں جلتاروشن شولہ ہوتی ہے۔۔۔۔۔گوہر رضا

 ھرم میں لِپٹی وطن پرستی کیا کیا سواںگ رچااےگی

مسلی کلیاں، جھُلسا گُلشن، ذر د  خِزاں دِکھلاّیگی

یُوروپ جِس وہشت سے اَب بھی سہما سہما رہتا ہے

خطرہ ہے وہ وہشت میرے مُلک میں آگ لگائےگی

جرمن گیسکدوں سے اب تک خون کی بدبُو آتی ہے

اَںدھی وطن پرستی ہم کو اُس رستے لے جائیگی

اَںدھے کوئیں میں جھُوٹ کی ناو تیز چلی تھی مان لیا

لیکِن باہر روشن دُنِیاں تُم سے سچ بُلواےےگی

نفرت میں جو پلے بڑے ہیں، نفرت میں جو کھیلے ہیں

نفرت دیکھو آگے آگے اُن سے کیا کروایّگی

فنکاراُ سے پُوچھ رہے ہو کیوں لؤٹائے ہیں سمّان

پُوچھو، کِتنے چُپ بیٹھے ہیں، شرم اُنہیں کب آئیگی

یہ مت کھاؤ، وہ مت پہنو، عشق تو بِل کُل کرنا مت

دیش دروہ کی چھاپ تُمہارے اُوپر بھی لگ جائیگی

یہ مت بھولوُ اَگلی نسلیں  جلتا روشن شولہ ہوتی ہیں

آگ کُریدُگے، چِںگاری دامن تک تو آئیگی

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