हम तुम्हें मरने न देंगे — गोपालदास "नीरज”

 

काव्य पाठ करते हुए नीरज

उपनाम:

‘नीरज’

जन्म:

04 जनवरी 1925

ग्राम पुरावली, जिला इटावा, उत्तर प्रदेश, भारत 

मृत्यु:

जुलाई 19, 2018

एम्स ,नई दिल्ली

कार्यक्षेत्र:

कवि सम्मेलन,

लगभग 50 वर्षों काव्य मंचों पर काव्य पाठ 

राष्ट्रीयता:

भारतीय

भाषा:

हिन्दी

काल:

बीसवीं शताब्दी

विधा:

गद्य, पद्य, गीत

विषय:

गीतकार, फ़िल्म

साहित्यिक

आन्दोलन:

काव्य मंचों पर साहित्यिक रचना की प्रस्तुति

प्रमुख कृति(याँ):

दर्द दिया है (पुरस्कृत), आसावरी (सचित्र),

मुक्तकी (सचित्र), लिख-लिख भेजत पाती (पत्र संकलन)

पन्त-कला, काव्य और दर्शन (आलोचना)

हम तुम्हें मरने न देंगे — गोपालदास "नीरज”

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धूल कितने रंग बदले डोर और पतंग बदले

जब तलक जिंदा कलम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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खो दिया हमने तुम्हें तो पास अपने क्या रहेगा

कौन फिर बारूद से सन्देश चन्दन का कहेगा

मृत्यु तो नूतन जनम है हम तुम्हें मरने न देंगे।

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तुम गए जब से न सोई एक पल गंगा तुम्हारी

बाग में निकली न फिर हस्ते गुलाबों की सवारी

हर किसी की आँख नम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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तुम बताते थे कि अमृत से बड़ा है हर पसीना

आँसुओं से ज्यादा कीमती है न कोई नगीना

याद हरदम वह कसम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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तुम नहीं थे व्यक्ति तुम आजादियों के कारवाँ थे

अमन के तुम रहनुमा थे प्यार के तुम पासवाँ थे

यह हकीकत है न भ्रम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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तुम लड़कपन के लड़कपन तुम जवानो की जवानी

सिर्फ दिल्ली ही न हर दिल था तुम्हारी राजधानी

प्यार वह अब भी न कम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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बोलते थे तुम न तुममें बोलता था देश सारा

बस नहीं इतिहास ही तुमने हवाओं को सवाँरा

.आज फिर धरती नरम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए—गोपालदास नीरज

 

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए

जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए

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जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर

फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए

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आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए

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प्यार का ख़ून हुआ क्यूँ ये समझने के लिए

हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए

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मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा

मैं रहूँ भूका तो तुझ से भी न खाया जाए

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जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे

मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए

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गीत उन्मन है ग़ज़ल चुप है रुबाई है दुखी

ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए

اب تو مذہب کوئی ایسا بھی چلایا جائے۔۔۔۔۔۔ گوپال داس نیرج

 

اب تو مذہب کوئی ایسا بھی چلایا جائے

جس میں انسان کو انسان بنایا جائے

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جس کی خوشبو سے مہک جائے پڑوسی کا بھی گھر

پھول اس قسم کا ہر سمت کھلایا جائے

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آگ بہتی ہے یہاں گنگا میں جھیلم میں بھی

کوئی بتلائے کہاں جا کے نہایا جائے

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پیار کا خون ہوا کیوں یہ سمجھنے کے لیے

ہر اندھیرے کو اجالے میں بلایا جائے

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میرے دکھ درد کا تجھ پر ہو اثر کچھ ایسا

میں رہوں بھوکا تو تجھ سے بھی نہ کھایا جائے

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جسم دو ہو کے بھی دل ایک ہوں اپنے ایسے

میرا آنسو تیری پلکوں سے اٹھایا جائے

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گیت انمن ہے غزل چپ ہے رباعی ہے دکھی

ایسے ماحول میں نیرجؔ کو بلایا جائے

Posted by: Bagewafa | جولائی 19, 2018

Speeches of Barister Asaduddin Owaisy in Parliament of India:

Speeches of Barister Asaduddin Owaisy in Parliament of India:

 

 

Sanjay Singh Firing Speech After Inauguration of Foot Bridge in Delhi

 

آج کی شب تو کسی طور گزر جائے گی۔۔۔۔۔پروین شاکر

 

ج کی شب تو کسی طور گزر جائے گی

رات گہری ہے مگر چاند چمکتا ہے ابھی

میرے ماتھے پہ ترا پیار دمکتا ہے ابھی

میری سانسوں میں ترا لمس مہکتا ہے ابھی

میرے سینے میں ترا نام دھڑکتا ہے ابھی

زیست کرنے کو مرے پاس بہت کچھ ہے ابھی

تیری آواز کا جادو ہے ابھی میرے لیے

تیرے ملبوس کی خوشبو ہے ابھی میرے لیے

تیری بانہیں ترا پہلو ہے ابھی میرے لیے

سب سے بڑھ کر مری جاں تو ہے ابھی میرے لیے

زیست کرنے کو مرے پاس بہت کچھ ہے ابھی

آج کی شب تو کسی طور گزر جائے گی!

آج کے بعد مگر رنگ وفا کیا ہوگا

عشق حیراں ہے سر شہر صبا کیا ہوگا

میرے قاتل ترا انداز جفا کیا ہوگا!

آج کی شب تو بہت کچھ ہے مگر کل کے لیے

ایک اندیشۂ بے نام ہے اور کچھ بھی نہیں

دیکھنا یہ ہے کہ کل تجھ سے ملاقات کے بعد

رنگ امید کھلے گا کہ بکھر جائے گا

وقت پرواز کرے گا کہ ٹھہر جائے گا

جیت ہو جائے گی یا کھیل بگڑ جائے گا

خواب کا شہر رہے گا کہ اجڑ جائے گا

 

 

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी…..परवीन शाकिर

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी

रात गहरी है मगर चाँद चमकता है अभी

मेरे माथे पे तिरा प्यार दमकता है अभी

मेरी साँसों में तिरा लम्स महकता है अभी

मेरे सीने में तिरा नाम धड़कता है अभी

ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी

तेरी आवाज़ का जादू है अभी मेरे लिए

तेरे मल्बूस की ख़ुश्बू है अभी मेरे लिए

तेरी बाँहें तिरा पहलू है अभी मेरे लिए

सब से बढ़ कर मिरी जाँ तू है अभी मेरे लिए

ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी!

आज के ब’अद मगर रंग-ए-वफ़ा क्या होगा

इश्क़ हैराँ है सर-ए-शहर-ए-सबा क्या होगा

मेरे क़ातिल तिरा अंदाज़-ए-जफ़ा क्या होगा!

आज की शब तो बहुत कुछ है मगर कल के लिए

एक अंदेशा-ए-बेनाम है और कुछ भी नहीं

देखना ये है कि कल तुझ से मुलाक़ात के ब’अद

रंग-ए-उम्मीद खिलेगा कि बिखर जाएगा

वक़्त पर्वाज़ करेगा कि ठहर जाएगा

जीत हो जाएगी या खेल बिगड़ जाएगा

ख़्वाब का शहर रहेगा कि उजड़ जाएगा

अनकहा इतिहास : अंग्रेजों की सबसे पहली लड़ाई उलेमा-ए-किराम के साथ

By Pradesh Hindi August 16, 2016

यह लेख जंगे आजादी का आगाज और मुसलमान उलेमा-ए-किराम का अहम किरदार की दूसरी कड़ी है।

सोलहवीं शताब्दी के खत्म होते होते अंग्रेजी सौदागर हिन्दुस्तान में पहुंच चुके थे। 31 दिसम्बर 1600 में क्वीन एलिजाबेथ की इजाजत से 100 सौदागरों ने 30000 पाउंड की रकम लगाकर East India Company की शुरुआत किया। पश्चिम बंगाल को कंपनी ने अपना हेडक्वॉर्टर बनाया और 150 साल तक अपनी सारी तवज्जो व्यवसाय में लगाया।

लेकिन जब औरंगजेब और मोहम्मद आजम शाह के बाद मुग़ल सल्तनत की बुनियाद कमजोर पड़ गई तो कंपनी ने अपना मुखौटा उतार फेंका और हुकूमत के निजाम में दखल अंदाजी शुरू कर दी।

 1757 में नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ पलासी की जंग में अंग्रेज़ी सेना खुल्लमखुल्ला मैदान में उतर आए और गद्दार मिर्जाफर की मदद से नवाब सिराजुद्दौला पराजित किया और पूरे बंगाल पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। फिर 1764 में अंग्रेजों के खिलाफ नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजय मिली और बिहार व बंगाल अंग्रेज के चपेट में चली गई। 1792 में टीपू सुल्तान के शहादत के बाद अंग्रेजों ने मैसूर पर कब्जा कर लिया। 1849 में पंजाब भी कंपनी के कब्जे में आ गया। इसतरह सिंध, आसाम, बर्मा, औध, रोहैलखन्ड, दक्षिणी भाग, अलीगढ़, उत्तरी भाग, मद्रास, पांडिचेरी, वगैरह अंग्रेजों के चपेट में आ गया और फिर वह वक्त भी आ गया जब दिल्ली पर भी कंपनी की हुकूमत कायम हो गई और मुग़ल बादशाह का सिर्फ़ नाम रह गया। इन इलाकों पर कब्जा जमाने के लिए अंग्रेजों ने क्या क्या तरकीबें अपनाया एनी बेसंत की जबानी सुनिए

"कंपनी वालों की लड़ाई सिपाहियों की लड़ाई न थी बल्कि सौदागरों की लड़ाई थी। हिन्दुस्तान को इंग्लिस्तान ने अपने तलवार से फतेह न किया बल्कि खुद हिन्दुस्तानियों के तलवार से और रिश्वतखोरी व साजिश, पाखंडता और दोरुखी पालिसी पर अमल कर के एक दूसरे से लड़ाकर उसने यह मुल्क हासिल किया है। "

(हिन्दुस्तान की कोशिश आजादी के लिए : 56)

मुल्क में ईस्ट इंडिया कंपनी के फैलती हुई जाल और बढ़ती हुई प्रभाव को सबसे पहले अगर किसी ने महसूस किया तो वह हजरत मौलाना शाह वलियूल्लाह देहलवी थें जिन्होंने देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीनने वाली हुकूमत को दरहम बरहम करने का खुफिया मिशन तैयार किया। उनके बनाए हुए मिशन के मुताबिक उनके बड़े बेटे मौलाना शाह अब्दुल अजीज देहलवी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का मुनज्जम आगाज किया और अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद फर्ज़ होने का फतवा जारी किया। यह फतवा मुल्क के कोने-कोने में जंगल के आग की तरह फैल गया।

1818 में जनता के तैयार करने के लिए मौलाना सैयद अहमद शहीद, मौलाना इस्माइल देहलवी, और मौलाना अब्दुल हई बुढानवी के परामर्श में एक दल गठित किया गया जिसने देश के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचकर लोगों को धार्मिक और राजनीतिक तौर पर जागरूक की, फिर अंग्रेजों से जिहाद के लिए 1820 / में मौलाना सैयद अहमद शहीद राय बरेलवी के नेतृत्व में मुजाहिदीन को रवाना किया गया, उन्होंने युद्ध की विशेषताओं के आधार पर जिहाद का केंद्र सूबा सरहद को बनाया, उद्देश्य अंग्रेजों से जिहाद था लेकिन पंजाब के राजा अंग्रेजों के वफादार थे, जिहाद के विरोधी थे और उसे विफल करने के उपाय कर रहे थे इसलिए पहले हजरत सैयद अहमद शहीद ने उन्हें संदेश भेजा कि "तुम हमारा साथ दो, दुश्मन (अंग्रेजों) के खिलाफ युद्ध करके हम देश तुम्हारे हवाले कर देंगे, हम देश व माल के तलबगार नहीं”। लेकिन राजा ने अंग्रेज की वफादारी न छोड़ें तो उससे भी जिहाद किया गया। 1831 / में बालाकोट के क्षेत्र में हज़रत मौलाना सैयद अहमद राय बरेलवी ने जाम शहादत को नोश किया, मगर उनके अनुयायियों ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि देश के विभिन्न पक्षों में अंग्रेज के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। 1857 /के युद्ध के लिए सैयद साहब के अनुयायियों ने फिजा प्रशस्त करने और फौज तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1857 / के स्वतंत्रता संग्राम में उलेमा-ए-किराम ने बाकायदा युद्ध में भाग लिया, यह उलेमा-ए-किराम हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी, हजरत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी और हज़रत सैयद अहमद शहीद के स्वर्ण चेन के स्वर्ण कड़ी थे। इस युद्ध के लिए उलेमा-ए-किराम ने जनता को जिहाद के लिए प्रोत्साहन दिलाने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में वाज और भाषण का बाजार गर्म कर दिया और जिहाद पर उभारने का कर्तव्य अंजाम दिया तथा एक सर्वसम्मत फतवा जारी करके अंग्रेजों से जिहाद को फर्जे ऐन ठहराया । इस फतवे ने जलते पर तेल का काम किया और पूरे देश में स्वतंत्रता की आग भड़क उठी, अकाबिर उलेमा देवबंद ने शामली के क्षेत्र में युद्ध में खुद भाग लिया। हज़रत मौलाना कासिम नानोतवी हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही और हाफिज जामिन शहीद ने हज़रत  हाजी इमदाद उल्लाह मुहाजीर मक्की के हाथ पर बैअत जिहाद की , फिर तैयारी शुरू कर दी गई, हज़रत हाजी साहब को इमाम बनाया गया, मौलाना मुनीर नानोतवी को सेना के दायें हाथ का और हाफिज जामिन थानवी को बायें बाजु का अधिकारी नियुक्त किया गया। मुजाहिदीन ने पहला हमला शेर अली सड़क पर अंग्रेजी सेना पर किया और माल व असबाब लूट लिया, दूसरा हमला 14 / सितंबर 1857 / को शामली (जानिए शामली युद्ध के अनकहे सच) में किया और जीत हासिल की, जब खबर आई कि तोब खाना सहारनपुर से शामली को भेजा गया है तो हज़रत हाजी साहब ने मौलाना गंगोही को चालीस पचास मुजाहिदीन के साथ कर दिया, सड़क बगीचे के किनारे से गुज़रती थी, मुजाहिदीन बगीचे में छिपे थे जब पलटन वहाँ से गुज़री तो मुजाहिदीन ने एक साथ फायर कर दिया, पलटन घबरागई और तोपखाना छोड़कर भाग गई। इसी अभियान में हाफिज जामिन थानवी साहब  शहीद हुए, सैयद हसन अस्करी साहब को सहारनपुर लाकर अंग्रेजों ने गोली मार दी। मौलाना रशीद अहमद साहब गंगोही मुजफ्फरनगर जेल में डाल दिए गए और मौलाना मुहम्मद कासिम साहब नानूतवी आगामी रणनीति तय करने के लिए अंडरग्राउंड चले गए।

Posted by: Bagewafa | جولائی 11, 2018

زخم۔۔۔۔۔۔گوہر رضا

زخم۔۔۔۔۔۔گوہر رضا

جسم پر زخم ہیں

آنکھوں میں لہو اُترا ہے

 آج تو روح بھی لرزاں ہے میری

ذہن پتھر کی طرح

سخت و بے جان سا، مفلوج سا،

بے حس، بیکار

اس میں چیخوں کے سِوا

کچھ بھی نہیں، کچھ بھی نہیں، کچھ بھی نہیں

مجھ سے مت پوچھو میرا نام تو بہتر ہوگا

میں وہی ہوں کہ جسے

ساری بدمست بہاروں کو پرکھنا تھا ابھی

میں وہی ہوں کہ جسے

پھول سا کھلنا، مہکنا تھا ابھی

جھومتے گاتے ہوئے جھرنوں کی دھن کو سن کر

میرے پیروں کو تھرکنا تھا ابھی

درسگاہوں کی کُھلی باہوں میں جانا تھا مجھے

اور ایک شولے کی مانند دھدھکنا تھا ابھی

میں وہی ہوں جسے مندر کی حدوں کے اندر

تم نے جوتوں کے تلے روند دیا

میں وہی ہوں کہ جسے

سارے بھگوان کھڑے

چپ کی تصویر بنے

تکتے رہے، تکتے رہے، تکتے رہے

اور میرے جسم کا ہر قطرہِ خوں

تھپکیاں دے کے سُلانے کا جتن کرتا رہا

مجھ کو سمجھاتا رہا

اور کچھ در سِتم سہ لے میری ننھی پری

موت کے پار ہر ایک ظلم سمٹ جائے گا

تب کوئی ہاتھ تجھے چھو بھی نہیں پائے گا

میں وہی ہوں جو درندوں کے گھنے جنگل میں

بین کرتی رہی اِنصاف کے دروازے پر

مجھ کو معلوم نہیں تھا کہ تمھیں

باپ کا سایا بھی سر پر میرے منظور نہیں

جسم پر زخم ہیں، گہرے ہیں،

بہت گہرے ہیں

مجھسے مت پوچھومیرا نام تو بہتر ہو گا

مادرِ ہند ہوں میں

وہ جو خاموش ہیں شامل ہیں زِنا میں میری

ہجوم دیکھ کے رستہ نہیں بدلتے ہم ۔۔۔۔۔حبیب جالب

.

ہجوم دیکھ کے رستہ نہیں بدلتے ہم

کسی کے ڈر سے تقاضا نہیں بدلتے ہم

.

ہزار زیر قدم راستہ ہو خاروں کا

جو چل پڑیں تو ارادہ نہیں بدلتے ہم

.

اسی لیے تو نہیں معتبر زمانے میں

کہ رنگ صورت دنیا نہیں بدلتے ہم

.

ہوا کو دیکھ کے جالبؔ مثال ہم عصراں

بجا یہ زعم ہمارا نہیں بدلتے ہم

.

.

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हुजूम देख के रस्ता नहीं बदलते हम…हबीब जालिब

ہ.

हुजूम देख के रस्ता नहीं बदलते हम

किसी के डर से तक़ाज़ा नहीं बदलते हम

.

हज़ार ज़ेर-ए-क़दम रास्ता हो ख़ारों का

जो चल पड़ें तो इरादा नहीं बदलते हम

.

इसी लिए तो नहीं मो’तबर ज़माने में

कि रंग-ए-सूरत-ए-दुनिया नहीं बदलते हम

.

हवा को देख के ‘जालिब’ मिसाल-ए-हम-अस्राँ

बजा ये ज़ोम हमारा नहीं बदलते हम

Hazrat maulana abdullah kapodrawi nawwarallahu marqadahu ka nayab interview:

social media ki zarurat ke bare me.

Note: According to news received from right sources that  Hazarat Moulana Kapodrvi has passed away to day 10 July 2018 at his home town.It requested to make dua for him.

Posted by: Bagewafa | جون 27, 2018

9/11 By Farrah Khan

Posted by: Bagewafa | جون 22, 2018

An precius advice from Ravish Kumar

An precius advice from Ravish Kumar

Posted by: Bagewafa | جون 21, 2018

Urdu Eid Mushayera recorded on 7 June 2018

Urdu Eid Mushayera recorded on 7 June 2018
Part – 1

Senator PTV Telecaster and Academic Scholar Tasleem Elahi Zulfi presenting Talk Show EDUCATION IN CANADA with Prof. Zeenat Lakhani and Media Person Neeraj Diwan on 24/7 TV Channel Rogers Cable 851, Bell Fibe 823 and Cogeco 106 all ever Canada.

Keep watching.

پاکستان اور انڈیا سے حصولِ تعلیم کے لیے کینیڈا آنے کے خواہش مند افراد کے لیے مفید اور معلوماتی پروگرام :

پی ٹی وی سینئر ٹیلی کاسٹر اور علمی ادبی اسکالر تسلیم الہی زلفی ” کینیڈین نظامِ تعلیم ” کی روشنی میں پاکستان اور انڈیا کے تجزیہ کار پروفیسر زینت لا کھانی اور میڈیا پرسن ایڈوکیٹ نیرج دیوان سے تقابلی اور تجزیاتی سیر حاصل معلومات اور مفید گفتگو فرما رہے ہیں

Part – 2

Senator PTV Telecaster and Academic Scholar Tasleem Elahi Zulfi presenting Talk Show EDUCATION IN CANADA with Prof. Zeenat Lakhani and Media Person Neeraj Diwan on 24/7 TV Channel Rogers Cable 851, Bell Fibe 823 and Cogeco 106 all ever Canada.

Keep watching.

پاکستان اور انڈیا سے حصولِ تعلیم کے لیے کینیڈا آنے کے خواہش مند افراد کے لیے مفید اور معلوماتی پروگرام :

پی ٹی وی سینئر ٹیلی کاسٹر اور علمی ادبی اسکالر تسلیم الہی زلفی ” کینیڈین نظامِ تعلیم ” کی روشنی میں پاکستان اور انڈیا کے تجزیہ کار پروفیسر زینت لا کھانی اور میڈیا پرسن ایڈوکیٹ نیرج دیوان سے تقابلی اور تجزیاتی سیر حاصل معلومات اور مفید گفتگو فرما رہے ہیں۔

Posted by: Bagewafa | جون 21, 2018

Allama Iqbal….Moulana Tariq Jameel

Posted by: Bagewafa | مئی 27, 2018

Urdu Mushyera 2017at Toronto…..SSTV

Urdu Mushyera 2017at Toronto…..SSTV

Posted by: Bagewafa | مئی 24, 2018

Bazm-e-Shairi 25-03-2014….Metro 1

Bazm-e-Shairi 25-03-2014….Metro 1

Posted by: Bagewafa | مئی 17, 2018

These bridges,fly overs,dams of India

These bridges,fly overs,dams of India…built to kill  the innocents.

 

नेतिहास….♦ चंद्रकांत बक्षी

     सरकारी कंट्राक्टर जैसे लग रहे एक दुर्जन ने पूछा- ‘क्या करते हैं आप?’ मीटर गेज ट्रेन की खड़खड़ाहट में उसने कुछ मोटी आवाज़ में जवाब दिया- ‘प्रोफेसर हूं!’

    ‘किस विषय के?’

    वह मुस्कराया. बोला- ‘इतिहास का.’

    ‘अहमदाबाद में?’ दुर्जन को व्यंग्यात्मक आनंद आने लगा- जैसा सफल आदमी को असफल आदमी के साथ बात करते समय आता है, अथवा किसी स्कूली-मास्टर के साथ बात करते समय…

    ‘ना!’ उसने दुर्जन को आंखों से नाप लिया. फिर कुछ मुंह बनाया, जैसे झूठ बोलने की तैयारी में हो, बोला- ‘आक्सफोर्ड में था…’

    दुर्जन दुनियादारी में माहिर था. तुरंत हार मान लेने वाला बिजनेसमैन वह नहीं था. पूछने लगा- ‘कहां… विलायत में?’ आंखों के कोनों में जरा-सी इज्जत की चमक.

    ‘विलायत में लंदन नाम का शहर है. वहां से करीब चालीस-पचास मील की दूरी पर है आक्सफोर्ड. वहां की यूनिवर्सिटी में मैं प्राचीन भारत का इतिहास…’

    ‘अच्छा इन्कम है वहां?’

    ‘पाउंड मिलत हैं वहां. एक पाउंड यानी… तीस रुपये?’ (छीना-झपटी. चक्रव्यूह.)

    ‘हमारे गांव का एक दर्जी भी वहीं है. अफ्रीका गया था. बाद में विलायत चला गया. कहते हैं, अपना मकान बना लिया है पट्ठे ने.’ (वन-अपमैनशिप!)

    ‘मैं भी यहां आया हूं.. मकान खरीदने के सिलसिले में. एक पालनपुर में खरीदना है. एक माउंट आबू में खरीद लेंगे.’ (हुकुम का इक्का!)

    दुर्जन की आंखों में धंधेदारी की चमक आ गयी- ‘वाह भई, आपने तो विलायत का अच्छा फायदा उटाया. चलो, पहचान हो गयी. किसी रोज हवा खाने आबू आयेंगे और जगह नहीं मिलेगी तो… दुर्जन हंसने लगा- ‘आप ही के यहां आ धमकेंगे!’ ह…ह…ह…’

    ‘जरूर. माउंट आबू में सर्वेन्ट्स क्वार्टर्स वाला एक बंगला खरीदना है! फिर जगह की सुविधा हो जायेगी.’ इतिहास का प्रोफेसर खिड़की के बाहर ताकने लगा. (ब्लाइंड!)

    ‘इस समय आप आबू जा रहे हैं?’

    ‘नहीं. पहले पालनपुर. वहां मकान-वकान का फैसला कर लें, फिर आबू.’ (शह और मात!)

    उंझा का स्टेशन! रेस्तरां कार वाला बैरा- ‘साब, थाली पालनपुर स्टेशन पर आयेगी. ले आऊं?’

    ‘नहीं. हम पालनपुर उतर जायेंगे.’

    इतिहास के प्रोफेसर ने बटुए में से कड़कड़ाते नोट निकालकर बांये हाथ से, लापरवाही से बैरे के हाथ में थमा दिये. बैरे ने बाकी पैसे लौटा दिये! दुर्जन मानपूर्वक देखता रह गया. ट्रेन चली. दुर्जन ने नाश्ते की पोटली खोली और बोला- ‘लीजिये साहब…’

    उसने चेहरे पर कृत्रिम घृणा लाते हुए देखा- ‘नहीं. आप खाइये. मुझे यह सब सूट नहीं करेगा…’ फिर जरा रुककर- ‘मैं रेस्तरां कार में ही खाता हूं.’ दुर्जन ने मक्खियां उड़ाते हुए डिब्बियां, शीशियां खोलनी शुरू की. एक कौर चबाते-चबाते वह पूछने लगा- ‘प्रोफेसर साहब, विलायत में मक्खियां होती हैं क्या?’

    इतिहास का प्रोफेसर जरा रुककर हंस दिया- ‘मक्खियां तो सभी जगह होती हैं. मगर वहां की मक्खियां कानों में इतना सारा गुनगुन नहीं करतीं. एक बार आप उन्हें भगा दीजिये, बस, फिर गुनगुनाहट बंद.’

    दुर्जन विलायती मक्खियों के बारे में सोचने लगा. इतिहास का प्रोफेसर भूगोल के विषय में सोचने लगा. वह गुजरात और राजस्थान की सीमा के पास आ गया था. तब तो इस ओर बाम्बे प्रेसिडेन्सी थी और उस पार था राजपूताना और उसके ‘देश’ के लोग, सीमावर्ती लोग कुछ विचित्र-सी मिली-जुली गुजराती-राजस्थानी बोलते थे.

    पालनपुर का स्टेशन! गुजरात का अंत. राजस्थान का आरम्भ… करीब-करीब. तांगे वाले ने पूछा- ‘कहां जाना है?’

    ‘टूटे नीम.’

    कितने वर्षों बाद! यहां बचपन गुजरा था, अतीत गुजरा था, इतिहास गुजरा था. जब छत के छप्पर पर सोते-सोते दस के फास्ट की सीटियां सुनी थीं, वह बचपन, जब अहमद भिश्ती अपने बूढ़ें बैल पर मोटे चमड़े की मशक डालर आता था और वह दौड़कर दोनों तरफ दो बाल्टियां रख आता था, वह अतीत, जब मिडिल स्कूल से लौटते समय रास्ते में कुंए में झांककर वह अपना नाम बोलता था और नाम की प्रतिध्वनि फैल जाती थी, पुरे शरीर में खुशी की कंपन के करेंट की तरह, वह इतिहास…

    जरा खांसी-सी आ गयी.

    दिल्ली दरवाजे के बाहर एक ग्राम्य स्त्राr सूखी घास बेच रही थी. तांगे वाले ने इतिहास के प्रोफेसर से कहकर तांगा रोक लिया और देहाती लहजे में घास का मोल-भाव करने लगा-

    ‘दस आना!’

    ‘चल-चल.’

    ‘नहीं काका…’

    ‘अच्छा जा, डाल आ. भीतर जाकर पूछ लेना. कहना, हालभाई ने भेजी है.’

    इतिहास का प्रोफ्रेसर देखता रह गया. शहरों का अविश्वास अभी तक यहां नहीं आया था…

    तांगा चला. सिगरेट पियोगे, हालाभाई? दीजिये, साहब! दो सिगरेट. हाला भाई की खुलती बातें. घोड़ा बहुत अच्छा है, हालाभाई. हां साहब, यह घोड़ा…

    फिर वही देहाती लहजा- ‘दो बरस पहले मैंने दो सौ में मांगा था. चार बरस का है. जसराज मारवाड़ी का है. भूखों मार डाला है बेचारे को. सत्रह रोज पहले मैंने खरीदा इसे. साहब, गाड़ी में लगाये तीन रोज ही हुए हैं. दो घोड़े हैं मेरे पास. असबाब भी मंगाना था घोड़े का, मगर बरसात हो गयी… छापी के पास पानी भर आया, इसलिए अब दो दिन बाद…’

    वर्षों के बाद वह भाषा टकरा रही थी कानों से. उसके इतिहास की भाषा. अतीत की भाषा. बचपन की भाषा. सुसंस्कृत होने के बाद आयास करके भूली गयी उसकी अपनी भाषा. पितृभाषा.

    सामने नीम का बूढ़ा पेड़ खड़ा था, जिसे वह ‘टूटे नीम’ के नाम से पहचानता था. इतिहास का प्रोफेसर तांगे वाले को पैसे देकर उतर पड़ा.

    पितृभूमि.

    पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण यह पूरब यह पश्चिम, चकोरों की दुनिया. मेरा नीलगूं आसमां बे किनारा. पितरों की भूमि को चूम लेने की इच्छा हुई. एक वृद्धा उसे घूरती हुई गुजर गयी. पहचाना नहीं. मेना काकी. जी रही है अब तक? इतिहास का प्रोफेसर घर की गली में मुड़ गया.

    घर में जाकर, खिड़की खोलकर उसने टूटे नीम की ओर देखा.

    उसके दादा नीचे हमीद खां को घोड़े की रास पकड़ाकर, ऊपर आकर, साफे को मेज पर रखकर, इसी तरह खिड़की खोलकर नीम की ओर देखते होंगे. उसके पिता ने मद्रास से आकर इसी तरह खिड़की खोली होगी और इसी तरह नीम को देखा होगा. और वह आक्सफोर्ड से आकर ठीक उसी तरह खिड़की खोलकर नीम को देख रहा था. बूढ़ा दरख्त पीढ़ियों पुराना था. पचासों वर्ष पुराना. कहते हैं, जब दादा छोटे थे, एक रोज बिजली गिरी थी और नीम आधा टूट गया था और तले बैठे हुए दो ऊंट मर गये थे. तभी से शायद उसे टूटा नीम कहते थे.

    उसकी दृष्टि गैसलाइट के लोहे के खम्भे की ओर गयी. लड़ाई के दिन थे और बिजली बचाने के लिए बत्तियां बंद रहती थीं. गांव-भर में चार-पांच ही मोटरकारें थीं और किसी एक मोटर के पीछे अन्य लड़कों के साथ वह भी दौड़ा था और लोहे के खम्भे से टकरा गया था. अनायास उसने उंगलियां कपाल पर उभरे घाव पर फेरी. घाव बालों में था, पर… अब तो बाल झड़ चुके थे. गाव का निशान बाहर आ गया था.

    याद्दाश्त की आंधियां. धुंधली-सी स्मृतियां.

    घर से घंटाघर दिखायी पड़ता था, एक जमाने में. अब तो बीच में एक पीपल का पेड़ उग आया था. घंटाघर के घंटे शायद अब भी सुनाई पड़ते होंगे. शायद. या… घड़ी में तपे हुए छप्परों पर से सूखे कपड़े उतार लेते थे हम. नीम के नीचे एक नकटी औरत चिल्ला-चिल्लाकर शहतूत बेचती थी. शहतूत में से इल्लियां निकलती हैं. मां हमेशा शहतूत लेने से मना करती थी. पैरों में बेड़ियां डालकर पुरानी जेल की ओर ले जाये जाते हुए कैदी. दोपहर को बारह बजे किले की दीवार पर से छूटती तोप. रवारी लकड़ियां बेचकर ऊंट को खड़ा करता और ऊंट पिछली टांगों के बल गले की घंटियां हिलाते हुए खड़ा होता. बेढंगा दृश्य… ट्यूबलाइटों से पहले की दुनिया.

    शाम को गर्म राख से लालटेन के कांच के गोले साफ होते थे. रात दीवारों की छायाओं में थिरकती. अंधेरे-अंधेरे मुर्गे की बांगें और सब्जियां सजाती सब्जी वालियों की कर्कश गालियां. सोते समय आंखों के ऊपर तुले हुए सितारे सुबह के झुटपुटे में निस्तेज होकर ऊंचे मकानों के पीछे लुढ़क जाते. जब आंखों पर चश्मे नहीं थे. जब बुद्धि की पर्त्तें जमी नहीं थीं. जब आत्मा पारदर्शक थी, जब बिना दांव-पेंच हंस डालना स्वाभाविक था, जब साथ पढ़ती लड़की की खुली कमर पर फैली अम्हौरियां देखकर सिर्फ अम्हौरियों के ही विचार आ सकते थे, जब…

    इतिहास का प्रोफेसर बाल्कनी की रेलिंग पर झुक गया और इतिहास में से नेतिहास की बादबाकी करने लगा.

    शाम को आंधी आ जाती थी, कच्छ के छोटे रन की तरफ से. अब कच्छ का छोटा रन ही आ गया था. बरसात कम हो गयी. छुटपन में बहुत होती थी. स्कूल में छुट्टी हो जाती थी. टूटे नीम के पास पानी बहता हुआ मिडिल-स्कूल तक जाता था. और वह भी बहते पानी में दौड़ता-कूदता दोस्तों के साथ मिडिल-स्कूल तक चला जाता था. तब स्कूल में टेलिफोन नहीं था. और वापसी. मार्ग में खेतों के किनारे से चुराई हुई हरी सौंफ चबाते-चबाते. जार्ज फिफ्थ क्लब पर होती बारिश क्लास-रूम की खिड़की से दिखाई पड़ती.

    टाइफाइड होता था, तो इक्कीस या अट्ठाईस या पैंतीस दिन बिछौने में लेटे रहना पड़ता था. तब मायसेटीन औषधियां नहीं थी और तांगे में बैठकर आया हुआ डाक्टर सिर गंजा करवा देता था. चिरायते का काढ़ा पेनिसिलीन और सल्फा औषधियों से ज्यादा काम देता था. और हड्डी टूट जाती या बिजली के सामान की जरूरत पड़ती, तब आबू वाली दोपहर ढाई की लोकल में बैठकर अहमदाबाद जाते थे. अहमदाबाद ‘बड़ा शहर’ था, जहां बिजली का सामान अच्छा और सस्ता मिलता था. पुरानी जेल के पास वाले उबड़-खाबड़ मैदान में छुट्टी की हर दोपहर को स्टम्पें गाड़कर एक इनिंग्स वाले क्रिकेट के मैच खेले जाते थे और जीतने के बाद तीन बार ‘हिप…हिप… हुर्रे’ चिल्लाते थें. जेल में पंडित जवाहरलाल नेहरू को खून की उल्टी होने की अफवाह पर हफ्ते भर सभाएं होती थीं.

    नवाब साहब-खुदाबंद खुदा-ए-खान, फैजबख्श, फैजरसान, श्रीदिवान महाखान जुब्द-तुल-मुल्क… और नाम के बाद में जी.सी.आई.ई., के.सी.सी.वी.ओs., ए.डी.सी. वाले नवाब साहब की सालगिरह के दिन स्कूल में बंटने वाले बताशे लेने के लिए छोटे भाई को लेकर, दो बड़े रूमाल लेकर, नयी कमीजें पहनकर जाया करते थे. चुराई हुई बर्फ चूसते समय या कटी पतंग लूटते समय चंगेज खां जैसा दिग्विजय का उन्माद हो जाता था…

    और बचपन की इतिहास-यात्रा के कुछ सहयात्री… नीम के नीचे मुनीर मिल गया था, लाल लुंगी पहने हुए. दो रोज से स्कूल नहीं आ रहा था. उसी रोज पता चला कि उसने सुन्नत करवाई थी… मीरा के दरवाजे के बाहर उसके काका की बीड़ी की दुकान थी. दुकान के ऊपरी हिस्से में ही बैठकर वह तीन कर्मचारियों के साथ बीड़ियां बनाता था. दाने चुगते कबूतरों की तरह उनके सिर हिलते थे. एक सिर शंकर का था. तीसरा कक्षा तक वह साथ था. फिर उसे टाइफाइड हुआ और…छठी में ही प्राणलाल ने स्कूल छोड़ दिया. लड़के कहते थे, बहुत गरीब थे उसके पिता. रियासत के किसी देहात में एक्साइज के क्लर्क थे. एक दिन प्राणलाल पोस्टमैन की वर्दी पहनकर चिट्ठी देने शर्माता-शर्माता आया था… कचहरी में भीगे कौवे जैसे एक जज के सामने उसके एक अफीमी आत्मीय ‘मच आब्लाइज्ड’ रटते थे, रटा करते थे और बार-बार उसे स्वभाव के बारे में सलाह दिया करते थे…

    इतिहास का प्रोफेसर बाहर आ गया.

    ‘कहो, मास्टर?’

    मास्टर अगर रास्ते में मिल गया होता तो वह पहचान नहीं पाता, लेकिन दुकान, वही थी. जर्जरित अर्गला पर दो-चार अधसिले कपड़े लटक रहे थे. अभी कालर और आस्तिन बाकी थे. दुकान खाली-खाली लग रही थी.

    मास्टर उसे घूरने लगा- ‘अरे, सूर्यकांत? तू?’

    मास्टर हंस दिया. दो रोज की बढ़ी हुई दाढ़ी में शिकने पड़ गयीं. चेहरे पर झुर्रियां, मटमैली हंसी, झड़े हुए केश, बुझी हुई आंखें, गाल की हड्डियों पर तनकर स्याह हो चुकी चमड़ी, कान के दोनों ओर फूटे हुए लम्बे बाल… मास्टर लक्ष्मणराव… जो स्कूली दिनों में हाफ-शर्टें सीता था, जब स्कूली यूनिफार्मों का जमाना नहीं आया था और जब हाईस्कूल में प्रवेश के बाद ही फुल-शर्टें पहनने का ‘अधिकार’ प्राप्त होता था.

    लक्ष्मणराव एक ही महराष्ट्रीय था पूरे गांव में. तब महाराष्ट्रीय महाराष्ट्रीय नहीं, बल्कि दक्षिणी कहे जाते थे.

    ‘कब आया?’

    ‘आज ही.’

    ‘अकेला आया है?’

    ‘हां, अकेला ही हूं!’ वह प्रसन्न-गम्भीर हंस दिया- ‘कैसा हैं मास्टर, तुम्हारे बाल-बच्चे?’ उसे पता था कि मास्टर की दो लड़कियां थीं.

    मास्टर का चेहरा लटक गया. उसे लगा, जैसे कुछ अपराध-सा कर डाला है. मास्टर ने धीरे से सिलाई-मशीन की दराज से एक तस्वीर निकाली- मास्टर की जवानी का ग्रुप-फोटो. मास्टर, एक स्त्राr, दो लड़कियां, एक लड़का. सभी चेहरों पर तसवीर खिंचवाने से पहले का आतंक. लड़के के चेहरे पर कुतूहल. वह सबसे छोटा था.

    ‘तूने तो यह दुकान देखी है, सूर्यकांत, कैसी चलती थी? रात बारह-बारह बजे तक मैं छह आदमियों से काम कराया करता था…’ थकान का निश्वास- ‘अब जमाना खराब हो गया है, भाई. मुश्किल से पेट भरता है. पुराने बूढ़े-बूढ़े ग्राहक ही आते हैं. काम भी होता नहीं है अब. दुनिया बदल गयी. मैं कहता हूं, सूर्यकांत, पाप किये होंगे मैंने, मेरी स्त्राr ने, पर इन बच्चों ने दुनिया का क्या बिगाड़ा है? बच्चों के ये दिन…’ मास्टर और कुछ कहने जा रहा था कि आंखें छलछला आयीं.

    ‘लड़कियां तो बड़ी हो गयी होंगी?’

    मास्टर कुछ संयत-सा हुआ- ‘क्या कह रहा है? तीन ही साल पुराना है यह फोटो. शारदा बारह साल की हुई और संध्या दस की. लड़का पिछले साल गुजर गया. स्कूल से आया, तब तो अच्छा-भला था. हैजा हो गया. दो दिन में भगवान ने उठा लिया. लुट गया सब, सूर्यकांत, सब लुट गया. घरवाली की तबीयत भी अब ठीक नहीं रहती. लड़कियों के बढ़ने में समय नहीं लगता. शादी-ब्याह… भाई, सब इकट्ठा होगा कैसे?’ मास्टर का गला रुंध गया. आगे बोल नहीं पाया वह. रो पड़ा. पुरुष के आंसू…

    उसने महसूस किया, बहुत गलत हो गया सब कुछ. उसके अविचारी शहरी सौजन्य ने पुराने घाव छील डाले थे. यह आदमी दुख की परम्पराओं में से जी रहा था, टिक रहा था. कितने समय से?

    उससे आश्वासन के स्वर में कहा- ‘मास्टर, तुम तो मर्द हो. भगवान है ऊपर सभी का देखता है वह. सच्चे आदमी को वह निश्चय ही पार उतारता है.’

    ‘ना, वह सब झूठ है. अब भगवान में श्रद्धा नहीं रही है मेरी. मैंने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा है और मुझे ही इतने सारे दुख, सूर्यकांत? अच्छा मान ले, मैंने कुछ बिगाड़ा भी होगा, पर इन बच्चों ने क्या अपराध किया है तेरे भगवान की दुनिया में?’ बोल, तू तो पढ़ा-लिखा आदमी है- बोल.’

    उसे एकाएक कंपकंपी आ गयी. मास्टर पागल हो गया है क्या?

    धीरे से सांत्वना की औपचारिक बातें करके वह भाग निकला. वापस, घर की ओर. विचारों में उलझा हुआ. नवाबी गयी, प्रजा का शासन आ गया, प्रजातंत्र आ गया. क्या कर डाला है प्रजातंत्र ने? अहर्निश भगवान की पूजा-भक्ति करने वाले, डरने वाले, अटल श्रद्धा रखने वाले, सीधे-सादे गरीब, प्रामाणिक रोटी कमाकर खाने वाले श्रमजीवियों के हृदय में से भगवान के प्रति श्रद्धा हिला डाली. और वह भी बुढ़ापे में, जीवन किनारे लगने अया तब!

    बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट में एक पात्र है. उसका नाम है जॉब. जॉब अच्छा आदमी था, सच्चा आदमी था, सज्जन था, कुलीन था. भगवान ने उसी के ऊपर सब दुख ढा दिये. उसके बच्चे मार डाले, उसकी सम्पत्ति का नाश कर डाला, उसके शरीर को तोड़ दिया. जॉब ने प्रश्न किया-  प्रभु, मुझ निर्दोष को तूने इतने सारे दुखों में क्यों फेंक दिया. शायद मैं सम्पूर्ण नहीं हूं, मगर मैंने ऐसा क्या किया है कि मुझे ही इतने सारे दुख सहने पड़े?

    अन्याय सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य है. जॉब एक सर्वमनुष्य का नाम है, जो दो हजार वर्षों से यह प्रश्न कर रहा है. जॉब क्रांतिकारी नहीं है, जॉब सीधा चारित्र्यवान मनुष्य है. जैसा मास्टर…

    तीन वर्ष में मास्टर कितना वृद्ध हो गया है. शोषित का वृद्धत्व और शोषित का नेतिहास…

    वह घर में घुस गया. अब मिलना नहीं था किसी से.

    पुराने घर में घुस गया. अब मिलना नहीं था किसी से.

    पुराने लोगों के पास एक ही रसिक बात है- मृत आत्मीयों की. नये उसे पहचानते नहीं हैं. पीढ़ियां बहुत जल्दी बड़ी हो जाती हैं. गांव ने शायद… कायाकल्प ही कर लिया है. किले की रांग तथा मुख्य द्वार गिरा दिय गये हैं. स्टेशन पर ओवर ब्रिज बन गया है, सामने गुड्ज-साइडिंग. बरसात के पहले बिना प्लेटफार्म-टिकिट स्टेशन पर घूमने जाते थे, तो आसपास के पेड़ों में कभी-कभार नीलपंखी दिखाई पड़ते थे… आज, वैगनों की शंटिंग लगातार चल रही है. स्कूल में टेलिफोन आ गया है. स्टेशन रोड पर सिंधी शरणार्थियों  (उन दिनों रेडियों वाले ‘विस्थापित’ शब्द नहीं जानते थे) की कच्ची दुकानें अब गायब हो गयी हैं.

    लोग बूढ़े हो गये हैं. मर गये हैं. पक्की दुकानों के मालिक हो गये हैं… या उसी की तरह गांव छोड़कर दूर-दूर चले गये हैं. रेलवे कालोनी काफी फैल गयी है और राजस्थानी कर्मचारियों से खचाखच भरी हुई है. कीर्ति-स्तम्भ के उजाड़ बगीचे के गिर्द पास के मिलिटरी कैम्प के जवान घूमते दिखाई पड़ते हैं. आइसक्रीम के होटलों पर भीड़ है. बैंकें और वेश्याएं भी आ गयी हैं. गांव शहर बन गया है…

    शाम का मेल… साढ़े पांच बजे का मेल, अब रात आठ बजे आता है. अंतर वही है, सिर्फ समय बढ़ा दिया गया है.

    एक ही चीज कायम है. पूर्ववत. ट्रेनों का लेट होना…

    टेन चली. दूर झाड़ियों के झुंड के ऊपर कीर्ति स्तम्भ का शिखर दिखाई दिया, पहली गुमटी, एक्साइज की नयी कलैक्टोरेट, नवाब के महल का जर्जरित द्वार, सिग्नल,दूसरी गुमटी, फुटबाल का शांत मैदान, मेहसाना जाता हुआ बस-मार्ग, अरहर के खेतों पर फैली हुई रात, पितृभूमि के आकाश में मुरझाये फूलों के तोरण जैसी झुकी हुई धुंधली आकाश-गंगा, अंधकार की पर्तों में विलीन होता जा रहा नेतिहास…

Posted by: Bagewafa | مئی 8, 2018

Aligarh Muslim University

Aligarh Muslim University

AMU Tarana (Aligarh Muslim University)
https://youtu.be/rn4fxEYnddw

Aligarh Muslim University And Maulana Hasrat Mohani / Part-1

Aligarh Muslim University aur Maulana Hasrat Mohani, Part-2

کرب چہروں پہ سجاتے ہوئے مر جاتے ہیں…..ملک زادہ جاوید

….

کرب چہروں پہ سجاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم وطن چھوڑ کے جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

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زندگی ایک کہانی کے سوا کچھ بھی نہیں

لوگ کردار نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

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عمر بھر جن کو میسر نہیں ہوتی منزل

خاک راہوں میں اڑاتے ہوئے مر جاتے ہیں

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کچھ پرندے ہیں جو سوکھے ہوئے دریاؤں سے

علم کی پیاس بجھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

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زندہ رہتے ہیں کئی لوگ مسافر کی طرح

جو سفر میں کہیں جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

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ان کا پیغام ملا کرتا ہے غیروں سے مجھے

وہ مرے پاس خود آتے ہوئے مر جاتے ہیں

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جن کو اپنوں سے توجہ نہیں ملتی جاویدؔ

ہاتھ غیروں سے ملاتے ہوئے مر جاتے ہیں

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कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं….मालिकज़ादा जावे

 

 

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कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

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ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

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उम्र-भर जिन को मयस्सर नहीं होती मंज़िल

ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

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कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से

इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

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ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह

जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

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उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे

वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

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जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती ‘जावेद’

हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

 

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ कार्यालय में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर प्रोफेसर फैज़ान मुस्तफा (कुलपति नालसर विधि विश्वविद्यालय)

Click the below shown URL to listen the talk:
https://www.facebook.com/AliSohrab/videos/1048332768648045/

जिन्ना ने भगत सिंह और तिलक के लिए वकालत की थी, क्या वे दस्तावेज़ भी नष्ट कर दिए जाएं?—प्रोफेसर अपूर्वानंद-

 

 

28 April2018 Urdu Mushayera organized by KGU Toronto,on Canada.

InviNushayera.jpg

कोहराम से…. मुहम्मदअली वफा

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कट गई युं जिंदगी तेरे बगैर आराम से

पी रहा हुं गोया बस में एक खयाली जाम से

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खो गया था शहरमें गुमनाम लेकिन दोस्तो

ये मुजे किसने पुकारा आज मेरे नाम से.

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हम तो चले निकले थे युंही, बे नियाजी चालसे

ख्वाबकी चिडिय़ां उडी लेकिन कीसी के बाम से

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लावा बन कर चल पडा , अलल सुबह सूरज मगर

थम गया ये थक कर देखो एक नशीली शाम से

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भीडके सहराओमें ,अकसर वफा, तडपा ये शहर

शोर सडकों पर उगा इस भीड के कोहराम से.

Ravish Kumar – इतिहास में दर्ज होगा कि Prime Time में BJP प्रवक्ता नहीं भेजती थी , रवीश Best Speech

 Ravish Kumar Speech in Hyderabad जब स्पीच ke दौरान रविश कुमार रोने लगे

 

 

कायर बुद्धिजीवियों का देश बन जाने का ख़तरा है-अरुंधति रॉय

2015 में 23 मार्च के एक-दो दिन आगे पीछे, गोरखपुर में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अपनी दसवीं वर्षगाँठ मना रहा था और प्रख्यात लेखिका अरुंधति रॉय सिनेमा के उस जनोत्सव में शामिल थीं। वे कार्यक्रम स्थल पर मौजूद ही नहीं थीं, गोरखपुर और आसपास के ज़िलों से आए तमाम युवाओं और संस्कृतिकर्मियों से ख़ूब घुलमिल भी रही थीं। इन दिनों धूम मचा रहा उनका उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस’ लिखे जाने के अंतिम चरण में था जिसका ज़िक्र वे किसी से नहीं कर रही थीं। उनकी रुचि राज और समाज की बारीक़ियाँ टटोलने में थी। उस कार्यक्रम में मौजूद, मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक डॉ.पंकज श्रीवास्तव ने अरुंधति से यह बातचीत की थी जो अप्रैल 2015 में अंग्रेज़ी पाक्षिक गवर्नेंस नाउ में छपी थी। फिर इसे हिंदी में अपनी फ़ेसबुक दीवार पर लगाया। यह बातचीत न सिर्फ़ आज भी प्रासंगिक है, बल्कि नए अर्थ खोल रही है-संपादक

हम अन्याय को संस्थाबद्ध करते जा रहे हैं !

(लीजिए, हिंदी में पढ़िये अरुंधति का इंटरव्यू। गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के दौरान 23 मार्च को मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय से हुई मेरी बातचीत अंग्रेज़ी पाक्षिक “गवर्नेंस नाऊ” में छपी है। लेकिन जब लोग यह जान गये हैं कि यह साक्षात्कार हिंदी में लिया गया था तो सभी मूल ही सुनना-पढ़ना चाहते हैं। इससे साबित होता है कि अपनी भाषा के परिसर में अगर ज्ञान-विज्ञान और विचारों की बगिया लहलहा सके तो कोई अंग्रेज़ी का मुँह नहीं जोहेगा। इस इंटरव्यू की करीब 40 मिनट की रिकॉर्डिंग मोबाइल फोन पर है, जिसे फ़ेसबुक पर पोस्ट करना मुश्किल हो रहा है। फ़िलहाल पढ़कर ही काम चलाइये- पंकज श्रीवास्तव )

सवाल—-गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल में आप दूसरी बार आई हैं। जो शहर गीताप्रेस और गोरखनाथ मंदिर और उसके महंतों की राजनीतिक पकड़ की वजह से जाना जाता है, वहां ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ दस साल का सफ़र पूरा कर रहा है। इसे कैसे देखती हैं ?

अरुंधति रॉय—दूसरी नहीं, तीसरी बार। एक बार आज़मगढ़ फ़ेस्टिवल में भी जा चुकी हूं। दरअसल, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो सिर्फ गोरखुपर के लिए अहमियत नहीं रखता। यह वाकई प्रतिरोध है जो सिर्फ जनसहयोग से चल रहा है, वरना प्रतिरोध को भी ‘ब्रैंड’ बना दिया गया है। अमेरिका से लेकर भारत तक, जहाँ भी देखो प्रतिरोध को व्यवस्था में समाहित कर के एक ‘ब्रैंड’ बनाने की कोशिश होती है। जब मैंने ‘एंड आफ इमेजिनेशन’ लिखा था, तो पहला रियेक्शन यह हुआ कि बहुत सारे ब्रैंड्स, जिसमें कुछ जीन्स के भी थे, ने विज्ञापन करने के लिए मुझसे संपर्क किया। यह एक पुराना खेल है। अमेरिका में नागरिकों की जासूसी का खुलासा करने वाले एडवर्ड स्नोडेन के बारे में फ़िल्म बनी है जिसके लिए फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन ने पैसा दिया। ‘फ़्रीडम आफ प्रेस फ़ाउंडेशन’ में भी फ़ोर्ड का पैसा लगा है। ये लोग ‘प्रतिरोध’ की धार पर रेगमाल घिसकर उसे कुंद कर देते हैं। भारत में देखिये, जंतर-मंतर पर जुटने वाली भीड़ का चरित्र बदल गया है। तमाम एनजीओ, फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन जैसी संस्थाओं से पैसा लेकर प्रतिरोध को प्रायोजित करते हैं। ऐसे में गोरखपुर जैसे दक्षिणपंथी प्रभाव वाले शहर में प्रतिरोध के सिनेमा का उत्सव मनाना ख़ासा अहमियत रखता है। मैं सोच रही थी कि आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थायें अक्सर मेरा विरोध करती हैं, प्रदर्शन करती हैं, लेकिन गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल को लेकर ऐसा नहीं हुआ। इसका दो मतलब है। या तो उन्हें इसकी परवाह नहीं। या फिर उन्हें पता है कि इस आयोजन ने गोरखपुर के लोगों के दिल मे जगह बना ली है। मेरे पास इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब नहीं है। लेकिन इस शहर में ऐसा आयोजन होना बड़ी बात है। कोई कह रहा था कि इस फ़ेस्टिवल से क्या फ़र्क़ पड़ा। मैं सोच रही थी कि अगर यह नहीं होता तो माहौल और कितना ख़राब होता।

सवाल—आपकी नज़र में आज का भारत कैसा है? मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य क्या बता रहा है ?

अरुंधति रॉय—जब मई 2014 में मोदी की सरकार बनी तो बहुत लोगों को, जिनमें मैं भी थी, यकीन नहीं हुआ कि यह हमारे देश में हुआ है। लेकिन अगर ऐतिहासिक नजरिये से देखें तो यह होना ही था। 1925 से जब आरएसएस बना, या उससे पहले से ही भारतीय समाज में फ़ासीवादी प्रवृत्तियाँ नज़र आने लगी थीं। ‘घर वापसी’ जैसे कार्यक्रम उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हो रहे थे। यानी इस दौर से गुज़रना ही था। देखना है कि यह सब कितने समय तक जारी रहेगा क्योंकि आजकल बदलाव बहुत तेज़ी से होते हैं। मोदी ने अपने नाम का सूट पहन लिया और अपने आप को एक्सोपज़ कर लिया। अच्छा ही है कि कोई गंभीर विपक्ष नहीं है। ये अपने आपको एक्सपोज़ करके खुद को तोड़ लेंगे। आखिर मूर्खता को कितने दिनों तक बरदाश्त किया जा सकता है। लोगों को शर्म आती है जब प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी। गणेश के धड़ पर हाथी का सिर ऐसे ही जोड़ा गया था। फ़ासीवाद के साथ लोग ऐसी मूर्खताएं कब तक सहेंगे।

मैं पहले से कहती रही हूं कि जब राजीव गांधी ने अयोध्या में राममंदिर का ताला खुलवाया तो साथ में ‘बाज़ार’ का ताला भी खोला गया। इसी के साथ दो क़िस्म के कट्टरपंथ को खड़ा किया गया। एक इस्लामी आतंकवाद और दूसरा माओवाद। इनसे लड़ने के नाम पर ‘राज्य’ ने अपना सैन्यीकरण किया। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ने इस रास्ते को अपनाया क्योंकि नव उदारवादी आर्थिक नीतियाँ, बिना सैन्यीकरण के लागू नहीं हो सकतीं। इसीलिए जम्मू-कश्मीर में पुलिस, सेना की तरह काम करती है और छत्तीसगढ़ में सेना, पुलिस की भूमिका में है। यह जो ख़ुफिया निगरानी, यूआईडी, आधार-कार्ड वगैरह की बातें हैं, यह सब उसी का हिस्सा हैं। अदृश्य जनसंख्या को नज़र में लाना है। यानी एक-एक आदमी की सारी जानकारी रखनी है। जंगल के आदिवासियों से पूछा जाएगा कि उनकी ज़मीन का रिकार्ड कहां है। नहीं है, तो कहा जाएगा कि ज़मीन तुम्हारी नहीं है। डिजिटलीकरण का मकसद “अदृश्य” को “दृश्य” बनाना है। इस प्रक्रिया में बहुत लोग गायब हो जाएंगे। इसमें आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक से लेकर फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन तक, सब मिले हैं। वे क़ानून के राज पर खूब ज़ोर देते हैं और क़ानून बनाने का हक़ अपने पास रखना चाहते हैं। ये संस्थायें सबसे ज़्यादा ग़ैरपारदर्शी ढंग से काम करती हैं, लेकिन इन्हें अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए आंकड़ों की पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। इसीलिए वे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की मदद करते हैं। फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन एक नया पाठ्यक्र गढ़ने में जुटा है। वह चाहता है कि पूरी दुनिया एक ही तरह की भाषा बोले। वह हर तरह के क्रांतिकारी विचारों, वाम विचारों को खत्म करने, नौजवानों की कल्पनाओं को सीमित करने में जुटा है। फिल्मों, साहित्यिक उत्सवों और अकादमिक क्षेत्र में कब्ज़ा करके शोषण मुक्त दुनिया और उसके लिए संघर्ष के विचार को पाठ्यक्रमों से बाहर किया जा रहा है।

सवाल— आपको हालात को बदलने की कोई मज़बूत जद्दोजहद नज़र आती है क्या.. भविष्य कैसा लग रहा है ?

अरुंधति रॉय— प्रतिरोध, आंदोलन या क्रांति, जो भी शब्द इस्तेमाल कीजिये, उसे पिछले कुछ वर्षों में काफी धक्का लगा है। 1968-70 में जब नक्सलवादी आंदोलन शुरू हुआ, या तमाम सीमाओं के बावजूद जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के दौर की माँगों पर जरा ग़ौर कीजिये। तब माँग थी- “न्याय”। जैसे ज़मीन जोतने वाली की हो या संपत्ति का समान वितरण हो। लेकिन आज जो माओवादी सबसे “रेडिकल” कहलाते हैं, वे बस यही तो कह रहे हैं कि जो ज़मीन आदिवासियों के पास है, उसे छीना ना जाये। ‘नर्मदा आंदोलन’ की माँग है कि विस्थापन न हो। यानी जिसके पास जो है, उससे वह छीना न जाये। लेकिन जिनके पास कुछ नहीं है, जैसे दलितों के पास ज़मीन नहीं है, उनके लिए ज़मीन तो कोई नहीं मांग रहा है। यानी ‘न्याय’ के विचार को दरकिनार कर मानवाधिकार के विचार को अहम बना दिया गया है। यह बड़ा बदलाव है। आप मानवाधिकार के नाम पर माओवादियों से लेकर सरकार तक को, एक स्वर में कोस सकते हैं। कह सकते हैं कि दोनों ही मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। जबकि ‘अन्याय’ पर बात होगी तो इसके पीछे की राजनीति पर भी बात करनी पड़ेगी।

कुल मिलाकर यह इमेजनिशन (कल्पना) पर हमला है। सिखाया जा रहा है कि ‘क्रांति’ यूटोपियन विचार है, मूर्खता है। छोटे सवाल बड़े बन रहे हैं जबकि बड़ा सवाल गायब है। जो सिस्टम के बाहर हैं, उनकी कोई राजनीति नहीं है। तमाम ख़्वाब टूटे पड़े हैं। राज्य, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के हाथ का उपकरण बना हुआ है। दुनिया की अर्थव्यवस्था एक अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन की तरह है जिसके लिए सरहदें बेमानी हो गयी हैं।

सवाल—- तो क्या प्रतिरोध की ताकतों ने समर्पण कर दिया है, ‘इमेजनिशेन’ की इस लड़ाई में ?

अरुंधति रॉय—मेरे ख़्याल में, वे बहुत कमज़ोर स्थिति में हैं। जो सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं, वे सोच ही नहीं पा रहे हैं। ‘राज्य’ लड़ाई को इतना थकाऊ बना देता है कि अवधारणा के स्तर पर सोचना मुश्किल हो जाता है। यहाँ तक कि अदालतें भी थका देती हैं। हर तरह से कोशिश करके लोग हार जाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर देश में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो मानती हो कि उसका काम लोगों की मदद करना है। उन्हें लगता है कि उनका काम “नियंत्रण” करना है। न्याय कल्पना से बाहर की चीज होती जा रही है। 28 साल बाद हाशिमपुरा हत्याकांड का फैसला आया। सारे मुल्ज़िम छोड़ दिये गये। वैसे इतने दिन बाद किसी को सजा होती भी तो अन्याय ही कहलाता।

सवाल—— आपने गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए गाँधी जी को पहला “कॉरपोरेट प्रायोजित एनजीओ” करार दिया है। इस पर ख़ूब हंगामा भी हुआ। आपकी बात का आधार क्या है ?

अरुंधति रॉय—आजादी के इतने सालों बाद हममे इतना साहस होना चाहिए कि तथ्यों के आधार पर राय बना सकें। मैंने गांधी को पहला कॉरपोरेट प्रायोजित एनजीओ कहा है तो उसके प्रमाण हैं। उन्हें शुरू से ही पूँजीपतियों ने कैसे मदद की, यह सब इतिहास का हिस्सा है। उन्होंने गाँधी की ख़ास मसीहाई छवि गढ़ने में ताकत लगाई। लेकिन खुद गाँधी का लेखन पढ़ने से सबकुछ साफ हो जाता है। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी के कामकाज के बारे में हमें बहुत गलत पढ़ाया जाता है। हमें बताया गया कि वे ट्रेन के डिब्बे से बाहर निकाले गये जिसके ख़िलाफ उन्होंने संघर्ष शुरू किया। यह ग़लत है। गाँधी ने वहाँ कभी बराबरी के विचार का समर्थन नहीं किया। बल्कि भारतीयों को अफ्रीकी काले लोगों से श्रेष्ठ बताते हुए विशिष्ट अधिकारों की मांग की। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी का पहला संघर्ष डरबन डाकखाने में भारतीयों के प्रवेश के लिए अलग दरवाज़ा खोलने के लिए था। उन्होंने कहा कि अफ्रीकी काले लोग और भारतीय एक ही दरवाजे से कैसे जा सकते हैं। भारतीय उनसे श्रेष्ठ हैं। उन्होंने बोअर युद्ध में अंग्रेजों का खुलकर साथ दिया और इसे भारतीयों का कर्तव्य बताया। यह सब खुद गाँधी ने लिखा है। दक्षिण अफ्रीका में उनकी ‘सेवाओं’ से ख़ुश होकर ही अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें क़ैसर-ए-हिंद के ख़िताब से नवाज़ा था।

सवाल—- आप आजकल गाँधी और अंबेडकर की बहस को नये सिरे से उठा रही हैं। आपके निबंध ‘डॉक्टर एंड द सेंट’ पर भी काफी विवाद हुआ था।

अरुंधति रॉय—यह जटिल विषय है। मैंने इस पर बहुत विस्तार से लिखा है और चाहती हूँ कि लोग पढ़कर समझें। इसकी बुनियाद डॉ.अंबेडकर और गाँधी की वैचारिक टकराहट है। अंबेडकर शुरू से सवाल उठा रहे थे कि हम कैसी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन गाँधी जाति व्यवस्था की कभी आलोचना नहीं करते, जो गैरबराबरी वाले समाज का इंजन है। वे सिर्फ यह कहकर रुक जाते हैं कि सबके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए। उन्होंने जाति व्यवस्था को हिंदू समाज का महानतम उपहार बताया। यह सब उन्होंने ख़ुद लिखा है। मैं कोई अपनी व्याख्या नहीं कर रही हूँ। जबकि अंबेडकर लगातार जाति उत्पीड़न और संभावित आज़ादी के स्वरूप का सवाल उठा रहे थे। पूना पैक्ट से पहले गाँधी ने जो भूख हड़ताल की, उसका नतीजा आज भी देश को प्रभावित करता है। हम यह सवाल क्यों नहीं उठा सकते कि क्या सही है और क्या गलत। भारत सरकार की सहायता से रिचर्ड एटनबरो न जो ‘गाँधी’ फ़िल्म बनाई उसमें अंबेडकर का छोटा सा रोल भी नहीं है, जो उनके सबसे प्रभावी आलोचक हैं। अगर हम इतने साल बाद भी बौद्धिक जांच-परख से कतराते हैं तो फिर हम बौने लोग ही हैं। अंबेडकर और गाँधी की बहस बेहद गंभीर विषय है।

सवाल— भगत सिंह और उनके साथियों के भी गाँधी से तमाम मतभेद थे, लेकिन उन्होंने भी कहा था कि भाग्यवाद जैसी तमाम चीज़ों के समर्थन के बावजूद गांधी ने जिस तरह देश को जगाया है, उसका श्रेय उन्हें न देना कृतघ्नता होगी।

अरुंधति रॉय-–अब बात शुक्रगुज़ार होने या ना होने से बहुत आगे बढ़ गयी। यह ठीक है कि गाँधी ने आधुनिक औद्योगिक समाज में अंतर्निहित नाश के बीजों की पहचान कर ली थी जो शायद अंबेडकर नहीं कर पाये थे। गाँधी की आलोचना का यह अर्थ भी नहीं है कि गाँधीवादियों से कोई विरोध है। या उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ नहीं किया। नर्मदा आंदोलन का तर्क बहुत गंभीर और प्रभावी रहा है, लेकिन सोचना होगा कि वह सफल क्यों नहीं हुआ। आंदोलनों के हिंसक और अहिंसक स्वरूप की बात भी बेमानी है। यह सिर्फ़ पत्रकारों और अकादमिक क्षेत्र की बहस का मसला है। जहां हज़ारों सुरक्षाकर्मियों के साये में बलात्कार होते हों, वहां हिंसा और अहिंसा कोई मायने नहीं रखती। वैसे, अहिंसा के “पोलिटकल थियेटर” के लिए दर्शकवर्ग बहुत ज़रूरी होता है। लेकिन जहां कैमरे नहीं पहुंच सकते, जैसे छत्तीसगढ़, वहां इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।

हमें अंबेडकर या गाँधी को भगवान नहीं इंसान मानकर ठंडे दिमाग से समय और संदर्भ को समझते हुए उनके विचारों को कसौटी पर कसना होगा। लेकिन हमारे देश में यह हाल हो गया कि आप कुछ बोल ही नहीं सकते। न इसके बारे में न उसके बारे में। सेंसर बोर्ड सरकार में नहीं सड़क पर है। नारीवादियों को भी समस्या है है, दलित समूहों को भी है। लेफ्ट को भी है और दक्षिणपंथियों को भी। खतरा है कि हम कहीं “बौद्धिक कायरों” का देश ना बन जायें।

सवाल— आपने पूँजीवाद और जातिप्रथा से एक साथ लड़ने की बात कही है, लेकिन इधर दलित बुद्धिजीवी अपने समाज में पूँजीपति पैदा करने की बात कर रहे हैं। साथ ही, जाति को खत्म न करके अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश पर भी ज़ोर है। जाति को ‘वोट की ताकत’ में बदला जा रहा है। अंबेडकरवादियों के इस रुख को कैसे देखती हैं ?

अरुंधति रॉय—-यह स्वाभाविक है। जब हर तरफ ऐसा ही माहौल है तो इन्हें कैसे रोक सकते हैं। जैसे कुछ बुद्धजीवी लोग कश्मीर में जाकर कहते हैं कि राष्ट्रवाद बड़ी खराब चीज़ है। भाई, पहले अपने घर में तो समझाओ। दलित मौजूदा व्यवस्था में अपने लिए थोड़ी सी जगह खोज रहे हैं। सिस्टम भी उनका इस्तेमाल कर रहा है। मैंने पहले भी कहा है ‘दलित स्टडीज’ हो रही है। अध्ययन किया जा रहा है कि म्युनिस्पलटी में कितने बाल्मीकि हैं, लेकिन ऊपर कोई नहीं देखता । कोई इस बात का अध्ययन क्यों नहीं करता कि कारपोरेट कंपनियों पर बनियों और मारवाड़ियों का किस कदर कब्ज़ा है। जातिवाद के मिश्रण नें पूँजीवाद के स्वरूप को और जहरीला कर दिया है।

सवाल— कहीं कोई उम्मीद नज़र आती है आपको ?

अरुंधति रॉय—-मुझे लगता है कि अभी दुनिया की जो स्थिति है, वह किसी एक व्यक्ति के फैसले का नतीजा नहीं हैं। हजारों फैसलों की शृंखला है। फैसले कुछ और भी हो सकते थे। इसलिए तमाम छोटी-छोटी लड़ाइयों का महत्व है। छत्तीसगढ़, झारखंड और बस्तर मे जो लड़ाइयाँ चल रही हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। बड़े बाँधों के खिलाफ लड़ाई ज़रूरी है। साथ ही जीत भी ज़रूरी है ताकि ‘इमेजिनेशन’ को बदला जा सके। अभी भी एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसके ख़्वाब ख़्त्म नहीं हुए हैं। वह अभी भी परिवर्तन की कल्पना पर यकीन करती है।

चलते-चलते

सवाल– दिल्ली के निर्भया कांड पर बनी बीबीसी की डाक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ पर प्रतिबंध लगा। आपकी राय?

अरुंधति रॉय–जितनी भी खराब फिल्म हो, चाहे घृणा फैलाती हो, मैं बैन के पक्ष में नहीं हूं। बैन की मांग करना सरकार के हाथ में हथियार थमाना है। इसका इस्तेमाल आम लोगों की अभिव्यक्ति के खिलाफ ही होगा।

सवाल—मोदी सरकार ने अच्छे दिनों का नारा दिया था। क्या कहेंगी?

अरुंधति रॉय—अमीरों के अच्छे दिन आये हैं। छीनने वालों के अच्छे दिन आये हैं। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश सबूत है।

सवाल—-आपके आलोचक कहते हैं कि गांधी अब तक आरएसएस के निशाने पर थे। अब आप भी उसी सुर में बोल रही हैं।

अरुंधति रॉय–आरएसएस गांधी की आलोचना सांप्रदायिक नज़रिये से करता है। आरएसएस स्वघोषित फ़ासीवादी संगठन है जो हिटलर और मुसोलिनी का समर्थन करता है। मेरी आलोचना का आधार गाँधी के ऐसे विचार हैं जिनसे दलितों और मजदूर वर्ग को नुकसान हुआ।

सवाल—-दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार के बारे में क्या राय है ?

अरुंधति रॉय—जब दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा आया तो मैं भी खुश हुई कि मोदी के फ़ासीवादी अभियान की हवा निकल गयी। लेकिन सरकार के काम पर कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। सिर्फ भ्रष्टाचार की बात नहीं है। देखना है कि दूसरे तमाम ज़रूरी मुद्दों पर पार्टी क्या स्टैंड लेती है।

सवाल—आजकल क्या लिख रही हैं..?

अरुंधति रॉय–एक उपन्यास पर काम कर रही हूँ। ज़ाहिर है यह दूसरा ‘गॉड आफ स्माल थिंग्स’ नहीं होगा। लिख रही हूँ, कुछ अलग।

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میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟۔۔۔۔۔حسین حیدری

سڑک پر سگریٹ پیتے وقت جو اذاں سنائی دی مجھ کو

تو یاد آیا کے وقت ہے کیا اور بات ذہن میں یہ آئی

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟

میں شیعہ ہوں یا سنی ہوں، میں خوجہ ہوں یا بوہری ہوں

میں گاؤں سے ہوں یا شہری ہوں، میں باغی ہوں یا صوفی ہوں میں قومی ہوں یا ڈھونگی ہوں

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟

میں سجدہ کرنے والا ہوں، یا جھٹکا کھانے والا ہوں

میں ٹوپی پہن کے پھرتا ہوں، یا داڑھی اڑا کے رہتا ہوں

میں آیت قول سے پڑھتا ہوں، یا فلمی گانے رمتا ہوں

میں اللہ اللہ کرتا ہوں، یا شیخوں سے لڑ پڑتا ہوں

میں کیسا مسلماں ہوں بھائی؟

میں ہندوستانی مسلماں ہوں

دکن سے ہوں،یوپی۔ سے ہوں ،بھوپال سے ہوں،

دلہی سے ہوں بنگال سے ہوں

گجرات سے ہوں،ہر اونچی نیچی جات سے میں ہندوستانی مسلمان ہوں

دکن سے ہوں،یو۔ سے ہوں،بھوپالسے ہوں ،

دلہی سے ہوں بنگال سے ہوں

گجرات سے ہوں،ہر اونچی نیچی جات سے ہوں ۔

میں ہی جلاہا موچی بھی،

میں داکٹر بھی،درجی بھی

”مجھ میں گیتا کا سار بھی ہے

ایک اردو کا اخبار بھی ہے

میرا ایک مہینہ رمضان بھی ہے

مین نے کیا گنگا سنان بھی ہے

اپنے ہی طور سے جیتا ہوں

دارو،سیگریٹ بھی پیتا ہوں

کوئی نیتا میری نس نس میں نہی

میں کیسی کے بس میں نہیں

میں ہندوستانی مسلماں ہوں

خونی دروازہ مجھ میں ہے

بھول بھلییا مجھ میں ہے

میں بابری کا ایک گنبد ہوں

میں شہر کی بیچ میں سرحد ہوں

جھگیوں میں پلتی غربت میں

مدرسوں کی طوطی چھت میں

دنگو میں بھڑکتا شولہ میں

کرسی پر خون کا دھبہ میں

میں ہندوستانی مسلمان ہوں

مندر کی چوکھت میری ہے مسجد کے قبلے میرے ہے

گردوارکا دربار مینرا،ایسو کے گرجے میرے ہے

سو میں سے 14 ہوں لیکن

14 یہ کم نہیں پڑتے ہیں

میں پورے سو میں بستہ ہوں

پورے سو مجھ میں بستے ہیں”

مجھے ایک نظر سے دیکھ نہ تو

میرے ایک نہی سو چہیرے ہے

سو رنگ کے کردار ہے میرے

سو قلم سے لیکھی کہانی میری

میں جتنا مسلماں ہوں بھائی

اتنا ہندوستانی ہوں۔

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?….. हुसैन हैदरी

 

सड़क पर सिगरेट पीते वक़्त जो अजां सुनाई दी मुझको

तो याद आया के वक़्त है क्या और बात ज़हन में ये आई

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

मैं शिया हूं या सुन्नी हूं, मैं खोजा हूं या बोहरी हूं

मैं गांव से हूं या शहरी हूं, मैं बाग़ी हूं या सूफी हूं मैं क़ौमी हूं या ढोंगी हूं

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

मैं सजदा करने वाला हूं, या झटका खाने वाला हूं

मैं टोपी पहनके फिरता हूं, या दाढ़ी उड़ा के रहता हूं

मैं आयत कौल से पढ़ता हूं, या फ़िल्मी गाने रमता हूं

मैं अल्लाह अल्लाह करता हूं, या शेखों से लड़ पड़ता हूं

मैं कैसा मुसलमां हूं भाई?

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

दकन से हुं,यु.पी से हुं,भोपालसे हुं,

दिल्हीसे हुं बंगाल से हुं

गुजरात से हुं,हर उंची नीची जात से हुं.

में ही जुलाहा मोची भी,

में दाकटर भी,दरजी भी

”मुझमें गीता का सार भी है

एक उर्दू का अखबार भी है

मेरा एक महीना रमजान भी है

मेंने किया गंगा स्नान भी है

अपने ही तौर से जीता हुं

दारु,सीगरेट भी पीता हुं

कोई नेता मेरी नस नस में नही

में कीसीके बस में नहीं

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

खूनी दरवाजा मुझमें है

भूल भुलैया मुझमें है

में बाबरीका एक गुंबद हुं

में शहरकी बीच में सरहद हुं

झुग्गियों में पलती गुरबत में

मद्रसों की तूती छ्त में

दंगो में भदकता शोला में

कुर्सीपर खून का धब्बा में

में हिंदुस्तानी मुसलमान हुं

मंदिरकी चोखत मेरी है मस्जिदके किब्ले मेरे है

गुरुद्वारका दरबार मेंरा,इसु के गिरजे मेरे है

सौ में से 14 हूं लेकिन

14 ये कम नहीं पड़ते हैं

मैं पूरे सौ में बसता हूं

पूरे सौ मुझमें बसते हैं”

मुझे एक नजर से देख न तु

मेरे एक नही सो चहेरे है

सो रंग के किरदार है मेरे

सो कलम से लीखी कहाँनी मेरी 

में जीतना मुसलमां भाई

इतना हिंदुस्तानी हुं

और इसके आगे जो जवाब आया उसे जहनियत से सुनें, दिलों में बस चुकी हर उस आवाज को निकाल कर सुनें जो कहती है कि हर मुसलमां आतंकवादी है, क्योंकि…

…ये हिंदुस्तानी मुसलमां हैं.

 

چلنا نہ آئے گا۔۔۔۔محمد خلیل الرحمان،خلیل

Posted by: Bagewafa | اپریل 4, 2018

रोटी और संसद – धूमिल

रोटी और संसद – धूमिल

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ–

‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’

मेरे देश की संसद मौन है।

क्या मोदी इस्राइल ‘मोसद’ के एजेंट हैं?… Azamgarh Express(Facebook)

ख़ास खबर गुजरात मुस्लिम नरसंहार पर विशेष: क्या मोदी इस्राइल ‘मोसद’ के एजेंट हैं?… Azamgarh Express(फ़केबूक)

  गुजरात मुस्लिम नरसंहार पर विशेष: क्या मोदी इस्राइल ‘मोसद’ के एजेंट हैं? पढ़ें अमरीश मिश्रा की रिपोर्ट

क्या भारत का प्रधानमन्त्री, ईज़राइल की गुप्तचर एजेन्सी ‘मोसाद’ का एजेंट है? जानिये 2002 गुजरात नरसंघार के दौरान, एहसान जाफरी की हत्या के पीछे की अनोखी साज़िश!

गुजरात नरसंहार पर विशेष: एहसान जाफरी के मरने के पहले मोदी जानते थे कि जाफरी को कैसे मारा जायेगा! इस लेख को पड़कर दिल दहल जाएगा, क्या…?

अहमदाबाद 28 फरवरी 2002 2 बजे के थोडा पहले..प्रदेश के डेप्युटी कमिश्नर Sanjiv Bhatt चिंतित थे…गोधरा रेल ‘हादसे’ के बाद (‘हादसा’ इसलिये क्यूंकि अब कुछ कट्टर भाजपा समर्थको को भी लग रहा है कि कारसेवको को ले जा रही बोगी मे आग भीतर से लगाई गई थी ना कि बाहर से मुसलमानो द्वारा.

पूरे अहमदाबाद और गुजरात मे सुनियोजित हमले भड़क चुके थे। मुस्लिम पुरुषो की बड़े पैमाने पर हत्या, मुस्लिम औरतो का बलात्कार और हत्या, मुस्लिम माओंं के गर्भ से बच्चोंं को चीर कर निकाल देना, मुस्लिम इलाको मे पानी भरकर उसके निवासियो को बिजली फैलाकर मारना…अच्छी तरह से तैयार, विहिप, बीजेपी, संघ और बजरंग दल के लोगो के संगठित समूह निर्मम तरीके से जघ्यन्ता पर उतर आये थे.

हथियार,पेट्रोल बम, साइकिल चेन, और तलवारो से लैस एक बड़ी भीड गुलबर्ग सोसायटी के चारो तरफ जमा हो चुकी थी और नारे लगा रही थी। इस सोसायटी मे एक असाधारण कवि, गंगा जमुनी तहजीब के नुमाइंदे और पूर्व कांग्रेस एमपी एहसान जाफरी का घर था.

जाफरी 1977 मे इंदिरा गांधी-विरोधी लहर के बावजूद, अहमदाबाद से लोक सभा चुनाव जीते थे। पर आज जाफरी शत्रुओंं से घिरे हुये थे। वह पहले भी साम्प्रदायिक दंगे झेल चुके थे, एक बार उनका घर भी जला दिया गया था।

पहले भी झेल चुके थे सांप्रदायिक दंगे

गुलबर्ग सोसायटी मे आने के बाद उन्होने 1980s के उत्तरार्ध मे दक्षिणपंथियो द्वारा प्रायोजित, साम्प्रदायिक दंगे देखे थे। फिर भी जाफरी को भारत की मिली जुली संस्कृति और इंडिया के लॉ ऐण्ड आर्डर पर पूरा भरोसा था। वह एक प्रगतिशील व्यक्ति और एक उदार मुसलमान थे.

जाफरी के कई पड़ोसी और पास की झुग्गी झोपड़ियों से तमाम मुस्लिम उनके यहाँ सुरक्षा की तलाश मे इस उम्मीद मे आये हुये थे कि पूर्व एमपी होने के नाते वो वहाँ सुरक्षित रहेंगे। जाफरी की पत्नी ज़किया जाफरी ने बाद मे मीडिया को बताया कि “उन्होने (एहसान जाफरी ने) मदद के लिये 100 से भी ज्यादा फोन काल किये थे.

गुजरात डीजीपी, अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर, प्रदेश मुख्य सचिव और दर्जनो और लोगोंं से मदद की गुहार लगायी। गुलबर्ग हत्याकांड से बचे एक गवाह ने भी बाद मे कोर्ट को बताया कि जाफरी ने सीएम नरेंद्र मोदी को भी फोन किया था.

“जब मैने उनसे पूंछा कि मोदी ने क्या कहा तो उन्होने (जाफरी) उत्तर दिया कि उसने मदद के बजाय गालियाँ दी”। डरे हुये जाफरी ने यहाँ तक कि उस समय दिल्ली, डेप्युटी पीएम लालकृष्ण आडवाणी को भी काल किया.

मोदी के एक भाजपाई करीबी जो उस दिन आडवाणी के साथ ही थे ने बाद मे प्रेस को बताया कि कैसे भाजपा नेता ने खुद मोदी के आफिस मे जाफरी के लिये फोन किया।

जानबूझ कर बनाया गया निशाना

करीब 2.30 PM तक पागल भीड गुलबर्ग सोसायटी का गेट तोडकर अंदर घुस चुकी थी। जाफरी के घर के बाहर एक बडी भीड़ जमा थी। वे औरतो का बलात्कार कर रहे थे और फिर उन्हे ज़िन्दा जला रहे थे। आदमियो को टुकड़ों मे काट रहे थे, बच्चो को भी नही बख्श रहे थे.

बाद मे कोर्ट मे जमा किये गये दस्तावेज़ों के अनुसार जाफरी को हमलावरो ने उनकी उंगलियाँ और टांग काटने के पूर्व, नंगा कर घुमाया…और फिर उनके शरीर को एक जलते चिता मे झोंक दिया। पुलिस की आफिशियल रिपोर्ट के अनुसार गुलबर्ग सोसायटी मे करीब 59 लोगो की हत्या हुई थी.

स्वतंत्र जांच के अनुसार करीब 69 या 70 लोग मारे गये। जाफरी की पत्नी ज़किया और कुछ अन्य लोग, जिन्होने खुद को ऊपरी कमरे मे खुद को बंद कर लिया था, बच गये। बाद मे, मोदी ने दावा किया कि उन्हे गुलबर्ग सोसायटी के बारे मे कोई जानकारी तब तक नही थी जब तक कि उन्हे पुलिस अधिकारियो ने शाम को नही बताया.

मोदी को सारी साजिश का पता था, साजिश कहीं और रची गयी थी

मोदी ने झूठ बोला! उस दिन खुद संजीव भट्ट ने मोदी को 2 बजे के पहले ही कई बार फोन किया था और बताया था कि गुलबर्ग सोसायटी के बाहर काफी भीड़ इकट्ठा हो गई है! अब, चिंतित भट्ट ने सीएम का सामना करने का फैसला किया.

मीटिंग के दौरान भट्ट ने मोदी से तुरंत दखल देने की अपील की परंतु मोदी का रवैया आश्चर्यचकित करने वाला था। मोदी ने पहले भट्ट को सुना और फिर बोले “संजीव, यह पता करो, कि क्या जाफरी को तड़ से (आवेश में) गोली चलाने की आदत है”? मुख्य मंत्री दफ्तर के बाहर, कारीडोर मे, संजीव भट्ट पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी और पूर्व गृह मंत्री नरेश रावल से मिले.

दोनो ही पूर्व मंत्रियो ने भट्ट से कहा कि एहसान जाफरी गुलबर्ग से फोन काल कर रहे हैं-और वो दो, मोदी से इसी सिलसिले में मिलने आये हैं। फिर, कुछ समय पश्चात, भट्ट को एक फोन आया। दूसरी तरफ से कहा गया कि जाफरी ने भीड़ पर फायर कर दिया.

जब भट्ट आफिस पहुंचे, तो उनकी टेबल पर एक संक्षिप्त रिपोर्ट पड़ी थी जिसमे लिखा था कि ‘जाफरी ने आत्मरक्षा मे गोली चलाई थी’! अचानक संजीव भट्ट के दिमाग मे कौंधा–क्या मोदी को पता था कि कैसे पूरा एहसान जाफरी एपीसोड खेला जायेगा!

एहसान जाफरी का क़त्ल एक साजिश, संघ और मोसद का हाथ

असल मे एहसान जाफरी का क़त्ल एक साज़िश थी। जाफरी के कत्ल के पीछे की ताकतों मे ईज़राइल के ‘मोसाद’ का संदिग्ध था। साफ है कि जाफरी के व्यवहार का पहले ही अध्ययन किया जा जुका था। दुश्मन जानते थे कि जाफरी के पास गन थी.

राष्ट्र-विरोधी, भारत-विरोधी, दुश्मन ताक़तों ने जाफरी के कत्ल के लिये ऐसे हालात पैदा किये जिसमे या तो एहसान जाफरी अपनी गन निकालने के लिये बाध्य होंगे (खून की प्यासी भीड़ को रोकने के लिये) या फिर अगर जाफरी गन नही भी निकाले, तो भी बाद मे कहा जा सके कि जाफरी ने आत्मरक्षा मे गन निकाली थी और भीड ने इसलिये उन्हे मार डाला.

यहाँ संघ-मोसाद के शैतानी दिमाग का कारनामा देखिये–ज़किया जाफरी का कहना है कि एहसान ने कोई फायर नही किया, बल्कि खुद को भीड़ के हवाले कर दिया था, इस शर्त पर कि वे घर मे सुरक्षा के लिये जमा अन्य लोगो को जाने देंगे! इस तरह जाफरी की हत्या एक साज़िश के तहत हुई.

दिखाने के लिये एक माहौल बनाया गया कि उनकी हत्या इसलिये हुई क्योंकि उन्होने गन निकाली थी। इसी तर्क का इस्तेमाल हुआ था मोदी को क्लीन चिट देने के लिये! तो मोदी को जाफरी के मारे जाने के पहले से मालुम था कि जाफरी को कैसे मारा जायेगा! और ऐसा आदमी हमारा प्रधानमंत्री है.

लेखक अमरेश मिश्र के अपनी निजी विचार है इसका मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद: पंडित वी. एस. कुमार ने किया है. इसको लिखने पर इनको मुकद्दमे करने की धमकी भी मिल रही है. देखिये किस तरह से मोदी बीजेपी आईटी सेल वाले सच लिखने पर धमकियाँ दे रहे हैं. जिसकी लिंक निचे है। https://www.facebook.com/amaresh.misra.1/posts/917324118427371

 

आई न रास हमको _मोहम्मदअली वफा

 

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आई न रास हमको ये मौसम बहार की

 हमतो गरीब पतझड के विरां बागमें पले

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हमने कहां, गुल भरी कोइ शाख भी देखी,

हम तो दहकते सहराकी ये आगमें जले

 

 

 

 

آئ نہ راس ہمکو۔۔محمدعلی وفا

 

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 آئ نہ  راس  ہمکو یہ موسم  بہار  کی

 ہمتو غریب  پتجہڑکے ویراں باغ میں  پلے

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 ہمنے کہاں گل بھری کوئ شاخ بھی دیکھی

  ہم تو دہکتے صحرا  کی یہ آگ  میں  جلے

Modern Urdu Ghazal | Shamsur Rahman Faruqi and Ahmad Mahfooz | Jashn-e-Rekhta 4th Edition 2017

 

ہم امن چاہتے ہیں مگر ظلم کے خلاف۔۔۔۔۔۔۔ ساحر لدھیانوی

 

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ہم امن چاہتے ہیں مگر ظلم کے خلاف

گر جنگ لازمی ہے تو پھر جنگ ہی سہی

ظالم کو جو نہ روکے وہ شامل ہے ظلم میں

قاتل کو جو نہ ٹوکے’وہ قاتل کے ساتھ ہے

ہم سر بکف اٹھے ہیں کہ حق فتح یاب ہو

کہہ دو اسے جو لشکرِ باطل کے ساتھ ہے

اس ڈھنگ پر ہے زور’ تو یہ ڈھنگ ہی سہی

ظالم کی کوئی ذات’نہ مذہب نہ کوئی قوم

ظالم کے لب پہ ذکر بھی ان کا گناہ ہے

پھیلتی نہیں ہے شاخِ تبسم اس زمیں پر

تاریخ جانتی ہے زمانہ گواہ ہے

کچھ کور باطنوں کی نظر تنگ ہی سہی

یہ زر کی جنگ ہے نہ زمینوں کی جنگ ہے

یہ جنگ ہے بقا کے اصولوں کے واسطے

جو خون ہم نے نذر دیا ہے زمین کو

وہ خون ہے گلاب کے پھولوں کے واسطے

پُھوٹے گی صبحِ امن ‘ لہو رنگ ہی سہی

(انشا اللہ )

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हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ —–साहिर लुधियानवी

 

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 हम अमन चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़

 गर जंग लाज़िमी है तो फिर जंग ही सही

ज़ालिम को जो ना रोके वो शामिल है ज़ुलम में

 क़ातिल को जो ना टोके वो क़ातिल के साथ है

हमसर ब-कफ़ उठे हैं कि हक़ फ़त्हयाब हो

 कह दो उसे जो लश्कर-ए-बातिल के साथ है

 इस ढंग पर है ज़ोर तो ये ढंग ही सही

ज़ालिम की कोई ज़ात न मज़हब न कोई क़ौम

ज़ालिम के लब पे ज़िक्र भी उनका गुनाह है

 फैलती नहीं है शाख़-ए-तबस्सुम इस ज़मीं पर

तारीख़ जानती है ज़माना गवाह है

 कुछ कौर बातिनों की नज़रतंग ही सही

 ये ज़र की जंग है ना ज़मीनों की जंग है

 ये जंग है बक़ा के उसूलों के वास्ते

 जो ख़ून हमने नज़र दिया है ज़मीन को

 वो ख़ून है गुलाब के फूलों के वास्ते

 फूटेगी सुबह-ए-अमन लहू रंग ही सही

 

कपिल सिब्बल ने बाबा रामदेव की धोती उतार दी Kapil Sibbal exposing Baba Ramdev

 

OBC बैंक में हुए 389 करोड़ के घोटाले को लेकर कांग्रेसी कपिल सिब्बल ने किया बड़ा खुलासा !

Posted by: Bagewafa | جولائی 2, 2018

ایک شام۔۔۔۔۔۔علامہ محمد اقبال

 

(بانگ درا)

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