آیئنہ بات کرنے پہ مجبور ہو گیا۔۔۔۔۔۔بشیر بدر

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया —-बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया

.

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के

दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

.

महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये

लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया

.

तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना

आईना बात करने पे मज़बूर हो गया

.

सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल

वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया

.

कुछ फल जरूर आयेंगे रोटी के पेड़ में

जिस दिन तेरा मतालबा मंज़ूर हो गया

 

Advertisements

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 13, 2017

محبت اب نہیں ہو گی۔۔۔ منیر نیا زی

محبت اب نہیں ہو گی۔۔۔ منیر نیا زی

محبت اب نہیں ہو گی

یہ کچھ دن بعد میں ہو گی

ستا رے جو دمکتے ہیں

 کِسی کی چشمِ حیراں میں

 ملا قا تیں جو ہو تی ہیں

 جمال ابر و باراں میں

 یہ نا آباد وقتوں میں

 دل نا شا د میں ہو گی

 محبت اب نہیں ہو گی

 یہ کچھ دن بعد میں ہو گی

 گزر جا ئیں گے جب یہ دن

 یہ اُن کی یا د میں ہو گی

URDU

 

سنا ہے لوگ اُسے آنکھ بھر کے دیکھتے ہیں ۔۔۔۔۔احمد فراز

.

         سُنا ہے لوگ اُسے آنکھ بھر کے دیکھتے ہیں

        سو اُس کے شہر میں کچھ دن ٹھہر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے بولے تو باتوں سے پھول جھڑتے ہیں

        یہ بات ہے تو چلو بات کر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے ربط ھے اُس کو خراب حالوں سے

        سو اپنے آپ کو برباد کر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے دن میں اُسے تتلیاں ستاتی ہیں

        سُنا ہے رات کو جگنو ٹھہر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کے بدن کی تراش ایسی ہے

        کہ پھول اپنی قبائیں کتر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُسے بھی ہے شعر و شاعری سے شغف

        سو ہم بھی معجزے اپنے ھُنر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے درد کی گاہگ ہے چشمِ ناز اُس کی

        سو ہم بھی اُس کی گلی سے گزر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے حشر ہیں اُس کی غزال سی آنکھیں

        سُنا ہے اُس کو ہرن دشت بھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کی سیاہ چشمگیں قیامت ہے

        سو اُس کو سُرمہ فروش آہ بھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے رات اُسے چاند تکتا رہتا ہے

        ستارے بامِ فلک سے اُتر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے رات سے بڑھ کر ہیں کاکلیں اُس کی

        سُنا ہے شام کو سائے گزر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کے لبوں سے گلاب جلتے ہیں

        سو ہم بہار پر الزام دھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کے شبستاں سے مُتصل ہے بہشت

        مکیں اُدھر کے بھی جلوے اِدھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے آئینہ تمثال ہے جبیں اُس کی

        جو سادہ دل ہیں اُسے بن سنور کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے چشمِ تصور سے دشتِ اِمکاں میں

        پلنگ زاویے اُس کی کمر کے دیکھتے ہیں

        رُکے تو گردشیں اُس کا طواف کرتی ہیں

        چلے تو اُس کو زمانے ٹھہر کے دیکھتے ہیں

        بس اِک نگاہ سے لُٹتا ہے قافلہ دل کا

        سو راہروانِ تمنّا بھی ڈر کے دیکھتے ہیں

        اب اُس کے شہر میں ٹھہریں یا کُوچ کر جائیں

        فراز آؤ ستارے سفر کے دیکھتے ہیں

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं۔۔۔۔۔۔۔۔अहमद फराज

 

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं

तो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना रब्त है उसको खराब हालो से

सो अपने आपको बरबाद करके देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक चश्म-ए-नाज़ उसकी

सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी का शग़फ़

तो हम भी मौजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं

सुना है रात उसे चांद तकता रहता है

सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियां सताती है

सुना है रात को जुग्नू ठहर के देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आंखें

सुना है उसको हिरन दश्त भर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर है काकलें उसकी

सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चशमगी क़यामत है

सो उसको सुर्मा फ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है जबसे हमाईल है उसकी गर्दन मे

मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बायें कतर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते है

तो हम बहार पे इलज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसील है जबीं उसकी

जो सादा दिल हैं उसे बन संवर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती है

चलें तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

कहानियां ही सही,सब मुबालग़े ही सही

अगर ये ख्वाब है ताबीर करके देखते हैं

शहजाद अहमद

BornApril 16, 1932, in Amritsar…..

He died in Lahore due to cardiac arrest on 2nd August 2012

रुखसत हुआ तो आँख मिलाकर नहीं गया- शहजाद अहमद को एक श्रद्धांजलि……. कुलदीप अंजुम

    चला गया वो सितारे खैरात करने वाला अदब का अज़ीम खिदमतगार

    रुखसत हुआ तो आँख मिलाकर नहीं गया

    वो क्यूँ गया है ये भी बताकर नहीं गया

    यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा

    जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया

    बस इक लकीर खेंच गया दरमियान में

    दीवार रास्ते में बनाकर नहीं गया

    शायद वो मिल ही जाये मगर जुस्तजू है शर्त

    वो अपने नक़्शे पा तो मिटाकर नहीं गया

    घर में हैं आजतक वही खुशबू बसी हुई

    लगता है यूँ कि जैसे वो आकर नहीं गया

    रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे

    और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया

अगर उर्दू अदब में आपकी जरा सी भी दिलचस्पी है तो आप शहजाद अहमद के नाम से ज़रूर वाकिफ होंगे.  इस महबूब शायर का पिछले दिनों अगस्त १ २०१२ बुधबार को इंतकाल हो गया . ३१ जुलाई को दफ्तर से लौटते वक़्त उन्हें दिल का दौरा पड़ा और अगले दिन इस महान फनकार ने हमारा साथ छोड़ दिया. करीब बीस साल पहले उन्हें पहली दफे दिल का दौरा पड़ा था पर उस समय वक़्त उनके साथ था . अपने आखिरी दिन तक वो "मजलिसे तरक्की ए अदब” के डारेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे .ये ओहदा उन्हें किब्लह अहमद नदीम कासमी साहब की अचानक मौत के बाद सौंपा गया था . आप इसी से अंदाज़ा लगा सकते हैं की शहजाद अहमद का कद क्या था और वो किस विरासत को साथ लेकर चल रहे थे . .तकरीबन तीस किताबें छपीं. जिनमें  कुछ तर्जुमा और कुछ फिलासफी से सम्बंधित थी पर ताउम्र उनका जोर उर्दू पोएट्री पर ही रहा . पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें देश के सबसे बड़े सिविल अवार्ड "प्राइड ऑफ परफार्मेंस(तमगा ए हुस्न ए करकरदगी)” से भी नवाज़ा .शहजाद अहमद की सबसे खास बात ये उन्होंने बुजुर्ग और नई नस्ल के बीच लिंक की तरह काम किया .उनके कलाम को इक तरफ जहाँ अदब के जनाब करों ने सराहा वही दूसरी ओर मजमे में भी उन्हें ग़ज़ल की मकबूलियत हासिल थी .अदब का ये अज़ीम खिदमतगार १६ जुलाई १९३२ के दिन अमृतसर में पैदा हुआ था .१९५६ में गवर्मेंट कालेज लाहोर से फिलॉसफी और साइकोलॉजी में डिग्री हासिल की . गोरा रंग , मीठी जुबान और साफ दिल उनकी शख्सियत का हिस्सा थे …उनका पहला मजमुआँ ‘सदफ’ १९५८ में शाया हुआ !

इतने बड़े शायर को कुछ पन्नों में समेटने की कोशिश नादानी होगी .फिर भी कुछ अशआर जो खासतौर पर मुझे पसंद हैं उनके मार्फत उस महान शायर को याद करने की कोशिश करते हैं-

    गुजरने ही न दी वो रात मैंने

    घडी पर रख दिया था हाथ मैंने

    फलक की रोक दी थी मैंने गर्दिश

    बदल डाले थे सब हालात मैंने

    फलक कशकोल लेके आ गया था

    सितारे कर दिए खैरात मैंने

शहजाद साहब की कही मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल ..

    शऊरे जात ने ये रस्म भी निबाही थी

    उसी को क़त्ल किया जिसने खैर चाही थी

    तुम्ही बताओ मैं अपने हक में क्या कहता

    मेरे खिलाफ भरे शहर की गवाही थी

    कई चरागनिहाँ थे चराग के पीछे

    जिसे निगाह समझते हो कमनिगाही थी

    तेरे ही लश्करियों ने उसे उजाड़ दिया

    वो सरज़मी जहाँ तेरी बादशाही थी

    इसीलिए तो ज़माने से बेनियाज़ था मैं

    मेरे बजूद के अन्दर मेरी तबाही थी

    तेरी जन्नत से निकाला हुआ इन्सान हूँ मैं

    मेर ऐजाज़ अज़ल ही से खताकारी है

    दो बलायें मेरी आँखों का मुकद्दर ‘शहजाद’

    एक तो नींद है और दूसरे बेदारी है

ग़ज़ल की खूबसूरती के लिहाज़ से इस ग़ज़ल की भला क्या मिसाल दी जा सकती है…

    वो मेरे पास है क्या पास बुलाऊँ उसको

    दिल में रहता है कहाँ ढूंढने जाऊँ उसको

    आज फिर पहली मुलाकात से आगाज़ करूँ

    आज फिर दूर से ही देखकर आऊँ उसको

    चलना चाहे तो रखे पाँव मेरे सीने पर

    बैठना चाहे तो आँखों पे बिठाऊँ उसको

    वो मुझे इतना सुबुक इतना सुबुक लगता है

    कभी गिर जाये तो पलकों से उठाऊँ उसको

पाकिस्तान ने अपना एक फिक्रमंद शायर खो दिया ये बात उनके इन दो अशआरों से ज़ाहिर हो जाती है …जो मैंने अलग -अलग गजलों से चुने हैं !

    मेरा कायद मेरी सोई हुई मिल्लत से कहता है

    बस अब तो नीद से जागो खुदारा दिन निकल आया

    यहाँ जुलूस है फरियाद करने वालों का

    जो सबसे आगे हैं वो आदमी यजीद का है

    वो मुल्क बेंचते हैं असलाह खरीदते हैं

    ये कारोबार हर इक दायमी यजीद का है

शहजाद अहमद ने जब दुनिया ऐ अदब में कदम रखा उस दौर में तरक्कीपसंद ग़ज़ल अपने पूरे शबाब पर थी . गज़ल के अमूमी रंग और घिसे पिटे मौज़ुआत से ग़ज़ल को आजाद करने वालों में से एक नुमायाँ नाम शहजाद अहमद का भी है . पचास की दहाई में मंज़रे आम पर आने वली पहली नसल के काफिले में अहमद फ़राज़ , मुनीर नियाजी , ज़मीलुद्दीन आली ,महशर बद्युनी, जौन एलिया ,नासिर काज़मी और शहजाद अहमद जैसे नाम शामिल थे. इक तरफ जहाँ जौन दुसरे शायरों के साथ तरक्की पसंद अदब के झंडाबरदार थे तो वहीँ शहजाद अहमद ज़फर इकबाल के साथ ज़दीद उर्दू ग़ज़ल का दामन थामे हुए थे. शहजाद अहमद की रोशन खयाली उन्हें औरो से जुदा करती है .

शहजाद अहमद बुनियादी तौर पर रूमान पसंद शायर थे. शुरूआती दौर में वो इसी रूप में मकबूलियत हासिल करते रहे बाद में उनके कहे में तमाम और फिक्र-ओ- फन शामिल हो गए . शहजाद अहमद को आज तक वह मुकाम आज तक नहीं मिला जिसके वह सही में हक़दार थे.  आँखों को सीपियाँ सिर्फ शहजाद अहमद ही कह सकते थे.

    शबे गम को सहर करना पड़ेगा

    बहुत लम्बा सफ़र करना पड़ेगा

    सबा नेज़े पे सूरज आ गया है

    ये दिन भी अब बसर करना पड़ेगा

    ये आंखें सीपियाँ हैं इसलिए भी

    हर आंसू को गोहर करना पड़ेगा

    उसे रुखसत ही क्यूँ होने दिया था

    ये गम अब उम्र भर करना पड़ेगा

    कहा तक दरबदर फिरते रहेंगे

    तुम्हारे दिल में घर करना पड़ेगा

    अभी तक जिसपे हम पछता रहे हैं 

    वही बारे दिगर करना पड़ेगा

    मुहब्बत में तुम्हे जल्दी बहुत है

    ये किस्सा मुक्तसर करना पड़ेगा

    बहुत आते हैं पत्थर हर तरफ से

    शज़र को बेसमर करना पड़ेगा

    अज़ाबे जाँ सही तरके ताल्लुक

    करेंगे हम अगर करना पड़ेगा

शहजाद अहमद ज़दीद और तरक्की पसंद दोनों के बीच से इंसानियत की बात करने वालों में से थे ….इंसानी फितरत ..दुखदर्द और इंसानी मसाइल की बातें उनके कलाम का अहम् हिस्सा हैं

    ज़लाया था मैंने दिया किसलिए

    बिफरने लगी है हवा किसलिए

    अगर जानते हो की तुम कौन हो

    उठाते हो फिर आइना किसलिए

    जो लिखा हुआ है वो होना तो है

    उठाते हो दस्ते दुआ किसलिए

    इसी काफिले का मुसाफिर हूँ मैं

    मेरा रास्ता है जुदा किसलिए

    बहुत मुख्तलिफ थी मेरी आरज़ू

    मुझे ये ज़माना मिला किसलिए

    भरी अंजुमन में अकेला हूँ मैं

    मगर ये नहीं जानता किसलिए

    मैं ‘शहजाद’ हर्फे गलत हूँ तो फिर

    मुझे उसने रहने दिया किसलिए

शायद ही किसी ने गुलाम अली साहब की आवाज़ में इस मशहूर ग़ज़ल को न सुना हो

    अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

    एक नज़र मेरी तरफ देख तेरा जाता क्या है

    मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक

    मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है

    पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको

    दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है

    सफरे शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे

    आंख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है

    उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले

    तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है

    मर गए प्यास के मारे तो उठा अबरे करम

    बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है

    मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता

    देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है

    तुझमे कुछ बल है दुनिया को बहाकर लेजा

    चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है

    तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उनपर

    जागने वालो को शहजाद जगाता क्या है 

    ईमाँ को एक बार भी जुम्बिश नहीं हुई

    सौ बार कूफ़ियों के कदम डगमगा गए

    हम इस ज़मीन को लाये हैं आसमानों से

    और इन्तिखाब किया है कई ज़हानो से

    यही जबाब मिला अब वतन ही सब कुछ है

    बहुत सवाल किये हमने नुक्तादानों से

    खुदा से उसका करम मांगते हैं हम शहजाद

    चलें तो आगे निकल जाएँ कारवानो से

    जो शज़र सूख गया है वो हरा कैसे हो

    मैं पयम्बर तो नहीं मेरा कहा कैसे हो

    जिसको जाना ही नहीं उसको खुदा क्यूँ मानें

    और जिसे जान चुके हैं वो खुदा कैसे हो

    दूर से देखके मैंने उसे पहचान लिया

    उसने इतना भी नहीं मुझसे कहा कैसे हो

    वो भी एक दौर जब मैंने उसे चाहा था

    दिल का दरवाज़ा है हर वक़्त खुला कैसे हो

    उम्र सारी तो अँधेरे में नहीं कट सकती

    हम अगर दिल न जलाएं तो ज़िया कैसे हो

    जिससे दो रोज भी खुलकर न मुलाकात हुई

    मुद्दतों बाद मिले भी तो गिला कैसे हो

शहजाद साहब उर्दू अदब में अपने नए बिम्ब और कहाँ के साथ आये

    अब तक उसकी मुहब्बत का नशा तारी है

    फूल बाकी नहीं खुशबू का सफ़र जारी है

    आज का फूल तेरी कोख से ज़ाहिर होगा

    शाखे दिल खुश्क न हो अबके तेरी बारी है

    ध्यान भी उसका है मिलते भी नहीं हैं उससे

    जिस्म से बैर है साये से वफादारी है

    इस तगो ताज में टूटे हाँ सितारे कितने

    आसमा जीत सका है न ज़मी हारी है

    कोई आया है अभी आंख तो खोलो शहजाद

    अभी जागे थे अभी सोने की तैयारी है

    धूप निकली है तो बदल की रिदा मांगते हो

    अपने साये में रहो गैर से क्या मांगते हो

    अरसा ऐ हश्र में बक्शिश की तमन्ना है तुम्हे

    तुमने जो कुछ न किया उसका सिला मांगते हो

    उसको मालूम है शहजाद वो सब जानता है

    किसलिए हाथ उठाते हो दुआ मांगते हो

    तय हमसे किसी तौर मुसाफत नहीं होती

    नाकाम पलटने की भी हिम्मत नहीं होती

    चोरी की तरह जुर्म है दौलत की हवस भी

    वो हाथ कटें जिनसे सखावत नहीं होती

    जिंदानिओं क्यूँ अपना गला कट रहे हो

    मरना तो रिहाई की ज़मानत नहीं होती

    जो तूने दिया है वही लौटायेंगे तुझको

    हमसे तो इमानत में खयानत नहीं होती

    किस बेतलबी से मैं तुझे देख रहा हूँ

    जैसे मेरे दिल में कोई हसरत नहीं होती

    ये सोचकर की तेरी ज़वीं पर न बल पड़े

    बस दूर ही से देख लिया और चल पड़े

    ऐ दिल तुझे बदलती हुई रुत से क्या मिला

    पौधों में फूल और दरख्तों में फल पड़े

    सूरज सी उसकी तबा है शोला सा उसका रंग

    छू जाये उस बदन को तो पानी उबल पड़े

    बहुत ख़राब किया ख्वाहिशाते दुनिया ने

    ज़रा ज़रा से ये बुत बन गए खुदा मेरे

    ये दुश्मनों से नहीं जात से लड़ाई है

    किसी भी काम न आयेंगे दस्तो पा मेरे

    तू दोस्तों की तरह फासला न रख इतना

    हरीफ है तो फिर आ पास बैठ जा मेरे

    ये और बात कि मैं बज़्म में अकेला हूँ

    बहुत करीब ही बैठे हैं आशना मेरे

    वो रौशनी थी कि मैं कुछ न देख पाया था

    कल आफ़ताब बहुत ही करीब था मेरे

    अब न वो शोर है न शोर मचाने वाले

    खाक से बैठ गए खाक उड़ाने वाले

    दिल से वहशी कभी काबू में न आया यारों

    हार कर बैठ गए जाल बिछाने वाले

        आरज़ू की बेहिसी का गर यही आलम रहा

        बेतलब आएगा दिन और बेखबर जाएगी रात

        शाम ही से सो गए हैं लोग आँखे मूंदकर

        किसका दरवाज़ा खुलेगा किसके घर जाएगी रात

    जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुसवाई

    अब खाक उड़ाने को बैठे हैं तमाशाई

    अब दिल को किसी करवट आराम नहीं मिलता

    एक उम्र का रोना है दो दिन की शनासाई

    इस खौफ से इक उम्र हमें नींद न आई

    इक चोर छुपा बैठा है सीने की गुफा में

    इक नूर का सैलाब है बंद आँखों के अन्दर !

    लिपटे हुए चेहरे हैं अँधेरे की रिदा में !!

शहजाद अहमद का जाना उर्दू अदब के लिए कितना बड़ा नुकसान है इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता …..उनके साथ उर्दू ग़ज़ल का इक मज़बूत स्तम्भ (ज़दीद ग़ज़ल का आखिरी) भी ढह गया.

 

 

تیرے جانے کی خبر دیوارو در کرتے رہے

 

तेरे जाने की ख़बर दीवार-ओ-दर करते रहे—-परवीन शाकिर

जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे

चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे

रास्तों का इल्म था हम को न सम्तों की ख़बर

शहर-ए-ना-मालूम की चाहत मगर करते रहे

हम ने ख़ुद से भी छुपाया और सारे शहर को

तेरे जाने की ख़बर दीवार-ओ-दर करते रहे

वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी

इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

आज आया है हमें भी उन उड़ानों का ख़याल

जिन को तेरे ज़ोम में बे-बाल-ओ-पर करते रहे

 

شوق دیدار مر گیا ہوگا۔۔۔۔۔۔ایوب سیفی

यादों की पहेली को — निलेश मिश्रा

 

यादों की पहेली को

कुछ इस तरह सुलझाओ

बूझो तो बूझ जाओ

वरना भुलाते जाओ

तुमने भुला दिया है

इतना यकीन है पर

मैंने भुला दिया है

इसका यकीं दिलाओ

मुझे छोड़ के गए तुम

सब ले गए थे क्यूँ तुम

इतना रहम तो कर दो

इक घाव छोड़ जाओ

कुछ नफरतें पड़ी हैं

कहीं पे तुम्हारे घर में

मेरा है वो सामां तुम

वापस मुझे दे जाओ

मेरा ग़म का खज़ाना है

तेरे पास मुस्कराहट

अपना जो है ले जाओ

मेरा जो है दे जाओकुछ इस तरह सुलझाओ

बूझो तो बूझ जाओ

वरना भुलाते जाओ

तुमने भुला दिया है

इतना यकीन है पर

मैंने भुला दिया है

इसका यकीं दिलाओ

मुझे छोड़ के गए तुम

सब ले गए थे क्यूँ तुम

इतना रहम तो कर दो

इक घाव छोड़ जाओ

कुछ नफरतें पड़ी हैं

कहीं पे तुम्हारे घर में

मेरा है वो सामां तुम

वापस मुझे दे जाओ

मेरा ग़म का खज़ाना है

तेरे पास मुस्कराहट

अपना जो है ले जाओ

मेरा जो है दे जाओ

یادوں کی پہیلی کو۔۔۔۔۔۔ نلیش مشرا

 

یادوں کی پہیلی کو

کچھ اس طرح سلجھاؤ

بُوجھو تو بُوجھ جاؤ

ورنہ بُھولاتے جاؤ

تم نے بُھولا دیا ہے

اتنا یقین ہے پر

میں نے بُھولا دیا ہے

اسکا یقیں دلاؤ

مجھے چھوڑ کے گئے تم

سب لے گئے تھے کیوں تم

اتنا رحم تو کر دو

اک گھاؤ چھوڑ جاؤ

کچھ نفرتیں پڑی ہیں

کہیں پہ تمہارے گھر میں

میرا ہے وہ ساماں

واپس مجھے دے جاؤ

میرا غم کا خزانہ ہے

تیرے پاس مسکراہٹ

اپنا جو ہے لے جاؤ

میرا جو ہے دے جاؤ

کچھ اس طرح سلجھاؤ

بُوجھو تو بُوجھ جاؤ

ورنہ بُھولاتے جاؤ

تم نے بُھولا دیا ہے

اتنا یقین ہے پر

میں نے بُھولا دیا ہے

اسکا یقیں دلاؤ

مجھے چھوڑ کے گئے تم

سب لے گئے تھے کیوں تم

اتنا رحم تو کر دو

ایک گھاؤ چھوڑ جاؤ

کچھ نفرتیں پڑی ہیں

کہیں پہ تمہارے گھر میں

میرا ہے وہ ساماں تم

واپس مجھے دے جاؤ

میرا غم کا خزانہ ہے

تیرے پاس مسکراہٹ

اپنا جو ہے لے جاؤ

میرا جو ہے دے جاؤ

https://youtu.be/KrG89ZGOOoM

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना….. अवतार सींघ संधु “पाश”

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है

सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है

पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में

सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो है

जुगनुओं की लौ में पढ़ना -बुरा तो है

मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना – बुरा तो है

सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

तड़प का न होना, सब सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर जाना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है

आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो

आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है

जो सबकुछ देखती हुई जमी बर्फ होती है

जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है

जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है

जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई

एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है

जो हर हत्‍याकांड के बाद

वीरान हुए आंगन में चढ़ता है

लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता

सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है

आपके कानो तक पहुँचने के लिए

जो मरसिए पढता है

आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर

जो गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे खतरनाक वह रात होती है

जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है

जिसमे सिर्फ उल्लू बोलते और हुआँ हुआँ करते गीदड़

हमेशा के अँधेरे बंद दरवाजों-चौगाठों पर चिपक जाते है

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है

जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए

और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना

کیا کہئیے۔۔۔۔۔۔محمد علی وفا

.

ہماری جان پر انکی نظر ہے کیا کہئیے 

ہمارے پاس توبس ایک ہی سر ہے کیا کہئیے

 .

نہیں ہے کوئ فرق انکی ہاں میں اور نا میں

ملا عجیب انہیں یہ ہنر ہے کیا کہئیے

 .

 یہ لگ رہا ہے کہ سر پھوڑنا پریگا ہمیں

وہ حالِ دل سے مرے بے خبرہے کیا کہئیے

 .

 کہاں تک بھلا سہتے  رہیں گےیہ سنگ زنی

بچانا ہم پہ بھی لازم  یہ  سر ہے کیا کہئیے 

 .

جنوں کی حد سے بھی آگے گزر گیےہیں وفا

کہ  آگ دل میں لگی اس قدر ہے کیا کہئیے

क्या कहिये۔۔۔۔۔۔۔۔۔मुहम्मदअली वफ़ा

 

 .

 हमारी जान पर उनकी नज़र है क्या कहिये

 हमारे पास तो बस एक ही सर है क्या कहिये

.

 नहीं है कोई फ़र्क़ उनकी हाँ में और ना में

मिला अजीब उन्हें ये हुनर है क्या कहिये

 .

 ये लग रहा है कि सर फोड़ना पडेगा हमें

 वो हाल-ए-दिल से मेरे बे ख़बर हे क्या कहिये

 .

 कहाँ तक भला सहते रहें गै ये संग-ज़नी

 बचाना हम पे भी लाज़िम ये सर है क्या कहिये

 .

 जुनूँ की हद से भी आगे गुज़र गयें  है वफ़ा

 कि आग दिल में लगी इस क़दर है क्या कहिये

Ghalib Academy Tarahi Mushayro at Missisauga on Canada 16 Sept.2017

 

 

महान मुस्लिम वैज्ञानिक:- इब्न अल हैशम…. साजिद अली सुलतान

 

 

कौन थे कैमरा के अविष्कार करने वाले मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल-हैशम..?

कौन थे कैमरा के अविष्कार करने वाले मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल-हैशम..?

इब्न अल हैशम एक ईराकी वैज्ञानिक थे जिनका जन्म 965 ईस्वी में बसरा, ईराक में हुआ था। इब्न अल हैशम का पूरा नाम अबू अली अल-हसन बिन अल-हैशम है। इब्न अल हैशम को भौतिक विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान में महारत हासिल थी।

   इब्न अल हैशम को अल्हज़ेन (Alhazen) भी कहा गया।इब्न अल हैशम अपने दौर में नील नदी के किनारे बाँध बनाना चाहते थे ताकि मिश्र के लोगों को साल भर पानी मिल सके लेकिन अपर्याप्त संसाधन के कारण उन्हें इस योजना को छोड़ना पड़ा लेकिन बाद में उन्हीं की इस योजना पर उसी जगह एक बाँध बना जिसे आज असवान बाँध के नाम से जाना जाता है।

  • आँख पर अनुसंधान●

पुराने समय में माना जाता था कि आँख से प्रकाश निकल कर वस्तुओं पर पड़ता है जिससे वह वस्तु हमें दिखाई देती है लेकिन इब्न अल हैशम ने अफलातून और कई वैज्ञानिकों के इस दावे को गलत साबित कर दिया और बताया कि जब प्रकाश हमारी आँख में प्रवेश करता है तब हमे दिखाई देता है। इस बात को साबित करने के लिए इब्न अल हैशम को गणित का सहारा लेना पड़ा।

   इब्न अल हैशम ने प्रकाश के प्रतिबिम्ब और लचक की प्रकिया और किरण के निरक्षण से कहा कि जमीन की अन्तरिक्ष की उंचाई एक सौ किलोमीटर है। इनकी किताब “किताब अल मनाज़िर” प्रतिश्रवण के क्षेत्र में एक उच्च स्थान रखती है। उनकी प्रकाश के बारे में की गयी खोजें आधुनिक विज्ञान का आधार बनी। इब्न अल हैशम ने आँख पर एक सम्पूर्ण रिसर्च की और आँख के हर हिस्से को पूरे विवरण के साथ अभिव्यक्ति किया। जिसमें आज का आधुनिक विज्ञान भी कोई बदलाव नही कर सका है।

  • कैमरे का आविष्कार●

इब्न अल हैशम ने आँख का धोखा या भ्रम को खोजा जिसमे एक विशेष परिस्थिति में आदमी को दूर की चीजें पास और पास की दूर दिखाई देती हैं। प्रकाश पर इब्न अल हैशम ने एक परिक्षण जिसके आधार पर इब्न अल हैशम ने कहा था कि अगर किसी अंधेरे कमरे में दीवार के ऊपर वाले हिस्से से एक बारीक छेंद के द्वारा धूप की रौशनी गुजारी जाये तो उसके उल्ट अगर पर्दा लगा दिया जाये तो उस पर जिन जिन वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ेगा वह उल्टा होगा। इब्न अल हैशम ने इसी आधार पर पिन होल कैमरे का आविष्कार किया। कैमरा शब्द अरबी के अल-क़ुमरा से बना है जिसका अर्थ होता है―छोटी अंधेरी कोठरी।

  • गुमनामी के अंधेरों में गुम―इब्न अल हैशम●

पश्चिमी देशों ने इब्न अल हैशम के कैमरे के आविष्कार को भी अपना नाम दिया और कहा कि "कैमरा” शब्द लैटिन के कैमरा ऑब्स्क्योरा से आया है जिसका अर्थ अंधेरा कक्ष होता है जबकि "कैमरा” शब्द अरबी के अल-कुमरा से बना है।

   इब्न अल हैशम ने जिस काम को अंजाम दिया उसी के आधार पर बाद में गैलीलियो, कापरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने काम किया। इब्न अल हैशम से प्रभावित होकर गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार किया। इब्न अल हैशम की वैज्ञानिक सेवाओं ने पिछले प्रमुख वैज्ञानिकों के चिराग बुझा दिए। इन्होने इतिहास में पहली बार लेंस की आवर्धक पावर की खोज की। इब्न अल हैशम ने ही यूनानी दृष्टि सिद्धांत (Nature of Vision) को अस्वीकार करके दुनिया को आधुनिक दृष्टि दृष्टिकोण से परिचित कराया। जो चीजें इब्न अल हैशम ने खोजी। पश्चिमी देशों ने हमेशा उन पर पर्दा डालने की कोशिस की। इब्न अल हैशम ने 237 किताबें लिखीं। यही कारण है कि अबी उसैबा ने कहा कि वो कशीर उत तसनीफ (अत्यधिक पुस्तक लिखने वाले) थे। इब्न अल हैशम का इंतिक़ाल 1040 ईस्वी में कइरो, मिस्र में हुआ था।

अगर तल्वार के साये में—शकील क़ादरी 

यहाँ होगी वहाँ होगी इधर होगी उधर होगी

नज़र यादे ख़ुदा में जब भी मसरूफ़े सफ़र होगी

.

ज़बाने को भला इस बात की कैसे ख़बर होगी

नज़र दुरवेश की है कौन जाने कब किधर होगी

 .

अगर तलवार के साये में जाकर तुम न खेलोगे

मेरे बच्चो कहो फिर ज़िंदगी कैसे बसर होगी

 .

तरफ़दारी जो हर मज़्लूम की करता था वो है गुम

नहीं मिलता कहाँ है वो हुकूमत को ख़बर होगी

 .

गुलों को ऐसे मुर्झाते नहीं देखा बहारों में

किसी बदबख़्त की इन को लगी काली नज़र होगी

 .

अंधेरों के परस्तारों की ज़द पे सर हमारे हैं

सुतूने-दार पे होंगे ये रौशन, फिर सहर होगी

 .

ख़िलाफे ज़ुल्म क्यूँ अक़्सर शकील आती है होंटों पर

"हमारी आह क्या कमबख़्त इतनी बेअसर होगी

اگر تلوار کے سایہ میں۔۔۔۔۔۔۔شکیل قادری

یہاں ہوگی وہاں ہوگی ادھر ہوگی اُدھر ہوگی

نظر یاد خدا میں جب بھی مصروف سفر ہوگی

 .

زمانے کو بھلا اس بات کی کیسے خبر ہوگی

نظر درویش کی ہے کون جانے کب کدھر ہوگی

 .

اگر تلوار کے سائے میں جاکر تم نہ کھیلو گے

میرے بچو کہو پھر زندگی کیسے بسر ہوگی

 .

طرف داری جو ہر مظلوم کی کرتا تھا وہ ہے گم

نہیں ملتا کہاں ہے وہ حکومت کو خبر ہوگی

.

گلوں کو ایسے مرجھا تے نہیں دیکھا بہاروں میں

کسی بدبخت کی ان کو لگی کالی نظر ہوگی

 .

اندھیروں کے پرستاروں کی زد پہ سر ہمارے ہیں

ستون دار پہ ہو نگے یہ روشن، پھر سحر ہوگی

 .

خلاف ظلم کیوں اکثر شکیل آتی ہے ہونٹوں پر

ہماری آہ کیا کم بخت اتنی بے اثر ہوگی

 

मुझे याद है……हर अलीग की पुरानी यादें

 

 

आज हम आपके सामने ऐसा वीडियो पेश कर रहे हैं, जिसे देखकर आपकी आँखों में भी आंसू आ जायेंगे. अगर आप अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र हैं या रह चुके है, तो आपके सामने सारी यादें ताज़ा हो जाएँगी.

 

 

 

ग़ज़ल के संदर्भ में प्रचलित कथाओं की सच्चाई क्या है ?….. शकील क़ादरी

 

 

ग़ज़ल साहित्यस्वरूप के उद्भ़व के संदर्भ में एक कथा का उल्लेख बार बार किया गया है, और वो इस तरह प्रस्तुत किया गया है, ” ग़ज़ल का जन्म प्रेम-चर्चा के लिये ही हुआ था। अरब में ग़ज़ल नाम का एक आदमी था जिसने अपना समग्र जीवन इश्क़बाज़ी में व्यतित किया था। वह हंमेशा इश्क़ और सौंदर्य की ही बातें किया करता था और उसी विषय के शे’र पढ़ा करता था। तब से जिस कविता में प्रेम और सोंदर्य का उल्लेख हो एसी कविता को लोग उस आदमी की याद में ग़ज़ल कहने लगे।”

इस कथा का उल्लेख रामनरेश त्रिपाठीने अपनी पुस्तक ‘कविता कौमुदी”, कृष्णलाल मो. झवेरीने अपने संपादन "गुजरातनी ग़ज़लो”, मुकुंदलाल मुन्शीने "उत्तर भारत सांस्कृतिक संघ” की मुख पत्रिका "उत्तरा” और डॉ. रशीद मीरने अपने महानिबंध "१९४२ पछीनी गुजराती ग़ज़लनी सौंदर्य मीमांसा” में किया है। मगर किसीने भी इस कथा का स्रोत नहीं बताया है। यह कथा अरबी, फ़ारसी या उर्दू के किस पुस्तक में दर्ज है यह भी उल्लेख नही किया है। अरबी भाषा के किसी भी प्रतिष्ठित शब्द कोश में भी ग़ज़ल के बारे में एसा कोई संदर्भ नहीं मिलता। इस लिये यह कथा किसी के दिमाग़ की उपज लगती है। यह आदमी किस शह्र का था इस संदर्भ भी इन विद्वानों में मतभेद है। मुकुंदलाल मुन्शीने लिक्खा है कि वह पश्चिम एशिया में हुआ था। इन चारों लेखकों में से किसीने यह भी नहीं बताया है कि वह किस साल में हुआ था। यही कारण है कि यह कथा बिलकुल विश्वास करने योग्य नहीं है। इस संदर्भ में ग़ज़ल غزل की तरह लिक्खे जाने वाले शब्दों की जानकारी होना ज़रूरी है। क्यूँ कि अरबी में ग़ज़ल غَزَل और ग़ज़िल غَزِل यह दोनों शब्द लिखने के तीन वर्णों का ही उपयोग होता है। कभी मात्रा चिह्न नहीं भी दर्शाए जाते। इसी कारण अरबी, उर्दू नहीं जानने वाले अर्थ का अनर्थ कर बैठते हैं।

जैसे غزل ग़ज़ल का एक अर्थ "ऊन का ताना” भी होता है। वह भी लिक्खा ग़ज़ल غزل ही जाता है मगर जब "ज़” "ز” के उपर अरबी में हलचिह्न लगा दें तो वह ग़ज़्ल غَزْل हो जायेगा और उस का अर्थ होगा "ऊन कांतना”। अगर "ज़” के नीचे ह्रस्व "इ” की मात्रा ( ِ ) लगा दें तो ग़जिल غزل हो जायेगा और उस के अर्थ "औरतों से बातें करना / इश्क़ब़ाज़ी करना और इश्क़ब़ाज़ी करने वाला या वो आदमी जो हर चीज़ में कमज़ोर हो” भी होंगे। उसे ग़जील غَزِیل भी कहा जाता है। और यह "ग़ज़ील” शब्द किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं है। यह हर उस व्यक्ति के लिये इस्तेमाल होता है जो इश्क़बाज़ी करता हो या हर चीज़ में कमज़ोर हो। दूसरी बात यह है कि अरब में आम तौर पर लिखते और बोलते वक़्त व्यक्ति के नाम के साथ उस के पिता का भी नाम लिया जाता है, जैसे अरबी अरूज़ लिखने वाले ख़लील इब्ने अहमद, अरब का शाइर याअरब बिन कहेतान…इत्यादि। इस कारण किसी व्यक्तिविशेष का नाम "ग़ज़ल” नहीं हो यह संभावना नहीं है। इस संदर्भ में जब मैं ने संशोधन किया तो खुल कर एक बात यह सामने आई कि अल-ग़ज़ील उपनामधारी एक आदमी ई.स. ८४० में जेन में हुआ था जिस का सही नाम याह्या बिन बक़्री था। वह अत्यंत युवान और ख़ूबसूरत था इस लिये लोग उसे "अल-ग़ज़ीलالغَزِیل कहेते थें, ग़ज़ल غَزَل नहीं। यह आदमी न तो शाइर था और न तो इश्क़बाज़ी करने वाला। सिर्फ़ सौंदर्यवान था। इस व्यक्ति का ग़ज़ल काव्यस्वरूप से कोई संबंध नहीं मिलता। दूसरी महत्व की बात साल के संदर्भ में है वह यह कि यह आदमी इस्लाम की स्थापना के लगभग दो सो साल बाद हुआ था और उस से पहले भी तग़ज़्ज़ुल, मुग़ाज़ल: और ग़ज़ल शब्द अरबी में मौजूद थें। अरब में इस्लाम से पहेले जो क़सीदे लिक्खे जाते थे उन में तश्बीब और नसीब में तग़ज़्जुल भी था ही, सिर्फ़ इरानीयोंने इसी तश्बीब और नसीब वाले हिस्से को क़सीदों से जुदा कर के उस में रदीफ़ और तख़ल्लुस शुमार कर दिये और उसे ग़ज़ल नाम दे दिया। हमें यह भी जानना चाहिये कि अरबी क़सीदों में रदीफ़ नहीं थी। इस चर्चा से स्पष्ट हो जाता है कि ग़ज़ल नाम का एक आदमी जो कविता करता था उस कविता को ग़ज़ल कहा गया यह बात एक भ्रम और कल्पित कथा है। जिस का कोई प्रमाण अरबी, फ़ारसी और उर्दू के ग़ज़ल साहित्य में मिलता नहीं है।

ग़ज़ल शब्द ओर ग़ज़ल के स्वरूप के उदभव की इस चर्चा के बाद गुजराती, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में जो व्याख्याएं की गई हैं उन के बारे विश्लेषण किया जायेगा।

(शकील क़ादरी की १९९३ में प्रकट हुई गुजराती भाषा की किताब "ग़ज़ल:स्वरूपविचार से यह हिन्दी अनुवाद किया गया है।)

ग़ज़ल शब्द का अर्थ :शकील कादरी

 

गुजराती ज़बान में ग़ज़ल सर्जन की प्रवृत्ति को आज सो सवासो वर्ष से अधिक समय बीत चुका है किन्तु ग़ज़ल शब्द के अर्थ, ग़ज़ल स्वरूप की उत्पत्ति और ग़ज़ल की व्याख्या के संदर्भ में कईं तरह के भ्रम पाये जाते हैं। अरबी भाषा में किसी शब्द के उच्चार में सामान्य परिवर्तन कर दिया जाये तो शब्दार्थ बदल जाता है। गुजराती में देखा गया है कि ‘ग़ज़ल’ शब्द के साथ जिन शब्दों की थोड़ी बहुत उच्चारगत समानता है, उन शब्दों को भी ग़ज़ल के साथ जोड़ कर चर्चा की गई है। इस कारण ग़ज़ल शब्द के बारे में कुछ भ्रम पाये जाते हैं। इन भ्रमों को दूर करने के लिये ग़ज़ल की अर्थगत, स्वरूपगत और उभयलक्षी व्याख्याएं देखेंगे। यह व्याख्याएं देखने से पहेले यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि "ग़ज़ल” शब्द मूलत: अरबी भाषा का होने के बावजूद एक स्वतंत्र काव्यरूप के तौर पर इस का विकास इरान में हुआ था। फिर भी ग़ज़ल और ग़ज़ल विद्या में जिन पारिभाषिक शब्दों का उपयोग किया जाता है वह शब्द अरबी भाषा के ही रक्खे गयें। अरबी भाषा का स्वरूप गुजराती और हिन्दी भाषा से भिन्न प्रकार का है। अरबी भाषा में विभिन्न शब्द के मूल में तीन वर्ण होते हैं। इन्हीं मूल वर्णो (Root Word) से विभिन्न वज़्न या उच्चारगत समतुला वाले नाम, क्रियापद वग़ैरह शब्दों का निर्माण होता है। जैसे "क-त-ब” (کَ-تَ-َ بَ) एक मूल है, धातु है। जिस में तीन वर्ण हैं। जिस में से भूतकाल का एक रूप क-त-ब (کَتَبَ) बना है। जिस का अर्थ है "उसने लिक्खा”। "कतब” के बाद कतबतु (ُکتبت) "मैं ने लिक्खा”, कतबना (کتبنا) "हम दोनों ने लिक्खा” इत्यादि। यह भूतकाल के पुल्लिंग रूप हैं। इसी तरह स्रीलिंग रूप भी बनते हैं। इस के अलावा नाम भी बनते हैं जैसे "मक्तूब” ( مکتوب) अर्थात "लिक्खा हुआ”, और "मक्तब:” (مکتبہ) अर्थात "पाठशाला”। यह चर्चा समझ लेने के बाद ग़ज़ल शब्द के विषय में जो भ्रम प्रचलित हैं उन्हें दूर करने में आसानी होगी।

"ग़ज़ल” (غزل) शब्द की व्युत्पत्ति "मुग़ाज़ेलत” (مغازلت) या "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द से हुई है यह बात मंजुलाल मजुमदारने अपनी किताब ” गुजराती साहित्यना पद्यस्वरूपो”, रशीद मीरने "”१९४२ पछीनी गुजराती ग़ज़लनी सौंदर्य मीमांसा” नाम के महानिबंध में और और एम. एफ़. लोखंड़वालाने "फ़ारसी साहित्यनो इतिहास” में कही है, मगर वास्तव में अरबी में मुग़ाज़ल: (مُغازلہ) शब्द है, मुग़ाज़ेलत (مُغازلت) नहीं। जो उर्दू में आकर "मुग़ाजेलत”हो गया है। "मुग़ाज़ल:” अरबी क्रियापद है और यह क्रियापद स्वयम् तीन वर्ण के मूल धातु "ग़-ज़-ल” (غ- ز- ل) से बना है।

इसी तरह "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द भी "ग़-ज़-ल” (غ-ز-ل) मूल धातु से ही बना है। इस चर्चा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि "ग़ज़ल” शब्द "मुग़ाज़ेलत” या "तग़ज़्ज़ुल” से नहीं बना है बल्कि उस के विपरित ग़ज़ल से "तग़ज़्ज़ुल” और "मुग़ाज़ेलत” शब्द बने हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि "मुग़ाज़ल:”, ” मुग़ाजेलत”, और "तग़ज़्ज़ुल” यह तीनों शब्द ग़ज़ल से बने हैं, "ग़ज़ल” शब्द इन शब्दों से नहीं बना है। गुजराती भाषा के विद्वान जिसे "मुग़ाज़ेलत” कहते हैं और मूल शब्द बताते हैं वह स्वयम् मूल में "मुग़ाज़ल:” है और उस का वज़्न (शब्दोच्चार) :मुफ़ाअल:” पर आधारित है। "मुग़ाज़ल:” का अर्थ होता है, ":Talk with her, in an amatory and enticing manner, to flirt, to talk with beloved.” इस के मूल में "ग़.ज.ल”शब्द है। "ग़ज़ल” शब्द क्रियापद का मूलरूप है जिस का शाब्दिक अर्थ है, "The talk and actions and circumstances, occurring between the lover and the object of love.” "ग़ज़ल” संज्ञा का नाम के रूप में भी प्रयोग होता है और जब नाम "Noun” के रूप में उस का प्रयोग होता है तब वह ग़ज़ल काव्यस्वरूप को दर्शाता है।

इसी तरह "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द भी "ग़ज़ल” शब्द से ही बना है। "तग़ज़्ज़ुल” शब्द "तफ़व्वुल” (تفول)के वज़्न पर है। "तग़ज़्ज़ुल” का शाब्दिक अर्थ है, "To sport, To dally, To hold, amours talk with (lover’s), Erotic verses.” जो कि यह सामान्य अर्थ है। बाद में इस शब्द का उपयोग पारिभाषिक रूप में होने लगा। काव्यशास्र में मूलत: इश्क़िया- प्रेम और शृगार के तत्व हों उसे तग़ज़्ज़ुल कहा जाने लगा। जो ग़ज़ल का सही रंग है। इस चर्चा से स्पष्ट हुआ होगा कि "ग़ज़ल” से ही तग़ज़्ज़ुल और मुग़ाज़ेलत शब्द बने हैं। तग़ज़्जुल या मुग़ाज़ेलत से "ग़ज़ल” शब्द बना यह गुजराती शोधकर्ताओं का भ्रम है।

(1993 में पब्लिश्ड़ मेरी गुजराती किताब ‘ग़ज़ल:स्वरूपविचार’ के एक पन्ने का अनुवाद – शकील क़ादरी)

+ कहीं हिन्दी हिज्जे की ग़लती हो तो बताने की कृपा करें।

जाने, तुम कैसी डायन हो — नागार्जुन

 

जाने, तुम कैसी डायन हो !

अपने ही वाहन को गुप-चुप लील गई हो !

शंका-कातर भक्तजनों के सौ-सौ मृदु उर छील गई हो !

क्या कसूर था बेचारे का ?

नाम ललित था, काम ललित थे

तन-मन-धन श्रद्धा-विगलित थे

आह, तुम्हारे ही चरणों में उसके तो पल-पल अर्पित थे

जादूगर था जुगालियों का, नव कुबेर चवर्ण-चर्वित थे

जाने कैसी उतावली है,

जाने कैसी घबराहट है

दिल के अंदर दुविधाओं की

जाने कैसी टकराहट है

जाने, तुम कैसी डायन हो !

(1975)

جگنو….علامہ محمد اقبال

 .

جگنو کی روشنی ہے کاشانۂ چمن ميں

 يا شمع جل رہی ہے پھولوں کی انجمن ميں

آيا ہے آسماں سے اڑ کر کوئی ستارہ

 يا جان پڑ گئی ہے مہتاب کی کرن ميں

 يا شب کی سلطنت ميں دن کا سفير آيا

 غربت ميں آ کے چمکا، گمنام تھا وطن ميں

 تکمہ کوئی گرا ہے مہتاب کی قبا کا

 ذرہ ہے يا نماياں سورج کے پيرہن ميں

 حسن قديم کی يہ پوشيدہ اک جھلک تھی

 لے آئی جس کو قدرت خلوت سے انجمن ميں

 چھوٹے سے چاند ميں ہے ظلمت بھی روشنی بھی

 نکلا کبھی گہن سے، آيا کبھی گہن ميں

 پروانہ اک پتنگا، جگنو بھی اک پتنگا

 وہ روشنی کا طالب، يہ روشنی سراپا

 ہر چيز کو جہاں ميں قدرت نے دلبری دی

 پروانے کو تپش دی، جگنو کو روشنی دی

 رنگيں نوا بنايا مرغان بے زباں کو

 گل کو زبان دے کر تعليم خامشی دی

 نظارئہ شفق کی خوبی زوال ميں تھی

 چمکا کے اس پری کو تھوڑی سی زندگی دی

 رنگيں کيا سحر کو، بانکی دلھن کی صورت

 پہنا کے لال جوڑا شبنم کی آرسی دی

 سايہ ديا شجر کو، پرواز دی ہوا کو

 پانی کو دی روانی، موجوں کو بے کلی دی

 يہ امتياز ليکن اک بات ہے ہماری

 جگنو کا دن وہی ہے جو رات ہے ہماری

 حسن ازل کی پيدا ہر چيز ميں جھلک ہے

 انساں ميں وہ سخن ہے، غنچے ميں وہ چٹک ہے

 يہ چاند آسماں کا شاعر کا دل ہے گويا

 واں چاندنی ہے جو کچھ، ياں درد کی کسک ہے

 انداز گفتگو نے دھوکے ديے ہيں ورنہ

 نغمہ ہے بوئے بلبل، بو پھول کی چہک ہے

 کثرت ميں ہو گيا ہے وحدت کا راز مخفی

 جگنو ميں جو چمک ہے وہ پھول ميں مہک ہے

 يہ اختلاف پھر کيوں ہنگاموں کا محل ہو

 ہر شے ميں جبکہ پنہاں خاموشی ازل ہو

(بانگ درا)

जुगनू۔۔۔۔۔ अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

 जुगनू की रोशनी है काशाना-ए-चमन में

 या शम्मा जल रही है फूलों की अंजुमन में

 आया है आसमां से उड़ कर कोई सितारा

 या जान पड़ गई है महताब की किरण में

 या शब की सलतनत में दिन का सफ़ीर आया

 ग़ुर्बत में आ के चमका, गुमनाम था वतन में

 तुक्मा कोई गिरा है महताब की क़बा का

ज़र्रा है या नुमायां सूरज के पैरहन में

 हुस्ने क़दीम की ये पोशीदा इक झलक थी

 ले आई जिसको क़ुदरत ख़लवत से अंजुमन में

 छोटे से चांद में है ज़ुल्मत भी रोशनी भी

 निकला कभी गहन से, आया कभी गहन में

परवाना इक पतंगा, जुगनू भी इक पतंगा

 वो रोशनी का तालिब, ये रोशनी सरापा

 हर चीज़ को जहां में क़ुदरत ने दिलबरी दी

 परवाने को तपिश दी, जुगनू को रोशनी दी

 रंगीं-नवा बनाया मुर्ग़ान बे-ज़बाँ को

 गुल को ज़बान देकर तालीम ख़ामुशी दी

नज़ारा शफ़क़ की ख़ूबी ज़वाल में थी

 चमका के इस परी को थोड़ी सी ज़िंदगी दी

रंगीं किया सहर को, बाँकी दुल्हन की सूरत

 पहना के लाल जोड़ा शबनम की आरसी दी

 साया दिया शजर को, परवाज़ दी हवा को

 पानी को दी रवानी, मौजों को बे-कली दी

 ये इमतियाज़ लेकिन इक बात है हमारी

 जुगनू का दिन वही है जो रात है हमारी

 हुस्न-ए-अज़ल की पैदा हर चीज़ में झलक है

 इंसां में वो सुख़न है, ग़ुंचे में वो चटक है

 ये चांद आसमां का शायर का दिल है गोया

 वां चांदनी है जो कुछ, याँ दर्द की कसक है

 अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू ने धोके दिए हैं वर्ना

नग़मा है बूए बुलबुल, बू फूल की चहक है

 कसरत में हो गया है वहदत का राज़ मख़फ़ी

 जुगनू में जो चमक है वो फूल में महक है

 ये इख़तिलाफ़ फिर क्यों हंगामों का महल हो

 हर शैय में जबकि पिनहां ख़ामोशी अज़ल हो

(बांगे दरा)

شاید مجھکو سورج نے پہچان لیا۔۔۔۔راحت اِندوری

ایک جگنو جگمگایا دیر تک ۔۔۔۔۔ نواز دیوبندی

.

وہ رلا کر ہنس نہ پایا دیر تک

 جب میں رو کر مسکرایا دیر تک

 .

بھولنا چاہا کبھی اس کو اگر

 اور بھی وہ یاد آیا دیر تک

 .

خود بہ خود بے ساختہ میں ہنس پڑا

 اس نے اس درجہ رلایا دیر تک

 .

بھوکے بچوں کی تسلی کے لیے

 ماں نے پھر پانی پکایا دیر تک

.

گنگناتا جا رہا تھا اک فقیر

دھوپ رہتی ہے نہ سایا دیر تک

 .

کل اندھیری رات میں میری طرح

ایک جگنو جگمگایا دیر تک

Died: September 29, 2014, Mumbai, India

हुतात्म्यांना फाशी…….कविता करकरे

This is a poem written by Kavita Karkare, the wife of martyr Hemant Karkare. The poem was read by Kavita, who passed away on Monday

Died: September 29, 2014, Mumbai, India

   At the Marathi book launch of ‘To The Last Bullet – The Inspiring Story Of A Braveheart Ashok Kamte’ by Vinita Kamte, Vinita Deshmukh.

Following is the English translation of the poem.

Do not make the mistake of becoming a martyr in this country,

as you will be branded a headless chicken

and a dumb ass who went forward (to face the threat)

‘Why do martyrs get the Ashokchakra?’

Such will be the sophistries after your death.

The Ram Pradhan Committee will hang even the martyrs,

hence don’t make the mistake of becoming a martyr in this country

‘Why was timely help not provided during 26/11

or why were the bodies lying on the road for 40 minutes?’

Do not raise such questions as the wife of a martyr in this country.

But first, do not commit the crime of becoming a martyr in this country.

No country subjects their martyrs to an alcohol test. Our country does.

Do not try to understand the politics behind this.

Why did a certain officer switch off his cell phone?

Or why was some officer sitting on the terrace?

Do not stand up bravely and point fingers their way

The compensation for martyrs got talked about a hundred times,

and the accounts of leave encashment and Provident Fund were given

If that was not enough, there were reminders of the Rs 15000 that were given for the last rites.

Do not make the mistake of becoming a martyr while being in a government job.

Murders are forgiven in this country.

Those who have been released from prison after being charged with corruption

can mingle among the masses with their heads held high.

But when you become a martyr, you become a pariah.

Do not ever commit the crime of becoming a martyr in this country.

Should martyrs be hanged?

Or should their martyrdom be kept alive?

You will decide. You will be keeping a flame that torch that we have lit.

बाबाकी  कहानी  रवीश  कुमार  की  जुबानी……काकावाणी

دیا مندر پر رکھوں تو گھر اندھیرا ہے۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زُلفی

मौलना अबुल कलाम आजाद………एक काबिले दीद डोक्युमेटरी

1

https://youtu.be/zpWpE5jFpp4

 

2

https://youtu.be/TwiIeIbysUU

2&3

 

3

https://www.youtube.com/watch?v=z0n3VekhZus

https://youtu.be/z0n3VekhZus

 

4

https://youtu.be/-uL397_trP8

5

https://youtu.be/W9rUWB6IkCk

6

https://youtu.be/ySLJDKy-KwMमौलना अबुल कलाम आजाद………एक काबिले दीद डोक्युमेटरी
1

2

2&3

3

4

5

6

पालकी दर्द की लिये कहार से गुजरे…..मुहमदअली वफा

हालते जुनुं में जब बाजार से  गुजरे

पालकी  दर्द की लिये कहार से गुजरे

दामन तर न हुआ कोई भी खूश्बू  से

बरसों बरस हम इस बहार से गुजरे

दामन बच गया ये हमारी किस्मत थी

चमनमें जब गुजरे शजरे खार से  गुजरे

कीसी  बेगुनह को ही लटकते देखा

जब भी हम कोई दार से गुजरे

जिंदगी अजीब कशमकश  में रही ‘वफा’

गमे जानां की  कई  दरार से  गुजरे

پالکی درد کی لئے کہار سے گزرے۔۔۔۔۔محمد علی وفا

.

حالت جنوں میں جب بازار سے گزرے

پالکی درد کی لئےکہار سے گزرے

دامن تر نہ ہوا کوئی بھی خوشبو سے

کئ بار ہم تو  اس بہار سے گزرے

دامن بچ گیا یہ ہی ہماری قسمت تھی

چمن میں گزرے شجرے خار سے گزرے

کسی بیگناہ کو ہی لٹکتے دیکھا ہمنے

جب بھی  ہم کوئی دار سے گزرے

زندگی عجیب کشمکش میں رہی ‘وفا’

غمے جاناں کی کئی درار سے گزرے

 

 

ہمارا خون امانت ہے۔۔۔۔۔ساحر لدھیانوی 

 :

ہمارا خون امانت ہے نسل نو کے لیے

ہمارے خون پہ لشکر نہ پل سکیںگے کبھی

کہو کہ آج بھی ہم سب اگر خموش رہے

تو اس دمکتے ہوئے خاکداں کی خیر نہیں

جنوں کی ڈھال ہوئی ایٹمی بلاؤں سے

زمیں کی خیر نہیں، آسماں کی خیر نہیں

گزشتہ جنگ میں گھر ہی جلے مگر اس بار

عجب نہیں کہ یہ تنہائیاں بھی جل جائیں

گزشتہ جنگ میں پیکر جلے مگر اس بار

عجب نہیں کہ یہ پرچھائیاں بھی جل جائیں

اسی خوف نے ساحر کو خواب بننے کے لیے مہمیز کیا:

آؤ کہ کوئی خواب بنیں، کل کے واسطے

ورنہ یہ رات، آج کے سنگین دور کی

ڈس لے گی جان و دل کو کچھ ایسے کہ جان و دل

تاعمر پھر نہ کوئی حسیں خواب بن سکیں

 

हमारा ख़ून अमानत है—-साहिर लुधियानवी

:

हमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिए

हमारे ख़ून पे लश्कर ना पल सकेंगे कभी

कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे

तो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहीं

जुनूँ की ढाल हुई ऐटमी बलाओं से

ज़मीं की ख़ैर नहीं, आसमां की ख़ैर नहीं

गुजिश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएं

गुजिश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये परछाईयां भी जल जाएं

इसी ख़ौफ़ ने साहिर को ख्वाब बनने के लिए मेहमिज़ किया:

आओ कि कोई ख़ाब बुनें, कल के वास्ते

वर्ना ये रात, आज के संगीन दौर की

डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल

ता उम्र फिर ना कोई हसीं ख्वाब बन सकें

 

Posted by: Bagewafa | اگست 16, 2017

Ravish kumar in Gujarat

हिंदुस्तानमें दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं—–गुलझार

شیخ الاسلام مولانا سید حسین احمد مدنی رح۔

 

 انگریزی جج سے کہنے لگے مجھے پتہ ہے سزا موت ہوگی اسی لئے دیوبند سے کفن ساتھ لیکر آیا ہوں

 ایک مرتبہ حضرت مولانا حسین احمد مدنیؒ پر غداری کا مقدمہ چلا اور فرنگی کی عدالت)جناح( ہال کراچی میں ان کی پیشی ہوئی، مولانا محمد علی جوہر اور بہت سارے دوسرے اکابرین بھی وہاں جمع تھے، فرنگی نے بلایا اور کہا کہ حسین احمد! یہ جو تم نے فتویٰ دیا ہے کہ انگریز کی فوج میں شامل ہونا حرام ہے،اس کی اجازت نہیں، تمہیں پتہ ہے کہ اسکا نتیجہ کیا ہو گا؟ حضرت نے فرمایا کہ ہاں مجھے پتہ ہے اس کا نتیجہ کیا ہے،

 اس نے پوچھا کہ کیا نتیجہ ہے؟

 حضرت کے کندھے پر ایک سفید چادر تھی، حضرت نے اس کی طرف اشارہ کرکے فرمایا کہ یہ اس کا نتیجہ ہے،

 فرنگی نے کہا کہ کیا مطلب؟

 فرمایا کہ کفن ہے، میں اپنے ساتھ لے کر آیا ہوں تاکہ تم اگر مجھے پھانسی بھی دے دو گے تو کفن میرے پاس ہوگا،

 مولانا محمد علی جوہر نے حضرت کے پاؤں پکڑ لیے اور عرض کیا کہ حضرت! تھوڑا سا ذومعنی سا جواب دے دیں جس سے آپ بچ جائیں، کیونکہ ہمیں آپکی بڑی ضرورت ہے، آپ ہمارے سر کا تاج ہیں، آپ جیسے اکابر ہمیں پھر نہیں ملیں گے مگر حضرت مدنیؒ کی اس وقت عجیب شان تھی۔

 سبحان اللہ

 فرنگی کہنے لگا: حسین احمد! تمہیں کفن لانے کی کیا ضرورت تھی؟

 جس کو حکومت پھانسی دے اس کو کفن بھی حکومت دیتی ہے،

 حضرت مدنیؒ نے فرمایا: اگر چہ کفن حکومت دیتی ہے، لیکن میں اپنا کفن اس لیے لایا ہوں کہ فرنگی کے دیے ہوئے کفن میں مجھے اللہ کے حضور جاتے ہوئے شرم آتی ہے، میں قبر میں تمہارا کفن بھی لے کر جانا نہیں چاہتا

शैखुल इस्लाम मौलाना हुसेन अहमद मदनी (रह)

 

अंग्रेज़ी जज से कहने लगे मुझे पता है सज़ा मौत होगी इसी लिए देवबंद से कफ़न साथ लेकर आया हूँ

 एक मर्तबा हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनीऒ पर ग़द्दारी का मुक़द्दमा चला और फ़रंगी की अदालत)जिनाह( हाल कराची में उनकी पेशी हुई, मौलाना मुहम्मद अली जोहर और बहुत सारे दूसरे अकाबिरीन भी वहां जमा थे, फिरंगी ने बुलाया और कहा कि हुसैन अहमद! ये जो तुमने फ़तवा दिया है कि अंग्रेज़ की फ़ौज में शामिल होना हराम है,इस की इजाज़त नहीं, तुम्हें पता है कि उसका नतीजा क्या होगा? हज़रत ने फ़रमाया कि हाँ मुझे पता है इस का नतीजा किया है,

उसने पूछा कि क्या नतीजा है?

हज़रत के कंधे पर एक सफ़ैद चादर थी, हज़रत ने इस की तरफ़ इशारा करके फ़रमाया कि ये उस का नतीजा है,

फ़रंगी ने कहा कि क्या मतलब?

फ़रमाया कि कफ़न है, में अपने साथ लेकर आया हूँ ताकि तुम अगर मुझे फांसी भी दे दोगे तो कफ़न मेरे पास होगा,

मौलाना मुहम्मद अली जोहर ने हज़रत के पांव पकड़ लिए और अर्ज़ किया कि हज़रत! थोड़ा सा ज़ूमानी सा जवाब दे दें जिससे आप बच जाएं, क्योंकि हमें आपकी बड़ी ज़रूरत है, आप हमारे सर का ताज हैं, आप जैसे अकाबिर हमें फिर नहीं मिलेंगे मगर हज़रत मदनीऒ की इस वक़्त अजीब शान थी।

 सुब्हान-अल्लाह

फ़रंगी कहने लगा: हुसैन अहमद! तुम्हें कफ़न लाने की क्या ज़रूरत थी?

जिसको हुकूमत फांसी दे उस को कफ़न भी हुकूमत देती है,

हज़रत मदनीऒ ने फ़रमाया: अगरचे कफ़न हुकूमत देती है, लेकिन में अपना कफ़न इसलिए लाया हूँ कि फिरंगी के दिए हुए कफ़न में मुझे अल्लाह के हुज़ूर जाते हुए शरम आती है, मैं क़ब्र में तुम्हारा कफ़न भी लेकर जाना नहीं चाहता

 

(Courtesy:Shabbir Mitchla)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

وہ قتل بھی کرتیں ہیں تو چرچا نہیں ہوتا۔۔۔۔۔۔اکبر اِلہ ابادی

चर्चा नहीं होता—अकबर ईलाहाबादी

.

गमझह नहीं होता के इशारा नहीं होता

आंख उनसे जो मिलती हैतो क्या क्या नहीं होता

.

जलवाह न हो मानीका तो सुरत का असर क्या

बुल बुल गुले तस्वीरका शेअदा नहीं होता

.

अल्लाह बचाए मरज़े ईश्क़ से दिलको

सुनते हैं कि ये आरज़ा अच्छा नहीं होता

.

तशबीह तेरे चहेरेको क्या दुं गुले तरसे

होता है शगुफ्ता मगर इतना नहीं होता

.

में नज़अ में हुं आएं तो एहसान है उनका

लेकिन ये समज़ ले के तमाशा नहीं होता

.

हम आह भी करतें हैं तो हो ज़ाते हैं बदनाम

वओ क़त्ल भी करतें झै तो चर्चा नहीं होता

دیکھتا رہا۔۔۔۔ محمد علی وفا

.

نفرت کدے کے بام کو دیکھتا رہا

زہر  بھرے یہ جام کو دیکھتا رہا

 .

دن بھی گزارا ہے  تیری ظلمتیں لئے

میں الجھنوں کی شام کو دیکھتا رہا۔

 .

جب بھی ذکرہوا ٹوٹے ہوئے دل کا

ایک تیرے ہی نام کو دیکھتا رہا

 .

خریدے کہاں سے یہ غریب دل

تیرے لگائے دام کو دیکھتا رہا

.

دسرونکی طرف وفا کبھی نظریں نہیں اٹھی

میں اپنے ہی کام کو دیکھتا رہا

 

देखता रहा….मुहम्मदअली वफा

.

नफरत कदेके बाम को देखता रहा

जहर भरे ये जामको देखता रहा

.

दिनभी  गुजारा   है तेरी जुलमतें लिये

में उलझनोंकी शामको देखता रहा

.

जब भी  जिकरा हुआ तूटे हुए दिलका

 तेरे ही एक नामको देखता रहा

.

खरीदे कहांसे  ये गरीब दिल

तेरे लगाये दाम को देखता रहा

.

गेरोंकी तरफ वफा कभी नजरें नहीं उठी

में अपनेही बस कामको  देखता रहा

 

Posted by: Bagewafa | جولائی 26, 2017

محبت کرنے والے۔۔۔۔۔حفیظ ہوشیارپوری

محبت کرنے والے۔۔۔۔۔حفیظ ہوشیارپوری

 

امام بخاریؒ چند امتیازی خصوصیات  ….مفتی محمد مجیب الرحمن دیودرگی

         

   .

 

دینی مدارس سے ہر سال لاکھوں فضلا فارغ التحصیل ہوتے ہیں، ان تمام طلبہٴ کرام نے آخری سال امام بخاریانکی صحیح بخاری شریف پڑھی، احادیث مبارکہ کے ورد کے ساتھ، سند پر، متن پر کلام کو سماعت فرمایا، ہزاروں دفعہ امام بخاریکا تذکرہ آیا، ان کے اقوال، ان کے ابواب پر بحث ومباحثہ کو سنا، مناسب محسوس ہوا کہ امام بخاریکی کچھ خصوصیات کا تذکرہ کیا جائے، تاکہ فارغین مدارس ان کے ان قابل تقلید پہلووٴں کو اپنی زندگی میں اپنائیں۔جس کتاب کو ہم نے سال بھر پڑھا، اس سے مستقل لگاوٴ رکھا، اس کتاب کے مصنفکی زندگی بھی ہمارے سامنے رہے ، تاکہ خارجی زندگی میں انہیں اپنائیں، اپنے لیے مشعل راہ بنائیں۔

 

حرام مال سے پرہیز

امام بخاری (متوفی 256ھ)کے زمانے میں احادیث مبارکہ کی سینکڑوں کتابیں لکھی گئیں، کئی مصنفین ومحدثین کا اس زمانے میں دور دورہ تھا، ایک ایک محدث کے سینکڑوں شاگرد ہوا کرتے تھے، ان سب کے باوجود جو قبولیت اللہ تعالیٰ نے امام بخاریاور ان کی کتاب کو نصیب فرمائی وہ دوسروں کے حصے میں نہیں آئی، اس کے اسباب ووجوہات پر نظر کرتے ہوئے علماء نے ارشاد فرمایا کہ اس کی بنیادی وجہ یہ ہے کہ ان کے والد بزرگوار نے اپنے بچے کے لیے حلال اور پاکیزہ غذا کا اہتمام کیا تھا او رحرام اور مشتبہ مال سے اپنے اہل وعیال کی حفاظت فرمائی تھی، جس حلال کی برکت اتنے بڑے علمی کارنامے کے ذریعہ ظاہر ہوئی، بخاری شریف کو اصح الکتب بعد کتاب اللہ (قرآن کریم کے بعد صحیح ترین کتاب) کا درجہ حاصل ہوا ہے، انسان کے اس کارنامے کو یہ درجہ حاصل ہونا کوئی معمولی بات نہیں، علماء نے ارشاد فرمایا کہ اس درجے کے حاصل ہونے میں ان کے والد کا کھانے کے سلسلہ میں کمال احتیاط کو بڑا دخل ہے، جب کہ ان کے والدنے انتقال کے موقعہ پر اپنے کثیر مال کے تعلق سے ارشاد فرمایا تھا کہ ”لاأعلم من مالي درہما من حرام، ولا درہما من شبہة“(فتح الباری1/479) میرے مال میں کوئی درہم حرام تو درکنار شبہ کا بھی نہیں ہے، اسی لیے ضرورت اس بات کی ہے کہ ہر ایک اپنی آمدنی کے ذرائع پر نظر رکھے، پاکیزہ اور طیب کی تلاش میں رہے اور حرام وناپاک مال سے اجتناب کرے۔

 

غیبت سے اجتناب

حدیث مبارک میں آپ صلی الله علیہ وسلم نے مسلمانوں کی جو تعریف کی ہے کہ مسلمان وہ ہے جس کے ہاتھ وزبان سے دوسرے مسلمان محفوظ رہیں۔(مشکوة،ص:12) اس لحاظ سے دوسرے مسلمان کو ہاتھ سے اذیت پہنچانا تو دشوار ہے، لیکن زبان سے اذیت دی جاسکتی ہے اور اس سے بچنا نہایت دشوار کُن مرحلہ ہے، اس میں بھی غیبت سے بچنا بہت ہی مشکل ہے، نیز ایسے موقع پر جب کہ مخالفین کی جانب سے زبان وقلم کے نشتر چلائے جارہے ہوں اور مخالفین نیچا دکھانے کے لیے ہر جانب سے کوشاں ومساعی ہوں، اس کے باوجودحق پر زبان کی استقامت میں ذرہ برابر فرق نہ آنا یہ امام بخاریکی کرامت سے بڑھ کر ہے، امام بخارینے فرمایا: ”ما ا غتبت أحدا منذ علمت أن الغیبة حرام، وفي روایة: لأرجو أں ألقی اللہ ولا یحاسبني أني اغتبت أحدا“ (فتح الباری1/480)جب سے مجھے غیبت کے حرام ہونے کا پتہ چلا تب سے میں نے کسی کی غیبت نہیں کی، ایک اور روایت میں یوں ہے کہ مجھے امید ہے کہ اللہ تعالیٰ سے میں اس حالت میں ملوں گا کہ اللہ تعالیٰ غیبت کے سلسلہ میں مجھ سے حساب نہیں لیں گے، کیوں کہ میں نے کسی کی غیبت نہیں کی۔ یہی وہ خصوصیت ہے جس کی وجہ سے اللہ تعالیٰ نے انہیں مقبولیت کا یہ مقام ومرتبہ نصیب فرمایا، غیبت کے سلسلہ میں جس قدر سخت وعیدیں قرآن وسنت میں وارد ہوئی ہیں اسی قدر اس میں ابتلا بھی عام ہے، ایسے میں اپنی زبان پر قابو رکھنا اور مخالفین کے سلسلہ میں زبان کو ساکت رکھنا اور دوسروں کا تذکرہ برائی سے نہ کرنا، یہ ایسی خصوصیت ہے کہ جس کی آج ہر عام وخاص، عالم وجاہل سب کو ضرورت ہے ۔

 

علمی وقار کی حفاظت

ایک مرتبہ امام بخاریدریائی سفر کررہے تھے کہ ایک ہزار اشرفیاں ان کے ساتھ تھیں، ایک شخص نے کمال نیاز مندی کا طریقہ اختیار کیا اور امام بخاریکو اس پر اعتماد ہوگیا، اپنے احوال سے اس کو مطلع کیا، یہ بھی بتادیا کہ میرے پاس ایک ہزار اشرفیاں ہیں، ایک صبح کو جب وہ شخص اٹھا تو اس نے چیخنا شروع کیا اور کہنے لگا کہ میری ایک ہزار اشرفی کی تھیلی غائب ہے، چناں چہ جہاز والوں کی تلاشی شروع ہوئی، امام بخارینے موقعہ پاکر چپکے سے وہ تھیلی دریا میں ڈال دی، تلاشی کے باوجود وہ تھیلی دست یاب نہ ہوسکی تو لوگوں نے اسی کی ملامت کی، سفر کے اختتام پر وہ شخص امام بخاریسے پوچھتا ہے کہ آپ کی وہ اشرفیاں کہاں گئیں؟ امام صاحب نے فرمایا: میں نے ان کو دریا میں ڈال دیا، کہنے لگا اتنی بڑی رقم کو آپ نے ضائع کردیا؟ فرمایا کہ میری زندگی کی اصل کمائی تو ثقاہت کی دولت ہے، چند اشرفیوں کے عوض میں اس کو کیسے تباہ کرسکتا تھا؟!(مقدمہ کشف الباری، ص: 132 بحوالہ آفتاب بخارا118)

 

غور کیجیے! امام بخاریاپنے علمی وقار کی حفاظت کی خاطر اپنے کثیر مال کو ضائع کرنا پسند کیا، ثقاہت پر ادنیٰ آنچ آئے ان کی ثقاہت وبھروسہ پر حرف گیری کی جائے، اسے برداشت نہیں کیا، آج اللہ نے ہمیں بھی علم کی دولت سے نوازا ہے، علم کے نور سے منور فرمایا ہے، اسی علم کی دستار ہمارے سرپر لپیٹی گئی ہے، انہیں امام بخاریکی کتاب پڑھ کر ہم فارغ ہورہے ہیں تو مال کی خاطر، دولت کی لالچ میں علمی وقار کا سودا نہ کریں، فانی دولت کے لیے مال داروں کے سامنے اپنے آپ کو رسوا وذلیل نہ کریں، جس سے ہمارا علمی وقار مجروح ہوجائے۔

 

نیز طلبائے کرام کے ساتھ شفقت کا یہ عالم ہوتا کہ امام ابن حجر عسقلانیفرماتے ہیں: ”وکان قلیل الأکل جدا، کثیر الاحسان إلی الطلبة مفرط الکرم(فتح الباری 1/481) آپکی غذا بہت کم تھی اور طلبہ پر بہت زیادہ احسان وکرم فرماتے تھے۔ امام بخاریکی یہ خاص صفت بخاری پڑھے ہوئے اساتذہ کرام کو اپنانی چاہیے اور طلبہ کو اپنا غلام یا نوکر سمجھنے کی بجائے ان پر احسان وکرم کا معاملہ کرنا چاہیے، اس لیے یہ طلبہ اساتذہ کے لیے دو طرح سے محسن ہیں، ایک تو یہ کہ ا نہیں کی طفیل میں دنیا میں روزی ملتی ہے اور انہی کے ذریعہ آخرت کی سرخروئی ہے یہ طلبہ ہمارے علوم کے محافظ اور اس کے نشرکرنے والے بنیں گے، انہیں کے واسطے سے ہمارا فیض عالم میں پہنچے گا، طلبہ کے ساتھ ترش روئی ونازیبارویہ خود اپنے ہی پیر پر کلہاڑی مارلینے کے مترادف ہے، غور کیجیے! امیر الموٴمین فی الحدیث جب طلبہ کے ساتھ احسان وشفقت کا معاملہ کرسکتے ہیں جن کے شاگردوں کی تعداد ہزاروں میں ہے تو ہما شما کا کیا اعتبار؟

 

امام بخاریکی نماز

نماز بندہٴ مومن کی معرا ج ہے، اللہ تعالیٰ سے لینے اور قرب الٰہی کا ذریعہ ہے، صحابہ کرام کی حالت نماز میں ایسی ہوتی کہ گویا کہ وہ خشک لکڑی ہیں اور دو دو رکعت نماز کے ذریعہ اپنے مسائل کو حل کرلیا کرتے، آپ صلی الله علیہ وسلم کو نماز سے اتنا لگاوٴ تھا کہ عبادت کرتے ہوے پائے مبارک پر ورم آجاتے، کوئی ادنیٰ سا معاملہ پیش آتا تو نماز کی طرف متوجہ ہوجاتے، اسی نماز کے تعلق سے آپ صلی الله علیہ وسلم نے حدیث جبرئیل میں تعلیم دی کہ:”أن تعبد اللہ کأنک تراہ فإن لم تکن تراہ فإنہ یراک (مشکوة، ص:11) نماز میں اتنا استحضار پیدا کرو کہ نماز میں یہ تصور قائم ہوجائے کہ اللہ تعالیٰ کو تم دیکھ رہے ہو، اگر یہ نہ ہو تو کم از کم یہ تصور تو قائم کرو کہ اللہ تعالیٰ تم کو دیکھ رہے ہیں، اس سے تمہیں عبادتوں میں احسانی کیفیت حاصل ہوگی۔ امام بخاریکی نماز کیسی احسانی کیفیت سے معمور تھی، آپ اس واقعہ سے اندازہ لگایئے کہ ایک دفعہ آپنماز پڑھ رہے تھے بھڑنے آپ کے جسم پر سترہ دفعہ کاٹ دیا، جب آپنے نماز پوری کی تو کہا کہ دیکھو! کونسی چیز ہے جس نے مجھے نماز میں تکلیف دی ہے؟ شاگردوں نے دیکھا تو بھڑ تھی جس کے کاٹنے سے ورم آگیا تھا، آپسے جلدی نماز ختم کرنے کی بابت سوال کیا گیا تو فرمایا کہ میں جس سورت کی تلاوت کررہا تھا اس کے ختم کرنے سے قبل نماز ختم کرنا نہیں چاہ رہا تھا۔(فتح الباری 1/481)

 

امام بخاریکا مجاہدہ

شاعر کہتا ہے #

        بقدر الکد تکتسب المعالي       

        من طلب العلی سہر اللیالي

محنت کے بقدر بلند یاں نصیب ہوتی ہیں، نیز جو بلندیاں چاہے وہ راتوں کو جاگا کرے، محنت کی جو بھی شکل ہو امام بخاریاسے اپنانے سے ہرگز گریز نہیں کرتے تھے، علم کے لیے مجاہدہ کی بابت امام محمد بن ابی حاتم وراق بیان کرتے ہیں کہ بسا ا وقات، دوران سفر امام بخاریکے ساتھ ایک ہی کمرہ میں رات گذرتی تھی، میں دیکھتا ہوں کہ رات کو پندرہ بیس دفعہ اٹھتے ہیں، ہر دفعہ چراغ جلا کر حدیث پر نشان لگاتے ہیں، پھر نماز تہجد ادا کرتے ہیں اور مجھے کبھی نہیں اٹھاتے ، میں نے ایک مرتبہ عرض کیا کہ آپ اس قدر مشقت برداشت کرتے ہیں، آپ مجھے اٹھالیا کریں، امام صاحبنے فرمایا: تم جوان آدمی ہو، میں تمہاری نیند خراب کرنا نہیں چاہتا۔ (سیر اعلام النبلاء 12/404 بحوالہ آفتاب بخارا 120)

 

آپ کے طعام کا تذکرہ کرتے ہوئے ابن حجر عسقلانی نے فرمایا: ”وکان قلیل الأکل جدا“ آپانکی خوراک بہت ہی کم تھی، بہت زیادہ مجاہدہ کھانے کے اعتبار سے برداشت کرتے تھے، امام بخاریکا قارورہ جب معائنے کے لیے اطباء کے پاس پیش کیا گیا تو اطباء نے دیکھ کر کہا کہ یہ ان لوگوں کے قارورے کی طرح ہے جو سالن کا استعمال نہیں کرتے، امام بخارینے فرمایا: ہاں بات صحیح ہے، میں نے چالیس سال سے شوربا استعمال نہیں کیا، اس کے علاج کے بارے میں پوچھا گیا تو اطباء نے کہا کہ اس کا علاج شوربا استعمال کرنا ہے، امام بخارینے انکار کیا حتی کہ مشائخ واہل علم نے بہت ہی زیادہ التجا کی تو رو ٹی کے ساتھ شکر استعمال کرنے لگے۔(فتح الباری 1/481) یہی وہ مجاہدات ہیں جن کی وجہ سے اللہ تعالیٰ نے امام بخاریکو بلندیاں نصیب فرمائیں۔

 

امام بخاریکا رمضان

رمضان کی پہلی رات میں اپنے ساتھیوں کو جمع کرتے،ان کی امامت فرماتے، ہر رکعت میں بیس آیتوں کی تلاوت کرتے، نیز اسی ترتیب پر قرآن ختم فرماتے، ہر دن سحری تک قرآن کریم کا ایک تہائی حصہ تلاوت فرماتے، اس طرح تین رات میں تلاوت کرتے ہوئے قرآن ختم فرماتے، نیز رمضان کے ہر دن میں ایک دفعہ قرآن کریم ختم فرماتے اور ہر مرتبہ ختم کرتے ہوئے دعا کا اہتمام کرتے۔(فتح الباری 1/481) گویا رمضان کا مہینہ امام بخاریکے یہاں تلاوت کا مہینہ ہوا کرتا، صبح وشام رات بھر تلاوت کا خا ص شغف واہتمام ہوا کرتا۔

 

نیز ابتلا آزمائش، تکالیف، مصیبتیں، امتحانات، انبیائے کرام علیہم الصلاة والسلام کو زیادہ پیش آئے ہیں، پھر جو شخص ان کے زیادہ قریب ہوتا ہے اسے بھی ابتلا وآزمائش میں ڈالا جاتا ہے، کسی نے فرمایا: مجھے مصائب سے دوچار کیا گیا کہ اگر وہ مصائب دن پر ڈال دیے جائیں تو وہ رات ہوجائے، امام بخاریکو بھی اللہ تعالیٰ نے بڑے بڑے امتحانات میں ڈالا، کئی مرتبہ آپکو جلا وطنی کی زندگی گذارنی پڑی، معاصر علمائے کرام میں سے کئی ایک نے موقعہ بموقعہ آپپر اعتراضات اور آپ کے خلاف زبان درازی کا طویل سلسلہ جاری رکھا، امیروں اور حاکموں نے الگ طوفان کھڑا کیا، ان سب کے باوجود آپاپنی زبان پر شکایت کے حروف نہیں لائے، اخیر میں سمرقند جانے کا ارادہ کیا تو روک دیا گیا، خرتنگ نامی چھوٹی سی جگہ میں امیر الموٴمنین فی الحدیث ابدی نیند سوگئے، لیکن ان تکالیف ومصیبتوں کو جھیل کر کسی کی بھی غیبت میں اپنی زبان کو ملوث نہیں کیا ، علوم دینیہ کے حصول میں مشغول رہنے والوں کے لیے ایک بہترین سبق ہے کہ وہ امام بخاریکے تحمل کو، دیگر صفات کو ا پنی زندگی کا جزولا ینفک بنالیں، تب ہی جاکر کوئی بڑا علمی معرکہ سر کیا جاسکتا ہے، نیز ان صفات سے مزین ہو کر اپنی دنیوی واخروی زندگی کو سنواریں۔

 

(Courtsy:AlFarooq)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शिकायत हो गई…..मुहम्मदअली वफा

 

۔

इस तरह भी बस हिफाजत हो गई

आपसे थोडी  रफाकत हो गई

۔

कुछ हमारे  दर्दके अवराक थे

आप को क्यूँ कर शिकायत हो गई

۔

कोन अब  उसको पढेगा  या खुदा

जिंदगी तो  एक  इबारत हो गई

۔۔

ये नकाबी चेहरा था इम्तेहां

नजर ऊठी तो कयामत हो गई

۔

झेल लेते तीर तुम्हारे वफा

आदतन  हमसे  मुदाफत हो गई

۔

गालगागा—गालगाग—गालगा

۔

फाइलातुन—फाइलातुन—फाइलुन

बहरे रमल…11अक्सरी

 


۔شِکایت ہو ہوگئ،،،محمدعلی وفا

 

۔

اِس ترہ بھی بس حفاظت ہو ہوگئ 

آپسے تھوڑی رفاقت ہو ہوگئ 

۔

کُچھ ہمارے درْدکے اوراق تھے 

آپ کو کْیُوں کر شِکایت ہو ہوگئ 

۔

کون اب اُسکو پڑھیگا یا خدا 

زِندگی تو ایک عبارت ہو ہوگئ 

۔

یے نقابی چہرا تھا اِمْتحاں 

نظر اُوٹھی تو قیامت ہو ہوگئ 

۔

جھیل لیتے تِیر تُمھارے وفاا 

آدتن ہمسے مُدافعت ہو ہوگئ

Sanjiv Bhatt

Trivia about what the Muslims did for the freedom of this country:

It was Emperor Aurangzeb who first asked the East India Company to quit India in 1686 in Surat!

The first war against the British was fought almost 200 years before independence The Battle of Plassey, wherein Nawab Sirajuddawla of Bengal was treacherously defeated by the British in 1757!

The first signs of victory against the British were seen in Mysore where Nawab Hyder Ali I waged war against the British in 1782. He was succeeded by his son, Tipu Sultan who again fought them in 1791 and was eventually treacherously defeated and killed in 1799. Tipu Sultan was the first General to use missiles in warfare!

The Mujahid Movement was active during 1824 and 1831 under the leadership of Syed Ahmad Shaheed and his two disciples and they were successful in liberating the North-west province from British authority. Syed Ahmad Shaheed was nominated Khalifa, but the freedom was short lived and he was killed in 1831!

The last Mughal Emperor, Bahadur Shah Zafar was to lead the War of Independence in 1857. A country-wide war was to begin simultaneously on the 31st of May 1857, but the Indians among the British army revolted before that on the 10th of May 1857!

A startling 5,00,000 Muslims were killed following the events of 1857, of which 5000 were the Ulema (religious scholars). It is said that there was not a single tree on the Grand Trunk Road from Delhi to Calcutta on which an alim’s body was not found hanging!

Indian Ulema called for Jihad against the British and declared India as Darul Harb (Territory under Enemy control). This call found resonance all over the country with Muslims rising up against the British!

To liberate the countrymen from the Cultural and Educational bondages of the colonial empire, towering centers of learning like the Aligarh Muslim University were established in the late 19th Century, which are still counted amongst the leading Universities of India.

The Reshmi Rumaal Tehreeq was launched in 1905 by Shaikhul Islam Maulana Mehmood Hasan and Maulana Ubaidullah Sindhi to unite all the Indian states against the British. Maulana Mehmood was imprisoned in Malta and Kalapani for the same where he breathed his last!

The Indian National Congress, from the time of its inception to independence has seen 9 Presidents who were Muslims!

Barrister M. K. Gandhi served in a law firm in South Africa owned by a Muslim, who on his own expenses brought Gandhiji to India in 1916. Here, he started his agitation under the Ali Biradran (Ali Brothers)!

The Mopla movement saw 3000 Muslims being killed in a single battle!

The Non-cooperation Movement and the Swadeshi Movement saw overwhelming Muslim participation. Janab Sabusiddiq who was the Sugar-king of that time gave up his business as a form of boycott. The Khoja and Memon communities owned the biggest business houses of that time and they parted with their treasured industries to support the boycott!

The 1942 Quit India movement was actually conceived by Maulana Abul Kalam Azad. He was imprisoned on the 8th of August and sent to Ahmadnagar, because of which Gandhiji had to lead the movement on the 9th of August!

Jyotiba Phule was sponsored by his neighbour, Usman Bagban, in his educational activities, so much so that the school in which he taught was owned by Mr. Usman. His daughter, Fatima was the first girl student there and joined as a teacher thereafter!

Muslim leaders always supported the Dalit cause. In the Round Table Conference held in London, Maulana Muhammad Ali Johar was lured into abandoning the Dalit cause in lieu of accepting all the other demands of the Muslims. But Maulana Johar refused to forsake the Dalits!

When Dr. B.R. Ambedkar could not win the 1946 Central Elections, the Bengal Muslim League vacated one of its own seats and offered it to Dr. Ambedkar, who won it in the bypoll. This gesture by the Muslim League paved the way for his entry into the Constituent Assembly and the rest as they say, is history!

Muslims freedom fighters were active in the field of journalism as well. Maulana Azad used his pen against the British despite being prevented by the colonial powers a number of times. In fact, the first journalist to be killed for the cause of India’s Freedom Struggle was also a Muslim – Maulana Baqar Ali.

 

 

امیر المومنین فی الحدیث حضرت مولانا یونس جونپوری رحمہ اللہ

یاسر ندیم الواجدی

 

دوسری صدی کے امیر المومنین فی الحدیث امام بخاری کی صحیح کو اس دور میں، پندرہویں صدی کے امیر المومنین فی الحدیث شیخ یونس جونپوری رحمہ اللہ سے زیادہ جاننے والا شاید ہی کوئی ہو۔ نابغہ روزگار شخصیات کی مقبولیت کا اصل اندازہ ان کے جنازوں سے ہوتا ہے۔ امام احمد بن حنبل (جن کی مسند کو حضرت شیخ نے ایک لفظ کی تلاش میں چار بار پڑھا تھا) نے کہا تھا کہ ہمارے اور ان کے درمیاں جنازے فیصلہ کریں گے۔ آج جب شیخ کا جنازہ اٹھا تو دنیا نے دیکھا کہ اہل علم کی قدر کسے کہتے ہیں۔ دلوں کے یہ بادشاہ اپنی وفات کے بعد بھی عظمت کی اونچائیوں پر فائز رہتے ہیں۔ دربار ان کے بھی سجتے ہیں لیکن امراء ووزراء کے لیے نہیں، بلکہ ان کے دربار میں وہ بوریہ نشین شہزادے حاضر باش رہتے ہیں جن کے سامنے نبی کی میراث سے اپنی زندگی کو منور کرلینا ہی مقصد ہوتا ہے اور اس کے لیے وہ سادگی سے مرصع دربار میں مسند نشین شیخ کے ارد گرد گھنٹوں بیٹھےاس میراث پر ٹوٹے پڑتے ہیں۔

 

حضرت شیخ جب سہارنپور پڑھنے کے لیے آئے تو بہت بیمار ہوگئے۔ اساتذہ نے مشورہ دیا کہ واپس اپنے گھر چلے جائیں۔ حضرت شیخ زکریا رحمہ اللہ نے بھی یہی فرمایا، مگر وہ نہ مانے۔ حضرت شیخ زکریا نے اپنے مخصوص انداز میں فرمایا کہ "پھر پڑا رہ یہیں”۔ شاگرد نے اس جملے پر ایسا عمل کیا کہ اپنے شیخ کے در پر زندگی گزاردی تا آنکہ بڑھاپے میں جنازہ ہی اٹھا۔ یہی وجہ تھی کہ استاذ کو بھی اپنے شاگرد پر ناز تھا۔ وہ کون استاذ ہے جو اپنے شاگرد کو لکھ کر دے کہ جب تم چالیس سال بعد اس تحریر کو پڑھوگے تو مجھ سے آگے نکل چکے ہوگے۔ اس سے بڑھ کر کسی طالب علم کے لیے شرف کی کیا بات ہوگی کہ استاذ اپنی کتاب میں اپنے شاگرد کا قول نقل کرے۔

 

میں اپنے کو خوش نصیب سمجھتا ہوں کہ مجھے حضرت کی زیارت کا ہی نہیں بلکہ آپ سے اجازت حدیث کا بھی موقع ملا۔ سنہ 2001 میں دورہ حدیث کے سال ہم نے بھی دیوبند سے مسلسلات کے سبق میں حاضری کے لیے سہارنپور کا سفر کیا۔ اس سفر میں شیخ کا پہلی مرتبہ دیدار ہوا۔ اس زمانے میں شیخ باہر سے آنے والے طلبہ کو بھی عبارت پڑھنے کی اجازت دیتے تھے۔ اس مناسبت سے میرے نام کی پرچی حضرت کے سامنے موجود تھی۔ شیخ کی نازک مزاجی کے قصے خوب سنے تھے اور ہم مزاج سے بالکل ناواقف۔ اوپر سے یہ بھی معلوم تھا کہ شیخ قلندر صفت ہیں، کہیں اللہ تعالیٰ ان کی زبان سے ہمارے دل کا حال نہ کہلوادے۔ اس پر مستزاد یہ کہ شیخ کے یہاں عبارت خوانی میں لحن جرم تھا جب کہ دیوبند میں صورت حال اس کے برعکس تھی۔ خوف کے اس ماحول میں عبارت پڑھی اور اس امتحان میں الحمد للہ کامیاب رہے۔ دوران عبارت حضرت نے ایک جملہ بھی ارشاد فرمایا تھا جو بطور سند میرے سینے میں محفوظ ہے۔

 

دوران درس حضرت شیخ نے شاہ ولی اللہ کی کتاب الفضل المبین کے رجال پر اس تفصیل سے کلام کیا کہ گویا امام ذہبی یا ابن حجر کتب ستہ کے رجال پر کلام کررہے ہوں۔ اس عمر میں حضرت کی یادداشت نے بہت متاثر کیا۔

 

حضرت شیخ ایک ایسی شخصیت تھے جن کے نزدیک ان کی کتابیں ہی ان کا سب کچھ تھیں، دنیا کسے کہتے ہیں وہ جاننا نہیں چاہتے تھے۔ ان کے شاگرد اور مرید شیخ یعقوب دہلوی سابق امام مسجد قبا ومشرف قاضیان مدینہ نے مجھے یہ واقعہ سنایا کہ "مدینہ منورہ تشریف لانے پر عرب علما ان کے جوتے سیدھے کرنا اپنا شرف سمجھتے تھے۔ ایک سفر میں ان عرب شاگردوں نے اتنے ہدایا دیے کہ ریالوں سے دو تھیلے بھر گئے۔ مدینہ سے واپسی پر شیخ نے مجھے حکم دیا کہ سارے پیسے مدینہ منورہ میں ہی غربا میں تقسیم کردوں۔ مین نے با اصرار کہا کہ حضرت اپنی ضرورت کے بقدر رکھ لیں، لیکن وہ تیار نہیں ہوے اور ایک ایک ریال صدقہ کروادیا۔ جب ایرپورٹ پہنچے تو مجھ سے کہا کہ مجھے سو ریال اس شرط پر قرض دو کہ بعد میں واپس لوگے”۔ جس شخص کے یہاں دنیا کی یہ حیثیت ہو اللہ تعالیٰ اسی کو دلوں کی بادشاہت عطا فرماتے ہیں۔

 

آج عجم سے لیکر عرب تک سبھی حضرت شیخ یونس کی رحلت پر ماتم کناں ہیں کیونکہ جس بخاری، ابن حجر، ذہبی اور جس خلیل احمد اور زکریا کاندھلوی کے تذکرے ہم سنتے آئے ہیں وہ سب شیخ یونس رحمہ اللہ کی شکل میں ہمارے سامنے مجسم تھے۔ اب نگاہ اٹھاکر مشرق سے مغرب تک دیکھتے ہیں تو محدثین تو ملتے ہیں لیکن امیر المومنین فی الحدیث کوئ نہیں۔ اس لیے میں دنیا کے ہر مدرسے اور ہر دار الحدیث کو تعزیت پیش کرتا ہوں

 

(Courtesy:Facebook Yasir Nadeem alwajidi)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Posted by: Bagewafa | جولائی 4, 2017

Gau hatya…Cow slaughter

Posted by: Bagewafa | جولائی 3, 2017

فرینکفرٹ۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

गाय औऱ हिंदुत्व : मिथक और वास्तविकता

 

अगर कोई झूठ और धोखाधड़ी में महारत हासिल करने के लिए किसी गुरुकुल या यूनिवर्सिटी की तलाश में है तो निश्चित ही आरएसएस से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। …

शम्सुल इस्लाम

June 16,2017 10:44

गाय औऱ हिंदुत्व : मिथक और वास्तविकता

शम्सुल इस्लाम

‘राम’, ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ (मुसलमानों व ईसाइयों को ज़ोर-ज़बरदस्ती हिंदू बनाना) जैसे मुद्दों के बाद हिंदुत्ववादी ताकतों के हाथ में अब गो- रक्षा का हथियार है। पवित्र गाय को बचाने के नाम पर मुसलमानों व दलितों को हिंसक भीड़ द्वारा घेरकर मारने, उनके अंग भंग कर देने और उनके साथ लूटपाट करने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। याद रहे कि ऐसी कई घटनाओं का तो पता ही नहीं चल पाता है।

डींग हांकने या अपनी बहादुरी दिखाने के लिए इन हिंसक तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो उस मारपीट तथा जुल्म व प्रताड़ना की तस्वीर दिखाते हैं, जिसे देख-सुन कर विभाजन के समय की क्रूरतापूर्ण हिंसक घटनाएं याद आ जाती हैं। इन्हें देख के साफ लगता है कि इन हिंसक व अराजक तत्वों को सरकार का वरदहस्त प्राप्त है तथा इन्हें कानून का कोई डर नहीं है।

यह शर्मनाक वीडियोज हमें दिखा रहे हैं कि कैसे यह हिंदूवादी हिंसक तत्व किसी को पीट-पीट कर मार डालने या उसे अधमरा कर देने पर खुशियां मनाते, उसका आनंद लेते हैं।

गो-रक्षा का धार्मिक कर्तव्य निभाने वाले यह आपराधिक तत्व सही मायनों में हत्यारे होने के साथ लुटेरे भी हैं। यह इससे सिद्ध हो जाता है,जब हम उन्हें प्रताड़ितों को घेरकर मारने से पहले उन की पूँजी और सामान की लूटमार करते देखते हैं।

आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक और नीतिकार, हमारे प्रधानमंत्री द्वारा अगस्त 2016 में गो माता के इन अराजक व हिंसक भक्तों को असामाजिक तत्व ठहरा दिए जाने के बावजूद इनका हिंसक तांडव जारी है।

प्रधामंत्री ने कहा था –

    ‘यह देख मुझे बहुत गुस्सा आता है कि लोग गो रक्षा के नाम पर दुकानें चला रहे हैं… कुछ लोग रात के समय अनैतिक कार्यों में लिप्त रहते हैं और दिन में वह गो र क्षकों का आवरण ओढ़ लेते हैं।’

प्रधानमंत्री द्वारा की गई इस सख्त टिप्पणी को लगभग एक साल होने को आया लेकिन गाय के नाम पर की जाने वाली हिंसा इस अरसे में और बढ़ गई तथा देश के बड़े हिस्से में फैल गई है। यह ज्यादा भीषण हो गई और अनियंत्रित भी। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री ने दिखावे के लिए यह बातें बोली हों, ताकि इन आपराधिक कृत्यों के खिलाफ समाज में पनप रहा गुस्सा कम किया जा सके। दूसरा यह कि उक्त गो रक्षक असामाजिक तत्व नहीं हैं, बल्कि वास्तविक गो-रक्षक हैं जिन्हें प्रधान-मंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है। परंतु इसमें कोई शक नहीं कि इन गैंगस्टर्स को आरएसएस तथा प्रशासन का वरदहस्त प्राप्त है।

दुर्भाग्य से न्याय पालिका, जिसके बारे में माना जाता है कि वह देश के शासकों को विधि सम्मत रूप से शासन करने पर बाध्य करेगी, कई बार उसने जनहित के मुद्दों पर प्रभावशाली काम किए भी, लेकिन पता नहीं क्यों इस बार वह इन आपराधिक तत्वों के आगे चुप है। बल्कि राजस्थान हाईकोर्ट के एक जज ने ‘गो- भक्तों’ द्वारा किए गए अपराधों की पड़ताल करने के बजाय (गो-रक्षा के नाम पर की जाने वाली हिंसा में राजस्थान प्रथम स्थान पर है। कुछ समय पहले ही वहां इन गो रक्षकों ने पहलू खान को बर्बरता-पूर्वक तरीक़े से मार डाला। इस घटना का पूरा वीडियो भी अपलोड किया गया था।) गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने तथा उसकी हत्या करने वाले को मृत्यु दंड देने के निर्देश जारी किए।

भारत के गृह-मंत्री राजनाथ सिंह ने तो, जो आरएसएस के महत्वपूर्ण विचारक भी हैं, गाय की पवित्रता पर एक नई ‘ वैज्ञानिक’ खोज तक का हवाला दे डाला। आरएसएस पदाधिकारियों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा जारी एक रिपोर्ट का जिक्र किया और कहा कि "गाय में 80 प्रतिशत जींस ऐसे पाए गए हैं, जो इंसानों में भी मौजूद हैं।” साथ ही उन्होंने भारतीय नागरिकों से "गाय की रक्षा और उसकी पूजा करने” का आह्वान भी किया।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आरएसएस के यह स्वयंसेवक, राजनाथ सिंह इस मामले में न केवल अध्-कचरी सोच वाले बल्कि पक्षपाती और गलत भी थे। विश्वस्तरीय प्रतिष्ठित पत्रिकासाइंस की खोज के आधार पर भारत के एक प्रमुख अंगरेजी दैनिक ने यह स्पष्ट किया है कि अन्य कई पशुओं के जींस, गाय के जींस से ज्यादा मानव जींस से मिलते हैं। चिंपांज़ी (गोरीले ), बिल्ली, चूहे व कुत्ते में क्रमशः 96, 90, 85 और 84 प्रतिशत जींस मानव जींस के समान मिलते हैं। केवल यह प्राणी ही नहीं, फलों में भी यही स्थिति है, जैसे केले में 60 प्रतिशत जींस मानव जींस के समान होते हैं। अब देखना यह है कि राजनाथ सिंह कब इन्हें भी पवित्र घोषित करते हैं। हमें उनसे यह जानने की भी जरूरत है कि अल्पसंख्यक और दलित इंसान हैं या नहीं, उनमें भी गौ-माता के जींस हैं या नहीं, और उनकी जानें हिंसक भीड़ से बचाई जाना जरूरी है कि नहीं।

गो-रक्षकों के ताजा शिकार आईआईटी-एम (चैन्ने स्थित) के बीफ खाने वाले लोग हुवे हैं। संस्थान के केंपस में आरएसएस के विद्यार्थी संगठन (abvp अभाविप) के कार्यकर्ताओं ने इन पर प्राणघातक हमला किया। हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं द्वारा गाय के नाम पर लगातार किए जा रहे इन हिंसक हमलों से एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट है कि यह फासीवादी तत्व हमारे आज के भारत के बारे में कुछ नहीं जानते तथा भारतीय इतिहास के मामले में भी निरे जाहिल हैं। खासतौर से भारत के वेदिक इतिहास से तो यह पूरी तरह अनभिग्य हैं, जिसे यह स्वर्ण काल के रूप में निरूपित करते हैं।

अगर कोई झूठ और धोखाधड़ी में महारत हासिल करने के लिए किसी गुरुकुल या यूनिवर्सिटी की तलाश में है तो निश्चित ही आरएसएस से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। इस क्षेत्र में उनकी दक्षता से किसी की कोई तुलना नहीं की जा सकती। भारत के हिंदुओं द्वारा बीफ ग्रहण करने के बारे में वे वास्तविकताओं को झुठला कर जिस प्रकार की बातें करते हैं, उनसे एक बार फिर उनकी यह विशेषग्यता सिद्ध हो रही है। वे ऐतिहासिक तथ्यों को आपराधिक रूप से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हुए यह दावा करते हैं कि भारत में बीफ खाने का चलन मुस्लमान/ईसाई शासकों के आगमन के बाद से शुरू हुआ तथा इन शासकों ने हिंदुओं और उनकी पवित्र धार्मिक मान्यताओं का निरादर करने के लिए भारत में बीफ खाने पर जोर दिया।

एक प्रश्न कि “हमारे देश (भारत) में गो वध कैसे प्रारंभ हुआ?” के उत्तर में पूरी तरह झूट बोलते बेशर्मी से, आरएसएस के महान गुरु, गोलवालकर ने कहा: “इसका प्रारंभ हमारे देश में विदेशी आक्रांताओं के आगमन के साथ हुआ। लोगों को गुलामी के लिए तैयार करने के लिए उन्होंने सोचा कि हिंदुओं के आत्म सम्मान से जुड़ी हर चीज का निरादर करो…इसी सोच के चलते गो-वध भी शुरू किया गया।”

यहाँ यह जानना रोचक होगा कि आरएसएस ने अपनी स्थापना (1925 ) से लेकर भारत की आज़ादी तक, अंग्रेजी राज में कभी भी गौ-वध बंद करने के लिए किसी भी तरह का आंदोलन नहीं चलाया।

इस तरह के दुष्प्रचार ने बीफ खाने या इसका व्यवसाय करने वाली देश के दो अलप-संख्याक समुदायों और दलितों को आतंकित करने में महती भूमिका निभाई। यहां इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हिन्दुत्वादी राजनीति के उत्थान के साथ ही गाय ऐसा संवेदनशील मुद्दा बना दिया गया, जिसने देश में मुसलमानों व दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काने के ज्यादातर मामलों में केंद्रीय भूमिका निभाई।

नाज़ी दुष्प्रचारक पॉल जोसेफ गोएबल्स के भारतीय उत्तराधिकारियों के लिए, जो यह दावा करते हैं कि भारत में बीफ खाना मुसलमानों/ईसाइयों के आगमन के साथ शुरू हुआ, भारतीय इतिहास के वैदिक काल का हिंदू लेखकों द्वारा किया गया वर्णन निरर्थक ही था।

आरएसएस द्वारा हिंदुत्ववादी विचारक के रूप में प्रतिष्ठित स्वामी विवेकानंद ने प्साडेना, कैलिफोर्निया (अमेरिका) के शेक्सपीयर क्लब में 2 फरवरी 1900 को ‘बुद्धिस्ट इंडिया’ के विषय पर अपने संबोधन में कहाः

    “आप अचंभित रह जाएंगे यदि प्राचीन वर्णनों के आधार पर मैं कहूं कि वह अच्छा हिंदू नहीं है, जो बीफ नहीं खाता है। महत्वपूर्ण अवसरों पर उसे आवश्यक रूप से बैल की बलि देना व उसे खाना चाहिए।”

अच्छे दिन : जनसंख्या सफाये के लिए इससे बेहतर राजकाज और राजधर्म नहीं हो सकता

इस कथन को वेदिक काल के इतिहास व संस्कृति विशेषग्य सी कुन्हन राजा की बात से बल मिलता है। महत्वपूर्ण यह है कि राजा ने यह शोध कार्य विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के अंतर्गत किया है। इसमें उन्होंने कहा हैः

    “वेदिक आर्यंस, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे, मछली, मांस, यहां तक कि बीफ भी खाते थे। एक सम्मानित अतिथि के आतिथ्य सत्कार में बीफ परोसा जाता था। हालांकि वेदिक आर्यंस बीफ खाते थे लेकिन उसके लिए दुधारू गायों का वध नहीं किया जाता था। ऐसी गायों के लिए अग्नय (जिन्हें मारना नहीं है) का शब्द इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन एक अतिथि गोघना (जिसके लिए गो-वध किया जाना है) माना जाता था। उस समय केवल बैल, बांझ गाय और बछड़ों का वध किया जाता था।”

गोरक्षा आंदोलन बन गया है, फिर बंटवारे का सबब #Beefgate #Dadri

भारतीय राजनीति, धर्म और संस्कृति के विशेषज्ञ व अद्भुत शोधकर्ता, डॉ अम्बेडकर ने इस विषय पर ‘क्या हिंदुओं ने कभी बीफ नहीं खाया?’ शीर्षक से उत्कृष्ट लेख लिखा है। वे लोग जो वास्तव में प्राचीन भारत को जानना-समझना तथा अल्पसंख्यकों को किनारे कर उनका सफाया करने के लिए गढ़े जाने वाले मिथकों की असलियत जानना चाहते हैं, उन्हें डॉ. अम्बेडकर का यह ऐतिहासिक आलेख जरूर पढ़ना चाहिए।

अनेकानेक वेदिक काल और उत्तर-वैदिक काल की हिंदू पांडुलिपियों का अध्ययन करने के बाद डॉ. अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि “जब भी पढ़े-लिखे ब्राह्मण इस पर बहस करें कि हिंदुओं ने कभी बीफ नहीं खाया और वे तो गाय को पवित्र मानते हैं तथा उन्होंने सदा ही गो-वध का विरोध किया है तो उनकी बात को स्वीकार करना असंभव है।”

हे राम! यह सैन्य राष्ट्र में कारपोरेट नरबलि का समय !

दिलचस्प बात यह है कि आं अम्बेडकर के अनुसार गायों की बलि इसलिए दी जाती थी, उनका मांस इसलिए खाया जाता था, कि वे पवित्र थीं। उन्होंने लिखा: “ऐसा नहीं था कि वेदिक काल में गाय को पवित्र नहीं माना जाता था, बल्कि उसके पवित्र होने के चलते ही वाजस्नेयी संहिता में यह निर्देश दिए गए हैं कि बीफ खाना चाहिए।” (धर्म शास्त्र विचार इन मराठी, पृ. 180)। यह कि ऋग्वेद के आर्यंस आहार के लिए गायों का वध करते थे और उनका बीफ खाना ऋग्वेद से ही सिद्ध होता है। ऋग्वेद (x. 86.14) में इंद्रा कहती हैः ‘उन्होंने एक बार 20 बैलों का वध किया’। ऋग्वेद (x.91.14) में है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई। ऋग्वेद से ही यह भी पता चलता है कि गायों का वध तलवार या कुल्हाड़ी से किया जाता था।”

अपने लेख का समापन आंबेडकर ने इन शब्दों पर किया हैः

“इन सब सबूतों के रहते किसी को संदेह नहीं हो सकता कि एक समय था जब हिंदू, चाहे वे ब्राह्मण हों या अन्य न सिर्फ मांसभक्षी थे बल्कि वे बीफ भी खाते थे।”

अंतिम फैसला : महेशचंद्र शर्मा जी, मोदी मार्का विकास में गो-वंश की नहीं, गो-वध की ही जगह है

हिंदुत्ववादियों द्वारा भारत के कमजोर वर्गों के विरुद्ध की जा रही हिंसा आरएसएस के दोग़लेपन को ही उजागर करती है, जो उसकी रीति-नीति का अभिन्न अंग है। वास्तव में तो, किसी भी मुद्दे पर दो-तीन तरह की बातें करना तो आरएसएस के लिए बहुत कम ही माना जायेगा। हिंदुत्ववादी संगठन, खास कर आरएसएस से जुड़े, साधारण इन्साफ पसंद भारतीयों की, बेधड़क हत्याएं कर रहे हैं, न केवल गो-वध के लिए बल्कि इन पशुओं के परिवहन करने पर भी। हद तो यह है कि उन दलितों को भी मौत के घाट उतरा जा रहा है, जो क़ानूनी तौर पर मुर्दा गायों की खाल उतर रहे थे। इसी के समानांतर आरएसएस/भाजपा की सत्ता वाले राज्य गोवा, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर हैं, जहां गो वध वैद्य है और बीफ वहां के मुख्य आहार में शामिल है। आरएसएस का तरीका कुछ ऐसा है कि कुछ क्षेत्रों में गो-वध की बात तो दूर रही, गऊ के साथ पाए जाने पर आपको ‘नर्क’ भेजा जा सकता है और कुछ क्षेत्रों में इस से जुड़े लोग गो-वध कराते हुवे राज कर रहे हैं। याद रहे हमारे देश में केरल जैसे राज्य भी हैं जहाँ बीफ़ ‘सेक्युलर’ खाना है!

यह सरकार भारत विरोध में खड़ी है

इस बात के दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं कि गाय के धंधे और बीफ पर रोक ने, पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों में घिरे, अपने अस्तित्व के लिए जूझते किसानों के लिए और मुसीबतें पैदा कर दी हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसानों की आत्महत्या दर 30 प्रतिशत बढ़ गई। ऐसे में गाय के विक्रय पर रोक लगाना किसानों को कुएं में धक्के देना जैसा है।

मोदी जी, गाय बचाओगे या देश : कहीं देश बाँटने का हथियार न बन जाए गाय

बतौर किसान नेता राजनीति में पदार्पण करने वाले चर्चित राजनीतिज्ञ, शरद पवार गौ-सेवा के बारे में एक अद्भुत प्रस्ताव लाए हैं। उनका कहना है कि आरएसएस के निर्देश पर मोदी सरकार गायों के क्रय-विक्रय व गो-वध पर रोक लगा रही है। इससे प्रभावित होने वाले किसानों को चाहिए कि वे अपने यहां की बांझ या बेकार गायें आरएसएस को सौंप दें, ताकि वह भी गौमाता की अच्छे-से सेवा करने के पवित्र काम में हिस्सेदारी सके। आरएसएस को इससे कोई समस्या भी नहीं होगी, क्यों कि भारत सरकार के बाद सब से ज़्यादा ज़मीनें इसी के पास हैं।

मोरों ने किया सामूहिक आत्महत्या करने का फैसला

पवार ने यह मांग भी की है कि आरएसएस को नागपुर के रेशम बाग स्थित अपना मुख्यालय, एक गोशाला में तब्दील कर लेना चाहिए, जिससे गरीब किसानों पर इन गायों का पेट भरने का बोझ न पड़े तथा आरएसएस को गायों की सेवा का पुण्य मिलता रहे।

इस पवित्र युद्ध का एक स्पष्ट एजेंडा मांस के कारोबार से जुड़े कुरैशियों (मुस्लमान), खटीक (हिन्दू ) और चमड़े के कारोबार से जुड़े दलितों की आर्थिक व्यवस्था ध्वस्त करना भी है। इससे फुटकर व्यापार की तरह होने वाला यह असंगठित उद्योग मर जाएगा। जिस का नतीजा यह होगा कि भारत जैसी बड़ी मंडी विश्व की उन बड़ी मांस कम्पनिओं के हवाले कर दी जाएगी जो प्रोसेस्ड मांस कारोबार पर एकाधिकार रखते हैं।

मांस के लिए मवेशी व्यापार पर रोक का हिंदुत्ववादी एजेंडा

आरएसएस अनेक मुँहों से बोलते हुए, अनेक गुप्त एजेंडों पर काम करने के फ़ासीवादी संस्कृति को निभाने में माहिर है। देशवासियों को विभाजित करने वाला कोई एक एजेंडा जब अपना प्रभाव खोने लगता है या ज्यादा विवादित होने लगता है, तब वे थैले से कोई दूसरा एजेंडा निकाल लेता है। ‘राम मंदिर’, ‘घर वापसी’, ‘लव जिहाद’ और अब बारी है गाय के नाम पर देश को बांटने की। गाय का मुद्दा देश का एकमात्र मुद्दा बन गया है। यह मुद्दा असल में ध्यान भटकाने के लिए छलावा मात्र है। गरीबी, बेरोजगारी, दंगे, अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों से ध्यान भटकाने का। आरएसएस-भाजपा से जुड़ा शासक वर्ग समझता है कि वे सब लोगों को हर समय मूर्ख बनाते रहेंगे। निश्चि ही वे गलत सिद्ध होंगे। लेकिन जब तक इन का पर्दाफ़ाश होगा, तब तक तो लोकतांत्रिक-धर्म निरपेक्ष भारत और इसके लोगों का बुरा हाल हो चुका होगा।

[अंग्रेज़ी से अनुवाद: जावेद आलम, इंदौर]

Prime time Ravish 5jun17 ; सरकार द्वारा NDTV को डराने की कोशिश ?? | NDTV CBI Raid

 دیکھتا رہا۔۔۔۔ محمد علی وفا

.

نفرت قدے کے بام کو دیکھتا رہا

زہر سے بھرے  جام کو دیکھتا رہا

 .

دن بھی گزارا تیری ظلمتیں لئے

میں الجھنوں کی شام کو دیکھتا رہا۔

 .

جب ہوا ذکر ٹوٹے ہوئے دل کا

 تیرے ہی نام کو دیکھتا رہا

.

اب خریدے کہاں سے یہ غریب دل

تیرے لگائے دام کو دیکھتا رہا

 .

دسرونکی طرف وفا نظریں نہیں اٹھی

میں میرے ہی کام کو دیکھتا رہا

देखता रहा—मुहम्मदअली वफा

.

नफरतकदे के बाम को देखता रहा

ज़हरसे भरे   जाम को देखता रहा

 .

दिन भी गुजारा तेरी जुल्म्तें लिये

में उल्झनों की शाम को देखता रहा.

 .

जब हुआ जिकर तूटे हुए दिल का

एक  तेरे ही नाम को देखता रहा

.

अब खरीदे कहां से ये गरीब दिल

तेरे लगाये   दाम को देखता रहा

 .

दुसरोंकी तरफ वफा नजरें नहीं उठी

में  मेरे ही काम को देखता रहा

برسوں کے بعد بھی۔۔۔۔۔محمدعلی وفا

बरसों के बाद भी- मुहम्मद अली वफा

.

जालिम रहा है आसमां बरसों के बाद भी

अदावत भरा है ये झमां बरसों के बाद भी

.

पानी बने बहता रहा  दरिया  ये खूनका

फिर भी नही कोइ आशनां बरसों के बाद भी

 .

बेठे रहे तुम हाथ बांधे आती शरम नहीं

कुछ भी नहीं तुमको अयां बरसों के बाद भी

 .

अबभी सहर को ढुंढते हो वो भी रातको

तुम पर  हसेगी ये शमां बरसों के बाद भी

 .

मोहिद बने रहना यहां  होता गूनाह कया

जारी अभी तक ईमतेहां  बरसों के बाद भी

 .

हमतो बने  बारिश कदे  जंगल जरा देखो

कटते रहे हमतो यहां बरसों के बाद भी

 .

मांगा पसीना तो हमारा खूने जिगर  दिया

फिरभी बने हम ही निशां बरसों के बाद भी

 .

घर भी गये लूटे यहां  असमत भी लूट गइ

मिलता नहीं कोइ पासबां बरसों के बाद भी

 .

आई कभी खद्दर कभी तो  रंगे जाफरां

दुश्मन बने बूढे जवां बरसों के बाद भी

 .

खंजर रहे  कातिल के हमही  पर घूमते

बन कर रहे मझलुम यहां  बरसों के बाद भी

 .

महरुम था ये चमन  बहारों की फसल से

छाई रही हमपर खिझां बरसों के बाद भी

दिलके फफोले ‘वफा’ खोलुं अब जा कर कहां

हसते रहे सब  सुन बयां बरसों के बाद भी

جینے کے بہانے سبھی رسوا یہاں ہوئے۔۔۔۔۔۔۔۔محمد علی وفا

This Ghazal was read on Mehman tv Mushayera by SSTV ,Toronto on 25 May 2017.It will be aired from SSTV Toronto on rogrs cable 851 on Eid dy

जलने दे मेरे दोस्त_मोहंमदअली’वफा’

 

चलताहुं  जीस तरह में चलने दे मेरे दोस्त
जलता हुं तेरी यादमें जलने दे मेरे दोस्त.

.

वल्लाह पुछ्ना नही मंझिल का भी पता
मेरे कदमको युंही मचलने दे मेरे दोस्त.

.

होता हुं तुलुअ में मगर मेरी अदासे

तारिक्यां छानेको है ढलने दे मेरे दोस्त.

.

हो जाए खूश्क ही न तेरे अश्ककी तरह
दरियाओंको इन आंखसे बहने दे मेरे दोस्त

.

ईसरार से रुकता नहीं खुशियोंका काफला
गमके बादलोंको भी घिरने दे मेरे दोस्त.

.

जीनेके बहाने तो सभी रुस्वा यहां हुए
ईज्जत के साथ मोत से मरने दे मेरे दोस्त.

ऊर्दु मुशायेरा– 25 th May 2017 Toronto,Canada اردو مشایرا

c

ا

(Courtesy:Urdu daily Inquilab,Mumbai)

राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले—शकील क़ादरी

 आज से कई सालं पहेले बडौदा में एक तरही मुशायरा रक्खा गया था। मिस्र-ए-तरह था ‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’। आज उसी मिस्रे पर कही गई मुसद्दस मिली। जो आज यहां पेश कर रहा हूँ….

 

राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले—शकील क़ादरी

अब भी मौजूद हैं उम्मत को जगाने वाले

जब्र की ज़ुल्म की बुनियाद हिलाने वाले

हौसला कूच-ए-क़ातिल में दिखाने वाले

जान रखते हैं बहुत, जान लुटाने वाले

बात लेकिन ये बनाते हैं बनाने वाले

‘राह ख़ुद भूल गए राह दिखाने वाले’

दीन की शम्अ अंधेरों में जलाने वाले

रेगज़ारों में हसीं फूल खिलाने वाले

एक पल में दरे ख़ैबर को गिराने वाले

जब चले आते हैं शम्शीर चलाने वाले

गीत गाते हैं यही ढोल बजाने वाले

‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’

फ़ाक़ा करते हैं अगर मिल न सके रिज़्क़े हलाल

ज़ुल्म के सामने मज़्लूम का रखते हैं ख़याल

सारे आलम में नहीं मिलती कहीं जिन की मिसाल

सर मुसलमानों के, नेज़ों पे दिखाते हैं जमाल

फिर भी अफ़्वाह उड़ाते हैं उड़ाने वाले

‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’

लैला मजनू की किताबें हैं पुरानी न दिखा

मौत प्यारी है बहुत ख़्वाबे जवानी न दिखा

बारहा क़ूज़े में रक्खा हुआ पानी न दिखा

कर्बला वालों को दरिया की रवानी न दिखा

वर्ना इल्ज़ाम लगाएंगे ज़माने वाले

‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’

रुख़ हवाओं का जिधर का हो उधर तुम न चलो

धूप गर सर पे चढ़े सब्र का साया कर लो

रात अंधेरी हो तो क़ंदील जला कर निकलो

और दुश्मनने बिछाये हुए काँटें चुन लो

ये न कह पाएंगे फिर बाद में आने वाले

‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’

जीना मरना है यहीं आज ये नीयत कर लो

ये कोई बात हुई बारहा हिजरत कर लो

अपने पुरखों की विरासत है हिफ़ाज़त कर लो

है ये अपनी ही ज़मीं अब इसे जन्नत कर लो

क़ब्र पे वर्ना यह लिख देंगे ज़माने वाले

‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’

दिल लगाना तो लगाना किसी आदिल से शकील

गर मुक़ाबिल हो तो डरना नहीं क़ातिल से शकील

और न दब जाना कहीं ताक़ते बातिल से शकील

फिर सदा आएगी राहों से मनाज़िल से शकील

कितने झूटे हैं ये इल्ज़ाम लगाने वाले

‘राह ख़ुद भूल गये राह दिखाने वाले’

آج سے کئی سالں پہیلے بڑودا میں ایک طر حی مشاعرہ رکھا گیا تھا۔ مصر طرح تھا ‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’۔ آج اسی مصرعہ پر کہی گئی مسدس ملی۔ جو آج یہاں پیش کر رہا ہوں۔۔۔۔

 

 

 


راہ خود بھول گئے راہ دیکھانے والے….شکیل قادری

اب بھی موجود ہیں امت کو جگانے والے

جبر کی ظلم کی بنیاد ہلانے والے

حوصلہ کوچہ قاتل میں دکھانے والے

جان رکھتے ہیں بہت، جان لٹانے والے

بات لکن یہ بناتے ہیں بنانے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دیکھانے والے’

دین کی شمع اندھیروں میں جلانے والے

ریگزاروں میں حسیں پھول کھلانے والے

ایک پل میں درے خیبر کو گرانے والے

جب چلے آتے ہیں شمشیر چلانے والے

گیت گاتے ہیں یہی ڈھول بجانے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’

فاقہ کرتے ہیں اگر مل نہ سکے رزقہ حلال

ظلم کے سامنے مظلوم کا رکھتے ہیں خیال

سارے عالم میں نہیں ملتی کہیں جن کی مثال

سر مسلمانوں کے، نیزوں پہ دکھاتے ہیں جمال

پھر بھی افواہ اڑاتے ہیں اڑانے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’

لیلیٰ مجنو کی کتابیں ہیں پرانی نہ دکھا

موت پیاری ہے بہت خوابے جوانی نہ دکھا

بارہا قوزے میں رکھا ہوا پانی نہ دکھا

کربلا والوں کو دریا کی روانی نہ دکھا

ورنہ الزام لگائینگے زمانے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’

رخ ہواوٴں کا جدھر کا ہو ادھر تم نہ چلو

دھوپ گر سر پہ چڑھے صبر کا سایہ کر لو

رات اندھیری ہو تو قندیل جلا کر نکلو

اور دشمن نے بچھایہ ہوئے کانٹیں چن لو

یہ نہ کہہ پائیں گے پھر بعد میں آنے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’

جینا مرنا ہے یہیں آج یہ نیت کر لو

یہ کوئی بات ہوئی بارہا ہجرت کر لو

اپنے پرکھوں کی وراثت ہے حفاظت کر لو

ہے یہ اپنی ہی زمیں اب اسے جنت کر لو

قبر پہ ورنہ یہ لکھ دینگے زمانے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’

دل لگانا تو لگانا کسی عادل سے شکیل

گر مقابل ہو تو ڈرنا نہیں قاتل سے شکیل

اور نہ دب جانا کہیں تاکتے باطل سے شکیل

پھر صدا آئیگی راہوں سے منازل سے شکیل

کتنے جھوٹے ہیں یہ الزام لگانے والے

‘راہ خود بھول گئے راہ دکھانے والے’

Older Posts »

زمرے