अपनी नज़रों से वार करते रहो……..शकील क़ादरी

.

 है तुम्हें इख़्तियार करते रहो

मौत का कारोबार करते रहो

.

शाह को दरकिनार करते रहो

हम फ़कीरों से प्यार करते रहो

 .

जाँ हमारी है उस के क़ब्ज़े में

वार तुम बार-बार करते रहो

 .

जिस में डूबो तो हो ख़ुदा राज़ी

ऐसे दरिया भी पार करते रहो

 .

हो जाओ कहीं शिकार उस के

नफ़्स का तुम शिकार करते रहो

.

चैन मिलता है बेक़रारी में

तुम मुझे बेक़रार करते रहो

 .

इश्क़ मे एक क्या हज़ारों दिल

हों अगर तो निसार करते रहो

 .

जाने जाँ दिल मेरा तड़पता है

अपनी नज़रों से वार करते रहो

.

वो क़यामत से पहेले आएगा

"यार का इंतेज़ार करते रहो”

.

हर इरादे को फ़ित्नगर के तुम

अज़्म से तार-तार करते रहो

 .

मैं हूँ शाइर शऊर है मुझ में

तुम मेरा एतबार करते रहो

 .

है तक़ाज़ा ‘शकील’ दुनिया का

क़ल्ब को सोगवार करते रहो

اپنی نظروں سے وار کرتے رہو۔۔۔۔۔شکیل قادری

.

ہے تمہیں اختیار کرتے رہو

موت کا کاروبار کرتے رہو

 .

شاہ کو درکنار کرتے رہو

ہم فقیروں سے پیار کرتے رہو

.

جاں ہماری ہے اس کے قبضے میں

وار تم باربار کرتے رہو

.

جس میں ڈوبو تو ہو خدا راضی

ایسے دریا بھی پار کرتے رہو

 .

ہو جاؤ کہیں شکار اس کے

نفس کا تم شکار کرتے رہو

.

چین ملتا ہے بیقراری میں

تم مجھے بےقرار کرتے رہو

.

عشق مے ایک کیا ہزاروں دل

ہوں اگر تو نثار کرتے رہو

 .

جانے جاں دل میرا تڑپتا ہے

اپنی نظروں سے وار کرتے رہو

 .

وہ قیامت سے پہیلے آئیگا

"یار کا انتظار کرتے رہو”

 .

ہر ارادے کو فتن گر کے تم

عزم سے تار تار کرتے رہو

میں ہوں شاعر شعور ہے مجھ میں

تم میرا اعتبار کرتے رہو

 .

ہے تقاضہ ‘شکیل’ دنیا کا

قلب کو سوگوار کرتے رہو

 

 

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मोहब्बत भी तन्हाईये दाएमी है…….खुमार बाराबंकवी

न हारा है इश्क़ और,न दुनिया थकी है

दीया जल रहा है, हवा चल रही है

सुकूँ ही सुकूं है ख़ुशी ही ख़ुशी है

तेरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है

वो मौजूद हैं और उनकी कमी है

मोहब्बत भी तन्हाईये दाएमी है

खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है

जिसे इश्क़ कहते हैं शायद यही है

चिराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं

नया है ज़माना नई रोशनी है

जफ़ाओं पे घुट घुट के चुप रहने वालो

ख़मोशी जफ़ाओं की ताईद भी है

मेरे राहबर मुझको गुमराह कर दे

सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है

‘ख़ुमार’ ए बला नोश तू और तौबा

तुझे ज़ाहिदों की नज़र लग गई है

محبت بھی تنہائی یہ دائمی ہے۔۔۔۔خمار بارہ بنکوی۔

ہ ہارا ہے عشق اور نہ دنیا تھکی ہے

دیا جل رہا ہے ہوا چل رہی ہے

سکوں ہی سکوں ہے، خوشی ہی خوشی ہے

ترا غم سلامت، مجھے کیا کمی ہے

وہ موجود ہیں اور ان کی کمی ہے

محبت بھی تنہائی یہ دائمی ہے

کھٹک گدگدی کا مزا دے رہی ہے

جسے عشق کہتے ہیں شاید یہی ہے

چراغوں کے بدلے مکاں جل رہے ہیں

نیا ہے زمانہ، نئی روشنی ہے

جفاؤں پہ گھُٹ گھُٹ کے چُپ رہنے والو

خموشی جفاؤں کی تائید بھی ہے

مرے راہبر! مجھ کو گمراہ کر دے

سنا ہے کہ منزل قریب آ گئی ہے

خمارِ بلا نوش! تُو اور توبہ!

تجھے زاہدوں کی نظر لگ گئی ہے۔

اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے۔۔۔۔۔کیفی اعظمی۔

۔


    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    زندگی جہد میں ہے صبر کے قابو میں نہیں

    نبضِ ہستی کا لہو کانپتے آنسو میں نہیں

    اڑنے کھلنے میں ہے نکہت خمِ گیسو میں نہیں

    جنت اک اور ہے جو مرد کے پہلو میں نہیں

    اس کی آزاد روش پر بھی مچلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    گوشے گوشے میں سلگتی ہے چتا تیرے لئے

    فرض کا بھیس بدلتی ہے قضا تیرے لئے

    قہر ہے تیری ہر اک نرم ادا تیرے لئے

    زہر ہی زہر ہے دنیا کی ہوا تیرے لئے

    رُت بدل ڈال اگر پھلنا پھولنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    قدر اب تک تری تاریخ نے جانی ہی نہیں

    تجھ میں شعلے بھی ہیں، اشک فشانی ہی نہیں

    تو حقیقت بھی ہے دلچسپ کہانی ہی نہیں

    تیری ہستی بھی ہے اک چیز جوانی ہی نہیں

    اپنی تاریخ کا عنوان بدلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    توڑ کر رسم کے بت بندِ قدامت سے نکل

    ضعفِ عشرت سے نکل وہمِ نزاکت سے نکل

    نفس کے کھینچے ہوئے حلقہء عظمت سے نکل

    قید بن جائے محبت، تو محبت سے نکل

    راہ کا خار ہی کیا گل بھی کچلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

    تو فلاطون و ارسطو ہے، تو زہرہ پروین

    تیرے قبضے میں ہےگردوں تری ٹھوکرمیں زمیں

    ہاں اُٹھا جلد اُٹھا، پائے مقدر سے جبیں

    میں بھی رکنے کا نہیں تو بھی رکنے کا نہیں

    لڑکھڑائے گی کہاں تک کہ سنبھلنا ہے تجھے

    اٹھ میری جان! میرے ساتھ ہی چلنا ہے تجھے

 

    

उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे – कैफ़ी आज़मी

 ۔

۔۔

उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 क़ल्ब-ए-माहौल[1] में लर्ज़ां[2] शरर-ए-जंग[3] हैं आज

 हौसले वक़्त के और ज़ीस्त[4] के यक-रंग हैं आज

 आबगीनों[5] में तपाँ[6] वलवला-ए-संग[7] हैं आज

 हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़[8] ओ हम-आहंगल[9] हैं आज

 जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन[10] की बहार

 तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार[11]

तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार[12]

ता-बा-कै[13] गिर्द तिरे वहम ओ तअय्युन[14] का हिसार[15]

कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत[16] से निकलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है

 तपती साँसों की हरारत[17] से पिघल जाती है

 पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

 बन के सीमाब[18] हर इक ज़र्फ़[19] में ढल जाती है

 ज़ीस्त[20] के आहनी[21] साँचे में भी ढलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 ज़िंदगी जोहद[22] में है सब्र के क़ाबू में नहीं

 नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं

 उड़ने खुलने में है निकहत[23] ख़म-ए-गेसू[24] में नहीं

 जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

 उस की आज़ाद रविश[25] पर भी मचलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 गोशे-गोशे[26] में सुलगती है चिता तेरे लिए

 फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा[27] तेरे लिए

 क़हर[28] है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए

 ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए

 रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 क़द्र अब तक तेरी तारीख़[29] ने जानी ही नहीं

 तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी[30] ही नहीं

 तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

 तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

 अपनी तारीख़ का उनवान[31] बदलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत[32] से निकल

 ज़ोफ़-ए-इशरत[33] से निकल वहम-ए-नज़ाकत[34] से निकल

 नफ़्स[35] के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत[36] से निकल

 क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल

 राह का ख़ार[37] ही क्या गुल[38] भी कुचलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तोड़ ये अज़्म-शिकन[39] दग़दग़ा-ए-पंद[40] भी तोड़

 तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद[41] भी तोड़

 तौक़[42] ये भी है ज़मुर्रद[43] का गुलू-बंद भी तोड़

 तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद[44] भी तोड़

 बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 तू फ़लातून[45] ओ अरस्तू है तू ज़ेहरा[46] परवीं[47]

तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं

[48] तिरी ठोकर में ज़मीं

 हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर[49] से जबीं[50]

मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं

 लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे

 उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे

اب حرف تمانا کو سماعت نہ ملےگی۔۔۔۔پیرزادہ قاسم

 

 .

 

اب حرف تمنا کو سماعت نہ ملے گی

بیچوگے اگر خواب تو قیمت نہ ملے گی

۔

تشہیر کے بازار میں اے تازہ خریدار

زیبائشیں مل جائیں گی قامت نہ ملے گی

۔

لمحوں کے تعاقب میں گزر جائیں گی صدیاں

یوں وقت تو مل جائے گا مہلت نہ ملے گی

۔

سوچا ہی نہ تھا یوں بھی اسے یاد رکھیں گے

جب اس کو بھلانے کی بھی فرصت نہ ملے گی

۔

تا عمر وہی کار زیاں عشق رہا یاد

حالانکہ یہ معلوم تھا اجرت نہ ملے گی

۔

تعبیر نظر آنے لگی خواب کی صورت

اب خواب ہی دیکھو گے بشارت نہ ملے گی

۔

آئینہ صفت وقت ترا حسن ہیں ہم لوگ

کل آئنے ترسیں گے تو صورت نہ ملے گی

 

समाअत न मिलेगी…पीरजादह क़सिम

अब हर्फ़-ए-तमन्ना को समाअत न मिलेगी

बेचोगे अगर ख़्वाब तो क़ीमत न मिलेगी

۔

तशहीर के बाज़ार में ऐ ताज़ा ख़रीदार

ज़ेबाइशें मिल जाएँगी क़ामत न मिलेगी

۔

लम्हों के तआक़ुब में गुज़र जाएँगी सदियाँ

यूँ वक़्त तो मिल जाएगा मोहलत न मिलेगी

۔

सोचा ही न था यूँ भी उसे याद रखेंगे

जब उस को भुलाने की भी फ़ुर्सत न मिलेगी

۔

ता-उम्र वही कार-ए-ज़ियाँ इश्क़ रहा याद

हालाँकि ये मालूम था उजरत न मिलेगी

۔

ताबीर नज़र आने लगी ख़्वाब की सूरत

अब ख़्वाब ही देखोगे बशारत न मिलेगी

۔

आईना-सिफ़त वक़्त तिरा हुस्न हैं हम लोग

कल आइने तरसेंगे तो सूरत न मिलेगी

ابابیل نہیں آئیں۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

Posted by: Bagewafa | دسمبر 5, 2017

नेहरू —- कैफ़ी आज़मी

नेहरू —- कैफ़ी आज़मी

मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं

फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला

जैसे सहरा में चश्मा कहीं

या समुन्दर में मीनार-ए-नूर

या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में

फ़िक्र सदियों अकेली अकेली रही

ज़ेहन सदियों अकेला अकेला मिला

 

और अकेला अकेला भटकता रहा

हर नए हर पुराने ज़माने में वो

बे-ज़बाँ तीरगी में कभी

और कभी चीख़ती धूप में

चाँदनी में कभी ख़्वाब की

उस की तक़दीर थी इक मुसलसल तलाश

ख़ुद को ढूँडा किया हर फ़साने में वो

 

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई

क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा

ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो

ज़िंदगी का हो कोई जिहाद

वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद

सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

 

जिन तक़ाज़ों ने उस को दिया था जनम

उन की आग़ोश में फिर समाया न वो

ख़ून में वेद गूँजे हुए

और जबीं पर फ़रोज़ाँ अज़ाँ

और सीने पे रक़्साँ सलीब

बे-झिझक सब के क़ाबू में आया न वो

 

हाथ में उस के क्या था जो देता हमें

सिर्फ़ इक कील उस कील का इक निशाँ

नश्शा-ए-मय कोई चीज़ है

इक घड़ी दो घड़ी एक रात

और हासिल वही दर्द-ए-सर

उस ने ज़िन्दाँ में लेकिन पिया था जो ज़हर

उठ के सीने से बैठा न इस का धुआँ

۔دو غزلین نیرنگ خیال جون ۔1984۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی۔

آگرہ(اینڈیا)۔تسلیم اِلاہی زلفی

(CourtesyFacebook)

(Courtesy:Shahafat 17Nove.17)

تیر کی طرح سے آغوش کماں تک آؤ……علی سردار جعفری

.

میں جہاں تم کو بلاتا ہوں وہاں تک آؤ

میری نظروں سے گزر کر دل وجاں تک آؤ

.

پھر یہ دیکھو که زمانے کی ہوا ہے کیسی

ساتھ میرے میرے فردوس جواں تک آؤ

.

تیغ کی طرح چلو چھوڑ کے آغوش نیام

تیر کی طرح سے آغوش کماں تک آؤ

.

پھول کے گرد فرو باغ میں مانند نسیم

مثل پروانہ کسی شم تپاں تک آؤ

.

لو وہ صدیوں کے جہنم کی حدیں ختم ہوئی

اب ہے فردوس ہی فردوس جہاں تک آؤ

.

چھوڑ کر وہم وگماں حسن یقیں تک پہنچو

پر یقیں سے بھی کبھی وہم وگماں تک آؤ

 .

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तीर की तरह से आगोश-ए-कमां तक आओ…..अली सरदार जाफरी

 

.

मैं जहां तक तुम को बुलाता हूं, वहां तक आओ

मेरी नजरों से गुजर कर, दिल-ओ-जां तक आओ

.

फिर ये देखो कि, जमाने की हवा है कैसी

साथ मेरे, मेरे फिरदौस-ए-जवां तक आओ

.

तेग की तरह चलो छोड़ के आगोश-ए- नियाम

तीर की तरह से आगोश-ए-कमां तक आओ

.

फूल के गिर्द फिरो बाग में मानिंद-ए-नसीम

मिस्ल-ए-परवाना किसी शाम-ए-तपन तक आओ

.

लो वो सदियों के जहन्नम की हदें खत्म हुईं

अब है फिरदौस ही फिरदौस जहां तक आओ

.

छोड़ कर वहम-ओ-गुमान, हुस्न-ए-यकीं तक पहुंचो

पर यकीं से भी कभी वहम-ओ-गुमां तक आओ

सच_न_बोलना ☆ बाबा नागार्जुन |

 

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,

डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!

जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!

सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!

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जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है

भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!

बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे

जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।

.

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,

फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!

बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!

भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

 .

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,

अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!

सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर

एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

 .

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,

देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!

जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,

काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

 .

माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!

बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!

मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,

ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

 .

रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,

कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!

नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,

जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!

 .

सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,

भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!

माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,

हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!

क़त्लगाह पर —- शकील क़ादरी

 

कातिल को है ग़ुरूर बहुत क़त्लगाह पर

लेकिन फ़क़ीर की है नज़र ख़ानक़ाह पर

.

इल्ज़ाम रौशनी के परिंदों के क़त्ल का

साबित करोगे कैसे? है आलमपनाह पर

 .

लगता है उस की आँखों में महेफ़ूज़ है हया

पर्दा जो डालता है किसी के गुनाह पर

.

इन्सानीयत का चाहने वाला हूँ इस लिये

सब कुछ लुटा रहा हूँ किसी की निगाह पर

 .

जितने परिंदे ज़ख़्मी हैं तीरों से सब के सब

इल्ज़ाम ज़ख़्म देने का धरते हैं शाह पर

 .

मैं हूँ फ़क़ीर कासे में अपना ही सर लिये

बेख़ौफ़ चल रहा हूँ ख़ुदा तेरी राह पर

 .

इन्साफ़ की तवक़्क़ो अदालत से क्या रखें

उसने यक़ीन कर लिया झूटे गवाह पर

.

लगता है शाह को है परिंदों से दुश्मनी

नोंचे हुए पड़े हैं यहाँ गाह-गाह पर

 .

नटवर था श्याम और सियाहफ़ाम थे बिलाल

फिर नाज़ क्यूँ न हो मुझे रंगे-सियाह पर

 .

सरमद का मैं मुरीद हूँ कहेता हूँ शान से

अल्लाह पर यक़ीं है, नहीं बादशाह पर

 .

होने न देगी ज़ुल्म किसी पर ‘शकील’ अब

है मुझ को एतेबार वतन की सिपाह पर

قتل گاہ پر۔۔۔۔۔۔ شکیل قادری

قاتل کو ہے غرور بہت قتل گاہ پر

لیکن فقیر کی ہے نظر خانقاہ پر

.

الزام روشنی کے پرندوں کے قتل کا

ثابت کروگے کیسے؟ ہے عالمپناہ پر

 .

لگتا ہے اس کی آنکھوں میں محیفوز ہے حیا

پردہ جو ڈالتا ہے کسی کے گناہ پر

 .

انسانیت کا چاہنے والا ہوں اس لئے

سب کچھ لٹا رہا ہوں کسی کی نگاہ پر

.

جتنے پرندے زخمی ہیں تیروں سے سب کے سب

الزام زخم دینے کا دھرتے ہیں شاہ پر

 .

میں ہوں فقیر کاسے میں اپنا ہی سر لئے

بیخوف چل رہا ہوں خدا تیری راہ پر

 .

انصاف کی توقع عدالت سے کیا رکھیں

اسنے یقین کر لیا جھوٹے گواہ پر

 .

لگتا ہے شاہ کو ہے پرندوں سے دشمنی

نونچے ہوئے پڑے ہیں یہاں گاہ گاہ پر

 .

نٹ ور تھا شیام اور سیاہ فام تھے بلال

پھر ناز کیوں نہ ہو مجھے رنگے سیاہ پر

 .

سرمد کا میں مرید ہوں کہیتا ہوں شان سے

اللہ پر یقیں ہے، نہیں بادشاہ پر

 .

ہونے نہ دیگی ظلم کسی پر ‘شکیل’ اب

 ہے مجھکو اِعتبار  وطن کے سپا ہ پر

ہاتھ خالی ہیں ترے شہر سے جاتے جاتے….. راحتؔ اندوری

.

ہاتھ خالی ہیں ترے شہر سے جاتے جاتے

جان ہوتی تو مری جان لٹاتے جاتے

..

اب تو ہر ہاتھ کا پتھر ہمیں پہچانتا ہے

عمر گزری ہے ترے شہر میں آتے جاتے

.

اب کے مایوس ہوا یاروں کو رخصت کر کے

جا رہے تھے تو کوئی زخم لگاتے جاتے

.

رینگنے کی بھی اجازت نہیں ہم کو ورنہ

ہم جدھر جاتے نئے پھول کھلاتے جاتے

.

میں تو جلتے ہوئے صحراؤں کا اک پتھر تھا

تم تو دریا تھے مری پیاس بجھاتے جاتے

.

مجھ کو رونے کا سلیقہ بھی نہیں ہے شاید

لوگ ہنستے ہیں مجھے دیکھ کے آتے جاتے

.

ہم سے پہلے بھی مسافر کئی گزرے ہوں گے

کم سے کم راہ کے پتھر تو ہٹاتے جاتے

ہहाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते—- राहत इंदौरी

 

.

 हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते

 जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते

.

 अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है

 उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते-जाते

.

 अब के मायूस हुआ यारों को रुख़स्त कर के

 जा रहे थे तो कोई ज़ख़म लगाते जाते

.

 रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वर्ना

 हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते

.

 मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था

 तुम तो दरिया थे मरी प्यास बुझाते जाते

.

 मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद

 लोग हंसते हैं मुझे देख के आते-जाते

.

 हमसे पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे

 कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 28, 2017

آستانے تلاش کرتاہے۔۔۔۔۔عرشد عثمانی

آستانے تلاش کرتاہے۔۔۔۔۔ارشد عثمانی

بیگانہ ملا۔۔۔۔کلیم عاجز

 

آشنا غم سے ملا راحت سے بیگانہ ملا

دل بھی ہم کو خوبیٔ قسمت سے دیوانہ ملا

۔

بلبل و گل شمع و پروانہ کو ہم پر رشک ہے

۔درد جو ہم کو ملا سب سے جدا گانہ ملا

۔

ہم نے ساقی کو بھی دیکھا پیر مے خانہ کو بھی

کوئی بھی ان میں نہ راز آگاہ مے خانہ ملا

۔

سب نے دامن چاک رکھا ہے بقدر احتیاج

ہم کو دیوانوں میں بھی کوئی نہ دیوانہ ملا

۔

ہم تو خیر آشفتہ ساماں ہیں ہمارا کیا سوال

وہ تو سنوریں جن کو آئینہ ملا شانہ ملا

۔

کیا قیامت ہے کہ اے عاجزؔ ہمیں اس دور میں

طبع شاہانہ ملی منصب فقیرانہ ملا  

राहत से बेगाना मिला—–कलीम आजिज़

 

आश्ना ग़म से मिला राहत से बेगाना मिला

दिल भी हम को ख़ूबी-ए-क़िस्मत से दीवाना मिला

۔

बुलबुल-ओ-गुल शम-ओ-परवाना को हम पर रश्क है

दर्द जो हम को मिला सब से जुदा-गाना मिला

۔

हम ने साक़ी को भी देखा पीर-ए-मय-ख़ाना को भी

कोई भी इन में न राज़-आगाह-ए-मय-ख़ाना मिला

۔

सब ने दामन चाक रक्खा है ब-क़द्र-ए-एहतियाज

हम को दीवानों में भी कोई न दीवाना मिला

۔

हम तो ख़ैर आशुफ़्ता-सामाँ हैं हमारा क्या सवाल

वो तो सँवरें जिन को आईना मिला शाना मिला

۔

क्या क़यामत है कि ऐ ‘आजिज़’ हमें इस दौर में

तब्अ’ शाहाना मिली मंसब फ़क़ीराना मिला

दुनिया का महान इस्लामी विश्वविद्यालय.. दारुल उलूम देवबन्द

इस्लामी दुनिया में दारुल उलूम देवबन्द का एक विशेष स्थान है जिसने पूरे क्षेत्र को ही नहीं, पूरी दुनिया के मुसलमानों को परभावित किया है। दारुल उलूम देवबन्द केवल इस्लामी विश्वविद्यालय ही नहीं एक विचारधारा है, जो अंधविश्वास, कूरीतियों व अडम्बरों के विरूद्ध इस्लाम को अपने मूल और शुद्ध रूप में प्रसारित करता है। इसलिए मुसलमानों में इस विचाधारा से प्रभावित मुसलमानों को ”देवबन्दी“ कहा जाता है।

देवबन्द उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण नगरों में गिना जाता है जो आबादी के लिहाज़ से तो एक लाख से कुछ ज़्यादा आबादी का एक छोटा सा नगर है। लेकिन दारुल उलूम ने इस नगर को बड़े-बड़े नगरों से भारी व सम्मानजनक बना दिया है, जो न केवल अपने गर्भ में एतिहासिक पृष्ठ भूमि रखता है, अपितु आज भी साम्प्रदायिक सौहार्द, धर्मनिरपेक्षता एवं देशप्रेम का एक अजीब नमूना प्रस्तुत करता है।

आज देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति व इस्लामी शिक्षा एवं संस्कृति में जो समन्वय आज हिन्दुस्तान में देखने को मिलता है उसका सीधा-साधा श्रेय देवबन्द दारुल उलूम को जाता है। यह मदरसा मुख्य रूप से उच्च अरबी व इस्लामी शिक्षा का केंद्र बिन्दु है। दारुल उलूम ने न केवल इस्लामिक शोध व सहित्य के संबंध में विशेष भूमिका निभायी है, बल्कि भारतीय पर्यावरण में इस्लामिक सोच व संस्कृति को नवीन आयाम तथा अनुकूलन दिया है।

दारुल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी द्वारा रखी गयी थी। वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेज़ों के विरूद्ध लड़े गये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी न पाये थे और अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज़ कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रेजों ने अपनी संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गये थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के प्रहार होने लगे थे। चारो ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जाये, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्षा जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्षा की जाये। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज उस समय तक विशाल एवं ज़ालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुक़ाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाये। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवश्यकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवश्यकता थी जो धर्म व जाति से उपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें।

इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढ़ाया उनमें दारुल उलूम देवबन्द के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। स्वर्गीये मौलाना महमूद हसन (विख्यात अध्यापक व संरक्षक दारुल उलूम देवबन्द) उन सैनानियों में से एक थे जिनके क़लम, ज्ञान, आचार व व्यवहार से एक बड़ा समुदाय प्रभावित था, इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शैखुल हिन्द (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभूषित किया गया था, उन्हों ने न केवल भारत में वरन विदेशों (अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र) में जाकर भारत व ब्रिटिश साम्राज्य की भत्र्सना की और भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध जी खोलकर अंग्रेज़ी शासक वर्ग की मुख़ालफत की। बल्कि शेखुल हिन्द ने अफ़ग़ानिस्तान व इरान की हकूमतों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उदाहरणतयः यह कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व इरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध लड़ने पर तैयार हो तो ज़मीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।

शेखुल हिन्द ने अपने सुप्रिम शिष्यों व प्रभावित व्यक्तियों के मध्यम से अंग्रेज़ के विरूद्ध प्रचार आरंभ किया और हजारों मुस्लिम आंदोलनकारियों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल कर दिया। इनके प्रमुख शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबैदुल्ला सिंधी थे जो जीवन पर्यन्त अपने गुरू की शिक्षाअों पर चलते रहे, और अपने देशप्रेमी भावनाओं व नीतियों के कारण ही भारत के मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों व आंदोलनकारियों में एक भारी स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं।

सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की स्र्वप्रथम स्वंतत्र सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना गया। यहीं पर रहकर उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की एक शाख क़ायम की जो बाद में (1922 ई. में) मूल कांग्रेस संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस में विलय कर दी गयी। शेखुल हिन्द 1915 ई. में हिजाज़ (सऊदी अरब का पहला नाम था) चले गये, उन्होने वहां रहते हुए अपने साथियों द्वारा तुर्की से संपर्क बना कर सैनिक सहायता की मांग की।

सन 1916 ई. में इसी संबंध में शेखुल हिन्द इस्तमबूल जाना चहते थे। मदीने में उस समय तुर्की का गवर्नर ग़ालिब पाशा तैनात था उसने शेखुल हिन्द को इस्तमबूल के बजाये तुर्की जाने की लिए कहा परन्तु उसी समय तुर्की के युद्धमंत्री अनवर पाशा हिजाज़ पहुंच गये।

शेखुल हिन्द ने उनसे मुलाक़ात की और अपने आंदोलन के बारे में बताया। अनवर पाशा ने भातियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और अंग्रेज साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध करने की एक गुप्त योजना तैयार की। हिजाज़ से यह गुप्त योजना, गुप्त रूप से शेखुल हिन्द ने अपने शिष्य मौलाना उबैदुल्ला सिंधी को अफगानिस्तान भेजा, मौलाना सिंधी ने इसका उत्तर एक रेशमी रूमाल पर लिखकर भेजा, इसी प्रकार रूमालों पर पत्र व्यवहार चलता रहा। यह गुप्त सिलसिला ”तहरीक ए रेशमी रूमाल“ के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। इसके सम्बंध में सर रोलेट ने लिखा है कि “ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों पर हक्का बक्का थी“।

सन 1916 ई. में अंग्रेज़ों ने किसी प्रकार शेखुल हिन्द को मदीने में गिरफ्तार कर लिया। हिजाज़ से उन्हें मिश्र लाया गया और फिर रोम सागर के एक टापू मालटा में उनके साथयों मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उज़ैर गुल हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद सहित जेल में डाल दिया था। इन सबको चार वर्ष की बामुशक्कत सजा दी गयी। सन 1920 में इन महान सैनानियों की रिहाई हुई।

शेखुल हिन्द की अंग्रेजों के विरूद्ध तहरीके-रेशमी रूमाल, मौलाना मदनी की सन 1936 से सन 1945 तक जेल यात्रा, मौलाना उजै़रगुल, हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद का मालटा जेल की पीड़ा झेलना, मौलाना सिंधी की सेवायें इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण हैं कि दारुल उलूम ने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई है। इस संस्था ने ऐसे अनमोल रत्न पैदा किये जिन्होंने अपनी मात्र भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया। ए. डब्ल्यू मायर सियर पुलिस अधीक्षक (सीआई़डी राजनैतिक) पंजाब ने अपनी रिपोर्ट नं. 122 में लिखा था जो आज भी इंडिया आफिस लंदन में सुरक्षित है कि ”मौलाना महमूद हसन (शेखुल हिन्द) जिन्हें रेशमी रूमाल पर पत्र लिखे गये, सन 1915 ई. को हिजरत करके हिजाज़ चले गये थे, रेशमी ख़तूत की साजिश में जो मौलवी सम्मिलित हैं, वह लगभग सभी देवबन्द स्कूल से संबंधित हैं।

गुलाम रसूल मेहर ने अपनी पुस्तक ”सरगुज़स्त ए मुजाहिदीन“ (उर्दू) के पृष्ठ नं. 552 पर लिखा है कि ”मेरे अध्ययन और विचार का सारांश यह है कि हज़रत शेखुल हिन्द अपनी जि़न्दगी के प्रारंभ में एक रणनीति का ख़ाका तैयार कर चुके थे और इसे कार्यान्वित करने की कोशिश उन्होंने उस समय आरंभ कर दी थी जब हिन्दुस्तान के अंदर राजनीतिक गतिविधियां केवल नाममात्र थी“।

उड़ीसा के गवर्नर श्री बिशम्भर नाथ पाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि दारुल उलूम देवबन्द भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केंद्र बिन्दु जैसा ही था, जिसकी शाखायें दिल्ली, दीनापुर, अमरोत, कराची, खेडा और चकवाल में स्थापित थी। भारत के बाहर उत्तर पशिमी सीमा पर छोटी सी स्वतंत्र रियासत ”यागि़स्तान“ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था, यह आंदोलन केवल मुसलमानों का न था बल्कि पंजाब के सिक्खों व बंगाल की इंकलाबी पार्टी के सदस्यों को भी इसमें शामिल किया था।

इसी प्रकार असंख्यक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दारुल उलूम देवबन्द स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भी देश प्रेम का पाठ पढ़ता रहा है जैसे सन 1947 ई. में भारत को आज़ादी तो मिली, परन्तु साथ-साथ नफरतें आबादियों का स्थानांतरण व बंटवारा जैसे कटु अनुभव का समय भी आया, परन्तु दारुल उलूम की विचारधारा टस से मस न हुई। इसने डट कर इन सबका विरोध किया और इंडियन नेशनल कांग्रेस के संविधान में ही अपना विश्वास व्यक्त कर #पाकिस्तान का विरोध किया तथा अपने देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण दिया। आज भी दारुल उलूम अपने देशप्रेम की विचार धारा के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।

दारुल उलूम #देवबन्द में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा, भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है। दारुल उलूम देवबन्द ने अपनी स्थापना से आज (हिजरी 1283 से 1424) सन 2002 तक लगभग 95 हजार महान विद्वान, लेखक आदि पैदा किये हैं।

दारुल उलूम में इस्लामी दर्शन, अरबी, फारसी, उर्दू की शिक्षा के साथ साथ किताबत (हाथ से लिखने की कला) दर्जी का कार्य व किताबों पर जिल्दबन्दी, उर्दू, अरबी, अंग्रेज़ी, हिन्दी में कम्प्यूटर तथा उर्दू पत्रकारिता का कोर्स भी कराया जाता है। दारुल उलूम में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा व साक्षात्कार से गुज़रना पड़ता है। प्रवेश के बाद शिक्षा मुफ्त दी जाती है।

दारुल उलूम देवबन्द ने अपने दार्शन व विचारधारा से मुसलमानों में एक नई चेतना पैदा की है जिस कारण देवबन्द स्कूल का प्रभाव भारतीय महादीप पर गहरा है।

#IndianMuslims

پتھروں کا نگر ہے بچا آئینہ۔۔۔۔۔۔۔ قمرایجاز

 

پتھروں کا نگر ہے ؛ بچا آئینہ ،

کر رہا ہے یہی التجا آئینہ

دیکھ کر لوگ تجھ کو سنورنے لگے،

اپنے کردار کو تو بنا آئینہ

گھر کے آئینے کی قدر گھٹ جائیگی ،

لایا بازار سے گر نیا آئینہ

بھید چہرے کے کھل جائیں گے دیکھنا،

سامنے جب تیرے آئیگا آئینہ

لاکھ چہرے کو اپنے چھپائے مگر،

جانتا ہے تیری ہر ادا آئینہ

ہر طرف بےظمیروں کا بازار ہے،

تو کسی کو وہاں نہ دکھا آئینہ

آئینہ تجھ سے کہتا ہے ایجاز یہ ،

پہلے خود دیکھ،لے پھر دکھا آئینہ

पत्थरों का नगर है बचा आईना…….कमर एजाझ

पत्थरों का  नगर  है ; बचा आईना ,

कर रहा  है  यही  इल्तिजा  आईना  !

देख कर लोग  तुझको  सँवरने लगे,

अपने क़िरदार को तू  बना  आईना  !

घर के आईने की  क़द्र  घट जाएगी ,

लाया बाज़ार  से गर  नया  आईना !

भेद चेहरे   के   खुल जायेंगे  देखना,

सामने जब   तेरे   आयेगा  आईना  !

लाख चेहरे  को अपने छुपाये  मगर,

जानता है   तेरी  हर  अदा   आईना  !

हर तरफ  बे-ज़मीरों का  बाज़ार  है,

तू किसीको  वहाँ  न दिखा  आईना  !

आईना तुझसे  कहता है ये  झाजिये ,

पहेले खुद देख,ले फिर दिखा आईना !

***

 

 

 

 

آشناغم سے ملا راحت سے بیگانہ ملا……..کلیم عاجز

آآشنا غم سے ملا راحت سے بیگانہ ملا

دل بھی ہم کو خوبیٔ قسمت سے دیوانہ ملا

.

بلبل و گل شمع و پروانہ کو ہم پر رشک ہے

درد جو ہم کو ملا سب سے جدا گانہ ملا

.

ہم نے ساقی کو بھی دیکھا پیر مے خانہ کو بھی

کوئی بھی ان میں نہ راز آگاہ مے خانہ ملا

.

سب نے دامن چاک رکھا ہے بقدر احتیاج

ہم کو دیوانوں میں بھی کوئی نہ دیوانہ ملا

.

ہم تو خیر آشفتہ ساماں ہیں ہمارا کیا سوال

وہ تو سنوریں جن کو آئینہ ملا شانہ ملا

.

کیا قیامت ہے کہ اے عاجزؔ ہمیں اس دور میں

طبع شاہانہ ملی منصب فقیرانہ ملا   

आश्ना ग़म से मिला राहत से बेगाना मिला—–कलीम आजिज़

 

आश्ना ग़म से मिला राहत से बेगाना मिला

दिल भी हम को ख़ूबी-ए-क़िस्मत से दीवाना मिला

.

बुलबुल-ओ-गुल शम-ओ-परवाना को हम पर रश्क है

दर्द जो हम को मिला सब से जुदा-गाना मिला

.

हम ने साक़ी को भी देखा पीर-ए-मय-ख़ाना को भी

कोई भी इन में न राज़-आगाह-ए-मय-ख़ाना मिला

.

सब ने दामन चाक रक्खा है ब-क़द्र-ए-एहतियाज

हम को दीवानों में भी कोई न दीवाना मिला

.

हम तो ख़ैर आशुफ़्ता-सामाँ हैं हमारा क्या सवाल

वो तो सँवरें जिन को आईना मिला शाना मिला

.

क्या क़यामत है कि ऐ ‘आजिज़’ हमें इस दौर में

तब्अ’ शाहाना मिली मंसब फ़क़ीराना मिला

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 19, 2017

AMU Tarana(Aligharh Muslim University)…..Asrarul Haque "Mjaz”

AMU Tarana(Aligharh Muslim University)…..Asrarul Haque "Mjaz”

majaz[1]

یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں
یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں
سرشارنگاہ نرگس ہوں، پابستہء گیسوئے سنبل ہوں

یہ میرا چمن
یہ میرا چمن
یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

جو طاق حرم میں روشن ہے، وہ شمع یہاں بھی جلتی ہے
اس دشت کے گوشے گوشے سے، اک جوئے حیات ابلتی ہے
یہ دشت جنوں دیوانوں کا، یہ بزم وفا پروانوں کی
یہ شہر طرب رومانوں کا، یہ خلد بریں ارمانوں کی
فطرت نے سکھائی ہے ہم کو، افتاد یہاں پرواز یہاں
گائے ہیں وفا کے گیت یہاں، چھیڑا ہے جنوں کا ساز یہاں

یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

اس بزم میں تیغیں کھینچیں ھیں، اس بزم میں ساغر توڑے ہیں
اس بزم میں آنکھ بچھائی ہے، اس بزم میں دل تک جوڑے ہیں
ہر شام ہے شام مصر یہاں، ہر شب ہے شب شیراز یہاں
ہے سارے جہاں کا سوز یہاں، اور سارےجہاں کا ساز یہاں
زرات کا بوسہ لینے کو، سو بار جھکا آکاش یہاں
خود آنکھ سے ہم نے دیکھی ہے، باطل کی شکست فاش یہاں

یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں
یہ میرا چمن
یہ میرا چمن
یہ میرا چمن ہےمیرا چمن، میں اپنے چمن کا بلبل ہوں

جو ابر یہاں سے اٹھے گا، وہ سارے جہاں پر برسے گا
ہر جوئے رواں پر برسے گا، ہر کوہ گراں پر بارسے گا
ہر سروثمن پر بر سے گا، ہر دشت و دمن پر برسے گا
خود اپنے چمن پر برسے گا، غیروں کے چمن پر برسے گا
ہر شہر طرب پر گرجے گا، ہر قصر طرب پر کڑکے گا

یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے گا
یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے گا
یہ ابر ہمیشہ برسا ہے، یہ ابر ہمیشہ برسے گا
برسے گا، برسے گا، برسے گا۔

از: اسرار الحق مجاز لکھنؤی

नज़र-ए-अलीगढ़
असरारुल हक़ मजाज़

सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरिगस हूँ, पाबस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूँ।
ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ।

हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है।

जो ताक़-ए-हरम में रौशन है, वो शमआ यहाँ भी जलती है।
इस दत के गोशे-गोशे से, इक जू-ऐ-हयात उबलती है।

इस्लाम के इस बुत-ख़ाने में, अस्नाम भी है और आज़र भी।
तहज़ीब के इस मैख़ाने में, शमशीर भी है और साग़र भी।

याँ हुस्न की बर्क़ चमकती है, या नूर की बारिश होती है।
हर आह यहाँ एक नग़मा है, हर अश्क़ यहाँ इक मोती है।

हर शाम है, शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है, शब-ए-शीराज़ यहाँ।
है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ, और सारे जहाँ का साज़ यहाँ।

ये दश्ते जुनूं दीवानों का, ये बज़्मे वफ़ा परवानों की।
ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों की।

फ़ितरत ने सिखाई है हमको, उफ़ताद यहाँ परवाज़ यहाँ।
गाए हैं वफ़ा के गीत यहाँ, छेड़ा है जुनूं का साज़ यहाँ।

इस फ़र्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं।
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं।

इस बज़्म में तेगें खींची हैं, इस बज़्म में सागर तोड़े हैं।
इस बज़्म में आँख बिछाई है, इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैं।

इस बज़्म में नेजे़ फेंके हैं, इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैं।
इस बज़्म में गिरकर तड़पे हैं, इस बज़्म में पीकर झूमे हैं।

आ-आके हज़ारों बार यहाँ, खुद आग भी हमने लगाई है।
फिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हम ही ने बुझाई है।

याँ हमने कमंदें डाली हैं याँ हमने शबख़ूँ मारे हैं।
याँ हमने क़बाएँ नोची हैं, याँ हमने ताज उतारे हैं।

हर आह है ख़ुद तासीर यहाँ, हर ख़्याब है ख़ुद ताबीर यहाँ।
तदबीर के पाए संगी पर, झुक जाती है तक़दीर यहाँ।

ज़र्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ।
ख़ुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ।

इस गुल कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली है।
फिर अब्र गरजने वाला है, फिर बर्क़ कड़कने वाली है।

जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा।
हर जू-ऐ-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा।

हर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा।
ख़ुद अपने चमन पर बरसेगा, ग़ैरों के चमन पर बरसेगा।

हर शहर-ए-तरब पर गरजेगा, हर क़स्रे तरब पर कड़केगा।
ये अब्र हमेशा बरसा है, ये अब्र हमेशा बरसेगा।
(1936)

Published on May 17, 2008

AMU Tarana — composed by Asrar-ul-Haque "Majaz” and music by Khan Ishtiaque. This is Rev 1 — with better quality Audio that is provided by Mr. Ahmad Zaib (Alig).

آیئنہ بات کرنے پہ مجبور ہو گیا۔۔۔۔۔۔بشیر بدر

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया —-बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया

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कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के

दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

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महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये

लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया

.

तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना

आईना बात करने पे मज़बूर हो गया

.

सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल

वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया

.

कुछ फल जरूर आयेंगे रोटी के पेड़ में

जिस दिन तेरा मतालबा मंज़ूर हो गया

 

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 13, 2017

محبت اب نہیں ہو گی۔۔۔ منیر نیا زی

محبت اب نہیں ہو گی۔۔۔ منیر نیا زی

محبت اب نہیں ہو گی

یہ کچھ دن بعد میں ہو گی

ستا رے جو دمکتے ہیں

 کِسی کی چشمِ حیراں میں

 ملا قا تیں جو ہو تی ہیں

 جمال ابر و باراں میں

 یہ نا آباد وقتوں میں

 دل نا شا د میں ہو گی

 محبت اب نہیں ہو گی

 یہ کچھ دن بعد میں ہو گی

 گزر جا ئیں گے جب یہ دن

 یہ اُن کی یا د میں ہو گی

URDU

 

سنا ہے لوگ اُسے آنکھ بھر کے دیکھتے ہیں ۔۔۔۔۔احمد فراز

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         سُنا ہے لوگ اُسے آنکھ بھر کے دیکھتے ہیں

        سو اُس کے شہر میں کچھ دن ٹھہر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے بولے تو باتوں سے پھول جھڑتے ہیں

        یہ بات ہے تو چلو بات کر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے ربط ھے اُس کو خراب حالوں سے

        سو اپنے آپ کو برباد کر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے دن میں اُسے تتلیاں ستاتی ہیں

        سُنا ہے رات کو جگنو ٹھہر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کے بدن کی تراش ایسی ہے

        کہ پھول اپنی قبائیں کتر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُسے بھی ہے شعر و شاعری سے شغف

        سو ہم بھی معجزے اپنے ھُنر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے درد کی گاہگ ہے چشمِ ناز اُس کی

        سو ہم بھی اُس کی گلی سے گزر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے حشر ہیں اُس کی غزال سی آنکھیں

        سُنا ہے اُس کو ہرن دشت بھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کی سیاہ چشمگیں قیامت ہے

        سو اُس کو سُرمہ فروش آہ بھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے رات اُسے چاند تکتا رہتا ہے

        ستارے بامِ فلک سے اُتر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے رات سے بڑھ کر ہیں کاکلیں اُس کی

        سُنا ہے شام کو سائے گزر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کے لبوں سے گلاب جلتے ہیں

        سو ہم بہار پر الزام دھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے اُس کے شبستاں سے مُتصل ہے بہشت

        مکیں اُدھر کے بھی جلوے اِدھر کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے آئینہ تمثال ہے جبیں اُس کی

        جو سادہ دل ہیں اُسے بن سنور کے دیکھتے ہیں

        سُنا ہے چشمِ تصور سے دشتِ اِمکاں میں

        پلنگ زاویے اُس کی کمر کے دیکھتے ہیں

        رُکے تو گردشیں اُس کا طواف کرتی ہیں

        چلے تو اُس کو زمانے ٹھہر کے دیکھتے ہیں

        بس اِک نگاہ سے لُٹتا ہے قافلہ دل کا

        سو راہروانِ تمنّا بھی ڈر کے دیکھتے ہیں

        اب اُس کے شہر میں ٹھہریں یا کُوچ کر جائیں

        فراز آؤ ستارے سفر کے دیکھتے ہیں

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं۔۔۔۔۔۔۔۔अहमद फराज

 

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं

तो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना रब्त है उसको खराब हालो से

सो अपने आपको बरबाद करके देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक चश्म-ए-नाज़ उसकी

सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी का शग़फ़

तो हम भी मौजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं

सुना है रात उसे चांद तकता रहता है

सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियां सताती है

सुना है रात को जुग्नू ठहर के देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आंखें

सुना है उसको हिरन दश्त भर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर है काकलें उसकी

सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चशमगी क़यामत है

सो उसको सुर्मा फ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है जबसे हमाईल है उसकी गर्दन मे

मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बायें कतर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते है

तो हम बहार पे इलज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसील है जबीं उसकी

जो सादा दिल हैं उसे बन संवर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती है

चलें तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

कहानियां ही सही,सब मुबालग़े ही सही

अगर ये ख्वाब है ताबीर करके देखते हैं

शहजाद अहमद

BornApril 16, 1932, in Amritsar…..

He died in Lahore due to cardiac arrest on 2nd August 2012

रुखसत हुआ तो आँख मिलाकर नहीं गया- शहजाद अहमद को एक श्रद्धांजलि……. कुलदीप अंजुम

    चला गया वो सितारे खैरात करने वाला अदब का अज़ीम खिदमतगार

    रुखसत हुआ तो आँख मिलाकर नहीं गया

    वो क्यूँ गया है ये भी बताकर नहीं गया

    यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आयेगा

    जाते हुए चिराग बुझाकर नहीं गया

    बस इक लकीर खेंच गया दरमियान में

    दीवार रास्ते में बनाकर नहीं गया

    शायद वो मिल ही जाये मगर जुस्तजू है शर्त

    वो अपने नक़्शे पा तो मिटाकर नहीं गया

    घर में हैं आजतक वही खुशबू बसी हुई

    लगता है यूँ कि जैसे वो आकर नहीं गया

    रहने दिया न उसने किसी काम का मुझे

    और खाक में भी मुझको मिलाकर नहीं गया

अगर उर्दू अदब में आपकी जरा सी भी दिलचस्पी है तो आप शहजाद अहमद के नाम से ज़रूर वाकिफ होंगे.  इस महबूब शायर का पिछले दिनों अगस्त १ २०१२ बुधबार को इंतकाल हो गया . ३१ जुलाई को दफ्तर से लौटते वक़्त उन्हें दिल का दौरा पड़ा और अगले दिन इस महान फनकार ने हमारा साथ छोड़ दिया. करीब बीस साल पहले उन्हें पहली दफे दिल का दौरा पड़ा था पर उस समय वक़्त उनके साथ था . अपने आखिरी दिन तक वो "मजलिसे तरक्की ए अदब” के डारेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे .ये ओहदा उन्हें किब्लह अहमद नदीम कासमी साहब की अचानक मौत के बाद सौंपा गया था . आप इसी से अंदाज़ा लगा सकते हैं की शहजाद अहमद का कद क्या था और वो किस विरासत को साथ लेकर चल रहे थे . .तकरीबन तीस किताबें छपीं. जिनमें  कुछ तर्जुमा और कुछ फिलासफी से सम्बंधित थी पर ताउम्र उनका जोर उर्दू पोएट्री पर ही रहा . पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें देश के सबसे बड़े सिविल अवार्ड "प्राइड ऑफ परफार्मेंस(तमगा ए हुस्न ए करकरदगी)” से भी नवाज़ा .शहजाद अहमद की सबसे खास बात ये उन्होंने बुजुर्ग और नई नस्ल के बीच लिंक की तरह काम किया .उनके कलाम को इक तरफ जहाँ अदब के जनाब करों ने सराहा वही दूसरी ओर मजमे में भी उन्हें ग़ज़ल की मकबूलियत हासिल थी .अदब का ये अज़ीम खिदमतगार १६ जुलाई १९३२ के दिन अमृतसर में पैदा हुआ था .१९५६ में गवर्मेंट कालेज लाहोर से फिलॉसफी और साइकोलॉजी में डिग्री हासिल की . गोरा रंग , मीठी जुबान और साफ दिल उनकी शख्सियत का हिस्सा थे …उनका पहला मजमुआँ ‘सदफ’ १९५८ में शाया हुआ !

इतने बड़े शायर को कुछ पन्नों में समेटने की कोशिश नादानी होगी .फिर भी कुछ अशआर जो खासतौर पर मुझे पसंद हैं उनके मार्फत उस महान शायर को याद करने की कोशिश करते हैं-

    गुजरने ही न दी वो रात मैंने

    घडी पर रख दिया था हाथ मैंने

    फलक की रोक दी थी मैंने गर्दिश

    बदल डाले थे सब हालात मैंने

    फलक कशकोल लेके आ गया था

    सितारे कर दिए खैरात मैंने

शहजाद साहब की कही मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल ..

    शऊरे जात ने ये रस्म भी निबाही थी

    उसी को क़त्ल किया जिसने खैर चाही थी

    तुम्ही बताओ मैं अपने हक में क्या कहता

    मेरे खिलाफ भरे शहर की गवाही थी

    कई चरागनिहाँ थे चराग के पीछे

    जिसे निगाह समझते हो कमनिगाही थी

    तेरे ही लश्करियों ने उसे उजाड़ दिया

    वो सरज़मी जहाँ तेरी बादशाही थी

    इसीलिए तो ज़माने से बेनियाज़ था मैं

    मेरे बजूद के अन्दर मेरी तबाही थी

    तेरी जन्नत से निकाला हुआ इन्सान हूँ मैं

    मेर ऐजाज़ अज़ल ही से खताकारी है

    दो बलायें मेरी आँखों का मुकद्दर ‘शहजाद’

    एक तो नींद है और दूसरे बेदारी है

ग़ज़ल की खूबसूरती के लिहाज़ से इस ग़ज़ल की भला क्या मिसाल दी जा सकती है…

    वो मेरे पास है क्या पास बुलाऊँ उसको

    दिल में रहता है कहाँ ढूंढने जाऊँ उसको

    आज फिर पहली मुलाकात से आगाज़ करूँ

    आज फिर दूर से ही देखकर आऊँ उसको

    चलना चाहे तो रखे पाँव मेरे सीने पर

    बैठना चाहे तो आँखों पे बिठाऊँ उसको

    वो मुझे इतना सुबुक इतना सुबुक लगता है

    कभी गिर जाये तो पलकों से उठाऊँ उसको

पाकिस्तान ने अपना एक फिक्रमंद शायर खो दिया ये बात उनके इन दो अशआरों से ज़ाहिर हो जाती है …जो मैंने अलग -अलग गजलों से चुने हैं !

    मेरा कायद मेरी सोई हुई मिल्लत से कहता है

    बस अब तो नीद से जागो खुदारा दिन निकल आया

    यहाँ जुलूस है फरियाद करने वालों का

    जो सबसे आगे हैं वो आदमी यजीद का है

    वो मुल्क बेंचते हैं असलाह खरीदते हैं

    ये कारोबार हर इक दायमी यजीद का है

शहजाद अहमद ने जब दुनिया ऐ अदब में कदम रखा उस दौर में तरक्कीपसंद ग़ज़ल अपने पूरे शबाब पर थी . गज़ल के अमूमी रंग और घिसे पिटे मौज़ुआत से ग़ज़ल को आजाद करने वालों में से एक नुमायाँ नाम शहजाद अहमद का भी है . पचास की दहाई में मंज़रे आम पर आने वली पहली नसल के काफिले में अहमद फ़राज़ , मुनीर नियाजी , ज़मीलुद्दीन आली ,महशर बद्युनी, जौन एलिया ,नासिर काज़मी और शहजाद अहमद जैसे नाम शामिल थे. इक तरफ जहाँ जौन दुसरे शायरों के साथ तरक्की पसंद अदब के झंडाबरदार थे तो वहीँ शहजाद अहमद ज़फर इकबाल के साथ ज़दीद उर्दू ग़ज़ल का दामन थामे हुए थे. शहजाद अहमद की रोशन खयाली उन्हें औरो से जुदा करती है .

शहजाद अहमद बुनियादी तौर पर रूमान पसंद शायर थे. शुरूआती दौर में वो इसी रूप में मकबूलियत हासिल करते रहे बाद में उनके कहे में तमाम और फिक्र-ओ- फन शामिल हो गए . शहजाद अहमद को आज तक वह मुकाम आज तक नहीं मिला जिसके वह सही में हक़दार थे.  आँखों को सीपियाँ सिर्फ शहजाद अहमद ही कह सकते थे.

    शबे गम को सहर करना पड़ेगा

    बहुत लम्बा सफ़र करना पड़ेगा

    सबा नेज़े पे सूरज आ गया है

    ये दिन भी अब बसर करना पड़ेगा

    ये आंखें सीपियाँ हैं इसलिए भी

    हर आंसू को गोहर करना पड़ेगा

    उसे रुखसत ही क्यूँ होने दिया था

    ये गम अब उम्र भर करना पड़ेगा

    कहा तक दरबदर फिरते रहेंगे

    तुम्हारे दिल में घर करना पड़ेगा

    अभी तक जिसपे हम पछता रहे हैं 

    वही बारे दिगर करना पड़ेगा

    मुहब्बत में तुम्हे जल्दी बहुत है

    ये किस्सा मुक्तसर करना पड़ेगा

    बहुत आते हैं पत्थर हर तरफ से

    शज़र को बेसमर करना पड़ेगा

    अज़ाबे जाँ सही तरके ताल्लुक

    करेंगे हम अगर करना पड़ेगा

शहजाद अहमद ज़दीद और तरक्की पसंद दोनों के बीच से इंसानियत की बात करने वालों में से थे ….इंसानी फितरत ..दुखदर्द और इंसानी मसाइल की बातें उनके कलाम का अहम् हिस्सा हैं

    ज़लाया था मैंने दिया किसलिए

    बिफरने लगी है हवा किसलिए

    अगर जानते हो की तुम कौन हो

    उठाते हो फिर आइना किसलिए

    जो लिखा हुआ है वो होना तो है

    उठाते हो दस्ते दुआ किसलिए

    इसी काफिले का मुसाफिर हूँ मैं

    मेरा रास्ता है जुदा किसलिए

    बहुत मुख्तलिफ थी मेरी आरज़ू

    मुझे ये ज़माना मिला किसलिए

    भरी अंजुमन में अकेला हूँ मैं

    मगर ये नहीं जानता किसलिए

    मैं ‘शहजाद’ हर्फे गलत हूँ तो फिर

    मुझे उसने रहने दिया किसलिए

शायद ही किसी ने गुलाम अली साहब की आवाज़ में इस मशहूर ग़ज़ल को न सुना हो

    अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

    एक नज़र मेरी तरफ देख तेरा जाता क्या है

    मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक

    मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है

    पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको

    दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है

    सफरे शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे

    आंख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है

    उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले

    तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है

    मर गए प्यास के मारे तो उठा अबरे करम

    बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है

    मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता

    देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है

    तुझमे कुछ बल है दुनिया को बहाकर लेजा

    चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है

    तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उनपर

    जागने वालो को शहजाद जगाता क्या है 

    ईमाँ को एक बार भी जुम्बिश नहीं हुई

    सौ बार कूफ़ियों के कदम डगमगा गए

    हम इस ज़मीन को लाये हैं आसमानों से

    और इन्तिखाब किया है कई ज़हानो से

    यही जबाब मिला अब वतन ही सब कुछ है

    बहुत सवाल किये हमने नुक्तादानों से

    खुदा से उसका करम मांगते हैं हम शहजाद

    चलें तो आगे निकल जाएँ कारवानो से

    जो शज़र सूख गया है वो हरा कैसे हो

    मैं पयम्बर तो नहीं मेरा कहा कैसे हो

    जिसको जाना ही नहीं उसको खुदा क्यूँ मानें

    और जिसे जान चुके हैं वो खुदा कैसे हो

    दूर से देखके मैंने उसे पहचान लिया

    उसने इतना भी नहीं मुझसे कहा कैसे हो

    वो भी एक दौर जब मैंने उसे चाहा था

    दिल का दरवाज़ा है हर वक़्त खुला कैसे हो

    उम्र सारी तो अँधेरे में नहीं कट सकती

    हम अगर दिल न जलाएं तो ज़िया कैसे हो

    जिससे दो रोज भी खुलकर न मुलाकात हुई

    मुद्दतों बाद मिले भी तो गिला कैसे हो

शहजाद साहब उर्दू अदब में अपने नए बिम्ब और कहाँ के साथ आये

    अब तक उसकी मुहब्बत का नशा तारी है

    फूल बाकी नहीं खुशबू का सफ़र जारी है

    आज का फूल तेरी कोख से ज़ाहिर होगा

    शाखे दिल खुश्क न हो अबके तेरी बारी है

    ध्यान भी उसका है मिलते भी नहीं हैं उससे

    जिस्म से बैर है साये से वफादारी है

    इस तगो ताज में टूटे हाँ सितारे कितने

    आसमा जीत सका है न ज़मी हारी है

    कोई आया है अभी आंख तो खोलो शहजाद

    अभी जागे थे अभी सोने की तैयारी है

    धूप निकली है तो बदल की रिदा मांगते हो

    अपने साये में रहो गैर से क्या मांगते हो

    अरसा ऐ हश्र में बक्शिश की तमन्ना है तुम्हे

    तुमने जो कुछ न किया उसका सिला मांगते हो

    उसको मालूम है शहजाद वो सब जानता है

    किसलिए हाथ उठाते हो दुआ मांगते हो

    तय हमसे किसी तौर मुसाफत नहीं होती

    नाकाम पलटने की भी हिम्मत नहीं होती

    चोरी की तरह जुर्म है दौलत की हवस भी

    वो हाथ कटें जिनसे सखावत नहीं होती

    जिंदानिओं क्यूँ अपना गला कट रहे हो

    मरना तो रिहाई की ज़मानत नहीं होती

    जो तूने दिया है वही लौटायेंगे तुझको

    हमसे तो इमानत में खयानत नहीं होती

    किस बेतलबी से मैं तुझे देख रहा हूँ

    जैसे मेरे दिल में कोई हसरत नहीं होती

    ये सोचकर की तेरी ज़वीं पर न बल पड़े

    बस दूर ही से देख लिया और चल पड़े

    ऐ दिल तुझे बदलती हुई रुत से क्या मिला

    पौधों में फूल और दरख्तों में फल पड़े

    सूरज सी उसकी तबा है शोला सा उसका रंग

    छू जाये उस बदन को तो पानी उबल पड़े

    बहुत ख़राब किया ख्वाहिशाते दुनिया ने

    ज़रा ज़रा से ये बुत बन गए खुदा मेरे

    ये दुश्मनों से नहीं जात से लड़ाई है

    किसी भी काम न आयेंगे दस्तो पा मेरे

    तू दोस्तों की तरह फासला न रख इतना

    हरीफ है तो फिर आ पास बैठ जा मेरे

    ये और बात कि मैं बज़्म में अकेला हूँ

    बहुत करीब ही बैठे हैं आशना मेरे

    वो रौशनी थी कि मैं कुछ न देख पाया था

    कल आफ़ताब बहुत ही करीब था मेरे

    अब न वो शोर है न शोर मचाने वाले

    खाक से बैठ गए खाक उड़ाने वाले

    दिल से वहशी कभी काबू में न आया यारों

    हार कर बैठ गए जाल बिछाने वाले

        आरज़ू की बेहिसी का गर यही आलम रहा

        बेतलब आएगा दिन और बेखबर जाएगी रात

        शाम ही से सो गए हैं लोग आँखे मूंदकर

        किसका दरवाज़ा खुलेगा किसके घर जाएगी रात

    जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुसवाई

    अब खाक उड़ाने को बैठे हैं तमाशाई

    अब दिल को किसी करवट आराम नहीं मिलता

    एक उम्र का रोना है दो दिन की शनासाई

    इस खौफ से इक उम्र हमें नींद न आई

    इक चोर छुपा बैठा है सीने की गुफा में

    इक नूर का सैलाब है बंद आँखों के अन्दर !

    लिपटे हुए चेहरे हैं अँधेरे की रिदा में !!

शहजाद अहमद का जाना उर्दू अदब के लिए कितना बड़ा नुकसान है इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता …..उनके साथ उर्दू ग़ज़ल का इक मज़बूत स्तम्भ (ज़दीद ग़ज़ल का आखिरी) भी ढह गया.

 

 

تیرے جانے کی خبر دیوارو در کرتے رہے

 

तेरे जाने की ख़बर दीवार-ओ-दर करते रहे—-परवीन शाकिर

जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे

चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे

रास्तों का इल्म था हम को न सम्तों की ख़बर

शहर-ए-ना-मालूम की चाहत मगर करते रहे

हम ने ख़ुद से भी छुपाया और सारे शहर को

तेरे जाने की ख़बर दीवार-ओ-दर करते रहे

वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी

इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

आज आया है हमें भी उन उड़ानों का ख़याल

जिन को तेरे ज़ोम में बे-बाल-ओ-पर करते रहे

 

شوق دیدار مر گیا ہوگا۔۔۔۔۔۔ایوب سیفی

यादों की पहेली को — निलेश मिश्रा

 

यादों की पहेली को

कुछ इस तरह सुलझाओ

बूझो तो बूझ जाओ

वरना भुलाते जाओ

तुमने भुला दिया है

इतना यकीन है पर

मैंने भुला दिया है

इसका यकीं दिलाओ

मुझे छोड़ के गए तुम

सब ले गए थे क्यूँ तुम

इतना रहम तो कर दो

इक घाव छोड़ जाओ

कुछ नफरतें पड़ी हैं

कहीं पे तुम्हारे घर में

मेरा है वो सामां तुम

वापस मुझे दे जाओ

मेरा ग़म का खज़ाना है

तेरे पास मुस्कराहट

अपना जो है ले जाओ

मेरा जो है दे जाओकुछ इस तरह सुलझाओ

बूझो तो बूझ जाओ

वरना भुलाते जाओ

तुमने भुला दिया है

इतना यकीन है पर

मैंने भुला दिया है

इसका यकीं दिलाओ

मुझे छोड़ के गए तुम

सब ले गए थे क्यूँ तुम

इतना रहम तो कर दो

इक घाव छोड़ जाओ

कुछ नफरतें पड़ी हैं

कहीं पे तुम्हारे घर में

मेरा है वो सामां तुम

वापस मुझे दे जाओ

मेरा ग़म का खज़ाना है

तेरे पास मुस्कराहट

अपना जो है ले जाओ

मेरा जो है दे जाओ

یادوں کی پہیلی کو۔۔۔۔۔۔ نلیش مشرا

 

یادوں کی پہیلی کو

کچھ اس طرح سلجھاؤ

بُوجھو تو بُوجھ جاؤ

ورنہ بُھولاتے جاؤ

تم نے بُھولا دیا ہے

اتنا یقین ہے پر

میں نے بُھولا دیا ہے

اسکا یقیں دلاؤ

مجھے چھوڑ کے گئے تم

سب لے گئے تھے کیوں تم

اتنا رحم تو کر دو

اک گھاؤ چھوڑ جاؤ

کچھ نفرتیں پڑی ہیں

کہیں پہ تمہارے گھر میں

میرا ہے وہ ساماں

واپس مجھے دے جاؤ

میرا غم کا خزانہ ہے

تیرے پاس مسکراہٹ

اپنا جو ہے لے جاؤ

میرا جو ہے دے جاؤ

کچھ اس طرح سلجھاؤ

بُوجھو تو بُوجھ جاؤ

ورنہ بُھولاتے جاؤ

تم نے بُھولا دیا ہے

اتنا یقین ہے پر

میں نے بُھولا دیا ہے

اسکا یقیں دلاؤ

مجھے چھوڑ کے گئے تم

سب لے گئے تھے کیوں تم

اتنا رحم تو کر دو

ایک گھاؤ چھوڑ جاؤ

کچھ نفرتیں پڑی ہیں

کہیں پہ تمہارے گھر میں

میرا ہے وہ ساماں تم

واپس مجھے دے جاؤ

میرا غم کا خزانہ ہے

تیرے پاس مسکراہٹ

اپنا جو ہے لے جاؤ

میرا جو ہے دے جاؤ

https://youtu.be/KrG89ZGOOoM

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना….. अवतार सींघ संधु “पाश”

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना – बुरा तो है

सहमी-सी चुप में जकड़े जाना – बुरा तो है

पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में

सही होते हुए भी दब जाना – बुरा तो है

जुगनुओं की लौ में पढ़ना -बुरा तो है

मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना – बुरा तो है

सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

तड़प का न होना, सब सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर जाना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है

आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो

आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है

जो सबकुछ देखती हुई जमी बर्फ होती है

जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है

जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है

जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई

एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है

जो हर हत्‍याकांड के बाद

वीरान हुए आंगन में चढ़ता है

लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता

सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है

आपके कानो तक पहुँचने के लिए

जो मरसिए पढता है

आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर

जो गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे खतरनाक वह रात होती है

जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है

जिसमे सिर्फ उल्लू बोलते और हुआँ हुआँ करते गीदड़

हमेशा के अँधेरे बंद दरवाजों-चौगाठों पर चिपक जाते है

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है

जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए

और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना

کیا کہئیے۔۔۔۔۔۔محمد علی وفا

.

ہماری جان پر انکی نظر ہے کیا کہئیے 

ہمارے پاس توبس ایک ہی سر ہے کیا کہئیے

 .

نہیں ہے کوئ فرق انکی ہاں میں اور نا میں

ملا عجیب انہیں یہ ہنر ہے کیا کہئیے

 .

 یہ لگ رہا ہے کہ سر پھوڑنا پریگا ہمیں

وہ حالِ دل سے مرے بے خبرہے کیا کہئیے

 .

 کہاں تک بھلا سہتے  رہیں گےیہ سنگ زنی

بچانا ہم پہ بھی لازم  یہ  سر ہے کیا کہئیے 

 .

جنوں کی حد سے بھی آگے گزر گیےہیں وفا

کہ  آگ دل میں لگی اس قدر ہے کیا کہئیے

क्या कहिये۔۔۔۔۔۔۔۔۔मुहम्मदअली वफ़ा

 

 .

 हमारी जान पर उनकी नज़र है क्या कहिये

 हमारे पास तो बस एक ही सर है क्या कहिये

.

 नहीं है कोई फ़र्क़ उनकी हाँ में और ना में

मिला अजीब उन्हें ये हुनर है क्या कहिये

 .

 ये लग रहा है कि सर फोड़ना पडेगा हमें

 वो हाल-ए-दिल से मेरे बे ख़बर हे क्या कहिये

 .

 कहाँ तक भला सहते रहें गै ये संग-ज़नी

 बचाना हम पे भी लाज़िम ये सर है क्या कहिये

 .

 जुनूँ की हद से भी आगे गुज़र गयें  है वफ़ा

 कि आग दिल में लगी इस क़दर है क्या कहिये

Ghalib Academy Tarahi Mushayro at Missisauga on Canada 16 Sept.2017

 

 

महान मुस्लिम वैज्ञानिक:- इब्न अल हैशम…. साजिद अली सुलतान

 

 

कौन थे कैमरा के अविष्कार करने वाले मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल-हैशम..?

कौन थे कैमरा के अविष्कार करने वाले मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न अल-हैशम..?

इब्न अल हैशम एक ईराकी वैज्ञानिक थे जिनका जन्म 965 ईस्वी में बसरा, ईराक में हुआ था। इब्न अल हैशम का पूरा नाम अबू अली अल-हसन बिन अल-हैशम है। इब्न अल हैशम को भौतिक विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान में महारत हासिल थी।

   इब्न अल हैशम को अल्हज़ेन (Alhazen) भी कहा गया।इब्न अल हैशम अपने दौर में नील नदी के किनारे बाँध बनाना चाहते थे ताकि मिश्र के लोगों को साल भर पानी मिल सके लेकिन अपर्याप्त संसाधन के कारण उन्हें इस योजना को छोड़ना पड़ा लेकिन बाद में उन्हीं की इस योजना पर उसी जगह एक बाँध बना जिसे आज असवान बाँध के नाम से जाना जाता है।

  • आँख पर अनुसंधान●

पुराने समय में माना जाता था कि आँख से प्रकाश निकल कर वस्तुओं पर पड़ता है जिससे वह वस्तु हमें दिखाई देती है लेकिन इब्न अल हैशम ने अफलातून और कई वैज्ञानिकों के इस दावे को गलत साबित कर दिया और बताया कि जब प्रकाश हमारी आँख में प्रवेश करता है तब हमे दिखाई देता है। इस बात को साबित करने के लिए इब्न अल हैशम को गणित का सहारा लेना पड़ा।

   इब्न अल हैशम ने प्रकाश के प्रतिबिम्ब और लचक की प्रकिया और किरण के निरक्षण से कहा कि जमीन की अन्तरिक्ष की उंचाई एक सौ किलोमीटर है। इनकी किताब “किताब अल मनाज़िर” प्रतिश्रवण के क्षेत्र में एक उच्च स्थान रखती है। उनकी प्रकाश के बारे में की गयी खोजें आधुनिक विज्ञान का आधार बनी। इब्न अल हैशम ने आँख पर एक सम्पूर्ण रिसर्च की और आँख के हर हिस्से को पूरे विवरण के साथ अभिव्यक्ति किया। जिसमें आज का आधुनिक विज्ञान भी कोई बदलाव नही कर सका है।

  • कैमरे का आविष्कार●

इब्न अल हैशम ने आँख का धोखा या भ्रम को खोजा जिसमे एक विशेष परिस्थिति में आदमी को दूर की चीजें पास और पास की दूर दिखाई देती हैं। प्रकाश पर इब्न अल हैशम ने एक परिक्षण जिसके आधार पर इब्न अल हैशम ने कहा था कि अगर किसी अंधेरे कमरे में दीवार के ऊपर वाले हिस्से से एक बारीक छेंद के द्वारा धूप की रौशनी गुजारी जाये तो उसके उल्ट अगर पर्दा लगा दिया जाये तो उस पर जिन जिन वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ेगा वह उल्टा होगा। इब्न अल हैशम ने इसी आधार पर पिन होल कैमरे का आविष्कार किया। कैमरा शब्द अरबी के अल-क़ुमरा से बना है जिसका अर्थ होता है―छोटी अंधेरी कोठरी।

  • गुमनामी के अंधेरों में गुम―इब्न अल हैशम●

पश्चिमी देशों ने इब्न अल हैशम के कैमरे के आविष्कार को भी अपना नाम दिया और कहा कि "कैमरा” शब्द लैटिन के कैमरा ऑब्स्क्योरा से आया है जिसका अर्थ अंधेरा कक्ष होता है जबकि "कैमरा” शब्द अरबी के अल-कुमरा से बना है।

   इब्न अल हैशम ने जिस काम को अंजाम दिया उसी के आधार पर बाद में गैलीलियो, कापरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने काम किया। इब्न अल हैशम से प्रभावित होकर गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार किया। इब्न अल हैशम की वैज्ञानिक सेवाओं ने पिछले प्रमुख वैज्ञानिकों के चिराग बुझा दिए। इन्होने इतिहास में पहली बार लेंस की आवर्धक पावर की खोज की। इब्न अल हैशम ने ही यूनानी दृष्टि सिद्धांत (Nature of Vision) को अस्वीकार करके दुनिया को आधुनिक दृष्टि दृष्टिकोण से परिचित कराया। जो चीजें इब्न अल हैशम ने खोजी। पश्चिमी देशों ने हमेशा उन पर पर्दा डालने की कोशिस की। इब्न अल हैशम ने 237 किताबें लिखीं। यही कारण है कि अबी उसैबा ने कहा कि वो कशीर उत तसनीफ (अत्यधिक पुस्तक लिखने वाले) थे। इब्न अल हैशम का इंतिक़ाल 1040 ईस्वी में कइरो, मिस्र में हुआ था।

अगर तल्वार के साये में—शकील क़ादरी 

यहाँ होगी वहाँ होगी इधर होगी उधर होगी

नज़र यादे ख़ुदा में जब भी मसरूफ़े सफ़र होगी

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ज़बाने को भला इस बात की कैसे ख़बर होगी

नज़र दुरवेश की है कौन जाने कब किधर होगी

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अगर तलवार के साये में जाकर तुम न खेलोगे

मेरे बच्चो कहो फिर ज़िंदगी कैसे बसर होगी

 .

तरफ़दारी जो हर मज़्लूम की करता था वो है गुम

नहीं मिलता कहाँ है वो हुकूमत को ख़बर होगी

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गुलों को ऐसे मुर्झाते नहीं देखा बहारों में

किसी बदबख़्त की इन को लगी काली नज़र होगी

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अंधेरों के परस्तारों की ज़द पे सर हमारे हैं

सुतूने-दार पे होंगे ये रौशन, फिर सहर होगी

 .

ख़िलाफे ज़ुल्म क्यूँ अक़्सर शकील आती है होंटों पर

"हमारी आह क्या कमबख़्त इतनी बेअसर होगी

اگر تلوار کے سایہ میں۔۔۔۔۔۔۔شکیل قادری

یہاں ہوگی وہاں ہوگی ادھر ہوگی اُدھر ہوگی

نظر یاد خدا میں جب بھی مصروف سفر ہوگی

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زمانے کو بھلا اس بات کی کیسے خبر ہوگی

نظر درویش کی ہے کون جانے کب کدھر ہوگی

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اگر تلوار کے سائے میں جاکر تم نہ کھیلو گے

میرے بچو کہو پھر زندگی کیسے بسر ہوگی

 .

طرف داری جو ہر مظلوم کی کرتا تھا وہ ہے گم

نہیں ملتا کہاں ہے وہ حکومت کو خبر ہوگی

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گلوں کو ایسے مرجھا تے نہیں دیکھا بہاروں میں

کسی بدبخت کی ان کو لگی کالی نظر ہوگی

 .

اندھیروں کے پرستاروں کی زد پہ سر ہمارے ہیں

ستون دار پہ ہو نگے یہ روشن، پھر سحر ہوگی

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خلاف ظلم کیوں اکثر شکیل آتی ہے ہونٹوں پر

ہماری آہ کیا کم بخت اتنی بے اثر ہوگی

 

मुझे याद है……हर अलीग की पुरानी यादें

 

 

आज हम आपके सामने ऐसा वीडियो पेश कर रहे हैं, जिसे देखकर आपकी आँखों में भी आंसू आ जायेंगे. अगर आप अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र हैं या रह चुके है, तो आपके सामने सारी यादें ताज़ा हो जाएँगी.

 

 

 

ग़ज़ल के संदर्भ में प्रचलित कथाओं की सच्चाई क्या है ?….. शकील क़ादरी

 

 

ग़ज़ल साहित्यस्वरूप के उद्भ़व के संदर्भ में एक कथा का उल्लेख बार बार किया गया है, और वो इस तरह प्रस्तुत किया गया है, ” ग़ज़ल का जन्म प्रेम-चर्चा के लिये ही हुआ था। अरब में ग़ज़ल नाम का एक आदमी था जिसने अपना समग्र जीवन इश्क़बाज़ी में व्यतित किया था। वह हंमेशा इश्क़ और सौंदर्य की ही बातें किया करता था और उसी विषय के शे’र पढ़ा करता था। तब से जिस कविता में प्रेम और सोंदर्य का उल्लेख हो एसी कविता को लोग उस आदमी की याद में ग़ज़ल कहने लगे।”

इस कथा का उल्लेख रामनरेश त्रिपाठीने अपनी पुस्तक ‘कविता कौमुदी”, कृष्णलाल मो. झवेरीने अपने संपादन "गुजरातनी ग़ज़लो”, मुकुंदलाल मुन्शीने "उत्तर भारत सांस्कृतिक संघ” की मुख पत्रिका "उत्तरा” और डॉ. रशीद मीरने अपने महानिबंध "१९४२ पछीनी गुजराती ग़ज़लनी सौंदर्य मीमांसा” में किया है। मगर किसीने भी इस कथा का स्रोत नहीं बताया है। यह कथा अरबी, फ़ारसी या उर्दू के किस पुस्तक में दर्ज है यह भी उल्लेख नही किया है। अरबी भाषा के किसी भी प्रतिष्ठित शब्द कोश में भी ग़ज़ल के बारे में एसा कोई संदर्भ नहीं मिलता। इस लिये यह कथा किसी के दिमाग़ की उपज लगती है। यह आदमी किस शह्र का था इस संदर्भ भी इन विद्वानों में मतभेद है। मुकुंदलाल मुन्शीने लिक्खा है कि वह पश्चिम एशिया में हुआ था। इन चारों लेखकों में से किसीने यह भी नहीं बताया है कि वह किस साल में हुआ था। यही कारण है कि यह कथा बिलकुल विश्वास करने योग्य नहीं है। इस संदर्भ में ग़ज़ल غزل की तरह लिक्खे जाने वाले शब्दों की जानकारी होना ज़रूरी है। क्यूँ कि अरबी में ग़ज़ल غَزَل और ग़ज़िल غَزِل यह दोनों शब्द लिखने के तीन वर्णों का ही उपयोग होता है। कभी मात्रा चिह्न नहीं भी दर्शाए जाते। इसी कारण अरबी, उर्दू नहीं जानने वाले अर्थ का अनर्थ कर बैठते हैं।

जैसे غزل ग़ज़ल का एक अर्थ "ऊन का ताना” भी होता है। वह भी लिक्खा ग़ज़ल غزل ही जाता है मगर जब "ज़” "ز” के उपर अरबी में हलचिह्न लगा दें तो वह ग़ज़्ल غَزْل हो जायेगा और उस का अर्थ होगा "ऊन कांतना”। अगर "ज़” के नीचे ह्रस्व "इ” की मात्रा ( ِ ) लगा दें तो ग़जिल غزل हो जायेगा और उस के अर्थ "औरतों से बातें करना / इश्क़ब़ाज़ी करना और इश्क़ब़ाज़ी करने वाला या वो आदमी जो हर चीज़ में कमज़ोर हो” भी होंगे। उसे ग़जील غَزِیل भी कहा जाता है। और यह "ग़ज़ील” शब्द किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं है। यह हर उस व्यक्ति के लिये इस्तेमाल होता है जो इश्क़बाज़ी करता हो या हर चीज़ में कमज़ोर हो। दूसरी बात यह है कि अरब में आम तौर पर लिखते और बोलते वक़्त व्यक्ति के नाम के साथ उस के पिता का भी नाम लिया जाता है, जैसे अरबी अरूज़ लिखने वाले ख़लील इब्ने अहमद, अरब का शाइर याअरब बिन कहेतान…इत्यादि। इस कारण किसी व्यक्तिविशेष का नाम "ग़ज़ल” नहीं हो यह संभावना नहीं है। इस संदर्भ में जब मैं ने संशोधन किया तो खुल कर एक बात यह सामने आई कि अल-ग़ज़ील उपनामधारी एक आदमी ई.स. ८४० में जेन में हुआ था जिस का सही नाम याह्या बिन बक़्री था। वह अत्यंत युवान और ख़ूबसूरत था इस लिये लोग उसे "अल-ग़ज़ीलالغَزِیل कहेते थें, ग़ज़ल غَزَل नहीं। यह आदमी न तो शाइर था और न तो इश्क़बाज़ी करने वाला। सिर्फ़ सौंदर्यवान था। इस व्यक्ति का ग़ज़ल काव्यस्वरूप से कोई संबंध नहीं मिलता। दूसरी महत्व की बात साल के संदर्भ में है वह यह कि यह आदमी इस्लाम की स्थापना के लगभग दो सो साल बाद हुआ था और उस से पहले भी तग़ज़्ज़ुल, मुग़ाज़ल: और ग़ज़ल शब्द अरबी में मौजूद थें। अरब में इस्लाम से पहेले जो क़सीदे लिक्खे जाते थे उन में तश्बीब और नसीब में तग़ज़्जुल भी था ही, सिर्फ़ इरानीयोंने इसी तश्बीब और नसीब वाले हिस्से को क़सीदों से जुदा कर के उस में रदीफ़ और तख़ल्लुस शुमार कर दिये और उसे ग़ज़ल नाम दे दिया। हमें यह भी जानना चाहिये कि अरबी क़सीदों में रदीफ़ नहीं थी। इस चर्चा से स्पष्ट हो जाता है कि ग़ज़ल नाम का एक आदमी जो कविता करता था उस कविता को ग़ज़ल कहा गया यह बात एक भ्रम और कल्पित कथा है। जिस का कोई प्रमाण अरबी, फ़ारसी और उर्दू के ग़ज़ल साहित्य में मिलता नहीं है।

ग़ज़ल शब्द ओर ग़ज़ल के स्वरूप के उदभव की इस चर्चा के बाद गुजराती, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में जो व्याख्याएं की गई हैं उन के बारे विश्लेषण किया जायेगा।

(शकील क़ादरी की १९९३ में प्रकट हुई गुजराती भाषा की किताब "ग़ज़ल:स्वरूपविचार से यह हिन्दी अनुवाद किया गया है।)

ग़ज़ल शब्द का अर्थ :शकील कादरी

 

गुजराती ज़बान में ग़ज़ल सर्जन की प्रवृत्ति को आज सो सवासो वर्ष से अधिक समय बीत चुका है किन्तु ग़ज़ल शब्द के अर्थ, ग़ज़ल स्वरूप की उत्पत्ति और ग़ज़ल की व्याख्या के संदर्भ में कईं तरह के भ्रम पाये जाते हैं। अरबी भाषा में किसी शब्द के उच्चार में सामान्य परिवर्तन कर दिया जाये तो शब्दार्थ बदल जाता है। गुजराती में देखा गया है कि ‘ग़ज़ल’ शब्द के साथ जिन शब्दों की थोड़ी बहुत उच्चारगत समानता है, उन शब्दों को भी ग़ज़ल के साथ जोड़ कर चर्चा की गई है। इस कारण ग़ज़ल शब्द के बारे में कुछ भ्रम पाये जाते हैं। इन भ्रमों को दूर करने के लिये ग़ज़ल की अर्थगत, स्वरूपगत और उभयलक्षी व्याख्याएं देखेंगे। यह व्याख्याएं देखने से पहेले यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि "ग़ज़ल” शब्द मूलत: अरबी भाषा का होने के बावजूद एक स्वतंत्र काव्यरूप के तौर पर इस का विकास इरान में हुआ था। फिर भी ग़ज़ल और ग़ज़ल विद्या में जिन पारिभाषिक शब्दों का उपयोग किया जाता है वह शब्द अरबी भाषा के ही रक्खे गयें। अरबी भाषा का स्वरूप गुजराती और हिन्दी भाषा से भिन्न प्रकार का है। अरबी भाषा में विभिन्न शब्द के मूल में तीन वर्ण होते हैं। इन्हीं मूल वर्णो (Root Word) से विभिन्न वज़्न या उच्चारगत समतुला वाले नाम, क्रियापद वग़ैरह शब्दों का निर्माण होता है। जैसे "क-त-ब” (کَ-تَ-َ بَ) एक मूल है, धातु है। जिस में तीन वर्ण हैं। जिस में से भूतकाल का एक रूप क-त-ब (کَتَبَ) बना है। जिस का अर्थ है "उसने लिक्खा”। "कतब” के बाद कतबतु (ُکتبت) "मैं ने लिक्खा”, कतबना (کتبنا) "हम दोनों ने लिक्खा” इत्यादि। यह भूतकाल के पुल्लिंग रूप हैं। इसी तरह स्रीलिंग रूप भी बनते हैं। इस के अलावा नाम भी बनते हैं जैसे "मक्तूब” ( مکتوب) अर्थात "लिक्खा हुआ”, और "मक्तब:” (مکتبہ) अर्थात "पाठशाला”। यह चर्चा समझ लेने के बाद ग़ज़ल शब्द के विषय में जो भ्रम प्रचलित हैं उन्हें दूर करने में आसानी होगी।

"ग़ज़ल” (غزل) शब्द की व्युत्पत्ति "मुग़ाज़ेलत” (مغازلت) या "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द से हुई है यह बात मंजुलाल मजुमदारने अपनी किताब ” गुजराती साहित्यना पद्यस्वरूपो”, रशीद मीरने "”१९४२ पछीनी गुजराती ग़ज़लनी सौंदर्य मीमांसा” नाम के महानिबंध में और और एम. एफ़. लोखंड़वालाने "फ़ारसी साहित्यनो इतिहास” में कही है, मगर वास्तव में अरबी में मुग़ाज़ल: (مُغازلہ) शब्द है, मुग़ाज़ेलत (مُغازلت) नहीं। जो उर्दू में आकर "मुग़ाजेलत”हो गया है। "मुग़ाज़ल:” अरबी क्रियापद है और यह क्रियापद स्वयम् तीन वर्ण के मूल धातु "ग़-ज़-ल” (غ- ز- ل) से बना है।

इसी तरह "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द भी "ग़-ज़-ल” (غ-ز-ل) मूल धातु से ही बना है। इस चर्चा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि "ग़ज़ल” शब्द "मुग़ाज़ेलत” या "तग़ज़्ज़ुल” से नहीं बना है बल्कि उस के विपरित ग़ज़ल से "तग़ज़्ज़ुल” और "मुग़ाज़ेलत” शब्द बने हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि "मुग़ाज़ल:”, ” मुग़ाजेलत”, और "तग़ज़्ज़ुल” यह तीनों शब्द ग़ज़ल से बने हैं, "ग़ज़ल” शब्द इन शब्दों से नहीं बना है। गुजराती भाषा के विद्वान जिसे "मुग़ाज़ेलत” कहते हैं और मूल शब्द बताते हैं वह स्वयम् मूल में "मुग़ाज़ल:” है और उस का वज़्न (शब्दोच्चार) :मुफ़ाअल:” पर आधारित है। "मुग़ाज़ल:” का अर्थ होता है, ":Talk with her, in an amatory and enticing manner, to flirt, to talk with beloved.” इस के मूल में "ग़.ज.ल”शब्द है। "ग़ज़ल” शब्द क्रियापद का मूलरूप है जिस का शाब्दिक अर्थ है, "The talk and actions and circumstances, occurring between the lover and the object of love.” "ग़ज़ल” संज्ञा का नाम के रूप में भी प्रयोग होता है और जब नाम "Noun” के रूप में उस का प्रयोग होता है तब वह ग़ज़ल काव्यस्वरूप को दर्शाता है।

इसी तरह "तग़ज़्ज़ुल” (تغزل) शब्द भी "ग़ज़ल” शब्द से ही बना है। "तग़ज़्ज़ुल” शब्द "तफ़व्वुल” (تفول)के वज़्न पर है। "तग़ज़्ज़ुल” का शाब्दिक अर्थ है, "To sport, To dally, To hold, amours talk with (lover’s), Erotic verses.” जो कि यह सामान्य अर्थ है। बाद में इस शब्द का उपयोग पारिभाषिक रूप में होने लगा। काव्यशास्र में मूलत: इश्क़िया- प्रेम और शृगार के तत्व हों उसे तग़ज़्ज़ुल कहा जाने लगा। जो ग़ज़ल का सही रंग है। इस चर्चा से स्पष्ट हुआ होगा कि "ग़ज़ल” से ही तग़ज़्ज़ुल और मुग़ाज़ेलत शब्द बने हैं। तग़ज़्जुल या मुग़ाज़ेलत से "ग़ज़ल” शब्द बना यह गुजराती शोधकर्ताओं का भ्रम है।

(1993 में पब्लिश्ड़ मेरी गुजराती किताब ‘ग़ज़ल:स्वरूपविचार’ के एक पन्ने का अनुवाद – शकील क़ादरी)

+ कहीं हिन्दी हिज्जे की ग़लती हो तो बताने की कृपा करें।

जाने, तुम कैसी डायन हो — नागार्जुन

 

जाने, तुम कैसी डायन हो !

अपने ही वाहन को गुप-चुप लील गई हो !

शंका-कातर भक्तजनों के सौ-सौ मृदु उर छील गई हो !

क्या कसूर था बेचारे का ?

नाम ललित था, काम ललित थे

तन-मन-धन श्रद्धा-विगलित थे

आह, तुम्हारे ही चरणों में उसके तो पल-पल अर्पित थे

जादूगर था जुगालियों का, नव कुबेर चवर्ण-चर्वित थे

जाने कैसी उतावली है,

जाने कैसी घबराहट है

दिल के अंदर दुविधाओं की

जाने कैसी टकराहट है

जाने, तुम कैसी डायन हो !

(1975)

جگنو….علامہ محمد اقبال

 .

جگنو کی روشنی ہے کاشانۂ چمن ميں

 يا شمع جل رہی ہے پھولوں کی انجمن ميں

آيا ہے آسماں سے اڑ کر کوئی ستارہ

 يا جان پڑ گئی ہے مہتاب کی کرن ميں

 يا شب کی سلطنت ميں دن کا سفير آيا

 غربت ميں آ کے چمکا، گمنام تھا وطن ميں

 تکمہ کوئی گرا ہے مہتاب کی قبا کا

 ذرہ ہے يا نماياں سورج کے پيرہن ميں

 حسن قديم کی يہ پوشيدہ اک جھلک تھی

 لے آئی جس کو قدرت خلوت سے انجمن ميں

 چھوٹے سے چاند ميں ہے ظلمت بھی روشنی بھی

 نکلا کبھی گہن سے، آيا کبھی گہن ميں

 پروانہ اک پتنگا، جگنو بھی اک پتنگا

 وہ روشنی کا طالب، يہ روشنی سراپا

 ہر چيز کو جہاں ميں قدرت نے دلبری دی

 پروانے کو تپش دی، جگنو کو روشنی دی

 رنگيں نوا بنايا مرغان بے زباں کو

 گل کو زبان دے کر تعليم خامشی دی

 نظارئہ شفق کی خوبی زوال ميں تھی

 چمکا کے اس پری کو تھوڑی سی زندگی دی

 رنگيں کيا سحر کو، بانکی دلھن کی صورت

 پہنا کے لال جوڑا شبنم کی آرسی دی

 سايہ ديا شجر کو، پرواز دی ہوا کو

 پانی کو دی روانی، موجوں کو بے کلی دی

 يہ امتياز ليکن اک بات ہے ہماری

 جگنو کا دن وہی ہے جو رات ہے ہماری

 حسن ازل کی پيدا ہر چيز ميں جھلک ہے

 انساں ميں وہ سخن ہے، غنچے ميں وہ چٹک ہے

 يہ چاند آسماں کا شاعر کا دل ہے گويا

 واں چاندنی ہے جو کچھ، ياں درد کی کسک ہے

 انداز گفتگو نے دھوکے ديے ہيں ورنہ

 نغمہ ہے بوئے بلبل، بو پھول کی چہک ہے

 کثرت ميں ہو گيا ہے وحدت کا راز مخفی

 جگنو ميں جو چمک ہے وہ پھول ميں مہک ہے

 يہ اختلاف پھر کيوں ہنگاموں کا محل ہو

 ہر شے ميں جبکہ پنہاں خاموشی ازل ہو

(بانگ درا)

जुगनू۔۔۔۔۔ अल्लामा मुहम्मद इक़बाल

 जुगनू की रोशनी है काशाना-ए-चमन में

 या शम्मा जल रही है फूलों की अंजुमन में

 आया है आसमां से उड़ कर कोई सितारा

 या जान पड़ गई है महताब की किरण में

 या शब की सलतनत में दिन का सफ़ीर आया

 ग़ुर्बत में आ के चमका, गुमनाम था वतन में

 तुक्मा कोई गिरा है महताब की क़बा का

ज़र्रा है या नुमायां सूरज के पैरहन में

 हुस्ने क़दीम की ये पोशीदा इक झलक थी

 ले आई जिसको क़ुदरत ख़लवत से अंजुमन में

 छोटे से चांद में है ज़ुल्मत भी रोशनी भी

 निकला कभी गहन से, आया कभी गहन में

परवाना इक पतंगा, जुगनू भी इक पतंगा

 वो रोशनी का तालिब, ये रोशनी सरापा

 हर चीज़ को जहां में क़ुदरत ने दिलबरी दी

 परवाने को तपिश दी, जुगनू को रोशनी दी

 रंगीं-नवा बनाया मुर्ग़ान बे-ज़बाँ को

 गुल को ज़बान देकर तालीम ख़ामुशी दी

नज़ारा शफ़क़ की ख़ूबी ज़वाल में थी

 चमका के इस परी को थोड़ी सी ज़िंदगी दी

रंगीं किया सहर को, बाँकी दुल्हन की सूरत

 पहना के लाल जोड़ा शबनम की आरसी दी

 साया दिया शजर को, परवाज़ दी हवा को

 पानी को दी रवानी, मौजों को बे-कली दी

 ये इमतियाज़ लेकिन इक बात है हमारी

 जुगनू का दिन वही है जो रात है हमारी

 हुस्न-ए-अज़ल की पैदा हर चीज़ में झलक है

 इंसां में वो सुख़न है, ग़ुंचे में वो चटक है

 ये चांद आसमां का शायर का दिल है गोया

 वां चांदनी है जो कुछ, याँ दर्द की कसक है

 अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू ने धोके दिए हैं वर्ना

नग़मा है बूए बुलबुल, बू फूल की चहक है

 कसरत में हो गया है वहदत का राज़ मख़फ़ी

 जुगनू में जो चमक है वो फूल में महक है

 ये इख़तिलाफ़ फिर क्यों हंगामों का महल हो

 हर शैय में जबकि पिनहां ख़ामोशी अज़ल हो

(बांगे दरा)

شاید مجھکو سورج نے پہچان لیا۔۔۔۔راحت اِندوری

ایک جگنو جگمگایا دیر تک ۔۔۔۔۔ نواز دیوبندی

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وہ رلا کر ہنس نہ پایا دیر تک

 جب میں رو کر مسکرایا دیر تک

 .

بھولنا چاہا کبھی اس کو اگر

 اور بھی وہ یاد آیا دیر تک

 .

خود بہ خود بے ساختہ میں ہنس پڑا

 اس نے اس درجہ رلایا دیر تک

 .

بھوکے بچوں کی تسلی کے لیے

 ماں نے پھر پانی پکایا دیر تک

.

گنگناتا جا رہا تھا اک فقیر

دھوپ رہتی ہے نہ سایا دیر تک

 .

کل اندھیری رات میں میری طرح

ایک جگنو جگمگایا دیر تک

Died: September 29, 2014, Mumbai, India

हुतात्म्यांना फाशी…….कविता करकरे

This is a poem written by Kavita Karkare, the wife of martyr Hemant Karkare. The poem was read by Kavita, who passed away on Monday

Died: September 29, 2014, Mumbai, India

   At the Marathi book launch of ‘To The Last Bullet – The Inspiring Story Of A Braveheart Ashok Kamte’ by Vinita Kamte, Vinita Deshmukh.

Following is the English translation of the poem.

Do not make the mistake of becoming a martyr in this country,

as you will be branded a headless chicken

and a dumb ass who went forward (to face the threat)

‘Why do martyrs get the Ashokchakra?’

Such will be the sophistries after your death.

The Ram Pradhan Committee will hang even the martyrs,

hence don’t make the mistake of becoming a martyr in this country

‘Why was timely help not provided during 26/11

or why were the bodies lying on the road for 40 minutes?’

Do not raise such questions as the wife of a martyr in this country.

But first, do not commit the crime of becoming a martyr in this country.

No country subjects their martyrs to an alcohol test. Our country does.

Do not try to understand the politics behind this.

Why did a certain officer switch off his cell phone?

Or why was some officer sitting on the terrace?

Do not stand up bravely and point fingers their way

The compensation for martyrs got talked about a hundred times,

and the accounts of leave encashment and Provident Fund were given

If that was not enough, there were reminders of the Rs 15000 that were given for the last rites.

Do not make the mistake of becoming a martyr while being in a government job.

Murders are forgiven in this country.

Those who have been released from prison after being charged with corruption

can mingle among the masses with their heads held high.

But when you become a martyr, you become a pariah.

Do not ever commit the crime of becoming a martyr in this country.

Should martyrs be hanged?

Or should their martyrdom be kept alive?

You will decide. You will be keeping a flame that torch that we have lit.

बाबाकी  कहानी  रवीश  कुमार  की  जुबानी……काकावाणी

دیا مندر پر رکھوں تو گھر اندھیرا ہے۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زُلفی

मौलना अबुल कलाम आजाद………एक काबिले दीद डोक्युमेटरी

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https://youtu.be/zpWpE5jFpp4

 

2

https://youtu.be/TwiIeIbysUU

2&3

 

3

https://www.youtube.com/watch?v=z0n3VekhZus

https://youtu.be/z0n3VekhZus

 

4

https://youtu.be/-uL397_trP8

5

https://youtu.be/W9rUWB6IkCk

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https://youtu.be/ySLJDKy-KwMमौलना अबुल कलाम आजाद………एक काबिले दीद डोक्युमेटरी
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पालकी दर्द की लिये कहार से गुजरे…..मुहमदअली वफा

हालते जुनुं में जब बाजार से  गुजरे

पालकी  दर्द की लिये कहार से गुजरे

दामन तर न हुआ कोई भी खूश्बू  से

बरसों बरस हम इस बहार से गुजरे

दामन बच गया ये हमारी किस्मत थी

चमनमें जब गुजरे शजरे खार से  गुजरे

कीसी  बेगुनह को ही लटकते देखा

जब भी हम कोई दार से गुजरे

जिंदगी अजीब कशमकश  में रही ‘वफा’

गमे जानां की  कई  दरार से  गुजरे

پالکی درد کی لئے کہار سے گزرے۔۔۔۔۔محمد علی وفا

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حالت جنوں میں جب بازار سے گزرے

پالکی درد کی لئےکہار سے گزرے

دامن تر نہ ہوا کوئی بھی خوشبو سے

کئ بار ہم تو  اس بہار سے گزرے

دامن بچ گیا یہ ہی ہماری قسمت تھی

چمن میں گزرے شجرے خار سے گزرے

کسی بیگناہ کو ہی لٹکتے دیکھا ہمنے

جب بھی  ہم کوئی دار سے گزرے

زندگی عجیب کشمکش میں رہی ‘وفا’

غمے جاناں کی کئی درار سے گزرے

 

 

ہمارا خون امانت ہے۔۔۔۔۔ساحر لدھیانوی 

 :

ہمارا خون امانت ہے نسل نو کے لیے

ہمارے خون پہ لشکر نہ پل سکیںگے کبھی

کہو کہ آج بھی ہم سب اگر خموش رہے

تو اس دمکتے ہوئے خاکداں کی خیر نہیں

جنوں کی ڈھال ہوئی ایٹمی بلاؤں سے

زمیں کی خیر نہیں، آسماں کی خیر نہیں

گزشتہ جنگ میں گھر ہی جلے مگر اس بار

عجب نہیں کہ یہ تنہائیاں بھی جل جائیں

گزشتہ جنگ میں پیکر جلے مگر اس بار

عجب نہیں کہ یہ پرچھائیاں بھی جل جائیں

اسی خوف نے ساحر کو خواب بننے کے لیے مہمیز کیا:

آؤ کہ کوئی خواب بنیں، کل کے واسطے

ورنہ یہ رات، آج کے سنگین دور کی

ڈس لے گی جان و دل کو کچھ ایسے کہ جان و دل

تاعمر پھر نہ کوئی حسیں خواب بن سکیں

 

हमारा ख़ून अमानत है—-साहिर लुधियानवी

:

हमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिए

हमारे ख़ून पे लश्कर ना पल सकेंगे कभी

कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे

तो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहीं

जुनूँ की ढाल हुई ऐटमी बलाओं से

ज़मीं की ख़ैर नहीं, आसमां की ख़ैर नहीं

गुजिश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएं

गुजिश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये परछाईयां भी जल जाएं

इसी ख़ौफ़ ने साहिर को ख्वाब बनने के लिए मेहमिज़ किया:

आओ कि कोई ख़ाब बुनें, कल के वास्ते

वर्ना ये रात, आज के संगीन दौर की

डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल

ता उम्र फिर ना कोई हसीं ख्वाब बन सकें

 

Posted by: Bagewafa | اگست 16, 2017

Ravish kumar in Gujarat

हिंदुस्तानमें दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं—–गुलझार

Posted by: Bagewafa | دسمبر 10, 2017

Who killed karkare……..Commissioner Musherif

ब्राहम्णो ने बम्ब ब्लास्ट क्यों किए थे 2002 से 2009 तक पूरे भारत में….Bamcef waman meshram bharti mukti murcha.

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न हारा इश्क…..खुमार बारा बंकवी

 

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न हारा है इश्क़ और,न दुनिया थकी है

दीया जल रहा है, हवा चल रही है

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सुकूँ ही सुकूं है ख़ुशी ही ख़ुशी है

तेरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है

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वो मौजूद हैं और उनकी कमी है

मोहब्बत भी तन्हाईये दाएमी है

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खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है

जिसे इश्क़ कहते हैं शायद यही है

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चिराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं

नया है ज़माना नई रोशनी है

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जफ़ाओं पे घुट घुट के चुप रहने वालो

ख़मोशी जफ़ाओं की ताईद भी है

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मेरे राहबर मुझको गुमराह कर दे

सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है

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‘ख़ुमार’ ए बला नोश तू और तौबा

तुझे ज़ाहिदों की नज़र लग गई है

 

نہہارا عشق۔۔۔۔خمار بارہ بنکوی

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نہ ہارا ہے عشق اور نہ دنیا تھکی ہے

دیا جل رہا ہے ہوا چل رہی ہے

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سکوں ہی سکوں ہے، خوشی ہی خوشی ہے

ترا غم سلامت، مجھے کیا کمی ہے

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وہ موجود ہیں اور ان کی کمی ہے

محبت بھی تنہائی یہ دائمی ہے

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کھٹک گدگدی کا مزا دے رہی ہے

جسے عشق کہتے ہیں شاید یہی ہے

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چراغوں کے بدلے مکاں جل رہے ہیں

نیا ہے زمانہ، نئی روشنی ہے

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جفاؤں پہ گھُٹ گھُٹ کے چُپ رہنے والو

خموشی جفاؤں کی تائید بھی ہے

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مرے راہبر! مجھ کو گمراہ کر دے

سنا ہے کہ منزل قریب آ گئی ہے

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خمارِ بلا نوش! تُو اور توبہ!

تجھے زاہدوں کی نظر لگ گئی ہے

نہ صورت کہیں شادمانی کی دیکھی۔۔۔۔۔مولانا حسرت موہانی

نہ صورت کہیں شادمانی کی دیکھی

بہت سیر دنیاٴ فانی کی دیکھی

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مری چشم خوں بار میں خوب رہ کر

بہار آپ نے گل فشانی کی دیکھی

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تمنا نے اس رو زیبا کو دیکھا

که تصویر حسن جوانی کی دیکھی

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عجب شوق سے دست ساقی میں ہم نے

صراحی میۂ ارغوانی کی دیکھی

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زہے روب حسن ان کے در پر کسی نے

ضرورت نہ کچھ پاسبانی کی دیکھی

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نہ تم سا خوش اخلاق پایا نہ ہم نے

کہیں شان یہ دل ستانی کی دیکھی

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مجھے کر کے مایوس بولے وہ ‘حسرت’

مسرت غم جاویدانی کی دیکھی

न सूरत कहीं शादमानी की देखी…मौलानाहसरत मोहानी

न सूरत कहीं शादमानी की देखी

बहुत सैर दुनिया-ए-फ़ानी की देखी

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मेरी चश्म-ए-ख़ूँ-बार में ख़ूब रह कर

बहार आप ने गुल-फ़िशानी की देखी

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तमन्ना ने उस रू-ए-ज़ेबा को देखा

कि तस्वीर हुस्न-ए-जवानी की देखी

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अजब शौक़ से दस्त-ए-साक़ी में हम ने

सुराही मय-ए-अरग़वानी की देखी

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ज़हे रोब-ए-हुस्न उन के दर पर किसी ने

ज़रूरत न कुछ पासबानी की देखी

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न तुम सा ख़ुश-अख़्लाक़ पाया न हम ने

कहीं शान ये दिल-सितानी की देखी

मुझे कर के मायूस बोले वो ‘हसरत’

मसर्रत ग़म-ए-जावेदानी की देखी

साहित्य आजतक पर जावेद अख्तर ने कहा, ये जाहिल लोग है कुछ नही जानते, भक्तो के फर्जी राष्ट्रवाद पर भी कसा तंज,

اب تو مرنا ہی دوا ہو جیسے۔۔۔۔۔۔۔۔۔پروین شاکر

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