तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा / गोपालदास "नीरज”

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।

सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,

हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,

वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा ।

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,

मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,

उसे कुछ भी न मिला जो अगर-मगर में रहा ।

تمام عمر میں اک اجنبی کے گھر میں رہا / گوپالداس "نیرج

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تمام عمر میں اک اجنبی کے گھر میں رہا ۔

سفر نہ کرتے ہوئے بھی کسی سفر میں رہا ۔

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وہ جسم ہی تھا جو بھٹکا کیا زمانہ میں،

دل تو میرا ہمیشہ تیری ڈگر میں رہا ۔

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تو ڈھونڑھتا تھا جسے جا کے برج کے گوکل میں،

وہ شیام تو کسی میرا کی چشمے تر میں رہا ۔

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وہ اور ہی تھے جنہیں تھی خبر ستاروں کی،

میرا یہ دیش تو روٹی کی ہی خبر میں رہا ۔

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ہزاروں رتن تھے اس جوہری کی جھولی میں،

اسے کچھ بھی نہ ملا جو اگر مگر میں رہا ۔

 

حالات کا پہرا دیکھا۔۔۔۔عبد السلام عارف

(Courtesy: Facebook wall of A.salam Arif)

تنہائی…۔۔ شکیل قادری

میری تنہائی میری ضرورت ہے تو

میری پرچھائی سی خوبصورت ہے تو

آئینہ میں تیرے میں نے دیکھا خدا

جو نہیں ہے حقیقت میں مجھ سے جدا

سوچتا ہوں، یہی کس کو سجدہ کروں

میری تنہائی سچ سچ بتا کیا کروں؟

میری تنہائی تجھ میں ہے نور خدا

میں بنوں کیسے اس نور کا رہنما؟

راہ تجھ میں نمایا ہوئی مستقیم

میری تنہائی ثابت ہوئی تو کریم

اپنے دل کو تیرے نور سے ہی بھروں

میری تنہائی میں تجھ سے کیوں کر ڈروں؟

میری تنہائی تونے یہ اچھا کیا

نفس کا ہے جو مفہوم سمجھا دیا

سانس پر اپنی سب رکھ رہے ہیں نظر

جسم سے بھاگ کر کوئی جائے کدھر؟

جیسے اندر ہے ویسے ہے باہر خدا

میری تنہائی آئی ہے کیسی وبا؟

اس وبا میں مجھے اپنا گھر مل گیا

خود میں جینے کا جیسے ہنر مل گیا۔

کام مشکل تھا لیکن وہ کرتا ہوں، اب

وقت بیوقت بھی خود سے ہی ملتا ہوں، اب

تجھ سے بڑھکر میرا کون ہے رازداں

میری تنہائی تجھ سا ہے کوئی کہاں؟

میری خوشیاں میرے غم ہیں تجھ پے عیاں

میری ورانیاں بھی کہاں ہیں نہاں

میرے اشار میں ہے روانی تیری

میرے الفاظ میں ہے کہانی تیری

ایک دن روح جائیگی پرواز پر

میری تنہائی کیا تو نہیں مختصر؟

خاک سے ہوں، بنا خاک ہو جاؤنگا

تھا جہاں کا وہیں جا کے کھو جاؤنگا

ہجر کی، وصل کی رات ڈھل جائیگی

جسم سے روح تنہا نکل جائیگی

کوئی ٹھہرا ہے پلکوں پے اب کیا کروں؟

میری تنہائی کیا اور تجھ سے کہوں؟

موت جیسی حسیں، خوبصورت ہے تو

میری تنہائی میری ضرورت ہے تو

तन्हाई….. शकील क़ादरी

तन्हाई….. शकील क़ादरी

 मेरी तन्हाई मेरी ज़रूरत है तू

 मेरी परछाई सी ख़ूबसूरत है तू

 आईने में तेरे मैं ने देखा ख़ुदा

जो नहीं है हक़ीक़त में मुझ से जुदा

 सोचता हूँ यही किस को सजदा करूँ

 मेरी तन्हाई सच सच बता क्या करूँ?

मेरी तन्हाई तुझ में है नूर-ए-ख़ुदा

 मैं बनूँ कैसे उस नूर का रहनुमा?

राह तुझ में नुमाया हुई मुस्तक़ीम

 मेरी तन्हाई साबित हुई तू करीम

 अपने दिल को तेरे नूर से ही भरूँ

 मेरी तन्हाई मैं तुझ से क्यूँ कर डरूँ?

मेरी तन्हाई तूने ये अच्छा किया

 नफ़्स का है जो मफ़्हूम समझा दिया

 साँस पर अपनी सब रख रहे हैं नज़र

 जिस्म से भाग कर कोई जाए किधर?

जैसे अंदर है वैसे है बाहर ख़ुदा

 मेरी तन्हाई आई है कैसी वबा?

इस वबा में मुझे अपना घर मिल गया

 ख़ुद में जीने का जैसे हुनर मिल गया।

 काम मुश्किल था लेकिन वो करता हूँ अब

 वक़्त बेवक्त भी ख़ुद से ही मिलता हूँ अब

 तुझ से बढ़कर मेरा कौन है राज़दाँ

 मेरी तन्हाई तुझ सा है कोई कहाँ?

मेरी ख़ुशियाँ मेरे ग़म हैं तुझ पे अयाँ

 मेरी विरानियाँ भी कहाँ हैं निहाँ

 मेरे अश्आर में है रवानी तेरी

 मेरे अल्फ़ाज़ में है कहानी तेरी

 एक दिन रूह जाएगी परवाज़ पर

 मेरी तन्हाई क्या तू नहीं मुख़्तसर?

ख़ाक से हूँ बना ख़ाक हो जाऊँगा

 था जहाँ का वहीं जा के खो जाऊँगा

 हिज्र की, वस्ल की रात ढल जाएगी

 जिस्म से रूह तन्हा निकल जाएगी

 कोई ठहरा है पलकों पे अब क्या करूँ?

मेरी तन्हाई क्या और तुझ से कहूँ?

मौत जैसी हसीं, ख़ूबसूरत है तू

 मेरी तन्हाई मेरी ज़रूरत है तू

 

(Courtesy: Facebook wall of Janab Shakeel Qadri)

 

 

ڈاکتر تسلیم اِلاہی زُلفی۔۔۔۔۔۔۔۔عرفی رضازیدی۔۔۔بریلی،اندیا

Posted by: Bagewafa | مئی 6, 2020

Rajeev Dhayani!!TV DEBATE!!Godi media

Rajeev Dhayani!!TV DEBATE!!Godi media

हिन्दू आतंकवाद—- एल एस हरदेनिया

जब भी हिन्दू आतंकवाद की बात की जाती थी तो संघ परिवार की ओर से जबरदस्त विरोध होता था। उसका दावा होता था कि किसी धर्म विशेष का नाम आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता है। वैसे एक समय था जब नरेन्द्र मोदी यह कहा करते थे कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान हैं।

परंतु दिनांक 10 अगस्त को महाराष्ट्र में कुछ ऐसे लोग पकड़े गए हैं जो आतंकवादी हमलों की तैयारी कर रहे थे। गिरफ्तार किए गए लोगो का संबंध दक्षिण पंथी हिन्दू संगठनों से पाया गया है। इन गिरफ्तारियों का समाचार अनेक समाचार पत्रों में छपा है। जैसे दिनांक 12 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में छपे समाचार की हेडलाईन है “Searches across Maharashtra terror attack foiled 3 with links to hardline Hindu groups held” (महाराष्ट्र में मारे गए छापों से आतंकी हमला विफल, हिन्दू समूह से जुड़े तीन व्यक्ति गिरफ्तार)

समाचारों के अनुसार एटीएस ने छापा मारकर तीन ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जो हिन्दू संगठन से जुड़े हुए हैं। इन लोगों के पास से बड़े पैमाने पर विस्फोटक सामग्री भी बरामद हुई है। इनमें से कुछ बम, जिलेटिन स्टिक आदि भी पाए गए। गिरफ्तारी के बाद एटीएस ने यह भी बताया कि ये लोग अनेक स्थानों पर आतंकी हमले करने की तैयारी कर रहे थे। जो लोग गिरफ्तार किए गए उनमें 40 वर्षीय वैभव राऊत भी शामिल है। वह हिन्दू गौरक्षा समिति का सदस्य है। इसके सनातन संस्था से भी संबंध हैं। इस बात के भी स्पष्ट संकेत मिल चुके हैं कि सनातन संस्था से जुड़े ये लोग नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे, एमएम कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेष की हत्या के षड़यंत्र में भी शामिल हैं।

सुधनवा गोंधलेकर नाम के एक अन्य व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है जो विश्व प्रतिष्ठान हिन्दुस्तान नामक संस्था के सदस्य हैं। इस संस्था के मुखिया संभाजी भिड़े हे। भिड़े के विरूद्ध इस वर्ष एक जनवरी को कोरेगांव के पास हुई हिंसक घटनाओं के संबंध में अपराध कायम किया गया है।

तीसरे अभियुक्त शरद कसालकर है। इन्हें राऊत के निवास स्थान से गिरफ्तार किया गया है। एटीएस के अनुसार कमालकर के पास एक दस्तावेज पाया गया है जिसमें बम बनाने की प्रक्रिया का विवरण है। इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री का मिलना इस बात का संकेत है कि ये लोग किसी गंभीर हिंसक कार्यवाही की तैयारी कर रहे थे। शायद उनका इरादा स्वतंत्रता दिवस और बकरीद के आसपास ऐसी घटना करने का था। एटीएस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वे ऐसी वारदात कब और कहां करने वाले थे। एटीएस इस बात का भी पता लगा रही है कि इन लोगों का दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और लंकेष की हत्याओं से सीधा संबंध तो नहीं थे। पालघर के पुलिस अधीक्षक मंजूनाथ भिनसे के अनुसार पिछले कई दिनों से राऊत की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। राऊत के पड़ोसियों के अनुसार राऊत की पहचान एक गौरक्षक के रूप में थी और वह प्रायः उन लोगों के घरों और दुकानों पर छापा मारता था जहां गौमांस मिलने की संभावना होती थी।

वैसे तो सनातन संस्था की ओर से कहा गया है कि राऊत उनकी संस्था का औपचारिक सदस्य नहीं था परंतु जो भी हो वह हिन्दुत्व संबंधी गतिविधियों में भाग लेता था और उसे हम अपना मानते हैं। इसलिए हम उसकी हर संभव कानूनी सहायता करेंगे।

बाद में छानबीन के बाद यह पता लगा कि जिन लोगों को एटीएस ने गिरफ्तार किया था वे मराठा आंदोलन के दौरान बम विस्फोट करना चाहते थे। उनका इरादा महाराष्ट्र सरकार को डराने का था। इन लोगों की योजना थी कि मुंबई, पुणे, सतारा और शोलापुर में भी इसी तरह की वारदातें की जाएं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गिरफ्तार किए गए लोगों का संबंध दक्षिणपंथी हिन्दू संगठनों से था।

सचिन प्रकाशराव अंदुरे नामक एक व्यक्ति को 18 अगस्त की रात पुणे से गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उसे 26 अगस्त तक सीबीआई रिमांड पर भेज दिया। सीबीआई के मुताबिक औरंगाबाद का रहने वाला अंदुरे ही दाभोलकर हत्याकांड में मुख्य शूटर था। इसके पहले सीबीआई की चार्जषीट में आरोपियों के रूप सारंग आकालेकर ओर विनय पवार के नाम थे और दोनों को फरार बताया गया था। ऐस में अब अंदुरे को आरोपी बनाए जाने के सवाल पर सीबीआई प्रवक्ता ने कहा कि मामले में पड़ताल जारी है। सीबीआई के मुताबिक एटीएस ने पिछले हफ्ते राज्य मं कथित तौर पर कुछ धमाकों की साजिष के संबंध में तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। उन्हीं में से एक शरद कलस्कर है जिसने नरेन्द्र दाभोलकर हत्याकांड में शामिल होने की बात कबूली है। उसी ने बताया कि दाभोलकर की हत्या में अंदुरे भी शामिल था। एटीएस ने यह जानकारी सीबीआई को दी थीं साथ ही कलस्कर को उसके हवाले कर दिया था। इस मामले में सीबीआई ने जून 2016 मे हिंदू जन जागृति समिति के सदस्य वीरेन्द्र तावड़े के खिलाफ चार्जषीट दायर की थी। सीबीआई ने तब तावड़े को घटना का मुख्य साजिशकर्ता बताया था। आरोपी की गिरफ्तारी पर दाभोलकर की बेटी मुक्ता ने मीडिया से कहा ‘‘उनकी हत्या के बाद इसी अंदाज में तीन ओर हत्याएं की गईं। जांच एजेसिंयों का कहना था कि इन चारों हत्याओं का आपस में सबंध है। उन्हें विचारधारा के टकराव की वजह से मार दिया गया‘‘।

सचिन अंदूरे ने पूछताछ के दौरान नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के मामले में जालना नगरपालिका के शिवसेना के एक पूर्व पार्षद श्रीकांत पंगारकर का भी नाम लिया। उसके बयान के आधार पर श्रीकांत को 19 अगस्त को गिरफ्तार किया गया। पंगारकर हिंदू जनजागृति समिति का पदाधिकारी है।

 

 

 

Posted by: Bagewafa | اپریل 23, 2020

اور بس۔۔۔۔۔عمار اِقبال۔کراچی

اور بس۔۔۔۔۔عمار اِقبال۔کراچی

جاوید کے نام۔۔۔۔علامہ داکٹر سر محمد اِقبال رح۔

(لندن میں اُس کے ہاتھ کا لِکھّا ہُوا پہلا خط آنے پر) .

دیارِ عشق میں اپنا مقام پیدا کر
نیا زمانہ، نئے صبح و شام پیدا کر

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خدا اگر دل فطرت شناس دے تجھ کو
سکُوتِ لالہ و گُل سے کلام پیدا کر

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اُٹھا نہ شیشہ گرانِ فرنگ کے احساں
سفالِ ہند سے مِینا و جام پیدا کر

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میں شاخِ تاک ہوں، میری غزل ہے میرا ثمر
مرے ثمر سے میء لالہ فام پیدا کر

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مرا طریق امیری نہیں، فقیری ہے
خودی نہ بیچ، غریبی میں نام پیدا کر!

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اک رند ہے اور مدحتِ سلطانِ مدینہ:جگر مرادآبادی

اجمیر شریف میں نعتیہ مشاعرہ تھا، فہرست بنانے والوں کے سامنے یہ مشکل تھی کہ جگر مرادآبادی صاحب کو اس مشاعرے میں کیسے بلایا جائے ، وہ کھلے رند تھے اورنعتیہ مشاعرے میں ان کی شرکت ممکن نہیں تھی۔ اگر فہرست میں ان کانام نہ رکھا جائے تو پھر مشاعرہ ہی کیا ہوا۔ منتظمین کے درمیان سخت اختلاف پیداہوگیا۔ کچھ ان کے حق میں تھے اور کچھ خلاف۔ دراصل جگرؔ کا معاملہ تھا ہی بڑا اختلافی۔

 بڑے بڑے شیوخ اور عارف باللہ اس کی شراب نوشی کے باوجود ان سے محبت کرتے تھے۔ انہیں گناہ گار سمجھتے تھے لیکن لائق اصلاح۔ شریعت کے سختی سے پابند علماء حضرات بھی ان سے نفرت کرنے کے بجائے افسوس کرتے تھے کہ ہائے کیسا اچھا آدمی کس برائی کا شکار ہے۔ عوام کے لیے وہ ایک اچھے شاعر تھے لیکن تھے شرابی۔ تمام رعایتوں کے باوجود علماء حضرات بھی اور شاید عوام بھی یہ اجازت نہیں دے سکتے تھے کہ وہ نعتیہ مشاعرے میں شریک ہوں۔آخر کار بہت کچھ سوچنے کے بعد منتظمین مشاعرہ نے فیصلہ کیا کہ جگر ؔکو مدعو کیا جانا چاہیے۔یہ اتنا جرات مندانہ فیصلہ تھا کہ جگرؔ کی عظمت کا اس سے بڑااعتراف نہیں ہوسکتاتھا۔جگرؔ کو مدعو کیا گیا تووہ سر سے پاؤں تک کانپ گئے۔ ’’میں گنہگار، رند، سیہ کار، بد بخت اور نعتیہ مشاعرہ! نہیں صاحب نہیں‘‘ ۔ اب منتظمین کے سامنے یہ مسئلہ تھا کہ جگر صاحب ؔکو تیار کیسے کیا جائے۔ ا ن کی تو آنکھوں سے آنسو اور ہونٹوں سے انکار رواں تھا۔ نعتیہ شاعر حمید صدیقی نے انہیں آمادہ کرنا چاہا، ان کے مربی نواب علی حسن طاہر نے کوشش کی لیکن وہ کسی صورت تیار نہیں ہوتے تھے، بالآخر اصغرؔ گونڈوی نے حکم دیا اور وہ چپ ہوگئے۔ سرہانے بوتل رکھی تھی، اسے کہیں چھپادیا، دوستوں سے کہہ دیا کہ کوئی ان کے سامنے شراب کا نام تک نہ لے۔ دل پر کوئی خنجر سے لکیر سی کھینچتا تھا، وہ بے ساختہ شراب کی طرف دوڑتے تھے مگر پھر رک جاتے تھے، لیکن مجھے نعت لکھنی ہے ،اگر شراب کا ایک قطرہ بھی حلق سے اتراتو کس زبان سے اپنے آقا کی مدح لکھوں گا۔ یہ موقع ملا ہے تو مجھے اسے کھونانہیں چاہیے،

 شاید یہ میری بخشش کا آغاز ہو۔ شاید اسی بہانے میری اصلاح ہوجائے، شایدمجھ پر اس کملی والے کا کرم ہوجائے، شاید خدا کو مجھ پر ترس آجائے ایک دن گزرا، دو دن گزر گئے، وہ سخت اذیت میں تھے۔ نعت کے مضمون سوچتے تھے اور غزل کہنے لگتے تھے، سوچتے رہے، لکھتے رہے، کاٹتے رہے، لکھے ہوئے کو کاٹ کاٹ کر تھکتے رہے، آخر ایک دن نعت کا مطلع ہوگیا۔ پھر ایک شعر ہوا، پھر تو جیسے بارش انوار ہوگئی۔ نعت مکمل ہوئی تو انہوں نے سجدۂ شکر ادا کیا۔ مشاعرے کے لیے اس طرح روانہ ہوئے جیسے حج کو جارہے ہوں۔ کونین کی دولت ان کے پاس ہو۔ جیسے آج انہیں شہرت کی سدرۃ المنتہیٰ تک پہنچنا ہو۔ انہوں نے کئی دن سے شراب نہیں پی تھی، لیکن حلق خشک نہیں تھا۔ادھر تو یہ حال تھا دوسری طرف مشاعرہ گاہ کے باہر اور شہرکے چوراہوں پر احتجاجی پوسٹر لگ گئے تھے کہ ایک شرابی سے نعت کیوں پڑھوائی جارہی ہے۔ لوگ بپھرے ہوئے تھے۔ اندیشہ تھا کہ جگرصاحب ؔ کو کوئی نقصان نہ پہنچ جائے یہ خطرہ بھی تھاکہ لوگ اسٹیشن پر جمع ہوکر نعرے بازی نہ کریں۔ ان حالات کو دیکھتے ہوئے منتظمین نے جگر کی آمد کو خفیہ رکھا تھا۔وہ کئی دن پہلے اجمیر شریف پہنچ چکے تھے جب کہ لوگ سمجھ رہے تھے کہ مشاعرے والے دن آئیں گا۔جگر اؔپنے خلاف ہونے والی ان کارروائیوں کو خود دیکھ رہے تھے اور مسکرا رہے تھے؎

 کہاں پھر یہ مستی، کہاں ایسی ہستی

 جگرؔ کی جگر تک ہی مے خواریاں ہیں

 آخر مشاعرے کی رات آگئی۔جگر کو بڑی حفاظت کے ساتھ مشاعرے میں پہنچا دیا گیا۔ سٹیج سے آواز ابھری’’رئیس المتغزلین حضرت جگر مرادآبادی!‘‘ ۔۔۔۔۔۔اس اعلان کے ساتھ ہی ایک شور بلند ہوا، جگر نے بڑے تحمل کے ساتھ مجمع کی طرف دیکھا… اور محبت بھرے لہجے میں گویاں ہوئے۔۔

’’آپ لوگ مجھے ہوٹ کررہے ہیں یا نعت رسول پاک کو،جس کے پڑھنے کی سعادت مجھے ملنے والی ہے اور آپ سننے کی سعادت سے محروم ہونا چاہتے ہیں‘‘۔

 شور کو جیسے سانپ سونگھ گیا۔ بس یہی وہ وقفہ تھا جب جگر کے ٹوٹے ہوئے دل سے یہ صدا نکلی ہے…

اک رند ہے اور مدحتِ سلطان مدینہ

 ہاں کوئی نظر رحمتِ سلطان مدینہ

 جوجہاں تھا ساکت ہوگیا۔ یہ معلوم ہوتا تھا جیسے اس کی زبان سے شعر ادا ہورہا ہے اور قبولیت کا پروانہ عطا ہورہا ہے۔نعت کیا تھی گناہگار کے دل سے نکلی ہوئی آہ تھی،خواہشِ پناہ تھی، آنسوؤں کی سبیل تھی، بخشش کا خزینہ تھی۔وہ خود رو رہے تھے اور سب کو رلا رہے تھے، دل نرم ہوگئے، اختلاف ختم ہوگئے، رحمت عالم کا قصیدہ تھا، بھلا غصے کی کھیتی کیونکر ہری رہتی۔’’یہ نعت اس شخص نے کہی نہیں ہے، اس سے کہلوائی گئی ہے‘‘۔مشاعرے کے بعد سب کی زبان پر یہی بات تھی.نعت یه تھی..

اک رند ہے اور مدحتِ سلطان مدینہ

 ہاں کوئی نظر رحمتِ سلطان مدینہ

 دامان نظر تنگ و فراوانیِ جلوہ

 اے طلعتِ حق طلعتِ سلطانِ مدینہ

 اے خاکِ مدینہ تری گلیوں کے تصدق

 تو خلد ہے تو جنت ِسلطان مدینہ

 اس طرح کہ ہر سانس ہو مصروفِ عبادت

 دیکھوں میں درِ دولتِ سلطانِ مدینہ

 اک ننگِ غمِ عشق بھی ہے منتظرِ دید

 صدقے ترے اے صورتِ سلطان مدینہ

 کونین کا غم یادِ خدا ور شفاعت

 دولت ہے یہی دولتِ سلطان مدینہ

 ظاہر میں غریب الغربا پھر بھی یہ عالم

 شاہوں سے سوا سطوتِ سلطان مدینہ

 اس امت عاصی سے نہ منھ پھیر خدایا

 نازک ہے بہت غیرتِ سلطان مدینہ

 کچھ ہم کو نہیں کام جگر اور کسی سے

 کافی ہے بس اک نسبت ِسلطان مدینہ​

(جگر مراد آبادی)

कोई उम्मीद बर नहीं आती……गालिब

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नज़र नहीं आती

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मौत का एक दिन मुअय्यन है

नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

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आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी

अब किसी बात पर नहीं आती

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जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद

पर तबीअत इधर नहीं आती

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है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ

वर्ना क्या बात कर नहीं आती

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क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं

मेरी आवाज़ गर नहीं आती

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दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता

बू भी ऐ चारागर नहीं आती

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हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी

कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

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मरते हैं आरज़ू में मरने की

मौत आती है पर नहीं आती

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काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’

शर्म तुम को मगर नहीं आती

Posted by: Bagewafa | مارچ 5, 2020

چل بسا۔۔۔۔۔۔محمد صادق

چل بسا۔۔۔۔۔۔محمد صادق

(Courtesy:Bilal Manjra..Preston U.K)

दर्दं अंगेज हो गई गजल….वसीम मलीक

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درد انگیز ہو گئ غزل۔۔۔۔وسیم ملیک

 

वे मुसलमान थे – देवी प्रसाद मिश्र की कविता

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कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे
ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे
वे मुसलमान थे
उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!
बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया
वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की
प्रतिपक्षी के खून में घुटनों तक
और अपने खून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे
न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे मुसलमान थे
वे फारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फरगना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए
वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे कि या खुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू
वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं
वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिखेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे
वे मुसलमान थे
यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे
वे मुसलमान थे
वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता
मीर मकदूम मोमिन न होते
शबाना न होती
वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला खुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला गालिब न होता
मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता
वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे
वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे
इमरान खान को देखकर वे खुश होते थे
वे खुश होते थे और खुश होकर डरते थे
वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे
वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे
वे फिलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
खुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे
वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे
वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाजें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं
वे शहर के बाहर रहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दजला का नहीं यमुना का पानी पीते थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज्यादातर अखबार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ्यू लगते हैं
कर्फ्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
खबरें आती थीं
उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे
वे अगर पाँच बार नमाज पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे
वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मकबरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताकत है
अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे
वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ के झटके महसूस करते थे
वे मुसलमान थे इसलिए
तूफान में फँसे जहाज के मुसाफिरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए
वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे
सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे
वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफवाह नहीं थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे

قائد کی طرح جی۔ -شکیل قادری

 

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یہ کس نے کہا زندگی مفسد کی طرح جی۔

غازی کی طرح، یا تو مجاہد کی طرح جی۔

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سینوں میں پنپتی ہے اسی ضد کی طرح جی۔

سجدے میں کٹا سر کسی ساجد کی طرح جی۔

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جابرؔ ہو اسے پھونک دے بس عزم سے اپنے

اس دور میں بے تیغ مجاہد کی طرح جی۔

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لڑنا ہو تو ایمان کو شمشیر بنا لے

نقطہ ہے یہی آبدو – زاہد کی طرح جی۔

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پھر مسجدے اقصٰی تجھے دیتی ہے سدائیں

توحید کا حامی ہے تو خالد کی طرح جی۔

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کرنی ہے اگر پیروی اے بوزرو سلماں

اسلام کے اک سچے مقلد کی طرح جی۔

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ہاں! جس نے چھڑایا تھا اسیرانے قفس کو

لازم ہے جہاں میں اسی قائد کی طرح جی۔

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ہر شے میں خدا کو تو اگر دیکھنا چاہے

رکھ دل پے نظر اپنے، مشاہد کی طرح جی۔

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تصویر بگڑتی نظر آتی ہے تو ڈر کیا؟

ہمت سے زمانہ میں مجدد کی طرح جی۔

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ہو جائیگی تقدیر عبادت سے منور

ماں کی یہ نصیحت تھی کہ عابد کی طرح جی۔

.

آنکھوں میں رقم جس کی ہے پیغامے محبت

کہیتا ہے کوئی بس اسی قاصد کی طرح جی۔

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ہو جائیگا دل تیرا "شکیل” اس طرح روشن

ہر لمحہ تو سچے کسی مرشد کی طرح جی۔

क़ाइद की तरह जी। -शकील क़ादरी

 

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यह किस ने कहा ज़िन्दगी मुफ़्सिद की तरह जी।

ग़ाज़ी की तरह, या तो मुजाहिद की तरह जी।

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सीनों में पनपती है उसी ज़िद की तरह जी।

 सजदे में कटा सर किसी साजिद की तरह जी।

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जाबिर हो उसे फूंक दे बस अज़्म से अपने

 इस दौर में बे-तेग़ मुजाहिद की तरह जी।

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लड़ना हो तो ईमान को शम्शीर बना ले

 नुक्ता है यही आबिदो – ज़ाहिद की तरह जी।

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फिर मस्जिदे अक़्सा तुझे देती है सदाएं

 तौहीद का हामी है तो ख़ालिद की तरह जी।

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करनी है अगर पैरवी ए बूज़रो सलमाँ

 इस्लाम के इक सच्चे मुक़ल्लिद की तरह जी।

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हाँ! जिस ने छुड़ाया था असीराने क़फ़स को

 लाज़िम है जहाँ में उसी क़ाइद की तरह जी।

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हर शय में ख़ुदा को तू अगर देखना चाहे

 रख दिल पे नज़र अपने, मुशाहिद की तरह जी।

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तस्वीर बिगड़ती नज़र आती है तो डर क्या?

हिम्मत से ज़माने में मुजद्दिद की तरह जी।

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हो जाएगी तक़दीर इबादत से मुनव्वर

 माँ की यह नसीहत थी कि आबिद की तरह जी।

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आँखों में रक़म जिस की है पैग़ामे मुहब्बत

 कहेता है कोई बस उसी क़ासिद की तरह जी।

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हो जाएगा दिल तेरा "शकील” इस तरह रौशन

 हर लम्हा तू सच्चे किसी मुर्शिद की तरह जी।

Posted by: Bagewafa | فروری 26, 2020

Munawwar Rana & Rahat Indori : Mushaira Aur Hum | Jashn-e-Rekhta

Munawwar Rana & Rahat Indori : Mushaira Aur Hum | Jashn-e-Rekhta

فقت بہانا ہے۔۔۔تسلیم اِلاہی زُلفی ۔

میدانِ حق کے مجایدوں کے نام۔۔۔انیس اشفاق

وہ مسلسل چپ ہے تیرے سامنے تنہائی میں۔۔ اقبال ساجد

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وہ مسلسل چپ ہے تیرے سامنے تنہائی میں

سوچتا کیا ہے اتر جا بات کی گہرائی میں

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سرخ رو ہونے نہ پایا تھا کہ پیلا پڑ گیا

چاند کا بھی ہاتھ تھا جذبات کی پسپائی میں

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بے لباسی ہی نہ بن جائے کہیں تیرا لباس

آئینے کے سامنے پاگل نہ ہو تنہائی میں

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تو اگر پھل ہے تو خود ہی ٹوٹ کر دامن میں آ

میں نہ پھینکوں گا کوئی پتھر تری انگنائی میں

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رات بھر وہ اپنے بستر پر پڑا روتا رہا

دور اک آواز بنجر ہو گئی شہنائی میں

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دائرے بڑھتے گئے پرکار کا منہ کھل گیا

وہ بھی داخل ہو گیا اب سرحد رسوائی میں

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حبس تو دل میں تھا لیکن آنکھ تپ کر رہ گئی

رات سارا شہر ڈوبا درد کی پروائی میں

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آنکھ تک بھی اب جھپکنے کی مجھے فرصت نہیں

نقش ہے دیوار پر تصویر ہے بینائی میں

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لوگ واپس ہو گئے ساجدؔ نمائش گاہ سے

اور میں کھویا رہا اک محشر رعنائی میں

مقبوضہ کشمیر۔۔۔۔۔۔۔۔تسلیم الَھی زُلفی۔کینیدا

(Courtesy:Facebook wall Janab Tasleem Ilahi Zulfi..Canada)

Posted by: Bagewafa | جنوری 24, 2020

تیری لگن سائیں۔۔۔۔۔نسرین سید

تیری لگن سائیں۔۔۔۔۔نسرین سید

(Courtesy: Facebookwall)

ملاکر دیکھوںگا۔۔۔۔تسلیم اِیلاہی زُلفی

(Courtesy:Facebookwall)

शाहीन बाग़ : प्रोफेसर सुषमा अंधारे Full Speech – Aurangabad News

بھیگ جاتی ہیں۔۔۔۔۔وصی شاہ

                                              

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سمندر میں اترتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

تری آنکھوں کو پڑھتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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تمہارا نام لکھنے کی اجازت چھن گئی جب سے

کوئی بھی لفظ لکھتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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تری یادوں کی خوشبو کھڑکیوں میں رقص کرتی ہے

ترے غم میں سلگتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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نہ جانے ہو گیا ہوں اس قدر حساس میں کب سے

کسی سے بات کرتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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میں سارا دن بہت مصروف رہتا ہوں مگر جوں ہی

قدم چوکھٹ پہ رکھتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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ہر اک مفلس کے ماتھے پر الم کی داستانیں ہیں

کوئی چہرہ بھی پڑھتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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بڑے لوگوں کے اونچے بد نما اور سرد محلوں کو

غریب آنکھوں سے تکتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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ترے کوچے سے اب میرا تعلق واجبی سا ہے

مگر جب بھی گزرتا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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ہزاروں موسموں کی حکمرانی ہے مرے دل پر

وصیؔ میں جب بھی ہنستا ہوں تو آنکھیں بھیگ جاتی ہیں

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आँखें भीग जाती हैं….वसी शाह

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समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से

कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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तिरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है

तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से

किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर जूँही

क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं

कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को

ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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तिरे कूचे से अब मेरा तअ’ल्लुक़ वाजिबी सा है

मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

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हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर

‘वसी’ मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

Posted by: Bagewafa | دسمبر 30, 2019

مرحبا۔۔۔۔سلمان اطہر

مرحبا۔۔۔۔سلمان اطہر

अंजना ओम कश्यप की बैंड बजाने वाले Varun Grover ने NRC को पर धमाकेदार बात कही है

جو ہوگا دیکھا جائےگا۔۔۔۔۔فہمیدا ریاض

हम कागज नहीं दिखायेंगे……वरुण ग्रोवर

जिंदगी का राज मुजमिर……रामप्रसाद ‘ बिस्मिल’

Courtesy:Janab Shakeek Qadri’s facebook wall with gratitude)

Posted by: Bagewafa | دسمبر 18, 2019

!Qaum Farosh..memood Madni(Tandvi?)

!Qaum Farosh..memood Madni(Tandvi?)

‘जज मार देंगे तो दूसरे जज कैसे काम करेंगे?

‘जज मार देंगे तो दूसरे जज कैसे काम करेंगे?
सुनिए जस्टिस लोया पर रिटायर्ड जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल की बात

(Courtesy: Youtube)

مقدر بن گیا۔۔بے گھر ہوگئے۔۔۔۔اعتماد صدقی

Posted by: Bagewafa | دسمبر 12, 2019

जमीन नहीं….दुष्यंतकुमार

जमीन नहीं….दुष्यंतकुमार

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तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

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मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ

मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

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तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह

तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

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तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ

अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

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तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर

तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

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बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ

ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं

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ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो

तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं

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(Courtesy: Natwar Mehta..Facebook)

Posted by: Bagewafa | دسمبر 2, 2019

ہم لوگ۔۔۔۔۔صا لح اچھا

ہم لوگ۔۔۔۔۔صا لح اچھا

Posted by: Bagewafa | نومبر 22, 2019

Allama IQBAL Ka Safar with Molana Tariq Jameel 23 march 2018

Allama IQBAL Ka Safar with Molana Tariq Jameel 23 march 2018

تو مجھ کوپہچان۔۔۔۔۔۔۔رحمان خاور

Posted by: Bagewafa | نومبر 14, 2019

یہ سانح کب تک۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

یہ سانح کب تک۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

(Courtesy: Facebook wall)

Posted by: Bagewafa | نومبر 13, 2019

Ayodhya Verdict…..Rana ayyub

Rana Ayyub On Ayodhya Verdict: Forget Closure, Muslims Can’t Even Say How Unhappy We Are

Pl.click the URL below to read a very informative article of Rana Ayyub.

 

https://www.huffingtonpost.in/entry/rana-ayyub-ayodhya-verdict-babri-masjid_in_5dcbc74ce4b0d43931cc91ad?ncid=other_facebook_eucluwzme5k&utm_campaign=share_facebook&fbclid=IwAR0stiHwNw9yUGMKJR6Et_9i-xMamiAqSsyhCmVR-PFY1t89125Ui7TMTRI

 

 

 

असदुद्दीन ओवैसी का ऐतिहासिक भाषण

#Babri Case: High Court: Preferred Beliefs over Law | Ep 12: by Prof. Faizan Mustafa

 

Posted by: Bagewafa | نومبر 3, 2019

Aashiq – e- Vatan – Maulana Azad – Ep #3

Aashiq – e- Vatan – Maulana Azad – Ep #3

Aashiq – e- Vatan – Maulana Azad – Ep #3

Posted by: Bagewafa | نومبر 3, 2019

گلے سے لگا لیا۔۔۔۔۔۔راھی جون پوری

گلے سے لگا لیا۔۔۔۔۔۔راھی جون پوری

کشمیر کی فریاد۔۔۔۔۔صالح اچھا

Ravish Kumar ने गोदी मिडिया को जम कर धोया || Ravish Kumar Speech

وزیر اعظم کا صفائ ابھیان اور ان کی بھتیجی کے ساتھ لوٹکی واردات۔۔۔۔۔عزیز برنی

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 17, 2019

غزل کی تعریف– عمر وبن حسین بازہر

غزل کی تعریف– عمر وبن حسین بازہر

 غزل خالصتاً عربی لفظ ہے ۔ فیروز اللغات کے مطابق غزل کے معنی ٰ ’’عورت سے بات کرنا ہے ‘‘ اور ’’لغات کشوری‘‘ میں غزل کے دو معنیٰ دیئے گئے ہیں جس میں ایک ہے ’’ وہ شخص جو عورتوں کے عشق کی باتیں کرتا ہے ‘‘۔ اور دیگر معنوں میں ’’کاتنا‘‘ ۔ ’’رسی بٹنا‘‘ یا ’’سوت ریشی‘‘ کے ہیں ۔ اور جو ہو بہو عربی کے معنی ٰہیں ۔ اگر ہم غزل کے معنی ٰ عورت سے باتیں کرنا مراد لیں تو مناسب یا درست دکھائی نہیںدیتا ۔ چونکہ ہر عورت سے باتیں کرنا یعنی ماں سے باتیں کرنا ‘ معلمہ سے باتیں کرنا ‘ ا

ستانی یاٹیچر سے باتیں کرنا بہن سے باتیں کرنا یا رشتہ دارخاتون و عزیز سے باتیں کرنا وغیرہ ۔ غزل کیسے کہلائے گی ؟ البتہ لغت کشوری میں دونوں معنیٰ غزل کے معنوں میں درست ہیں۔ اول الذکر کی مناسبت سے نوجوان لڑکے اور لڑکیوں کے درمیان آپسی بات چیت ان کے درمیان راز ونیاز کی باتیں ‘ شکوے شکایتیں ‘ روٹھنے منانے کی باتیں ‘ ملنے بچھڑے کی باتیں ‘ حسن و عشق کی باتیں وعدے و فاؤں کی باتیں اسطرح نوجوان لڑکے لڑکیوں کے درمیان ہونے والی عشقیہ بات چیت کو غزل کے معنی و مفہوم میں لیا جاتا ہے ۔ اسطرح غزل سے مراد صنف نازک سے لطف اندوز ہونا ‘ اس کے حسن و جمال کی تعریف کرنا اس سے عشق و محبت کا اظہار کرنا اور اسی طرح کے حسین جذباتی واردات غزل کہلاتی ہیں ۔ ڈاکٹر عبدالحلیم ندوی لکھتے ہیں کہ ’’ جاہلی دور کے اصناف سخن میں سب سے اہم اور ممتاز صنف غزل ہے ۔ اور اس غزل کا موضوع اور محور عورت تھی ۔ کیونکہ غزل کے معنی نوجوان لڑکے اور لڑکیوں کی آپس کی بات چیت اور عورتوں سے لطف اندوزی اور ان سے حسن و محبت کی باتیں کرنا ہے ‘‘ ۔

(عربی ادب کی تاریخ ۔ ص 130)

اصناف شاعری کی بات کی جائے تو غزل و اصناف شاعری میں ایک حسین و جمیل نازک سی صنف سخن ہے ۔ بلکہ یہ کہنا غلط نہ ہوگا کہ یہ عروس شاعری (Bride of Poetry) ہے جو بام عروج پر ہے ۔ اوراہمیت کی حامل ہے ۔ یہ صنف ہر دور ‘ ہر طبقہ ہر تہذیب اور ہر زمانہ میں ہر عام و خاص کی مقبول ترین صنف رہی ۔ ماضی میں بھی ہر ایک کے دل کو لبھا رہی تھی اور عصر حاضر میں بھی ہر کوئی اس کا دیوانہ ہے اور یقیناً اس کا سحر کل بھی کم نہ ہوگا ۔ اس طرح یہ بات واضح ہوجاتی ہے کہ غزل اس صنف کو کہیں گے جس میں حسن وعشق یا محب و محبوب سے متعلق مضامین شامل ہوں ۔ یعنی ہجو وصال کا تذکرہ ‘ سوز و غم کا ذکر ‘ وصل معشوق کی لذت اور اسطرح کی دیگر کیفیات عشق واردات محبت شامل ہوں یعنی آنکھوں سے آنکھیں چار ہونا اور ہوش و حواس گم ہونا اور ہمیشہ حسن یار میں کھوئے رہنا وغیرہ ۔ یعنی

ملے کسی سے نظر تو سمجھو غزل ہوئی

 رہی نہ اپنی خبر تو سمجھو غزل ہوئی

 اس روایت کے مدنظر اردو کی زیادہ تر کلاسیکی شاعری حسن و عشق کے مختلف واردات و کیفیات سے ہی متعلق ہے ۔بلکہ ان ہی کیفیات میں رچی بسی ہوئی ہے اس طرح شروعات میں یہ حسین صنف سخن صرف اور صرف حسن و جمال عشق و محبت کے وارداتوں کے ارد گرد گھومتی رہی جس کی ایک خاص وجہ یہ ہے کہ اردو شاعری ہمیشہ فارسی شاعری کی مقلد رہی اس تعلق سے ڈاکٹر نور الحسن ہاشمی رقمطراز ہیں کہ ’’ شعر و شاعری کا عموماً اور ایشیائی شاعری کا خصوصاً عشق و محبت کے جذبات و احساسات سے چولی دامن کا ساتھ رہا ہے ۔ ہماری اردو شاعری سراسر فارسی شاعری کی متبع ہے اپنے ابتدائی حالات میں عشق و محبت و معشوق و دیگر لوازمات عاشقی کے وہی سانچے وہی تصورات اور وہی معیار رکھتی ہے جو ایران میں اس وقت رائج تھے ‘‘ ۔

( دلی کا دبستان شاعری ۔ ص 24)

Tablighi Jamaat ke Baare Mein Sawal Sheikh Makki Al hijazi شیخ مکی الحجازی

Tablighi Jamaat ke Baare Mein Sawal Sheikh Makki Al hijazi شیخ مکی الحجازی

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 11, 2019

Ravish Kumar Octo.112019

Prime Time With Ravish Kumar, Oct 11, 2019

Prime Time With Ravish Kumar, Oct 11, 2019 | Are Trade ties With China Hurting Indian Manufacturers?

آہ جاتی ہے فلک پر (ایک رُلا دینے والی دُعا) —-آغا حشر کاشمیری

 

امت مسلمہ کی موجودہ حالت پر ایک رُلا دینے والی دعا

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آہ جاتی ہے فلک پر رحم لانے کے لئے

بادلو! ہٹ جاﺅ دے دو راہ جانے کے لئے

.

اے دعا! ہاں عرض کر عرشِ الٰہی تھام کے

اے خدا، رخ پھیر دے اب گردش ایام کے

.

رحم کر اپنے نہ آئینِ کرم کو بھول جا

ہم تجھے بھولے ہیں لیکن تو نہ ہم کو بھول جا

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خلق کے راندے ہوئے دنیا کے ٹھکرائے ہوئے

آئے ہیں اب تیرے در پر ہاتھ پھیلائے ہوئے

.

خوار ہیں، بدکار ہیں، ڈوبے ہوئے ذلت میں ہیں

کچھ بھی ہیں لیکن ترے محبوب کی امت میں ہیں

.

حق پرستوں کی اگر کی تو نے دلجوئی نہیں

طعنہ دیں گے بت کہ مسلم کا خدا کوئی نہی

DR.TASLIM AHMED REHMANI | NATIONAL SECRETARY | SOCIAL DEMOCRATIC PARTY OF INDIA |

 

मुसलमानों का मोहल्ला।—-~निखिल सचान

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मेरा इक दोस्त अक्सर कहता था, कि ये

 कौमी एकता की बातें

 बस कहने में अच्छी लगती हैं.

कहता था, कि तुम कभी

 मुसलमानों के मोहल्ले में

 अकेले गए हो ?

कभी जाकर देखो. डर लगता है.

वो मुसलमानों से बहुत डरता था

 हालांकि उसे शाहरुख़ खान बहुत पसंद था

उसके गालों में घुलता डिम्पल

 और उसकी दीवाली की रिलीज़ हुई फ़िल्में भी

 दिलीप कुमार यूसुफ़ है, वो नहीं जानता था

 उसकी फिल्में भी वो शिद्दत से देखता था

 वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

वो इंतज़ार करता था आमिर की क्रिसमस रिलीज़ का

और सलमान की ईदी का

 गर जो ब्लैक में भी टिकट मिले

 तो सीटियाँ मार कर देख आता था

 वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

वो मेरे साथ इंजीनियर बना

 विज्ञान में उसकी दिलचस्पी इतनी कि

 कहता था कि अब्दुल कलाम की तरह

 मैं एक वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ

 और देश का मान बढ़ाना चाहता हूँ

 वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

वो क्रिकेट का भी बड़ा शौक़ीन था

 ख़ासकर मोहोम्मद अज़हरुद्दीन की कलाई का

 ज़हीर खान और इरफ़ान पठान की लहराती हुए गेंदों का

 कहता था कि ये तीनों जादूगर हैं

 ये खेल जाएं तो हम हारें कभी न

 वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

वो नरगिस और मधुबाला के हुस्न का मुरीद था

 उन्हें वो ब्लैक एंड व्हाईट में देखना चाहता था

 वो मुरीद था वहीदा रहमान की मुस्कान का

 और परवीन बाबी की आशनाई का

 वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

वो जब भी दुखी होता था तो मुहम्मद रफ़ी के गाने सुनता था

 कहत था कि ख़ुदा बसता है रफ़ी साहब के गले में

 वो रफ़ी का नाम कान पर हाथ लगाकर ही लेता था

 और नाम के आगे हमेशा लगाता था साहब

अगर वो साहिर के लिखे गाने गा दें

 तो ख़ुशी से रो लेने का मन करता था उसका

 वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

वो हर छब्बीस जनवरी को अल्लामा इकबाल का

 सारे जहाँ से अच्छा गाता था

 कहता था कि अगर

 गीत पर बिस्मिल्ला खान की शहनाई हो

 और ज़ाकिर हुसैन का तबला

 तो क्या ही कहने !

वो उनसे नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

उसे जब इश्क़ हुआ तो लड़की से

 ग़ालिब की ग़ज़ल कहता

 फैज़ के चंद शेर भेजता

 उन्ही उधार के उर्दू शेरों पर पर मिटी उसकी महबूबा

 जो आज उसकी पत्नी है

 वो इन सब शायरों से नहीं डरता था

 बस मुसलमानों से डरता था

बड़ा झूठा था मेरा दोस्त

 बड़ा भोला भी

 वो अनजाने ही हर मुसलमान से

 करता था इतना प्यार

फिर भी न जाने क्यों कहता था, कि वो

 मुसलमानों से डरता था

 वो मुसलमानों के देश में रहता था

 ख़ुशी ख़ुशी, मोहब्बत से

 और मुसलमानों के न जाने कौन से मोहल्ले में

 अकेले जाने से डरता था

दरअसल

 वो भगवान् के बनाए मुसलमानों से नहीं डरता था

 शायद वो डरता था, तो

 सियासत, अख़बार और चुनाव के बनाए

 उन काल्पनिक मुसलमानों से

 जो कल्पना में तो बड़े डरावने थे

 लेकिन असलियत में

ईद की सेंवईयों से जादा मीठे थे !!

(court. Syed Asif Ali)

Posted by: Bagewafa | مارچ 5, 2020

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