ربِ کونین میرے دل کی دعائیں سُن

 

ربِ کونین میرے دل کی دعائیں سُن لے

میں ہوں بے چین میرے دل کی صدائیں سُن لے

شان اعلٰی ہے تیری مالک و مُختار ہے تُو

مجھ کو معلو م ہے دنیا کا مدد گار ہے تُو

میں ہوں محتاج مجھے علم کی دولت دے دے

اپنے انمول خزانے سے انعمت دے دے

میں ہوں کمزور مجھے دولتِ ایماں دے دے

ناتواں بندے سے بھی دین کی خدمت لے لے

جلوہءِ حق سے میرے دل کو فِروزاں کر دے

نور اسلام کا چہرے پہ نمایا ں کر دے

ربِ کونین میرے دل کی دعائیں سُن لے

میں ہوں بے چین میرے دل کی صدائیں سُن لے

میں پریشان ہوں سرمایہ ِ راحت دے دے

اپنے محبوب کی سچی محبت دے دے

جس کے صدقے میں دو عالم کو بنایا تُو نے

میرے محبوب جسے کہہ کر بلایا تُو نے

واسطہ اُس کا گناہ گار کی بخشش کر دے

اپنے اس بندہِ نادل پہ نوازش کر دے

نور اسلام کا چہرے پہ منور کر دے

آمین

रब-ए-कौनैन मेरे दिल की दुआएं सुन ले

 

 

 रब-ए-कौनैन मेरे दिल की दुआएं सुन ले

 मैं हूँ बेचैन मेरे दिल की सदाएँ सुन ले

 शान आला है तेरी मालिक-ओ-मुख़तार है तू

 मुझको मालूम है दुनिया का मददगार है तू

 मैं हूँ मुहताज मुझे इलम की दौलत दे दे

 अपने अनमोल खज़ाने से अनामत दे दे

 मैं हूँ कमज़ोर मुझे दौलत-ए-ईमां दे दे

 नातवां बंदे से भी दीन की ख़िदमत ले-ले

जिलौ हुइ हक़ से मेरे दिल को फ़रोज़ां कर दे

 नूर इस्लाम का चेहरे पे नुमायां कर दे

 रब-ए-कौनैन मेरे दिल की दुआएं सुन ले

 मैं हूँ बेचैन मेरे दिल की सदाएँ सुन ले

 मैं परेशान हूँ सरमायाॱएॱ राहत दे दे

 अपने महबूब की सच्ची मुहब्बत दे दे

 जिसके सदक़े में दो-आलम को बनाया तू ने

 मेरे महबूब जिसे कह कर बुलाया तू ने

 वास्ता उस का गुनाहगार की बख़शिश कर दे

 अपने इस बंदा-ए-ना दिल पे नवाज़िश कर दे

 नूर इस्लाम का चेहरे पे मुनव्वर कर दे

Posted by: Bagewafa | مارچ 18, 2017

बारिश, हां वही बारिश

बारिश, हां वही बारिश 

बारिश, हां वही बारिश

बारिश, हां वही बारिश, वही बारिश जो आसमान से आती थी,
बूंदों में गाती थी, पहाड़ों से फिसलती थी, नदियों में चलती थी,नहरों में मचलती थी, बारिश…
हां, हां वही बारिश, जो आजकल कहीं खो गई है, या फिर थककर सो गई है,
शायद ऐसा भी हो सकता है, बिना आंसू बादल रो सकता है
हमने भी कितने पेड़ तोड़ दिए, संसद की कुर्सियों में जोड़ दिए,
हमने कुएं बुझा दिए, नदियां सूखा दीं, विकास की ताकत से कुदरत झुका दी।
शुक्र है, अब बच्चे शर्म से नहीं मरेंगे, चुल्लू भर पानी के लिए जरूर दुआ करेंगे,
हम शेख चिल्ली नहीं, हम कहां साख पर बैठे हैं,
हम सब अपने शहरों में गांव की राख पर बैठे हैं,
शहर में आज भी पानी कम नहीं, मगर पता नहीं क्यों हमारी आंखें नम नहीं,
जवान देश की मिट्टी के लिए, किसान खेत की मिट्टी के लिए परेशान है,जाग रहा है पता नहीं शहरों की भीड़ में ,कौन किसके लिए जाग रहा है, किसके लिए भाग रहा है।
किसान की समस्या खत्म नहीं होती, पैकेज तो हर साल अस्सी है,
एक भी काम नहीं आता, छुटकारे के लिए बस, एक रस्सी है,
परेशान दोनों हैं, हम सास बहू के रिश्तों में, और किसान लोन की किश्तों में।
बैंक, बीमार, पेस्टीसाइड, दहेज, मंत्रालय, किसान कहां-कहां भटक सकता है,
इंसानों से अच्छा तो आज सूखा पेड़ है, कम से कम उससे लटक तो सकता है।
लेकिन कब तक, कब तक हाथों पर हाथ धरे बारिश का इंतजार करें?
मेंढक की शादी से दिल बहलाएं, नंदी बैल की हां में हां मिलाएं कब तक?
सुना था राजस्थाना में एक जुहरे वाला बाबा है..सहरा से पानी लेककर आया है,राजिंद्रसिंह नाम है दुनिया में छाया है..हमारी बीच भी कोई होगा न..बारिश वाला बाबा.

फिल्मों में बहुत देखे हैं, हां वही, वो आ गया है, सस्ती, सुंदर, टिकाऊ बारिशवाला,
वो फिल्मी नहीं है, हमने कहां उसे ठीक से जाना है, कोई भगवान नहीं, कोई बाबा नहीं, बस हमारा नाना है।
अब हम जान नहीं देंगे, जान लगा देंगे, बारिश को बुलाने के काम में, हमारे अपने नाम में,
उम्मीद है गांव को देख आपकी भीगी आंखें सरकार ही नहीं, भगवान को भी जगा देंगी
अगले साल सस्ती सुंदर टिकाऊ बारिश हम सबको भिगा देगी, हम सबको भिगा देगी

2-बारिश !

हां मेरे दोस्त वही बारिश.
वही बारिश जो आसमान से आती है
बूंदों मैं गाती है
पहाड़ों से फिसलती है
नदियों मैं चलती है
नहरों मैं मचलती है
कुंए पोखर से मिलती है
खप्रेलो पर गिरती है
गलियों मैं फिरती है
मोड़ पर संभालती है
फिर आगे निकलती है व
ही बारिश
ये बारिश अक्सर गीली होती है
इसे पानी भी कहते हैं उर्दू में
आप मराठी में पानी
तमिळ में कन्नी कन्नड़ में नीर
बंगला में… जोल केह्ते हैं
संस्‍कृत में जिसे वारि
नीर जीवन पै अमृत पै अम्बु भी केह्ते हैं
ग्रीक में इसे aqua pura
अंग्रेजी में इसे water फ्रें
च में औ’ और केमिस्ट्री में H2O केह्ते हैं
ये पानी आंखों से ढलता है तो आंसू कहलता है
लेकिन चेहरे पर चढ़ जाये तो रुबाब बन जाता है
हां…कोई शर्म से पानी पानी हो जाता है
और कभी कभी यह पानी सरकारी फाइलों में अपने कुंए समेत चोरी हो जाता है
पानी तो पानी है
पानी जिन्दगानी है
इसलिए जब रूह की नदी सूखी हो
और मन का हिरण प्यासा हो
दीमाग में लगी हो आग
और प्यार की घागर खाली हो
तब मैं….हमेशा ये बारिश नाम का गीला पानी लेने की राय देता हूं
मेरी मानिए तो
ये बारिश खरीदिये
सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश
सिर्फ 5 हज़ार रुपये में
इस्से कम में दे कोई तो चोर की सज़ा वो मेरी
आपकी जूती सिर पर मेरी
मेरी बारिश खरीदये
सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश

 

قیامت کبھی کبھی ۔۔۔۔۔۔ ناصر کاظمی

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ہوتی ہے تیرے نام سے وحشت کبھی کبھی

برہم ہوئی ہے یوں بھی طبیعت کبھی کبھی

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اے دل کسے نصیب یہ توفیقِ اضطراب

ملتی ہے زندگی میں یہ راحت کبھی کبھی

تیرے کرم سے اے اَلمِ حسن آفریں

دل بن گیا ہے دوست کی خلوت کبھی کبھی

جوشِ جنوں میں درد کی طغیانیوں کے ساتھ

اشکوں میں ڈھل گئی تری صورت کبھی کبھی

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تیرے قریب رہ کے بھی دل مطمئن نہ تھا

گزری ہے مجھ پہ یہ بھی قیامت کبھی کبھی

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کچھ اپنا ہوش تھا نہ تمہارا خیال تھا

یوں بھی گزر گئ شبِ فرقت کبھی کبھی

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اے دوست ہم نے ترکِ محبّت کے باوجود

محسوس کی ہے تیری ضرورت کبھی کبھی

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क़यामत कभी कभी —-नासिर काज़मी

 .

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

बरहम हुई है यूँ भी तबीअत कभी कभी

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ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब

मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी

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तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-आफ़रीं

दिल बन गया है दोस्त की ख़ल्वत कभी कभी

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जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़्यानियों के साथ

अश्कों में ढल गई तिरी सूरत कभी कभी

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तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था

गुज़री है मुझ पे ये कयामत  कभी कभी

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कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था

यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी कभी

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ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद

महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी

طشتری میں باپ نے پایا جواں بیٹے کا سر۔۔۔۔۔۔ شکیل قادری

 

چھین کر ہونٹوں سے پریوں کی کہانی لے گئی

مفلسی معصوم بچوں کی نشانی لے گئی

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طشتری میں باپ نے پایا جواں بیٹے کا سر

چھین کر جب بدنصیبی راجدھانی لے گئی

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چھین لی ہے چاندنی نے تیرے چہرے کی چمک

اور گھنے بالوں کی خوشبو رات رانی لے گئی

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گاؤں سے اس شہر میں پنہاری کل جو آئی تھی

اپنے قوزے میں وہ میری خاندانی لے گئی

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اس کو کر دے گا بڈھاپا ہی مکمل اب ‘شکیل’

نا مکمل جو کہانی نوجوانی لے گئی

 .

 

 

 .

तश्तरी में बापने पाया जवाँ बेटे का सर…शकील क़ादरी

छीन कर होंटों से परियों की कहानी ले गई

मुफ़्लिसी मासूम बच्चों की निशानी ले गई

 .

तश्तरी में बापने पाया जवाँ बेटे का सर

छीन कर जब बदनसीबी राजधानी ले गई

 .

छीन ली है चाँदनीने तेरे चह्रे की चमक

और घने बालों की ख़ुश्बू रातरानी ले गई

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गाँव से इस शह्र में पनिहारी कल जो आई थी

अपने क़ूज़े में वो मेरी ख़ानदानी ले गई

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उस को कर देगा बुढापा ही मुकम्मिल अब ‘शकील’

नामुकम्मिल जो कहानी नौजवानी ले गई

میرے ہاتھوں میں لکیروں کے سوا کچھ بھی نہیں۔۔۔۔۔۔راجیش ریڈی

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زندگی تو نے لہو لے کے دیا کچھ بھی نہیں

تیرے دامن میں میرے واسطے کیا کچھ بھی نہیں

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میرے اِن ہاتھوں کی چاہو تو تلاشی لے لو

میرے ہاتھوں میں لکیروں کے سوا کچھ بھی نہیں

 .

یا خدا اب کے یہ کس رنگ سے آئی ہے بہار

زرد ہی زرد ہے پیڑوں پہ ، ہرا کچھ بھی نہیں

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دل بھی اک ضد پہ اڑا ہے کسی بچے کی طرح

یا تو سب کچھ ہی اِسے چاہئے یا کچھ بھی نہیں

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं—– राजेश रेड्डी

 .

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ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं|

तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं|

 .

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशि ले लो,

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं|

 .

या ख़ुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार,

ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं|

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दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,

या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं|

Syed Shahabuddin: the most misunderstood politician

 Original_syed-shahabuddin

The misunderstood leader, politician, intellectual, activist.

Syed Shahabuddin happens to be one of the most misunderstood politicians and is probably the worst victim of hostile media. Given his contribution and services to the Indian Muslims he does not deserve the ungratefulness as being so ignorantly displayed by some of us.

With a gold medal from Patna University and successful diplomatic career, had he compromised on his principles he would surely have become president or at least vice president of India and would now be living a peaceful and comfortable life earning praises from everyone, including media network.

After being nominated as a Janata Dal MP in the Rajya Sabha he articulated Muslims’ grievances, asked questions and kept an open eye on all the ills pestering Indian Muslims. Undeterred by the hostility of the media as well as his own party he kept on speaking and writing on Muslim issues and paid the price by never being able to return to the parliament. In this respect (being in a secular party and still articulating Muslims’ issues), except Maulana Hifzurrehman Saheb, he has no match in post-independent India. It was him who, in the 80s assembled Muslim MPs, from all the parties, and met the then Prime Minister Mrs Indira Gandhi to highlight the problems being faced by Muslims in India. I still remember an editorial in the Times of India headed, “Playing with fire” in which Shahabuddin Saheb was viciously vilified.

No Muslim or non-Muslim politician has written so much on Muslim issues as Shahabuddin. One of his most outstanding contributions to the Muslim community is the Muslim India, a journal of research and documentation that no research scholar working on Indian Muslims can afford to ignore.

There is not a single thing, either in his writings or speeches that would put him in the category of either a communalist or a fundamentalist. A communalist! What an absurd idea? Only because he stood to protect Muslim personal law – a right enshrined in the constitution of India he was branded so. Because in the wake of Moradabad riots, 1980, his was the most courageous speech in the parliament. Because he spoke against the Hindutva fascists. And when he demanded ban on Salman (Shaitan) Rushdi’s novel, he was even called a fundamentalist (sic).

Four years ago a friend of mine, Dr Hilal Ahmed, during his PhD at the the School of Oriental and African Studies (SOAS), London, wrote a well-researched paper, based on Shahabuddin’s editorials published in Muslim India. When he showed it to his supervisor, a leading expert on Indian politics the gentleman remarked that so far his impression of Shahabuddin Saheb was based on media reports and that was the first time he had actually read his writings. “From this he comes out to be a brilliant political thinker”, the expert told my friend.

But such is the ungrateful nature of our community that a professor from the Department of Political Science of AMU met Hilal Saheb at a seminar and himself requested him to contribute to his journal. Hilal Saheb abridged the aforementioned paper and sent it to the learned Professor. However, the Professor refused to publish the paper saying that in his view neither Shahabuddin was an intellectual nor an activist.

(courtesy: Milli Gazette)

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं —-क़तील शिफ़ाई

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गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं

हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

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बच निकलते हैं अगर आतिह-ए-सय्याद से हम

शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

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ख़ुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा

जिन को जलना हो वो आराअम से जल जाते हैं

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शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये

हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

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जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ

जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं

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रब्ता बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन

आशना जब तेरे पैग़ाम से जल जाते हैं

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گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں – قتیل شفائی

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گرمئی حسرتِ ناکام سے جل جاتے ہیں

ہم چراغوں کی طرح شام سے جل جاتے ہیں

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شمع جس آگ میں جلتی ہے نمائش کے لیے

ہم اُسی آگ میں گمنام سے جل جاتے ہیں

 .

خود نمائی تو نہیں شیوہء اربابِ وفا

جن کو جلنا ہو وہ آرام سے جل جاتے ہیں

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بچ نکلتے ہیں اگر آتشِ سیّال سے ہم

شعلہء عارضِ گلفام سے جل جاتے ہیں

 .

جب بھی آتا ہے مرا نام ترے نام کے ساتھ

جانے کیوں لوگ مرے نام سے جل جاتے ہیں

 .

رابتہ باہم پہ ہمیں کیا نہ کہیں گے دشمن

آشنا جب تیرے پیغام سے جل جاتے ہیں

नजीब की मांकी फरियाद…….इमरान प्रतापगढी

 

 .

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,

समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली

.

मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,

तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली

.

वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे,

वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे

.

यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है,

तडप करके ये एक मॉं कह रही है

कोई पूँछता ही नहीं हाल मेरा…..!

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा

 .

उसे ले के वापस चली जाऊँगी मैं,

पलट कर कभी फिर नहीं आऊँगी मैं

.

बुढापे का मेरे सहारा वही है,

वो बिछडा तो ज़िन्दा ही मर जाऊँगी मैं

.

वो छ: दिन से है लापता ले के आये,

कोई जा के उसका पता ले के आये

 .

वही है मेरी ज़िन्दगी का कमाई,

वही तो है सदियों का आमाल मेरा

.

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा!

 .

ये चैनल के एंकर कहॉं मर गये हैं,

ये गॉंधी के बंदर कहॉं मर गये हैं

.

मेरी चीख़ और मेरी फ़रियाद कहना,

ये मोदी से इक मॉं की रूदाद कहना

 .

कहीं झूठ की शख़्सियत बह ना जाये,

ये नफ़रत की दीवार छत बह ना जाये

.

है इक मॉं के अश्कों का सैलाब साहब,

कहीं आपकी सल्तनत बह ना जाये

 .

उजड सा गया है गुलिस्तॉं वतन का

नहीं तो था भारत से ख़ुशहाल मेरा

 .

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा।

نجیب کی ماں کی فریاد۔۔۔۔عمران پرتاپ گھڑی

 

سنا تھا که بیحد سنہری ہے دہلی،

سمندر سی خاموش گہری ہے دہلی

 .

مگر ایک ماں کی صدا سن نہ پائے،

تو لگتا ہے گونگی ہے بحری ہے دہلی

 .

وہ آنکھوں میں اشکوں کا دریا سمیٹے،

وہ امید کا اک نظریہ سمیٹے

 .

یہاں کہہ رہی ہے وہاں کہہ رہی ہے،

تڑپ کرکے یہ ایک ماں کہہ رہی ہے

 .

کوئی پوچھتا ہی نہیں حال میرا…۔۔!

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا

.

اسے لے کے واپس چلی جاؤنگی میں،

پلٹ کر کبھی پھر نہیں آؤنگی میں

 .

بڈھاپے کا میرے سہارا وہی ہے،

وہ بچھڑا تو زندہ ہی مر جاؤنگی میں

 .

وہ کئ: دن سے ہے لاپتہ لے کے آئے،

کوئی جا کے اسکا پتہ لے کے آئے

 .

وہی ہے میری زندگی کا کمائی،

وہی تو ہے صدیوں کا اعمال میرا

 .

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا!

 .

یہ چینل کے اینکر کہاں مر گئے ہیں،

یہ گاندھی کے بندر کہاں مر گئے ہیں

.

میری چیخ اور میری فریاد کہنا،

یہ مودی سے اک ماں کی روداد کہنا

 .

کہیں جھوٹھ کی شخصیت بہہ نہ جائے،

یہ نفرت کی دیوار چھت بہہ نہ جائے

 .

ہے اک ماں کے اشکوں کا سیلاب صاحب،

کہیں آپکی سلطنت بہہ نہ جائے

 .

اجڑ سا گیا ہے گل ستاں وطن کا

نہیں تو تھا بھارت سے خوشحال میرا

 .

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا۔

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تھا کتنا دل خراش اداسی کا قہقہہ۔۔۔۔۔کفیل اعظم امروہوی

۔

تنہائی کی گلی میں ہواوٴں کا شور تھا

آنکھوں میں سو رہا تھا اندھیرا تھکا ہوا

۔

سینے میں جیسے تیر سا پیوست ہو گیا

تھا کتنا دل خراش اداسی کا قہقہہ

۔

یوں بھی ہوا که شہر کی سڑکوں پہ بار ہا

ہر شخص سے میں اپنا پتہ پوچھتا پھرا

۔

برسوں سے چل رہا ہے کوئی میرے ساتھ ساتھ

ہے کون شخص اس سے میں اک بار پوچھتا

۔

دل میں اتر کے بجھ گئی یادوں کی چاندنی

آنکھوں میں انتظار کا سورج پگھل گیا

۔

چھوڑی ہے ان کی چاہ تو اب لگ رہا ہے یوں

جیسے میں اتنے روز اندھیروں میں قید تھا

۔

میں نے ذرا سی بات کہی تھی مذاق میں

تم نے ذرا سی بات کو اتنا بڑھا لیا

۔

کمرے میں پھیلتا رہا سگریٹ کا دھواں

میں بند کھڑکیوں کی طرف دیکھتا رہا

۔

‘اعظم یہ کس کی سمت بڑھے جا رہے ہیں لوگ

اس شہر میں تو میرے سوا کوئی بھی نہ تھا

۔

था कितना दिल-ख़राश उदासी का क़हक़हा—–कफील आजम अमरोहवी

तन्हाई की गली में हवाओं का शोर था

आँखों में सो रहा था अँधेरा थका हुआ

.

सीने में जैसे तीर सा पैवस्त हो गया

था कितना दिल-ख़राश उदासी का क़हक़हा

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यूँ भी हुआ कि शहर की सड़कों पे बार-हा

हर शख़्स से मैं अपना पता पूछता फिरा

.

बरसों से चल रहा है कोई मेरे साथ साथ

है कौन शख़्स उस से मैं इक बार पूछता

.

दिल में उतर के बुझ गई यादों की चाँदनी

आँखों में इंतिज़ार का सूरज पिघल गया

.

छोड़ी है उन की चाह तो अब लग रहा है यूँ

जैसे मैं इतने रोज़ अँधेरों में क़ैद था

.

मैं ने ज़रा सी बात कही थी मज़ाक़ में

तुम ने ज़रा सी बात को इतना बढ़ा लिया

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कमरे में फैलता रहा सिगरेट का धुआँ

मैं बंद खिड़कियों की तरफ़ देखता रहा

.

‘आज़र’ ये किस की सम्त बढ़े जा रहे हैं लोग

इस शहर में तो मेरे सिवा कोई भी न था

کیفی اعظمی اچھے شاعر ،بڑے اِنسان۔۔۔۔محمد وصی اللہ حسینی

k1k2k3kaifi4(Courtesy:Daily Shahafat Urdu daily)

ہواوں کو بلایا ہے دیوں کی پیروی کرنے۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔تسلیم اِلاہی زلفی

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تحلیل ۔۔۔۔۔۔۔ اختر الایمان

میری ماں اب مٹی کے ڈھیر کے نیچے سوتی ہے

اسکے جملے، اسکی باتوں،

جب وہ زندہ تھی، کتنا برہم  کرتی تھی

میری روشن تبئی ، اسکی جہالت

ہم دونوں کے بیچ ایک دیوار تھی جیسے

‘رات کو خوشبو کا جھونکا آئے، ذکر نہ کرنا

پیروں کی سواری جاتی ہے’

‘دن میں بگولوں کی زد میں مت آنا

سائے کا اثر ہو جاتا ہے’

‘بارش پانی میں گھر سے باہر جانا تو چوکس رہنا

بجلی گر پڑتی ہے،تو پہلوٹی کا بیٹا ہے’

جب تو میرے پیٹ میں تھا، میں نے ایک سپنا دیکھا تھا

تیری عمر بڑی لمبی ہے

لوگ محبت کرکے بھی تجھ سے ڈرتے رہینگے

میری ماں اب ڈھیروں من مٹی کے نیچے سوتی ہے

سانپ سے میں بیحد خاہف ہوں

ماں کی باتوں سے گھبراکر میں نے اپنا سارا زہر اگل ڈالا ہے

لیکن جب سے سب کو معلوم ہوا ہے میرے اندر کوئی زہر نہیں ہے

اکثر لوگ مجھے احمق کہتے ہیں

तहलील ….. अख़्तर-उल-ईमान

 

मेरी माँ अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है

उसके जुमले, उसकी बातों,

जब वह ज़िंदा थी, कितना बरहम (ग़ुस्सा) करती थी

मेरी रोशन तबई (उदारता), उसकी जहालत

हम दोनों के बीच एक दीवार थी जैसे

 

‘रात को ख़ुशबू का झोंका आए, जि़क्र न करना

पीरों की सवारी जाती है’

‘दिन में बगूलों की ज़द में मत आना

साये का असर हो जाता है’

‘बारिश-पानी में घर से बाहर जाना तो चौकस रहना

बिजली गिर पड़ती है- तू पहलौटी का बेटा है’

 

जब तू मेरे पेट में था, मैंने एक सपना देखा था-

तेरी उम्र बड़ी लंबी है

लोग मोहब्बत करके भी तुझसे डरते रहेंगे

 

मेरी माँ अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है

साँप से मैं बेहद ख़ाहिफ़ हूँ

माँ की बातों से घबराकर मैंने अपना सारा ज़हर उगल डाला है

लेकिन जब से सबको मालूम हुआ है मेरे अंदर कोई ज़हर नहीं है

अक्सर लोग मुझे अहमक कहते हैं ।

اب وہ پہلی سی رفاقات نہ سہی۔۔۔۔۔۔انیس امروہوی

maslahat-anees-amrohvi

 

कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहता कि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए: मुनव्वर राना

 

munawwar-rana

इस मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इनको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए.

(मुनव्वर राणा की फेसबुक वॉल से साभार)

जब पंडित नेहरू ने मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद से यह कहा था कि हम आपको रामपुर से खड़ा कर रहे हैं. मौलाना ने पूछा कि रामपुर से क्यों? नेहरू कहने लगे क्योंकि वो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. इस पर मौलाना ने कहा कि मैं वहां से खड़ा होना पसंद नहीं करूंगा. मैं हिंदुस्तान का लीडर हूं, मुसलमानों का लीडर नहीं हूं. फिर वे गुरुदासपुर, पंजाब से लड़े और जीतकर लोकसभा में आए थे.

अब हम ये नहीं कहते कि भाजपा ने लोकसभा या विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट क्यों नहीं दिया? उन्होंने नहीं दिया या हो सकता है मांगने वाले गए ही न हों. अब अगर वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे का ख़्वाब सही में देखना चाहते थे तो ये होना चाहिए था कि पांच ऐसी सीटों से जो अल्पसंख्यकों की न हों, वहां से पांच मुसलमानों को जितवा कर सदन में पहुंचाते तो उत्तर प्रदेश में ही नहीं, पूरे मुल्क़ में उनकी इज़्ज़त बढ़ती. यह संदेश जाता कि पार्टी वाकई सबका विकास चाहती है. पार्टी की ग़लती ये नहीं है कि उसने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया. पार्टी की ग़लती ये है कि उसे कुछ ऐसे उम्मीदवार जितवाने चाहिए थे जो मुसलमान होते लेकिन मुस्लिम बहुल सीट से न लड़कर ऐसी सीट से लड़ते जहां हिंदू या दूसरी क़ौमें रहती हैं.

एक तरफ़ तो भाजपा भी कहती है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है, दूसरी तरफ़ वह मुसलमानों से दूरी बनाकर रखती है. जब मुसलमानों को आप साथ लेंगे ही नहीं तो कैसे मुसलमान आपके साथ आएंगे

मैंने साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाया तो बार-बार ये कहा था कि मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इसको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. ‘मैं दुश्मन ही सही आवाज़ दे मुझको मुहब्बत से, सलीक़े से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है.’

तो बात यह है कि भाजपा मुसलमानों का कुछ सीटों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके यह संदेश दे सकती थी कि उसके प्रति जैसा सोचा जाता है, वह वैसी नहीं है. इससे अच्छा संदेश जाता. एक पार्टी जो सत्ता में है, उसके लिए ये मुश्किल काम नहीं था. लेकिन वे योगी, साक्षी और इस तरह के लोगों को ज़ंजीर के बग़ैर खुला छोड़ देते हैं. हमने तो ये देखा है कि समाज में, घर में, आंगन में कोई भी आदमी ऐसी वैसी बात करता है तो उसे फ़ौरन डांट दिया दिया जाता है. मुहल्ले का कोई आदमी ऐसी बदतमीज़ी करता है तो सभी नाराज़ होते हैं. बजाय इसके कि ऐसे लोगों को डांट-फटकार कर बैठा दिया जाए, अचानक दो पागल क़िस्म के लीडर खड़े हो जाते हैं, बेवकूफ़ी भरे बयान देते हैं और आपकी राय ये होती है कि ये उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है. तो ऐसा व्यक्ति आपके पास क्यों है जो आपके ख़िलाफ़ राय दे रहा हो. इसका मतलब ये है कि आप ये चाहते ही हैं कि इस मुल्क़ में इत्तेहाद होने ही न पाए.

इतनी बड़ी जीत लेकर भारतीय जनता पार्टी आई थी, अगर वो चाहती तो सूरत बदल सकती थी. जब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाया तो मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाया था तो मैंने कहा कि मैं अकेले नहीं आऊंगा, और भी बड़े लोगों ने लौटाया है, उनको भी बुलाइए. मुझसे मीडिया ने पूछा कि अगर आप जाएंगे तो प्रधानमंत्री से क्या कहेंगे? हमने कहा, हम कोई बात नहीं करेंगे. हम प्रधानमंत्री का हाथ पकड़ेंगे और उनको दादरी ले जाएंगे. अख़लाक़ के घर के पास ले जाकर उनसे कहेंगे कि ‘काले कपड़े नहीं पहने है तो इतना कर ले, इक ज़रा देर को कमरे में अंधेरा कर ले.’ क्योंकि एक इंसान की मौत एक क़ौम की मौत है, एक क़ौम की मौत एक मुल्क़ की मौत है, एक मुल्क़ की मौत पूरी दुनिया की मौत है.

मैं एक शायर और एक हिंदुस्तानी की हैसियत से यही कहना चाहता हूं कि अगर ये चाहें तो सबको मुहब्बत करें और सब इनको मुहब्बत करें. लेकिन ये पूरे मुल्क़ पर हुक़ूमत करना ही नहीं चाहते. ये सिर्फ़ हिंदू पर हुक़ूमत करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हम अपने 65 बरस के तजुर्बे से कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी हुक़ूमत इतिहास के पन्नों में नक़लीपन के साथ भले रह जाए, असल में वो ज़िंदा रहती नहीं है.

जैसी राजनीति भाजपा करती है उसका अंजाम ये हो सकता है कि हिंदुस्तान उतना ही रह जाएगा जितने को काउ बेल्ट कहते हैं. ये जो पांच छह सूबे हैं, यही हिंदुस्तान कहलाएगा. जो बंगाली है उसका बंगाल हो जाएगा. जो मद्रासी है उसका मद्रास हो जाएगा. जो असमिया है उसका असम हो जाएगा, जो गुजराती है उसका गुजरात हो जाएगा. बाक़ी हिंदुस्तान उतने ही नक़्शे में रह जाएगा जितने में काउ बेल्ट है. क्योंकि अगर आप एक क़ानून पूरे मुल्क़ में नहीं चला सकते तो ये तय है कि फिर आप पूरे मुल्क़ को एक नहीं रख सकते. आप गोवा में बीफ़ खाने की पूरी इजाज़त देते हैं, लेकिन वही बीफ़ खाता हुआ आदमी मुंबई एयरपोर्ट पर उतर जाए तो उसको 5 साल की सज़ा हो जाती है. इसका मतलब गोवा अलग मुल्क़ है और मुंबई अलग मुल्क़ है!

ये तय करना पड़ेगा कि यह पूरा एक मुल्क़ है या जो जहां जैसा चाहे वैसा मुल्क़ है! हमने तो जो नक़्शा देखा है वह तो यही है कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है लेकिन ये नारे लिखवाने से काम नहीं चलता.

इस देश में फिलहाल ऐसी कोई सियासी पार्टी नहीं है जो मुसलमानों को यह भरोसा दिला सके कि यह आपका मुल्क है और आप यहां सुरक्षित हैं. हालांकि, वोट के लिए सब ऐसा कहते हैं. लेकिन अगर ऐसा है तो पूरे मुल्क़ में एक बार इस पर भी वोटिंग करा ली जाए कि मुसलमानों को यहां रखना चाहिए या नहीं. तब उन लोगों को अफ़सोस होगा जो ऐसा चाहते हैं क्योंकि 80 प्रतिशत हिंदू कहेंगे कि नहीं, ये हमारे भाई हैं, हमारे जैसे हैं, यहीं पैदा हुए हैं, यहीं रहना है, यहीं जीना-मरना है. ये यहां का चांद देखकर नमाज़ पढ़ते हैं, यहां की ज़मीन पर सज़दा करते हैं, तो ये हमारे साथ यहीं रहेंगे. लेकिन ये जो सियासी लोग हैं ये अपने फ़ायदे के लिए कभी कह देते हैं कि ठीक है, कभी कह देते हैं कि नहीं ठीक है. चुनाव आता है तो दुकानें खुल जाती हैं, वोट बिकते हैं. क्या दाढ़ी वाला, क्या टोपी वाला, चोटी वाला, सबकी ख़रीद-फ़रोख़्त होती है.

यह बहुत मौजूं सवाल है कि आज मुसलमानों में मज़बूत लीडरशिप क्यों नहीं है. मेरे ख़्याल से लीडर मांएं नहीं जनतीं, लीडर क़ौमें ख़ुद पैदा कर लेती हैं. हालात लीडर पैदा करते हैं. लीडर बनने के लिए ऐतबार ज़रूरी है, लीडर वह हो सकता है जिसपर लोग ऐतबार करें. मुसलमानों के यहां सूरत-ए-हाल ये हो गई है कि ख़रीद-फ़रोख़्त ने लीडर नहीं बनने दिया. हम आपसे चाहे जैसी बात करें लेकिन मुझे कहीं का मेंबर बना दिया जाए, मुझे लाल बत्ती दे दी जाए तो हम बिक जाते हैं. हम इतने कम दाम में बिकने लगे कि उतने कम दाम में आला ज़ात की तवायफ़ भी नहीं मिलती है. इसलिए हमारे यहां लीडर नहीं पैदा हो पाए.

हमने जब साहित्य अकादमी अवार्ड वापस किया था तब हमारी आंखों में वो इंक़लाब था, मेरे लहज़े में वो शफ़्फ़ाकी थी, मेरी आवाज़ में वो अंगारे थे कि 24 घंटे के अंदर मुझे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने मिलने को बुला लिया. लेकिन हमने मना कर दिया. हमने कहा कि अवॉर्ड लौटाने वाले और भी लोग हैं जो ज्ञान में हमसे बड़े हैं, उम्र में हमसे बड़े हैं, उन्हें भी बुलाया जाए. अगर यही लोग कुछ दिन के लिए हमारे साथ खड़े हो जाते तो इस मुल्क़ में कोई भी फ़ैसला हो सकता था.

हम चीख़ते रहते हैं कि मुल्क़ में फ़िरक़ापरस्ती का क़ानून होना चाहिए कि जो पकड़ा जाए उसे उसके शहर से एक हज़ार किलोमीटर के फ़ासले पर जेल में रखा जाए. रातों-रात ये जो सोम और बालियान जैसे लीडर पैदा हो जाते हैं, वो इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि वे जेल जाते हैं तो उन्हें छुड़ाने के लिए पचास हज़ार लोग पहुंचते हैं तो वे रातों-रात हीरो हो जाते हैं. इसी तरह कोई मुसलमान ग़ैर-मुसलमान को मार देता है तो उसके साथ दस हज़ार मुसलमान खड़े हो जाते हैं. फिर वो मुसलमानों का लीडर बन जाता है.

भगवान एक बच्चा पैदा करने के लिए एक औरत की कोख़ उधार लेता है, नौ महीने इंतज़ार करता है तब एक बच्चा पैदा होता है. हमारे मुल्क़ में एक मुसलमान रात में एक हिंदू को मार दे तो सुबह वह मुसलमानों का लीडर बन जाता है. इसी तरह हिंदू रात में मुसलमान का क़त्ल कर दे तो सुबह हिंदुओं का लीडर हो जाता है. यह इस मुल्क़ के लिए मुफ़ीद नहीं है.

मैं तो समझता हूं, जैसा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि इस देश में 25 साल के लिए सैन्य शासन लागू कर देना चाहिए. अभी जो है पूरे मुल्क़ में ख़ौफ़ का आलम रहता है. ज़रा-ज़रा सी बात पर हिंदू-मुस्लिम, जाति, धर्म और दुनिया भर के झगड़े, भ्रष्टाचार, बेईमानियां दूर करने के लिए सेना का शासन ज़रूरी है. देश को सेना के हाथ में दे देना चाहिए और ये जो हर पांच साल में चुनाव होता है, इसे भी बंद कर देना चाहिए.

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि चुनाव का कोई मतलब नहीं है. चुनाव में अगर कोई रिक्शेवाला खड़ा न हो सके, कुछ रुपये महीने पाने वाला पत्रकार न खड़ा हो सके, एक जूते गांठने वाला मोची न खड़ा हो सके तो चुनाव का कोई मतलब नहीं. यह तय होना चाहिए कि जिस आदमी की संपत्ति 25 लाख से ज़्यादा हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकता. ये जो 15-20 करोड़ की संपत्ति वाले लोग चुनाव लड़ते हैं, ये उनकी वो रक़म है जो वे काग़ज़ पर दिखाते हैं. आयकर विभाग छापा मारता है तो कहता है कि हमने नौ करोड़ पकड़े, इसका मतलब है कि वह नब्बे करोड़ का आदमी होगा. ये चुनाव और जम्हूरियत बस पैसे वालों का खेल बनकर रह गया है. हमारे ज़माने में मंत्री तक एक टूटी-फूटी जीप में चलते थे. आज तो सभासद भी करोड़ों की गाड़ी में चलता है. बंद एसी गाड़ी में चलने वाले मंत्री को मालूम ही नहीं है कि नंगे पांव चलने वालों की परेशानी क्या होती है.

मैं यह लिखना चाहता हूं कि इस मुल्क़ की आबादी 130 करोड़ है. सौ करोड़ यहां पर जानवर रहते हैं. तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा आदि की व्यवस्था है. सौ करोड़ लोग ऐसे है जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा, आवास आदि का कुछ ठीक नहीं है. ये जानवरों की तरह जी रहे हैं. आप जानवरों को भी वोटरों में शामिल कर लेते हैं. इसका मतलब आपको गिनती नहीं आती. आप जानवरों को इंसानों में शामिल कर रहे हैं या फिर इंसानों को जानवरों में शामिल कर रहे हैं.

हम तो यही चाहेंगे कि शासन कोई करे, लेकिन हमारा मुल्क़ बचा रहे. उसे नेता चलाए, सेना चलाए, औरत चलाए, मर्द चलाए, लेकिन मुल्क़ सुरक्षित होना चाहिए. हर आदमी सुरक्षित होना चाहिए. इस देश का मुसलमान कभी नहीं कहता कि हमको कोई दाढ़ी वाला प्रधानमंत्री लाकर दे दीजिए. आज़ादी के बाद जिन्ना की वजह से मुसलमान इस बात से अलर्ट हो गया कि उसका लीडर हिंदू ही है. ये जो झोलाछाप ओवैसी वगैरह हैं, ये तो वोटकटवा हैं, बकौल लालू प्रसाद यादव. ये सिर्फ़ मुसलमान का वोट काटकर किसी को जितवा देते हैं. इनको इसी बात का पैसा मिलता है. कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहता कि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए. वह तो सिर्फ़ यह चाहता है कि दंगे न हों. बिहार में मुसलमानों ने नीतीश की सरकार बनाई तो उसे विश्वास है कि वे दंगा नहीं होने देंगे. यूपी में आज मुसलमान मायावती की तरफ़ देख रहे हैं क्योंकि उनको यह पता है कि मायावती के शासन में दंगा नहीं होता.

ऐसी ही इंदिरा गांधी की हुक़ूमत थी. अगर इंदिरा गांधी को बाबरी मस्ज़िद गिरानी होती तो वे ख़ुद जहाज़ में बैठतीं और बम फिंकवा देतीं. अगर नहीं गिरानी होती तो चाहे दस हज़ार लोगों को मारना पड़ता, वे वहां किसी को दाख़िल नहीं होने देतीं. हुक़ूमतें ऐसी ही चलती हैं. आप औरंगज़ेब को गाली देते हैं लेकिन इतिहास पढ़िए तो सबसे बड़ा हिंदुस्तान तो उसी की हुक़ूमत में था. म्यांमार से नेपाल, गोवा, काबुल, कंधार, ये सब उसी की हुक़ूमत में थे. ज़ाहिर-सी बात है कि मुग़लों ने इतनी बड़ी-बड़ी हुक़ूमतें बना दी थीं तो क्यों बना दी थीं? क्योंकि उनको इस मुल्क़ से मुहब्बत हो गई थी. वरना ऐसा भी हो सकता था कि वे हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा रखते लेकिन अपना हेडक्वार्टर क़ाबुल में बना लेते. लेकिन वे हिंदुस्तान आए और इसी मिट्टी में दफ़्न हो गए.

हम कहते हैं कि हिंदुस्तान का जो आदमी यह दावा करता है कि हम बहुत बड़े राष्ट्रवादी हैं वह जहां जी चाहे हमसे बैठकर बात कर ले. इंशाअल्लाह, वह राष्ट्रद्रोही निकलेगा, राष्ट्रवादी हमीं निकलेंगे. आप कहते हैं कि भारत माता की जय, अरे साहब हम तो दिन में 94 बार नमाज़ पढ़कर इस मिट्टी पर सज़दा करते हैं और इस मिट्टी को चूमते हैं. क्या इतनी बार इस मिट्टी को आप भी चूमते हैं? जिस दिन आप सौ बार चूमने लगें तब कहिएगा कि आप हमसे बड़े हिंदुस्तानी हैं. जब बंटवारा हुआ, हमारे पुरखों ने कहा कि हम पाकिस्तान नहीं जाएंगे. यह हमारी सरज़मीं है, हम अपने पुरखों की क़ब्र के पास बैठे रहेंगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएंगे.

अब आज हालत यह है कि कोई झूठा मसला होता है बस अख़बार में छप जाता है कि फलां आदमी आतंकवादी है, इसके तार वहां से हैं, इसको इतना पैसा आया है. उसे पकड़ कर बंद कर देते हैं. सब मान लेते हैं कि वह आतंकवादी है. इस देश की दशा इतनी ख़राब है कि अगर आज पुलिस मुझे पकड़ ले कि यह आतंकवादी है तो लोग मान लेंगे कि हां यह आतंकवादी होगा. जब 12 बरस बाद हमको छोड़ा जाएगा तब तक हम अपने पांव पर चलने लायक नहीं बचेंगे. ऐसा सैकड़ों नौजवानों के साथ हो चुका है. क़ानून यह होना चाहिए कि जब आप किसी को 12 बरस या 20 बरस बाद बेक़सूर कहकर छोड़ रहे हैं तो उसे 50 करोड़ का हर्ज़ाना भी देना चाहिए.

पुलिस एक 18 बरस के लड़के को पकड़ती है, फिर उसे 20 साल बाद बूढ़ा करके छोड़ देती है कि यह निर्दोष है. तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है. जब यहां ऐसा क़ानून चलता है तो यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना हो गया. अगर इस तहख़ाने को हम ठीक नहीं करेंगे तो यह सबके लिए नुकसान करेगा.

यहां पर किसी भी मुसलमान को कह देते हैं कि पाकिस्तानी है. अरे आप अरबी कह दीजिए तो हम मान भी लें कि हां, अरब से आए थे. पैदल चल के आए थे. पाकिस्तान से हमारा क्या लेना देना? पाकिस्तान तो जितना हमारा है, उतना ही आपका है. वह तो हिंदुस्तान का हिस्सा था. हमें आप पाकिस्तानी क्यों कहेंगे? अगर हम पाकिस्तानी हैं तो आप पहले पाकिस्तानी हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है. हम तो इस मुल्क़ को मादरे-वतन कहते ही हैं. हमारा मुल्क़ तो ये है ही, हमारी मां भी यही है. यह मां का वतन है और मुसलमान इस मुल्क़ से बेपनाह मोहब्बत करते हैं.

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

 

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اُردو ہے میرا نام ۔۔۔۔۔۔ اقبال اشعر

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اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی
میں ’میر‘ کی ہمراز ہوں، ’غالب‘ کی سہیلی

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دکّن کے ’ولی‘ نے مجھے گودی میں کھلایا
’سودا‘ کے قصیدوں نے میرا حسن بڑھایا

ہے ’میر‘ کی عظمت کہ مجھے چلنا سکھایا
میں ’داغ‘ کے آنگن میں کھلی بن کے چمیلی

اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی

غالب‘ نے بلندی کا سفر مجھ کو سکھایا

حالی‘ نے مروت کا سبق یاد دلایا
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اقبال‘ نے آئینۂ حق مجھ کو دکھایا
’مومن‘ نے سجائی میرے خوابوں کی حویلی

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اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی

ہے ’ذوق‘ کی عظمت کہ دیئے مجھ کو سہارے

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چکبست‘ کی الفت نے میرے خواب سنوارے
’فانی‘ نے سجائے میری پلکوں پہ ستارے
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اکبر‘ نے رچائی میری بے رنگ ہتھیلی
اردو ہے میرا نام میں ’خسرو‘ کی پہیلی

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کیوں مجھ کو بناتے ہو تعصب کا نشانہ
میں نے تو کبھی خود کو مسلماں نہیں مانا

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دیکھا تھا کبھی میں نے بھی خوشیوں کا زمانہ

اپنے ہی وطن میں ہوں مگر آج اکیلی

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اردو ہے میرا نام میں ’خسرو ‘ کی پہیلی

 

उर्दू है मेरा नाम……इकबल अशअर

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उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली…
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो की पहेली

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मैं मीर की हमराज हूँ ,ग़ालिब की सहेली
दक्कन की वली ने मुझे गोदी में खिलाया

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सौदा के क़सीदो ने मेरा हुस्न बढ़ाया
है मीर की अज़मत कि मुझे चलना सिखाया

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मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली
उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली

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ग़ालिब ने बुलंदी का सफर मुझको सिखाया
हाली ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया

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इक़बाल ने आइना-ए-हक़ मुझको दिखाया
मोमिन ने सजाई मेरी ख्वाबो की हवेली॥

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उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली॥॥
है ज़ौक़ की अजमत कि दिए मुझको सहारे

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चकबस्त की उल्फत ने मेरे ख़्वाब संवारे
फानी ने सजाये मेरी पलकों पे सितारे

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अकबर ने रचाई मेरी बेरंग हथेली
उर्दू है मेरा नाम ..

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क्यों मुझको बनाते हो तास्सुब का निशाना
मैंने तो कभी खुद को मुसलमाँ नही माना

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देखा था कभी मैंने खुशियों का ज़माना
अपने ही वतन में हूँ आज अकेली

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उर्दू है मेरा नाम मैं खुसरो कि पहेली…

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Posted by: Bagewafa | فروری 12, 2017

بول محبت بول۔۔۔۔۔۔صالح اچھا

یہاں ہر بات اپنے رنگ میں سمجھائ جاتی ہے۔۔صالھ اچھا

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غنیم سے بھی عداوت میں حد نہیں مانگی۔۔۔۔۔۔۔ احمد فراز

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غنیم سے بھی عداوت میں حد نہیں مانگی

کہ ہار مان لی لیکن مدد نہیں مانگی

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ہزار شکر کہ ہم اہل حرف زندہ نے

مجاوران ادب سے سند نہیں مانگی

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بہت ہے لمحۂ موجود کا شرف بھی مجھے

سو اپنے فن سے بقائے ابد نہیں مانگی

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قبول وہ جسے کرتا وہ التجا نہیں کی

دعا جو وہ نہ کرے مسترد نہیں مانگی

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میں اپنے جامۂ صد چاک سے بہت خوش ہوں

کبھی عبا و قبائے خرد نہیں مانگی

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شہید جسم سلامت اٹھائے جاتے ہیں

جبھی تو گور کنوں سے لحد نہیں مانگی

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میں سر برہنہ رہا پھر بھی سر کشیدہ رہا

کبھی کلاہ سے توقیر قد نہیں مانگی

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عطائے درد میں وہ بھی نہیں تھا دل کا غریب

فرازؔ میں نے بھی بخشش میں حد نہیں مانگی

गनीम से भी अदावत में हद नहीं माँगी —- अहमद फ़राज़

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गनीम से भी अदावत में हद नहीं माँगी

कि हार मान ली, लेकिन मदद नहीं माँगी

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हजार शुक्र कि हम अहले-हर्फ़-जिन्दा ने

मुजाविराने-अदब से सनद नहीं माँगी

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बहुत है लम्हा-ए-मौजूद का शरफ़ भी मुझे

सो अपने फ़न से बकाये-अबद नहीं माँगी

क़बूल वो जिसे करता वो इल्तिजा नहीं की

दुआ जो वो न करे मुस्तरद, नहीं माँगी

मैं अपने जाम-ए-सद-चाक से बहुत खुश हूँ

कभी अबा-ओ-क़बा-ए-ख़िरद नहीं माँगी

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शहीद जिस्म सलामत उठाये जाते हैं

तभी तो गोरकनों से लहद नहीं माँगी

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मैं सर-बरहना रहा फिर भी सर कशीदा रहा

कभी कुलाह से तौक़ीद-ए- सर नहीं माँगी

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अता-ए-दर्द में वो भी नहीं था दिल का ग़रीब

`फ़राज’ मैंने भी बख़्शिश में हद नहीं माँगी

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औरंगजेब यदि किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहते तो इसके लिए शिवाजी का पोता शाहू जी सब से आसान शिकार था!….. मोहम्मद आरिफ दगिया

 

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” जो है नाम वाला , वही तो बदनाम है “-ये अल्फाज़ मुग़ल बादशाह औरंगजेब के ऊपर सबसे ज्यादा फिट बैठते हैं . जिस शख्स की कभी ” तहज्जुद ” की नमाज़ क़ज़ा नहीं होती थी …..जिसके शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों की संख्या सभी मुग़ल बादशाहों की तुलना में सबसे ज्यादा थी …. जिसने कट्टर मुसलमान होते हुए भी कई मंदिरों के लिए दान और जागीरें दीं…. जिसने शिवाजी को क़ैद में रखने के बावजूद मौत के घाट नहीं उतारा , जबकि ऐसा करना उनके लिए मुश्किल नहीं था …. जो खुद को हुकूमत के खजाने का सिर्फ ” चौकीदार ” 16426293_834414706696254_1747179301452394796_n (1)11403437_488205441330315_1600211412164008075_nसमझता था ( मगर वह आजकल के चौकीदारों की तरह नहीं था ) और अपनी जीविकोपार्जन के लिए वह टोपियाँ सिलता और कुरान शरीफ के अनुवाद करता था ///. औरंगजेब ऐसा बादशाह है जिसके साथ इतिहास और तास्सुबी इतिहास कारों ने कभी न्याय नहीं किया . एक ऐसा बादशाह , जिसे भारतीय इतिहास में सब से ज्यादा बदनाम किया गया है ;मगर जो अपने खानदान के तमाम बादशाहों में सबसे ज्यादा मुत्तकी , परहेज़गार ,इंसाफपसंद , खुदा से डरने वाला , हलाल रिजक खाने वाला और तहज्जुदगूज़ार बन्दा था /

उस बादशाह का नाम है -औरंगजेब ( रहमतुल्लाह अलैह ),जिनका मजारे पाक औरंगाबाद ( महाराष्ट्र ) में है ///

….क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हिन्दू धर्म के सिद्धांतों ,कर्मकांडों का यथाविधि पालन करने वाले व्यक्ति को ” समर्पित हिन्दू ” कहा जाता है , कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों पर मजबूती से चलने वाले इंसान को ” समर्पित कामरेड ” कहा जाता है ,बुद्ध के आदर्शों पर चलने वाले भंते जी या बौद्ध को ” समर्पित बौद्ध ” कहा जाता है ……मगर इस्लाम के सिद्धांतों पर चलने वाले आदमी को ” समर्पित मुसलमान ” नहीं कहा जाता , बल्कि उसे ” कट्टर मुसलमान ” की उपाधि दी जाती है ???इसी भेदभाव का शिकार औरंगजेब जैसे बादशाह को भी होना पड़ा और आज तक उनके साथ ये लक़ब जुड़ा है कि वह एक कट्टर मुसलमान था ,जो एक मन जनेऊ प्रतिदिन उतरवा कर ही खाना खाता था .जबकी इस बात के खंडन के लिए अँगरेज़ इतिहासकार प्रोफेसर अर्नाल्ड ने अपनी किताब ” प्रीचिंग ऑफ़ इस्लाम ” में लिखा है -“औरंगजेब के दौर के इतिहास में जहाँ तक मैंने तफ्तीश और पड़ताल की है ,मुझको पता चला है कि कहीं भी , किसी भी हिन्दू को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाए जाने का कोई प्रमाण नहीं है .”

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मुंशी इश्वरी प्रसाद अपनी मशहूर किताब ” तारीखे हिन्द ” में लिखते हैं–” परमात्मा की शान है कि औरंगजेब जितना रिआया का खैर ख्वाह था , इतिहास में उसे उतना ही ज्यादा बदनाम किया गया है . कोई उसे ज़ालिम कहता है , कोई खुनी , मगर हकीक़त में वह ” आलमगीर ” का ही लकब पाने का अधिकारी है .”

भारत में मुसलमानों की हुकुमत करीब 600 साल तक रही . दिल्ली मुसलमानों की राजधानी थी. वहां हर तरह की ताकत मुसलमानों के हाथ में थी. अगर मुस्लिम बादशाह हिन्दुओं को तलवार केबल पर मुसलमान बनाना चाहते तो वे सबसे पहले दिल्ली और आसपास के हिदुओ को ही मुसलमान बनाते , क्युकी ऐसा करने से उनकी हुकुमत को भी एक तरह से सुरक्षा मिल जाती क्युकी आसपास कोई दुश्मन आबादी ही नहीं रह जाती जो हुकुमत के खिलाफ विद्रोह कर सके . मगर यह एक आश्चर्यजनक तथ्य हमें नज़र आता है कि दिल्ली और उसके आसपास 50 मील की आबादी हमेशा बहुसंख्यक हिन्दुओं की ही रही और वे भी खुशहाल और इज्ज़त के साथ रहते आये थे . यह बात पंडित सुन्दर लाला शर्मा ने ” गाँधी की क़ुरबानी से सबक ” नामक लेख में व्यक्त किया है ///

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औरंगजेब यदि किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहते तो इसके लिए उनके सबसे बड़े दुश्मन शिवाजी का पोता शाहू जी सब से आसान शिकार था जो 7 साल की उम्र में क़ैद हो कर आया था .मगर औरंगजेब ने शाहू जी की परवरिश एक मराठा राजकुमार की तरह की और कभी भी उनके धर्मांतरण का कोई प्रयास नहीं किया .बल्कि उन्होंने खुद व्यक्तिगत रूचि ले कर शाहू जी की शादी बहादुर जी मराठा की बेटी के साथ धूमधाम से की, जैसे कोई बाप अपने बेटे की शादी कराता है .///

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नीचे की पंक्तियों में मैं औरंगजेब के वे तारीखी शब्द उद्धृत कर रहा हूँ ,जो उनके ऊपर लगे कट्टरता और धर्मान्तरण के आरोपों को पूरी तरह गलत साबित करते हैं और औरंगजेब की एक ऐसी छवि प्रस्तुत करते हैं , जिसे इतिहास लिखने वाले अपराधियों ने हमेशा दुनिया वालों से छुपाने का गुनाह किया है —

“संभाजी के इस बेटे शाहू जी की शिक्षा -दीक्षा का प्रबंध किया जाये .इसके लिए दक्षिण से अच्छे पंडित बुलावा लिए जाएँ .उनकी शिक्षा -दीक्षा मराठा रीती-रिवाजों के अनुसार की जाए …….और हाँ , शिवाजी की बेगम हमारी क़ैद में हैं .वे चाहें तो दक्षिण से अपने ख़ास दास-दासियों को अपने पास बुलावा सकती है जो एक राजा की बीवी के साथ रहा करते हैं .उनको यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वे एक मुसलमान की क़ैद में हैं .”

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आगे औरंगज़ेब ( रहमतुल्लाह अलैह ) कहते हैं —

“शिवाजी ने हमसे ताजिंदगी दुश्मनी निभाई , शायद यही अल्लाह की मर्ज़ी थी , मगर उनके बाद उनकी बेगमों और बच्चों को यह एहसास नहीं होना चाहिए की हम उनसे भी दुश्मनी रखते हैं . यह बात सारी दुनिया को बता दी जाये कि हमारी दुश्मनी भी सिर्फ शिवाजी से थी , मगर उनके बाद उनकी बेगमों और बच्चों से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है ” ///

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इसके बाद भी अगर कोई व्यक्ति या संगठन औरंगजेब को धार्मिक रूप से कट्टर और धर्मान्तरण का जुनूनी कहता है यही कहा जा सकता है कि वह पूर्वाग्रह से युक्त है ……और मैं सोचता हूँ कि शक की तरह पूर्वाग्रह भी एक ऐसा मर्ज़ है , जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास नहीं रहा होगा . किसी सड़क पर से औरंगजेब के नाम की तख्ती को हटा लेने से इतिहास में उनके नाम की तख्ती पर पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कलम जब निष्पक्ष हो कर इस देश का इतिहास लिखेगी तो वह लिखेगी कि औरंगजेब कट्टर नहीं था बल्कि जिन्होंने उनके नाम की तख्ती को हटाने का काम किया है , वे सबसे बड़े कट्टर , धर्मांध , असहिष्णु और पूर्वाग्रही प्राणी थे ///

(मोहम्मद आरिफ दगिया )( https://www.muslimissues.com)

دل بہلتا نہیں_ مُحمّد علی وفا

 

خوابوں کی بارات سے دِل بہلتا نہیں

خُوشیوں کی خیرات سے دِل بہلتا نہیں

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برسے نہیں تُم برسنے کے زمانے میں

بے موسمی برسات سے دِل بہلتا نہیں

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آئیں ہیں تو کُچھ کہو کے دِل تڑپ اٹھے

یہ بے تُکے اِرشاد سے دِل بہلتا نہیں

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دِل کی گھٹن بڑھ گئ دیِدارسے تیرے

بے رُخی سی رات سے دِل بہلتا نہیں

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شورو شرابا بن گئ   تیری کہا نی بھی

اب کسی بھی بات سے دل بہلتا نہیں

दिल बहलता नहि_मुहम्मदअली वफा 

 

ख्वाबोंकी बारात से दिल बहलता नहि

खूशियोंकी खैरात से दिल बहलता नहि

 

 

बरसे नहि   तुम  तो बरसने के जमाने में

बे मौसमी बरसात से दिल .बहलता नहि

.

 

आयें है तो कुछ कहो  के दिल तडप उठे

बे तूके  ईरशाद से दिल बहलता नहि

 .

 

दिलकी घुंटन बढ गई दिदारसे तेरे

बे रूखीसी रात से दिल बहलता नहि

 

शोरो शराबा बना गई  तेरी कहानी भी

अब कीसीभी बात से दिल बहलता नहि

.میخانے سے شراب_محمدعلی وفا

.

 

 .

کون لا کر دے ہمیں اسکا بھی کچھ جواب

ساقی اٹھا کے لے گیا میخانے سے شراب

 .

انکی نظر نے اور بھی رسوا کیا ہمیں

ورنہ فرست تھی کہاں کے دیکھتے شباب

.

کھو گئے تھے ہم کبھی غبارے خواب میں

واللہ پوچھیے نہی ان راتوں کا حساب

.

شرما کے چاند چاندنی بستر لپٹ گئے

اٹھ گیا علل صبح سرج کا جب نقاب

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خوشبو کہاں سے بھر گئی سانس میں یہ میرے

برسو ہوئے ہم نے تو دیکھا نہیں گلاب

.

ظلمت کدے میں جب گئے صحرا بھی لے گئے

اور چاندنی نے رات بھر اتارا نہیں حجاب

 

मौखाने से शराब._मुहम्मद अली वफा

.

कौन ला कर दे हमें उसका भी कुछ जवाब

साकी उठाके ले गया मौखाने से शराब

 .

उनकी नजर ने और भी रुस्वा किया हमें

वरना फुरसत थी  किसे कि देखते शबाब

.

खो गये थे हम कभी गुबारे खवाब में

वल्लाह पूछिये नही उन रातोंका हिसाब

 .

शरमाके चांद चांदनी बिस्तर लिपट गये

उठ गया अलल सबह सुरजका जब निकाब

खूश्बु कहां से भर गई अब सांसो मे  मेरे

बरसो हुए हमने तो دदेखा नहीं गुलाब

 .

जुलमत कदे में हम जो गये सहरा भी ले गये

और चांदनी ने रात भर उतारा नहीं हिजाब

مکتبوں میں کہیں رعنائی افکار بھی ہے۔۔۔۔ علامہ اقبال

 

 ۔

مکتبوں میں کہیں رعنائی افکار بھی ہے

خانقاہوں میں کہیں لذت اسرار بھی ہے

.

منزل رہ رواں دور بھی دشوار بھی ہے

کوئی اس قافلہ میں قافلہ سالار بھی ہے

 .

بڑھ کے خیبر سے ہے یہ معرکۂ دین و وطن

اس زمانے میں کوئی حیدر کرار بھی ہے

 .

علم کی حد سے پرے بندۂ مومن کے لیے

لذت شوق بھی ہے نعمت دیدار بھی ہے

 .

پیر مے خانہ یہ کہتا ہے کہ ایوان فرنگ

سست بنیاد بھی ہے آئینہ دیوار بھی ہے

मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है …. अल्लामा इक़बाल

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मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है

ख़ानक़ाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है

.

मंज़िल-ए-रह-रवाँ दूर भी दुश्वार भी है

कोई इस क़ाफ़िले में क़ाफ़िला-सालार भी है

 .

बढ़ के ख़ैबर से है ये मारका-ए-दीन-ओ-वतन

इस ज़माने में कोई हैदर-ए-कर्रार भी है

 .

इल्म की हद से परे बंदा-ए-मोमिन के लिए

लज़्ज़त-ए-शौक़ भी है नेमत-ए-दीदार भी है

.

पीर-ए-मै-ख़ाना ये कहता है के ऐवान-ए-फ़रंग

सुस्त-बुनियाद भी है आईना-दीवार भी है

اذانوں میں دلکشی نہ رہے…آغا شورش کاشمیری

فضا میں رنگ، ستاروں میں روشنی نہ رہے

ہمارے بعد یہ،  ممکن ہے زندگی نہ رہے

.

خیالِ خاطرِ احباب واہمہ ٹھہرے

اِس انجمن میں کہیں رسمِ دوستی نہ رہے

 .

فقیہہ شہر کلامِ خُدا کا تاجر ہو

خطیبِ شہر کو قرآں سے آگہی نہ رہے

 .

قبائے صُوفی و مُلّا کا نرْخ سستا ہو

بِلال چُپ ہو، اذانوں میں دلکشی نہ رہے

 .

نوادراتِ قلم پر ہو مُحْتسب کی نظر

مُحیط ہو شبِ تاریک، روشنی نہ رہے

 .

اِس انجمن میں عزیزو! یہ عین ممکن ہے

ہمارے بعد چراغوں میں روشنی نہ رہے

.

अजानों में दिल-कशी न रहे….. आग़ा शोरिश काश्मीरी

 

 

फ़िज़ा में रंग, सितारों में रोशनी न रहे

हमारे बाद ये, मुम्किन है ज़िंदगी न रहे

 .

ख़्याल-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब वाहिमा ठहरे

इस अंजुमन में कहीं रस्म-ए-दोस्ती न रहे

 

फ़क़ीहे शहर कलाम-ए-ख़ुदा का ताजिर हो

ख़तीब-ए-शहर को क़ुरआँ से आगही न रहे

 .

क़बाए सूओफ़ी-ओ-मुल्ला का नर॒ख़ सस्ता हो

बिलाल चुप हो, अजानों में दिल-कशी न रहे

.

नवादरात-ए-क़लम पर हो मुह॒तसिब की नज़र

मुहीत हो शब-ए-तारीक, रोशनी न रहे

.

इस अंजुमन में अज़ीज़ो! ये ऐन-मुमकिन है

हमारे बाद चराग़ों में रोशनी न रहे

جو چل سکو تو کوئی ایسی چال چل جانا —— احمد فراز

 

جو چل سکو تو کوئی ایسی چال چل جانا

مجھے گماں بھی نہ ہو اور تم بدل جانا

 .

یہ شول گی ہو بدن کی تو کیا کیا جائے

سو لازمی ہے تیرے پیرہن کا جل جانا

 .

تمھیں کرو کوئی درماں یہ وقت آ پہنچا

کہ اب تو چارا گروں کا بھی ہاتھ مل جانا

ابھی ابھی جو جدائی کی شام آئی تھی

ہمیں عجیب لگا زندگی کا ڈھل جانا

 .

سجی سجائی ہوئی موت زندگی تو نہیں

مورخوں نے مقابر کو بھی محل جانا

 .

یہ کیا کہ تو بھی اسی ساعت جوال میں ہے

کہ جس طرح ہے سبھی سور جوں کو ڈھل جانا

 .

ہر اک عشق کے بعد اور اسکے عشق کے بعد

فراز اتنا آساں بھی نہ تھا سنبھل جانا

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना —— अहमद फ़राज़

 

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना

मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना

.

ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये

सो लाजमी है तेरे पैरहन का जल जाना

.

तुम्हीं करो कोई दरमाँ, ये वक्त आ पहुँचा

कि अब तो चारागरों का भी हाथ मल जाना

.

अभी अभी जो जुदाई की शाम आई थी

हमें अजीब लगा ज़िन्दगी का ढल जाना

.

सजी सजाई हुई मौत ज़िन्दगी तो नहीं

मुअर्रिखों ने मकाबिर को भी महल जाना

.

ये क्या कि तू भी इसी साअते-जवाल में है

कि जिस तरह है सभी सूरजों को ढल जाना

.

हर इक इश्क के बाद और उसके इश्क के बाद

फ़राज़ इतना आसाँ भी ना था संभल जाना


شوق ہے اسکو خود نمائی کا …۔ داغ دہلوی

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شوق ہے اسکو خود نمائی کا

اب خدا حافظ اس خدائی کا

 .

وصل پیغام ہے جدائی کا

موت انجام آشنائی کا

 .

دے دیا رنج اک خدائی کا

ستیا ناش ہو جدائی کا

.

کسی بندے کو دردے عشق نہ دے

واسطہ اپنی کبریائی کا

 .

صلح کے بعد وہ مزا نہ رہا

روز سامان تھا لڑائی کا

 .

اپنے ہوتے عدو پہ آنے دیں

کیوں الزام بیوفائی کا

 .

اشک آنکھوں میں داغ ہے دل میں

یہ نتیجہ ہے آشنائی کا

 .

ہنسی آتی ہے اپنے رونے پہ

اور رونا ہے جگ ہنسائی کا

.

اڑ گئے ہوش دام میں پھنس کر

قید کیا نام ہے رہائی کا


शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का …. दाग़ देहलवी

.

शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का

अब ख़ुदा हाफ़िज़, इस ख़ुदाई का

 .

वस्ल पैग़ाम है जुदाई का

मौत अंजाम आशनाई का

.

दे दिया रंज इक ख़ुदाई का

सत्यानाश हो जुदाई का

.

किसी बन्दे को दर्दे-इश्क़ न दे

वास्ता अपनी क़िब्रियाई का

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सुलह के बाद वो मज़ा न रहा

रोज़ सामान था लड़ाई का

.

अपने होते अदू पे आने दें

क्यों इल्ज़ाम बेवफ़ाई का

.

अश्क़ आँखों में दाग़ है दिल में

ये नतीजा है आशनाई का

 .

हँसी आती है अपने रोने पे

और रोना है जग हँसाई का

.

उड़ गये होश दाम में फँस कर

क़ैद क्या नाम है रिहाई का

وطن کو خون دے دیا_ محمد علی وفا

.
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انفعال جو مانگا وطن کو خوں دے دیا
پھر بھی ہماری قدر کے دئیے نہی جلے

.

عبدالحمید اشفاق اللہ بھی مٹے

آزاد ،مدنی،شیخ کو تو کون جانتا

.

محمد علی جوہر بھی یاد نہ آئے

آزادی یا موت کا فتویٰ دیا ہمیں

.

بخاری عطاء اللہ بھی میٹے زمین سے

کون پچھتا حسرت موہانی کے نام کو

.

انصاری، خاں،کچلو بھی ندارد

فخرالدین,ذاکرکو تو کون جانتا

.

قدوائ کے احساں بھی بھول گئے تم

کرنل آزاد ہند کبھی یاد نہ آیا

,

شکوہ نہیں دل کے پھپولے ہیں یہ ‘وفا’

آزادی اے ملک کا قصہ ہے یہ فا

..

.کچھ بھی ہو وطن اپنا ہے آن دے دینگے،
بھارت کی حفاظت کے لئے جان دے دینگے۔

انفال=پسینہ مدنی=مولانا حسین احمد مدنی(دیوبند)ریشمی رومال کی تحریک میں شیخ الہند مولانا محمود الحسن کے ساتھی مالٹا(یورپ) میں ڈھائی سال سے زیادہ جیل کی سؤ بت برداست کی
شیخ= شیخ الہند مولانا محمود الحسن (ریشمی رومال تحریک کے روحِ رواں)
ریشمی رومال کی تحریک= بھارت کی آزادی کے لئے شیخ الہند مولانا محمود الحسن ، مولنا حسین احمد مدنی(دیوبند)انکے جان نثار ساتھییوںکی کی ایک اہم تحریک
کرنل=کرنل شہ نواز( آز
اد ہند فوج ،نیتاجی سبھاش چندر بوجھ کے با وفا ساتھی،نہرو کی کیبینیٹ میں وزیر بھی بنے تھے)

वतनको खून दे दिया_ मोहंमदअली ‘वफा’

ईंफाल जो मांगा वतनको खून दे दिया,
फिर भी हमारी कद्र के दिये नही जले.

अब्दुल हमीद, अशफाकुल्लाह भी मिटे,
आझाद, मदनी,शेखको तो कौन जानता

मुहम्मदअली जौहर भी याद न आये,
आझादी या मौत का फतवा दिया हमें.

बुखारी, अताउल्लाह भी मीटे जमीन से,
कौन पूछता हसरत मोहानी के नाम को.

अंसारी,अजमलखां,किचलु भी नदारद,
झाकिर,फखरुद्दीन, को तो कौन जानता.

किडवाईके अहसां भी भूल गये तुम,
कर्नल आझाद हिन्द कभी याद न आया.

शिकवा नहीं दिलके फफोले है ये ‘वफा’
आझादी ए मुल्कका किस्सा है ये वफा.

कुछ्भी हो वतन अपना है ,आन दे देंगे,
भारत की हिफाजत के लिये जान दे देंगे.

ईंफाल=पसीना मदनी=मौलान हुसेन अहमद मदनी(देवबंद)रेशमी रूमालकी तहरीक में शेखुल हिन्द महमदुलहसन के साथे माल्टा(युरोप) में ढाई साला से ज्यादा जेल की सउबत बरदास्त की.
शेख= शेखुल हिन्द महमदुलहसन (रेशमी रूमाल तहरीक के रुहे रवां)
रेशमी रूमाल की तहरीक= भारत की आझादी के लिये शेखुल हिन्द महमदुलहसन, मौलान हुसेन अहमद मदनी(देवबंद)उनके जानींसार साथीओ की एक अहम तेहरीक..
कर्नल=कर्नल शहनवाझ( आझाद हिन्द फौज ,नेताजी सुभाष चन्द्र बोझ के बा वफा साथी,नहेरु की केबीनेट में मंत्री भी बने थे)

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Posted by: Bagewafa | جنوری 25, 2017

Happy republic day 26 Jan.2017

happy-rep-17

 تمام عمر چلا ہوں مگر چلا نہ گیا – نقش لایلپری

 

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تمام عمر چلا ہوں مگر چلا نہ گیا
تیری گلی کی طرف کوئی راستہ نہ گیا
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تیرے خیال نے پہنا شفق کا پیراہن
میری نگاہ سے رنگوں کا سلسلہ نہ گیا
۔
بڑا عجیب ہے افسانۂ محبت بھی
زباں سے کیا یہ نگاہوں سے بھی کہا نہ گیا
۔
ابھر رہے ہیں فزاؤں میں صبح کے آثار
یہ اور بات میرے دل کا ڈوبنا نہ گیا
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کھلے دریچوں سے آیا نہ ایک جھونکا بھی
گھٹن بڑھی تو ہواوٴں سے دوستانہ گیا
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کسی کے ہجر سے آگے بڑھی نہ عمر میری
وہ رات بیت گئی ‘نقش’ رت جگا نہ گی گیا

तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया – नक़्श लायलपुरी

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तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया

तेरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया

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तेरे ख़याल ने पहना शफ़क का पैराहन

मेरी निगाह से रंगों का सिलसिला न गया

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बड़ा अजीब है अफ़साना-ए-मुहब्बत भी

ज़बाँ से क्या ये निगाहों से भी कहा न गया

 .

उभर रहे हैं फ़ज़ाओं में सुब्ह के आसार

ये और बात मेरे दिल का डूबना न गया

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खुले दरीचों से आया न एक झोंका भी

घुटन बढ़ी तो हवाओं से दोस्ताना गया

 .

किसी के हिज्र से आगे बढ़ी न उम्र मेरी

वो रात बीत गई ‘नक्श़’ रतजगा न गया

 ہوا جب سامنا اس خوب رو سے۔۔۔۔۔داغ دہلوی

ہوا جب سامنا اس خوب رو سے

اڑا ہے رنگ گل کا پہلے بو سے

یہ آنکھیں تر جو رہتی ہیں لہو سے

وہ گزرے عشق کے دن آبرو سے

اسے کہئے شہادت نامۂ عشق

اسے لکھا ہے خط اپنے لہو سے

دھواں بن کر اڑی مسی کی رنگت

یہ کس نے جل کے تیرے ہونٹ چوسے

رقیبوں کو تمنا ہے تو باشد

تمہیں مطلب پرائی آرزو سے

وہ گل تکیہ مرے مرقد میں رکھنا

معطر ہو جو زلف مشک بو سے

نئی ضد ہے کہ دل ہم مفت لیں گے

بھلا کیا فائدہ اس گفتگو سے

عدو بھی تم کو چاہے اے تری شان

لڑاتے ہیں ہم اپنی آرزو سے

ہوا ہے تو تو شاہد باز اے دل

بچاؤں تجھ کو کس کس خوب رو سے

لگا رکھی ہے خاک اس رہ گزر کی

تیمم اپنا بڑھ کر ہے وضو سے

ہمارا دل اسے اب ڈھونڈتا ہے

تھکے ہیں پاؤں جس کی جستجو سے

خدا جانے چھلاوا تھا کہ بجلی

ابھی نکلا ہے کوئی روبرو سے

ہوا ہے داغؔ آصف کا نمک خوار

گزر جائے الٰہی آبرو سے

हुआ जब सामना उस ख़ूब-रू से …..दाग दहेलवी

 

हुआ जब सामना उस ख़ूब-रू से

उड़ा है रंग गुल का पहले बू से

ये आँखें तर जो रहती हैं लहू से

वो गुज़रे इश्क़ के दिन आबरू से

इसे कहिए शहादत-नामा-ए-इश्क़

उसे लिक्खा है ख़त अपने लहू से

धुआँ बन कर उड़ी मिस्सी की रंगत

ये किस ने जल के तेरे होंट चूसे

रक़ीबों को तमन्ना है तो बाशुद

तुम्हें मतलब पराई आरज़ू से

वो गुल-तकिया मिरे मरक़द में रखना

मोअत्तर हो जो ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू से

नई ज़िद है कि दिल हम मुफ़्त लेंगे

भला क्या फ़ाएदा इस गुफ़्तुगू से

अदू भी तुम को चाहे ऐ तिरी शान

लड़ाते हैं हम अपनी आरज़ू से

हुआ है तू तो शाहिद-बाज़ ऐ दिल

बचाऊँ तुझ को किस किस ख़ूब-रू से

लगा रखी है ख़ाक उस रहगुज़र की

तयम्मुम अपना बढ़ कर है वज़ू से

हमारा दिल उसे अब ढूँडता है

थके हैं पाँव जिस की जुस्तुजू से

ख़ुदा जाने छलावा था कि बिजली

अभी निकला है कोई रू-ब-रू से

हुआ है ‘दाग़’ आसिफ़ का नमक-ख़्वार

गुजर जाए  इलाही आबरूसे

عرصہ ہوا۔……..شہباز ندیم ضیائی

ساعت آسودگی دیکھے ہوئے عرصہ ہوا

مفلسی کو میرے گھر ٹھہرے ہوئے عرصہ ہوا

لمحۂ راحت رسا دیکھے ہوئے عرصہ ہوا

ماں ترے شانے پہ سر رکھے ہوئے عرصہ ہوا

ہجر کی تاریکیوں کا سلسلہ ہے دور تک

چاندنی کو چاند سے بچھڑے ہوئے عرصہ ہوا

زندگی بے خواب لمحوں میں سمٹ کر رہ گئی

ہجر میں تیرے پلک جھپکے ہوئے عرصہ ہوا

خوف سے سہما ہوا ہے دل پرندہ آج بھی

سر سے سیلاب الم گزرے ہوئے عرصہ ہوا

دل کو رہتا ہے مسلسل منتشر ہونے کا خوف

یعنی اندر سے مجھے ٹوٹے ہوئے عرصہ ہوا

کاروبار زیست میں کچھ اس قدر الجھا کہ بس

تیرے بارے میں بھی کچھ سوچے ہوئے عرصہ ہوا

اے ہجوم آرزو اب چاہتا ہوں تخلیہ

خانۂ دل میں تجھے رہتے ہوئے عرصہ ہوا

میں کہاں ہوں کون سی منزل میں ہوں کوئی بتائے

مجھ کو اپنی کھوج میں نکلے ہوئے عرصہ ہوا

دشمنی گم ہو گئی ہے دوستوں کی بھیڑ میں

چہرہ ہائے دشمناں دیکھے ہوئے عرصہ ہوا

جا تو اپنی راہ لے اب اے دل عشرت طلب

پہلوئے شہبازؔ میں بیٹھے ہوئے عرصہ ہوا

अर्सा हुआ۔۔۔۔۔۔۔۔शहबाज़ नदीम ज़ियाई

 

साअत-ए-आसूदगी देखे हुए अर्सा हुआ

मुफ़लिसी को मेरे घर ठहरे हुए अर्सा हुआ

लम्हा-ए-राहत-रसा देखे हुए अर्सा हुआ

माँ तिरे शाने पे सर रक्खे हुए अर्सा हुआ

हिज्र की तारीकियों का सिलसिला है दूर तक

चाँदनी को चाँद से बिछड़े हुए अर्सा हुआ

ज़िंदगी बे-ख़्वाब लम्हों में सिमट कर रह गई

हिज्र में तेरे पलक झपके हुए अर्सा हुआ

ख़ौफ़ से सहमा हुआ है दिल परिन्दा आज भी

सर से सैलाब-ए-अलम गुज़रे हुए अर्सा हुआ

दिल को रहता है मुसलसल मुन्तशिर होने का ख़ौफ़

यानी अंदर से मुझे टूटे हुए अर्सा हुआ

कारोबार-ए-ज़ीस्त में कुछ इस क़दर उलझा कि बस

तेरे बारे में भी कुछ सोचे हुए अर्सा हुआ

ऐ हुजूम-ए-आरज़ू अब चाहता हूँ तख़लिया

ख़ाना-ए-दिल में तुझे रहते हुए अर्सा हुआ

मैं कहाँ हूँ कौन सी मंज़िल में हूँ कोई बताए

मुझ को अपनी खोज में निकले हुए अर्सा हुआ

दुश्मनी गुम हो गई है दोस्तों की भीड़ में

चेहरा हाए दुश्मनाँ देखे हुए अर्सा हुआ

जा तू अपनी राह ले अब ऐ दिल-ए-इशरत-तलब

पहलू-ए-‘शहबाज़’ में बैठे हुए अर्सा हुआ

हज़रात आप ही सरकार……….रवीश कुमार

 

हज़रात आप ही सरकार

सरकार तो है ही बोकरात

उसके डंडे में ज़ोर है

डंडा खाने के लिए शोर है

जुग कलजुग की घटा घनघोर है

डरपोकों की तादाद बढ़े यही तो

बुलेटिनों में बुलेटिन

नंबर वन बुलेटिन का ज़ोर है

हफ़्तों लोगों ने आँखें फाड़ कर देखा है

वही लेकर आज फिर आया हूँ

तो कमर कस लें और रस लें कि

जन्नत टाइम का समय शुरू होता है अब

मुल्क में टीवी पर जब से हम पर्दानशीं हुए हैं

परिंदों के घर उजड़ गए हैं

पर्दों के परखच्चे उड़ गए हैं

हम ही तो हम हैं, हम नहीं तो उन्हें भी ग़म है

तुम्हारी आँखों के नूर न हो सके, हूरों को भी यही ग़म है

हर तरह का खाद है हमारी दुकान में

वाद विवाद

राष्ट्रवाद

गोबर का खाद

फ़साद वसाद

यहाँ लाद वहाँ लाद

इसे मार उसे मार

यूरिया का खाद

जल्दी डाल जल्दी डाल

तो सुनिये बाहों में बाँहें डाल

मीडिया में भी सैंकड़ों मीडिया

नेशनल मीडिया, लोकल मीडिया

दब्बू मीडिया भोकल मीडिया

प्रिंट मीडिया सरकारी मीडिया

मीडिया में भी एक मीडिया

इसका नाम सोशल मीडिया

जब से मुल्क में जन्नत की तामीर हुई है

सोशल मीडिया उनके चेलों की जागीर हो गई है

फरियाते हैं न सरियाते हैं

दिन भर देखो गरियाते हैं

माँ की गाली, बहन की गाली

बेटी की गाली बीबी की गाली

गाली रसगुल्ला गाली बर्फ़ी हो गई है

गाली गुड़ की खीर हो गई है

रसियाव समझ कर खा लीजिये

पुलाव समझ कर फाँक लीजिये

हर खाते में गाली है, हर गाली का खाता है

योजनाओं में एक योजना है

तहतों में तहत इसके तहत

सबको गालीधन मिलेगा

ट्वीटर पर बंट रहा है

फेसबुक पर बंट रहा है

रहे हैं रही है रहा है रहा है

जोगीरा मत कहो सारा कुछ सारा रा रा है

हुजूर की, हुजूर का,हुजूर के लिए

की का के को समझो अपनी तक़दीर के लिए

गाली जन्नत की नेमत है

बेकारों की तरफ़ से सरकारी बताशा है

मिलेगी रोज़ अब यही एकमात्र प्रत्याशा है

आशा ही झाँसा है और झाँसा भी आशा है

बोलना यहाँ बिल्कुल मना है

बोलने पर हैशटैग की हरकत है

सबके फोलोअर हुए हज़ार

कुछ यहाँ गिरे कुछ वहाँ गिरे

गुल के गुलशन में फ़ूल खिले हैं

कुछ वहाँ गिरे कुछ यहाँ गिरे

तो हज़रात जन्नत टाइम आपका नज़रिया बदल देगा

आपके बदलने का टाइम चला गया

यही बता कर चल देगा

कुछ मंत्र हैं एंकरों के लिए

कुछ तंत्र हैं एंकरों के लिए

इनके चक्कर में रोज़ आया करो

जहालत की जन्नत हुई है यहाँ

तर्कों की क़ब्रों पे जाया करो

हमने चुराई है ये तर्ज भी

तुम न नुसरत को सबको सुनाया करो

भयंकर भयंकर एंकर है

एंकर ही तो भयंकर है

वही नेशनल वही रैशनल

हर एंटी का एंटी है

हर आंटी का अंकल है

कल कल कल कल

हलचल हलचल हलचल हलचल

अलबल अलबल अलबल अलबल

तू नैशल मैं नैंशनल

नेशन में है सब नैशनल

ब्रेक के पहले ब्रेक के बाद

झूम के गाएँ आज की रात

हिन्दू मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम

दादरी मालदा दीघा मालदा

डालडा डालडा डालडा डालडा

झाऊं झाऊं कांव काँव

ऊफ वूफ आव वाव

रेलगाड़ी छुक छुक ह्रदय की नाड़ी धुक धुक

जब से जन्नत की तामीर हुई है

हर एंकर की जागीर हुई है

आम आदमी बेकाम आदमी

खास आदमी सौकाम आदमी

ओपिनियन से ही डोमिनियन है

हर स्टेट का अपना स्टेटस है

जो जेल में नहीं है वही तो नेशनल है

कालिया कालिया कालिया कालिया

हर जेल से भागा है कालिया

हर दीवार को फाँदा है कालिया

कालिया नहीं वो माल्या है

आँधी नहीं वो अंधड़ है

गांधी नहीं वो लफंदर है

एंकर एंकर एंकर है

क्रेज़ है इन दिनों क़र्ज़ का

कोई उतार रहा है कोई लेके भाग रहा है

माल्या नाम जपते हैं सब

बाकी पर चुप रह जाते हैं सब

कौन नाम ले उधारियों का

जन्नत टाइम में ब्रेक हुआ चाहता है

ब्रेक के बाद ब्रेक फ़ेल हुआ चाहता है

जाते जाते हम कुछ फ़रमा जाते हैं

हमें ख़त न लिखें हम शरमा जाते हैं

जो छोटे हैं वो तकलीफ़ सहते रहे

जो नहीं सह पाते वो राम राम जपते रहे

जो सह पाते हैं वो सहनशील हैं

बाकी सब ज्वलनशील हैं

ज़रूरी है कि हम सब जेल से डरें

ख़ुदा से नहीं जेलर से डरें

जन्नत के इस दौर में जेल में बहारें आईं हैं

इसलिए आवाज़ उठती है तो न उठायें

घर में रहें जेल न जायें

जेल जाकर आप ठीक हो जायेंगे

जेल चलो जेल चलो

खेल खेल में जेल चलो

ठेल ठेल के जेल चलो

जेल जेल में जेल चलो

जेलर साहब आप तो इसी ज़माने के हैं

हम पढ़े न होते तो लगता ही नहीं

आप अंग्रेज़ों के ज़माने के हैं

 

فاصلہ ہے کہ کم نہیں ہوتا۔۔۔۔۔ قابل اجمیری

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عام فیضانِ غم نہیں ہوتا

ہر نفس محترم نہیں ہوتا

نامرادی نے کردیا خوددار

اب سرِ شوق خم نہیں ہوتا

راستہ ہے کہ کٹتا جاتا ہے
فاصلہ ہے کہ کم نہیں ہوتا

وقت کرتا ہے پرورش برسوں
حادثہ ایک دم نہیں ہوتا

ٹوٹ جاتا ہے دل مگر قابل
عشق مانوسِ غم نہیں ہوتا

फ़ासिला है कि कम नहीं होता….काबिल अजमेरी

 

आम फैज़ान-ए-ग़म नहीं होता
हर-नफ़स मुहतरम नहीं होता

नामुरादी ने कर दिया ख़ुद्दार
अब सर-ए-शौक़ ख़म नहीं होता

रास्ता है कि कटता जाता है
फ़ासिला है कि कम नहीं होता

वक़्त करता है परवरिश बरसों
हादिसा एक दम नहीं होता

टूट जाता है दिल मगर काबिल

इशक़ मानूस-ए-ग़म नहीं होता

माँ मेरे गूंगे शब्दों को….- बेकल उत्साही

‘माँ मेरे गूंगे शब्दों को
गीतों का अरमान बना दे .
गीत मेरा बन जाये कन्हाई,
फिर मुझको रसखान बना दे .

देख सकें दुख-दर्द की टोली,
सुन भी सकें फरियाद की बोली,
माँ सारे नकली चेहरों पर
आँख बना दे,कान बना दे.

मेरी धरती के खुदगर्जों ने
टुकड़े-टुकड़े बाँट लिये हैं,
इन टुकड़ों को जोड़ के मैया
सुथरा हिन्दुस्तान बना दे .

गीत मेरा बन जाये कन्हाई,
फिर मुझको रसखान बना दे’

madina

مصطفی (صلی اللہ علیہ وسلم) جان رحمت پہ لاکھوں

سلام۔۔۔۔۔۔مولانا احمد رضا خان صاحب

« بروز: جون 15, 2010, 12:47:21 شام »

مصطفی (صلی اللہ علیہ وسلم) جان رحمت پہ لاکھوں سلام
شمعِ بزمِ ہدایت پہ لاکھوں سلام
شہر یار ارم ، تاجدارِ حرم
نو بہارِ شفاعت پہ لاکھوں سلام
ہم غریبوں کے آقا پہ بے حد درود
ہم فقیروں کی ثروت پہ لاکھوں سلام
جس کے ماتھے شفاعت کا سہرا رہا
اس جبینِ سعادت پہ لاکھوں سلام
جس کے سجدے کو محرابِ کعبہ جھکی
ان بھوئوں کی لطافت پہ لاکھوں سلام
جس طرف اٹھ گئی دم میں دم آگیا
اس نگاہِ عنایت پہ لاکھوں سلام
جس سے تاریک دل جگمگانے لگے
اس چمک والی رنگت پہ لاکھوں سلام
پتلی پتلی گلِ قدس کی پتیاں
ان لبوں کی نزاکت پہ لاکھوں سلام
وہ دہن جس کی ہر بات وحی خدا
چشمہء علم وحکمت پہ لاکھوں سلام
وہ زبان جس کو سب کُن کی کنجی کہیں
اس کی نافذ حکومت پہ لاکھوں سلام
جس کی تسکیں سے روتے ہوئے ہنس پڑیں
اس تبسم کی عادت پہ لاکھوں سلام
ہاتھ جس سمت اُٹھا ، غنی کردیا
موجِ بحرِ سخاوت پہ لاکھوں سلام
کُل جہاں ملک اور جو کی روٹی غذا
اس شکم کی قناعت پہ لاکھوں سلام
جس سہانی گھڑی چمکا طیبہ کا چاند
اس دل افروز ساعت پہ لاکھوں سلام
اللہ اللہ وہ بچپنے کی پھبن
اس خدا بھاتی صورت پہ لاکھوں سلام
جس کے آگے کھنچی گردنیں جھک گیئں
اس خدا داد شوکت پہ لاکھوں سلام
سیدہ ، زاہرہ ، طیبہ ، طاہرہ
جانِ احمد (صلی اللہ علیہ وسلم) پہ لاکھوں سلام
ایک میرا ہی رحمت پہ دعویٰ نہیں
شاہ کی ساری امت پہ لاکھوں سلام
مجھ سے خدمت کے قدسی کہیں ہاں رضا
مصطفیٰ (صلی اللہ علیہ وسلم) پہ لاکھوں سلام

مصطفی جانِ رحمت پہ لاکھوں سلام
شمعِ بزمِ ہدایت پہ لاکھوں سلام

مِہرِ چرخِ نبوت پہ روشن دُرود
گلِ باغِ رسالت پہ لاکھوں سلام

شبِ اسرا کے دولہا پہ دائم دُرود
نوشۂ بزمِ جنّت پہ لاکھوں سلام

عرش کی زیب و زینت پہ عرشی دُرود
فرش کی طیب و نُزہت پہ لاکھوں سلام

نورِ عینِ لطافت پہ اَلطف دُرود
زیب و زینِ نظافت پہ لاکھوں سلام

نقطۂ سِرِّ وحدت پہ یکتا دُرود
مرکزِ دورِ کثرت پہ لاکھوں سلام

فتحِ بابِ نبوت پہ بے حد دُرود
ختمِ دورِ رسالت پہ لاکھوں سلام

شرقِ انوارِ قدرت پہ نوری دُرود
فتقِ اَزہارِ قدرت پہ لاکھوں سلام

سِرِّ غیبِ ہدایت پہ غیبی دُرود
عطر جیبِ نہایت پہ لاکھوں سلام

ماہِ لاہوتِ خَلوت پہ لاکھوں دُرود
شاہِ ناسوتِ جَلوت پہ لاکھوں سلام

کنزِ ہر بے کس و بے نوا پر دُرود
حرزِ ہر رفتہ طاقت پہ لاکھوں سلام

پرتوِ اسمِ ذاتِ اَحد پر دُرود
نُسخۂ جامعیت پہ لاکھوں سلام

مطلعِ ہر سعادت پہ اسعد دُرود
مقطعِ ہر سیادت پہ لاکھوں سلام

مجھ سے بے کس کی دولت پہ لاکھوں دُرود
مجھ سے بے بس کی قوت پہ لاکھوں سلام

کثرتِ بُعدِ قلّت پہ اکثر دُرود
عزتِ بُعدِ ذلّت پہ لاکھوں سلام

ربِّ اعلا کی نعمت پہ اعلا دُرود
حق تعالیٰ کی منّت پہ لاکھوں سلام

ہم غریبوں کے آقا پہ بے حد دُرود
ہم فقیروں کی ثروت پہ لاکھوں سلام

فرحتِ جانِ مومن پہ بے حد دُرود
غیظِ قلبِ ضلالت پہ لاکھوں سلام

اشک باریِ مژگاں پہ برسے دُرود
سلکِ دُرِّ شفاعت پہ لاکھوں سلام

نیچی آنکھوں کی شرم و حیا پر دُرود
اونچی بینی کی رفعت پہ لاکھوں سلام

اُن کے خد کی سُہُولت پہ بے حد دُرود
اُن کے قد کی رشاقت پہ لاکھوں سلام

چاند سے منہ پہ تاباں درخشاں دُرود
نمک آگیں صباحت پہ لاکھوں سلام

اُس کی پیاری فصاحت پہ بے حد دُرود
اُس کی دل کش بلاغت پہ لاکھوں سلام

اُس کی باتوں کی لذّت پہ بے حد دُرود
اُس کے خطبے کی ہیبت پہ لاکھوں سلام

رفعِ ذکرِ جلالت پہ اَرفع دُرود
شرحِ صدرِ صدارت پہ لاکھوں سلام

مہدِ والا کی قسمت پہ صدہا دُرود
بُرجِ ماہِ رسالت پہ لاکھوں سلام

اُٹھتے بوٹوں کی نشوونَما پر دُرود
کھِلتے غنچوں کی نکہت پہ لاکھوں سلام

فضلِ پیدایشی پر ہمیشہ دُرود
کھیلنے سے کراہت پہ لاکھوں سلام

اعتلائے جبلّت پہ عالی دُرود
اعتدالِ طَوِیّت پہ لاکھوں سلام

بے بناوٹ ادا پر ہزاروں دُرود
بے تکلف ملاحت پہ لاکھوں سلام

بھینی بھینی مہک پر مہکتی دُرود
پیاری پیاری نفاست پہ لاکھوں سلام

میٹھی میٹھی عبارت پہ شیریں دُرود
اچھی اچھی اِشارت پہ لاکھوں سلام

سیدھی سیدھی رَوِش پر کروروں دُرود
سادی سادی طبیعَت پہ لاکھوں سلام

لطفِ بیداریِ شب پہ بے حد دُرود
عالمِ خوابِ راحت پہ لاکھوں سلام

خندۂ صبحِ عشرت پہ نُوری دُرود
گِریۂ ابرِ رحمت پہ لاکھوں سلام

نرمیِ خوئے لینت پہ دائم دُرود
گرمیِ شانِ سطوت پہ لاکھوں سلام

الغرض اُن کے ہر موٗ پہ لاکھوں دُرود
اُن کی ہر خُو و خصلت پہ لاکھوں سلام

اُن کے ہر نام و نسبت پہ نامی دُرود
اُن کے ہر وقت و حالت پہ لاکھوں سلام

اُن کے مولا کی اُن پر کروروں دُرود
اُن کے اصحاب و عترت پہ لاکھوں سلام

جلوگیّانِ بیتُ الشَّرَف پر دُرود
پردگیّانِ عفّت پہ لاکھوں سلام

جاں نثارانِ بدر و اُحُد پر دُرود
حق گزارانِ بیعَت پہ لاکھوں سلام

زاہدِ مسجدِ احمدی پر دُرود
دولتِ جیشِ عُسرت پہ لاکھوں سلام

اُن کی بالا شرافت پہ اعلا دُردو
اُن کی والا سیادت پہ لاکھوں سلام

کاملانِ طریقت پہ کامل دُرود
حاملانِ شریعت پہ لاکھوں سلام

مردِ خیلِ طریقت پہ بے حد دُرود
فردِ اہلِ حقیقت پہ لاکھوں سلام

کاش محشر میں جب اُن کی آمد ہو اور
بھیجیں سب اُن کی شوکت پہ لاکھوں سلام

مجھ سے خدمت کے قُدسی کہیں ہاں ! رضاؔ
مصطفی جانِ رحمت پہ لاکھوں سلام

3

مصطفی جانِ رحمت پہ لاکھوں سلام

بسم اللّٰہ الرحمن الرحیم

مصطفی جانِ رحمت پہ لاکھوں سلام

شمعِ بزمِ ہدایت پہ لاکھوں سلام

مِہرِ چرخِ نبوت پہ روشن دُرود

گلِ باغِ رسالت پہ لاکھوں سلام

شہرِ یارِ ارم تاج دارِ حرم

نوبہارِ شفاعت پہ لاکھوں سلام

شبِ اسرا کے دولہا پہ دائم دُرود

نوشۂ بزمِ جنّت پہ لاکھوں سلام

عرش کی زیب و زینت پہ عرشی دُرود

فرش کی طیب و نُزہت پہ لاکھوں سلام

نورِ عینِ لطافت پہ اَلطف دُرود

زیب و زینِ نظافت پہ لاکھوں سلام

سروِ نازِ قِدَم مغزِ رازِ حِکَم

یکّہ تازِ فضیلت پہ لاکھوں سلام

نقطۂ سِرِّ وحدت پہ یکتا دُرود

مرکزِ دورِ کثرت پہ لاکھوں سلام

صاحبِ رَجعتِ شمس و شقُ القمر

نائبِ دستِ قدرت پہ لاکھوں سلام

جس کے زیرِ لِوا آدم و من سِوا

اس سزائے سیادت پہ لاکھوں سلام

عرش تا فرش ہے جس کے زیرِ نگیں

اُس کی قاہر ریاست پہ لاکھوں سلام

اصل ہر بُود و بہبود تُخمِ وجود

قاسمِ کنزِ نعمت پہ لاکھوں سلام

فتحِ بابِ نبوت پہ بے حد دُرود

ختمِ دورِ رسالت پہ لاکھوں سلام

شرقِ انوارِ قدرت پہ نوری دُرود

فتقِ اَزہارِ قدرت پہ لاکھوں سلام

بے سہیم و قسیم و عدیل و مثیل

جوہرِ فردِ عزت پہ لاکھوں سلام

سِرِّ غیبِ ہدایت پہ غیبی دُرود

عطر جیبِ نہایت پہ لاکھوں سلام

ماہِ لاہوتِ خَلوت پہ لاکھوں دُرود

شاہِ ناسوتِ جَلوت پہ لاکھوں سلام

کنزِ ہر بے کس و بے نوا پر دُرود

حرزِ ہر رفتہ طاقت پہ لاکھوں سلام

پرتوِ اسمِ ذاتِ اَحد پر دُرود

نُسخۂ جامعیت پہ لاکھوں سلام

مطلعِ ہر سعادت پہ اسعد دُرود

مقطعِ ہر سیادت پہ لاکھوں سلام

خلق کے داد رس سب کے فریاد رس

کہفِ روزِ مصیبت پہ لاکھوں سلام

مجھ سے بے کس کی دولت پہ لاکھوں دُرود

مجھ سے بے بس کی قوت پہ لاکھوں سلام

شمعِ بزمِ دنیٰ ہُوْ میں گم کُن اَنَا

شرحِ متنِ ہُوِ یَّت پہ لاکھوں سلام

انتہائے دوئی ابتدائے یکی

جمع تفریق و کثرت پہ لاکھوں سلام

کثرتِ بعدِ قلّت پہ اکثر دُرود

عزتِ بعدِ ذلّت پہ لاکھوں سلام

ربِّ اعلا کی نعمت پہ اعلا دُرود

حق تعالیٰ کی منّت پہ لاکھوں سلام

ہم غریبوں کے آقا پہ بے حد دُرود

ہم فقیروں کی ثروت پہ لاکھوں سلام

فرحتِ جانِ مومن پہ بے حد دُرود

غیظِ قلبِ ضلالت پہ لاکھوں سلام

سببِ ہر سبب منتہائے طلب

علّتِ جملہ علّت پہ لاکھوں سلام

مصدرِ مظہریت پہ اظہر دُرود

مظہرِ مصدریت پہ لاکھوں سلام

جس کے جلوے سے مرجھائی کلیا ں کھلیں

اُس گلِ پاک مَنبت پہ لاکھوں سلام

قدِّ بے سایہ کے سایۂ مرحمت

ظلِ ممدود رافت پہ لاکھوں سلام

طائرانِ قُدُس جس کی ہیں قُمریاں

اُس سہی سرو قامت پہ لاکھوں سلام

وصف جس کا ہے آئینۂ حق نما

اُس خدا ساز طلعت پہ لاکھوں سلام

جس کے آگے سرِ سروراں خم رہیں

اُس سرِ تاجِ رفعت پہ لاکھوں سلام

وہ کرم کی گھٹا گیسوے مُشک سا

لکّۂ ابرِ رافت پہ لاکھوں سلام

لَیْلَۃُ القدر میں مطلعِ الفجر حق

مانگ کی استقامت پہ لاکھوں سلام

لخت لختِ دلِ ہر جگر چاک سے

شانہ کرنے کی عادت پہ لاکھوں سلام

دُور و نزدیک کے سُننے والے وہ کان

کانِ لعلِ کرامت پہ لاکھوں سلام

چشمۂ مِہر میں موجِ نورِ جلال

اُس رگِ ہاشمیت پہ لاکھوں سلام

جس کے ماتھے شفاعت کا سہرا رہا

اُس جبینِ سعادت پہ لاکھوں سلام

جن کے سجدے کو محرابِ کعبہ جھکی

اُن بھووں کی لطافت پہ لاکھوں سلام

اُن کی آنکھوں پہ وہ سایہ افگن مژہ

ظلۂ قصرِ رحمت پہ لاکھوں سلام

اشک باریِ مژگاں پہ برسے دُرود

سلکِ دُرِّ شفاعت پہ لاکھوں سلام

معنیِ قَدْ رَأیٰ مقصدِ مَاطَغیٰ

نرگسِ باغِ قدرت پہ لاکھوں سلام

جس طرف اٹھ گئی دم میں دم آ گیا

اُس نگاہِ عنایت پہ لاکھوں سلام

نیچی آنکھوں کی شرم و حیا پر دُرود

اونچی بینی کی رفعت پہ لاکھوں سلام

جن کے آگے چراغِ قمر جھلملائے

اُن عِذاروں کی طلعت پہ لاکھوں سلام

اُن کے خد کی سُہُولت پہ بے حد دُرود

اُن کے قد کی رشاقت پہ لاکھوں سلام

جس سے تاریک دل جگمگانے لگے

اُس چمک والی رنگت پہ لاکھوں سلام

چاند سے منہ پہ تاباں درخشاں دُرود

نمک آگیں صباحت پہ لاکھوں سلام

شبنمِ باغِ حق یعنی رُخ کا عَرَق

اُس کی سچی بَراقت پہ لاکھوں سلام

خط کی گردِ دہن وہ دل آرا پھبن

سبزۂ نہرِ رحمت پہ لاکھوں سلام

رِیشِ خوش معتدل مرہمِ رَیش دل

ہالۂ ماہِ نُدرت پہ لاکھوں سلام

پتلی پتلی گلِ قُدس کی پتّیاں

اُن لبوں کی نزاکت پہ لاکھوں سلام

وہ دہن جس کی ہر بات وحیِ خدا

چشمۂ علم و حکمت پہ لاکھوں سلام

جس کے پانی سے شاداب جان و جناں

اُس دہن کی طراوت پہ لاکھوں سلام

جس سے کھاری کنویں شیرۂ جاں بنے

اُس زُلالِ حلاوت پہ لاکھوں سلام

وہ زباں جس کو سب کُن کی کنجی کہیں

اُس کی نافذ حکومت پہ لاکھوں سلام

اُس کی پیاری فصاحت پہ بے حد دُرود

اُس کی دل کش بلاغت پہ لاکھوں سلام

اُس کی باتوں کی لذّت پہ بے حد دُرود

اُس کے خطبے کی ہیبت پہ لاکھوں سلام

وہ دُعا جس کا جوبن قبولِ بہار

اُس نسیمِ اجابت پہ لاکھوں سلام

جن کے گچھّے سے لچھّے جھڑیں نور کے

اُن ستاروں کی نُزہت پہ لاکھوں سلام

جس کی تسکیں سے روتے ہوئے ہنس پڑیں

اُس تبسم کی عادت پہ لاکھوں سلام

جس میں نہریں ہیں شیٖر شکر کی رواں

اُس گلے کی نضارت پہ لاکھوں سلام

دوش بردوش ہے جن سے شانِ شَرَف

ایسے شانوں کی شوکت پہ لاکھوں سلام

حَجَرِ اسودِ کعبۂ جان و دل

یعنی مُہرِ نبوت پہ لاکھوں سلام

روئے آئینۂ علم پُشتِ حضور

پُشتیِ قصرِ ملّت پہ لاکھوں سلام

ہاتھ جس سمت اُٹھّا غنی کر دیا

موجِ بحرِ سماحت پہ لاکھوں سلام

جس کو بارِ دو عالم کی پروا نہیں

ایسے بازو کی قوّت پہ لاکھوں سلام

کعبۂ دین و ایماں کے دونوں ستوں

ساعدینِ رسالت پہ لاکھوں سلام

جس کے ہر خط میں ہے موجِ نورِ کرم

اُس کفِ بحرِ ہمّت پہ لاکھوں سلام

نُور کے چشمے لہرائیں دریا بہیں

انگلیوں کی کرامت پہ لاکھوں سلام

عیدِ مشکل کُشائی کے چمکے ہِلال

ناخنوں کی بشارت پہ لاکھوں سلام

رفعِ ذکرِ جلالت پہ اَرفع دُرود

شرحِ صدرِ صدارت پہ لاکھوں سلام

دل سمجھ سے ورا ہے مگر یوں کہوں

غنچۂ رازِ وحدت پہ لاکھوں سلام

کُل جہاں مِلک اور جَو کی روٹی غذا

اُس شکم کی قناعت پہ لاکھوں سلام

جو کہ عزمِ شفاعت پہ کھنچ کر بندھی

اُس کمر کی حمایت پہ لاکھوں سلام

انبیا تَہ کریں زانُو اُن کے حضور

زانُوؤں کی وجاہت پہ لاکھوں سلام

ساق اصلِ قدم شاخِ نخلِ کرم

شمعِ راہِ اِصابت پہ لاکھوں سلام

کھائی قرآں نے خاکِ گزر کی قسم

اُس کفِ پا کی حُرمت پہ لاکھوں سلام

جس سہانی گھڑی چمکا طیبہ کا چاند

اُس دل افروز ساعت پہ لاکھوں سلام

پہلے سجدے پہ روزِ ازل سے دُرود

یادگاریِ اُمّت پہ لاکھوں سلام

زرع شاداب و ہر ضرع پُر شیٖر سے

برَکاتِ رضاعت پہ لاکھوں سلام

بھائیوں کے لیے ترکِ پِستاں کریں

دودھ پیتوں کی نِصفَت پہ لاکھوں سلام

مہدِ والا کی قسمت پہ صدہا دُرود

بُرجِ ماہِ رسالت پہ لاکھوں سلام

اللہ اللہ وہ بچپنے کی پھبَن!

اُس خدا بھاتی صورت پہ لاکھوں سلام

اُٹھتے بوٹوں کی نشوونَما پر دُرود

کھِلتے غنچوں کی نکہت پہ لاکھوں سلام

فضلِ پیدایشی پر ہمیشہ دُرود

کھیلنے سے کراہت پہ لاکھوں سلام

اعتلائے جبلّت پہ عالی دُرود

اعتدالِ طَوِیّت پہ لاکھوں سلام

بے بناوٹ ادا پر ہزاروں دُرود

بے تکلف ملاحت پہ لاکھوں سلام

بھینی بھینی مہک پر مہکتی دُرود

پیاری پیاری نفاست پہ لاکھوں سلام

میٹھی میٹھی عبارت پہ شیریں دُرود

اچھی اچھی اِشارت پہ لاکھوں سلام

سیدھی سیدھی رَوِش پر کروروں دُرود

سادی سادی طبیعَت پہ لاکھوں سلام

روزِ گرم و شبِ تیرہ و تار میں

کوہ و صحرا کی خَلوت پہ لاکھوں سلام

جس کے گھیرے میں ہیں انبیا و مَلک

اس جہاں گیر بعثت پہ لاکھوں سلام

ادھے شیشے جھلاجھل دمکنے لگے

جلوہ ریزیِ دعوت پہ لاکھوں سلام

لطفِ بیداریِ شب پہ بے حد دُرود

عالمِ خوابِ راحت پہ لاکھوں سلام

خندۂ صبحِ عشرت پہ نُوری دُرود

گِریۂ ابرِ رحمت پہ لاکھوں سلام

نرمیِ خوئے لینت پہ دائم دُرود

گرمیِ شانِ سطوت پہ لاکھوں سلام

جس کے آگے کھنچی گردنیں جھک گئیں

اُس خداداد شوکت پہ لاکھوں سلام

کس کو دیکھا یہ موسیٰ سے پوچھے کوئی

آنکھوں والوں کی ہمّت پہ لاکھوں سلام

گردِ مہ دستِ انجم میں رَخشاں ہِلال

بدر کی دفعِ ظلمت پہ لاکھوں سلام

شورِ تکبیر سے تھرتھراتی زمیں

جنبشِ جیشِ نصرت پہ لاکھوں سلام

نعرہائے دلیراں سے بَن گونجتے

غُرّشِ کوسِ جرأت پہ لاکھوں سلام

وہ چقاچاق خنجر سے آتی صدا

مصطفی تیری صَولت پہ لاکھوں سلام

اُن کے آگے وہ حمزہ کی جاں بازیاں

شیرِ غُرّانِ سطوت پہ لاکھوں سلام

الغرض اُن کے ہر موٗ پہ لاکھوں دُرود

اُن کی ہر خُو و خصلت پہ لاکھوں سلام

اُن کے ہر نام و نسبت پہ نامی دُرود

اُن کے ہر وقت و حالت پہ لاکھوں سلام

اُن کے مولا کی اُن پر کروروں دُرود

اُن کے اصحاب و عترت پہ لاکھوں سلام

پارہائے صُحف غنچہ ہائے قُدُس

اہلِ بیتِ نبوت پہ لاکھوں سلام

آبِ تطہیر سے جس میں پودے جمے

اُس ریاضِ نجابت پہ لاکھوں سلام

خونِ خیرُالرُّسل سے ہے جن کا خمیر

اُن کی بے لوث طینت پہ لاکھوں سلام

اُس بتولِ جگر پارۂ مصطفی

حجلہ آرائے عِفّت پہ لاکھوں سلام

جس کا آنچل نہ دیکھا مہ و مِہر نے

اُس رِدائے نَزاہت پہ لاکھوں سلام

سیّدہ زاہرہ طیّبہ طاہرہ

جانِ احمد کی راحت پہ لاکھوں سلام

حَسَنِ مجتبیٰ سیّدُ الاسخیا

راکبِ دوشِ عزت پہ لاکھوں سلام

اَوجِ مِہرِ ہُدیٰ موجِ بحرِ نَدیٰ

رَوحِ رُوحِ سخاوت پہ لاکھوں سلام

شہد خوارِ لُعابِ زبانِ نبی

چاشنی گیرِ عصمت پہ لاکھوں سلام

اُس شہیدِ بَلا شاہِ گلگوں قَبا

بے کسِ دشتِ غربت پہ لاکھوں سلام

دُرِّ دُرجِ نجف مِہرِ بُرجِ شَرَف

رنگِ رومی شہادت پہ لاکھوں سلام

اہلِ اسلام کی مادرانِ شفیق

بانوانِ طہارت پہ لاکھوں سلام

جلوگیّانِ بیتُ الشَّرَف پر دُرود

پردگیّانِ عفّت پہ لاکھوں سلام

سَیِّما پہلی ماں کہفِ امن و اماں

حق گزارِ رفاقت پہ لاکھوں سلام

عرش سے جس پہ تسلیم نازل ہوئی

اُس سرائے سلامت پہ لاکھوں سلام

منزلُُ مَّن قَصَبْ لَا نَصَبْ لَاصَخَبْ

ایسے کوشک کی زینت پہ لاکھوں سلام

بنتِ صدّیق آرامِ جانِ نبی

اُس حریمِ براء ت پہ لاکھوں سلام

یعنی ہے سورۂ نور جن کی گواہ

اُن کی پُر نور صورت پہ لاکھوں سلام

جن میں رُوح ا لقدُس بے اجازت نہ جائیں

اُن سُرادِق کی عِصمت پہ لاکھوں سلام

شمعِ تابانِ کاشانۂ اجتہاد

مفتیِ چار ملّت پہ لاکھوں سلام

جاں نثارانِ بدر و اُحُد پر دُرود

حق گزارانِ بیعَت پہ لاکھوں سلام

وہ دسوں جن کو جنت کا مژدہ ملا

اُس مبارک جماعت پہ لاکھوں سلام

خاص اُس سابقِ سیرِ قُربِ خدا

اوحَدِ کاملیَّت پہ لاکھوں سلام

سایۂ مصطفیٰ مایۂ اِصطَفیٰ

عِزّو نازِ خلافت پہ لاکھوں سلام

یعنی اُس افضلُ الخلق بعدَ الرُّسُل

ثانی اَثنَینِ ہجرت پہ لاکھوں سلام

اصدقُ الصّادِقیں سیّدُ المتّقیں

چشم و گوشِ وزارت پہ لاکھوں سلام

وہ عمر جس کے اعدا پہ شیدا سقر

اُس خدا دوست حضرت پہ لاکھوں سلام

فارقِ حقّ و باطل امامِ الہُدیٰ

تیغِ مسلول شدّت پہ لاکھوں سلام

ترجمانِ نبی ہم زبانِ نبی

جانِ شانِ عدالت پہ لاکھوں سلام

زاہدِ مسجدِ احمدی پر دُرود

دولتِ جیشِ عُسرت پہ لاکھوں سلام

دُرِّ منثور قرآں کی سلک بہی

زوجِ دو نور عفّت پہ لاکھوں سلام

یعنی عثمان صاحب قمیصِ ہدیٰ

حُلّہ پوشِ شہادت پہ لاکھوں سلام

مرتضیٰ شیرِ حق اشجع الاشجعیں

ساقی شیٖر و شربت پہ لاکھوں سلام

اصل نسلِ صفا وجہِ وصلِ خدا

بابِ فصلِ ولایت پہ لاکھوں سلام

اّولیں دافعِ اہلِ رفض و خروج

چارمی رکنِ ملّت پہ لاکھوں سلام

شیرِ شمشیر زن شاہِ خیبر شکن

پرتوِ دستِ قدرت پہ لاکھوں سلام

ماحیِ رفض و تفضیل و نصب و خروج

حامیِ دین و سنت پہ لاکھوں سلام

مومنیں پیشِ فتح و پسِ فتح سب

اہلِ خیر و عدالت پہ لاکھوں سلام

جس مسلماں نے دیکھا اُنھیں اک نظر

اُس نظر کی بصارت پہ لاکھوں سلام

جن کے دشمن پہ لعنت ہے اللہ کی

اُن سب اہلِ محبت پہ لاکھوں سلام

باقیِ ساقیانِ شرابِ طہور

زینِ اہلِ عبادت پہ لاکھوں سلام

اور جتنے ہیں شہزادے اُس شاہ کے

اُن سب اہلِ مکانت پہ لاکھوں سلام

اُن کی بالا شرافت پہ اعلا دُردو

اُن کی والا سیادت پہ لاکھوں سلام

شافعی مالک احمد امامِ حنیف

چار باغِ امامت پہ لاکھوں سلام

کاملانِ طریقت پہ کامل دُرود

حاملانِ شریعت پہ لاکھوں سلام

غوثِ اعظم امامُ التقیٰ والنقیٰ

جلوۂ شانِ قدرت پہ لاکھوں سلام

قطبِ ابدال و ارشاد و رُشدالرشاد

مُحییِ دین و ملّت پہ لاکھوں سلام

مردِ خیلِ طریقت پہ بے حد دُرود

فردِ اہلِ حقیقت پہ لاکھوں سلام

جس کی منبر ہوئی گردنِ اولیا

اُس قدم کی کرامت پہ لاکھوں سلام

شاہِ برکات و برکات پیشینیاں

نوبہارِ طریقت پہ لاکھوں سلام

سید آلِ محمد امام الرشید

گلِ روضِ ریاضت پہ لاکھوں سلام

حضرتِ حمزہ شیرِ خدا و رسول

زینتِ قادریت پہ لاکھوں سلام

نام و کام و تن و جان و حال و مقال

سب میں اچھے کی صورت پہ لاکھوں سلام

نورِ جاں عطر مجموعہ آلِ رسول

میرے آقائے نعمت پہ لاکھوں سلام

زیبِ سجّادہ سجّاد نوری نہاد

احمدِ نورِ طینت پہ لاکھوں سلام

بے عذاب و عتاب و حساب و کتاب

تاابد اہلِ سنّت پہ لاکھوں سلام

تیرے ان دوستوں کے طفیل اے خدا

بندۂ ننگِ خلقت پہ لاکھوں سلام

میرے اُستاد ماں باپ بھائی بہن

اہلِ وُلد و عشیرت پہ لاکھوں سلام

ایک میرا ہی رحمت میں دعویٰ نہیں

شاہ کی ساری اُمّت پہ لاکھوں سلام

کاش محشر میں جب اُن کی آمد ہو اور

بھیجیں سب اُن کی شوکت پہ لاکھوں سلام

مجھ سے خدمت کے قُدسی کہیں ہاں ! رضاؔ

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محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ قریب آ رہا ہے

 

محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ

محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ قریب آ رہا ہے
بلندی پہ اپنا نصیب آ رہا ہے
محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ قریب آ رہا ہے
بلندی پہ اپنا نصیب آ رہا ہے
فرشتوں یہ دے دو پیغام انکو
خبر جا کے دے دو انکو فرشتوں
کے خادم تمھارا سعید آ رہا ہے
مدینہ ، مدینہ ، مدینہ ، مدینہ
بڑا لطف دیتا ہے نام مدینہ
وفا تم نا دیکھو گے ہرگز کسی میں
زمانہ وہ ایسا قریب آ رہا ہے
حفاظت کرو اپنے ایمان و دین کی
زمانہ وہ ایسا عجیب آ رہا ہے
محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ قریب آ رہا ہے
بلندی پہ اپنا نصیب آ رہا ہے
فرشتوں یہ دے دو پیغام انکو
خبر جا کے دے دو انکو فرشتوں
کے خادم تمھارا سعید آ رہا ہے
مدینہ ، مدینہ ، مدینہ ، مدینہ
بڑا لطف دیتا ہے نام مدینہ
تمہیں کچھ خبر ہے کہاں جا رہا ہوں
رسول خدا ( صلی اللہ علیہ وسلم ) ہیں وہاں جا رہا ہوں
تمہیں کچھ خبر ہے میں کیا پا رہا ہوں
محبت کا انکی مزہ پا رہا ہوں
چلو جا کے رہنا مدینے میں اب تو
قیامت کا منظر قریب آ رہا ہے
فرشتوں یہ دے دو پیغام انکو
خبر جا کے دے دو انکو فرشتوں
کے خادم تمھارا سعید آ رہا ہے
مدینہ ، مدینہ ، مدینہ ، مدینہ
بڑا لطف دیتا ہے نام مدینہ
نگاہوں میں سلطانیت ہیچ ہو گی
جو پائے گا دل میں پیام مدینہ
سکون جہاں تم کہاں ڈھونڈتے ہو
سکون جہاں ہے نظام مدینہ
مدینہ ، مدینہ ، مدینہ ، مدینہ
بڑا لطف دیتا ہے نام مدینہ
محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ قریب آ رہا ہے
بلندی پہ اپنا نصیب آ رہا ہے
محمد ( صلی اللہ علیہ وسلم ) کا روزہ قریب آ رہا ہے
بلندی پہ اپنا نصیب آ رہا ہے
فرشتوں یہ دے دو پیغام انکو
خبر جا کے دے دو انکو فرشتوں
کے خادم تمھارا سعید آ رہا ہے

 

 

 

मुहम्मद( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) का रोज़ा करीब आ रहा हे

 

मुहम्मद( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) का रोज़ा करीब आ रहा हे

बुलंदी पा अपना नसीब आ रहा हे

मुहम्मद( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) का रोज़ा करीब आ रहा हे

बुलंदी पे अपना नसीब आ रहा हे

फरिश्तों यह दे दो पेग़ाम उनको

ख़बर जा के दे दो उनको फरिश्तों

के खादिम तुम्हरा सईदआ रहा हे

मदीना, मदीना, मदीना, मदीना

बड़ा लुत्फ देता हे नामे मदीना

वफ़ा तम ना देखो गे हरगज़ कसी में

ज़माना वुह एसा करीब आ रहा हे

हफ़ाज़त करो अपने एमान व देन के

ज़माना वुह एसा अजेब आ रहा हे

मुहम्मद( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) का रोज़ा करीब आ रहा हे

बुलंदी पा अपना नसीब आ रहा हे

फरिश्तों यह दे दो पेग़ाम उनको

ख़बर जा के दे दो उनको फरिश्तों

के खादिम तुम्हरा सईद आ रहा हे

मदीना, मदीना, मदीना, मदीना

बड़ा लुत्फ देता हे नामे मदीना

तुम्हें कुछख़बर हे कहां जा रहे हुं

रसुले खुदा( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) हें वहां जा रहा हुं

तुम्हें कुछख़बर हे में कया पा रहा हुं

मोहब्बत का उनकी मज़ा पा रहा हुं

चलो जा के रहना मदीने में अब तो

क़यामत का मंज़र करीब आ रहा हे

फरिश्तों यह दे दो पेग़ाम उनको

ख़बर जा के दे दो उनको फरिश्तों

के खादिम तुम्हरा सईद आ रहा हे

मदीना, मदीना, मदीना, मदीना

बड़ा लुत्फ देता हे नामे मदीना

नगाहुं में सलतानेत हेच हो गे

जो पाए गा दल में पयाम मदीना

सकून जहां तुम कहां ढूंढते हो

सकून जहां हे निज़ाम मदीना

मदीना, मदीना, मदीना, मदीना

बड़ा लुत्फ देता हे नामे मदीना

मुहम्मद( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) का रोज़ा करीब आ रहा हे

बुलंदी पा अपना नसीब आ रहा हे

मुहम्मद( सललल्लाहो अलय हे वसल्लम) का रोज़ा करीब आ रहा हे

बुलंदी पा अपना नसीब आ रहा हे

फरिश्तों यह दे दो पेग़ाम उनको

ख़बर जा के दे दो उनको फरिश्तों

के खादिम तुम्हरा सईद आ रहा हे

دوسرا بن واس – کیفی اعظمی

دوسرا بن واس – کیفی اعظمی

رام بن باس سے جب لوٹ کے گھر میں آئے

یاد جنگل بہت آیا جو نگر میں آئے

رقص دیوانگی آنگن میں جو دیکھا ہوگا

چھ دسمبر کو شری رام نے سوچا ہوگا

اتنے دیوانے کہاں سے میرے گھر میں آئے

جگمگاتے تھے جہاں رام کے قدموں کے نشاں

پیار کی کاہ کشاں لیتی تھیں انگڑائی جہاں

موڑ نفرت کے اسی راہ گزر میں آئے

دھرم کیا ان کا تھا ،کیا ذات تھی ، یہ جانتا کون

گھر نہ جلتا تو انہیں رات میں پہچانتا کون

گھر جلانے کو میرا لوگ جو گھر میں آئے

شاکا ہاری ہیں میرے دوست ،تمہارے خنجر

تم نے بابر کی طرف پھینکے تھے سارے پتھر

ہیں میرے سرکی خطا، زخم جو سر میں آئے

پاؤں سرجو میں ابھی رام نے دھوئے بھی نہ تھے

کہ نظر آئے وہاں خون کے گہرے دھبے

پاؤں دھوئے بنا سرجو کے کنارے سے اٹھے

رام یہ کہتے ہوئے اپنے دوارے سے اٹھے

راجدھانی کی فضا آئی نہیں راس مجھے

چھ دسمبر کو مل دوسرا ون واس مجھے

दूसरा वनवास — कैफ़ी आज़मी

 

राम बनवास से जब लौटकर घर में आये

याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये

रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा

छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा

इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये

धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन

घर ना जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन

घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे ख़ंजर

तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर

है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आये

पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे

कि नज़र आये वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे

पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे

राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे

राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे

 

 

 

 

 

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दुश्मन है मेरी मौत के सारे फ़िराक में—- शमीम अंसारी

 

दुश्मन है मेरी मौत के सारे फ़िराक में

मरते है बच्चे औरते अब भी इराक़ में

शोलों की बारिशों से ये भीगा है सीरिया

मर मर के बच्चे औरते मिलते है राख़ में

कुर्सी है इनकी शान अजब इत्तेफ़ाक़ है

मर जाये सारी उम्मत मिट जाये ख़ाक़ में

पहले भी कुछ फ़रिश्तों को जन्नत हुई अता

लाहौर का वो पेड़ था लाशें थी शाख़ में

कोशिश है ये शमीम के क़िरदार हो बुलंद

इंसानियत की बात मेरी जाये पाक में

बुलबुल क़ो गुल मिले नहीं फ़स्ले बहार में—- शकील क़ादरी

आख़िरी मुग़ल शहेनशाह और आज़ादी के सिपाही बहादूर शाह ज़फ़र की माज़िरत के साथ…. जिस के दो बेटों का सर अंग्रेज़ोने क़लम कर दिया था…

पेरोडी

 

धबरा रहा है दिल तेरा लंबी क़तार में

सब का यही तो हाल है नोटों के प्यार में.

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वोटों को कोसते रहो मोदी से क्या गिला

जो मिल रहा है यार वो ले लो उधार में

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कह दो पचास दिन से कहीं और जा बसे

“इतनी जगह कहाँ है दिले दाग़दार में”

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ख़ुद ही तमाचे मार के अब गाल रक्खो लाल

साहिबने जो लगा दिया तुम को क़तार में

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बनिये को ब्याज़ देके जो लाये थे कुछ हज़ार

अब वो भी चोरी हो गए सब्ज़ी बज़ार में

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बाज़ार, कारख़ानों पे छाई सियाह रात

आई है ऐसी मंदी हर इक कारोबार में

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बेहाल नोटबंदी से बस ऐसे हो गये

जैसे चढ़े हों सूली पे सब कू-ए-यार में

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है देशवासीयों का यही हाल ऐ “शकील”

बुलबुल क़ो गुल मिले नहीं फ़स्ले बहार में

(Courtesy:Facebook)

اپنی مفلسی اچھی لگی ۔۔۔۔ کفیل احمد

بند  دروازے سے آتی روشنی اچھی لگی

جھانک کر باہر جو دیکھا زندگی اچھی لگی

مسکرا کر دیکھنا اور یوں پلٹ جانا ترا

جانے کیوں مجھ کو تری یہ بے رُخی اچھی لگی

رات بھر چلتا رہا اک چاند میرے ساتھ ساتھ

اور مجھ کو چاند کی یہ رہبری اچھی لگی

کائناتِ رنگ و بُو میں ایک شخص اچھا لگا

ایسے سچے شخص کی پھر پیروی اچھی لگی

دھونا چہرہ گُل کا اپنے شبنمی قطروں کے ساتھ

باغ کے ہر گُل کی ہم کو تازگی اچھی لگی

تیری دولت گر محبت دے نہیں سکتی تو پھر

اس سے بہتر مجھ کو اپنی مفلسی اچھی لگی

میرے آنکھوں پر سجی تھیں میرے غم کی موتیاں

غم کے ماروں کو مگر اُس کی ہنسی اچھی لگی

واقعی درویش پھر کہنے لگے مجھ کو کفیل

سب کو مجھ درویش سے جب دوستی اچھی لگی

अपनी मुफ़लिसी अच्छी लगी ——कफ़ील अहमद

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बंद दरवाज़े से आती रोशनी अच्छी लगी

झांक कर बाहर जो देखा ज़िंदगी अच्छी लगी

मुस्कुरा कर देखना और यूं पलट जाना तेरा

जाने क्यों मुझको तरी ये बेरुखी अच्छी लगी

रात-भर चलता रहा इक चांद मेरे साथ साथ

और मुझको चांद की ये रहबरी अच्छी लगी

काइनात-ए-रंग-ओ-बू में एक शख़्स अच्छा लगा

ऐसे सच्चे शख़्स की फिर पैरवी अच्छी लगी

धोना चेहरा गुल का अपने शबनमी क़तरों के साथ

बाग़ के हर गुल की हमको ताज़गी अच्छी लगी

तेरी दौलत गर मुहब्बत दे नहीं सकती तो फिर

इस से बेहतर मुझको अपनी मुफ़लिसी अच्छी लगी

मेरे आँखों पर सजी थीं मेरे ग़म की मूतियां

गम के मारों को मगर उस की हंसी अच्छी लगी

वाक़ई दरवेश फिर कहने लगे मुझको कफ़ील

सबको मुझ दरवेश से जब दोस्ती अच्छी लगी

(courtesy:Facebook)

कभी भोपाल कर डाला….इमरान प्रतापगढी

पुराने  हाल से बदतर सभी  का  हाल  कर डाला

कहीं  कश्मीर कर  डाला…कभी  भोपाल कर  डाला

कहां  वादा  था  हर  खातेमें 15 लाख  आयेंगे

कहां  सब  ले लिया हर शख्सको  कंगाल कर डाला

सियासत आपकी सांसो पे पाबंदी  करा देगी

मगर  नफरतके  मारोंमें  रजामंदी करेगी

ये  जनता  है  रुलाओ मत इसे  तुम खूनके  आंसु

अगर ये  जीद  पे  आयेगी तो  नसबंदी करा देगी

और कीतना सितम  याद  करोगे  साहब

अब  कीतना हमें बरबाद  करोगे  साहब

खुदकी  औलाद  नहीं  है तो बताओ  इतना

कीतनी  मांओको बे  औलाद  करोगे  साह्ब

सरहद  पर  दहशत  गर्दो  का  कब्जा  है

मुल्क् पे  झूटे  हमदर्दो ंका  कब्जा  है

एक के बदले दस  सरोंकी  उम्मीद न रख

दिल्ही तुझ पर  ना मर्दोंका कब्जा  है

सूरज

साहब रोशन  दान की बातें  करता  है.

एक  कश्मीर  संभाले नही संभलता   है

और बलुचिस्तान की  बातें करता है

अपने  सभी  प्यादों  केनाम बदल डालो

तारीखी  यादोंका नाम बदल  डालो

अकबर रोड  के नाम  बदल नेसे पहले

अपने दामादोंका नाम बदल  डालो

*

घुर्राने  वालोंको आग  बबूला करके  छोड  दिया

इधर  उधर बस झूल रहे हैं झूल  करके  छोड  दिया

अमित शाह को  लालु  ने  लूला करके  छोड  दिये

चाय  चाय  करते थे…गाय  गाय  करते  हैं

जगे  हैं  दलित  जबसे  हाय  हाय  करतें  है

तीन  साल  बाकी  है आने  दो  जरा उन्हें

दिल्हीभी  ये कह देगी  बाय  बाय  करते  हैं.

जो नफरत  के  सबब की थी  वो  ललकार कीसकी थी

हमारे खूनको  प्यासी थी वो तलवार  कीसकी थी

हमारी गरदन मत  काटिये बस ये  बता दिजीये

जीसे  तुम  पहनके  भागे थे  ये  सल्वार  कीसकी थी

लहूकी बात  करता है कतलकी बात  करता है

वो  कारोबारिये के साथ धन की बात  करता  है

हमारे  मूल्कने  कैसा   नमुना  चुन  लिया  है  यारो

वतन की  बात  करनी थी  तो  मनकी  बात  करता  है.

……..

हाथोंकी  सफाई  छुपाता  है

वो  काली कमाई छूपाता  है

दावा है मसीहाई   का  मगर

वो अपनी लुगाई  छूपाता  है

मीडिया ने  गढ  रखा  है

वो  जूठी शानका  क्या  होगा

जओ बीवी  का न हुआ  भला

वो हिंदुस्तानका क्या होगा?

………

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,

समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली !

मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,

तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली !!

वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे

, वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे !

यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है

तडप करके ये एक मॉं कह रही है !

कोई पूँछता ही नहीं हाल मेरा…..!

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा…!

उसे ले के वापस चली जाऊँगी मैं,

पलट कर कभी फिर नहीं आऊँगी मैं !

बुढापे का मेरे सहारा वही है,

वो बिछडा तो ज़िन्दा ही मर जाऊँगी मैं !

मेरी चीख़ और मेरी फ़रियाद कहना,

ये मोदी से इक मॉं की रूदाद कहना !

कहीं झूठ की शख़्सियत बह ना जाये,

ये नफ़रत की दीवार छत बह ना जाये !

है इक मॉं के अश्कों का सैलाब साहब,

कहीं आपकी सल्तनत बह ना जाये !!

वो है ज़िन्दगी भर की मेरी कमाई,

वही तो है सदियों का आमाल मेरा….!!

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा …

کبھی بھوپال کر ڈالا۔۔۔عمران پرتاپگڑھی

پرانے حال سے بدتر سبھی کا حال کر ڈالا

کہیں کشمیر کر ڈالا۔۔۔ بھوپال کر ڈالا

کہاں وعدہ تھا ہر کھاتیمیں 15 لاکھ آئینگے

کہاں سب لے لیا ہر شخش کو کنگال کر ڈالا

سیاست آپکی سانسو پہ پابندی کرا دیگی

مگر نفرت کے ماروں ںیں رضامندی کرا دیگی

یہ جنتا ہے رلاؤ مت اسے تم خون کے آنسو

اگر یہ جد پہ آئیگی تو نس بندی کرا دیگی

اور کتنا ستم یاد کروگے صاحب

اب کتنا ہمیں برباد کروگے صاحب

خدکی اولاد نہیں ہے تو بتاؤ اتنا

کتنی مانؤکو بے اولاد کروگے صاحب

سرحد پر دہشت گردو کا قبضہ ہے

ملک پہ جھوٹے ہمدردو نکا قبضہ ہے

ایک بدلے دس سرونکی امید نہ رکھ

دل ہی تجھج پر نا مردونکا قبضہ ہے

اب روشن دان کی باتیں کرتا ہے۔

ایک کشمیر سنبھالے نہی سمبھلتا ہے

اور بلچستان کی باتیں کرتا ہے

اپنے سبھی پیادوں کی نام بدل ڈالو

تاریخی یادوں کا نام بدل ڈالو

اکبر روڈ کے نام بدل نیسے پہلے

اپنے دامادوں کا نام بدل ڈالو

٭

گُھرانے والوں کو آگ ببولا کرکے چھوڑ دیا

ادھر ادھر بس جھول رہے ہیں جھول کرکے چھوڑ دیا

امت شاہ کو لالو نے لولا کرکے چھوڑ دئیے

چائے چائے کرتے تھے۔۔۔ گائے۔۔۔ گائے کرتے ہیں

جگے ہیں دلت جب سے ہائے ہائے کرتیں ہے

تین سال باقی ہے آنے دو ذرا انہیں

دل ہی بھی یہ کہدیگی بائے بائے کرتے ہیں۔

جو نفرت کے سبب کی تھی وہ للکار کیس کی تھی

ہمارے خوون کی پیاسی تھی وہ تلوار کیس کی تھی

ہماری گردن مت کاٹیے بس یہ بتا دجیے

جیسے تم پہنکے بھاگے تھےوہ سلوار کیس کی تھی

لہو کی بات کرتا ہے قتل کی بات کرتا ہے

وہ کاروباری کے ساتھ دھن کی بات کرتا ہے

ہمارے ملک نے کیسا نمونا چن لیا ہے یارو

وطن کی بات کرنی تھی تو من کی بات کرتا ہے۔

……۔

ہاتھونکی صفائی چھپاتا ہے

وہ کالی کمائی چھوپاتا ہے

دعویٰ ہے مسیحائی کا مگر

وہ اپنی ُلگائی چھوپاتا ہے

میڈیا نے گڑہ رکھا ہے

وہ جوٹھی شان کا کیا ہوگا

جؤ بیوی کا نہ ہوا بھلا

وہ ہندُستاں کا کیا ہوگا

سنا تھا که بیحد سنہری ہے دہلی،

سمندر سی خاموش گہری ہے دہلی !

مگر ایک ماں کی صدا سن نہ پائے،

تو لگتا ہے گونگی ہے بہری ہے دہلی !!

وہ آنکھوں میں اشکوں کا دریا سمیٹے

، وہ امید کا اک نظریہ سمیٹے !

یہاں کہہ رہی ہے وہاں کہہ رہی ہے

تڈپ کرکے یہ ایک ماں کہہ رہی ہے !

کوئی پونچھتا ہی نہیں حال میرا۔۔۔۔۔!

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا۔۔۔!

اسے لے کے واپس چلی جاؤنگی میں،

پلٹ کر کبھی پھر نہیں آؤنگی میں !

بڈھاپے کا میرے سہارا وہی ہے،

وہ بچھڑا تو زندہ ہہی مر جاؤنگی میں !

میری چیخ اور میری فریاد کہنا،

یہ مودی سے اک ماں کی روداد کہنا !

کہیں جھوٹھ کی شخصیت بہہ نہ جائے،

یہ نفرت کی دیوار چھت بہہ نہ جائے !

ہے اک ماں کے اشکوں کا سیلاب صاحب،

کہیں آپکی سلطنت بہہ نہ جائے !!

وہ ہے زندگی بھر کی میری کمائی،

وہی تو ہے صدیوں کا اعمال میرا۔۔۔۔!!

کوئی لا کے دے دے مجھے لال میرا

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محمود ،میرے دوست۔۔۔۔محمود درویش

محمود ،میرے دوست

دکھ ایک ایسا سفید پرندہ ہے

جو میدان جنگ کے قریب بھی نہیں پھٹکتا

فوجی کے لیے دکھ گناہ ہے

وہاں تو میں صرف ایک مشین ہوتا ہوں

جو آگ اگلتی ہے

اور علاقے کو ایک ایسے سیاہ پرندے میں تبدیل کردیتی ہے

جو اڑ نہیں سکتا

(فوجی جو سوسن کے خواب دیکھتا ہے)

اور تم اب ہماری دہلیز پر کھڑے ہو

آؤ ،اندر آجاؤ،ہمارے ساتھ بیٹھو

اور عرب کافی کی چسکیاں لو

[شاید تم بھی محسوس کرنے لگو کہ تم بھی انسان ہو،جیسے ہم ہیں]

(محاصرے کے دوران)

ماں! کیا ہم سے کوئی غلطی ہوگئی ہے

کیوں ضروری ہے کہ ہم دو بار مریں

ایک بار تو مریں زندگی میں

اور ایک بار زندگی کے بعد

بید کے جنگلو!کیا تمھیں

کیا تمھیں یاد رہے گا کہ وہ

جسے دوسری مردہ اشیا کی طرح

تمھارے اداس سایوں میں پھینکا گیا ، ایک آدمی تھا ؟

کیا تمھیں یاد رہے گا کہ میں ایک آدمی ہوں؟

(جلاوطنی سے خط)

معدوم ہوتے لفظوں کے درمیان سے گذرنے والو!

تمھاری اور سے تلوار،ہماری طرف سے خون

تمھاری اور سے فولاد

ہماری طرف سے گوشت

تمھاری طرف سے ایک اور ٹینک

ہماری طرف سے پتھر

تمھاری طرف سے آنسو گیس

ہماری طرف سے وہی آنسو اور بارش

ہم پر بھی اور تم پر بھی آسمان

ہمارے لیے بھی اور تمھارے لیے بھی ہوا

اس لیے لے لو ہمارے خون میں سے اپنا حصہ

اور چلے جاؤ

جاؤ چلے جاؤکسی رقص کی تقریب میں

ہمیں تو ابھی آبیاری کرنی ہے

پھولوں کی ،شہیدوں کی

ہمیں تو ابھی اورزندہ رہنا ہے

جہاں تک بھی ممکن ہوسکے گا

(وہ جو لفظوں کے درمیاں گزرے)

महमूद ,मेरे दोस्त…..मेहमूद दर्वीश(फलिस्तीनी अरबी कवि

 

महमूद ,मेरे दोस्त

दु:ख एक ऐसा सफ़ैद परिंदा है

जो मैदान-ए-जंग के क़रीब भी नहीं फटकता

फ़ौजी के लिए दु:ख गुनाह है

वहां तो मैं सिर्फ एक मशीन होता हूँ

जो आग उगलती है

और इलाक़े को एक ऐसे स्याह परिंदे में तबदील कर देती है

जो उड़ नहीं सकता

(फ़ौजी जो सोसन के ख्वाब देखता है)

और तुम अब हमारी दहलीज़ पर खड़े हो

आओ ,अंदर आ जाओ,हमारे साथ बैठो

और अरब काफ़ी की चुसकीयां लो

[शायद तुम भी महसूस करने लगो कि तुम भी इन्सान हो,जैसे हम हैं]

(मुहासिरे के दौरान)

माँ! क्या हमसे कोई ग़लती हो गई है

क्यों ज़रूरी है कि हम दो बार मरें

एक-बार तो मरें ज़िंदगी में

और एक-बार ज़िंदगी के बाद

बेद के जंगलो!क्या तुम्हें

क्या तुम्हें याद रहेगा कि वो

जिसे दूसरी मुर्दा अश्या की तरह

तुम्हारे उदास सायों में फेंका गया , एक आदमी था ?

क्या तुम्हें याद रहेगा कि में एक आदमी हूँ?

(जिलावतनी से ख़त)

मादूम होते लफ़्ज़ों के दरमयान से गुज़रने वालो!

तुम्हारी और से तलवार,हमारी तरफ़ से ख़ून

तुम्हारी और से फ़ौलाद

हमारी तरफ़ से गोश्त

तुम्हारी तरफ़ से एक और टैंक

हमारी तरफ़ से पत्थर

तुम्हारी तरफ़ से आँसू गैस

हमारी तरफ़ से वही आँसू और बारिश

हम पर भी और तुम पर भी आसमान

हमारे लिए भी और तुम्हारे लिए भी हुआ

इसलिए ले लो हमारे ख़ून में से अपना हिस्सा

और चले जाओ

जाओ चले जाओ किसी रक़्स की तक़रीब में

हमें तो अभी आबयारी करनी है

फूलों की ,शहीदों की

हमें तो अभी और ज़िंदा रहना है

जहां तक भी मुम्किन हो सकेगा

चीख के निकली—मुहम्मदअली वफा

अच्छा हुआ तन्हाईयां सब साथ में रही

वरना शहर की भीड़ यहां से चीख के निकली

कब तक छुपाते तुम ये हक़ीकत को

सदा मकतुलकी खंज़र चीरके निकली

आखिरी वो सांस का कैसा था बिलकना

तल्ख हक़ीकत ये गले से तीर के निकली

दिलकश अदाएँ गज़लकी ढूंढ  रहे थे

जरा देखा तो सिरहाने मीर के निकली

 

چیخ کے نکلی….محمد علی وفا

اچھا ہوا تنہائیاں سب ساتھ میں رہی

ورنہ شہر کی بھیڑ یہاں سے چیخ کے نکلی

کب تک چھپاتے  تم یہ حقیقت کو

صدا مقتول کی خنزرکو چیر کے نکلی

آخری وہ سانس کا کیسا تھا بلکنا

تلخ حقیقت یہ گلے سے تیر کے نکلی

دلکش ادائیں غزل کی ڈھونڈھ رہے تھے

ذرا دیکھا تو سرہانے میر کے نکلی

Posted by: Bagewafa | نومبر 12, 2016

نیل کمل والے ہیں۔۔۔۔۔۔۔منور رانا

نیل کمل والے ہیں۔۔۔۔۔۔۔منور رانا

ان سے ملیے جو یہاں پھیر بدل والے ہیں

ہم سے مت بولئے ہم لوگ غزل والے ہیں

کیسے شفاف لباسوں میں نظر آتے ہیں

کون مانے گا کہ یہ سب وہی کل والے ہیں

لوٹنے والے اسے قتل نہ کرتے لیکن

اس نے پہچان لیا تھا کہ بغل والے ہیں

اب تو مل جل کے پرندوں کو رہنا ہوگا

جتنے تالاب ہیں سب نیل کمل والے ہیں

یوں بھی اک پھوس کے چھپر کی حقیقت کیا تھی

اب انہیں خطرہ ہے جو لوگ محل والے ہیں

بے کفن لاشوں کے انبار لگے ہیں لیکن

فخر سے کہتے ہیں ہم تاج محل والے ہیں

बर-ए-सग़ीर की तारीख़ का वो नफ़ीस किरदार—- अबूल-कलाम आज़ाद

वज़ीर तालीमात, भारत

ओहदा सँभाला

15 अगस्त, 1947-ए- 22 फरवरी, 1958वज़ीर आज़म जवाहर लाल नेहरू

ज़ाती तफ़सीलात

पैदाइश11 नवंबर 1888 -ए-

मक्का, हिजाज़ विलाएत, सलतनत उस्मानिया (अब सऊदी अरब)

वफ़ात 22 फरवरी 1958 (उम्र 69 साल)

दिल्ली, भारत क़ौमीयत भारत सियासी जमात इंडियन नैशनल कांग्रेस

शरीक-ए-हयात ज़ुलेखा बेगम

मज़हब इस्लाम

अबुल-कलाम मुहयुद्दीनअहमद आज़ाद : (पैदाइश 11 नवंबर,1888-ए- वफ़ात 22 फरवरी,1958-ए-) (बंगाली:*मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद का असल नाम मुहयुद्दी अहमद था उनके वालिद बुजु़र्गवार मुहम्मद ख़ैरउद्दीन उन्हें फ़ीरोज़ बख़त (तारीख़ी नाम) कह कर पुकारते थे।* *मौलाना 1888-ए-में मक्का मुअज़्ज़मा में पैदा हुए। वालिदा का ताल्लुक़ मदीना से था. सिलसिला नसब शेख़ जमाल उद्दीन से मिलता है जो अकबर-ए-आज़म के अह्द में हिन्दोस्तान आए और यहीं मुस्तक़िल सुकूनत इख़तियार करली।*

*1857ए- की जंग-ए-आज़ादी में आज़ाद के वालिद को हिन्दोस्तान से हिज्रत करनी पड़ी कई साल अरब में रहे। मौलाना का बचपन मक्का मुअज़्ज़मा और मदीना में गुज़रा। इबतिदाई तालीम वालिद से हासिल की। फिर जामिआ अज़हर(मिस्र) चले गए। चौदह साल की उम्र में उलूम मशरिक़ी का तमाम निसाब मुकम्मल कर लिया था। मौलाना की ज़हनी सलाहियतों का अंदाज़ा इस से होता है कि उन्होंने पंद्रह साल की उम्र में माहवार जरीदा लसान अल सिदक़ जारी किया। जिसकी मौलाना अलताफ़ हुसैन हाली ने भी बड़ी तारीफ़ की। 1914ए- में अलहलाल निकाला। ये अपनी तर्ज़ का पहला पर्चा था। तरक़्क़ी-पसंद सियासी तख़ैयुलात और अक़ल पर पूरी उतरने वाली मज़हबी हिदायत का गहवारा और बुलंद पाया संजीदा अदब का नमूना था।*

*मौलाना बैयक वक़त उम्दा इंशा पर्वाज, जादू बयान ख़तीब, बेमिसाल सहाफ़ी और एक बेहतरीन मुफ़स्सिर थे। अगरचे मौलाना सियासी मसलक में ऑल इंडिया कांग्रेस के हमनवा थे. लेकिन उनके दिल में मुस्लमानों का दर्द ज़रूर था। यही वजह थी कि तक़सीम के बाद जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के वक़ार को सदमा पहुंचने का अंदेशा हुआ तो मौलाना आगे बढ़े और इस के वक़ार को ठेस पहुंचाने से बचा लिया।*

*यौम तालीम*

*मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद, आज़ाद हिन्दोस्तान के पहले वज़ीर-ए-तालीम थे।उनके यौम-ए-पैदाइश 11 नवंबर, 1888-ए-को हिन्दोस्तान में क़ौमी यौम तालीम मनाया जाता है।*

*बशुक्रियह

ही उद्दीन अहमद अबुल-कलाम आज़ाद बर्रे-सग़ीर की तारीख़ का वो नफ़ीस किरदार है जो किसी तआरुफ़ का मुहताज नहीं, आप ग़ैर मुनक़सिम हिन्दोस्तान की अज़ीम और मुक़तदिर शख़्सियतों में से एक थे और यक़ीनन इलम व फ़रासत के इमाम थे। आप को समाज, मुआशरा, ज़बान ,कलाम, बयान ,मज़हब और बैन अल मज़हबी तकाबुलात और सियासत के पेच-ओ-ख़म पर उबूर हासिल था। आपने क़ुरआन की तफ़सीर लिखी, मज़हब को जाँचा,आबा-ए-की देरीना रसूमात को तर्क किया,सियासत के दश्त में आबला-पाई की,उसूल-ओ-नज़रियात को नया और मोतबर लब-ओ-लहजा दिया , सयासी बसीरत के मफ़ाहीम को नई रोशनी दी और ख़ुद-साख़्ता क़ाइदीन मिल्लत के इजतिमाई सयासी शऊर को बोना कर दिया।यक़ीनन ीह मुत्तहदा भारत का अज़ीम सरमाया था जिसे नफ़सपरसत सियासत दां समझ ना सके और आज निसफ़ सदी से ज़्यादा वक़्त गुज़र जाने के बावजूद भी उनके वीज़न,हालात की नब्ज़ शनाशी और उनकी अज़ीम सियासी बशीरत पर हम जैसे तालिब-इल्म उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने पर मजबूर हैं। मौलाना बैयक वक़त उम्दा इंशापर्दाज़, जादू बयान ख़तीब, बेमिसाल सहाफ़ी और एक बेहतरीन मुफ़स्सिर थे। अबुल-कलाम आज़ाद हर लिहाज़ से जामेअ शख़्सियत के मालिक थे उन पर अंग्रेज़ी लफ़्ज़ Polymath पूरा उतरता है जिस मैदान में क़दम रखा अपनी शख़्सियत ,इलम और साबित क़दमी की वजह से कामयाबी की मंज़िलें छूलें अपनों ने धुत्कारा, गालियां दें लेकिन इन्होंने हमेशा मुहज़्ज़ब लहजे में कलाम किया और अदब व लिहाज़ की हदूद की पासदारी मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद रहिमा अल्लाह मिल्लत-ए-इस्लामीया हिंद का रोशन चिराग़ हैं. जिसकी रोशनी बशीरत-ओ-बसारत को जिला देती है।

अब्बू उल-कलाम आज़ाद इलमदोस्त ,हुर्रियत पसंद और क़ौम परस्त मुस्लमान रहनुमा थे। ज़िंदगी का सफ़र 1888में शुरू हुआ। अमली ज़िंदगी का आग़ाज़1904से शुरू हुआ । 1923, 1930 और 1939मैं ऑल इंडिया नैशनल कांग्रेस के क़ाइम मक़ाम सदर मुक़र्रर किए गए। 1940 मैं कांग्रेस के(दुबारा।इब्न-ए-कलीम)सदर मुंतख़ब हुए और मुसलसल 1946 तक हिन्दोस्तान की सबसे बड़ी सयासी जमात के सरबराह रहे।

मौलाना आज़ाद बीस बरस की उम्र में आज़ादी की तहरीक में शामिल हुए। क़ैद-ओ-बंद का सिलसिला रांची बिहार से शुरू हुआ और क़िला अहमद नगर में 1945मैं ख़त्म हुआ। कल 68बरस और सात माह। इस में 9बरस और 8माह अंग्रेज़ की क़ैद काटी। गोया उम्र-ए-अज़ीज़ का हर सातवाँ रोज़ जेल में कटा।

मौलाना के नुक़्ता-ए-नज़र से सयासी मकालमे की मारूफ़ रिवायत में इख़तिलाफ़ भी किया जा सकता है और इस पर भी बात हो सकती है कि मौलाना आज़ाद अमली सियासत के जोड़ तोड़ से मावरा थे या नहीं? मौलाना की सियासी बशीरत, शराफ़त, बुलंद निगाही, इलमी हैसियत, वज़्अ-दारी और ख़ुद्दारी पर कोई सवाल उठाना किसी मुअर्रिख़ के लिए इतना आसान नहीं रहा, ताहम मुहम्मद अली जिनाह के सियासी कैरियर पर ये एक दाग़ है कि मुफ़ादात की बिसात पर खेले जा रहे सियासी खेल में मुस्लिम लीग की मज़हबी शनाख़्त को उजागर करने के लिए जब इन्होंने कांग्रेस को हिंदू जमात क़रार देना चाहा तो, मोहयुद्दीन अब्बू उल-कलाम आज़ाद को कांग्रेस का शो बॉय क़रार दे दिया।जबकि मौलाना को इस किस्म के हमलों का जवाब देने की आदत थी और ना ही मौलाना आज़ाद इसे ज़रूरी समझते थे। मुआमला वीज़न और शऊर का था लेकिन इस के बरख़िलाफ़ मौलाना ने अपनी तसनीफ़ में हैरानकुन तौर पर मुहम्मद अली जिनाह का एक से ज़्यादा मुक़ामात पर ना सिर्फ ये कि तज़किरा किया बल्कि मुतअद्दिद उमूर-ओ-मुआमलात में उनके नुक़्ता-ए-नज़र को मुस्तर्द करने के लिए माक़ूल लब वलहजा इख़तियार किया और उसूल वाक़लीत के मयार का पूरा लिहाज़ रखा है।

क़ायम-ए-पाकिस्तान से तक़रीबन सवा साल क़बल अप्रैल 1946 जरीदा चट्टान में क़ायम-ए-पाकिस्तान को लेकर मौलाना ने कुछ पेशीन गोईआं की थीं,ये इंटरव्यू शोरिश काश्मीरी ने लिया था। इंटरव्यू के इक़तिबासात दर्ज जे़ल हैं:

1। कई मुस्लिम ममालिक की तरह पाकिस्तान की नाअहल सियासी क़ियादत फ़ौजी आमिरों की राह हमवार करेगी।

2। बैरूनी कर्ज़ों का भारी बोझ होगा।

3। पड़ोसीयों से दोस्ताना ताल्लुक़ात का फ़ुक़दान होगा और जंग के इमकानात होंगे ।

4। दाख़िली शोरिश और इलाक़ाई तनाज़आत होंगे।

5। पाकिस्तान के सनअतकारों और नौ दुलत्तियों के हाथों क़ौमी दौलत की लूट मार होगी।

6। नौ दौलतियों के इस्तिहसाल के नतीजे में तबक़ाती जंग का तसव्वुर पैदा होगा।

7। नौजवानों की मज़हब से दूरी,अदम इतमीनान और नज़रिया पाकिस्तान का ख़ातमा हो जाएगा।

8पाकिस्तान पर कंट्रोल करने के लिए आलमी ताक़तों की साज़िशें बढ़ेंगी।

अक्तूबर 1947में जामा मस्जिद दिल्ली में मुस्लमानों के इजतिमा से ख़िताब करते हुए मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद ने ख़बरदार किया था कि:

मैं तुमसे ये नहीं कहता कि तुम हाकिमाना इक़तिदार के मदरसे से वफ़ादारी की सर्टीफिकट हासिल करो और कासालेसी की वही ज़िंदगी इख़तियार करो जो ग़ैर मुल्की हाकिमों के अह्द मैं तुम्हारा शआर रहा है। मैं कहता हूँ कि जो उजले नक़्श वनगार तुम्हें इस हिन्दोस्तान में माज़ी की यादगार के तौर पर नज़र आरहे हैं वो तुम्हारा ही क़ाफ़िला था, उन्हें भूलाओ नहीं ,उन्हें छोडो -नहीं, उनके वारिस बन कर रहो ओर समझ लो कि अगर तुम भागने के लिए तैयार नहीं तो फिर तुम्हें कोई ताक़त भगा नहीं सकती। आओ अह्द करो कि ये मुल़्क हमारा है। हम उस के लिए हैं ओ रास की तक़दीर के बुनियादी फ़ैसले हमारी आवाज़ के बग़ैर अधूरे ही रहेंगे।

यूपी से पाकिस्तान जानेवाले एक गिरोह से गुफ़्तगु करते हुए फ़रमाया था:

आप मादर-ए-वतन छोड़कर जा रहे हैं आपने सोचा उस का अंजाम क्या होगा? आपके इस तरह फ़रार होते रहने से हिन्दोस्तान में बसने वाले मुस्लमान कमज़ोर होजाएंगे और एक वक़्त ऐसा भी आसकता है जब पाकिस्तान के इलाक़ाई बाशिंदे अपनी अपनी जुदागाना हैसियतों का दावा लेकर उठ खड़े हो। बंगाली, पंजाबी, सिंध, बलोच और पठान ख़ुद को मुस्तक़िल कौमें क़रार देने लगीं। क्या उस वक़्त आपकी पोज़ीशन पाकिस्तान में बिन बुलाए मेहमान की तरह नाज़ुक और बे किसी की नहीं रह जाएगी? हिंदू आप का मज़हबी मुख़ालिफ़ तो हो सकता है ,क़ौमी मुख़ालिफ़ नहीं। आप इस सूरत-ए-हाल से निमट सकते हैं मगर पाकिस्तान में आपको किसी वक़्त भी क़ौमी और वतनी मुख़ालफ़तों का सामना करना पड़ जाये गा जिसके आगे आप बेबस होजाएंगे।

ये कोई जज़बाती अपील नहीं थी ना ही कोई नज़रियाती तक़रीर थी यहां मौलाना की सयासी बशीरत का नुक़्ता उरूज बोल रहा था और आपकी सयासी बसीरत मुस्तक़बिल में झांक रही थी। जबकि इस में कोई शुबा नहीं कि वो एक ऐसे दानिश्वर थे जिसकी निगाह-ए-दूर-रस ने भाँप लिया था कि मलिक की तक़सीम किसी तरह भी मुस्लमानों के लिए सूदमंद ना होगी।

मौलाना आज़ाद की सयासी बसीरत को सलाम किया जाना चाहिए कि सानिहा तक़सीम के बावजूद भी बड़ी हद तक मुल्क सैकूलरीज़म की राह पर गामज़न रहा और इस का सहरा बड़ी हद तक मौलाना के सर जाता है। मौलाना की क़ियादत, उनके तदब्बुर, उनकी शख़्सियत में मर्कूज़ हिन्दुस्तानी इमतिज़ाज , सैकूलरीज़म के लिए उनकी जिद्दो जहत- -मुसलसल और उनकी मुशतर्का तहज़ीब की ज़िंदा जावेद अलामत होने की बदौलत ही हिन्दोस्तान सिक्युलर बना रहा और मुल्क के मुस्लमानों की ख़ुशक़िसमती है कि मौलाना आज़ाद जैसी शख़्सियत ने उनकी रहनुमाई की ।लेकिन अलमीया ये है कि हिन्दुस्तानी क़ौमी तहरीक के अज़ीम रहनुमाओं में मौलाना आज़ाद की तालीमात को महिज़ अधूरा समझा गया है और अवाम की अक्सरीयत के सामने उनकी हैसियत बस एक क़ौम परस्त मुस्लिम रहनुमा की है। मौलाना आज़ाद रहिमअल्लाह की क़ौमी तहरीक एक जज़बाती यादगार,निशानी और भोली बसरी विरासत के तौर पर बाक़ी रह गई है जिसकी इज़्ज़त तो की जाती है मगर उसे वाज़िह और तन्क़ीदी तौर पर समझने का एहसास नहीं होता जबकि मौलाना आज़ाद पूरी ज़िंदगी सैकूलर ज़म की नुमाइंदगी करते रहे। सयासी बसीरत के नुक़्ता कमाल पर फ़ाइज़ आज़ाद के ख़ाबों का भारत एक मज़बूत ख़ुद-एधतिमादी से मामूर सैकूलर भारत था:दुनिया को हमारे इरादों के बारे में शक रहा हो मगर हमें अपने फ़ैसलों के बारे में शक नहीं गुज़रा। वक़्त का कोई उलझाओ, हालात का कोई उतार चढ़ाओ और मुआमलों की कोई चुभन हमारे क़दमों का रुख नहीं बदल सकती& इमाम उल-हिंद मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद।

अल्लामा शोरिश काश्मीरी के इन अशआर के साथ जो इन्होंने 10 मार्च 1958 मौलाना आज़ाद के मज़ार पर लिखा था:

कई दिमाग़ों का एक इंन्सां मैं सोचता हूँ कहाँ गया है

क़लम की अज़मत उजड़ गई है ज़बां से ज़ोर-ए-बयाँ गया है

उतर गए मंज़िलों के चेहरे, अमीर किया? कारवां गया है

मगर तरी मर्गे नागहां का मुझे अभी तक यक़ीं नहीं है

ये कौन उठा कि देर-ओ-काअबा शिकस्ता-दिल, ख़स्ता गाम पहुंचे

झुका के अपने दलों के पर्चम ख़वास पहुंचे अवाम पहुंचे

तरी लहद पे हो रब की रहमत, तरी लहद को सलाम पहुंचे

मगर तरी मर्गे नागहां का मुझे अभी तक यक़ीं है

بر صغیر کی تاریخ کا وہ نفیس کردار ابو الکلام آزاد

وزیر تعلیمات، بھارت

عہدہ سنبھالا

15 اگست، 1947ء – 22 فروری، 1958ءوزیر اعظم جواہر لعل نہرو

ذاتی تفصیلات

پیدائش11 نومبر 1888 ء

مکہ, حجاز ولایت, سلطنت عثمانیہ (اب سعودی عرب)

وفات22 فروری 1958 (عمر 69 سال)

دہلی، بھارت قومیت بھارت یسیاسی جماعت انڈین نیشنل کانگریس

شریک حیات زلیخہ بیگم

مذہب اسلام

ابوالکلام محی الدین احمد آزاد : (پیدائش 11 نومبر،1888ء – وفات 22 فروری،1958ء) (بنگالی:*مولانا ابوالکلام آزاد کا اصل نام محی الدین احمد تھا ان کے والد بزرگوار محمد خیر الدین انہیں فیروزبخت (تاریخی نام) کہہ کر پکارتے تھے۔* *مولانا 1888ء میں مکہ معظمہ میں پیدا ہوئے۔ والدہ کا تعلق مدینہ سے تھا سلسلہ نسب شیخ جمال الدین سے ملتا ہے جو اکبر اعظم کے عہد میں ہندوستان آئے اور یہیں مستقل سکونت اختیار کرلی۔*

*1857ء کی جنگ آزادی میں آزاد کے والد کو ہندوستان سے ہجرت کرنی پڑی کئی سال عرب میں رہے۔ مولانا کا بچپن مکہ معظمہ اور مدینہ میں گزرا۔ ابتدائی تعلیم والد سے حاصل کی۔ پھر جامعہ ازہر(مصر) چلے گئے۔ چودہ سال کی عمر میں علوم مشرقی کا تمام نصاب مکمل کر لیا تھا۔ مولانا کی ذہنی صلاحتیوں کا اندازا اس سے ہوتا ہے کہ انہوں نے پندرہ سال کی عمر میں ماہوار جریدہ لسان الصدق جاری کیا۔ جس کی مولانا الطاف حسین حالی نے بھی بڑی تعریف* *کی۔ 1914ء میں الہلال نکالا۔ یہ اپنی طرز کا پہلا پرچہ تھا۔ ترقی پسند سیاسی تخیلات اور عقل پر پوری اترنے والی مذہبی ہدایت کا گہوارہ اور بلند پایہ سنجیدہ ادب کا نمونہ تھا۔*

*مولانا بیک وقت عمدہ انشا پرداز، جادو بیان خطیب، بے مثال صحافی اور ایک بہترین مفسر تھے۔ اگرچہ مولانا سیاسی مسلک میں آل انڈیا کانگریس کے ہمنوا تھے لیکن ان کے دل میں مسلمانوں کا درد ضرور تھا۔ یہی وجہ تھی کہ تقسیم کے بعد جب علی گڑھ مسلم یونیورسٹی کے وقار کو صدمہ پہنچنے کا اندیشہ ہوا تو مولانا آگے بڑھے اور اس کے وقار کو ٹھیس پہنچانے سے بچا لیا۔*

*یومِ تعلیم*

*مولانا ابوالکلام آزاد، آزاد ہندوستان کے پہلے وزیر تعلیم تھے۔ان کے یوم پیدائش 11 نومبر، 1888ء کو ہندوستان میں قومی یومِ تعلیم منایا جاتا ہے۔*

*بشکریہ *

محی الدین احمدابوالکلام آزاد بر صغیر کی تاریخ کا وہ نفیس کردار ہے جو کسی تعارف کا محتاج نہیں، آپ غیرمنقسم ہندوستان کی عظیم اور مقتدر شخصیتوں میں سے ایک تھے اور یقینا علم وفراست کے امام تھے۔ آپ کوسماج، معاشرہ، زبان ،کلام، بیان ،مذہب اور بین المذاہبی تقابلات اور سیاست کے پیچ و خم پر عبور حاصل تھا۔ آپ نے قرآن کی تفسیر لکھی، مذہب کو جانچا،آباء کی دیرینہ رسومات کو ترک کیا،سیاست کے دشت میں آبلہ پائی کی،اصول و نظریات کو نیا اور معتبر لب و لہجہ دیا ، سیاسی بصیرت کے مفاہیم کو نئی روشنی دی اور خود ساختہ قائدین ملت کے اجتماعی سیاسی شعورکو بونا کردیا۔یقینا ًیہ متحدہ بھارت کا عظیم سرمایہ تھا جسے نفس پرست سیاست داں سمجھ نہ سکے اور آج نصف صدی سے زیادہ وقت گزر جانے کے باوجود بھی ان کے ویژن،حالات کی نبض شناشی اور ان کی عظیم سیاسی بصیرت پر ہم جیسے طالب علم انھیں خراج عقیدت پیش کرنے پر مجبور ہیں۔ مولانا بیک وقت عمدہ انشا پرداز، جادو بیان خطیب، بے مثال صحافی اور ایک بہترین مفسر تھے۔ ابوالکلام آزاد ہرلحاظ سے جامع شخصیت کے مالک تھے ان پر انگریزی لفظ Polymath پورا اترتا ہے جس میدان میں قدم رکھا اپنی شخصیت ،علم اور ثابت قدمی کی وجہ سے کامیابی کی منزلیں چھولیں اپنوں نے دھتکاراگالیاں دیں لیکن انھوں نے ہمیشہ مہذب لہجے میں کلام کیا اور ادب ولحاظ کی حدود کی پاسداری مولانا ابوالکلام آزاد رحمہ اللہ ملت اسلامیہ ہند کا روشن چراغ ہیں جس کی روشنی بصیرت و بصارت کو جلا دیتی ہے۔

ابو الکلام آزاد علم دوست ،حریت پسند اور قوم پرست مسلمان رہنما تھے۔ زندگی کا سفر 1888میں شروع ہوا۔ عملی زندگی کا آغاز1904سے شروع ہوا ۔ 1923، 1930 اور 1939میں آل انڈیا نیشنل کانگریس کے قائم مقام صدر مقرر کیے گئے۔ 1940 میں کانگریس کے(دوبارہ۔ابنِ کلیم)صدر منتخب ہوئے اورمسلسل 1946 تک ہندوستان کی سب سے بڑی سیاسی جماعت کے سربراہ رہے۔

مولانا آزاد بیس برس کی عمر میں آزادی کی تحریک میں شامل ہوئے۔ قید و بند کا سلسلہ رانچی بہار سے شروع ہوااور قلعہ احمد نگر میں 1945میں ختم ہوا۔ کل 68برس اور سات ماہ۔ اس میں 9برس اور 8ماہ انگریز کی قید کاٹی۔ گویا عمر عزیز کا ہر ساتواں روز جیل میں کٹا۔

مولانا کے نقطہ نظر سے سیاسی مکالمے کی معروف روایت میں اختلاف بھی کیا جاسکتا ہے اوراس پر بھی بات ہو سکتی ہے کہ مولانا آزاد عملی سیاست کے جوڑ توڑ سے ماورا تھے یا نہیں؟ مولانا کی سیاسی بصیرت، شرافت، بلند نگاہی، علمی حیثیت، وضع داری اور خودداری پر کوئی سوال اٹھانا کسی مورخ کے لیے اتنا آسان نہیں رہا، تاہم محمد علی جناح کے سیاسی کیرئیر پر یہ ایک داغ ہے کہ مفادات کی بساط پرکھیلے جارہے سیاسی کھیل میں مسلم لیگ کی مذہبی شناخت کو اجاگر کرنے کے لیے جب انھوں نے کانگریس کو ہندو جماعت قرار دینا چاہا تو محی الدین ابو الکلام آزاد کو کانگریس کا ”شوبوائے“ قرار دے دیا۔جبکہ مولانا کو اس قسم کے حملوں کا جواب دینے کی عادت تھی اور نہ ہی مولانا آزاد اسے ضروری سمجھتے تھے۔ معاملہ ویژن اور شعور کا تھالیکن اس کے برخلاف مولانا نے اپنی تصنیف میں حیران کن طور پر محمد علی جناح کا ایک سے زیادہ مقامات پر نہ صرف یہ کہ تذکرہ کیا بلکہ متعدد امور و معاملات میں ان کے نقطہ نظر کو مسترد کرنے کے لیے معقول لب ولہجہ اختیار کیا اوراصول وعقلیت کے معیار کا پورا لحاظ رکھا ہے۔

قیام پاکستان سے تقریبا سوا سال قبل اپریل 1946 جریدہ چٹان میں قیام پاکستان کو لے کر مولانا نے کچھ پیشین گوئیاں کی تھیں،یہ انٹرویو شورش کاشمیری نے لیا تھا۔ انٹرویو کے اقتباسات درج ذیل ہیں:

1۔ کئی مسلم ممالک کی طرح پاکستان کی نااہل سیاسی قیادت فوجی آمروں کی راہ ہموار کرے گی۔

2۔ بیرونی قرضوں کا بھاری بوجھ ہوگا۔

3۔ پڑوسیوں سے دوستانہ تعلقات کا فقدان ہوگا اور جنگ کے امکانات ہوں گے ۔

4۔ داخلی شورش اور علاقائی تنازعات ہوں گے۔

5۔ پاکستان کے صنعتکاروں اور نودلتیوں کے ہاتھوں قومی دولت کی لوٹ مار ہوگی۔

6۔ نودولتیوں کے استحصال کے نتیجے میں طبقاتی جنگ کا تصور پیدا ہوگا۔

7۔ نوجوانوں کی مذہب سے دوری،عدم اطمینان اور نظریہ پاکستان کا خاتمہ ہوجائے گا۔

8پاکستان پر کنٹرول کرنے کے لیے عالمی طاقتوں کی سازشیں بڑھیں گی۔

اکتوبر 1947میں جامع مسجد دہلی میں مسلمانوں کے اجتماع سے خطاب کرتے ہوئے مولانا ابوالکلام آزاد نے خبردارکیا تھا کہ:

”میں تم سے یہ نہیں کہتا کہ تم حاکمانہ اقتدار کے مدرسے سے وفاداری کی سرٹیفکٹ حاصل کرو اور کاسہ لیسی کی وہی زندگی اختیار کرو جو غیر ملکی حاکموں کے عہد میں تمہارا شعار رہا ہے۔ میں کہتا ہوں کہ جو اجلے نقش ونگار تمھیں اس ہندوستان میں ماضی کی یاد گار کے طور پر نظر آرہے ہیں وہ تمہارا ہی قافلہ تھا، انھیں بھلاوٴ نہیں ،انھیں چھوڑ و نہیں، ان کے وارث بن کر رہو او رسمجھ لو کہ اگر تم بھاگنے کے لیے تیار نہیں تو پھر تمھیں کوئی طاقت بھگا نہیں سکتی۔ آوٴ عہد کرو کہ یہ ملک ہمارا ہے۔ ہم اس کے لیے ہیں او را س کی تقدیر کے بنیادی فیصلے ہماری آواز کے بغیر ادھورے ہی رہیں گے۔“

یوپی سے پاکستان جانے والے ایک گروہ سے گفتگو کرتے ہوئے فرمایا تھا:

”آپ مادر وطن چھوڑ کر جارہے ہیں آپ نے سوچا اس کا انجام کیا ہوگا؟ آپ کے اس طرح فرار ہوتے رہنے سے ہندوستان میں بسنے والے مسلمان کمزور ہوجائیں گے اور ایک وقت ایسابھی آسکتا ہے جب پاکستان کے علاقائی باشندے اپنی اپنی جدا گانہ حیثیتوں کا دعویٰ لے کر اٹھ کھڑے ہوں۔ بنگالی، پنجابی، سندھ، بلوچ اور پٹھان خود کو مستقل قومیں قرار دینے لگیں۔ کیا اس وقت آپ کی پوزیشن پاکستان میں بن بلائے مہمان کی طرح نازک اور بے کسی کی نہیں رہ جائے گی؟ ہندو آپ کامذہبی مخالف تو ہوسکتا ہے ،قومی مخالف نہیں۔ آپ اس صورت حال سے نمٹ سکتے ہیں مگر پاکستان میں آپ کو کسی وقت بھی قومی اوروطنی مخالفتوں کا سامنا کرنا پڑجائے گا جس کے آگے آپ بے بس ہوجائیں گے۔“

یہ کوئی جذباتی اپیل نہیں تھی نہ ہی کوئی نظریاتی تقریر تھی یہاں مولانا کی سیاسی بصیرت کا نقطہ عروج بول رہا تھا اور آپ کی سیاسی بصیرت مستقبل میں جھانک رہی تھی۔ جبکہ اس میں کوئی شبہ نہیں کہ وہ ایک ایسے دانشور تھے جس کی نگاہِ دور رس نے بھانپ لیا تھا کہ ملک کی تقسیم کسی طرح بھی مسلمانوں کے لیے سودمند نہ ہوگی۔”

مولانا آزاد کی سیاسی بصیرت کو سلام کیا جانا چاہیے کہ سا نحہ تقسیم کے باوجود بھی بڑی حد تک ملک سیکولر زم کی راہ پر گامزن رہااور اس کا سہرا بڑی حد تک مولانا کے سر جاتا ہے۔ مولانا کی قیادت، ان کے تدبر، ان کی شخصیت میں مرکوز ہندوستانی امتزاج ، سیکولرزم کے لیے ان کی جہد مسلسل اور ان کی مشترکہ تہذیب کی زندہ جاوید علامت ہونے کی بدولت ہی ہندوستان سیکو لر بنا رہا اور ملک کے مسلمانوں کی خوش قسمتی ہے کہ مولانا آزاد جیسی شخصیت نے ان کی رہنمائی کی ۔لیکن المیہ یہ ہے کہ ہندوستانی قومی تحریک کے عظیم رہنماوٴں میں مولانا آزاد کی تعلیمات کو محض ادھورا سمجھا گیا ہے اور عوام کی اکثریت کے سامنے ان کی حیثیت بس ایک قوم پرست مسلم رہنما کی ہے۔ مولانا آزاد رحمہ اللہ کی قومی تحریک ایک جذباتی یادگار،نشانی اوربھولی بسری وراثت کے طور پر باقی رہ گئی ہے جس کی عزت تو کی جاتی ہے مگر اسے واضح اور تنقیدی طور پر سمجھنے کا احساس نہیں ہوتا جبکہ مولانا آزاد پوری زندگی سیکولرزم کی نمائندگی کرتے رہے۔ سیاسی بصیرت کے نقطہ کمال پر فائز آزاد کے خوابوں کا بھارت ایک مضبوط خود اعتمادی سے معمور سیکولر بھارت تھا:”دنیا کو ہمارے ارادوں کے بارے میں شک رہا ہو مگر ہمیں اپنے فیصلوں کے بارے میں شک نہیں گزرا۔ وقت کا کوئی الجھاوٴ، حالات کا کوئی اتار چڑھاوٴ اور معاملوں کی کوئی چبھن ہمارے قدموں کا رخ نہیں بدل سکتی“… امام الہند مولانا ابوالکلام آزاد۔

علامہ شورش کاشمیری کے ان اشعار کے ساتھ جو انھوں نے 10 مارچ 1958 مولانا آزاد کے مزار پر لکھاتھا:

کئی دماغوں کا ایک انساں میں سوچتا ہوں کہاں گیا ہے

قلم کی عظمت اجڑ گئی ہے زباں سے زور بیاں گیا ہے

اتر گئے منزلوں کے چہرے، امیر کیا؟ کارواں گیا ہے

مگر تری مرگ ناگہاں کا مجھے ابھی تک یقیں نہیں ہے

یہ کون اٹھا کہ دیر و کعبہ شکستہ دل، خستہ گام پہنچے

جھکا کے اپنے دلوں کے پرچم خواص پہنچے عوام پہنچے

تری لحد پہ ہو رب کی رحمت، تری لحد کو سلام پہنچے

ر تری مرگ ناگہاں کا مجھے ابھی تک یقیں نہیں ہے

(Courtesy:tesri Jang)

नोटबंदी के बाद मां की गुल्लक अब चर्चा में के फैसले से बचने के तरीके …………रवीश कुमार NDTV NDTV

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original

تو ابھی رہ گزر میں ہے قید مقام سے گزر۔۔۔۔ علامہ اقبال

 

 

تو ابھی رہ گزر میں ہے قید مقام سے گزر

 

مصر و حجاز سے گزر پارس و شام سے گزر

 

 

جس کا عمل ہے بے غرض اس کی جزا کچھ اور ہے

 

حور و خیام سے گزر بادہ و جام سے گزر

 

 

 

گرچہ ہے دل کشا بہت حسن فرنگ کی بہار

 

طائرک بلند بام دانہ و دام سے گزر

 


کوہ شگاف تیری ضرب تجھ سے کشاد شرق و غرب

 

تیغ ہلال کی طرح عیش نیام سے گزر

 

 

 

تیرا امام بے حضور تیری نماز بے سرور

 

ایسی نماز سے گزر ایسے امام سے گزر

तु अभी रह गुज़र में है क़ैदो मुक़ाम से गुज़र…. अल्लामा इक़बाल

 

 

 

तु अभी रह गुज़र में है क़ैद मुक़ाम से गुज़र

 

मिस्र ओ- हिजाज़ से गुज़र पारस ओ- शाम से गुज़र

 

 

जिस का अमल है बे ग़रज़ इस की जज़ा कुछ और है

 

हूर ओ- ख़य्याम से गुज़र बादह ओ- जाम से गुज़र

 

 

गरचे है दिल कशा बहुत हुस्ने फिरंग की बिहार

 

ताईरकी बुलंद बाम दाना ओ- दाम से गुज़र

 

 

 

कोह शिगाफ़ तेरी ज़रब तुझ से कुशाद शिर्क ओ- ग़र्ब

 

तेग हिलाल की तरह ऐशे नियाम से गुज़र

 

 

 

 

قتل چھپتے تھے کبھی سنگ کی دیوار کے بیچ …….محسن نقوی.

قتل چھپتے تھے کبھی سنگ کی دیوار کے بیچ

اب تو کھلنے لگے مقتل بھرے بازار کے بیچ

اپنی پوشاک کے چھن جانے پہ افسوس نہ کر

سر سلامت نہیں رہتے یہاں دستار کے بیچ

سرخیاں امن کی تلقین میں مصروف رہیں

حرف بارود اگلتے رہے اخبار کے بیچ

کاش اس خواب کی تعبیر کی مہلت نہ ملے

شعلے اگتے نظر آئے مجھے گلزار کے بیچ

ڈھلتے سورج کی تمازت نے بکھر کر دیکھا

سر کشیدہ مرا سایا صف اشجار کے بیچ

رزق، ملبوس ، مکاں، سانس، مرض، قرض، دوا

منقسم ہو گیا انساں انہی افکار کے بیچ

دیکھے جاتے نہ تھے آنسو مرے جس سے محسن

آج ہنستے ہوئے دیکھا اسے اغیار کے بیچ

       

क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच …..मोहसिन नक़वी

क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच

अब तो खुलने लगे मक़तल भरे बाज़ार के बीच

अपनी पोशाक के छिन जाने का अफ़सोस न कर

सर सलामत नहीं रहते यहाँ दस्तार के बीच

सुर्खियाँ अमन की तलकीन में मशरूफ रहीं

हर्फ़ बारूद उगलते रहे अख़बार के बीच

जिस की चोटी पे बसाया था क़बीला मैनें

ज़लज़ले जाग पड़े हैं उसी कोहसार के बीच

काश इस ख्वाब की ताबीर की मोहलत न मिले

शोले उगते नज़र आये मुझे गुलज़ार के बीच

ढलते सूरज की तमाज़त ने बिखर कर देखा

सर-कशीदा मेरा साया सफ़-ए-अश्जार के बीच

रिज़्क, मलबूस, मकाँ, साँस, मरज़, क़र्ज़, दवा

मुन्क़सिम हो गया इन्सां इन्हीं अफ़कार के बीच

देखे जाते न थे आंसू मेरे जिस से ‘मोहसिन’

आज हँसते हुए देखा उसे अगयार के बीच

मेरे अज़ीज़ दर्शको-पाठको, कुछ तो समझो इस खेल को, ये आपके ख़िलाफ़ है–रवीश कुमार

मेरे अज़ीज़ दर्शको-पाठको, कुछ तो समझो इस खेल को, ये आपके ख़िलाफ़ है–रवीश कुमार November 03, 2016 18 Comments

 

आए दिन कोई न कोई नेता या संवैधानिक प्रमुख, अपने ठोंगे से मूंगफली की तरह उलट कर ये सुझाव बांटने लगता है कि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए। हम कंफ्यूज़ हैं कि वो कौन से ‘ऐसे मामले’ हैं जिनपर  राजनीति नहीं हो सकती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ये बात कही है। खुद संवैधानिक पद पर रहते हुए आरोपी को क्रूर आतंकवादी बता कर ट्वीट कर रहे हैं, क्या ये राजनीति नहीं है? क्या ये उन्हीं ‘ऐसे मामलों’ में राजनीति नहीं है, जिन पर राजनीति न करने की सलाह बाकियों को दे रहे हैं? क्या मुख्यमंत्री को इतना तो पता होगा कि जब तक आरोप साबित नहीं होते तब तक किसी को आतंकवादी नहीं कहना चाहिए। पर वे खुलकर क्रूर आतंकवादी लिख रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि मारे गए लोग निर्दोष हैं पर सज़ा अदालत देगी या मुख्यमंत्री ट्वीटर पर देंगे। क्या इस देश में सिखों को, मुसलमानों को और बड़ी संख्या में हिन्दुओं को फर्ज़ी एनकाउंटर में नहीं मारा गया है? क्या ये सही नहीं है कि सभी दलों की सरकारों ने ये काम किया है? अगर एनकाउंटर संदिग्ध नहीं होते हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन क्यों बनाई है? क्या मुख्यमंत्री को सुप्रीम कोर्ट का आदर नहीं करना चाहिए?

 

एनकाउंटर अदालत की निगाह में एक संदिग्ध गतिविधि है। एक नहीं, सैंकड़ों उदाहरण दे सकता हूं। वैसे भी इस मामले किसी राज्य का मुख्यमंत्री कैसे बिना साबित हुए क्रूर आतंकवादी लिख सकता है। क्या हमारे राजनेता अपने ऊपर लगे आरोपों को बिना फैसले या जांच के स्वीकर कर लेते हैं? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पार्टी के नेताओं और सरकार के अधिकारियों पर व्यापम घोटाले के तहत लगे आरोपों को बिना अंतिम फैसले के स्वीकार करते हैं। जब हमारे नेताओं ने अपने लिए कोई आदर्श मानदंड नहीं बनाए तो दूसरों के लिए कैसे तय कर सकते हैं।

 

मध्य प्रदेश के एंटी टेरर स्कावड का प्रमुख कह रहा है कि भागे कैदियों के पास बंदूक नहीं थी। तो फिर तस्वीर में कट्टे कहां से दिख रहे हैं। फिर आई जी पुलिस तीन दिन से किस आधार पर कह रहे हैं कि कैदियों ने जवाबी फायरिंग की। सरपंच का बयान है कि वे पत्थर चला रहे थे। दो आई पी एस अफसरों के बयान में इतना अंतर है। क्या इनमें से कोई एक अफसर गद्दार है? देशभक्त नहीं है? क्या इनमें से कोई एक आई पी एस इन क़ैदियों से सहानुभूति रखता है? क्या हम इस स्तर तक आने वाले हैं ? रमाशंकर यादव को मारकर अमरूद की लकड़ी और तीस चादरों से सीढ़ी बना रहे थे, उस वक्त जेल प्रशासन क्या कर रहा था। क्या सिपाही लोग भी लकड़ी लाने चले गए थे ? क्या ये सवाल न पूछा जाए।

 

यह बात सबसे ख़तरनाक राजनीति है कि राजनीति नहीं होनी चाहिए। दिल्ली में एक पूर्व सैनिक ने आत्महत्या की। फिर वही बात कि राजनीति नहीं होनी चाहिए। तो क्या राजनीति बंद हो जानी चाहिए। इसे लेकर आप पाठक बिल्कुल भ्रम में न रहे कि यह बात शिवराज सिंह चौहान या बीजेपी के ही नेता मंत्री कहते हैं। आप गूगल करेंगे तो आपको सरकार में रहते हुए कांग्रेस के मंत्रियों का भी यही बयान मिलेगा। मौजूदा ग़ैर बीजेपी सरकारों के मंत्रियों का भी यही बयान मिलेगा। उनके दौर में भी ऐसे मामलों में धक्का मुक्की मिलेगी। सवाल यही है कि तब उनके और अब इनके के बीच क्या बदला? क्या बदलाव सिर्फ सत्ता पर कब्ज़े के लिए होता है? उस कब्ज़े को बनाए रखने के लिए होता है? शहीद हेमराज के घर कितना तांता लगा था। क्या वहां ये नेता तीर्थ करने गए थे? क्या वो राजनीति नहीं थी। क्या वो ग़लत राजनीति थी? आज भी शहीद हेमराज के परिवार की तमाम शिकायतें हैं। वहां जाने वाले नेताओं में कोई दोबारा गया ? तो फिर रामकिशन ग्रेवाल के परिवारों से मिलने की बात राजनीति कैसी है? क्या ये इतना बड़ा अपराध है कि एक उपमुख्यमंत्री को आठ घंटे हिरासत में ले लिया जाए। राहुल गांधी को थाने थाने घुमाया जाए। ऊपर से ग्रेवाल के बेटों के साथ जो पुलिस ने किया वो क्या था। क्या नेताओं को बेटों से न मिलने देना, राजनीति नहीं है? ऐसे मामले तो देश के होते हैं तो सरकार के मंत्री क्यों नहीं गए रामकिशन के परिवार से मिलने। क्या इस देश के नेताओं ने सैनिकों की शहादत को दलों में बांट लिया है?

 

दरअसल, आप पाठकों को यह खेल समझना होगा। हर राजनीतिक दल के भीतर राजनीति समाप्त हो गई है।  किसी दल में आंतरिक लोकतंत्र नहीं रहा। दलों के भीतर लोकतंत्र ख़त्म करने के बाद अब उनकी नज़र देश के भीतर लोकतंत्र को समाप्त करने की है। इसीलिए राजनीति नहीं करने का लेक्चर झाड़ने वाले नेताओं की बाढ़ आ गई है। उत्तर प्रदेश में आतंक के झूठे केसों में फंसाए गए नागरिकों के अधिकारों की मांग को लेकर रिहाई मंच ने प्रदर्शन किया। आप पता कीजिए कि रिहाई मंच के राजीव यादव को पुलिस ने किस कदर मारा है। वहां तो बीजेपी भी इस मसले पर चुप है और बीजेपी की सरकार पर सवाल उठाने वाले भी चुप हैं। यूपी हो या दिल्ली या मध्य प्रदेश कहीं भी सवाल करने वालों की ख़ैर नहीं है। अलग अलग संस्थानों के पत्रकारों से मिलता रहता हूं। सभी डरे हुए लगते हैं। नहीं सर,लाइन के ख़िलाफ़ नहीं लिख सकते मगर असली कहानी ये है। सही बात है, कितने पत्रकार इस्तीफा दे सकते हैं, इस्तीफा तो अंतिम हल नहीं है। क्या हमारा लोकतंत्र इतना खोखला हो गया है कि वो दस पचास ऐसे पत्रकारों का सामना नहीं कर सकता जो सवाल करते हैं। क्यों मुझसे आधी उम्र का नौजवान पत्रकार सलाह देता है कि आपकी चिन्ता होती है। कोई नौकरी नहीं देगा। क्यों वो अपनी नौकरी की चिंता में डूबा हुआ है कि कुछ लिख देंगे तो नौकरी जाएगी। इस भ्रम में मत रहिए कि ये दिल्ली की बात है। हर राज्य के पत्रकारों से यही सुन रहा हूं।

 

आप पाठक और दर्शक इतना तो समझिये कि किसी भी नेता या दल को पसंद करना आपकी अपनी राजनीतिक समझ का मामला है। आप बिल्कुल पसंद कीजिए लेकिन किसी नेता का फैन मत बनियेगा। जनता और फैन में अंतर होता है। फैन अपने स्टार की बकवास फिल्म भी अपने पैसे से देखता है। जनता वो होती है जो नेताओं का बकवास नहीं झेलती। सवालों से ही आपका अपने राजनीतिक निर्णय के प्रति भरोसा बढ़ता है। यह तभी होगा जब आम पत्रकार डरा हुआ नहीं होगा। अगर नेता इस तरह सवाल करने पर हमला करेंगे तो मेरी एक बात लिखकर पर्स में रख लीजिए। यही नेता एक दिन आप पर लाठी बरसायेंगे और कहेंगे कि देखो, हमने सवाल पूछने वाले दो कौड़ी के पत्रकारों को सेट कर दिया, अब तुम ज्यादा उछलो कूदो मत।

 

ऐसा होगा नहीं। ऐसा कभी नहीं हो सकता। निराश होने की ज़रूरत भी नहीं है।फिर भी पत्रकारों के भीतर भय के इस माहौल को दूर करने की ज़िम्मेदारी जनता की भी है। जब वो सत्ता बदल सकती है तो प्रेस के भीतर घुस रही सत्ता को भी ठीक कर सकती है। इसलिए आप किसी के समर्थक हों, सवाल कीजिए कि ये क्या अखबार है, ये क्या चैनल है, इसमें ख़बरों की जगह गुणगाण क्यों हैं। हर ख़बर गुणगाण की चासनी में क्यों पेश की जा रही है। इसमें सवाल क्यों नहीं हैं। सवाल पूछना कब देश विरोधी और लोकतंत्र विरोधी हो गया।

 

क्यों हर दूसर आदमी मीडिया की आज़ादी को लेकर बात कर रहा है? आप पाठक और दर्शक जो महीने से लेकर अब तो घंटे घंटे डेटा के पैसे दे रहे हैं, पता तो कीजिए कि वास्तविकता क्या है? हमारी आज़ादी आपकी आज़ादी की पहली शर्त है। तीन दिन से इंटरनेशनल कॉल के ज़रिये कई लोग फोन कर भद्दी गालियां दे रहे हैं, अगर आपने अपनी राजनीतिक आस्था के चलते इनका बचाव किया तो ऐसे लोगों के पास आपका भी फोन नंबर होगा। आपकी भी बारी आएगी। रामनाथ गोयनका पुरस्कार वितरण के समापन भाषण में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने प्रधानमंत्री के सामने ही एक किस्सा सुना दिया। एक बार अखबार के संस्थापक और स्वतंत्रता सेनानी रामनाथ गोयनका जी से किसी मुख्यमंत्री ने कह दिया कि आपका रिपोर्टर अच्छा काम कर रहा है। गोयनका जी ने उसे नौकरी से निकाल दिया। आज ऐसे पत्रकारों को सरकार इनाम देती है। सुरक्षा देती है। आप पाठकों को सोचना चाहिए। कल सुबह जब अख़बार देखियेगा, चैनल की हेडलाइन देखियेगा, तो सोचियेगा। और हां, कहियेगा कि ऐसे सभी मामलों में राजनीति होनी चाहिए क्योंकि राजनीति लोकतंत्र की आत्मा है। लोकतंत्र का शत्रु नहीं है। हमारी आवाज़ चली गई तो आपके हलक से पानी भी नहीं उतरेगा।

http://naisadak.org/are-you-getting-my-point-its-against-you-dear-janta/

वह गाँधी के पीछे-पीछे गया कुछ दूर – – बोधिसत्व भाई की कविता

 

एक आदमी मुझे मिला भदोही में,

वह टायर की चप्पल पहने था।

वह ढाका से आया था छिपता-छिपाता,

कुछ दिनों रहा वह हावड़ा में

एक चटकल में जूट पहचानने का काम करता रहा

वहाँ से छटनी के बाद वह

गया सूरत

वहाँ फेरी लगा कर बेचता रहा साड़ियाँ

वहाँ भी ठिकाना नहीं लगा

तब आया वह भदोही

टायर की चप्पल पहनकर

 

इस बीच उसे बुलाने के लिए

आयी चिट्ठियाँ, कितनी

बार आये ताराशंकर बनर्जी, नन्दलाल बोस

रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नज़रूल इस्लाम और

मुज़ीबुर्रहमान।

 

सबने उसे मनाया,

कहा, लौट चलो ढाका

लौट चलो मुर्शिदाबाद, बोलपुर

वीरभूम कहीं भी।

 

उसके पास एक चश्मा था,

जिसे उसने ढाका की सड़क से

किसी ईरानी महिला से ख़रीदा था,

उसके पास एक लालटेन थी

जिसका रंग पता नहीं चलता था

उसका प्रकाश काफ़ी मटमैला होता था,

उसका शीशा टूटा था,

वहाँ काग़ज़ लगाता था वह

जलाते समय।

 

वह आदमी भदोही में,

खिलाता रहा कालीनों में फूल

दिन और रात की परवाह किये बिना।

 

जब बूढ़ी हुई आँखें

छूट गयी गुल-तराशी,

तब भी,

आती रहीं चिट्ठियाँ, उसे बुलाने

तब भी आये

शक्ति चट्टोपाध्याय, सत्यजित राय

आये दुबारा

लकवाग्रस्त नज़रूल उसे मनाने

लौट चलो वहीं….

वहाँ तुम्हारी ज़रूरत है अभी भी…।

 

उसने हाल पूछा नज़रूल का

उन्हें दिये पैसे,

आने-जाने का भाड़ा,

एक दरी, थोड़ा-सा ऊन,

विदा कर नज़रूल को

भदोही के पुराने बाज़ार में

बैठ कर हिलाता रहा सिर।

 

फिर आनी बन्दी हो गयीं चिट्ठियाँ जैसे

जो आती थीं उन्हें पढ़ने वाला

भदोही में न था कोई।

भदोही में

मिली वह ईरानी महिला

अपने चश्मों का बक्सा लिये

 

भदोही में

उसे मिलने आये

जिन्ना, गाँधी की पीठ पर चढ़ कर

साथ में थे मुज़ीबुर्रहमान,

जूट का बोरा पहने।

 

सब जल्दी में थे

जिन्ना को जाना था कहीं

मुज़ीबुर्रहमान सोने के लिए

कोई छाया खोज रहे थे।

वे सोये उसकी मड़ई में…रातभर,

सुबह उनकी मइयत में

वह रो तक नहीं पाया।

 

गाँधी जा रहे थे नोआखाली

रात में,

उसने अपनी लालटेन और

चश्मा उन्हें दे दिया,

चलने के पहले वह जल्दी में

पोंछ नहीं पाया

लालटेन का शीशा

ठीक नहीं कर पाया बत्ती,

इसका भी ध्यान नहीं रहा कि

उसमें तेल है कि नहीं।

 

वह पूछना भूल गया गाँधी से कि

उन्हें चश्मा लगाने के बाद

दिख रहा है कि नहीं ।

वह परेशान होकर खोजता रहा

ईरानी महिला को

गाँधी को दिलाने के लिए चश्मा

ठीक नम्बर का

 

वह गाँधी के पीछे-पीछे गया कुछ दूर

रात के उस अन्धकार में

उसे दिख नहीं रहा था कुछ गाँधी के सिवा।

 

उसकी लालटेन लेकर

गाँधी गये बहुत तेज़ चाल से

वह हाँफता हुआ दौड़ता रहा

कुछ दूर तक

गाँधी के पीछे,

पर गाँधी निकल गये आगे

वह लौट आया भदोही

अपनी मड़ई तक…

जो जल चुकी थी

गाँधी के जाने के बाद ही।

 

वही जली हुई मड़ई के पूरब खड़ा था

टायर की चप्पल पहनकर

भदोही में

गाँधी की राह देखता।

 

गाँधी पता नहीं किस रास्ते

निकल गये नोआखाली से दिल्ली

उसने गाँधी की फ़ोटो देखी

उसने गाँधी का रोना सुना,

गाँधी का इन्तजार करते मर गयी

वह ईरानी महिला

भदोही के बुनकरों के साथ ही।

उसके चश्मों का बक्सा भदोही के बड़े तालाब के किनारे

मिला, बिखरा उसे,

जिसमें गाँधी की फ़ोटो थी जली हुई…।

 

फिर उसने सुना

बीमार नज़रूल भीख माँग कर मरे

ढाका के आस-पास कहीं,

उसने सुना रवीन्द्र बाउल गा कर अपना

पेट जिला रहे हैं वीरभूमि-में

उसने सुना, लाखों लोग मरे

बंगाल में अकाल,

उसने पूरब की एक-एक झनक सुनी।

 

एक आदमी मुझे मिला

भदोही में

वह टायर की चप्पल पहने था

उसे कुछ दिख नहीं रहा था

उसे चोट लगी थी बहुत

वह चल नहीं पा रहा था।

उसके घाँवों पर ऊन के रेशे चिपके थे

जबकि गुल-तराशी छोड़े बीत गये थे

बहुत दिन !

बहुत दिन !

– Bodhi Sattva

  (Courtesy:Himanshu Kumar Facebook)

Posted by: Bagewafa | اکتوبر 30, 2016

Kohram

‘दिवाली पर कश्मीरी शायर का पीएम मोदी को खुला ख़त, ‘मोदी जी, मौत का नंगा नाच बंद करवा दीजिये’

جوتم کروگے وہ ہم کریں گے…..منظر بھوپالی

ستم کروگے ستم کریں گے

کرم کروگے کرم کریں گے

ہم آدمی ہیں تمھارے جیسے

جوتم کروگے وہ ہم کریں گے

چلائے خنجر تو گھاؤ دیں گے

بنوگے شعلہ آلاؤ دیں گے

ہمیں ڈبونے کی سوچنا مت

تمہیں بھی کاغذ کی ناؤ دیں گے

قلم ہوئے تو قلم کریں گے

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

تم اُٹھتے ہاتھوں کو کاٹ ڈالو

کہ شہر لاشوں سے پاٹ ڈالو

پھر اگلا موسم ہمارا ہوگا

چمن کا سبزہ بھی چاٹ ڈالو

کہ ہم بھی نہ اس سے کم کریں گے

جوتم کروگے وہ ہم کریں گے

گلاب دوگے، گلاب دیں گے

محبتوں کا جواب دیں گے

خوشی کا موسم جو ہم کو دو گے

تمہیں گلوں کی کتاب دیں گے

کبھی سروں کو نہ خم کریں گے

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

وہ دیکھو ظالم کی ہار دیکھو

خدا کی لاٹھی کی مار دیکھو

پروں کو سب کے جو کاٹتا ہے

سمے کے خنجر کی دھار دیکھو

چلو کے جشن اب ہم کریں گ

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

ہواؤں کو اب لگام دے لو

سنو نہ چنگاریوں سے کھیلو

ملی جو رائی بنے گی پروت

ذرا حقیقت سے کام لے لو

ستم کے بدلے ستم کریں گے

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

ابھی رمق بھر ہے روشنی کی

کہ آس باقی ہے زندگی کی

اگر بجھایا آلاؤ تو پھر

نہ ہوگی اک بوند روشنی کی

چراغ کچھ ہم بھی کم کریں

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

نیائے تم کو پکارتا ہے

سنو جو تم میں اُدارتا ہے

ہمیشہ جیتی ہے آدمیت

جو ظلم کرتا ہے ہارتا ہے

ستم کا سر ہم قلم کریں گے

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

ستم کروگے ستم کریں گے

جو تم کروگے وہ ہم کریں گے

जो तुम करोगे वो हम करेंगे……मंजर भोपाली

सितम करोगे सितम करेंगे
करम करोग करम करेंगे
हमारी नीयत है तुम्हारी जैसी
जो तुम करोगे वो हम करेंगे

चलाये खंजर तो घाव देंगे
बनोगे शोला अलाव दोगे
हमें डुबोने की मत सोचना
तुम्हे भी कागज़ की नाव देंगे
कलम करोगे तो कलम करेंगे
जो तुम करोगे वोह हम करेंगे

तुम उठते हाथो को काट डालो
की शहर लाशोसे से पात डालो
फ़िर अगला मौसम हमारा होगा
चमन का सरदा भी छांट डालो
हम भी इससे न कम करेंगे
जो तुम करोगे वो हम करेंगे

गुलाब दोगे गुलाब देंगे
मोहाबतो का जवाब दोगे
खुशी का मौसम जो हमको देंगे
तुम्हे गुलो की किताब देंगे
कभी सर को न कलम करेंगे

वो देखो जालिम की हार देखो
ख़ुद की लाठी की मार देखो
परो को सबके जो काटता है
समय की खंजर की धार देखो.
चलो जश्न अब हम करेंगे
जो तुम करोगे वो हम करेंगे

हवाओ को अब लगाम देलो
सुनो न चिंगारियों से खेलो
मिली जो राई बनेगी पर्वत
जरा हकीकत से काम लेलो
सितम की बदले सितम करेंगे
जो तुम करोगे वोह हम करेंगे

अभी मकबर है रौशनी की
यऐ आस बाकी है जिंदगी की
अगर बुझाया अलाव तुमने
न होगी एक बूँद रौशनी की
चिराग कुछ हम भी कम करेंगे
सितम करोगे सितम करेंगे.
जो तुम करोगे वो हम करेंगे

न्याय तुमको पुकारता है
सुनो जो तुममें उदारता है
हमेशा जीती है आदमियत.
जो जुल्म करता है हारता है
सितम का सर हम कलम करेंगे
जो तुम करोगे वोह हम करेंगे

Posted by: Bagewafa | مارچ 14, 2017

How Govt.Fooling you using nationalism……Facebook


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